विश्वनाथ त्रिपाठी
• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल • सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार
• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण
• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण
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( आज की हिन्दी कविता और आज की आलोचना पर एक प्रतिक्रिया) अपनी अपूर्व बुनावट में आलोचना ऐसी है - एक नीला आइना बेठोस१ - कि समय की अनेक रंगतें उसमें झिलमिलाती हैं और वह खु+द भी उसकी अनेक तहों में शामिल है। ÷ आज की आलोचना' शीर्षक में विकट आत्मसंघर्षशील मुक्तिबोधीय आलोचना समूची है और लिखे जाते ही अतीत के गर्त में गिर रही फिलहाल की समीक्षाएं नहीं हैं। निन्दा और प्रशंसा की शब्दावली में बिलकुल सपाट और मूर्त होकर एक आलोचना दृश्य पर मौजूद है और दूसरी सभ्यता समीक्षा की तरह साहित्य विवेक के इतिहास, वर्तमान और भविष्य में अंतःसलिल और अदृश्य है। एक आलोचना पेशेवर, विश्वविद्यालयीय और निजी राय होकर समकालीन रचनाशीलता के सामने अप्रासंगिक हो गयी है, और एक और आलोचना समय और समाज की मीमांसा की अपनी अदम्य उत्कटता में दूसरी साहित्यिक अभिव्यक्तियों में ढल गयी है जहां एक कवि कहानी लिखता हुआ दृश्य पर इस तरह हस्तक्षेप करता है : ÷÷..... चावल का स्वाद फर्टिलाइजर की वजह से बिगड़ गया था और जिसकी वजह से उन्होंने चावल खाना कम कर दिया था। फर्टिलाइजर के पहले का चावल ललछहूं था, वह मीठा था और मुंह में जाते ही मुंह में तरह तरह के तरल निकलने लगते थे। मुंह में चावल इस तरह से भर जाता कि जैसे मुंह में हंसी भरी हो। लेकिन जब से गोबर की जगह दूसरी तरह की खादों का इस्तेमाल शुरू हुआ था - चावल सफेद हो गया था वियतनाम या इराक में मरे हुए अमेरिकी के चेहरे जैसा।'' २ क्या ऐसे किसी वक्तव्य को आलोचना माना जा सकता है जो हमारे समकालीनता बोध को संश्लिष्ट और दुरुस्त न करता हो। आज की आलोचना पर यह तर्कसंगत आरोप अक्सर लगता है कि वह समकालीनता से ग्रस्त है। ठीक है कि आलोचना को समकालीनता तक सीमित नहीं होना चाहिए और वैसी आलोचना हमारा अभीष्ट भी नहीं है लेकिन परम्परा और सैद्धांतिकी के नाम पर समय के सुरक्षित कोनों में विहार करना तो निहायत विचित्रा है। आखिर आलोचना कोई पुरातात्विक गतिविधि नहीं है। एक सार्थक रचनात्मक हस्तक्षेप अतीत की सभी साहित्यिक कृतियों के साथ वर्तमान के सम्बन्ध को बदलते हुए एक नये विन्यास में संयोजित कर देता है। इस तरह एक विश्वसनीय आलोचना भी, वर्तमान से भविष्य में तो जाती ही है, अतीत में भी चतुर्दिक उथल पुथल करती है। तो हमारे समय में जिन लोगों के होने के तर्क विगत के वैभव और वर्तमान की यथास्थितिवादिता में हैं वह आलोचना की समकालीनता से सर्वाधिक घबड़ाते हैं। और आलोचक! समाज द्वारा प्रदत्त कोई पद वह नहीं है , बल्कि रोलां बार्थ के शब्दों में कहें तो यह एक ÷ खास तरह से जीने की पद्धति' ३ है। कोई भी लेखक अपने महत्व या अपनी भूमिका की वजह से नहीं, बल्कि इस तथ्य से पहचाना जाता है कि वह बहस में कितना शामिल है, और विषय के साथ भाषा के सम्बंधों को कितने संश्लेष में सोच पाता है। और इस तरह किसी भी विधा में लिख रहा व्यक्ति उपन्यासकार, कहानीकार, आलोचक या कवि होने की बजाए लेखक ज्यादा है। लेखक यानी वह जो भाषा के सौन्दर्य की अपेक्षा उसकी गहराई से सम्बोधित है। इस बिन्दु पर आलोचना बिलकुल साहित्यिक अभिव्यक्ति है, और संस्थाओं या संगठनों या किसी भी के दबाव के बाहर एक आलोचक का एकांत भी उतना ही वांछित और जरूरी है जितना किसी भी लेखक का एकांत। इसी बिन्दु पर लेखक और आलोचक एक ही आदमी हैं। अजब तौर पर हिन्दी साहित्य का वर्तमान पर्यावरण इस धारणा से न तो सहमत दिखता है और न इस राह पर चलने की कोशिश करता हुआ। बल्कि यह कहना भी अतिरंजना ही है कि हिन्दी साहित्य का कोई एक वर्तमान पर्यावरण है। इस स्थिति के लिये यह कहना ठीक होगा कि यहां एक साथ अपनी अपनी संवादहीनता में निमग्न कई वर्तमान पर्यावरण हैं। हर पर्यावरण के अपने कवि हैं , अपने कथाकार और अपने आलोचक। इस समूचे दृश्य को सम्बद्ध करने वाले सूत्रा यदि कहीं हैं तो सतह पर नहीं हैं। आलोचना ही इस अभाव को दूर करती आयी है, लेकिन फिलहाल वह यह नहीं कर रही है या नहीं कर पा रही है। यह आलोचना की क्षमता से जुड़ा सवाल है कि वह पूरे परिदृश्य का संज्ञान लेने में, उसके सामान्यीकरणों में जाने का जोखिम उठाने में असमर्थ सिद्ध हो रही है। यह आलोचना समकालीन रचनाशीलता के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टियां नहीं दे पा रही है। इस असमर्थ आलोचना से जाहिर है कि आज का रचनाकार खिन्न है; जैसा कि मंगलेश डबराल ने कहा हैः ÷÷ हिन्दी आलोचना के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसकी मांग होती है कि उसे महत्व दिया जाए। उस रचना से भी ज्यादा जिसकी वह आलोचना है। आलोचना महत्वपूर्ण होने की कोशिश या दिखावा करती है। जबकि वह होती नहीं है। हिन्दी कविता की आलोचना ने अच्छी और रद्दी कविता का घालमेल करने, नामों की सूची गिनाने, इधर उधर से जांच करने और घपला करने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं किया है। हिन्दी आलोचना विश्लेषण प्रस्तुत करती है या उसका दावा करती है। कविता का विश्लेषण किया नहीं जा सकता, उसे सिर्फ समझा जा सकता है और समझने का कोई अंत नहीं होता। हिन्दी के ज्यादातर आलोचकों में यह समझ नहीं है और जब भी वे नाम गिनाते हैं तो आशंका होती है कि उनका उद्देश्य क्या है।'' ४ विश्लेषण के नाम पर फिलहाल चल रही कोशिशों का एक बड़ा हिस्सा इस रिवाज का भी शिकार है कि व्याख्या करने की कोशिश में वह कविता की अंतर्वस्तु बताने लगता है। इस क्रम में विषय भिन्न सरलीकरण करता है , कविता की विलक्षण संरचना को यादृच्छिक बखान में विघटित कर देता है और स्थूल समाजशास्त्राीय तथ्यों को व्याख्या पर चिपकाता हुआ अंततः संदिग्ध हो जाता है। सराहना की ऐसी निरीहता की वजह से एक उत्कृष्ट कविता भी अंततः एक हीनतर परिवेश का हिस्सा हो जाती है। इस विचित्रा स्थिति में कवि के आलोचनात्मक हस्तक्षेप की एक सूरत यह है कि उसकी कविता अपनी संरचनागत ताकत में अंतर्वस्तु मात्रा में विघटित होने से इंकार कर दे। उसकी कोई टीका या भाष्य न सम्भव हो। मिसाल के लिये विष्णु खरे की कविता ÷ नेहरू गांधी परिवार के साथ मेरे रिश्ते' को सोचा जा सकता है। इस कविता का अर्थ नहीं बताया जा सकता। इसके गूढ़ार्थों को डीकोड करने के लिये सुधी समालोचकों को श्रम करने की जरूरत नहीं, और पाठक और रचना के बीच किसी उपस्थिति की कोई गुंजाइश भी यहां मुमकिन नहीं। इस कविता में एक संश्लिष्ट मानवीय अनुभव की जो प्रत्यक्षता दर्ज है वह किसी भी व्याख्या या टीका के पार जाती है। जब पूंजी और तकनीक की चतुर्दिक व्याप्ति की वजह से आदमी का जीवन अप्रत्याशित दिशाओं और गंतव्यों की ओर चाहे अनचाहे बढ़ रहा हो , समय और समाज की आलोचना किसी भूतपूर्व बिन्दु पर स्थिर नहीं रह सकती। हिन्दी आलोचना के एक बड़े तबके की यह अजब समस्या है कि उसने खुद को छठें और सातवें दशक की कुछ सर्वस्वीकृत, सर्वमान्य स्थापनाओं में, प्रायः बिना उनके ठोस संदर्भों के समुचित बोध के, विलीन कर लिया है। नवलेखन के दौर में उन मूल्यों की पहचान और प्रतिष्ठा के लिये जो साहित्यिक संग्राम हुआ था, वह हमारी परम्परा का सुनहला अध्याय है। हमें उनसे प्रतिकृत होना चाहिए, इससे कोई इंकार नहीं है, लेकिन उन्हें अंतिम अकाट अपरिवर्तनीय बना कर आज की रचनाओं पर इस्तेमाल करना तो प्रतिगमन होगा। मुक्तिबोध की आलोचना के अनेक अवदानों में से एक यह भी है कि उसने नयी कविता के भीतर सक्रिय और संघर्षरत अनेक वर्गदृष्टियों को पहचाना और उनके नैतिक महत्व को प्रत्यक्ष किया था। आज उसी समाजचिन्तक आलोचना के नाम पर जिस तरह अप्रासंगिक सरलीकरण किये जा रहे हैं और उन्हें रचनाओं पर थोपा जा रहा है वह रचनाओं के साथ साथ उन महान मूल्यों के प्रति भी एक धोखा है। आलोचना की महत्वपूर्ण होने की कोशिश पुराने मानदण्डों के दम पर फतवों, सरलीकरणों और चालाक अतिरेकों का तात्कालिक विमर्श चलाने से नहीं सिद्ध होगी। उसे रचना और इसलिए समय के भीतर स्पंदित हो रहे यथार्थ के नये तत्वों को चुनौती की तरह लेना होगा। अन्यथा वह आज जितनी ही अविश्वसनीय बनी रहेगी। ऐसी आलोचना साहित्य को मात्रा ÷ लिटरेरी कंस्ट्रक्ट नहीं सोशल कन्स्ट्रक्ट या सोशल क्रिटीक' मानने का दावा करती है और टैरी ईगल्टन और एडवर्ड सईद जैसे आलोचकों को अपना आदर्श बताती हुई किसी बहुत बड़े विचारधारात्मक उच्छेद का प्रस्ताव करती है। उसके ऐसे प्रस्तावों में निहित रूढ़ि का पर्दाफाश हांलाकि तभी हो जाता है जब वह ÷ नौकर की कमीज' के मुकाबले ÷ धरती धन न अपना' को श्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध करने में गर्क होती है।५ इस आलोचना में कहने की क्रांतिकारिता खू+ब है, लेकिन विषयवस्तु के साथ भाषा का व्यवहार यदि जरा भी उसके साहित्यबोध से भिन्न हुआ तो तुरंत वह रचना के साथ किसी सामंत की तरह पेश आने लगती है। अपने समय के साहित्यिक आचरण को न समझ पाना भयानक अक्षमता तो है ही, एक तरह का अपराध भी है। प्रगतिवादी आंदोलन के दौर की आलोचना ऐसी ही जड़ता और अहंकार का शिकार हुई थी। रचना और आलोचना के बीच तब कोई द्वंद्वात्मक सम्बन्ध नहीं रह गया था और कुछ पूर्वनिर्धारित सिद्धांतों के दबाव में रचना को स्वीकृत या खारिज किया जा रहा था। एक ऐसे दौर में जब रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान और प्रकाशचंद्र गुप्त नयी कविता को नहीं समझ और सराह पा रहे थे, एक कवि ने अपने हस्तक्षेप के जरिये पिछले दौर की आलोचना की भूलों, चूकों और अहम्मन्यताओं को संशोधित किया। वैचारिक और कलात्मक सक्रियताएं एक ही समय में भिन्न भिन्न आयामों और दिशाओं में गति करती हुई परस्पर संवादरत् और संघर्षरत रहती हैं , और यह सब चेतना के स्थूल से सूक्ष्मतम विभिन्न स्तरों पर साथ साथ सम्भव होता है। यह एक लगातार प्रक्रिया है जिसमें बुरे और अच्छे के बीच संघर्ष तो होता ही है, अच्छे और अधिक अच्छे के बीच का कहीं उग्रतर संगर भी होता रहता है। यह दीगर है कि कभी इन द्वन्द्वों को कुछ सूत्राों और प्रत्ययों में परिभाषित कर लिया जाता है कभी नहीं किया जा पाता। लेकिन इनकी उपस्थिति और व्याप्ति असंदिग्ध है। अपने होने में यह समय का चरित्रालक्षण हैं। किसी जैविक जरूरत की तरह एक समाज का विवेक इस समूची प्रक्रिया को अपने में जज्ब कर लेता है और यह क्रियाशीलताएं भीतर और बाहर, दोनों की हो जाती हैं। इस विशद् वाह्य के आभ्यंतरीकरण से रचनात्मक दृश्य के प्रति एक कॉमन रेस्पान्स तैयार होता है। यह कोई ठोस बीजगणितीय रेस्पान्स नहीं है जो तैयार उपभोक्ता उत्पाद की तरह साहित्य की दुकानों, मन्दिरों और मठों में विचारहीन, व्यक्तित्वहीन, आत्महीन भक्तों को बतौर प्रसाद उपलब्ध है। यह रेस्पांस मौसम या हवा या नदी की तरह हमारे समय में अदृश्य होकर प्रवाहित है। आलोचना इस रेस्पांस को सिद्धांतों, मूल्यांकनों, विश्लेषणों, प्रतिक्रियाओं और विमर्शों में ढालती है। अनेक निजी रायें इस तरह संगठित होकर एक सामाजिक समझ बनती हैं। निजी रायों का सामाजिक समझ में रूपांतरण - यह आलोचना का कार्यभार है। इसी काम की बदौलत इतिहास और समकाल के जटिल अंधेरे रचनात्मक कोने अर्थ के आलोक में जगमगाने लगते हैं और इसी आलोचकीय कोशिश से किसी वक्त की इंटेलेक्चुअल सामर्थ्य तय होती है और जटिल माने जाने वाले रचनाकार भी लोकप्रिय हो उठते हैं। लेकिन क्या आजकल लिखी जा रही हिन्दी आलोचना पाठकीय प्रतिक्रिया से इस तरह प्रतिकृत हो पा रही है? क्या पाठक के रूप में उपलब्ध समाज से अंतक्रिया करती हुई वह कुछ खुद को कुछ अपने पाठक को बदल पा रही है? क्या उसमें एक असहमत ऑडिएंस को सम्बोधित करने की नैतिक और बौद्धिक ताकत है जो आलोचना की अनिवार्य आवश्यकता है। एडवर्ड सईद का जिक्र इस बिन्दु पर जरूरी है। ÷ सैटेनिक वर्सेस' से उपजे विवाद के दौरान सईद अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में खडे+ हुए थे। विवाद के दौरान ही वह मिस्र गये जहां पुस्तक प्रतिबंधित थी और सर्वत्रा निन्दित हो रही थी। लेकिन जाहिर है कि इस मुद्दे पर खुद से असहमत एक समाज से संवाद करते हुए उन्होंने पुस्तक का पक्ष लिया। इस घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है कि ÷ अगर कोई धारणा अलोकप्रिय है या कुछ ऐसा है जो नहीं कहा गया है तो उसे कहने की कोशिश में आप एक नयी ऑडिएंस बना लेते हैं जिसका वजूद उसके पहले शायद नहीं था।' ६ राजनीति या किसी भी दूसरे विषय या विचार से साहित्य का रिश्ता , वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण के शब्दों में कहें तो, ÷ बहुत सट कर नहीं, थोड़ा हट कर, संदर्भपरक और वक्र बनता है क्योंकि विचारों की गति तर्कमूलक और बौद्धिक होती है इसीलिए किसी हद तक योजनाबद्ध और बेलोच, जबकि साहित्य के मूल अवयव कल्पना और अनुभूति हैं।' समीक्षा भी जब साहित्य के अलावा किसी और चीज की ज्यादा तरफदार हो जाती है तब साहित्य के साथ उसका सम्बन्ध असहज हो जाना स्वाभाविक है। समीक्षा के भी साथ किसी भी अवधारणा का सम्बन्ध हमेशा के लिये तय नहीं किया जा सकता। ऐसे तयशुदा सम्बन्ध यथास्थिति के पक्ष में कुर्बान हो जाने को अभिशप्त हैं। भोपाल गैस त्राासदी और नर्मदा बचाओं सरीखे अहिंसक आंदोलनों ने बीते दशकों में देश की सभी लोकतांत्रिाक संस्थाओं का दरवाजा खटखटा कर अपना हश्र देख लिया है। लोकतंत्रा के उपलब्ध ढांचे में प्रतिरोध के सारे अहिंसक तरीके नितांत व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं। मशहूर लेखिका अरुंधति राय के खयाल से ÷ जिस देश में अन्यथा भी लोग लगातार भूखे मर रहे हैं, एक राजनीतिक हथियार के तौर पर भूख हड़ताल का इस्तेमाल भी खासा बिडम्बनामूलक है।' ९ स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स के विरोध के लिये हो रही बैठकों में, पाया गया है कि, स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स के सबसे बड़े प्रमोटरों का धन लगा हुआ है। हमारे इस नवउदारवादी लोकतंत्रा में विरोध के सारे मौजूदा तौरतरीके एक आभासी सच्चाई हो गये हैं और दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सत्ता उनका इस्तेमाल कर रही है। इस जटिल सामाजिक दृश्य में व्यापक इंसानी त्राासदी की एक कील कहीं न कहीं से रोज निकल आती है, और यह ऐसा दुख है जिसे रोज समझने का ऐतिहासिक कार्यभार रघुवीर सहाय हमें दे गये हैं। आजकल लिखी जा रही कविता पुस्तकों की समीक्षाओं ने सार्थक हिन्दी आलोचना को हतप्रभ और अवाक् करने का काम ज्यादा किया है। यह ताकत , महत्वाकांक्षा और लालच के घालमेल से तैयार एक ऐसी चीज हो गयी है जिसमें किसी भी रचना और रचनाकार को कुछ भी बताया जा सकता है। यहां लोकतंत्रा का सर्वाधिक विकृत इस्तेमाल है। यह त्राासद है कि जब हरेक को कुछ भी कहने की छूट मिली है, समीक्षा महत्वहीनता का शिकार हो रही है। मुक्तिबोध ने कहा था कि ÷ रिव्यू करना आग से खेल करना है' । आज कौन यह खेल रहा है? देवीशंकर अवस्थी का भी मानना था कि इस महत्वपूर्ण क्रिटिकल एक्टिविटी को साहित्य सृजन के केन्द्र में लाकर ही पाण्डित्यधर्मी और ठेठ जड़ आलोचना को अपदस्थ किया जा सकता है। लेकिन आज कौन ÷ विवेक के रंग' सरीखे पुस्तक समीक्षा संकलन का आयोजन कर रहा है? आलोचना को विश्वसनीय बने रहने के लिये पुस्तक समीक्षा के मोर्चे पर स्वयं को लगातार सिद्ध करना है, यह तथ्य परम्परा ने हमें बताया है और यह आज की आलोचना की क्षमता से जुड़ा एक जरूरी सवाल भी है। जब दृश्य पर परस्पर विरोधी अनेक रचना दृष्टियां एक साथ सक्रिय हों तो अपना पक्ष रखने का नैतिक दबाव भी कवियों के आलोचना लिखने का कारण , बीते दौर में बना है। फिलहाल ऐसा दबाव मौजूद नहीं है तो इसका कारण यही है कि रचनात्मक विरोध विकसित नहीं हो पा रहे हैं और असहमतियां खीझों में बदल जा रही हैं। आलोचना के नाम पर इतना सब कुछ बड़ी मात्राा में लगातार छपने के बावजूद समकालीन कविता से जुड़ा कोई एक मुद्दा आज निर्मित नहीं हो पाया है। अपवादस्वरूप कुछ फतवे गुपचुप सुनाई दे जाते हैं। इन फतवों में एक विश्रृंखलित समय में अपनी राय को जारी कर देने की चालाकी तो है, स्पष्टता और विस्तार के साथ अपना पक्ष रखने का साहस नहीं है। आलोचकों का एक बड़ा तबका हर तरह की ताकत का सहयोगी और स्वयं में एक हीनतर किस्म का सत्ता प्रतिष्ठान बना हुआ है। यहां से निकलने वाली प्रतिष्ठानपरक आलोचना निर्णय सुनाती है या आदेश देती है। यह आलोचना मूल्यांकन करने का दावा करती है लेकिन मूल्यांकन के इसके औजार कभी सामने नहीं आते। एक महत्वपूर्ण माने जाने वाले आलोचक दस पंद्रह वर्षों तक अरुण कमल की बेहद तारीफ करने के बाद, सम्प्रति, अरुण कमल को खराब और आलोक धन्वा को सर्वोत्तम कह रहे हैं। दशकों तक आलोक धन्वा की सुचिन्तित उपेक्षा और अब इस अभिनव प्रस्थान के तर्क उनकी आलोचना में कहीं मौजूद नहीं हैं। आलोक धन्वा या अरुण कमल की कविता के उत्कर्ष की वास्तविक वजहों से बहुत दूर इस रुचि परिवर्तन के कारण भय, प्रलोभन और ताकत के साहित्येतर संसार में हैं। चिकित्सा शास्त्रा की शब्दावली में कहें तो ये आलोचना एक ऐसे डॉक्टर की तरह पेश आती है जो रोगी शरीर की चीरफाड़ तो कर डाले लेकिन चीरफाड़ के जायज औजार या तो उसके पास हों ही नहीं , और हों भी तो सार्वजनिक रूप से दिखाने लायक न हों इसलिए ताकत के परदे में छिपे रहते हों। हालांकि चिकित्सा और चिकित्सकों का रूपक यहां नाकाफी साबित हो सकता है क्योंकि तमाम पतन के बावजूद ऐसे डाक्टर खोजना असम्भव है जो आपरेशन तो कर डालें लेकिन आपरेशन के उपकरण उनके पास न हों, या दिखाने लायक न हों। कुंवर नारायण की एक मशहूर कविता है जिसमें अस्पताल अस्पताल नहीं है , डॉक्टर डॉक्टर नहीं है, नर्स नर्स नहीं है और ऑपरेशन थियेटर ऑपरेशन थियेटर नहीं। अंत में वहां एक मरीज को लाया जाता है, जो बीमार नहीं, बल्कि भूखा है। उसके पेट में आपरेशन नाइफ की बजाए एक जंग लगा भयानक छुरा भोंकते हुए वह डॉक्टर, जो दरअसल डॉक्टर नहीं है, कहता है कि अब यह बिलकुल ठीक हो जाएगा। यह आलोचना भी विश्लेषण की बजाए ठीक करने का काम करती है। अशोक वाजपेयी ने अपनी आलोचना पुस्तक ÷ फिलहाल' में लिखा है कि ÷ नवलेखन के दौर में रचना प्रक्रिया पर जो बहस हमारे यहां हुई उससे कम से कम एक बात साफ देख सकने की ओर हम प्रवृत्त हुए और वह यह कि भाषा एक माध्यम मात्रा नहीं है। वह अनुभव को सम्प्रेषित भर नहीं करती, बल्कि स्वयं रचनात्मक अनुभूति का अंग है। इसका सीधा सा मतलब है कि अब तक कथ्य और शिल्प, अनुभूति और अभिव्यक्ति के बीच जो मोटा मोटा सा विभाजन हम करते थे, वह बदल गया है, उसमें निहित द्वैत रचनात्मक सत्ता के लिये अप्रासंगिक हो गया है।' जो लोग आज आलोचना में कथ्य और शिल्प के रेशे रेशे बिखेर रहे हैं, क्या उन्हें मूल्यों के लिये हुए उस महान संघर्ष की जरा भी याद है? समकालीनता का प्रतिरोध
इतिहास और परम्परा के प्रवाह में हमारा आज और अब भी व्यतीत हो जाता है। प्रवाह की , जाहिर है कि अपनी ताकत है और ऐसी ताकतवर सत्ता के सामने हरेक समकालीनता को एक मौलिक प्रतिरोध के जरिये खड़े होना होता है। नैरंतर्य किसी दौर के विवेक को सपाट और रुग्ण भी करता है और क्यों उसे हमेशा स्वीकार्य होना चाहिए? कलाओं का उत्कर्ष, स्वीकार और संघर्ष के इस विचित्रा झंझावात के दरमियान ही होता है। दृश्य पर उपलब्ध कविता के प्रति नकार के दृष्टिकोण के दम पर पतनशील उत्तरछायावादी काव्य प्रवृत्तियों के अंदर से प्रगतिवाद, प्रगतिवाद से नयी कविता, नयी कविता से एक व्यापक जनपक्षधर कविता और यों ही अपने पूर्ववर्तियों से आगामी काव्ययुग संभव होते हैं और हर दौर सर्जनात्मक संघर्ष से परम्परा को अपने लिये प्रासंगिक बनाता है। मसलन अस्सी के दशक की कविता के दृश्य पर आते ही शमशेर, नागार्जुन, त्रिालोचन और केदारनाथ अग्रवाल की कविता एक नये सिलसिले में मूल्यवान हो उठती है। कालात्मक अग्रगामिताएं कुछ ऐसे ही दिक् और काल का विध्वंस करती हुई रास्ता बनाती हैं। एक युगबोध से आगामी में दाखिल होने के संक्रांति काल में सर्जनात्मकता के विभिन्न आयामों से पैदा दबाव की वजह से साहित्य रूपों की शुद्धता का खयाल नहीं रखा जा पाता और नहीं रखा जाना चाहिए। लेकिन ऐसी हालत में रचनात्मकता की प्रशंसाओं को नैतिक, या आगे बढ़ कर राजनीतिक होना होता है और आलोचना पर बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है। ऐसे समय में मान लीजिए कि एक कृति विलक्षण सौन्दर्यात्मक आनन्द ( एस्थेटिक प्लीजर) दे रही है तो यही उस कृति का यथार्थ नहीं है, बल्कि एक बड़े यथार्थ का लक्षण मात्रा है। इस कृति की सौन्दर्यात्मकता को आस्वाद में घटा कर पहचानने का आलोचनात्मक तेवर भी राजनीति करता है और यथास्थिति की राजनीति करता है। आस्वाद से शुरूआत भर हो सकती है, लेकिन आस्वाद में ही यदि अंत भी हो तो इसमें विवेक का अंत भी शामिल है क्योंकि वही कृति प्रदत्त अवधारणाओं से टकराती हुई नितांत व्यावहारिक उलझनें खड़ी करती है, और रचनात्मक सुख को विरोध की बौद्धिकता में रूपांतरित करने की चुनौती आलोचना पर अब आ जाती है। एक बड़ी रचना चुनौती का नया परिसर बनाती है और आलोचना को उसमें दाखिल होना होता है। लेकिन जिस आलोचना का उद्देश्य अपनी काव्यदृष्टि का डिफेन्स भर करना हो, उससे नयी चुनौतियों के स्वीकार के उपर्युक्त साहस की उम्मीद एक ज्यादा बड़ी उम्मीद हो जाएगी। हिन्दी की हर आगामी कविता इस दिलचस्प अवरोध से टकराती हुई आयी है कि उसे कदम कदम पर नकारात्मक सम्मतियां मिली हैं। मसलन १९८५ के बाद की कविता। उसे अराजनीतिक और छोटे छोटे विषयों और आशयों की कविताएं कहा गया है। ÷ घर परिवार गृहस्थी प्रकृति लोकजीवन के सुकोमल दृश्य और बिम्ब जो दृश्यपटल पर जरा सा ठहर कर विसर्जित हो जाते हैं, इधर की कविता में लगातार बढ़ते गये हैं। कह सकते हैं कि कविता ज्यादा घरेलू और पालतू हो गयी है। एक सीमा तक यह अच्छा है, लेकिन यही यदि मुख्य कर्तव्य बन जाए तो अधिक से अधिक कनिष्ठ कविता ( माइनर पोएट्री) का सृजन हो सकता है' ८। यहां यह बताना काफी दिलचस्प होगा कि खुद अरुण कमल के दौर की कविता के बारे में मैनेजर पाण्डेय का मानना है कि ÷ वहां पालतू प्रकृति कविता पर छा गयी थी और राजनीतिक और सामाजिक चिन्ताएं कविता से बाहर हो गयी थीं।' ९ खैर। हो सकता है किन्हीं कवियों पर ये आरोप चरितार्थ होते हों , लेकिन किसी भी तर्क से उन्हें युवा कविता का प्रतिनिधि चेहरा मानना कठिन होगा। तब इन अपवादों को युवा कविता के खाते में रख कर क्यों गिना जा रहा है? यह आरोप जिस कविता पर लगाये गये हैं उसके यहां लोक का आलोचनाहीन तेवर है, प्रकृति और जिन्दगी के अबोध ताजा टटके अभिनव बिम्ब हैं, चीजों, व्यक्तियों और घटनाओं में सरल एकरेखीय सम्बन्ध हैं और मासूमियत का विकराल विमर्श है। यह जानना भी कठिन नहीं है कि कौन से लोग इस कविता को प्रोत्साहित कर रहे हैं, और यह जानना भी कठिन नहीं है कि पूरी युवा कविता की अवास्तविक तस्वीर पेश करने के लिये ही ऐसे अपवादों को क्यों स्थापित किया जा रहा है - भले ही उनकी भर्त्सना करते हुए। दरअसल हमारा विमर्श समूची युवा कविता के गलत सिरे सम्बोधित है और इस चालाक गलती में युवा कविता की ताकत के बिन्दुओं की उपेक्षा का रिवाज जारी है और मौलिकता हलाक हो रही है। युवा कवियों पर एक आरोप यह लगता है कि वह आलोचनात्मक गद्य नहीं लिखते। यह आरोप एक ओर तो नवें दशक के कुछ प्रमुख कवियों - कुमार अंबुज, लीलाधर मंडलोई, पंकज चतुर्वेदी, बद्रीनारायण, आशुतोष दुबे और एकांत श्रीवास्तव के सृजनात्मक गद्य के जरिये किये गये आलोचनात्मक हस्तक्षेप की उपेक्षा करता है, वहीं दूसरी ओर एक उत्कृष्ट कवि से उत्कृष्ट गद्य की भी अनावश्यक मांग करता है। मेरे एक अग्रज मित्रा इस अतर्क्य आलोचनात्मक व्यवहार पर एक रोचक वाकया सुनाते हैं कि अमृतलाल नागर के निधन के बाद उनके कृतित्व की चर्चा करते हुए किसी ने कहा कि बाकी सब तो ठीक है लेकिन नागर जी ने ग्राम्य जीवन को केन्द्र में रखते हुए कोई उपन्यास नहीं लिखा। मित्रा यहां जोड़ते हैं: भले आदमी, जो कुछ किया है उसके गुण दोषों पर तो बातचीत की जा सकती है, लेकिन जो नहीं किया गया उस पर बात करना कहां की समझदारी है? और यदि किसी आलोचना का विन्यास इस तरह के स्थूल आरोपों से तय होता हो तो ऐसी आलोचना लिखने से तो आलोचना न लिखना ही बेहतर होगा। दरअसल फिलहाल हिन्दी कविता ने जो आंतरिक स्वभाव अर्जित किया है उससे प्रतिष्ठानपरक और प्रगीतात्मक कविता का एक हिस्सा यदि अपने भविष्य को लेकर आशंकित है तो इसे समकालीन रचनात्मकता की ताकत का एक सन्दर्भ बिन्दु माना जाना चाहिए। जो लोग कविता के विमर्शात्मक व्यवहार, अप्रत्याशित राजनीतिक और मानवीय क्षेत्राों में जाने के साहस, लोक के प्रति घनघोर आलोचनात्मक तेवर और निकटवर्ती परम्परा को अपने लिए प्रासंगिक करने की ईमानदारी से भयभीत हैं, प्रायः वही युवा कविता को लेकर हमलावर हैं। विजय कुमार एक आरोप लगाते हैं कि ÷ विष्णु खरे के काव्य पैटर्न बाद के बहुत सारे कवियों को सहज उपलब्ध हो गये हैं लेकिन अब उन्हें दोहराया नहीं जा सकता।' १० वे कहते हैं कि ÷ कला में कोई भी हिकमत कुछ समय बाद एक रूढ़ि बनने लगती है, इसलिए आज की हमारी कविता में क्लीशों की कमी नहीं है।' ११ प्रसंगवश, कुंवर नारायण ने लिखा है कि विष्णु खरे की कविता प्रचलित कविता के ÷ अस्वीकार के तेवर से पैदा हुई है।' १२ यह तेवर यदि आज की कविता में भी दिखता है तो यह तय है कि विष्णु खरे के काव्य व्यक्तित्व को वह अपनी परम्परा के तौर पर स्वीकार कर रही है। बाद की कविता पर विष्णु खरे के काव्य पैटर्न का प्रभाव या दबाव यदि हमारे विश्लेषण का मुद्दा है तो इसी जगह यह भी जानना होगा कि उस पद्धति की मदद से या उस पद्धति के बावजूद कोई कविता भिन्न अंतर्वस्तु उत्पादित कर रही है या नहीं। कथन के तमाम ढंग के अलावा यदि कथ्य के नये नये तत्व हमारे लिये जरूरी हैं तो कोई भी प्रभाव वर्जित नहीं है। मुक्तिबोध की कविता का महाकाव्यात्मक विन्यास यदि आगामी कविता को काव्यरचना का एक मॉडल उपलब्ध कराता है, तो इतने भर पर कैसी कोई आपत्ति? इस तरह की आपत्ति में यह अंतर्निहित है कि कविता के विन्यास को जीवन दृष्टि और रचनात्मक साहस से अलग कुछ समझा गया है। यदि भगत सिंह का उद्दण्ड साहस हमारे काम का है, तो निराला और मुक्तिबोध का क्यों नहीं। नयी संरचनाओं में दाखिल होने और उपलब्ध संरचनाओं में जाने, उन्हें नया करने के नितांत नैतिक कार्यक्रम को दृश्य पर मौजूद चातुर्यपूर्ण आक्षेपों की परवाह करते हुए स्थगित नहीं किया जा सकता। मुक्तिबोध अपनी डायरी में एक जगह किसी विचारक को उद्धृत करते हैं: ÷÷ औद्धत्य की अपनी प्रतिभा है।'' फिर इस वाक्य को उलट देते हैं और उसे भी वेैसा ही सत्य मानते हैं। संरचना की समस्याएं कविता में अनुस्यूत राजनीति की भी समस्याएं हैं, यह बात हर समझदार आदमी जानता है और अपनी समझदारी में चुप रहते हुए संरचना मात्रा पर बात करता है जैसे संरचना के इस्तेमाल के राजनीतिक आशय हों ही नहीं। यह राजनीति प्रत्येक कविता और प्रत्येक व्याख्या में चुपचाप अपना काम करती रहती है। शिल्प को उसकी सामाजिक अपरिहार्यता से काट कर कुछ तकनीकी अंदाज में बात करने वाली समझ आत्मरक्षा की यथास्थितिवादी फर्श पर फिसलती रहती है और इसके उलट हर नयी पुरानी संरचना अतीत, वर्तमान और भविष्य के सिलसिले में एक विशुद्ध अपनी और प्रासंगिक राजनीति का निर्वाह करती जाती है। देवी प्रसाद मिश्र इसलिए पहल ८२ में प्रकाशित अपने साक्षात्कार में कहते हैं: ÷÷ नयी संरचनाओं की सूझ ने एक नये नैरिटिव के लिये उत्पात किया और नये नैरिटिव ने विजन की विस्तारधायिता दी। नयी संरचना ने नया साहस भी दिया। पोएटिक ड्रजरी से बाहर आने के लिये मन हुमकने लगा। कविता में थोड़ी सी जगह में मेरा काम चलना बंद हो गया - मैं ज्यादा जगह की मांग करने लगा। मैं शहरों, सम्बन्धों, विचारधारा, सर्वानुभूति, विग्रह, राग, पूंजी, जातीयता, निर्मितियों वगैरह की पर्तों में जाने की सोचने लगा। जगह कम लगने लगी तो हाशिये पर भी चला गया। यह कुछ ऐसा था कि आप संवेदनशून्य शहर को जगाने के लिये पूरे शहर में पोस्टर चिपका दें। इसे आप एक असहमत का नैतिक उपद्रव समझ लीजिए।... असल में यह जो विकल्प की खोज है, यह एक सतत प्रक्रिया है।... जो प्रदत्त इतिहास या साहित्येतिहास है उसका विकल्प पाने का यत्न है। तो यह प्रदत्त विनमरता की कायरता से बाहर आना है। इस तरह से देखें तो यह अल्टरनेटिव ऑफ पोएटिक्स ही नहीं, अल्टरनेटिव ऑफ पॉलिटिक्स की भी तलाश है।''
सामान्यीकरण से सरलीकरण तक
बड़े कवि प्रायः अपने काव्ययुग से बाहर रहते हैं - भविष्य की कविता में। वे अपने युग के औसत सामान्यीकरणों में पूरे के पूरे कभी पहचाने नहीं जा पाते - उनकी कविता किसी दौर की सामान्य विशेषताओं का निर्वाह करने में सीमित नहीं होती। इसलिए जब भी कुछ सूत्राों में पूरे समय को ढालने की कोशिश की जाती है तो विलक्षणताओं की कीमत पर। रघुवीर सहाय ने कहा है किसी कृति का शिल्प उस कृति पर ही प्रतिफलित होकर आगामी रचनाओं के लिये अप्रासंगिक हो जाता है। आलोचना या कृति की व्याख्या को भी ऐसा ही होना चाहिए। वह किसी कृति को अद्वितीय तरीके से पहचाने और फिर तबाह हो जाए - उसमें निहित मूल्यदृष्टि, विचारशीलता, तर्कपद्धति भले ही अतीत से भविष्य तक प्रवहमान हो, लेकिन उस व्याख्या की हिस्टोरिकल प्लेसिंग को दुहराना असम्भव हो, आलोचना प्रक्रिया के जिन क्षणों में एक कृति का सत्य व्यापक सार्वभौमिक सत्य के साथ एक विशेष संश्लेष में चमके, उसके बाद वह क्षण बिलकुल वैसे दुबारा घटित न हो, आइंदा वह किसी और तरीके से हो पाये। जब भी आलोचना किसी कृति के पाठ से हासिल अंतर्दृष्टि को अपने औजारों में स्थायी कर लेती है, वह एक ओर इकतरफा, प्रतिक्रियावादी और सत्तापरक होने का खतरा उठा रही होती है, तो दूसरी ओर निर्दोष पाठकीय संवेदना से खुद को वंचित भी करती है। किसी आगामी रचना की समय सापेक्ष गत्यात्मकता में शामिल होने के लिये आलोचना को भी एक लगातार सफर में रहना होगा अन्यथा वह एक प्रतिष्ठान में रूढ़ हो जाएगी। अवधारणात्मक सच्चाईयां अपने आप में जरूरी तो हैं ही , लेकिन उनका सर्वोत्तम काम है रचना की व्यावहारिकताओं में उतरना, और यह एक अविराम प्रक्रिया है जिसमें दोनों सिरे कभी न रुकने के लिये प्रतिश्रुत हैं। पुराने और स्वीकृत मानमूल्य नयी सर्जनात्मक उलझनों में घुल जाते हैं और अपने सारतत्व को किसी आगामी प्रासंगिकतम प्रतिमान में घोल लेते हैं। शमशेर के शब्दों में इस नवीन आलोचना में कई दर्पनों और व्यक्तियों के जल हिले मिले रहते हैं। ऐसा न होने पर स्थगन और गतिहीनता के पुराने निकषों पर नयी रचना को कसा जाने लगता है और आलोचना भूतपूर्व और कविता विरोधी होने लगती है। विनोद कुमार शुक्ल की कहानी ÷ गोष्ठी' आलोचना की ऐसी ही हालत पर है। उस कहानी का केन्द्रीय चरित्रा एक आलोचक हमेशा एक ऐसी गोष्ठी करता है जिसमें शामिल होने वाले प्रत्येक कवि को अपनी कविता में आने वाले सभी प्रतीकों को वहां ले आना पड़ता है और आलोचक के गोदाम में जमा करना पड़ता है और क्रमवार, मात्राावार ढंग से आलोचक के सामने सजाना होता है। जो ऐसा नहीं कर पाता, जाहिर है कि आलोचक के कोप का शिकार होता है। एक दिन गोष्ठी में आने वाले एक कवि की कविता में एक पंखुड़ी का गुलाब है जिसे वह नहीं ला पाया है। इस पर आलोचक डपटता हुआ उससे कहता है कि ÷ आखिर तुम इतनी लम्बी कविता क्यों लिखते हो। फिर टूटफूट ही आदमी की जिन्दगी नहीं है। इसके पहले तुम ट्रक का बहुत पुराना सड़ा हुआ टायर लाये थे।.... उस टायर से एक जोड़ी चप्पल भी नहीं बन सकती।.... कल मैं अपने गोदाम से उस टायर को निकलवा कर किसी घूरे में फिकवा दूंगा। जान लो कविता कोई घूरा नहीं है।.... इस बार भी तुम सड़ी गली चीजें लाये होगे। क्या तुमने कोई भी चीज साबुत नहीं देखी। फिर एक पंखुड़ी का गुलाब कहां होता है। मान लो तुम एक पंखुड़ी का गुलाब लाते भी हो, तो भी तुम्हारी कविता में कुछ स्थायी नहीं होगा। क्योंकि तुम्हारा वह कीमती प्रतीक कुछ ही घंटों बाद मुरझा जाएगा। तुम्हें अपनी कविता से वह हिस्सा निकालना होगा जिसमें एक पंखुड़ी का गुलाब है।' गौरतलब है कि ताकत से सम्भव होने वाली इस गोष्ठी में एक मजदूर कवि पिछले दो साल से नहीं आ पाया है क्योंकि उसकी कविता के प्रतीक रोटियां ही रोटियां होती थीं। ÷ दिन भर काम करने के बाद शाम को जब वह कविता सुनाने के लिये रोटियां लेकर चलता था तो रास्तें में इतनी जोर की भूख लगती थी कि वह सभी रोटियां खा जाता था और बीच रास्ते से घर लौट जाता था।' एक अन्य कवि की कविता में मरे हुए सांप का जिक्र है लेकिन जो मरा हुआ सांप गोष्ठी में लाया गया है उसके मुंह में चींटियां लगी हुई हैं तो आलोचक कवि से सांप के मुंह पर लगी चींटियां धुलवाता है। एक मारवाड़ी युवक कवि से आलोचक बहुत खुश है। ÷ वह प्रायः छोटी छोटी कविताएं लिखता था। चूंकि वह चांदी के गिलास में पानी पीता था, इसलिए उसकी कविता में एक चांदी का गिलास था। अपनी जेब से एक चांदी का गिलास और दो गज जरी की किनार और कुछ छोटे छोटे धागे निकाल कर उसने सामने रख दिया और कविता पढ़ी।' चूंकि कविता में केवल दो गज किनार का उल्लेख था, इसलिए आलोचक बाकायदा गज से किनार को नाप कर देखता है, कि वह दो गज है या नहीं। सत्ता प्रतिष्ठान के अंतःकक्षों में सामाजिक आत्म के रेशे रेशे को पहले बिखेर कर , फिर उस बिखरे हुए को अपनी नापाक सहूलियतों के लिये कैसे करीने से सजा कर रखा जाता है, आलोचक का गोदाम उसका दिलचस्प रूपक है। वहां पिछली सारी कविताओं के प्रतीक कवितावार, पंक्तिवार रखे हैं। इस अजीब बीहड़ कमरे से चिढ़कर, अपने प्रतीक वहां रखने आया कवि, किसी कविता में आये पेट्रोल के डिब्बे से चारों ओर पेट्रोल छिड़क कर, एक दूसरी कविता में इस्तेमाल हुई माचिस की तीली से प्रतीकों के गोदाम में आग लगा देता है और भाग जाता है। लेकिन तभी आलोचक वहां आता है और प्रतीक के रूप में रखे हुए आग बुझाने के यंत्राों से आग बुझा देता है और बचे हुए कवियों को प्रतीकों की प्रत्यक्ष उपयोगिता समझाने लग जाता है। यहां देखा जा सकता है कि सत्ता संरचनाएं साहित्य क्रियाओं में अपनी भूमिकाएं अदा करती हुई किस हद तक अन्यायी और हिंसक हो जा सकती हैं , लेकिन एक सशक्त कविता या एक निर्भीक व्याख्या अपनी अपील से सारे कुपाठों को ध्वस्त भी करती रहती है जैसे यही कहानी।
असुरक्षितों का संलाप
दिलचस्प यह है कि कुछ लोग खुद प्रभाव ग्रहण करते ही हास्यास्पद और कातर हो उठते हैं और युवा कविता पर प्रभाव प्रभाव का सर्वाधिक आरोप वे ही लगाते रहे। वार्तालाप की शैली में लिखी गयी मुक्तिबोध की महान आलोचना की नकल करते हुए वह इतिहास को किसी ट्रैजेडी या कॉमेडी की तरह दुहराते हैं और इस सिलसिले में उनका पहले से विभाजित आत्म सतह पर तिरने लगता है और जिन कुत्साओं को अपने नाम से कहने का साहस नहीं होता उन्हें उपाध्याय जी१३ नामक कल्पित मात्रा से कहलवाया जाता है। इस तरह एक संवाद का आभासी चंदोवा तान देने के लिये बाद लगाये गये आरोपों का सतहीपन और भी चमकीला हो उठता है। ऐसे लोग पीढ़ियों की शब्दावली में सोचने के पिटे हुए पैटर्न में नाहक फिर से उलझ रहे हैं। गौरतलब है कि आठवें और नवें दशक की दुहाई देकर ऐसे लोगों ने दोनों दशकों में लिखी गयी अच्छी और बुरी कविता का अप्रत्याशित घालमेल करने और रचनात्मकताओं को आपस में लड़ाने की कोशिश की है। यह रणनीति, हांलाकि दृश्य पर मौजूद सभी लोगों को अपने बौद्धिक स्तर का समझने की गलतफहमी के आधार पर तैयार की गयी है जिसका अंतिम लक्ष्य बहुतेरी कमजोर कविताओं को दशक के नाम पर बचा लेना भर है। क्या यह बात किसी से छिपी हुई है कि आठवें और नवें दशक - दोनों में बहुत कुछ नितांत त्याज्य और बहुत कुछ उत्कृष्टतम है। इस बोध के बाद किसी पीढ़ी की वकालत क्या कोई प्रासंगिक उद्यम रह जाता है? इस बिन्दु पर यह भी रेखांकित किया जा सकता है कि अपने दौर की कविता के पक्ष में मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, असद जैदी या उदय प्रकाश एक भी शब्द नहीं बोलते। बोलने के लिये सामने आते हैं विजय कुमार। क्या यही वह सन्दर्भ बिन्दु नहीं होना चाहिए जहां से विजय कुमार के काव्य व्यक्तित्व का सम्यक् विवेचन तुरंत किया जाना जरूरी हो उठे। जिस तरह प्रसादजी की कामायनी में रति की प्रतिकृति लज्जा कहती है कि मैं शालीनता सिखाती हूं वैसे ही विजय कुमार की प्रतिकृति उपाध्याय जी समकालीन रचनाशीलता को शालीनता सिखाते लगते है। लेकिन उन आरोपों की जांच फिलहाल ज्यादा जरूरी है जो उन्होंने युवा कविता पर ÷ नया ज्ञानोदय' के मई अंक में लगाये हैं। संतुष्टि की बात यही है कि यह उनके पंद्रह साल पुराने आरोप हैं। इस पूरी बहस में विस्मय को किसी युक्ति की तरह इस्तेमाल किया गया है और काव्यदृश्य के बारे में अपने बोध को खासा मासूम बना कर पेश किया गया है। एक कथन पर गौर कीजिएः ÷÷... यह तो एक पावर स्ट्रक्चर का खेल है। युवा कवि बेचारा इस पावर स्ट्रक्चर के खेल में परेशान और कन्फ्यूज्ड है। उसमें आक्रोश भी सही ढंग से पैदा नहीं होता क्योंकि उसके कंधे झुके हुए हैं और कहीं न कहीं वह पावर स्ट्रक्चर के इस खेल में शामिल होना चाहता है।'' १४ क्या इस राय को कविता की आलोचना माना जाएगा ? क्या इन वाक्यों में कविता के अध्ययन और विश्लेषण से हासिल अंतर्दृष्टि है? क्या किसी भी कोण से यह सर्जनात्मक आचरण है? कंधों का झुकाव और पावर स्ट्रक्चर में शामिल होने की ललक किस प्रक्रिया से गुजर कर जानी गयी है। खैर। इस पूरे लेख को पढ़ कर यह भी जाना जा सकता है कि विजय कुमार को परिदृश्य के बारे में क्या क्या मालूम नहीं है, मसलन उनकी प्रतिकृति उपाध्याय जी एक जगह कहते हैं: ÷÷ साहित्य में हर दस पंद्रह साल में यह फर्क आ जाए यह जरूरी भी नहीं है। इमरजेन्सी के बाद हिन्दी में युवा कवियों की एक पीढ़ी उभरी थी। उसका सौन्दर्यबोध पूर्ववर्ती अकविता और नक्सलवादी कविता से अलग था। निम्नमध्यवर्गीय कवि के दिन प्रतिदिन के संसार और उसके घर मोहल्ले की दुनिया की दृश्यावलियां कविता में आयी थीं जिनमें एक राजनीतिक विचार का आभ्यंतरीकरण हुआ था। क्या उसके बाद इन पच्चीस वर्षों में सचमुच कविता में ठोस रूप से कुछ नया घटित हुआ है।'' १५ सवाल यह है कि यदि आपको यह नहीं मालूम है कि कुछ नया हुआ है या नहीं तो आप यह कैसे बताते हैं कि कुछ नया नहीं हुआ है। और तो और , एक जगह विजय कुमार कहते हैं कि ÷÷ जब कविता की आलोचना में आस्वाद की ऐसी कोई गहनता होगी तो वह जाने अनजाने युवा रचनाकार को भी कुछ नया रचने के लिये प्रेरित करेगी। लेकिन यही है कि युवा मानसिकता को समझने और दिशा देने के औजार ही नहीं हैं हमारी आज की आलोचना के पास।'' १६ यानी, उनके लेखे आदर्श स्थिति वह है जब रचना आलोचना की अनुवर्तिनी हो, उसके निर्देशों पर चल कर सम्भव हो रही हो। अनुभव की बजाए आलोचनात्मक मानदण्ड उसकी बुनियाद हों - अंततः वह आलोचना की बाइप्रोडक्ट हो और होती ही रहे। प्रसंगवश, टैरी इगल्टन का मानना है कि रचनाधर्मिताएं अविकल एक दूसरे के समानांतर उत्पादन करती हैं - एक सापेक्षिक स्वायत्तता में।१७ वह एक दूसरे को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल नहीं करतीं और न ही कभी एक दूसरे में खप जाती हैं। वे अपनी आत्मवत्ता को इस समूची प्रक्रिया में अक्षुण्ण रखती हैं। यों अनुभव के साथ अभिव्यक्ति में जिस तरह के सम्बन्ध की लालसा विजय कुमार रखते हैं और जिसका प्रस्ताव भी करते हैं क्या वही सम्बन्ध नहीं है जो पैसे से पैसा बनाने के बाजारवादी आर्थिक ढांचे और सिर्फ उसके दम पर फलते फूलते उच्च मध्यवर्ग में हैं। और यदि ऐसा है तो यह सम्बन्ध हमारे समय के कौन से कवियों का अभीष्ट हो सकता है ? बकौल ग्राम्शी, ÷ बुद्धि के क्षेत्रा में दुश्मन के सबसे मजबूत गढ़ पर हमला' १८ करने की नैतिकता यानी सामर्थ्य को सीमा में पहचानने का उद्यम हमारे कुछ आलोचकों के वश की बात शायद नहीं रही, इसलिए जब वह युवा कविता पर मीडियाकर, कैरियरवादी, यंत्राचालित, काव्यात्मक ऊर्जा से हीन और लद्धड़ होने के आरोप लगाते हैं तो उन्हीं की प्रतिकृति उपाध्यायजी की इस बात से सहमत होने की इच्छा होती है कि ÷ हिन्दी कविता में हास्यरस कितना है यह तो नहीं मालूम पर निश्चय ही इस तरह की आलोचना से अहर्निश हास्य का उद्रेक हो रहा है।' १९ और जैसा कि रवीन्द्र कालिया कहते हैं: ÷÷ विजय कुमार जी की चेतना पर प्रकारांतर से कोई दूसरी पीढ़ी हावी है।'' काव्य रचना , जो जीवन संघर्ष से भिन्न कुछ नहीं है, के धाराप्रवाह में जब भी तट पर खड़े होकर नसीहतें दी गयी हैं तो उन नसीहतों के चक्कर में पड़ने वाले कालांतर में फ्रॉड ही साबित हुए हैं। नयी कविता के दिनों में कवियों को एस्थेटिक इमोशन, वह भी निरे निजी इमोशनों को सत्य मान लेने की, उन्हीं के आधार पर अभिव्यक्तियां करने की सलाह खूब दी जाती थी, उन्हें बताया गया था कि हृदय में संचित जीवनानुभवों को व्यक्त करना गलत होगा। प्रत्युत्तर में मुक्तिबोध ने कहा था कि हमारी जनता स्वयं एस्थेटिक इमोशन का भंडार है। यहां एक असम्भव, आपराधिक कल्पना की जाय - यदि मुक्तिबोध उन जड़ीभूत आग्रहों को मान लेते तो आजाद भारत के विराट विपर्यस्त जीवन का इतना बड़ा लैंडस्केप क्या हमें मिल पाता? इसलिए जीवन की वास्तविकता और अनुभव के वजन की शर्त पर कविता की दुनिया में की गयी सौदेबाजियां कलाकार के काम की नहीं हो सकतीं, एक चाटुकार भले ही उनसे तृप्त हो ले। एक वृहद्जीवन और उसमें निहित अनंत सत्यों का संश्लेष हमारे भविष्य की कविता को संदर्भपरक और बड़ा कर रहा है। नये नये जीवनानुभव, अभिनव काव्यवस्तु बन कर कविता में दाखिल हो रहे हैं और पुराने अनुभवों और कला मूल्यों से तैयार काव्य संरचनाओं को उलट पुलट रहे हैं। यह कविता संदर्भबहुल है और इसकी राजनीति एक देश में एक व्यवस्था के बिखर जाने से हताश होकर बैठ नहीं गयी है। कुछ अधेड़ आवाजें यह भी कहती पायी जा रही हैं कि महाख्यान खंडित हो गया है और यथार्थ टुकड़ा टुकड़ा रचनात्मकता में ही उपलब्ध हो पायेगा। इस तरह वे सिर्फ अपनी उन विपुल कविताओं की औचित्य स्थापना करना चाह रहे हैं जिनकी शुरुआत में ही अंत छिपा होता है और जो आकार में ही नहीं प्रभाव में भी छोटी साबित हुई हैं। यहां कविताओं की लम्बाई की वकालत नहीं है लेकिन एक कठिन और विराट कविता को लेकर कोई पूर्वग्रह भी नहीं है। भविष्य की हिन्दी कविता यदि अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा दिखाई दे रही है और विजय कुमार के ही पसंदीदा मुहावरे में कहें तो, जिसे एक साथ कई ÷ पीढ़ियां' लिख रही हैं तो यह अंततः कुछ ही लोगों के लिये दिक्कत और भय का कारण होना चाहिए।
संदर्भ १. शमशेर बहादुर सिंह की सुप्रसिद्ध काव्यंपक्ति २. तद्भव-१५ में प्रकाशित देवीप्रसाद मिश्र की कहानी ÷ पिता के मामा के यहां' के वाक्य ३. रोलां बार्थ, ÷ क्रिटिसिज्म एंड टु्रथ' पृ. ६४ ४. ÷ लेखक की रोटी', पृ. ११२ ५. ÷ बया' के प्रवेशांक में प्रकाशित लेख में वीरेन्द्र यादव का मन्तव्य ६. रिफ्लेक्शंस आन एक्जाइल पृ. ७. तहलका में प्रकाशित साक्षात्कार का एक वाक्य ८. अरुण कमल, ÷ कविता और समय', पृ. १९३ ९. इंडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित लेख ÷ सरोकारों से साक्षात्कार', पृ. ९ १०. आलोचना, सहस्त्रााब्दी अंक बारह में प्रकाशित लेख ÷ समाचार समय में कविता', पृ. ३२ ११. वही, पृ. ३२ १२. विष्णु खरे की कविता पुस्तक ÷ काल और अवधि के दरमियान' की पीठ पर छपा मंतव्य १३. नया ज्ञानोदय के युवा पीढ़ी विशेषांक, मई २००७ में प्रकाशित विजय कुमार के लेख ÷ कवित्त ही कवित्त है' में युवा कविता की अविराम भर्त्सना करने वाला चरित्रा १४. नया ज्ञानादेय, मई २००७ में प्रकाशित विजय कुमार का लेख, पृ. १२ १५. वही, पृ. १३ १६. वही, पृ. १३ १७. टेरी ईगल्टन ÷ क्रिटिसिज्म एंड आइडियोलॉजी' पृ.६५ १८. ÷ कविता के नये प्रतिमान', ले. नामवर सिंह, की भूमिका में उद्धृत कथन १९. नया ज्ञानादेय, मई २००७ में प्रकाशित विजय कुमार का लेख, पृ० १२ TOP (Back to अनुक्रम) |