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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

 मुर्दहिया
डा. तुलसी राम

प्रसिद्ध चिन्तक और विचारक डा. तुलसी राम की आत्मकथा हम तद्भव में शुरू कर रहे हैं। मार्क्सवादी आंदोलन से गहरे जुड़े तुलसी राम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं और इन दिनों बौद्ध दर्शन को लेकर महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। उनके विचारों और लेखन की तरह ही उन्हें ÷ अश्वघोष' पत्रिाका के सम्पादक के रूप में भी सम्मान दिया जाता है। प्रस्तुत है उनकी आत्मकथा की पहली किस्त 

मूर्खता मेरी जन्मजात्‌ विरासत थी। मानव जाति का वह पहला व्यक्ति जो जैविक रूप से मेरा खानदानी पूर्वज था , उसके और मेरे बीच न जाने कितने पैदा हुए, किन्तु उनमें से कोई भी पढ़ा लिखा नहीं था। लगभग तेईस सौ वर्ष पूर्व यूनान देश से भारत आये मिनांदर ने कहा कि आम भारतीयों को लिपि का ज्ञान नहीं है, इसलिए वे पढ़ लिख नहीं सकते। उसके समकालीनों ने तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, किन्तु आधुनिक भारतीय पंडों ने मिनांदर का खूब खंडन मंडन किया। हकीकत तो यह है कि आज भी करोड़ों भारतीय मिनांदर की कसौटी पर खरा उतरते हैं। सदियों पुरानी इस अशिक्षा का परिणाम यह हुआ कि मूर्खता और मूर्खता के चलते अंधविश्वासों का बोझ मेरे पूर्वजों के सिर से कभी नहीं उतरा...।

शुरुआत यदि दादा से ही करूं तो पिता जी के अनुसार उन्हें एक भूत ने लाठियों से पीट पीट कर मार डाला था। अपने पांच भाइयों में पिता जी सबसे छोटे थे। घर में सभी का कहना था कि दादा जी जिनका नाम जूठन था , गांव से थोड़ा सा दूर झाड़ियों वाले टीले के पास छोटे से खेत में मटर की फसल को देर रात जानवरों से बचाने के उद्देश्य से गये थे। मटर के खेत में उन्हें फली खाता एक साही नामक जानवर दिखाई दिया, क्योंकि रात उजली थी। दादा जी ने अपनी लाठी से साही पर हमला बोल दिया। लाठी लगते ही साही रौद्र रूप धारण करते हुए अपने लम्बे लम्बे कटीले रोंगटों को फैला कर अंतरध्यान हो गया। घर वालों के अनुसार वह साही नहीं, बल्कि उस क्षेत्रा का भूत था। इस प्रकरण के बाद दादा जी खेत से डर कर तुरंत घर आ गये। इस भूत का किस्सा सारे गांव में फैल गया। डर कर हर किसी ने उधर जाना बंद कर दिया। सभी कहने लगे कि भूत बदला अवश्य लेगा।

इसी बीच दादा जी एक दिन खलिहान में रात को सोये हुए थे कि साही संतरित भूत लाठी लेकर आया और उसने दादा जी को पीट पीट कर मार डाला। दादा जी को मैंने कभी देखा नहीं था, क्योंकि उनकी यह भुतही हत्या मेरे जन्म से अनेक वर्ष पूर्व हो चुकी थी। इस हत्या की गुत्थी मेरे लिए आज भी एक उलझी हुई पहेली बनी हुई है। तर्कसंगत तथ्य तो शायद यही होगा कि दादा जी की गांव के ही किसी अन्य व्यक्ति से अवश्य ही दुश्मनी रही होगी और उसने साही भूत का मनोवैज्ञानिक बहाना निर्मित कर उन्हें मार डाला हो। सच्चाई, चाहे जो भी हो इस भुतही प्रक्रिया ने मेरे खानदान के हर व्यक्ति को घनघोर अंधविश्वास के गर्त में धकेल दिया। परिणाम स्वरूप घर में भूत बाबा की पूजा शुरू हो गयी। घर में ओझाओं का बोलबाला हो गया। किसी को सिरदर्द होते ही ओझैती सोखैती शुरू हो जाती थी। ऐसे भुतहे वातावरण में किसी शिशु का जन्म आजमगढ़ जिले के धर्मपुर नामक गांव में एक जुलाई, सन्‌ १९४९ को हुआ हो तो उसकी विरासत कैसी होगी?

जाहिर है शैशव काल में ही मैं मूर्खताजन्य अंधविश्वासों के बोझ तले दब गया। मेरी दादी का नाम मुसड़िया था। वह सौ वर्ष से भी ज्यादा जिन्दा रही। उसके चेहरे तथा बाहों से लटकते हुए चिचुके चमड़े उसकी लम्बी उम्र को प्रमाणित करते थे। गांव वालों का कहना था कि मेरी दादी कौआ का मांस खायी है , इसलिए वह मरती नहीं है। गांव में यह किम्वदंती फैली हुई थी कि कौवे का मांस खाने वाला बहुत दिन तक जिन्दा रहता है। जो भी हो दादी कहती थी कि महीने के किसी पक्ष के त्रायोदशी के दिन मेरे पिता जी का जन्म हुआ था, इसलिए उनका नाम तेरसी पड़ा। मेरी माता का नाम धीरजा था। मेरे पिता जी को मछली मारने में महारत हासिल थी। वे किसी भी जलस्रोत से बड़ी आसानी से मछलियां मार लाते थे। ÷ मछरमरवा' के रूप में उन्हें उस क्षेत्रा में पौराणिक ख्याति मिली हुई थी। लोग कहीं भी मछली मारने जाते, वे पिता जी से प्रार्थना करते थे कि साथ चल कर वह पानी छू भर दें, बस मछली सबको मिल जाएगी। बाद में मेरी मां ने मुझे बताया कि जिस चारपाई पर मैं पैदा हुआ, उसके नीचे तुरंत पिता जी ने गांव स्थित पोखरी से एक जिन्दा मछली पकड़ कर डाल दिया। यह एक प्रकार का टोटका था, जिसके अनुसार उनका विश्वास था कि मुझे भी बड़ा होने पर ÷ मछरमरवा' के रूप में पौराणिक ख्याति मिल सकेगी। सम्भवतः मेरे मां बाप की सर्वोच्च आकांक्षाओं की पहुंच मुझे एक सिद्धहस्त ÷ मछरमरवा' के रूप में देखने तक ही सिमट कर रह गयी थी। जाहिर है एक दलित खेत मजदूर और मजदूरनी की आकांक्षा इससे ज्यादा और क्या हो सकती थी? मां ने यह भी बताया कि उसके कई बच्चे पहले पैदा हुए किन्तु थोड़ा बड़ा हो होकर सबके सब मरते चले गये। इसलिए जब मैं पैदा हुआ, तो पिता जी मुझे अपनी गोद में लेकर गांव से करीब डेढ़ किलामीटर दूर एक शिव मंदिर, जिसे शेरपुर कुटी कहते थे, पहुंचे और मंदिर के महंत बाबा हरिहर दास से आशीर्वाद देने के लिए विनती की। बाबा हरिहर दास बड़े उदार पुरुष थे। उन्होंने मुझे जीवित रहने का आशीर्वाद देते हुए मेरा नाम तुलसी राम रखा। बाबा का कहना था कि तुलसी राम रामभक्त थे। अतः यह लड़का भी बड़ा होकर तुलसी राम के रूप में रामभक्त होगा। मुझे जीवित रखने की प्रक्रिया में पिता जी स्वयं एक कट्टर शिवभक्त हो गये। उन्होंने घर के पास एक नया पीपल का पेड़ लगाया और उसकी पूजा शुरू कर दी। शनिवार के दिन वे पीपल पर पानी चढ़ाते और शाम को घी का दिया जलाते। वे शिव की प्रार्थना में जो कुछ बोलते, उसे सुन कर ऐसा लगता था कि मानो वे किसी से लगातार रो रोकर बातें कर रहे हों। पिता जी के अनुसार, जैसे जैसे पीपल बढ़ता गया, वैसे वैसे मैं भी। इस बीच उस जर्जर बुढ़िया दादी का लगाव भी मुझसे बढ़ता गया।

जब मैं तीन साल का हुआ , गांव में चेचक की महामारी आयी। मेरे ऊपर उसका गहरा प्रकोप पड़ा। चेचक से मैं मरणासन्न हो गया। घर में स्थानीय ग्रामीण देवी देवताओं की पूजा शुरू हो गयी। उस समय गांव में दलितों के अलग देवी देवता होते थे, जिनकी पूजा सवर्ण नहीं करते थे। हमारे गांव में भी ÷ चमरिया माई' और ÷ डीह बाबा' दो ऐसे ही देवी देवता थे, जिनकी पूजा दलित करते थे। इन दोनों को सूअर तथा बकरे की बलि दी जाती थी। बलि के अलावा इन्हें ÷ हलवा सोहारी' ( पूड़ी), ÷ धार' तथा ÷ पुजौरा' भी चढ़ाया जाता था। एक लोटा पानी में कुछ जायफल, छोहाड़ा, लौंग आदि मिला दिया जाता, जिसे ÷ धार' कहते थे। एक मुट्ठी जौ का आटा ÷ पुजौरा' कहलाता था। चमरिया माई का स्थान उसी मटर वाले भुतहे खेत के पास झाड़ियों वाले टीले पर था। वहां कुम्हार के आंवा में पके मिट्टी के कुछ हाथी और घोड़े रखे हुए थे। यही हाथी घोड़े गांव के ब्राह्मणों के घरों के पास डीह बाबा के स्थान पर भी रखे हुए थे। जैसा कि अवगत है घर वाले भूत की भी पूजा करते थे, किन्तु गांव में चमरिया माई या डीह बाबा की तरह उसका कोई स्थान निर्धारित नहीं था। गांव के दक्षिण पश्चिम कोण की दिशा में थोड़ी दूर पर दौलताबाद नामक एक दूसरा गांव था, जिसके बाहर एक सुनसान जगह पर बहुत पुराना पीपल का विशाल पेड़ था। घर वालों के अनुसार वह भूत उसी पेड़ पर रहता था। अतः वहीं जाकर उसकी पूजा की जाती थी। चेचक निकलने पर मनौती के अनुसार देवी ÷ शीतला माई' की भी पूजा की जाती थी। शीतला माई का मंदिर गांव से करीब बीस किलोमीटर पश्चिमोत्तर में निजामाबाद कस्बे के पास था। वहां साल में एक बार गांव के सारे दलित मिल जाते और शीतला माई को सूअर के बच्चे की बलि के अलावा ÷ हलवा सोहारी' भी चढ़ायी जाती थी। शीतला माई को अति प्रसन्न रखने के लिए मंदिर में वेश्याओं का नृत्य भी कराया जाता था। ऐसी नृत्यांगनाएं मंदिर के पास बड़ी आसानी से मिल जाती थीं।

मेरे ऊपर चेचक का प्रकोप इतना जबर्दस्त था कि जीवित रहने की उम्मीद घर वाले लगभग छोड़ चुके थे। उपरोक्त देवी देवताओं की मनौती के अलावा कोई चिकित्सीय इलाज किसी भी तरह सम्भव नहीं था ; क्योंकि घर वाले घोर अंधविश्वास के कारण दवा लेने से हठ के साथ इनकार कर देते थे। वैसे भी उन दिनों चेचक लाइलाज बीमारी थी। घर वाले इसे शीतला माई का प्रकोप समझते थे। पास के गांव से एक ओझा आता और कभी भी स्पष्ट न होने वाले कथित मंत्राों को बड़बड़ाते तथा लौंग तोड़ते हुए झाड़ फूक करता था। वह नीम के पेड़ की छोटी डाल तोड़ कर पत्ते समेत पूरी देह पर फेरता रहता था। उधर मेरी बुढ़िया दादी जो चमरिया माई की अटूट भक्तिन थी, कंडे की आग में घी डाल डाल कर ÷ जय चमरिया माई', ÷ जय चमरिया माई' की बार बार रट लगाते हुए अगियारी करती रहती थी। दादी मेरी मां से ज्यादा रोती रहती थी। अंततोगत्वा चेचक की आवश्यक बीमारी वाली अवधि समाप्त होने के साथ मैं ठीक होने लगा। घर वाले अटूट विश्वास के साथ कहते कि उनकी पूजा पाठ से जिन्दा बच गया। इस बीच विभिन्न मनौतियांें में सूअरों, बकरों की बलि में भैंसा भी शामिल हो चुका था। मेरी जान तो बच गयी, किन्तु चेचक का प्रकोप हटते ही मेरी पूरी देह पर गहरे गहरे घाव के दाग पड़ गये। विशेष रूप से मेरा चेहरा इन दागों का भंडारण क्षेत्रा बन गया। गांव में लोहार अनाज से मिट्टी या कंकड़ निकालने के लिए लोहे की पतली चद्दर काट कर उसे बड़ी चलनी का रूप देते थे और उसकी पेंदी में पतली छेनी से सैकड़ों छेद कर देते थे, जिसे ÷ आखा' कहते थे। आखा की पेंदी का बाहरी हिस्सा छेनी के छेद से खुरदुरा हो जाता था। मेरा चेहरा इसी आखा के बाहरी हिस्से जैसा हो गया था। इस पूरे प्रकरण में मेरे शेष जीवन पर अत्यंत दूरगामी प्रभाव डालने वाली घटना घटी - चेचक से मेरी दायीं आंख की रोशनी हमेशा के लिए विलुप्त हो गयी। भारत के अंधविश्वासी समाज में ऐसे व्यक्ति ÷ अशुभ' की श्रेणी में हमेशा के लिए सूचीबद्ध हो जाते हैं। ऐसी श्रेणी में मेरा भी प्रवेश मात्रा तीन साल के अवस्था में हो गया। अतः घर से लेकर बाहर तक सबके लिए मैं ÷ अपशकुन' बन गया।

मेरे गांव में मेरे अलावा कई अन्य व्यक्ति भी अपशकुन की श्रेणी में आते थे। एक थे करीब अस्सी वर्ष के बूढ़े ब्राह्मण जंगू पांडे। वे जीवन पर्यन्त कुंआरे रह गये थे। उनका अपना कोई नहीं था। शाम के समय वे अकसर घूमते हुए दलित बस्ती में आ जाते थे। उनके आते ही विभिन्न परिवारों में खलबली मच जाती थी। नयी नयी बहुओं को लोग घर के अंदर ही रहने के लिए हिदायत देते रहते थे। लोगों का मानना था कि जंगू पांडे की निगाह पड़ते ही बहुओं का अनिष्ट हो जाएगा। सम्भवतः वे निर्वंश हो जाएंगी। इस संदर्भ में एक घटना याद आने पर आज भी दुख की अनुभूति होती है। मेरे घर के पास एक आम के पेड़ में खूब बौर आये थे। अचानक जंगू पांडे आकर आम के बौरों को देखने लगे क्योंकि बौर बहुत अच्छे लग रहे थे। मेरे घर वालों ने कहना शुरू कर दिया कि जंगू पांडे की नजर लग गयी। अब फल नहीं आयेंगे। जबकि बाद में खूब फल आये। इसी तरह गांव की एक अन्य बुढ़िया ब्राह्मणी थी , जिसका नाम किसी को मालूम नहीं था। वह सिर्फ ÷ पंडिताइन' के रूप में जानी जाती थी। पंडिताइन निर्वंश विधवा थी। उन्हें भी लोग देखना पसंद नहीं करते थे। गांव भर के लोगों का कहना था कि पंडिताइन का सामना हो जाने से किसी काम में सफलता नहीं मिलेगी। किसी काम से जाते हुए यदि पांडे का सामना किसी से हो जाता, तो वह लौट कर घर वापस आ आता और थोड़ी देर तक ठहर कर अपशकुन मिटाता, फिर काम पर जाता। यद्यपि जंगू पांडे और वह पंडिताइन बेहद शराफत से बातें करते थे, फिर भी उन मान्यताओं के चलते वे बिना किसी कारण अपमानित होते रहते थे। तीन वर्ष के शैशव काल में जब ÷ अशुभ अपशकुन' की श्रेणी में मेरा प्रवेश हुआ तो भारत की आजादी के पांच साल बीत चुके थे। अर्थात्‌ सन्‌ १९५२ का साल अपनी चरणसीमा की ओर बढ़ रहा था। धीरे धीरे मेरे मस्तिष्क में उस ग्रामीण परिवेश से उत्पन्न संवेदनाएं हिलने डुलने लगीं।

अपने पांच भाइयों में मेरे पिता जी सबसे छोटे थे। सभी का एक संयुक्त परिवार था , जिसमें छोटे बड़े लगभग पचास व्यक्ति एक साथ रहते थे। पिता जी के बीच वाले भाई जो वरीयताक्रम में तीसरे नम्बर पर थे, अत्यंत क्रोधी एवं क्रूर पुरुष थे। अकारण कोई भी व्यक्ति उनकी भद्दी भद्दी गालियों का शिकार बन जाता। उनके दो बेटे एकदम उन्हीं जैसे क्रूर थे। वे सभी मुझे अकसर ÷ कनवा कनवा' कह कर पुकारते थे। घर में कई अन्य भी कभी कभी ऐसा ही कहते थे, इसके अलावा यह कि कभी भी कोई वैसा कहने से मना नहीं कर पाता। यहां तक कि मेरी मां भी सिसकियां भरते हुए चुप रह जाया करती थी, जिसका कारण था उन व्यक्तियों का क्रूर व्यवहार।

मेरी दादी का मुझसे अटूट लगाव दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। मैं उस भारी भरकम संयुक्त परिवार का सबसे छोटा सदस्य था। दादी रात को भी मुझे अपने पास सुलाती और हमेशा मेरे मुंह पर हाथ फेरते हुए चमरिया माई की विनती करती रहती। मैं जैसे जैसे बड़ा होता गया , वैसे वैसे मेरा अपशकुन और अपमान भी बृहद होता गया, विशेष रूप में परिवार के अंदर। बाद में थोड़ा समझदार होने पर दादी ने बताया कि चेचक निकलने के पहले घर में सबसे छोटा होने के कारण परिवार के सभी सदस्यों में मुझे गोद में लेकर खेलाने की होड़ लगी रहती थी, किन्तु चेचक के बाद सब कुछ बदल गया। पिता जी के बीच वाले कटु हृदयी भाई का नाम नग्गर था। वे यदि घर में किसी बात से नाराज होते तो तुरंत खाना पीना छोड़ देते थे। एक तरह से वे गांधीवादी अनशन पर बैठे जाते। घर का कोई सदस्य, उन्हें मनाने के लिए थाली में खाना तथा लोटे में पानी लेकर जाता, तो वह उनकी गालियों की बौछार से सराबोर हो जाता। वे तुरंत खाना समेत थाली को वहीं उलट देते और लोटे के प्रहार से थाली को चकनाचूर कर देते। उस समय घर गांव में सबके पास कांसे या फूल नामक धातु की थालियां और लोटे हुआ करते थे, जो किसी भी तरह के प्रहार से खंड खंड हो जाते। इस तरह उनकी हर नाराजगी का शिकार कम से कम एक थाली अवश्य हुआ करती थी। अपनी इस तुनकमिजाजी से न जाने कितनी थालियां अपना अस्तित्व खो चुकी थीं। उनसे हर कोई आतंकित रहता था। उनके दोनों बेटे भी सही अर्थों में इस आतंक के उत्तराधिकारी थे। ये बाप बेटे जब कभी अच्छे मूड में होते, तो मुझे पास बुलाते और जिस आंख से मैं देख सकता था उसे हाथ से बंद करा करा कर मेरे सामने अपनी उंगलियां फैला कर गिनने के लिए कहते। ऐसी स्थिति में मुझे धुंधला सा दिखाई पड़ता था जिसके सहारे मैं विभिन्न उंगलियों को गिन कर बता देता और वे प्रसन्न हो जाते। इस प्रसन्न मुद्रा में वे हमेशा शाबाशी के रूप में कहते : ÷÷ कनवा बड़ा तेज है।'' उनकी उंगलियों को गिन गिन कर मैं भी खूब प्रसन्न रहता। किन्तु जब थोड़ा और बड़ा हुआ, तब अनुभूति हुई कि जिस गिनती की सफलता से मैं अपने को महान गणितज्ञ समझ कर खुश हो जाता था, वास्तव में वह मेरा उपहास होता था तथा वे अपने मनोरंजन के लिए मेरे साथ यह खेल खेलते थे। धीरे धीरे यह खेल मुझे बुरा लगने लगा। अत्यंत मानसिक पीड़ा होती थी, किन्तु उस धुंधली गिनती से पीछा छुड़ा लेने की हिम्मत नहीं पड़ती। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। इस संदर्भ में मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस धुंधली गिनती की परीक्षा से उत्पन्न पीड़ा मेरे जीवन की पहली मानसिक पीड़ा थी। अशुभ अपशकुन वाली पीड़ा की अनुभूति कुछ देर से आयी। इन्हीं पीड़ाओं में मेरा सारा बचपन विलुप्त हो गया और मैं अल्पायु में ही अत्यंत संवेदनशील बन गया।

 

मेरे दादा परदादा गांव के ब्राह्मण जमींदारों के खेतों पर बंधुवा मजदूर थे। उन जमींदारों ने ही कुछ खेत उन्हें दे दिया था। गांव के अन्य दलित भी उन्हीं जमींदारों के यहां हरवाही ( हल चलाने का काम) करते थे। यह हरवाही पुश्त दर पुश्त चली आ रही थी। मेरे परिवार में पिता जी के अन्य चारों बड़े भाई हरवाही नहीं करते थे, क्योंकि उनके बड़े बड़े कई बेटे थे, जिनमें से पांच आसनसोल की कोयला खदानों, कलकत्ता की जूट मिलों एवं लोहे के कारखाने में काम करते थे। किन्तु मेरे पिता जी को खानदानी हरवाही से कभी मुक्ति नहीं मिली। वे अकसर कहा करते थे कि यदि हरवाही छोड़ दूंगा तो ÷ ब्रह्महत्या' का पाप लगेगा। अत्यंत धर्मांध होने के कारण वे हरवाही को अपना जन्मसिद्ध अधिकार एवं पवित्रा कार्य समझते थे। मेरी मां भी उनके साथ मजदूरी करती थी। हमारा संयुक्त परिवार एक अजायबघर की तरह था, जिसमें तरह तरह के लोग अलग अलग तौर तरीकों के साथ रहते थे। पिता जी के सबसे बड़े भाई, जिनका नाम सोम्मर था, बारह गांवों के चमारों के चौधरी चुने गये थे। भारत की आजादी के पूर्व न जाने कब से पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्राों की एक परम्परा के अनुसार चमारों का ÷ बारहगांवा' होता था, अर्थात्‌ बारह गांव के चमारों की एक बृहद पंचायत होती थी, जिसमें कोई एक व्यक्ति सर्वसम्मति से चौधरी चुना जाता था। इस चौधरी को व्यावहारिक रूप में एक न्यायाधीश की तरह अधिकार प्राप्त होता था। ÷ बारहगांवा' के चमार अपने किसी भी आपसी झगड़े के निपटारे के लिए चौधरी के पास आते, फिर पंचायत बुलायी जाती, जिसमें घंटों की माथापच्ची के बाद चौधरी अपना अंतिम फैसला देते, जो तुरंत सभी को मान्य हो जाता था।

बारहगांवा के चौधरी के समक्ष जो समस्याएं लायी जातीं , उनमें दो मामले बड़े विचित्रा ढंग से सुलझाये जाते थे। इनमें से एक मामला होता था किसी युवती का गांव के किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन सम्बंध या उसका बिन विवाह गर्भवती हो जाना तथा दूसरा था किसी चमार द्वारा मरे हुए पशु ( गाय बैल या भैंस) का मांस खाया जाना। मरे हुए पशु का मांस खाने के संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि आजादी के पूर्व हमारे क्षेत्रा के सभी चमार गाय, बैल तथा भैंस मर जाने पर उसका मांस खा जाते थे। मेरी बुढ़िया दादी अकसर मुझे सोते समय अपनी युवा अवस्था के अनेक संस्मरण सुनाया करती थी, जो अत्यंत रोचक एवं चमत्कारिक हुआ करते थे। दादी के ये संस्मरण उसकी शतकीय उम्र को देखते हुए सम्भवतः सन्‌ १८६० या ७० के दशक के मालूम पड़ते हैं। मैं इन संस्मरणों को बहुत ध्यान से सुनता था। एक ऐसे ही संस्मरण में दादी ने बताया कि जब वह ब्याह कर हमारे गांव आयी तो देखा कि गांव में किसी की गाय, भैंस या बैल मर जाता तो पास स्थित जंगल में ले जाकर उसका चमड़ा निकाला जाता फिर उसके बाद गंड़ासे और कुल्हाड़ियों से काट काट कर उसका मांस सारे दलित बांस से बनी हुई टोकरियों में भर कर घर लाते। मांस काटने का काम प्रायः महिलाएं करती थीं। दादी यह भी बताती कि जिस समय कोई चमार पुरुष मरे हुए जानवर का चमड़ा निकालना शुरू करता अचानक सैकड़ों की संख्या में वहां गिद्ध मंडराने लगते तथा दर्जनों कुत्ते आकर भौंकने लगते थे। कुछ सियार भी चक्कर मारते किन्तु कुत्तों और महिलाओं की उपस्थिति को देखते हुए वे पास नहीं आ पाते। मरे पशु के मांस के बंदरबांट में महिलाओं के साथ कुत्तों और गिद्धों में उग्र होड़ मच जाती थी। दादी भी इस होड़ में शामिल हुआ करती थी। दादी मांस के कुछ हिस्से को आवश्यकतानुसार तुरंत पकाती किन्तु अधिकांश बचे हुए कच्चे मांस को कई दिन तक तेज धूप में सुखाती। खूब सूख जाने पर मांस को कच्ची मिट्टी से बनी कोठिली में रख कर बंद कर देती। इस प्रक्रिया से सूखे मांस का भंडारण बढ़ता जाता और साल के उन महीनों में जब खाने की वस्तुओं का टोंटा पड़ जाता तो सूखे मांस को नये तरीके से पका पका कर परिवार के लोग अपना पेट भरते। मरे हुए इन पशुओं के मांस को ÷ डांगर' कहा जाता था।

आजादी के बाद चमारों ने डांगर खाना बंद करने का अभियान चलाया , जो अत्यंत सफल रहा। स्मरण रहे कि यह अभियान मूल रूप से बाबा साहेब आम्बेडकर ने चलाया था किन्तु हमारे बारहगांवा में उन्हें कोई नहीं जानता था, बल्कि जगजीवन राम काफी लोकप्रिय थे। डांगर विरोधी अभियान की सफलता के बावजूद किसी किसी गांव में कई एक चोरी छिपे डांगर लाकर खाया करते थे। किन्तु पकड़ लिए जाने पर उनका मामला चौधरी के पास लाया जाता था। मेरे सबसे बड़े सोम्मर चाचा आजादी के पूर्व कभी चौधरी चुने गये थे। वे बड़े तर्कबाज बातूनी थे, इसलिए जीवनपर्यन्त चौधरी बने रहे। उनकी बातों में दम होता था साथ ही निष्पक्षता भी, जिसके कारण उन्हें बदल देने की आवाज बारहगांवा में कभी नहीं उठी। बारहगांवा से किसी भी मामले के आने के बाद बुलायी गयी पंचायत हमारे घर के सामने स्थित कुएं के काफी बड़े चबूतरे पर बैठ कर की जाती थी। पंचायत में बारहों गांव के प्रतिनिधि आते थे, जिसके कारण भारी भरकम भीड़ हो जाती थी। पंचायत शुरू होते ही गांजा तथा हुक्का पीने का लम्बा दौर चालू हो जाता था। स्वयं हमारे परिवार के दस लोग आला दर्जे के गजेड़ी थे। शाम के समय सभी गांजा पीते और मुझे बार बार पुआल की रस्सी की बड़ी सी गांठ बना कर, उसे जलाना पड़ता। जब जल कर वह लाल हो जाती तो उस धधकती आग को गांजे से भरी चिलम के ऊपर रखना पड़ता था। लगभग पांच साल की उम्र से ही रस्सी की गांठ जलाने की मेरी नौकरी पक्की हो गयी थी। इस काम से मुझे बड़ी नफरत थी किन्तु मजबूरी में करना पड़ता था। नफरत का सबसे बड़ा कारण था, किसी भी प्रकार के धुएं से मेरा दम घुटता था। मेरे बड़े होने पर इसकी पहचान एक एलर्जी के रूप में की गयी। पंचायत के दिन रस्सी जलाने की ड्यूटी बड़ी लम्बी हो जाती थी। इस ड्यूटी के कारण मैं मजबूरी में पूरी पंचायत खत्म होने तक उसकी कार्यवाही देखता सुनता रहता।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि यौन सम्बंध तथा डांगर खाने के मामले पंचायत द्वारा बड़े विचित्रा ढंग से सुलाझाये जाते थे। यौन सम्बंध से जुड़ी युवती के पूरे परिवार को ÷ कुजाति' घोषित कर दिया जाता था। कुजाति का मतलब होता था, उसका हुक्का पानी बंद अर्थात्‌ सम्पूर्ण रूप से बारह गांवा द्वारा बहिष्कार। उस परिवार से कोई बात तक नहीं कर सकता था। ÷ कुजाति' की घोषणा बड़े ही विचित्रा ढंग से की जाती थी। बारहगांवा में अकसर किसी न किसी के घर शादी विवाह आदि जैसे पर्व के अवसर पर सामूहिक भोज हुआ करता था। ऐसे किसी भोज में ÷ कुजाति' किये जाने वाले व्यक्ति को निमंत्रिात किया जाता और जब सभी के साथ वह खाने के लिए कतार में बैठता तो सबके साथ पत्तल में उसे भी खाना परोसा जाता। लेकिन ज्यों ही वह व्यक्ति खाना हाथ में लेकर मुंह की ओर बढ़ाता, तुरंत एक अन्य व्यक्ति उसका हाथ पकड़ लेता। फिर सभी एक साथ बोलते कि उसे ÷ कुजाति' घोषित कर दिया गया है, इसलिए वह नहीं खा सकता। कुजाति घोषित होने के बाद वह आदमी अपमानित होकर वहां से अपने घर वापस लौट जाता था। इस तरह उसका बहिष्कार शुरू हो जाता था। बाद में जब कभी कुजाति किया हुआ व्यक्ति बिरादरी में वापस आना चाहता तो वह बारहगांवा से अपील करता। पंचायत फिर बुलायी जाती और दंड स्वरूप उसे पूरे ग्राम समाज को सूअर भात खिलाने का दिन तय किया जाता। इस बीच यदि अवैध यौन सम्बंध के चलते वह युवती गर्भवती रहती तो उसका गर्भपात स्वयं गांव की महिलाएं जो बच्चा पैदा करवाने में अनुभवी होती थीं, पेट दबा दबा कर अत्यंत क्रूर ढंग से करवा देती थीं। फिर भोज के निर्धारित दिन सूअर भात पंचों का परोसने के समय चौधरी की अनुमति से युवती के ऊपर गंगाजल छिड़क कर उसे पवित्रा घोषित कर दिया जाता था। इसके बाद कुजाति परिवार के पाप को माफ करने के लिए भोज में उपस्थित पंचों से अपील की जाती। सभी पंच एक साथ जोर का नारा लगाते : ÷ बोला बोला सीताराम' इसके बाद वे कहते कि पाप माफ कर दिया गया। इसके साथ ही वह परिवार बिरादरी में वापस आ जाता था। डांगर खाने वालों के साथ भी यही दंड विधान अपनाया जाता था। छोटे मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए दोषी व्यक्ति को दंड स्वरूप विवाह आदि जैसे अवसरों पर बिछायी जाने वाली बड़ी दरी तथा खाना पकाने के लिए बड़े बड़े कांसे या पीतल के हंडे ग्राम समाज को देने के लिए कहा जाता। ऐसे सामान चौधरी या किसी अन्य व्यक्ति के घर पर रख दिये जाते थे और अवसर आने पर कोई भी व्यक्ति उसका उपयोग कर सकता था। पर्व बीत जाने पर सामानों को वापस कर दिया जाता था। सन्‌ १९५० के दशक में ऐसी पंचायतों का दलितों के बीच काफी बोलबाला था, किन्तु १९६० के दशक से धीरे धीरे ये परम्पराएं विलुप्त होने लगीं। आज के जमाने में न वैसे चौधरी रहे और न वैसी पंचायतों के नामोनिशान।

पिता जी के दूसरे नम्बर वाले भाई का नाम मुनेस्सर तथा तीसरे वही गुस्सैल नग्गर। ये दोनों उत्तर प्रदेश में प्रचलित प्रसिद्ध ÷ शिवनारायण पंथ' के ÷ धर्मगुरु' थे। इन दोनों ÷ गुरुओं' के दर्जनों अलग अलग चेले थे, जो दूर दूर के गांवों में फैले हुए थे। संयोगवश अपने गांव का कोई भी व्यक्ति इनका चेला नहीं था। मुनेस्सर चाचा कलकत्ता की एक जूट मिल में नौकरी करते थे। अतः उनके दर्जनों चेले वहां भी थे, जो मूलतः उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे। शिवनारायण पंथ के ये चेले जब भी अपने इन गुरुओं से मिलते, उनके नमस्कार करने का एक विचित्रा तरीका होता था। वे सिर पर पहले पगड़ी बांधते और फिर गुरु के सामने घुटना मोड़ कर उकडं+ू बैठ जाते। फिर दोनों हाथ एक साथ सटा हुआ फैला कर गुरु के पैरों पर रख देते थे। वे अपने सिर को दांये बांये यौगिक मुद्रा में घुमाने के बाद पैरों पर ही झुका कर जोर से बोलते, ÷ बन्दगी साहेब' । ये गुरु जब कभी चेलों के घर जाते, तो थाली में उनका पैर धोकर उस गंदे पानी को चेले पी जाते थे। हमारे घर में शिवनारायण पंथ की परम्परा में साल में तीन अवसरों पर समारोह होता, जिसमें बड़ी संख्या में चेले उपस्थित होते। ये तीन अवसर होली, दीवाली तथा कृष्णजन्माष्टमी के दिन आते। इन समारोहों को ÷ गादी लगाना' कहा जाता था। लकड़ी की बनी छोटी मेज के बराबर छोटे पैरों वाली एक चौकी रख दी जाती। उस पर साफ कपड़ा बिछा कर सुविधानुसार उपलब्ध किसी भी देवी देवता का शीशे में मढ़ा हुआ फोटो रख दिया जाता था। ढेर सारी अगरबत्तियां भी जला कर रखी जातीं। यद्यपि हमारे परिवार में कोई पढ़ा लिखा नहीं था किन्तु घर में न जाने किस भाषा में लिखी हुई एक हस्तलिखित पांडुलिपि लाल कपड़े में रखी हुई थी, जिसे ÷ अन्यास' कहा जाता था। इस पांडुलिपि को कोई व्यक्ति छू तक नहीं सकता था। इस रहस्यमय अन्यास को भी चौकी पर रख दिया जाता। इसी को गादी लगाना कहा जाता था। गादी लगाते ही चौकी के चारों तरफ गुरु समेत चेले तन्मय होकर बैठ जाते। इसके बाद ढोल, खंजीरा तथा अन्य वाद्य यंत्राों के साथ रात भर शिवनारायण के भजन गाये जाते। बीच बीच में कबीर के भी भजन गाये जाते थे। साथ ही एक बड़े कड़ाहे में दूध, घी, सूजी, गुड़ तथा किसमिश आदि के मिश्रण से ढेर सारा प्रसाद पकाया जाता, जिसका वितरण गादी समाप्त होने पर किया जाता। किसी शिवनारायण पंथी की मृत्यु हो जाने पर हिन्दुओं की तरह उसकी लाश को जलाया नहीं जाता, बल्कि मुसलमानों की तरह दफनाया जाता था। किसी किसी को गंगा नदी में बहा भी दिया जाता था। मृतकों के अंतिम संस्कार की एक विशेष बात यह होती थी कि लाश को घर से कब्रिस्तान तक ले जाते समय शवयात्राी ढोल मंजीरा के साथ भजन गाते हुए चलते थे तथा वाद्य यंत्राों की रफ्तार बेहद तेज हो जाती थी। सारे शवयात्राी मृत्यु के तीसरे दिन मृतक के घर इकट्ठा होते और भाड़ में भुने हुए गेहूं का दाना खाकर शरबत पीते। गेहूं के दाने को ÷ बहुरी' कहा जाता था। ÷ बहुरी' के संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि गांव की दलित महिलाएं आपस में झगड़ा करते समय एक दूसरे के बेटे, पिता, पति या किसी अन्य की ÷ बहुरी भुजाने' का शाप देतीं, तो इसे बहुत बुरा माना जाता था। जाहिर है ÷ बहुरी भुजाने' का मतलब होता था विपक्षी के सगे सम्बंधियों की मृत्यु कामना। बाद में मृत्यु के तेरहवें दिन ÷ तेरही' के अवसर पर बहुत बड़ा मृत्युभोज होता था। शिवनारायण पंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संस्थापक शिवनारायण स्वयं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक क्षत्रिाय थे, किन्तु उनके अनुयाई सिर्फ दलित जाति के लोग बने। सिर्फ दलितों में इस पंथ का प्रचलन अपने आप में एक रहस्यमय तथ्य है। शिवनारायण पंथी बन जाने पर उस व्यक्ति को ÷ गुरुमुख' कहा जाता था।

पिता जी के चौथे बड़े भाई का नाम मुन्नर था। वे चौधरी चाचा या दोनों शिवनारायण पंथी गुरु चाचाओं से बिल्कुल भिन्न एक समन्वयवादी किस्म के व्यक्ति थे। इसी विशेषता के कारण उन्हें परिवार का मालिक बनाया गया था। घर में जो कुछ सम्पदा थी , उसका वे हिसाब किताब रखते थे। मुन्नर चाचा भूत पिशाच में बहुत विश्वास करते थे। वे दादी की तरह चमरिया माई के भक्त थे। साल में गर्मी के दिनों में गांव भर के दलित मिल कर चमरिया माई तथा डीह बाबा की ÷ पुजैया' करते। यह पुजैया आम पूजा से भिन्न होती थी।

हर साल पुजैया के आयोजन में मुन्नर चाचा की नेतृत्वकारी भूमिका होती थी। वे गांव भर के लोगों से पुजैया के लिए अंशदान इकट्ठा करते। रात के समय सोता पड़ने के बाद गांव के बाहर मैदान में लोग इकट्ठा होकर बड़े बड़े घड़ों में धार बनाते तथा इस अवसर पर किसी न किसी ओझा या तांत्रिाक को अवश्य बुलाया जाता। ओझा लौंग तोड़ तोड़ कर विभिन्न देवियों का नाम लेकर हिचक हिचक कर विचित्रा विचित्रा शब्द ध्वनि निकालता। यह क्रम घंटों रात के सन्नाटे में चलता रहता। धार से भरे हुए घड़ों के पास लाल कपड़े की अनेक झंडियां भी रखी जाती थीं। साथ में गोल आकृति का एक बड़ा भतुआ ( एक प्रकार का कद्दू) रखा जाता। भतुआ अंदर से बिल्कुल लाल रंग का होता था। काटने पर ऐसा लगता था कि मानो खून से लथपथ हो। ओझा द्वारा औझैती समाप्त होने पर मुन्नर चाचा के नेतृत्व में धार से भरे घड़ों उठा कर कंधे पर रख लिया जाता। झंडियां पकड़ ली जातीं। चाचा भतुआ लेकर सबके आगे चलते तथा ÷ चमरिया माई एवं डीह बाबा की जय' के सर्वाधिक जोर से लगाये जाने वाले नारों के साथ लोग दूसरे गांव की सीमा में ऐसी जगह पहुंचते, जहां एक रास्ता दूसरे रास्ते को काटता है। वहां पर सबसे पहले भतुआ को पटक कर चकनाचूर कर दिया जाता तथा वह धार भी गिरा दी जाती और झंडियां गाड़ दी जातीं। इसके बाद लोग चुपके से घर वापस आ जाते। पुजैया में भतुआ का तोड़ा जाना सम्भवतः नरबलि का प्रतीक होता था। इस सालाना पुजैया के पीछे गांव वालों का अटूट विश्वास था कि अगले साल गांव में कोई बीमारी या अन्य आपदा नहीं आयेगी।

पुजैया के दूसरे दिन दलित बस्ती के सभी लोग मिल कर एक बहुत बड़ा सूअर खरीद कर लाते थे और उसकी बलि चढ़ायी जाती थी। सूअर खरीदने की प्रक्रिया बड़ी रोचक होती थी। सूअर पालने वाले दूर दूर के गांवों में रहते थे। साधारणतया दलितों में पासी जाति के लोग सूअर पालते थे। हमारे गांव में कोई पासी नहीं रहता था। किसी किसी गांव में एक या दो घर पासियों के होते थे। सूअरों को रखने के लिए दस से पंद्रह फीट का लम्बा चौड़ा , दो फीट गहरा चौकोर गड्ढा खोद कर किनारे किनारे चार या पांच फीट की ऊंची दीवार खड़ी की जाती तथा उसके ऊपर गन्ने की पत्ती से बनी मड़ई टांग दी जाती। इस मड़ई का प्रवेशद्वार बहुत संकरा तथा कमरे के अंदर की ओर छिछला होता था। इस निवास को ÷ खोभार' कहते थे, जिसमें पंद्रह बीस सूअर रहते थे। ये सूअर रात के समय ही ÷ खोभार' में आते थे। अन्यथा वे गांव के आस पास इधर उधर भोजन की तलाश में भटकते रहते थे। इसलिए सूअर खरीदने वाले भी दौड़ते हुए सूअरों का पीछा करते हुए उनमें से किसी एक को पसंद करते थे। पसंद करने के बाद कीमत तय हो जाने पर उसे पकड़ने के लिए लम्बी लम्बी सामूहिक मैराथन दौड़ लगानी पड़ती थी। कभी कभी सूअर घंटों भागता रहता था। दौड़ भी उतनी देर जारी रहती थी। अंततः उसे घेर कर मुश्किल से काबू में किया जाता था।

पकड़ने के बाद सूअर के चारों पैरों को मोटी रस्सी से एक साथ बांध दिया जाता था। फिर एक मोटे बांस की काड़ी में लटका कर दो दो आदमी आगे पीछे जिस तरह डोली कहांर उठाते हैं , वैसे, उठा कर अपने गांव लाते थे। जिस तरह उस जमाने में सवर्ण घरों की कन्याएं विवाह के बाद विदा होकर डोली में बैठ कर ससुराल जाते समय रोती चिल्लाती तथा रुदन गायकी करती रहती थीं, ये सूअर भी वैसे ही मानव कंघों पर काड़ी में बंधे तथा उल्टे लटके हुए रास्ते भर चिल्लाते रहते थे। सूअर की बलि या उसे मारने का तरीका बहुत अमानवीय होता था। सूअर को जमीन पर लेटा कर उसकी गर्दन तथा कमर के ऊपर बांस की काड़ी रख कर चार चार आदमी जोर से दबाये रहते, फिर एक आदमी द्वारा लगभग दो फीट लम्बी अत्यंत नुकीली लोहे की सरिया जिसे ÷ हिकना' कहते थे, उसके सीने में भोंक दिया जाता था। सरिया भोंकते समय सूअर बड़ी तेज आवाज में चिल्लाना शुरू कर देता था। उसकी यह आवाज मीलों दूर तक सुनाई देती थी। सूअर की चिल्लाहट के साथ ही चमरिया माई तथा डीह बाबा की जयकार भी होती रहती थी। सूअर के मरते ही ÷ हिकना' को सीने से निकाल लिया जाता और उसके गहरे घाव में उतना ही बड़ा अरहर का डंडा जिसको ÷ रहंठा' कहा जाता था, घुसेड़ दिया जाता, ताकि खून बाहर न निकले। मृत सूअर के बाल उखाड़ने के बाद उसे गन्ने की पत्ती जला कर खूब भूना जाता था, ताकि उसके चमड़े में घुसे बालों की जड़ें समाप्त हो जाएं। इसके बाद सूअर की पूंछ के पास का पूंछ समेत करीब एक किलो का मांस का बड़ा टुकड़ा सबसे पहले काट कर निकाल लिया जाता था। इस पूरे टुकड़े को पूंछ ही कहा जाता था, जिसे हमारे बारहगांवा के चौधरी चाचा को समर्पित किया जाता था। गांव में जब भी सूअर की बलि या बिना बलि वाला सूअर मारा जाता, यह एक किलो की पूंछ चौधरी के नाम पर हमारे परिवार को मुफ्त में मिलती थी। बाकी मांस आवश्यकतानुसार हर परिवार पैसे से खरीदता था। सूअर की पूंछ चौधरी चाचा की बारह गांवों में विशिष्ट प्रतिष्ठा और उनकी न्यायायिक भूमिका की मान्यता का प्रतीक थी। यह परम्परा चौधरी चाचा के जीवन पर्यन्त जारी रही।

इस तरह हमारा परिवार संयुक्त रूप से बृह्‌द होने के साथ साथ वास्तव में एक अजायबघर ही था , जिसमें भूत प्रेत, देवी देवता, सम्पन्नता विपन्नता, शकुन अपशकुन, मान अपमान, न्याय अन्याय, सत्य असत्य, ईष्या द्वेष, सुख दुख आदि आदि सब कुछ था, किन्तु शिक्षा कभी नहीं थी।

उन्हीं दिनों हमारे सदियों पुराने खानदान में एक युगांतरकारी घटना हुई। मैं लगभग पांच साल का हो चुका था। यह सन्‌ १९५४ की बात है। हमारे परिवार के जो लोग आसनसोल और कलकत्ता में खानों और मिलों में काम करते थे , कभी कभी पोस्टकार्ड पर चिट्ठियां भेजा करते थे। हमारी दलित बस्ती में कोई पढ़ा लिखा नहीं था। गांव में ब्राह्मण ही पढ़े लिखे थे। वे अकसर दलितों की चिट्ठियां पढ़ने में आनाकानी करते तथा पढ़ने के पहले अपमानजनक बातें सुनाते। इस व्यवहार से ऊब कर घर वालों की कृपा दृष्टि सबसे छोटा बालक होने के कारण मेरे ऊपर पड़ी। परिणाम स्वरूप पूर्वोक्त शिव मंदिर के पास स्थित प्रायमरी स्कूल में मुझे चिट्ठी पढ़ने लायक बनाने के उद्देश्य से भेजा जाने लगा।

अगले अंक में जारी


 

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