बुखार
बुखार एक अस्फुट शब्द है।
जो तुम्हें ले जाता है एक साफ सुथरी , निष्कम्प दुनिया से भीतर की कंपकंपी और थरथराहट में। घंघोल देता है जो तमाम बेबाकियों को अपनी अस्पष्टता में। मोहता है जो भागते हांफते हुए को अपनी मंथरता में।
भीतर का लहराता हुआ पारा - लगातार चढ़ता हुआ - और गीली पट्टियां और बर्फ - भाप बन कर उड़ते हुए - बिस्तर, बैचैनी, करवटें, दवाएं, छटपटाहट और तंद्रा - किसी की ठंडी हथेली तपते हुए माथे पर - नीमबेहोशी और टूटे फूटे वाक्य जिन्हें सब सुनना चाहते हैं और कोई सुनना नहीं चाहता।
कौन है यह जो बुखार की आवाज में अपने भीतर के ज्वार को मुक्त कर रहा है ? जो मथ रहा है मन और काया को, उनके अलग अलग तापमानों में एक साथ?
समुद्र का बुखार तो देखा होगा कभी न कभी , पर क्या कभी किसी पेड़ या पहाड़ का बुखार देखने जांचने और थामने की कोशिश की है? क्या ईश्वर को भी बुखार आता होगा कभी? कैसा दिखाई देता होगा उसे बुखार की आंखों से संसार?
जैसे उतरता है बाढ़ का पानी वैसे ही उतरता है बुखार। चीजें धीरे धीरे दिखाई देने लगती हैं लेकिन उन पर मिट्टी और गाद और भीगने के बाद सूखने के निशान हैं। तो क्या चीजें ऐसी ही थीं या बुखार के पहले किसी और शक्ल में दिखाई दे रही थीं ?
क्या बुखार में हम बुखार से पहले थे ?
चेहरा
भिखारी के चेहरे से याचना पोंछ दो तो वह उतना भिखारी नहीं लगेगा। चेहरे के तनिक सम्पादन से वह एक फटेहाल निम्नतम मध्यवर्गीय तो लग ही सकता है। अफसर
के बूढ़े चपरासी का चेहरा न किसी आम बूढ़े का चेहरा है न आम चपरासी का। वह अफसर के चपरासी का ही चेहरा है ; भले ही कमरे के अंदर और बाहर वह अलग अलग तरह का जान पड़े। अनेक लोग जब सुबह सोकर उठते हैं तो पाते हैं कि बिस्तर में
उनका चेहरा चूर चूर होकर बिखरा पड़ा है। वे उसके नीचे से अपने नये उग आये चेहरे को गौर से देखते हैं ताकि आईने के सामने आने पर खुद को पहचान लें। बहुत से लोगों को इतना फर्क भी नहीं पड़ता। अभी अभी एक सभा में मुख्य वक्ता का चेहरा
बीच भाषण में ठुड्डी पर से टूट गया , फिर बांये गाल की पपड़ी गिर गयी और उसके बाद दांयी भौंह समेत आंख चू पड़ी। सभा देखती रही और जितनी देर में मंचासीन लोग बिसलरी से पानी पीते हैं, उतनी भर देर में मुख्य वक्ता ने अपना ब्रीफकेस खोल कर नया चेहरा निकाला, लगाया और भाषण देना जारी रखा।
नये चेहरे वाला भाषण थोड़ा बदल गया था , पर उस पर आजकल कौन ध्यान देता है?
सराय में नेमप्लेट
वह आदमी सराय में बरसों से इस तरह था कि उसने सराय में अपने कमरे पर अपनी नेमप्लेट ठोक रखी थी। लोग आसपास के कमरों में आते जाते रहते। वह अपने कमरे में ही जमा रहता। बाज दफा ऐसा भी होता कि सिवा उसके सराय भर में कोई न होता। सराय की सारी चाबियां मालिक उसी को सौंप कर अपने घर चला जाता। कोई नया मुसाफिर उस दौरान भूले भटके चला आता तो उसी को सराय का मालिक समझता।
यह नेमप्लेट , जो सराय के एक कमरे पर लगी है, पानी पर लिखी है या रेत पर, कहना मुश्किल है। अभी तो इसके रंग और अक्षर चमक रहे हैं। अंततः जाएगी तो यह भी उसी रास्ते जिस पर एक दिन सारी नामपट्टिकाएं जाती हैं, लेकिन सम्भव है जब कोई खुरदरा हाथ इस नेमप्लेट को कूड़ेदान में फेंकने के लिए बढ़े तो पाये कि वहां न कोई नाम है, न रंग है, न अक्षर हैं, न ही कोई पट्टिका।
वह कमरा खाली है। बरसों से उसमें रहने वाला आदमी अब उसमें बरसों से नहीं रहता।
बारिश में
बारिश में रेनकोट पहन कर दुपहिए पर आवारगी करते रहना। बारिश बख्शेगी नहीं और बर्दाश्त के भीतर भी लगेगी। गीली उंगलियों में गर्म चाय की प्याली थामे पिछले जन्म की किसी घाटी में उतर जाना। वहां खपरैल से जगह जगह पानी टपकता होगा
और अनजाने अदेखे कोनों से बरसाती कीड़े निकलते होंगे। तारों पर बूंदें गले मिल कर कूद जाती होंगी। बाहर हवा और बारिश का मिला जुला शोर होगा। किताबों के पन्ने नम हो गये होंगे और उनमें लिखे शब्द गीली धरती की तरह महकते होंगे। मां हर जगह बरतन रखती होगी जिनमें पानी की बूंदों के गिरने की आवाज घर की आवाज होगी। घर में घर से बाहर रह गये की फिक्र होगी और घर के भीतर वालों की ऊब। एक स्लेटी आसमान से झरता हुआ बरसाती अंधेरा गायब हो गयी लाइट का फायदा उठा कर सारे घर में फतह कर लेगा। मोमबत्ती की लौ बार बार बदहवास होगी। तुम फिर लौटोगे और पाओगे कि चाय खत्म हो चुकी और ठंडी उंगलियों में प्याली की गर्मी भी। उठोगे और निकल पड़ोगे - अपने को उसी तरह बरसात के हवाले करते हुए और महसूस करते हुए कि धरती पर बरसता पानी तुम्हें किस तरह आसमान से जोड़ रहा है।