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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

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शताब्दी
दिनकर
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लेख
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मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
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अंक/17 जनवरी/08

कविता के एकांत में
भारत भारद्वाज

एकांत श्रीवास्तव बीसवीं शताब्दी की ढलान पर उभरे कवि हैं लेकिन जिस तीव्रता के साथ उन्होंने अपने पहले कविता संग्रह ÷अन्न हैं मेरे शब्द' (1994) से लेकर अब तक प्रकाशित अपने तीसरे कविता संग्रह ÷बीज से फूल तक' (2003) तक कविताई की है, कविता के सुधी पाठकों को सुखद आश्चर्य से भरने वाली है। लगभग डेढ़ दो दशकों की उनकी यह काव्य यात्रा इसलिए भी आह्‌लादक है कि उन्होंने कविता को ÷अन्न' से उठाते कर मिट्टी से जोड़ ही नहीं दिया है, कविता बनने की कहानी को ÷बीज से फूल तक' हार्दिकता से बढ़ाय भी है। ऐसे समय में जब कविता को लेकर, खासकर उसकी पहचान के संकट को लेकर अनेक सवाल उठाये जा रहे हैं, एकांत श्रीवास्तव ÷समुद्र में सूर्योदय' में एक ऐसी कविता लिखते हैं जो ÷पानी का महाकाव्य' बन जाता है। रघुवीर सहाय की कविता ÷पानी का संस्मरण' याद आने लगती है। मैं बताऊं आपको, जब उनके पहले कविता संग्रह की समीक्षा मैंने ÷इंडिया टुडे' के लिए लिखी थी, इस कवि से मेरा बिल्कुल परिचय नहीं था। लेकिन इसकी कविता ने मुझे लिखने के लिए विवश किया था। और लिखना मेरा चुनाव था। मैं फिर कहना चाहता हूं कि जिस तरह एकांत श्रीवास्तव की कविताओं का विकास हुआ है, हिन्दी की उनकी पीढ़ी के बहुत कवियों का हुआ है। अच्छी बात यह है कि एकांत का शब्द पर अटूट विश्वास है। उनके तीसरे संग्रह के बल पर हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने बिल्कुल ठीक संकेत किया है कि ÷अन्न हैं मेरे शब्द' से अपनी काव्य यात्रा आरम्भ करने वाले एकांत आज भी विश्वास करते हैं कि ÷जहां कोई नहीं रहता/वहां शब्द रहते हैं', शब्द को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ देने वाले एकांत अकेले नहीं हैं, यहां उनके पूर्वज भी हैं। त्रिालोचन के एक कविता संग्रह का शीर्षक है ÷शब्द' और नोबेल पुरस्कार विजेता ज्यां पाल सात्र की आत्मकथा का तो शीर्षक ही है ÷दि वर्डस' (यानी शब्द)। एकांत कविता की दुनिया में मात्र शब्दों पर टिके हुए नहीं हैं, वे उसके पार संवेदना की दुनिया में भी जाते हैं।
इधर हिन्दी में आलोचकों ने ÷आलोचना में रचनाकारों का हस्तक्षेप' पर ही नहीं लिखा है, ÷हिन्दी की युवा आलोचना' पर भी गम्भीरता से विचार किया है। आलोचना का वर्तमान परिदृश्य इन्हीं सादृश्यों से जगमगा रहा है। कविता आलोचक को ही नहीं, कवियों को भी उसी तरह परेशान करती है। क्यों करती है, इस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। कविता लिखी जाती है, पढ़ी जाती है, सराही जाती है। उस पर आलोचकीय टिप्पणी होती है। सब कुछ ठीकठाक होता रहता है। लेकिन कहीं कवि के मन में भी अपनी कविता के कविता होने को लेकर संशय बना रहता है। यह लगभग द्वंद्वात्मक स्थिति है कवि और आलोचक के बीच! कवि को लगता है आलोचक उसकी कविता को ठीक से नहीं समझ रहा है, आलोचक को लगता है कवि अपने समय को ठीक से पकड़ नहीं पा रहा है। टकराहट इसी बिन्दु पर होती है। जब टकराहट ज्यादा होने लगती है, कवि आलोचक को फालतू समझने लगता है और अपनी कविता की सफाई देने लगता है। लेकिन बात इससे बनती नहीं। यदि इस धरती पर सिर्फ रचयिता होते, आलोचक न होते तो शायद उनकी दृष्टि में दुनिया बहुत खूबसूरत होती लेकिन यदि कोई यह बताने वाला नहीं होता कि रचयिता की नयी सृष्टि कैसी है तो दुनिया कैसी होती, बताना मुश्किल होता। यह नयी बात नहीं है कि काशीनाथ सिंह ने बता दिया कि ÷आलोचना भी रचना है' और सचमुच है। यह बात मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं। हम समझते हैं आलोचक आउट साइडर है, उसे रचना से कुछ लेना देना नहीं। यह गलत बात है। आलोचक के बिना रचनाकार का अस्तित्व पहचान में ही नहीं आता। कौन बतायेगा रचनाकार द्वारा सृजित रचना किस कोटि की है।
आज यदि साहित्य की दुनिया में कवि खुद कविता पर विमर्श करने के लिए उतारू हैं तो इसका यह साफ मतलब है कि उन्हें सिर्फ कविता लिखने से संतुष्टि नहीं है, वे यह भी जानना चाहते हैं कि पाठक यह भी समझे कि किस तरह कविता लिखी जा रही है। वे भी कविता का इतिहास, भूगोल और व्याकरण समझते हैं। इधर जिस तरह युवा या युवेतर कवियों की पीढ़ी ने कविता से सम्बंधित या कवितेतर गद्य लेखन किया उससे स्पष्ट है कि उन्हें सिर्फ कवि न माना जाए, वे अपने समय को भी ठीक से समझते हैं। इस क्षेत्र में पहली दस्तक दी − अरुण कमल ने 1999 के आरम्भ में ÷कविता और समय' से। इसी वर्ष उदय प्रकाश की पुस्तक छपी ÷ईश्वर की आंख'। इन दो पुस्तकों के छपने का साफ संकेत था कि नयी पीढ़ी के कवि सचेत हो जायें कि उन्हें सिर्फ कविता नहीं गद्य और खासकर कविता पर भी विचार करना है। हवा में पहले से ही सुगबुगाहट थी। फिर अन्य कवियों को तय करना था कि वे क्या करें। 2004 में एक साथ राजेश जोशी की पुस्तक आयी − ÷एक कवि की नोट बुक' और विष्णु नागर की ÷कविता के साथ साथ'। लगभग इसी के आसपास आयी कवि विनोद दास की पुस्तक ÷कविता का वैभव'। ऐसी स्थिति में बस मैं सिर्फ अनुमान भर कर सकता हूं कि इसी पीढ़ी या तुरंत बाद की पीढ़ी के युवतर कवि अपनी स्थिति के बारे में क्या सोच रहे होंगे। लेकिन कविता पर विचार करना इन्हें जरूरी लगा।

÷कविता का आत्मपक्ष' कवि एकांत श्रीवास्तव की एक ऐसी पुस्तक है, जो उनके पूर्वज, समकालीन कवियों द्वारा लिखित प्रकाशित पुस्तक से इस अर्थ में हट कर है कि इस पुस्तक में कवि ने कविता के भीतर एक कवि की तरह प्रवेश किया है, एक शास्त्राीय आलोचक की तरह नहीं। और कविता की दुनिया में यह प्रवेश हार्दिकता के साथ है। और बेलाग है। यहां न शास्त्रा है न शास्त्राीयता। टे्रन यात्रा के बीच रचना आलोचना और कविता की कौंध है। प्रथम दृष्टया देखने में यह पुस्तक साधारण लगती है, लेकिन इसके भीतर प्रवेश करने के बाद बाहर निकलना, मुश्किल लगता है। यह मेरा अनुभव है। कविता के बारे में बोलना या विचार करना कठिन रहा है और कविता के बीच से गुजरना तो और भी कठिन।
मुझे मालूम है कि एकांत श्रीवास्तव की यह पुस्तक वस्तुतः ÷कविता का आत्मपक्ष' नहीं है, उसकी आत्मकथा है और इस आत्मकथा के अनेक पक्ष हैं, जिनका उद्घाटन करना मुझे जरूरी लगता है। इस पुस्तक में संकलित एक टिप्पणी है− ÷कविता का आत्मपक्ष' जिसे पढ़ने से पता चलता है कि ÷कविता का आत्मपक्ष' के अनेक पक्ष हैं, जिन पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। एकांत लिखते हैं−÷÷कविता को सामाजिक वस्तु मान लेने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए बशर्ते उसके वैयक्तिक पक्ष का भी ध्यान रखा जाए।'' बिल्कुल ठीक बात है। मैं अपनी बात कहूं तो इस पुस्तक पर लिखने के पूर्व मैंने ÷कविता! क्या है?' पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डा. जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ. नामवर सिंह का लेखन और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की पुस्तक ÷कविता क्या है' देखा। असली कविता को ढूंढने की यह प्रक्रिया मुझे अधूरी लगी। दरअसल कविता कविता में होती है, शास्त्राीयता या शास्त्रा निरूपण में नहीं। एक अच्छी कविता का उदाहरण देकर ही बताया जा सकता है कि अच्छी कविता कैसी होती है।
एकांत श्रीवास्तव ने अपनी इस पुस्तक में जिस तरह कविता पर विचार किया है, उस तरह अब तक किसी कवि ने विचार नहीं किया था। अच्छी बात यह है कि ऐसा वस्तुनिष्ठता के साथ किया गया है, शास्त्राीयता के आधार पर नहीं। आरम्भ ÷एक फूल का नाम' (कविता का शीर्षक) को ही आप देखें वे लिखते हैं− ÷÷शीर्षक भी कविता की एक सुविधाजनक पहचान के लिए आवश्यक है।'' आगे − ÷÷कभी कभी शीर्षक कविता की मूल वस्तु को स्पष्ट करते हैं।'' बिल्कुल ठीक है। एकांत ने ÷कविता का आरम्भ', ÷कविता का महत्व' और ÷कविता का अंत' पर भी चलते चलते विचार किया है, जो ठीकठाक लगता है।
इस पुस्तक में एकांत ने कविता के अनेक क्षेत्रों पर विचार किया है और उनका यह विचार गम्भीरता से कविता से जुड़ा हुआ है। चाहे कविता का घर हो या रचना का सच। ÷कविता का घर' आलोचना के वास्तु (वस्तु नहीं) के अनुसार बनाना चाहिए− ऐसी उम्मीद की जाती है। लेकिन एक अच्छी कविता हर बार आलोचना के वास्तु को बदल देती है और अपना वास्तु स्वयं तय करती है।
एकांत ने कविता के घर में प्रवेश करते समय तमाम सावधानियां बरती हैं और अपने पूर्वजों को हमेशा ध्यान में रखा है। एक अच्छी बात यह है कि उन्होंने कविता से सम्बंधित ज्ञात तमाम स्रोतों की भी खोज की है। और इस खोज में उनकी कविता से लगातार टकराहट हुई है। कविता के आरम्भ से लेकर कविता के मध्य और कवित के अंत तक। मुझे लगता है जिस तरह एकांत श्रीवास्तव ने इस पुस्तक की परिकल्पना की है, इसके पहले इस तरह विचार नहीं किया गया। कविता क्या है? को हार्दिकता के साथ नहीं, संवेदनशीलता के साथ एकांत श्रीवास्तव ने अपने विमर्श में उठाया है। मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि हमारे समय के एक कवि ने कविता की संवेदनशीलता को हमारे समक्ष मूर्तिमान किया है। इस पुस्तक को पढ़ते वक्त मुझे बराबर रसूल हमजातोव की पुस्तक ÷मेरा दागिस्तान' और मारिया रिल्के की पुस्तक ÷पत्र युवा कवि के नाम' याद आती रही।
अंतिम बात, ÷कविता का आत्मपक्ष' एक कवि द्वारा कविता के बारे में लिखी गयी बेहद हंसमुख गद्य की पुस्तक है, जिसमें हमारा जीवन और समाज बेशक अपनी कुरूपता में चमकता है, लेकिन यह हमारे समय की सच्चाई है। एकांत की कविता की, उनके गद्य की, अपने समय में होने की तारीफ की जानी चाहिए। एकांत ने अपने समय की कविता को जिस तरह रूपायित किया है, विलक्षण है। ÷कविता का आत्मपक्ष' वस्तुतः हमारे समय की कविता का विपक्ष है। एक ऐसा विपक्ष जो उनके बाद की कवि पीढ़ी की आंख खोलेगा।
कविता का आत्मपक्ष : एकांत श्रीवास्तव, प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, मूल्य : 150.00 रु.।


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