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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

  आत्मान्वेषण की प्रक्रिया में
शम्भु गुप्त

नीलाक्षी सिंह का उपन्यास ÷ शुद्धिपत्रा' अपने अनतिदीर्घ कलेवर में आज के बाजारवादी समय में गहराई तक जाकर डूबते को तिनके के सहारे की तरह हस्तक्षेप करता है। यों , तिनका सतह पर रहता है और कुल मिला कर यह एक मुहावरा ही तो है, जिसमें एक सदिच्छा या शुभाशंसा छुपी है, लेकिन यह उपन्यास न तो एक मुहावरा है, न इसमें कोई सदिच्छा या शुभाशंसा का कथित संदेश ही है। मूल्यवत्ता की स्थापना यह किसी संदेश या उपदेश या आग्रह की तरह नहीं करता और न ही किसी विकल्प की तरह। बल्कि कहना यह चाहिए कि यथार्थ की बहुआयामी खराद पर घटनाओं और चरित्राों को उनकी चरम सम्भावना तक ले जाकर - चढ़ा कर - यह दूर खड़ा हो जाता है और वहीं से आगे की प्रक्रिया को चुपचाप; बल्कि थोड़ी ÷ भीतरगुन्नी' नजरों से देखता चलता है। नीलाक्षी सिंह अपने हाथ में बहुत कम रखती हैं, सिर्फ इतना कि लगे कि वे एक उपन्यास लिख रही हैं। पता नहीं यह यथार्थ का, उसकी पेचीदगी का, उसकी संक्रामकता का दबाव है या उपन्यास की कथानायिका सरीखी स्वधा अवस्थी की तरह लेखिका का एक स्वभाव कि ÷ कभी ऐसी अकड़ूछाप कि कोई भी हो, कुछ भी कहे, अपनी बला से!' ( शुद्धिपत्रा पृ. १३९) कि लेखिका कथा में जितना धंसी हुई है, उससे ज्यादा उससे बाहर उतरा रही है, या कहें कि जितना वह ऊपर और बाहर उतराती या तैरती नजर आती है, उससे कई कई गुना ज्यादा वह गहरे अंदर धंसी है। यह एक विरोधाभास जैसी स्थिति है लेकिन इस विरोधाभास या कहें कि द्वंद्व के बिना यह कतई सम्भव नहीं हो पाता है कि एक लेखक ÷ अपनी आंखों से देखने, अपने रोओं से छूने, अपनी जीभ से चखने, अपनी सांसों को पहचानने का हौसला चाह' ( पृ. ११६) सके। एक लेखक के बतौर इस हौसले की चाह उसके सृजनरत होने और यथार्थ की पेचीदगी में सफलतापूर्वक धंसने की प्रारम्भिक शर्त है। इस हौसले के अभाव में वह या तो किनारे पर बैठ कर कंकड़ियां उछालता रहेगा या फिर गहराइयों की काल्पनिक प्रकाल्पनिक माप गढ़ता रहेगा। नीलाक्षी सिंह इन दोनों सीमाओं की कैद में फंसने से बची रह गयी हैं तो सम्भवतः इसका यही कारण है कि उन्होंने बहुत संयम से काम लिया है। वे अतिरक्ति रूप से अपनी किसी घटना या पात्रा से न तो सहानुभूतिशील हैं, न ही वितृष्ण। इनमें से कोई उनका अपना पक्ष नहीं है। ये घटनाएं या पात्रा अपने में लगभग स्वायत्त हैं और अपनी गति से चलते हुए अपनी परिणति तक पहुंचते हैं। लेखिका का पक्ष यदि कोई है तो वह पाठक है, जो इस पूरे प्रकरण में तीसरा पक्ष है। यह बात अजीब लग सकती है लेकिन सच है कि यह उपन्यास नीलाक्षी ने एक लेखक के बतौर नहीं, जैसे एक पाठक के बतौर लिखा है। एक ऐसे पाठक के बतौर, जो सारी चीजों को बहुत मजा ले लेकर देख रहा है और देख देख कर मजा ले रहा है। ऊपर ऊपर से देखने पर यह एक प्रकार का यथार्थवाद अथवा यथातथ्यवाद कहा जा सकता है लेकिन यह यथार्थवाद नहीं है। यह यथार्थवाद होता तो इसकी संरचना आख्यानक या वर्णनात्मक होती। यह उपन्यास आख्यानपरक या वर्णनात्मक नहीं है, यह इसके यर्थाथवाद से मुक्त होने का पहला लक्षण है। यह अपनी घटनाओं और पात्राों को किसी प्रकार की गलदश्रुता या भावुकतावाद में गर्क नहीं होने देता, यथार्थवाद से इसकी मुक्ति का यह दूसरा लक्षण है। और इसका तीसरा किन्तु अनंतिम लक्षण यह है कि ये घटनाएं और चरित्रा सिर्फ एक उदाहरण हैं, चीजें इनके पहले भी हैं और बाद में भी हैं। यह यथार्थ का एक बहता हुआ दरिया है, जिसे एक खास परिक्षेत्रा में चित्राांकित किया गया है।

एक लेखक बतौर एक पाठक कोई चीज लिखे , एक लेखक के रूप में यह कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए उसे अपने अंतर्निषेधों, आग्रहों, उत्तेजनाओं इत्यादि से मुक्त होना होता है, जो स्वयं में एक भारी भरकम काम है। अपने अंतर्निषेधों, आग्रहों, उत्तेजना इत्यादि से मुक्त होने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा करना होता है जो उसे एक सामान्यता - सहजता दे सके। वह किसी भी प्रकार के विशिष्टिताबोध से पूरी तरह मुक्त होकर बृहत्तर सामान्यजन का एक स्वाभाविक हिस्सा बन सके। ÷ शुद्धिपत्रा' जैसा उपन्यास इसी लेखकीय प्रक्रिया से गुजर कर लिखा जा सकता है। एक बेहद संतुलित और सतर्क प्रक्रिया; जिसे साधना बहुत मुश्किल काम है।

निश्चय ही मौजूदा मुक्त बाजार के बीच स्त्राी की स्थिति और नियति इस उपन्यास की केन्द्रीय चिन्ता है। लेखिका ने इस चिन्ता में शामिल होते हुए इसके उस सबसे नाभिकीय संदर्भ में सेंध लगायी है , जो स्त्राी को सार्वजनिक और सर्वमान्य तौर पर एक व्यक्ति से एक वस्तु या जिंस में रिड्यूस करता है। यानी कि उपभोग्य वस्तुओं के विज्ञापन/प्रचार प्रसार में स्त्राी का उपयोग। कमाल यह है कि पुरुष तो पुरुष; स्त्रिायों को भी इन विज्ञापनों में अब रस आने लगा है और वे उनकी जीवन शैली को निर्दिष्ट करते चल रहे हैं। मुक्त बाजार के बहाने नवसाम्राज्यवाद का यह एक नया पुरुषवर्चस्ववादी एजेण्डा है, जिसे स्त्रिायों ने हंस हंस कर आत्मसात किया है। यह एजेण्डा इतना र्छंिपूर्ण है कि ऊपर ऊपर से लगता है कि स्त्राी की भूमिका यहां केन्द्रीय है और उसे गौरव मिल रहा है लेकिन थोड़ा सा ही अंदर जाकर देखेंगे तो तुरंत पता चल जाएगा कि केन्द्र में यहां स्त्राी नहीं, मात्रा मादा है और उसी की वाहवाही कुल मकसद है। इस वाहवाही का प्रारूप सौन्दर्य निरूपण नहीं है बल्कि सौन्दर्य के उपभोग का निरूपण है। यह उपभोग निरूपण ही आज के बाजार की मांग मानी जा रही है। यहां एक शीतल पेय का विज्ञापन तैयार किया जा रहा है। विज्ञापन के सम्भावित चार विकल्पों में से दो ऐसे हैं जिनमें यह पेय मुंह के साथ साथ बल्कि मुंह में गयी दो चार बूंदों के बाद शेष सारी बोतल युवा स्त्राी की देह पा उड़ेली जाती है। युवा स्त्राी देह पर उड़ेला गया यह पेय जार में बेहोश पड़े मेढक को भी जिला देता है। एक अन्य विकल्प में एक युवा लड़की फरमाती है - ÷ मेरे शरीर को यह स्वाद क्यों न मिले!' इन दृश्यों के बाद पार्श्व से कैचलाइन उभरती है - ÷ ए ड्राप व्हिच ब्रिंग्स लाइफ टू वर्ल्ड... स्काई ड्राप...' ( पृ. १४३ एवं १४४)। यहां चयन हालांकि एक अन्य - थोड़े शालीन - विकल्प का होता है हालांकि इसके पीछे तात्कालिकता काम करती है; लेकिन चार में से दो विकल्पों का इस तरह युवा स्त्राी देह के चटखारों पर संकेन्द्रित होना विज्ञापन निर्माण की दुनिया की प्रवृत्तियों की ओर साफ संकेत करता है। इससे पहले भी यह कम्पनी वाशिंग पाउडर का वैसा बोल्ड और बिकाऊ विज्ञापन ( पृ. १७१) कर चुकी थी और आगे एक बाथ सोप के विज्ञापन में इस बोल्डनेस को और भी ÷ सनसनी' से भर कर बिकाऊ बनाया जाता है। ( पृ. १८६)।

÷ शुद्धिपत्रा' का यह असल कथा समरांगण है, जहां विभिन्न चरित्रा और स्थितियां एक दूसरे से टकराती हैं। यह टकराहट इतनी गहरी और निगूढ़ है कि यह लगभग समय की एक चारित्रिाकता के रूप में उभरती प्रतीत होती है। यहां चीजें परस्पर इतनी विरोधी और उलझन भरी हैं कि अंतिमतः कुछ भी सुनिश्चित नहीं हो पाता। यों, अंतिमतः सुनिश्चित तो कलाकृति में सामान्यतः कुछ होता भी नहीं है; जैसे जीवन में नहीं होता; यह उसकी एक सहजात प्रवृत्ति है। लेकिन फिर भी, कुछ चीजें तो सुनिश्चित होती ही हैं; मसलन प्रेम, मित्राता, सामाजिक पारिवारिक सम्बन्ध इत्यादि। यहां जैसे ये चीजें ही संकटग्रस्त हैं। नये समय ने इनकी नींव पर ही धावा बोला है; एक ऐसा धावा जो ऊपर से बहुत ही हृदयहारी और आत्मीय लगे। यह मुक्त बाजार की कूटनीति है। नीलाक्षी सिंह की विशेषता यह है कि वे चीजों को एकदम काला या एकदम सफेद जैसे पूर्वाग्रही नैतिकतावाद के तहत न लेकर उनके समयाबद्ध स्वरूप में लेती हैं; एक ऐसा समय जिसने न केवल इसकी बल्कि और बहुत सारी नैतिकताओं की चूलें बुरी तरह हिला दी हैं। हम किसे नैतिक कहें और किसे अनैतिक यह अधिकार जैसे हमसे छीन लिया गया है। जिसे अब तक हम अनैतिक कहते आये थे; उसके पास अपने तर्क हैं और अपना जस्टीफिकेशन है। वह भी अपने आप में कम तर्कसंगत नहीं है। बात नियति या परिणति की नहीं है; बात तत्काल की है। इस समय जो मुझे ठीक लग रहा है, अपने स्वयं के हिसाब से वही मेरा रास्ता है; इसमें नैतिक अनैतिक क्या होता है; इत्यादि इत्यादि! यानी कि इकतरफा यहां कुछ नहीं है; सब कुछ बेहद संश्लिष्ट और परस्पर उलझा हुआ है। यह संश्लिष्टता और उलझाव ऐसे हैं कि यहां केवल एक विकल्प आपके सामने है; और वह है - तात्कालिकता! यह तात्कालिकता हर अगले कदम पर तात्कालिकता ही रहती है। इसका न कोई इतिहास होता है, न स्मृति और न भविष्य ही। यहां सिर्फ तात्कालिकता का तांडव है। इस जीवन शैली में हर स्थिति और हर चरित्रा पूर्ण स्वायत्त है; उसे टोकने बरजने, चैक करने, निन्दा करने, तिरस्कृत करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। यह पूर्ण स्वतंत्राता है। इस उपन्यास की मुक्ता, सुजाता राय, सुजाता राय की मां, तेजसी पाल इत्यादि स्त्राी पात्रा इसके उदाहरण हैं। यह वृत्ति स्वधा अवस्थी में भी एक सीमा तक देखी जाती है।

यह कथितपूर्ण स्वतंत्राता कैसी है , इसका कॉनफिगरेशन और कैपेसिटी क्या और कैसी है, इसे हम सुजाता राय और उसकी मां के उदाहरण से बखूबी जान सकते हैं। सुजाता राय की ट्रजेडी यह है कि वह जहां के लिए चली थी, वहां तो पहुंच नहीं सकी; उल्टे जो उसके एजेण्डे में नहीं था, वह उसके सामने दरपेश होता है। कोई चाहे तो इसे कथा पर लेखिका का गजब नियंत्राण कह सकता है कि वह सुजाता राय को खींच खांच और धकेल धकाल कर वहां ले आयी, जो इस उपन्यास में उसका खुद का एजेण्डा है। क्या है, इस उपन्यास में नीलाक्षी सिंह का एजेण्डा? कोई चाहे तो आसानी से कह सकता है कि - सुधा या स्वधा अवस्थी नाम की लड़की! नीलाक्षी यहां उसे हीरोइन बनाने पर तुली हैं! तभी तो न ऐसा उन्होंने दिखाया कि सुजाता राय स्वतंत्राता के जिस रास्ते पर चलती चली जा रही थी, अचानक वह उसे व्यर्थ लगने लगता हैः ÷ मुझे अकेलेपन से बहुत डर लगता है। मुझे दुनिया से बहुत डर लगता है। मुझे आजादी से बहुत डर लगता है। मैं गुलामी का स्वाद चखना चाहती हूं'( पृ. ११९)। थोड़ा आगे चल कर वह इस आकांक्षा से भर उठती है - ÷ उसे किसी चीज की कमी नहीं लगती थी। बस एक खयाल नया नया सा आने लगा था कि कभी कभी स्वधा अवस्थी जैसी बन जाने का मन होता, जो हल्की हल्की गरीब हो, कभी आउटडेटेड सी लगे, कभी सलीकेदार, कभी ऐसा लगे कि वह चुपचाप सबकी सब बातें मान लेगी, गऊ जैसी। कभी ऐसी अकड़+ूछाप कि कोई भी हो, कुछ भी कहे, अपनी बला से!' ( पृ. १३९)। लेकिन कोई यह भी तो देखे कि उसकी यह आकांक्षा मात्रा उसकी एक सनक है। यह ठीक है कि सुजाता राय जब भी दुविधाग्रस्त होती है, वह स्वधा अवस्थी का दामन थामती है; लेकिन उपन्यास में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि सुजाता राय उसकी कायल हो चुकी हो।

दरअसल यहीं इस उपन्यास का वह सबसे बड़ा पेंच है जो जितना सुलझता है , उतना ही उलझ जाता है। कभी लगता है कि लेखिका स्वधा अवस्थी के पीछे खड़ी है और सबको कठपुतली की तरह नचा रही है। कभी लगता है कि लेखिका किसी के न आगे है न पीछे; दूर खड़ी एक एक चरित्रा को उसके अपने स्वयं के वजन में तौल रही है और पाठक की तरफ हसरत भरी निगाह से देख रही है कि वे खुद देखें कि कौन कितने पानी में है। लेखिका की इस पाठकोन्मुखता का पता उसकी एक तरह की टटकी खिलंदड़ी कथा भाषा से भी चलता है जो शुरू से आखिर तक लगभग एक तान में चलती है। यह खिलंदड़ापन कृष्णा सोबती जैसा विशेषणमूलक आख्यानपरक खिलंदड़ापन नहीं है और न ही परसाई जैसी व्यंग्यमूलकता इसमें है। इनके कुछ अंश इसमें जरूर हैं लेकिन इनका संचालक तत्व कुछ और है। दरअसल इस उपन्यास की भाषा का संचालक तत्व है - समय समीक्षा। यह समय ही है, जिसने सुजाता राय की कथित स्वतंत्राता की सीमाएं उजागर की हैं और उसे दुविधाग्रस्त बना दिया है। यह रास्ता दरअसल स्त्राी की व्यक्तित्वहीनता की ओर जाता है जहां स्त्राी एक व्यक्ति के अलावा सब कुछ हो सकती है। स्वधा अवस्थी जैसे इस नियति का पूर्वाभास कर लेती है, इसलिए आगे बढ़ते बढ़ते यकायक वह अपने कदम पीछे कर लेती है। शायद उसे पता चल जाता है कि पच्चीस सालों से चोटियों में गुंथे बाल खुल जाने ( पृ. ११८), चीफ की नजरों में आ जाने ( वही), ÷ अपने हाथ केबिन में मजबूत कर' लेने ( १५१) से एक स्त्राी का व्यक्तित्व नहीं बनता। यह तो दरअसल स्वयं को व्यक्तित्वहीनता के रास्ते पर बढ़ाते चलना है, जो कि वैश्वीकरण और मुक्त बाजार के मूल में निहित एक नये पुरुषवर्चस्व का र्छंिपूर्ण लुभावना कार्यक्रम है। सुजाता राय जो यह तय पाती है कि अब सही मायने में उसकी जिन्दगी उसके काम जैसी थी, जिसमें हर बार चीजों को नयी नजर से व्यवस्थित कर लुभावना बनाये रखना था बस...ताकि वह बिक सके। ( १००) और उसमें जो वैसी किलर इंसटिंक्ट है जिससे तरक्की मिलती है ( १३५) और अब जो उसकी यह स्थिति है कि - ÷ सुजाता राय को अकेलेपन से डर लगता था। या कि उसके शब्दों में नफरत थी अकेलेपन से उसे। यहां अकेलेपन का मतलब अकेले रहने से नहीं, दिमाग के खालीपन से था। इसीलिए शायद उसने अपने को शोर में डुबो दिया था। जिन्दगी उसके लिए दफ्तर था, पार्टी थी, शापिंग थी, सैरसपाटा मौज मस्ती थी। उसे प्यार में ताजा ताजा धोखा मिला था। पर तारीफ कि उसके चेहरे पर आज एक भी निशान नहीं था इस फरेब का।' ( ९९) तो दरअसल यही तो वह व्यक्तित्वहीनता और संवदेनशून्यता - एक तरह की यांत्रिाक ठसता - है, जो मौजूदा नवपुरुषवर्चस्ववाद का संलक्ष्य है। दिमाग का खालीपन स्त्राी को देह लीला में ही तो डुबायेगा; इसे कौन नहीं जानता! सुजाता राय की मां को अपने नये पति द्वारा दूध में से मक्खी की तरह निचोड़ कर निकाल देना एक पुराने किस्म का क्रूर धोखा कहा जा सकता है, लेकिन पहले इस धोखाधड़ी के खिलाफ बहुत कुछ किया जा सकता था, आज इसका कोई इलाज नहीं रह गया है तो दरअसल इसीलिए कि स्त्राी यहां खुद ग्लैमर में फंसी है। नये पुरुषवर्चस्ववाद के जबड़े इतने भयानक और कूटनीतिक हैं कि वह स्त्राी को उसके अपने हथियारों से ही शिकस्त दे रहा है। नीलाक्षी ने इस प्रकरण को थोड़ा खोला होता तो, मेरा अंदाजा है कि, यही तथ्य उभर कर सामने आते।

कहने को कह सकते हैं कि एक लेखिका के रूप में नीलाक्षी सिंह ने स्वधा अवस्थी का दामन थाम कर स्त्राी की इसी देह लीला वाले नवपुरुषवर्चस्ववाद के कूटनीतिक मंसूबे का प्रतिरोध और प्रतिकार खड़ा किया है , इस उपन्यास में। हो सकता है, यह सच हो। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। पूरी सच्चाई यह है कि एक सीमा तक खुद स्वधा अवस्थी इस ग्लैमर के फेर में पड़ी दिखाई देती है। घर से कदम बाहर रखने से लेकर इस विज्ञापन कम्पनी में नौकरी के स्थायित्व के उस कथित कम्पिटीशन के वक्त तक - जिसमें कि वह बॉस को अपने जादू में लगभग पूरी तरह बांध चुकी है - वह निरंतर इस रास्ते पर आगे बढ़ने की कोशिश में रही है। अब, यह अलग बात है कि इस मामले में वह हमेशा एक कदम आगे तो दो कदम पीछे वाले अंतर्द्वंद्व के चलते किसी मुकाम तक नहीं पहुंच पाती और अंततः इस अंधी दौड़ से ही अपने आप को अलग कर लेती है।

शुद्धिपत्रा का महत्व यह है कि इसमें मौजूदा वैश्वीकरण और मुक्त बाजार के अंतर्गत स्त्राी की दुर्द्धर्ष नियति के बरअक्स उसके व्यक्तित्व की एक नयी खोज का प्रयास किया गया है। स्त्राी के पास - विशेषतः युवा स्त्राी/लड़कियों के पास - इस समय दो ही विकल्प हैं - ÷ अपनी रंग झड़ी उपस्थिति को रंगों से भर देना या हाशिये पर जाकर खड़े हो जाना, अब इससे आगे कोई विकल्प था नहीं।' ( ८५)। यह स्वधा अवस्थी है, जो एक ओर अपनी परम्परागत पारिवारिक/कस्बाई झिझक और फलसफे से लैस है तो दूसरी ओर उसकी ÷ मध्यवर्गीय आंखों का कोई ऊंचा सपना' ( १५८) उसे उद्वेलित भी किये है। वह घर से बाहर निकलने से लेकर लगातार इन दो ध्रुवों के बीच कभी इधर तो कभी उधर होती रही है। हालांकि कालांतर में धीरे धीरे उसने इन दोनों का एक मिश्रण भी तैयार किया, जो संयोगवश बड़ा ही फैशनेबुल और चित्तार्षक बन पड़ा; बॉस से लेकर सुजाता राय तक उसके इस सम्मोहन से बंधे हैं - ÷ ऐसी लड़कियां सच में फैशन में भी थीं। सीरियलों तक में। सीधी सादी दिखनेवाली देशी लड़की, जिसमें खूब सी करीनगी छिपी हो, लोग मन ही मन उससे चकित हों, पर प्रत्यक्ष में तवज्जो नहीं। और एक दिन जब वह अपने को खोल से निकाल कर पंख फैलाये सामने खड़ी हो तो सारी दुनिया उसकी गुलाम।' ( १३९)। लेकिन यह तो यर्थाथवाद है जिससे आगे चल कर न केवल इस चरित्रा को बल्कि इसकी रचनाकार को भी मुक्त होना है। ध्यान से देखें तो इस लड़की के इस कथित सम्मोहन के पीछे भी नवपुरुषवर्चस्ववादी मानदंड अपना काम कर रहे हैं। जब तक यह इन्नोसेंस में है तब तक तो इसे एक तरह की गुलामियत में रहना है और जब यह इससे बाहर निकल अपना विस्तार करेगी तो लोगों को इसका गुलाम हो जाना है; इन दोनों स्थितियों में क्या तत्वतः कोई फर्क है? गुलामियत दोनों स्थितियों में है। पहली में सीधे सीधे और और दूसरी में र्छंि रूप में। एक ऐसी गुलामी; जो नस्लवाद की तरह काफी समय लेकर ही पहचान में आती है। लेकिन तब तक बाढ़ सब कुछ बरबाद कर चुकी होती है। पंख खोले स्त्राी की गुलामी करता पुरुष दरअसल उसका स्वत्व चूस रहा होता है, और पूरा चूस लेने के बाद वह उसी स्थिति में आ जाती है जिसमें इस उपन्यास में हम सुजाता राय की मां को देखते हैं। सम्भवतः सुजाता राय भी उधर ही बढ़ रही दिखती है। आखिर ऊपर के उद्धरण में दोनों स्थितियों में गुलामियत ही क्यों है? किसी भी स्थिति में बराबरी, जनतांत्रिाकता, निजता जैसी मानसिकता नहीं है। शक दरअसल इसी कारण पैदा होता है। स्त्राी का लापरवाह इन्नोसेंस भी पुरुष के आनंद की वस्तु है और फिर पंख फैला कर सामने खड़ा होना तो सीधे सीधे चरम आनंद है ही!

कहना होगा कि स्वधा अवस्थी न तो अपनी इन्नोसेंस की स्थिति में पूरी तरह अबोध है और न बाद में जब वह अपने पंख फैलाना शुरू करती है तो पूरी तरह सर्वसमर्पित। यह उसकी एक सहजात प्रवृत्ति जैसी है जिसका सम्बन्ध उसके पारिवारिक सामाजिक/वर्गीय संस्कारों से हैं। ÷ संस्कार' शब्द पर किसी को ऐतराज हो तो यहां ÷ स्वभाव' शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेखिका सम्भवतः उसके इसी पारिवारिक सामाजिक/वर्गीय स्वभाव को उसकी ÷ कुछ अलौकिक शक्तियां' नाम देती है, जो प्रारम्भ से लेकर अंत तक उसमें निरंतर जीवित रहती हैं और समय समय पर उसे निर्दिष्ट करती चलती हैं। इन्हीं शक्तियों ने दरअसल उसे यह परखने की अंतर्दृष्टि दी है कि अपने बॉस के साथ सचमुच में वह पे्रमाबद्ध है या यह उसकी आंखों का कोई मध्यवर्गीय ऊंचा सपना मात्रा है। ( १५८)। यही अंतर्दृष्टि उसे यह समझ देती है कि उसका सम्भावित प्यार तो वह हकलाने वाला लड़का है और जब वह देखती है कि वह हकलाने वाला लड़का तो किसी और का हो गया है तो यही अंतर्दृष्टि प्रारम्भिक स्वाभाविक ईर्ष्या/द्वेष के बाद उसे यह समझा भी देती है कि अब इस सम्भावना से अपने हाथ खींच लेना ही उचित है। स्वधा अवस्थी नाम की यह लड़की आदर्श की पुतली या एकदम सूफियाना स्वभाव की नहीं है। वह एक पर्याप्त स्वाभाविक जीवंत चरित्रा है जिसमें बहुत सारी कमियां और कमजोरियां हैं। लेकिन उसमें वह जो एक सहजात पारिवारिक सामाजिक/वर्गीय चेतना है, वह उसकी सबसे अहम पहचान है। उसकी यही चेतना उसे अंततः इस मुकाम पर लाती है कि - ÷ इससे ज्यादा जरूरी है कि मैं अपने आप से प्यार करूं। ... देखो, यहां भी फिर से पहला कदम धरने की तैयारी है।' ( १८८) उसे कोई चाहे तो स्त्राीवाद के एक विशिष्ट प्ररूप के अंतर्गत ले सकता है, या कोई चाहे तो इसे मध्यवर्गीय आत्मलीनता भी मान सकता है, जो आगे चल कर कोई भी रूप ले सकती है। लेकिन जैसा कि हम इस लड़की के पिछले इतिहास से जानते हैं, यह एक युवती के एक मनुष्य के रूप में अपने निजी व्यक्तित्वहीन हो जाने के खतरे का प्रतिरोध और विकल्प है, बल्कि एक रूप में स्त्राी की अनंत सम्भावनाओं के व्यक्तित्व की खोज भी है।

यह उपन्यास दरअसल अपने समय को कई स्तरों पर पकड़ता है। स्त्राी के व्यक्तित्व की खोज इसका एक आयाम है तो प्रेम सम्वेदना अथवा स्त्राी पुरुष सम्बंध दूसरा आयाम है। ये दोनों आयाम यहां युवा पीढ़ी के संदर्भ से उठाये गये हैं। चूंकि यहां युवा पीढ़ी है तो संदर्भ की सम्पूर्णता के लिए पिछली एक दो पीढ़ियां भी हैं। युवा पीढ़ी मौजूदा समय में संक्रमित है , ऐसा उससे पिछली पीढ़ी उसके बारे में सोचती है। यहां एक चीज और साफ साफ दिखाई देती है कि युवा पीढ़ी जिस संक्रमण से गुजर रही है और जिस बेपनाह संघर्ष, अंतर्द्वंद्व, असमंजस और दुविधा के साथ जी रही है, उससे पिछली पीढ़ी का साबका नहीं रहा है। पिछली पीढ़ी एक तरह से इस बदले हुए समय से अनभिज्ञ है और उसके फार्मूले वही पुराने हैं। मौजूदा समय में पीढ़ियों के बीच का अंतराल या पीढ़ीगत द्वंद्व की पिछली अवधारणा अधिकांशतः बदल गयी है। अब इन दोनों के बीच अहं का टकराव लगभग खत्म है। युवा पीढ़ी के रास्ते में पिछली पीढ़ी अब रोड़ा नहीं है बल्कि कुछ और ही चीजें इस जगह आ गयी हैं। बदले हुए समय ने भिन्न किस्म की चुनौतियां उसके सामने पेश की हैं, जो उसके भविष्य निर्माण; उसके कैरियर, उसके व्यक्तित्व, सामाजिक पारिवारिक व्यक्तिगत सम्बन्धों आदि; के मानदंड निर्धारित कर रही हैं। यहां एक तरह से उसका अस्तित्व और व्यक्तित्व ही दांव पर लगा है। मूल्यवत्ता इसीलिए गौण हो गयी है। मूल्यधर्मिता उसके लिए अप्रासंगिक कर दी गयी है। ऐसा इसलिए हुआ है कि उसे उसके इतिहास और स्मृति से विमुक्त कर दिया गया है। इतिहास और स्मृति से हीन होने पर तत्कालवाद सबसे बड़ा मूल्य बन जाता है। इतिहास और स्मृति से हीन होने पर मनुष्य किसी आदिम जीव की तरह बेसिक इंसटिंक्ट्स से परिचालित होने लगता है। ये आदिम वासनाएं ही उसका वर्तमान और भविष्य तय करती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसी स्थिति में देहवाद सर्वप्रमुख हो उठे और आदमी आत्महीनता की ओर कदम बढ़ा दे। मौजूदा वैश्वीकरण और मुक्त बाजार युवा पीढ़ी को यही सब कुछ दे रहा है।

युवा पीढ़ी का असल संघर्ष यह है कि उसे न केवल इस तात्कालिक देहवाद से मुक्त होना है बल्कि अपने इतिहास और स्मृति को पुनर्जीवित करते हुए मूल्यधर्मिता के अंतर्गत अपना भविष्य संवारना है। उसका संकट यह है कि अधिकांश परिस्थितियां इस मामले में उसकी असहयोगी हैं और उसे हतोत्साह कर रही हैं। उसके पास अब सिवाय इसके कोई चारा नहीं है कि वह सारे भेड़ियाधसान को अस्वीकार कर आत्मस्थ हो जाए और एक गहरी आत्मान्वेषण की प्रक्रिया में खुद को डाल दे। जैसा कि स्वधा अवस्थी यहां करती है।

नीलाक्षी सिंह अब तक जो काम अपनी कहानियों में कर रही थीं , इस उपन्यास के मार्फत उसको एक बार फिर उन्होंने आगे बढ़ाया है। अबकी बार थोड़ी ज्यादा संश्लिष्टता, गहराई और सूझबूझ के साथ। उनका कथा कर्म युवा पीढ़ी को संकट और संक्रमण से उबरने का साहस देता है; एक ऐसी अंतःप्रेरणा जो फिलहाल निर्विकल्प हैः ÷... घबराने की बात नहीं... मामूली सी मुश्किल है, तुरंत स्थिति सामान्य हुई जाती है... ऐसा! यह आकलन सौ फीसदी प्रामाणिकता न जुटा पाये... पर एक लौ भर आस तो है ही इसके पक्ष में।' ( १९२)

 

शुद्धिपत्रा : नीलाक्षी सिंह, प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्य : १४५.०० रु.

 


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