÷÷मैं प्रायः ऊबता हूं और जब ऊबता हूं/ तब बच्चे के साथ खेलता हूं यही खेल/ यह वह खेल है/ जिसे मेरी मां ने मुझसे खेला था/ और उसकी मां ने उससे/ ... हो सके तो बचा लो इसे/ जिसे आज मैं तुम्हें सौंपता हूं/ इसलिए नहीं कि तुम इसे आगे ले जाओगे/ बल्कि इसलिए तुम इसमें अपना पिछला जीवन देख सकोगे'' (अक्कड़ बक्कड़ : पृष्ठ 86-87)
उत्तर प्रदेश की विन्ध्य की पहाड़ियों के बीच बसे सोनभद्र जनपद के एक छोटे से गांव में पैदा हुए युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल के दूसरे काव्य संग्रह ÷बोली बात' की कविताओं से गुजरना लोक जीवन की स्मृति में जीने जैसा अनुभव लोक है, क्योंकि अब गांवों में गांव कम बचे हैं, इसलिए नहीं कि गांवों में विकास की लहर दौड़ पड़ी है और रातोंरात उसका नक्शा विकास के मानचित्र पर छप गया है बल्कि सच्चाई यह है कि हमारे गांव तेजी से मर रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब किसानों मजदूरों के घरों से बैल एकदम गायब हो जाएंगे और फिर हम बैल का दर्शन शिव जी के चित्र कैलेण्डर में अपनी आने वाली पीढ़ियों को करा पायेंगे। आज आकस्मिक नहीं है कि औसत भारतीय किसान की माली हालत प्रेमचंद के जमाने के ÷गोदान' के ÷होरी' से भी बदतर है। सरकारी आंकड़ों पर ही अगर भरोसा करें तो प्रत्येक ग्रामीण परिवार के सदस्य हजारों रुपये राष्ट्रीय ऋण के भार से ग्रस्त हैं। व्यक्तिगत ऋण से निजात तो महाजनी सभ्यता के दौर से आज तक उसे नहीं मिल पायी है। देश के हजारों किसानों की सामूहिक आत्म हत्याएं इस टे्रजडी का तीव्रतम साक्ष्य हैं। कहने का आशय यह है कि आज सरकारी ऋण की जानलेवा प्रक्रिया महाजनी और सामंती व्यवस्था से ज्यादा हिंसक और खतरनाक हो चुकी है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में भूमंडलीकरण (अर्थात भूमंडीकरण) की प्रक्रिया का सबसे अधिक नुकसान और सजा इस देश के साधारण आदमी को भुगतनी पड़ रही है। जाहिर है औसत भारतीय किसान हमारी अर्थव्यवस्था में सबसे निरीह नागरिक बन चुका है।
मुझे लगता है कि भारतीय लोक जीवन में गांवों के इस क्रूरतम और भयावह यथार्थ का सामना अभी समकालीन हिन्दी कविता को करना शेष है। फिलहाल समकालीन हिन्दी कविता के एजेण्डे पर ÷बचाने' की क्रिया सक्रिय है। जाहिर है बचाना जरूरी है क्योंकि जमाने की बुरी नजर हमारी लोक संस्कृतियों पर लग गयी है। श्रीप्रकाश शुक्ल के इस संग्रह की अधिकतम कविताओं की मुद्राएं, कथन और उपक्रम बचाने में लगे हैं। यह ÷बचाना' कविता की निरर्थक क्रिया नहीं है और न ही यथार्थ से पलायन है, बल्कि स्मृतियों में ही सही मनुष्यता का पुनर्वास है। कविता कुल मिला कर स्मृति का ही पुनर्वास है, इसलिए इन कविताओं को पढ़ते हुए कम से कम पूरब के आदमी को अपने घर की कहानी की दशा दिशा याद आती है। कमोवेश पूरे देश में भारतीय बोलियों के समाज की तस्वीर आज यही है। इसलिए श्रीप्रकाश शुक्ल के कवि कर्म की फलश्रुति भूमंडलीकरण से उपजे नये बाजारवाद के विरुद्ध कारगर हस्तक्षेप के रूप में दिखायी पड़ती है। इस संग्रह में हस्तक्षेप की ऐसी कई बेजोड़ कविताएं हैं पर मैं यहां ÷पोतना' कविता का जिक्र खास तौर से करना चाहता हूं। पोतना हमारे लोक जीवन के घरेलू कर्म व्यापार की दैनंदिन संस्कृति का एक ऐसा अनिवार्य उपकरण है कि जिसके बिना मिट्टी के घरों में चूल्हे से लेकर घर आंगन की लिपाई पुताई नहीं होती। आज जमाना बदल रहा है। कच्चे मकानों की जगह पक्के मकानों ने ले ली है। जाहिर है कि सफाई के लिए अब ÷वायपर' ने ÷पोतने' की जगह ले ली है। पोतना इस तरह अपदस्थ होकर बेकार की वस्तु मान लिया गया है। व्यवस्था की नयी मशीनरी में साधारण आदमी की नियति का ऐसा मार्मिक और भावप्रवण चित्रण कविता को इतना अर्थवान बना देता है कि पाठक अपने घर में ÷वायपर' की जगह ÷पोतना' खोजने के लिए विवश हो जाता है। पूरी कविता घरेलू जीवन की बदली स्थिति से शुरू होती है और पोतने की खोज के साथ खत्म होती हैᄉ÷÷कच्चे घर के पीछे एक पोतने की उपस्थिति/उसके सही सलामत होने की निशानी है/ जबकि आज के घर में वायपर का प्रवेश/घर में कितने वायरस का प्रवेश है/ कभी का पोतना/जिसे बहुत सहेज कर रखा गया था/ आंगन के एक कोने में/विलुप्त होती प्रजातियों में सबसे जोरदार प्रजाति है... एक दिन अचानक जब/किसी संगमरमरी फर्श से फिसले बूढ़े की तरह/उखड़ गये इसके हाथ पांव/तब बहुत याद आयी पोतने की/लोगों ने पुचकारा उसे/नहला धुला कर उठाया गया उसको/लेकिन पोतना तो पोतना ही था/उसने उठने से मना कर दिया'' (पोतना : पृष्ठ 80)
कहने की जरूरत नहीं कि आम आदमी की सबसे बड़ी ताकत उसका स्वाभिमान है जिसे तोड़ा या छोड़ा तो जा सकता है पर झुकाया नहीं जा सकता। ÷पोतना' का कविता के अंत में अपनी जगह से उठने की मनाही का साहस मौजूदा व्यवस्था में आम आदमी की ताकत और उसके साहस का प्रतीक है। निश्चय ही इस लिहाज से यह विलक्षण कविता है जो साधारण जीवनानुभावों से पैदा होती है और असाधारण अर्थ गौरव के विस्तार को अपने भीतर समेट पाने की क्षमता अर्जित करती है। कवि की काव्य सामर्थ्य का एक सक्षम नमूना तो है ही। लगभग यही सामर्थ्य कवि ने ÷हड़परौली' कविता में लोक जीवन में स्त्रिायों की स्थिति और लोकाचार के बारे में दुहरायी है। इस कविता की बड़ी सामर्थ्य यह है कि स्त्रिायां अवर्षण की स्थिति से जूझने के बावजूद इंद्र महाराज को खुश करने के लिए आधी रात में निर्वसन हल चलाने की परम्परा यानी लोकाचार की परिपाटी का निषेध कर देती हैं। इस तरह यह कविता परम्परा और लोकाचार से शुरू होकर अंत में परम्परा से विद्रोह करती प्रकट होती है। विद्रोह की यह रास स्त्रिायों ने थाम रखी है। इसलिए इस कविता की उठान सर्जनात्मक और विद्रोही है। कवि कहता है-÷÷भारतीय संस्कृति की यह एक बड़ी घटना थी/जिसे बाजार की किसी बही में/कभी दर्ज नहीं किया गया/इतिहास ने तो समझा ही नहीं!/यूं हमारी संस्कृति में पहली बार जुती औरतें पहली बार पकड़ीं मुठिया/पहली बार उठाया हल और फावड़ा/और पहली बार बहुत चुपके से निकलीं/मध्य रात्रिा में। ...ठीक ऐसी जगह पर/बहुत याद आयीं औरतें/मूकता और कूकता की ये औरतें/सूखे में भी रक्त भर की गर्मी बचाने वाली औरतें/...लेकिन मुश्किल यही थी इस बार/कि औरतों ने हल उठाने से मना कर दिया''। (हड़परौली : पृष्ठ 9,10,11) पर ÷तीज की औरतें' कविता में स्त्रिायों की व्रत परम्परा में यह विद्रोह कवि नहीं दिखा पाता। काश! ऐसा कर सकता।
कहना न होगा कि लोक जीवन की कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है परम्परा के नाम पर चले आ रहे गतानुगतिक रीतिरिवाजों को तोड़ने के लिए लोक जीवन को जागृत करना। जड़ता की स्थितियों का तोड़ना। स्त्राी समाज को संगठित करना। आखिर पतिव्रत धर्म के नाम पर अनवरत व्रत उपवास करती स्त्रिायां मरण शैय्या पर लेटी कई बार जीवन से हाथ धो बैठती हैं फिर भी ÷तीज' और ÷जीवित पुत्रिाका व्रत' पर निर्जला दिन गुजारने का हठ नहीं छोड़ पातीं। क्या हिन्दू धर्मशास्त्रा में पुरुषों के लिए निर्जला व्रत रखने का एक भी विधान दृष्टांत के रूप में दिखाया जा सकता है? बेहतर होता कि कवि, धर्म के नाम स्त्राी समाज के स्व अर्जित शोषण की दास्तान को उजागर कर पाता। उम्मीद है श्रीप्रकाश शुक्ल का जागरूक और प्रतिरोधी कवि लोक जीवन के इस संगीन पक्ष पर भी विचार करेगा।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं में लोक जीवन के स्वर की जो गूंजें हैं उनमें ज्यादातर इस्तेमाल घरेलू जीवन के परिवेश और उपयोग में लायी जाने वाली छोटी चीजों है जिसाके केन्द्र में है-मां, अर्थात लोक जीवन और लोक संस्कृति की अधिष्ठात्री; दुर्भाग्यवश उत्तर भारत में मातृ सत्ता, सामंतवाद के चलते हाशिये पर रही है, पर कहना होगा कि आठवें दशक से हिन्दी कविता ने ÷गंग पट्टी' के समाज में मातृ सत्ता को हमेशा अहमियत दी है। श्रीप्रकाश के इस संग्रह की अधिसंख्य कविताओं में मातृ सत्ता की गूंजें हैं और वे गूंजें ऊर्धवान हैं।
इस लिहाज से ÷कील' और ÷गोदना' कविता का जिक्र खासतौर पर उल्लेखनीय और पाठकों के लिए स्मरणीय है। ÷कील' कविता की सर्जना में मां से बच्चे की ठिठोली और शैतानी को जिस अंदाज में रचा गया है वह काबिले तारीफ है। मां की नाक से बच्चे का कील लेकर भागना और मां का उसे बचाने के लिए पीछे पीछे चोटियाना प्रकारांतर से पिता द्वारा दिये ÷सुहाग' को बचाने और जतन से रखने की जुगत है-÷÷यह वर्षों पुरानी बात है/जब मैं बच्चा था/मां से प्यार करते करते/उसकी नाक नोचने की कोशिश की थी/और नाक तो नहीं/उसकी एक कील ही हाथ लगी थी...यह वह कील है/जिसका होना/एक स्त्राी का होना है/दुनिया के सारे सम्बंध/इसी कील के नाना रूप हैं। इसके बगैर एक स्त्राी का होना/भिनसारे में निपटने जैसा है'' (कील : पृष्ठ 17)
÷गोदना' भी लोक जीवन में स्त्राी का सुहाग माना जाता है। ग्रामीण स्त्रिायां प्रायः अपनी बायी बांह पर पति का नाम गोदवा लेती हैं। इस ÷सुहाग' के पीछे दरअसल सामंतवाद के अवशिष्ट की बू आती है। स्त्राी की बांह पर पति का नाम भले ही सुहाग और पे्रम की चाह से उपजा हो पर इसके पीछे पुरुष वर्चस्व की हनक ही दिखायी देती है। यानी स्त्राी कोई वस्तु हो जिस पर उसके मालिक का नाम लिखना जरूरी है। अगर गांव के बदलते परिवेश में ÷गोदनी' गायब हो रही है तो कवि को जोक जीवन की स्त्रिायों का सौभाग्य मानना चाहिए। कम से कम इससे प्रतीक के रूप में ही सही स्त्राी को पुरुष वर्चस्व से मुक्ति तो मिलेगी। इसलिए कवि को ÷नर जाति का सबसे कोमलतम स्पर्श यह गोदना/अब नहीं बचा है कहीं पर' के लिए इसरार करने की जरूरत नहीं है। लोक संस्कृति के टुकड़ों को बचाने के लिए नयी परम्पराओं को खोज कर रोपित करने की जरूरत है।
हालांकि यह सजगता श्रीप्रकाश में है इसीलिए वे अपनी कविता का उपजीव्य लोक जीवन में तलाश रहे हैं। पर यह तलाश यायावरी या हवाखोरी न लगे इसके लिए लोक जीवन के भीतर व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए अच्छी चीजों की तलाश और बुरी चीजों के बहिष्कार की प्रक्रिया साथ साथ चलनी चाहिए। इस संग्रह में दर्ज ÷रामरती' कविता में एक लड़की के गौने जाने और अपने साथ में ले जाने वाली चीजों का ब्यौरा दर्ज हुआ है। वह पाठक के लिए पढ़ने और गुनने योग्य है। कविता के अंत में ÷चूल्हा' न ले जा पाने की भूल को जिस बेधक और व्यंग्यात्मक अंदाज में बयान किया गया है वह दहेज के लोभियों के लिए सबक है। हालांकि औसत भारतीय स्त्राी के जीवन में ÷चूल्हा' मृत्यु का मुख भी है जो उसे सदियों से विरासत में ससुराल में ही भेंट किया जाता है। दहेज जैसी कुरीति पर लिखी गयी इस कविता की खासियत है कि इसमें दहेज का कोई जिक्र नहीं, शायद इसीलिए यह कविता ज्यादा अपील करती है।
इस संग्रह की दूसरी खासियत यह है कि कवि ने अपने परिवेश के भूगोल को खासतौर से जागृत करने की कोशिश की है। कहना चाहिए कविता में परिवेश के भूगोल का चित्रण लोक जीवन का उभार करने वाली कविता की प्राथमिक शर्त है। कोई कवि दुनिया जहान की खबर रखता हो और अपने परिवेश के प्रति बेखबर हो तो उसे जागरूक कवि तो नहीं कहा जा सकता। हिन्दी में ऐसे बहुतेरे कवि हैं जिनकी कविता में परिवेश का भूगोल एक सिरे से नदारद होता है। ऐसा लगता है कि वे ग्लोबल होने के चक्कर में अपनी जड़ों से बेदखल होकर आत्म निर्वासित होने के लिए अभिशप्त हैं, जबकि हिन्दी के बड़े कवियों के रचना संसार पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि उनकी कविता में अपने परिवेश का भूगोल और वहां के लोगबाग चलते फिरते मिल जाएंगे। अभी हाल ही में दिवंगत हुए कवि त्रिालोचन की कविताओं में व्याप्त अवध और भोजपुरी अंचल का परिवेश अपनी पूरी फिज+ा के साथ वर्तमान है। जाहिर है जनकवि त्रिालोचन की असली ताकत यही है। इस दृष्टि से श्रीप्रकाश शुक्ल का ÷बोली बात' संग्रह अपने शीर्षक के अनुरूप कविताओं के परिवेश में व्याप्त रूप, रस और गंध के साथ मौजूद है। यहां भोजपुरी बोली की मिठास को काव्य भाषा में जिस अंदाज में ढाला गया है वह अलग से एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। सोनभद्र, बनारस, गाजीपुर और आसपास के इलाकों में रचीबसी श्रीप्रकाश की कविताएं इस तरह कविता में प्रगतिशील चेतना का ही एक नया चेहरा उपस्थित करती हैं। गाज+ीपुर को अलविदा करते हुए कवि की मनःस्थिति पाठक मन को उदास करती हैᄉ ÷÷यह एक ऐसा शहर है/ जहां मुझे कुछ फूल मिले थे/ कुछ फिकरे...यहां के लोग हर आने का/ बहुत धधा कर स्वागत करते हैं/ और हर जाने वाले को उतनी ही तेजी से भूल जाते हैं...यहां एक तरफ ÷आधा गांव' है तो दूसरी तरफ ÷सोना माटी'/और इन दोनों के बीच/करइल का वह क्षेत्र है/ जहां की मिट्टी कुछ इतनी जरखेज है/ कि हर आदमी एक सम्भावना है/ इस शहर से मैं धीरे धीरे गया हूं/ जैसे धीरे धीरे जाता है मां का दूध/धीरे धीरे जाती है ललाई/ धीरे धीरे जाती है समृति/यह जो धीरे धीरे जाना है शहर को धीरे धीरे पाना है/और मुड़मुड़ के देखना है'' (अलविदा गाजीपुर : पृष्ठ 104-105)
कहना न होगा कि लोक जीवन में लोक संस्कृति और लोक भाषा यानी भोजपुरी के परिवेश की पहचान कराता यह संग्रह समकालीन कविता के संसार में काव्य भाषा की खोज के नाते भी याद करने लायक है। ऐसे दर्जनों शब्द हैं जो सम्भवतः पहली बार खड़ी बोली की कविता में दाखिल हुए हैं। ये भोजपुरी शब्द अपने तुक विन्यास के साथ बाकायदा कविता में चुहुलबाजी करते हैंᄉ ÷झुराने लगती है बिरई/कुहुकने लगती है चिरई/(पृष्ठ 9) यहां बिरई और चिरई का तुक विन्यास और झुराना, बिरई, कुहुकना, चिरई, एक काव्य पंक्ति में चार भोजपुरी शब्दों की उपस्थिति खड़ी बोली की कविता को समृद्ध करती है। खड़ी बोली के शब्दों के बरअक्स अगर भोजपुरी शब्दों को खड़ा करके देखें तो भाषा में बोलियों के प्रयोग से काव्य सौन्दर्य बढ़ जाता है। मसलन ÷आटा' के समानांतर ÷पिसान' ÷कड़कड़ाना' के बरअक्स ÷कुकुआना' ÷सिकुड़ना' की जगह ÷चिंगुरना', पंखा की जगह ÷बेना', ÷कुर्ती' की जगह ÷सलूका', ÷बैल' की जगह ÷बरधा', महापात्र की जगह ÷महापातर' दलिद्दर, भटकटइया जैसे भोजपुरी बोलीबानी के शब्दों के प्रयोग नायाब और अर्थ बेधक हैं। भोजपुरी की क्रियाओं और संज्ञाओं में शब्दों के युग्म भी बड़े सटीक ढंग से प्रयुक्त हैं-जैसे अक्कड़ बक्कड़, अगड़म बगड़म, ताकत वाकत, हरकत बरकत आदि जाहिर है इन शब्दों के प्रयोग से श्रीप्रकाश की कविता की निजी पहचान बनती है। जिसे आगे काफी तादात में कविता के भीतर पोसने की जरूरत है। पर कवि के लिए यह भी जरूरी है कि उसका लहजा एकदम निजी हो। हालांकि किसी कवि के लिए निजी लहजा बना पाना कठिन प्रक्रिया है। लहजा कोई कोई कवि ही अर्जित कर पाता है। कइयों की उम्र बीत जाती है, संग्रहों के अम्बार लग जाते हैं। पर कवि कोई निजी लहजा नहीं बना पाता। श्रीप्रकाश की कविता से गुजरते हुए उम्मीद जगती है। वे काव्य भाषा को जिस तरह नाज और भांज रहे हैं उससे उनकी पहचान बनती है, पर जरूरी है कि वे निजी लहजा हासिल करने के लिए दूसरों को श्रेय न लेने दें। ÷बोली बात' के सिलसिले में आखिरी खास बात यही कहनी थी।
बोली बातः श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्यः 150.00 रु.
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