27 नवम्बर, 1977 को मुम्बई में जन्मे गीत चतुर्वेदी समकालीन रचनाशीलता के विरल उदाहरण हैं। कविता, कहानी और अनुवाद के क्षेत्रा में उन्होंने यादगार काम किये हैं। कविता के लिए उन्हें पिछले दिनों प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला। प्रस्तुत है उनके कथाकार की उपलब्धिᄉ यह लम्बी कहानी।
हमने अच्छा किया या बुरा
इस सोच से बहुत आगे
एक मैदान है
मैं तुम्हें वहां मिलूंगी
जब आत्मा अपने से भी ऊंची
उस घास के बीच लेटती है
तो दुनिया इतनी ठसाठस भरी होती है
कि उसके बारे में कुछ भी बोलना
अच्छा नहीं लगता
विचार, भाषा, यहां तक कि यह कहना
हम एक दूसरे के लिए है
जहां कोई मायने नहीं रखता।
जलालुद्दीन रूमी
डिम्पा की मां के बारे में तो आप जानते ही होंगे। मैंने जब पिछली से पिछली बार कहानी लिखी थी, तो आपको बताया ही था उसके बारे में। भूल गये लगता है? यार, अपन ने लम्बे टैम तब अस्सल लुक्खागिरी की है, तो अपुन को ÷काहनी' में भोत इंटरेस्ट है। ÷काहनी' बोले तो किसी की अक्खी लाइफ का एक्स रे। जब लुक्खागिरी के मूड में होते, तो ÷काहनी' बोलते। जब अकेले में बैठ कर सोचते, तो कहानी सोचते। दोनों में डिफरेंस है। तो डिम्पा की मां अपन लोगों को बहुत जमी थी, क्योंकि उसके नितम्ब बहुत बड़े बड़े थे और हम लोगों में एक शर्त लगती थी, खासकर तब, जब वह बिरला गेट पर भाजी लेने आती थी। जब वह भाजी लिया करती, तो हम पीछे से उसे देखते हुए यह शर्त लगाते कि आज कौन उसके हिप्स पर चिकोटी काटेगा, कौन चमाट मार सकेगा, वगैरह वगैरह। और कहीं दिलचस्पी नहीं होती थी, बस हिप्स।
डिम्पा की मां को वैसे कोई खास आब्जेक्शन नहीं होता था, पर अगर चिकोटी ज्यादा तेज कट गयी, तो वह बवाल कर देती थी। धीरे से सहला दो, तो वांदा नहीं। ग्रांटेड है।
जब वो आती, तो हम लोग गुनगुनाना शुरू करते थे ᄉ आधा किलो, एक किलो। आधा किलो, एक किलो। उसके विकट नितम्ब बहुत नैसर्गिक तरीके से अप एंड डाउन होते थे और हम उसे तराजू के रूपक में देखते थे। जैसे तराजू का भारी पलड़ा नीचे होता है, हल्का ऊपर, वैसे ही उसके नितम्ब भी ऊपर नीचे होते थे।
शर्त के कारण येड़ा ढेपलू तीन बार फंसा था। शायद वो ज्यादा ही जोर से चिकोटी काटता था। या फिर उसे ऐसा लगता था कि यह दस्तक है, अगर डिम्पा की मां ने उसे पहचान लिया, तो उसके घर में उसकी फ्री एंट्री हो जाएगी और फिर तो खल्लास। झक्कास में धमाल, फुक्कट में बजाओ माल। पन ऐसा कभी हो नहीं पाया। येड़ा ढेपलू को तीन बार डिम्पा की मां के चमाट गाल पर झेलने पड़े। और मजे की बात है कि तीनों बार डिम्पा की मां ने उसे पहचाना।
बोली ÷÷रंडी के, फिर आ गया तू।''
और तड़ाक। येड़ा ढेपलू ने शर्त लगाना बंद कर दिया। यही नहीं, डिम्पा की मां अगर बिरला गेट पर दिख भी गयी, तो येड़ा ढेपलू सीधे कल्याण निकल जाता, डुक्कर पकड़ के।
सच्ची बोले तो तीसरी बार बेचारे येड़ा ढेपलू का कोई कसूर ही नहीं था। चमाट तो टकले गुड्डू गांधी ने मारी थी। दो बार येड़ा ढेपलू पिट गया, तो तीसरी बार उसने शर्त लगाने से ही मना कर दिया। गुड्डू गांधी ने उसे बहुत उकसाया। जमाने भर के हीले दिये। पर येड़ा नहीं माना, तो नहीं माना। फ्लैट नकार। तय हुआ कि इस बार किला फतह करने का जिम्मा गुड्डू गांधी का। साला, गुड्डू गांधी भोत शाणा बनता था। अक्खा टाइम टकला रहता था। दाढ़ी बढ़ी रहेंगी, चल जाएंगा, पर टकले पे बाल नहीं मंगता। जब छोटा था, तो बाप ने उसको बहुत प्यार से गुड्डू नाम दिया था। उसके टकले को देख हममें से किसी ने गांधी नाम दे दिया। बाप और दोस्त का प्यार मिल गया, तो गुड्डू गांधी बन गया। हम लोगों ने सोचा कि हर बार बेचारे येड़े को पड़ती है, इस बार गांधी के शाणपणे की थोड़ी वाट लगनी चाहिए। डिम्पा की मां से खायेगा, तो शाणपणा निकल जाएगा। तो तय हुआ कि हाथ तो गांधी ही फिरायेगा। गांधी ने भी टंगड़ी मार दी। येड़ा ढेपलू उसके साथ गाड़े तक जायेगा, जिधर डिम्पा की मां दो रुपये की भाजी के लिए सौदागरी कर रही है।
गुड्डू गांधी गया। साथ में येड़ा भी। येड़ा डर रहा था। दो चमाट याद थे उसको। वह थोड़ा पीछे ही रहा। गाड़े के पास भीड़ तो होती है। येड़े को पता नहीं चला कि गांधी ने कब हाथ साफ किया। उसे तो डिम्पा की मां के लल्ले काले चेहरे पर भभकती हुई लाल आंख दिखाई दी और उसका हाथ अपने गाल की दिशा में बढ़ता दिखाई दिया। रापचिक काला क्रिश्चियन हाथ। माईला...येड़े का उदरीच वाटरलू होगया।
डिम्पा की मां बोली, ÷÷यह रंडी का..हमेशा तंग करता है।''
किसी ने पूछा, ÷÷क्या हो गया?''
÷÷अरे, ये हरामी का बच्चा है।''
दो चार लोग और पलट गये। क्या हो गया, क्या हो गया, की रट लग गयी।
डिम्पा की मां बस इत्ता बोली, ÷÷ये स्साला हरामी है...।''
दो लोग आगे बढ़े, तो लगा, येड़े को सलटा देंगे ओर येड़ा भी नक्की ढक्कन, कि जगह से हिले ही नहीं। आंख फाड़ कर बस डिम्पा की मां को देखे जावे। उसको मजबूत पड़ती पब्लिक की, उससे पहले ही गांधी एक्टिव हो गया। पूछा, ÷÷क्या हो गया आंटी? क्या हो गया भइया?''
÷÷ये स्साला हरामी है...''
÷÷क्या किया रे? बोल? भड़वे? बोल?''
गांधी ने येड़े को हड़काना शुरू किया और धक्के मारते हुए थोड़ा आगे तक ले गया। फिर बोला, ÷÷निकल ले लपुट। तेर्कों बचाके यहां तक ले आया। अब निकल ले। मेरी गारंटी नहीं अब चल निकल।''
और येड़ा वहां से भागा, कि साला दूसरे दिन तक किसी को नजर नहीं आया। जब आया, तो गांधी की बैण्ड बजा दी।
साले, मजे तेरे और पड़ी मेर्को।
गांधी ने उसको समझाया कि कितनी चतुराई से उसको पब्लिक से पिटने से बचा लिया उसने। और येड़ा ये बात मान भी गया। दोनों में फिर पक्की दोस्ती। येड़ा को चैरिटी में जो मिला था, वह हर वक्त भूले रहता था, पर डिम्पा की मां बिरला गेट पर आयी नहीं कि येड़ा ढेपलू की फटने लगे। तभी से हम लोग उसे ÷येड़ा ढेपलू फट्टूभाई, डिम्पा की मां ने सॉलिड बजायी'ᄉ कहने लगे थे। हालांकि इसके बाद भी शर्त लगाने में कभी कोताही नहीं हुई। गुड्डू गांधी हर बार सहला आता, कभी पकड़ा नहीं जाता, और धीरे धीरे पूरे बिरला गेट में ये फेमस हो गया कि डिम्पा की मां फिराने देती है, बशर्ते प्यार से फिराओ। गांधी को, पता नहीं, क्या तरीका आता था, कि धीरे धीरे डिम्पा की मां के लिए शर्त लगना ही बंद हो गयी। वह आती, तो पहले ही हम बोल देतेᄉ जा रे गांधी। आ गयी तेरी।
तो जैसा कि आप जानते ही हैं, डिम्पा के तीन नाम हैं। पहला नाम तो आप जान ही गये, दूसरा नाम है अशोक और तीसरा नाम है डेविड। इस नाम को डिम्पा सरनेम की जगह इस्तेमाल करता है। स्कूल के शुरुआती दिनों में उसके नाम के साथ एक और नाम जुड़ा था ᄉ कुमार। यानी अशोक कुमार डेविड। पर चिढ़ के मारे उसे जल्द ही वह नाम हटाना पड़ गया। स्कूल के बच्चे उससे पूछते कि तेरे बाप का नाम कुमार है क्या? वह बोलता नहीं, तो सवाल आता, फिर नाम के साथ कुमार क्यों लगाया है? वह कुछ लोगों के लिए राष्ट्र से भी बड़े महाराष्ट्र की उससे भी बड़ी राजधानी के पास बसा हुआ छोटा सा कस्बा था, जहां मराठी बोलने वाले लोग रहते थे और उनमें नाम रखने का रिवाज ऐसा था ᄉ नामदेव सखाराम बांडेकर, अतुल रमेश करमरकर, विजय दीनानाथ चव्हाण। तो जो बीच का नाम होता था, वह बाप का मान लिया जाता था और लोग बाप का नाम साथ में बोलने पर या तो बहुत फख्र महसूस करते थे या गाली जैसा। सो, कुछ चिढ़ते भी थे। तो अशोक कुमार डेविड के नाम में से कुमार इसलिए हट गया कि बाकी छात्राों को वह पसंद नहीं आया। इसके बाद भी डिम्पा की टेंशन कम नहीं हुई थी। अब सब पूछते ᄉ ये डेविड किसका नाम है रे?
वह बोलता ᄉ मेरा सरनेम है।
पन ऐसा कैसा सरनेम? ये तो नाम होता है।
और उसके बाद डेविड नाम वाले कुछ लोगों का जिक्र होता है। डिम्पा ने एक दिन बहुत परेशान होकर अपने बाप राधेश्याम डेविड, जिसके कारण उसे डेविड जैसे एक नाम को सरनेम की जगह इस्तेमाल करने की गंदी आदत पड़ी थी, से जिद की कि वह अपने बेटे के लिए एक अच्छा सा सरनेम खोज कर लाये ᄉ जैसे पाटिल, चव्हाण, साठे, जोशी, पांडे या मिश्रा। पर उसके बाप ने उसे डांट दिया कि जो मिला है, उसी में सब्र कर। मेरे बाप ने मुझे कोई सरनेम नहीं दिया, मैं तेरे लिए कहां से लाऊं।
और मन मार कर डिम्पा को इसी सरनेम के साथ काम चलाना पड़ा। एक दिन राधेश्याम डेविड ने किसी अखबार में एक सरनेम पढ़ लिया- चाटे। उसके बाद जब भी डिम्पा सरनेम का जिक्र छेड़ता, राधेश्याम डेविट चाटे का हवाला देते और कहते, इससे तो अच्छा सरनेम है न तेरा। डिम्पा मान जाता। और उसके बाद उसने इसे एक मजबूत तर्क की तरह स्वीकार किया।
तो बातों बातों में आपको यह भी पता चल गया कि डिम्पा के बाप के दो नाम थे। राधेश्याम और डेविड। उनमें अपने सरनेम को लेकर कोई काम्प्लेक्स नहीं। उनका एक और नाम था साहिब, पर यह नाम उनकी बीवी के सिवाय कोई नहीं लेता। बीवी उसे नाम नहीं मानती, यह तो फीलिंग है। फीलिंग को कोई नाम दे सकते हैं क्या? यहीं, लगे हाथ यह बता दिया जाए कि डिम्पा की मां के चार नाम हैं। पहला तो आप जान ही गये, दूसरा नाम है हेमा। यह नाम उसके मायके वाले भी कभी नहीं लेते। किसी को याद ही नहीं। स्कूल में लिखा हुआ था। बाद में शादी के कार्ड पर छप गया। उसे शादी से पहले भूतपूर्व नाम छकुली से जाना जाता था। शादी हो गयी, तो राधेश्याम डेविड ने उसे डार्लिंग कहना शुरू किया और यह उनकी जबान पर इस तरह चिपका कि जब कभी झगड़े के दौरान उन्हें अपनी पत्नी को गाली देनी होती, तो कहते ᄉ साली हरामखोर डार्लिंग...। यह सुनने में फनी लग सकता है, पर जब राधेश्याम डेविड के मुंह से इस तरह शब्द निकलते, तो पूरी कॉलोनी में आफत आ जाती। और इसके बदले में डिम्पा की मां भी क्या न बोले, एक से एक आभूषण सिंगार के साथ भाषा को सजाया जाता है कि रीति काल का कोई कवि भी वहां से मूतते हुए भागे।
डिम्पा की मां के चौथे नाम के बारे में काफी कहा जा चुका है। वह पारिवारिक नाम है। पूरा परिवार उसे ढोता है, भले नयी पीढ़ी को वह पसंद नहीं। जिस जगह से डिम्पा का बाप आया था, वहां कोई सरनेम चलता भी नहीं। बीसियों साल पहले वे लोग झाबुआ में रहा करते थे। एक दिन कोई सिस्टर नन आयी। उसने इनका पूरा नाम नहीं बदला। पानी छिड़का और सिर्फ डेविड नाम जोड़ दिया। कहा ᄉ आज से भैरू बाबा की पूजा बंद। ये खीस्त है, तुम्हारा नया देवता। फिर उसके भजन गाये गये ᄉ खीस्त बाबा तेरी अजब है कहानी। राधेश्याम डेविड जब छोटे थे, तो उन्हें खीस्त बोलने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी, पर उन्होंने यह बात किसी से कही नहीं। पुरानी पीढ़ी के लोग विरासत पर सवाल वैसे ही नहीं करते थे। जो पुरखों ने दिया, सिर माथे लगा लिया। पर उनकी जुबान की बाबा ने सुन ली, जल्द ही खीस्त, यीशु हुआ, फिर ईसा, फिर जीसस। ये नाम सही था। जुबान को आराम मिला। संकट के समय ÷ओ खीस्त बाबा' बोलने में कई बार खांसी आ जाती थी। ÷ओ जीसस' चल जाएगा।
नाम के साथ डेविड जुड़ने के बाद राधेश्याम डेविड के पिता जी को जो पैसे मिले थे, उससे उन्होंने झाबुआ छोड़ दिया और शिरपूर आ गये। वहां उन्होंने पानी से बरफ बनाने का धंधा शुरू किया और साइकिल पर गली गली घूम कर बरफ बेचने लगे। जूनियर डेविड जब कांबा के पास इस कॉलोनी में आये, तब तक उनके पास बारहवीं और आईटीआई का सर्टिफिकेट था, उम्र में 27 दिन बड़ी एक बीवी थी और अगर सब कुछ ठीक रहा, तो उसके पेट में उन्हीं का बच्चा भी था। हां जी, राधेश्याम डेविड को अक्सर यह शक हो जाता है कि डिम्पा की मां के पेट में जो कुछ भी है, वह उनका नहीं है। कई बार वह डर जाते हैं, जब डिम्पा की मां कॉलोनी के किसी घर से कुछ खाकर आ जाती है। किसी दूसरे का पेट में जाए, उन्हें बर्दाश्त नहीं। वह किसलिए कमाते हैं? पेट में डालने के लिए ही न। सो, पेट उनके लिए बहुत अहम है। पेट में जाने के रास्ते भी।
मैंने बताया था कि डिम्पा की मां अपनी किस्मत पर हमेशा रोती रहती है। जिन्दगी ने उसे इतने संघर्ष नहीं दिये कि उसका रंग काला हो जाए, वह तो बचपन से ही ऐसी है। जितना काला उसका चेहरा है, उससे ज्यादा काले उसके बाल हैं। और बाल भी कमर से नीचे तक लपकते, पर एक बार डार्लिंग के साथ किसी झगड़े को अंजाम तक पहुंचाने के लिए मिस्टर डेविड ने कैंची से उन बालों को काट दिया था। उसके बाद डिम्पा की मां के बाल पीठ से नीचे गये ही नहीं। उसके चेहरे की कालिमा में उसकी आंखें इतनी सफेद लगती हैं, मानो चिल्ला चिल्ला कर कुछ बोलना चाहती हैं। संस्कृत के किसी विद्वान ने उसे देख लिया होता, तो उसका पांचवां नाम ÷चिल्लाक्षी' रख देता। उसके काले रंग के बारे में बहुत बातें होतीं। जिस मां को अपनी बेटी से दुश्मनी निकालनी होती, वह डिम्पा की मां को सर्वश्रेष्ठ उपमा की तरह प्रयोग करती।
पर अगर डिम्पा की मां के सामने उसके रंग का जिकर कर दें, तो उसके चेहरे पर बहुत तिरछी मुस्कान आ जाती। बहुत शर्माते हुए वह कहती, ÷÷मैं ऐसी नहीं थी रे। बहुत साफ रंग था मेरा। पर मेरा साहिब है न रे जो, बहुत बड़ा रंगरेज है। जब मुझे खूब प्यार करता है, तो मेरा रंग उजला हो जाता है। जब नाराज होता है, तो मेरा रंग काला हो जाता है। जब मुझसे बातें करता है, तो मैं नीली होती हूं। जब मुझे छूकर गुजरता है, तो लाल पड़ जाती हूं। इन दिनों वह मुझ पर बहुत नाराज है। क्या करूं, मेरे मिस्टर अब भी मुझ पर शक करते हैं बोलो, ये भी कोई बात हुई। लड़का सोलह का होने आया, अब भी शक करते हैं। पर प्यार भी बहुत करते हैं।''
यह कहते हुए इतना डूब जाती थी, इतनी देर तक बोलती रहती थी कि सामने वाला फिर कभी उसके सामने उसके रंग के बारे में कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाता था।
डिम्पा की मां को यह बताने में बहुत गौरव होता था कि उसका पति अब भी उस पर शक करता है।
डिम्पा की मां शाम को आठ बजे घर में घुसी थी। राधेश्याम डेविड सोफे पर बैठा था। रंगरेज का चेहरा आज जर्द था। रंग बदल देगा। डिम्पा की मां को तब डिम्पा पैदा हो चुका था। उससे पहले जम्बो भी पैदा हो चुका था। डिम्पा की मां को जम्बो की मां भी कहा जा सकता था, क्योंकि पहली संतान तो वही था, लेकिन पैदा होने के कुछ समय बाद ही जम्बो को डिम्पा की मां का भाई ले गया था। डिम्पा की मां का भाई, राधेश्याम डेविड का दोस्त था। शिरपूर में खासा रसूख रखता था। डेविड पहले उसके कारखाने में ही नौकरी करता था। वहीं पर डिम्पा की मां को उसने पहली बार देखा था। नहीं, कोई फर्स्ट साइट लव नहीं हुआ था। डिम्पा की मां भले कितनी भी काली थी, पर हमेशा से वह ऐसी नहीं थी कि उस पर हंसा जाए। आज हम लोग जब डिम्पा की मां को याद करते हैं, तो समझ में आता है कि उसने अपना स्टाइल सिग्नेचर डेवलप किया था। उस जमाने में फैशन मैग्जीन्स इतनी नहीं थीं, न ही इतने सारे फैशन डिजाइनर। फिल्मों में जो दिखा दिया जाता था, वही आम जनता का फैशन हो जाता था। आज तो अलग से फैशन सेगमेण्ट है। फैशन फिल्मों से आगे हो गया है। सैलेब्रिटीज पहले ही तय कर देती हैं कि आने वाला साल का स्टाइल सिग्नेचर क्या होगा। तो डिम्पा की मां ने उस पिछड़े समय में भी अपना स्टाइल सिग्नेचर बना रखा था, यह बात आज समझ में आती है, पर उन दिनों में भी वह सबसे अलग लगती थी। उसका रंग पहले से ही काला नहीं था, वह तो कालेपन में भी एक चमकते उजास से भरी रहती थी। वह तो उसका साहिब रंगरेज है, उसे जाने कैसे रंगों में रंगता रहता है।
शिरपूर की उस शाम को जब कारखाने के काउंटर पर डिम्पा की मां बैठी हुई थी, तो डेविड ने उसे देखा था। वह डिम्पा की मां के चेहरे को ध्यान से देखता, उससे पहले डिम्पा की मां खड़ी होकर थोड़ा झुकी थी और उसका कुर्ता छाती से खुल गया थोड़ा सा। डेविड की नजर डिम्पा की मां के दूधिया खरगोशों पर सबसे पहले पड़ी। डेविड दंग रह गया। इतना काला बदन और इतने दूधिया खरगोश। डिम्पा की मां वापस बैठ गयी। पल भर में किसी ने उसकी रहस्य की आवृत्त दुनिया में प्रवेश कर लिया है, उसे नहीं पता चला था। शादी के बाद पहली रात जब डेविड उसके खरगोशों को बेतहाशा प्यार कर रहा था, तब वे दूधिया नहीं थे।
डेविड ने पूछा, ÷÷तुम्हें यहां पाउडर लगाने का बड़ा शौक है न?''
डिम्पा की मां चौंक गयी थी, ÷÷तुम्हें कैसे पता?''
÷÷बस, देखा है मैंने।''
÷÷क्या देखा है तुमने?''
÷÷तुम्हारे उछलते हुए खरगोशों को सफेद रुई का लिहाफ ओढ़े देखा है।''
÷÷मतलब?''
÷÷हां, मैंने तुम्हारा चेहरा देखने से पहले तुम्हारे खरगोशों को ही देखा था। छोटे से गोल, दोनों के बीच की लकीर, जो किसी सरहद की तरह नहीं है।''
÷÷कैसे देख लिया तुमने?''
डिम्पा की मां याद करने लगी कि उसने कभी सपने में भी डेविड को नहीं देखा था। उसकी सिर्फ तस्वीर ही दिखाई थी उसके भाई ने और कहा था ᄉ बघ छकुली, ये तेरा नवरा है। तेरी शादी इससे बनने की। उसे बिल्कुल याद नहीं कि डेविड उस तस्वीर से बाहर निकल कर उसके कुर्ते के गले में कैसे बैठ गया कि उसे वहां से उसके खरगोश दिख गये।
÷÷झूठ बोलते हो जी तुम।''
÷÷विश्वास नहीं, तो बताओ, मुझे कैसे पता चला कि तुम्हें यहां पाउडर लगाना बहुत अच्छा लगता है।'' डिम्पा की मां चुप हो गयी। हां, कैसे पता चल सकता है?
÷÷जिस दिन मैंने पहली बार इन खरगोशों को देखा था, मेरे दिल में ये बात आ गयी थी कि एक दिन ये मेरे होंगे।''
÷÷बता दो, कब देखा था?''
÷÷पहली बार सिर्फ एक बार देखा था। उसके बाद बार बार देखा। आंख बंद होती, तो नजर आंख से निकल कर तेरे कुर्ते में चली जाती थी। वहां बैठ कर मैं देर तक तेरे खरगोशों को देखा करता था। प्यारे से नन्हें, फुदकते हुए खरगोश।''
÷÷हट्ट।'' डिम्पा की मां शर्मा गयी।
खरगोश एक सम था। साहिब ने उसे सफेद रंग में रंगा था। सफेद रुई का लिहाफ ओढ़े फुदकता खरगोश, जिसकी आंखों में कत्थई रंग का बिन्दु था। जिसके चेहरे के चारों ओर उभार था। जो उनके जीवन का सम था। डेविड जब नाराज होता, तो डिम्पा की मां बात को खरगोश तक ले आती। वह बरसों तक पूछती रही कि बता दो, कब दिखे थे तुम्हें खरगोश?
डेविड बरसों तक नहीं बताता।
÷÷हां देखा, सिर्फ इतना बता दूं कि तेरा चेहरा देखने से पहले देखा था खरगोश। और उनको देखते ही तय किया था कि एक दिन मेरे होंगे ये खरगोश।''
भयंकर गुस्सा और जानलेवा झगड़े को खरगोश ने अपना जिक्र आने पर कोमल प्यार और गांगेय रूलाहट में बदलते देखा है। खरगोश बहुत ताकतवर था। उसका जिक्र आता था, तो पत्थर सा हो गया दिल पिघल कर उसकी कंदरा में बहने लगता।
डेविड जब क्रोध में जलते हुए, पार्क की बेंच पर जाकर बैठता, तो पीछे से एक छोटा सा कंकड़ आता, जिस पर एक कागज लिपटा होता। उसमें बहुत खराब हैंडराइटिंग और गलत स्पेलिंग्स में लिखा होताᄉ आज नाही बघायचं खरगोश? आओ न, आज उन्होंने बर्फ जैसी रुई का लिहाफ पहना है। देखो न, ठंड के मारे गले जा रहे हैं तुम्हारे खरगोश।
डेविड इस कागज को फाड़ कर फेंक देता। यहां वहां देखता। कोई नजर न आता। वह जिद में बैठा रहता। फिर एक कागज आता, उसमें भी खरगोश के इंतजार के बारे में लिखा होता। डेविड उठता और डिम्पा की मां को बांहों से पकड़ कर बाहर ले आता। पार्क की सूनी बेंच पर दोनों एक दूसरे का हाथ हाथों में लिए बैठे रहते। डेविड की आंखों से आंसू गिरते रहते। डिम्पा की मां अपनी उंगली की पोर पर एक एक आंसू जमा करती और कहती, ÷÷हर बूंद आंसू, खरगोश की कत्थई आंख में रोप देना। मेरा खरगोश तुम्हारा हर गुस्सा, आंसू अपनी आंख में समेट लेना चाहता है।''
डेविड की आंखों से और आंसू बहने लगते। डिम्पा की मां का रंग बदल जाता। उसके साहिब ने आंसू से उसका पूरा शरीर रंग दिया। पहले उसके होंठों का रंग बदला। फिर उसके गालों का। फिर उसके खरगोशों का। उसका पोर पोर उजला हो गया। डिम्पा की मां ने बर्फ का लिहाफ ओढ़ लिया।
दोनों हाथों में हाथ डाले देर तक कॉलोनी की सड़क पर भटकते रहते। बीच बीच में रोते। फिर कस के एक दूसरे को पकड़ लेते। डिम्पा की मां डेविड की हथेली चूमती और कहती, ÷÷मालूम क्या साहिब? आत्मा हथेली के सिरे में रहती है। हथेली चूमने का मतलब आत्मा चूमना होता है। देख साहिब, मेरे होंठ तेरी आत्मा को चूमते हैं। मुझे अपनी रूह के रंग में रंग दे।''
लल्ले, राधेश्याम डेविड पर सेंटी होने का दौरा पड़ जाता। भगीरथ के बुलाने पर गंगा पहले डेविड की आंखों में गिरी थी। शिव की जटा में तो बाद में गयी थी। बोले तो, शिव ने चीटिंग की। डेविड की आंखें इस वक्त यही कह रही हैं। वह भरे हुए गले से कहता है ᄉ माझी रानपाखरूं...(मेरी बनतितली)
और अरुण दाते की आवाज में गाता है ...
आज हृदय मम विशाल झाले
त्यास पाहुनि गगन लाजले
(आज मेरा हृदय बहुत विशाल हो गया है, जिसे देख आसमान भी लजा रहा है।)
डिम्पा की मां मुस्कराने की कोशिश करती आंखों से देखती, एक लैम्पपोस्ट के नीचे खड़े हो जाती है। लैम्पपोस्ट से बहुत हल्की पीली रोशनी नीचे गिर रही है। डिम्पा की मां जब अपने बरामदे में खड़ी हो यहां देखती है, तो उसे कोई यहां सिर झुकाये बैठा दिखता है, जिसके चारों ओर रोशनी के बीच एक काला अंधेरा घेरा दिखाई देता है। डिम्पा की मां उस लैम्पपोस्ट से टिक कर खड़ी हो जाती है और सुर जोड़ती है :
आज माइया किरणकरांनी
ओंजलीमध्ये धरली अवनी
अरुणाचे मी गंध लावले...
(मुझ पर रोशनी करने वाली किरणों ने अपनी अंजरियों में भर लिया है धरती को। मैंने अपनी पूरी देह पर सूरज की सुगंध लगा ली है।)
आज रंगरेज का रंग बदला हुआ है। डेविड ने पहली बार कहा, ÷÷साली डार्लिंग, तू ज्यादा समय तक घर से बाहर मत रहा कर।''
÷÷क्या हो गया?''
÷÷कुछ नहीं, बस मैंने कह दिया है ना। ज्यादा समय तक घर के बाहर मत रहा कर।''
बर्फ से ढंके हुए उन दिनों में ऐसा बहुत कम हुआ था कि डिम्पा की मां घर में आयी हो और डेविड उसका इंतजार करते बैठा हो। डिम्पा कॉलोनी में खेलता रहता था और डेविड पालियों में नौकरी करता था। कभी रात पाली, कभी दिन पाली। कलपुर्जों की फिटिंग करता था। घर आता, तो सोने की लगी रहती। आज वह डिम्पा की मां के घर में घुसने के वक्त सोफे पर इस तरह बैठा था, जैसे इंतजार ही कर रहा तो।
दोनों के बीच बहुत अजीब किस्म का सम्बंध था। दोनों बहुत लड़ते थे और शायद उतना ही प्यार करते थे। उनका प्यार मिसाल था और झगड़े भी। हर झगड़े के पीछे प्यार ही होता है, ऐसा डिम्पा की मां हर झगड़े के बाद कॉलोनी के हर घर में जाकर कह आती थी, क्योंकि उनके घर के भीतर हुआ झगड़ा थोड़ी ही देर में कॉलोनी के पत्ते पत्ते, बूटे बूटे तक पहुंच जाता था। अगर किसी को रात बारह बजे सड़क पर दो आत्माएं एक दूसरे की बांहों में बांहें डाले, बाबा आदम और बब्बी ईव के अपराधों के पथ पर चलती दिखतीं, तो भूतों की तमाम खबरों के बाद भी यह मान लिया जाता था कि डेविड दम्पति आज नाइटवॉक पर निकला है। कॉलोनी के थिएटर में दिखाई जाने वाली साप्ताहिक फिल्मों के सबसे करुण दृश्यों पर अगर किसी को रोने की आवाज सुनाई दे जाए, तो समझ लिया जाता था कि मिस्टर एंड मिसेज डेविड आज बहुत इमोशनल हैं और घर जाते जाते रास्ते में घंटों प्यार करेंगे। सालाना जलसा तब तक खत्म घोषित नहीं होता था, जब तक डिम्पा की मां और राधेश्याम डेविड साथ साथ ठुमके न लगा लें। और महीने पखवाड़े की किसी एक रात में जब सारी कॉलोनी में किसी महिला की दारुण चीखें गूंजती थीं, रात भर लोगों के दरवाजों पर कोई सिसकी आहट करती थी, तो बाकसम, वह भूत नहीं होता था, डिम्पा की मां रो रही होती थी। वह जितना धीमे हंसती थी, उतना ही चिल्ला कर रोती थी।
डिम्पा की मां का पिटना एक सार्वजनिक कर्म था। यह ऐसा दृश्य था, जिसे देखने के बाद लोग देर तक दरवाजा नहीं खोलते थे। दरवाजा खोलें, तो क्या पता, डिम्पा की मां बाहर ही खड़ी हो, कब दौड़ कर आपके घर के भीतर आ जाए और राधेश्याम डेविड डिम्पा की मां से ध्यान हटा कर आप पर लगा दे, डिम्पा की मां को गालियां देना छोड़ आपको देने लग जाए और कह दे कि आपके साथ ही सोती है यह। इसे पिटते देख आप इसे बचाने के लिए अपना दरवाजा खोल कर खड़े हो गये हैं। आप आयं बायं करते रह जाएं, लड़ा जाए, या पहले इसे शांत कराया जाए, इसका सिर फोड़ दिया जाए या सिर पर ठंडा पानी डाला जाए, आपको समझ में नहीं आता। आप और कुछ बोलें, तब तक डेविड आपसे धक्का मुक्की कर चुका होगा। आपके घर के भीतर घुस कर, डिम्पा की मां को पकड़ कर बाहर ला चुका होगा ओर उसे गालियां देते हुए ले जाएगाᄉ ÷÷साली, अक्खी कॉलोनी में तमाशा कर दिया है। इधर भाग रही है, उधर भाग रही है, चल घर में।''
हम सबको लगता कि अब घर ले जाकर डेविड उसे और मारेगा। वह तो चला जाता पर आपके घर में नया बखेड़ा शुरू हो जाता। आपकी बीवी एकाध बार तो जरूर पूछ लेती ᄉ ÷÷कब सोये थे डिम्पा की मां के साथ?'' आप भौंचक उसका मुंह देखते रह जाएं और वह बात को मजाक में उड़ा दे। एक घर का झगड़ा दूसरे घर में ट्रांसफर हो जाए।
पहली बार ऐसा तब हुआ था।
कोई तपती हुई दोपहर थी, जब बाहर खेलते कई बच्चों ने डिम्पा की मां को पेटीकोट और ब्लाउज में ही बाहर दौड़ते देखा था। उसके पीछे बेल्ट लेकर डेविड दौड़ रहा था ᄉ नाड़े वाला धारीदार कच्छा पहने हुए। वे दोनों शायद अपराह्न ᄉ अंतरंगता में थे और उसी समय किसी बात को लेकर तनातनी हुई थी। दोनों में जब भी तनातनी होती, तो शुरुआत में कोई संभालना नहीं चाहता था। बात बढ़ती रहती, बढ़ती रहती और बढ़ ही जाती। फिर बहुत बड़ा हंगामा होता, चीखें गूंजतीं, पकड़ा पकड़ी होती, और उसके बाद दोनों में से एक को कुछ ख्याल आता और वह दूसरे को पकड़ कर घर में लेजाता।
इस वक्त डिम्पा की मां पेटीकोट और ब्लाउज में कॉलोनी की काली, डाबर से बनी हुई साफ सुथरी सड़क पर दौड़ रही है और डिम्पा का बाप पीछे है। इस वक्त कॉलोनी की औरतों ने पहली बार जाना था कि डिम्पा की मां पेटीकोट भी सैटिन का पहनती थी। जैसा फिल्मों में हीरोइनें। ज्यादातर औरतें कॉटन का रद्दड़, सस्ता पेटीकोट पहनती हैं और उनके लिए डिम्पा की दौड़ती हुई मां का धूप में चमकता सफेद सैटिन का पेटीकोट गहरे आश्चर्य में डालने वाला था। दूसरे दिन जब कुछ औरतें डिम्पा की मां के घर उसका हालचाल जानने गयी थीं, तो उनकी दिलचस्पी उसकी पिटाई से ज्यादा यह जानने में थी कि इसके पास और कौन कौन से पेटीकोट हैं। वहीं लोगों को पहली बार पता चला था कि डिम्पा की मां कितनी अच्छी कारीगर है। एंब्रॉएडरी, क्रोशिया, बुनावट, सिलाई सब में एक्सपर्ट।
जब डिम्पा की मां दौड़ रही थी उसका सैटिन का पेटीकोट लहरा रहा था, तो औरतों ने उसमें लटकती हुई झालरें देखी थीं। सिल्क की झालरें गहरे सफेद रंग की थीं। चमकती हुई झालरें। उसके ब्लाउज में सिल्क की लेस लगी हुई थी, वह भी डिम्पा की मां ने खुद ही लगायी थी।
तो डिम्पा की मां सैटिन का सफेद पेटीकोट और सफेद ब्लाउज पहने कॉलोनी की पतली सड़कों पर दौड़ रही थी और उसका पति बेल्ट ताने उसके पीछे। डिम्पा की मां के होंठों के नीचे से खून टपक रहा था। उसके कमर तक के बाल खुले हुए थे। उस वक्त तक वह बहुत ज्यादा मोटी नहीं हुई थी। भव्य लग रही थी। पिटने से बचने के लिए दौड़ती एक भव्य स्त्राी। संवार संवार कर बनाये हुये रूप को सबको दिखाते हुए दौड़ती एक भव्य स्त्राी। डर के लिहाफ में लिपट कर अनावृत्त दौड़ती एक भव्य स्त्राी। बेल्ट लहराते दौड़ते आते पति को बार बार पीछे मुड़ कर देखती हुई एक भव्य स्त्राी। थोड़ी देर पहले तक प्यार के महासागर में गोते लगाने के बाद खौफ के रंग में पगी हुई एक भव्य स्त्राी।
यहीं कहीं सैटिन के सफेद पेटीकोट के कारण डिम्पा की मां का पैर अटका और सड़क पर ढुलक गयी। बहुत तेजी के साथ उसके पेटीकोट के अंदर का शरीर दिखा और फिर छिप गया। उसका सिर किसी पत्थर से लगा और हाथ उसके पेट के नीचे आकर दब गया। दर्द से वह बुरी तरह चीख उठी। डेविड अब तक उसके पास पहुंच गया और सनाक से एक बेल्ट दे मारी। डिम्पा की मां बिलबिला उठी और उठने की कोशिश में फिर गिर पड़ी।
उसने पलट कर पति को देखा। वह गुस्से में कांप रहा था। गालियां बक रहा था। डिम्पा की मां के काले चेहरे पर उसके काले बाल बिखरे हुए थे। उसका चेहरा दिख ही नहीं रहा था। बाल हटाते हुए वह चीखी, ÷÷और मार साले भड़वे। इसी में शांति है तुझको, मार डाल। आज मार डाल मुझे। तू साला भड़वा कभी यकीन कर नहीं सकता मुझ पर। इससे तो अच्छा है, मर जाऊं। मार डाल मुझे और जाकर फोड़ दे अपना घंटा। हरामी की औलाद...मार...मार मुझको...मार...''
डिम्पा की मां के होंठों से खून बह रहा था। आंखों में छाया हुआ था। माथे से बह रहा था। उसकी कोहनी छिल गयी थी। उल्टी हथेली, जहां आत्मा का वास होता है, वहां खून छलका हुआ था। डिम्पा की काली मां, डिम्पा की लाल मां में बदल गयी थी। रंगरेज ने फिर उसका रंग बदल दिया था। उसका साहिब रंगरेज है। उसके रंगों से खेलता है। उसके बदन की चुनरी में अपनी मर्जी का रंग भर देता है। उसकी मर्जी कभी पूछता तक नहीं। कैसा जोगी है। मन नहीं रंगता। कपड़ा रंगता है।
÷÷नहीं घर आकर नहीं मारा उसने मुझे। वह मुझे देर तक अपनी बांहों में ले रोता रहा। फिर बोला, तुझसे कितनी बार कहा है न, ज्यादा देर तक घर से बाहर मत रहा कर। क्या करूं, मैं सुबह 8.40 की लोकल से निकल जाती हूं, फिर शाम को आने में टाइम लग जाता है। स्टेशन से कॉलोनी तक आना भी तो टेंशन का काम है। रस्ते में बिरला गेट से भाजी भी लेती हूं। बस मिल जाए, तो ठीक, नहीं तो ऑटो करना पड़ता है कई बार। पन इनको मेरे पे हमेशा डाउट रहता है। इनको लगता है कि मैं हॉस्पिटल नहीं जाती, कहीं और जाती हूं। क्या बोलूं, शायद एक दो बार ये मेरे पीछे पीछे हॉस्पिटल भी आये हैं। अब कितना समझाऊं, ये बात तो समझने की ही होती है। हर वक्त बोलता है कि मुझ पर विश्वास करता है। जब शांत रहता है, तो बहुत अच्छा रहता है, पर जाने क्या हो जाता है बीच बीच में।''
डिम्पा की मां घर आयी औरतों से कह रही थी या खुद से, नहीं पता। कल का वाकया ऐसा था कि डिम्पा की मां का मन ही नहीं हो रहा था कि किसी का चेहरा देखे। वह ऊपर से मुस्कुरा रही थी, पर भीतर ही भीतर उसके दिल में हल्ला हो रहा था। कल दोपहर को डेविड उसे ले आये और उसके बाद देर तक उससे प्यार करते रहे। प्यार करते रहे मतलब उसके घावों को सहलाया। उसे देर तक देखते रहे। डिम्पा की मां चुप थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इस वक्त कैसे रिएक्ट किया जाए। कुछ पलों पहले जो आदमी जंगलियों की तरह व्यवहार कर रहा था, सड़क पर उसे दौड़ा कर मार रहा था, जिसे हमेशा ये शक रहता था कि कहीं मैं किसी के साथ सोती तो नहीं, कभी सड़क या बस में मेरा दुपट्टा जरा ढुलक जाए, तो जो आदमी जान ले ले कि तेरा कैरेक्टर ही ऐसा है, वह आदमी आज सरेराह मुझे पेटीकोट में दौड़ा रहा है, जो अपनी इज्जत के बारे में हमेशा मुझे चार बातें सुनाता रहता है और जिसे जरा सी फिक्र नहीं कि आज उसकी इज्जत का क्या हुआ है, उस आदमी की प्यार और सम्भाल को कहां सहेजूं? क्यों स्वीकार करूं? क्यों नहीं पलट कर उसे दो हाथ मार दूं और कहूं कि भाग यहां से भड़वे...
डेविड उसके घावों पर कॉटन से डेटॉल लगा रहा है। जलन के मारे रूह हंगामा कर रही है। उसके भीतर जैसे कोई जुलूस निकल रहा है। हजारों लोग सड़क के किनारे खड़े हैं और नारे लगा रहे हैं। लेकिन जैसे किसी ने रिमोट पर म्यूट का बटन दबा दिया है। देखने पर पता चल रहा है कि बहुत हंगामा हो रहा है, लोग उछल रहे हैं, शब्द अपने रूप का सबसे भयंकर नृत्य कर रहे हैं, हवा में हाथ भांजे जा रहे हैं, मुट्ठियां तनी हुई हैं, लेकिन कोई आवाज नहीं हो रही। या तो उस आवाज को जिन कानों के रास्ते भीतर की दुनिया में जाना था, जिस जुबान के रास्ते बाहर की दुनिया में आना था, वे कान अंधी खाईं की मानिन्द हो गये हैं, वह जुबान काठ हो गयी है। वह उसके बालों में हाथ डाल रहे हैं। बालों को सहला रहे हैं। डिम्पा की मां को याद आता है कि वह एक वक्त इन बालों को पेड़ की छांव की तरह महसूस करना चाहता है और दूसरे वक्त इन्हें जला देना चाहता है। वह उसकी आंखों की कोर को पोंछ रहा है, वह देर तक उनमें झांक रहा है। उसे याद आता है कि वह एक पल इन आंखों को समंदर में चहकती हुई सीपी कहता है और अगले पल इन्हें फोड़ डालना चाहता है। डिम्पा की मां की आंखें झुक रही हैं। वह बार बार उसका सिर उठा रहा है। वह बार बार सिर झुका कर आंखें हटा रही है। कैसी विडम्बना है, उसने सड़क पर मुझे मारा है, फिर भी कितनी जोर आजमाइश कर रहा है नजरें मिलाने की, मैंने सिर्फ उसे कुछ गालियां दी हैं, वो भी बुरी तरह आजिज आने के बाद, पर मैं नजरें भी नहीं उठा पा रही। इसलिए भी नहीं उठा पा रही कि क्या अब इससे कभी प्यार के दो बोल भी बोले जा सकेंगे?
पार्वती बाई सावंत ने एक बार बहुत सही कहा था कि कभी मर्द को अपने दिल के बारे में पूरी तरह मत बताना। वह तेरे दिल में हमेशा छेद करता रहेगा कि वहां से कोई बात निकल कर उस तक आ जाए। मत बताना कभी भी। उसे सिर्फ उतना ही बताना, जितने में वह खुश हो जाए, जितने में उसे अहसास हो कि हां, वही है सब कुछ। उसके आगे जहां बढ़ी, जहां उसे यह बताया कि उसके आगे भी कुछ है, वहां वह हाथ से निकला। वह तेरा जीना हराम कर सकता है। वह अगर बहुत प्यार करे, तो भी डरना। वह अगर बहुत नफरत करे, तो भी डरना। मर्द काबू करने की चीज होता है। और उसके लिए कभी मशक्कत वाला रास्ता मत अपनाना। कोशिश करना कि सिर्फ एक निगाह हजार हर्फ बोल दे।
डिम्पा की मां ने हजार हर्फों वाली वह निगाह उठायी, जो बाहर सड़क पर दौड़ते वक्त जाने कहां बिला गयी थी। जब वह दौड़ रही थी, तो क्यों नहीं पलट कर एक बार उसी हजार हर्फों वाली निगाह से देख लेती? डिम्पा की मां ने उसे देखा। उसकी आंखें भरी हुई थीं। उसे बहुत दुख हो रहा था। उसका साहिब...वहशी रंगरेज...।
÷÷डार्लिंग, पता नहीं, क्या हो जाता है मुझे...माफ कर देना यार...फिर हाथ उठाया तुझ पर...नहीं मारना चाहिए था तुझे...जो भी बात थी, बात करके हो सकती थी...पर क्या करूं, मैं गुस्से में रहता हूं, तो तू सम्भाल लिया कर...तू भी ऐसे जवाब देती है कि और आग लगती है...''
÷÷साहिब...हजार बार मार...हर रोज मार...तेरा गुस्सा...तेरी मार...सब सिर माथे है। बहुत प्यार करता है न मुझसे...इसीलिए तो इतना हाथ भी उठाता है...तुझे दे दिया है मैंने अपना ये शरीर...सजा कर दिल में रख...या खाल उतार कर दीवार पर टांग...सब तेरा है...तेरे रंग में है...सिर्फ तेरे रंग में...पर ये न बोला कर कि मैं कहीं और जाती हूं...किसी और के साथ...जो कुछ है, सिर्फ तू है...और अब इन सबके लिए कोई समय नहीं रे साहिब...मत बोला कर ऐसा...''
और वे फिर इमोशनल हो गये। नाइटवॉक पर निकल गये। दिन में जिस सड़क पर डिम्पा की मां देर तक दौड़ायी गयी थी, उसी सड़क पर वह राधेश्याम डेविड की बांहों में बांहें डाल कर घूम रही थी। उसने पसंदीदा सफेद रंग की साड़ी पहनी थी, जिस पर गुलाबी रंग की एम्ब्रॉएडरी उसने खुद की थी। उसने गले में वह हार पहना था, जो उसके पिता ने उसे शादी के कुछ ही महीनों बाद लाकर दिया था। वह सड़क पर चल रही थी और सोच रही थी कि जिन लोगों ने उसे दिन में देखा है, कम से कम वही लोग उसे रात में भी देख लें। देखें कि उसके साहिब ने फिर उसका रंग बदल दिया है। देखें कि उसका साहिब कितने प्यार से उसकी चूनर में पे्रम का रंग बांधे है। कैसे रात की हवा में उसकी चूनर लहरावे है... कैसे खोया खोया है उसके रंग में, गंध में, देखो कि रात की इस हल्की रोशनी में मेरे दुखते हुए शरीर से भी सूरज की सुगंध आ रही है... मेरे साहिब ने सूरज की हल्दी बना कर मेरे जख्मों पर लगाया है... इस हल्दी से कैसे मेरा सियाही जैसा रंग झक उज्जर उज्जर होवे है...स्याही रंग छुड़ाए के रे दियो मजीठा रंग... बांधणी चूनर मेरी...
देर रात तक डेविड दम्पत्ति सड़क के किनारे भटकते रहे। फिर उन्होंने सुधीर फड़के के गाने गुनगुनाये। फिर उन्होंने एक दूसरे की हथेली में बसी आत्मा को चूमा। फिर उन्होंने आंसुओं से दिन की कलुषता का आचमन किया। आत्मा का प्रच्छालन।
डिम्पा की मां जितनी काली थी, डेविड उतना ही तगड़ा और खूबसूरत था। कमाल का रेसलर था। बदन में ताकत का झरना था। छह बाई छह की सेटी को टांग से धक्का मार कर खसका देता था। डिम्पा की मां जब खासी मोटी हो गयी थी और उसके नितम्ब पूरी कॉलोनी में चर्चा का केन्द्र हो गये थे, तब भी डेविड डिम्पा की मां को अपनी गोद में उठा कर दिन भर घूम सकता था। और उसके बाद भी थकान नहीं। इस तरह की बातें डिम्पा की मां ही कॉलोनी वालों को बताया करती थी।
शिरपूर में डेविड ने जब डिम्पा की मां को पहली बार देखा था, उससे पहले तक उसके जीवन में कुछ खास नहीं हुआ था। जो हुआ भी था, उसे वह डिम्पा की मां के खरगोशों को देखने के बाद भूल गया था। उसने उसके भाई से दिल की बात कही ᄉ बहुत डरते डरते। हालांकि इस बारे में कई दिन तक सोचता रहा कि पहले बात किससे की जाए, डार्लिंग से या फिर उसके भाई जॉन विश्वनाथ बटनवाला से। उसके भाई का बिजली के बटन बनाने का कारखाना था। डेविड वहीं काम करता था। बारहवीं पढ़ने के बाद प्रोफेशनल कोर्स करने का बड़ा फैशन था। इसी के चलते डेविड ने आईटीआई कर लिया और फिटर के रूप में वहां ज्वाइन कर लिया। छोटा सा कारखाना था। छोटे से कस्बे में। डेविड ने अपनी मां के रास्ते जॉन तक जाना चाहा। मां और ज्यादा रिस्की थी। दस सवाल पूछने लगी। क्या जानता है तू लड़की के बारे में? पता नहीं, किदर किदर मुंह मारा होगा। कभी उसको ढंग के कपड़ों में देखा है? क्या क्या नहीं लगाती वह थोपड़े पर? मेली कलूटन। तेरे लिए गोरी लड़की ढूंढ कर लाऊंगी मैं।
डेविड की मां के सपने अलग किस्म के थे। डेविड सुंदर था। गांव में गुजर जाए, तो हर लड़की के दिल में उछल कूद मच जाए, पर डेविड को खरगोश बुला रहे थे। उसने बटनवाला से बात कर ली। और जाने क्या राज था, बटनवाला पहली ही बार में मान भी गया। डेविड ने कहा कि एक बार वह छकुली से मिलना चाहता है।
बटनवाला ने मना कर दिया, ÷÷मिलने की क्या बात है? तेरा फोटू दिखा देता हूं उसको। मेरी साइड से फाइनल है। तू डेट वगैरा निकलवा ले।''
शाम को डेविड ने कारखाने में सबको बता दिया कि वह बटनवाला की बहन से शादी करने वाला है। सब चौंक गये। किसी ने कुछ नहीं कहा था, डेविड को याद है, बस, सबकी आंखें फटी की फटी रह गयी थीं।
÷÷तू बटनवाला की बहन के साथ... नहीं रे... ऐसा नहीं हो सकता...''
÷÷कायकू नहीं हो सकता?''
÷÷अरे... तेरे सामने क्या है रे वो... तेर्को तो साले मस्त पिक्चर में जाने का मंगता..''
÷÷मेर्को नहीं करनी पिक्चर विक्चर। मेरी नक्की है उसके साथ... बटनवाला से बात हो गैली है।''
फिर किसी ने कुछ नहीं कहा। डेविड ने बटनवाला की बहन से शादी की और उसके तीसरे ही दिन बटनवाला ने उससे कहा कि कल्याण के पास कांबा में नयी कम्पनी खुली है। उसने उसकी बात वहां कर दी है। बिजली बनाती है कम्पनी। वहां चले जा। फिर भी डेविड को शिरपूर से निकलते निकलते तीन महीने लग गये। उसमें से ज्यादातर दिन अपनी मां के साथ लड़ने में बीते। फिर मां शिरपूर में ही अपने भाई के पास रहने चली गयी।
डेविड बहुत गुस्सैल, हर बात में आस्तीन ऊपर कर लेने वाला और शौकीन किस्म का था। उसे नाटकीयता बहुत पसंद थी। सादा सा गुलाब भी वह इतने ड्रामे के साथ देता था कि आप उसके ड्रामे पर मर मिटें। रजनीकांत की तरह उसे सिगरेट उछाल कर पीने में बहुत मजा आता था। बस जब तक सड़क पर खड़ी है, डेविड उसमें नहीं बैठेगा। बस चल पड़ी है, तो डेविड अपनी जगह से हिलेगा। बस रफ्तार पकड़ चुकी है, तो डेविड अपनी जगह से उठेगा। बस अब बहुत दूर हो गयी है, तो डेविड बला की तेजी के साथ दौड़ेगा और हत्था पकड़ कर बस में कूद जाएगा। वह जितनी बार दौड़ती हुई बस में चढ़ता, उतनी बार ड्राइवर को मन ही मन गाली देता साला, अपुन से पल्ली?
कमोबेश यही बात उसके काम में भी थी। शिफ्ट मैनेजर ने 11 बजे काम सौंपा है। सात बजे तक पूरा करके देना है। डेविड को काम की कोई टेंशन नहीं रहती। पांच बजे तक घूमता रहेगा। फिर एक घंटे में धड़ाधड़ सब कुछ निपटा देगा। सात बजे से पहले काम पूरा है। डेविड अपनी अदाओं पर ख्+ाुद ही मरता था। बाकी लोग उसकी आदतों का मजाक उड़ाते थे।
कॉलोनी जाने के चार महीने बाद जब वह शिरपूर लौटा, तो उसकी मां ने डिम्पा की मां का हाल पूछते हुए कहा था, मैं बोली थी न, बहुत फेमस है वो। बहुत कुछ सुना उसके बारे में मैंने। यही वास्ते तो बटनवाला एक बार में ही मान गया था। शिरपूर की इस यात्राा में डेविड का इतना ज्ञान बढ़ा था कि वह उस ज्ञान को संभाल नहीं पाया और आकर डिम्पा की मां पर उल्टी कर दी। डिम्पा की मां उसे बार बार समझाती रही कि उसके बारे में कहा बहुत जाता था, पर वह ऐसी है नहीं।
एक रात डेविड ने बहुत इमोशनल होकर डिम्पा की मां से पूछा, ÷÷सच बताना डार्लिंग, कोई था न, शिरपूर में सब बोलते हैं। कोई था, तभी तो बोलते हैं। वरना क्यों कोई बोले? मेरे बारे में तो कोई नहीं बोलता?''
÷÷साहिब... तुम मर्द हो। कुछ भी करोगे, कौन बोलेगा... पर लड़की के बारे में सब बोलते हैं। वह जैसी जगह थी, वहां जरा सा लिपस्टिक लगा लो, तो चार बात फैल जाती है। जरा सा स्लीवलेस पहन लो, तो मान लेते हैं कि आपने कुछ भी नहीं पहना है। साहिब, पढ़े लिखे हो। इतना तो समझो।''
डेविड ने फिर कहा, ÷÷बता दो। कोई तो था। प्लीज। बता दो।''
÷÷कोई नहीं था। हां, मेरी क्लास में एक लड़का था, जिसे बहुत पसंद करती थी मैं। उसके साथ रहना चाहती थी। एक बार उसका हाथ भी पकड़ा था। हम सब लोग पिक्चर देखने गये थे, तब। पर फिर कुछ भी नहीं हुआ था। वह अपने घर। मैं अपने घर। उसके बाद वह लड़का खुद ही दूर रहने लगा। शायद उसका कोई अफेयर था। बाकी किसी को देख लो, तो वह पसंद आ ही जाता है। ऐसा तो होता है। किसी को देखो, तो देखने को दिल करता है। पर ऐसे कई लोगों से तो बात भी नहीं हो पायी। शादी पार्टी में जाते थे हम लोग। तो ऐसा कुछ भी नहीं था रे। भरोसा कर।''
÷÷है रे भरोसा। पर जो सुना, वही तो पूछा है। ये मत सोचना कि तेरा साहिब तेर्पे डाउट करताहै।''
÷÷नहीं, मैं नहीं सोचती ऐसा रे। पर अच्छा नहीं लगता, जब तू ऐसे सवाल करता है।''
पर डेविड का ज्ञान धीरे धीरे बढ़ता गया। कोई बेताल था, जो पीठ पर लदा था। बेताल आपका अतीत होता है। जब तक पेड़ पर टंगा रहे, आप खुश रहते हैं। जैसे ही पीठ पर आता है, दस सवाल पूछने लगता है। आप उसके सवालों के जवाब खोजने दौड़ते हैं, दौड़ते रहते हैें। वह आपको पस्त कर देता है। राजा विक्रम पागल हो गया था उसके पीछे दौड़ते दौड़ते। डेविड राजा विक्रम की संतति था। उसकी किसी पुश्त के लहू से निकला। अपनी पीठ पर बहुत भरोसा था उसको। ताकतवर थी। बेताल पेड़ पर टंगा था। गया, उसकी पूंछ खींच ली। बेताल पेड़ छोड़ उसकी पीठ पर आ लदा।
डेविड एक खेत था। लिहाफ ओढ़ा खेत। लिहाफ तले उसने कुछ बीज बिखेर रखे थे। लिहाफ के कारण अंदर गर्मास रहती थी। लिहाफ के बाहर पानी बरसता था, तो रिस रिस कर भीतर जाता था। जैसे स्पंज के भीतर पानी जमा होता है। जैसे ककड़ी के भीतर पानी रहता ही है। ककड़ी खाओ, तो मुंह पानी से भर जाता है। लिहाफ को दबाओ, तो पानी उलचने लगता है। जब पानी के साथ गर्मास मिलती है, तो बीज का मुंह खुल जाता है। डेविड शराब पीता था, तो उसके भीतर के बीज बोलने लग जाते थे।
डिम्पा के पैदा होने के कुछ साल बाद उसकी मां ने नौकरी शुरू कर दी थी। शिरपूर के समय से ही वह टे्रण्ड नर्स थी। शिरपूर के एक अस्पताल में नौकरी करती थी, पर शादी के कारण उसे छोड़ना पड़ा था। शादी के बाद उसका बड़ा मन था कि कोई नौकरी करे। कुछ नहीं, तो पास के मांटेसरी में जाकर बच्चों को ही पढ़ा आये। डेविड को लगता था कि नौकरी के बारे में केवल तभी सोचना चाहिए, जब आपको पैसों की जरूरत हो। फिर भी कभी वह नौकरी के खिलाफ नहीं था।
डिम्पा की मां ने थोड़े हाथ पैर चलाये, तो उसे दादर के एक बड़े अस्पताल में नर्स की नौकरी मिल गयी। उसे सिर्फ एक दो बार ही जाना पड़ा था। बटनवाला ने सिर्फ एक बार बोलने पर ही डेविड के साथ उसका रिश्ता मंजूर कर लिया था। जम्बो सिर्फ आठ महीने ही डिम्पा की मां के पेट में रहा था। डॉक्टर ने बहुत दुखी होकर बताया था कि बहुत कमजोर पैदा हुआ है, समय पूरा नहीं कर पाया। कॉलोनी में उसे डिम्पा की मां के पति के रूप में जाना जाता था। डिम्पा की मां किसी भी घर में बेरोक टोक जा सकती थी। नाइटगाउन पहन कर भी। बाहर वाला कोई टोके, तो बात मजहब की हो जाती कि हमारे में तो ऐसा अलाऊड है। डेविड टोके, तो क्या साहिब, इतने भी पिछड़े मत बनो। कपड़ा तो है, पूरा बदन ढंकता है। देखो, कुछ दिख रहा है क्या? चाहे शादी हो या पार्टी, डेविड और डिम्पा की मां साथ खड़े हों और कॉलोनी के लोग आ जाएं जो वे डेविड से नमस्ते करते और फिर डिम्पा की मां से मुखातिब हो जाते। कोई घर आता, तो हॉल में बैठ कर डेविड से सबसे पहले यही पूछता, काय भाऊ? वहिणी कुठे? और जब वहिणी आकर हॉल में बैठ जाती, तो भाऊ की कोई बखत ही नहीं। जो आता, वो डिम्पा की मां से ऐसे बात करता, जैसे एक दो जन्मों की पहचान हो। कॉलोनी के गेट से बाहर निकलो, तो ऑटो वाले तैयार, डिम्पा की मां को बिठाने के लिए। आओ आओ भाभी। अच्छा, तो आज भाई साहब भी साथ में ही जायेंगे। भाभी भी बोले, हां न? क्यों, नहीं जा सकते क्या? बिरला गेट पहुंचो, तो भाजी वाले पहले ही बोलने लग जाएं ᄉ भाभी, आज करेला मस्त...अ...आएला है। ले के जाओ। केले वाला दूर से ही आवाज लगाने लगे। साला, कई बार तो देखा है कि नईम केलेवाला पैसे ही लेने से मना कर देवे। आनंद कट पीस सेण्टर में घुसो, तो काउंटर वाला तीन बार मुस्कराये देख कर। बोले सिन्धी मेंᄉ अचो सैहब, अचो। वंज, स्टूल खणी अच। बैठो भाभी। और भाभी भी पूछ लेवेᄉ क्या जी, कैसी है थाईज अभी? अभी जास्ती तो नहीं दुखता ना? अब आनंद वाले की थाईज का दर्द इसको कहां से मालूम पड़ गया? आनंद वाला बोलेᄉ इधर तो दिखा नईं सकता, पन दर्द तो कम हैं आप अच्छा दवा बताया था।
डिम्पा की मां से हर कोई बात करता है, डेविड से कोई नहीं करता। ऐसे ही थोड़े कोई औरत इत्ती फेमस हो जाती है?
ये सारे बीज खेत में बिखरे हुए थे। एक एक बीज अलग अलग, सोने के दाने की तरह। हर बीज का खेत के साथ एक अलग रिश्ता होता है। उसे बीज और खेत के सिवा कोई नहीं जान सकता। ऊपर से देखने में ऐसा लगता है कि हर बीज का खेत के साथ एक जैसा जुड़ाव है।
डेविड के दिमाग में घूमता रहता था एक एक बीज। एक एक वाकया। वह रस्ते भर डिम्पा की मां को छेड़ता रहता ᄉ ÷÷क्या मैडम? बहुत चलती है आपकी तो? लीडर बन जाने का।''
और डिम्पा की मां खुश हो जाती। उसे लगता कि उसके पीआर ने आज फिर उसके पति को प्रभावित कर दिया है। वह और जोश से अपने पीआर को खाद पानी देती। डेविड को लगता, यह औरत बहुत बड़ी बेशर्म है। अब और चिढ़ा रही है। डिम्पा की मां डेविड के सामने नईम केलेवाले से दो मिनट और ज्यादा बात करती। बताती ᄉ ये मेरे मिस्टर हैं। नईम केलेवाला नमस्ते बोल कर फिर डिम्पा की मां की सेवा में लग जाता। आनंद वाला बोलताᄉ अरे, बहुत हैण्डसम हैं आपके मिस्टर। और डिम्पा की मां एक ऐंठ से भर जाती। डेविड को लगता ᄉ साला, दुनिया मानती है कि मैं इससे जास्ती हैण्डसम है, यही नहीं मानती। फिर भी दस लोगों के मुंह लगती रहती है।
डिम्पा की मां बोलती ᄉ ÷÷साहिब, तेर्को मेर्पे बहुत डौट होता रहेंगा न?''
साहिब बोलता ᄉ ÷÷कायका डौट रे? ठीक है न।?''
÷÷फिर कायको मेर्को ऐसा बोलता?''
डेविड मौन में चला जाता। एक ऐसी ढाल, जो तलवार टूट जाने के बाद काम में आती है।
शाम होने के बाद डेविड के मुंह से शराब की बास आने लगती थी। पहले वह घर में ही बैठ कर पीता था, अब बाहर पीता है। शराब की बास से डिम्पा की मां का सिरदर्द होने लगता है। डेविड सोचता है, बाहर से पीकर आयेगा, तो घर आते आते आधा बास तो वैसे ही मर जायेगा।
उसने कई लोगों से सुना है कि डॉक्टर और नर्स के बीच खतरनाक रिश्ता होता है। कोई भी डॉक्टर अपनी नर्स को नहीं छोड़ता। उसने कई लोगों से सुना है कि कैसे सब्जी वाले घर के भीतर घुसते हैं और फिर घर बना कर रहने लग जाते हैं। कैसे लाइट फिटिंग करने वाले एक बार घर में आकर मरम्मत कर जाते हैं और कैसे उस घर की लाइट बार बार खराब होने लगती है। उसे उल्हासनगर की सिन्धी औरतें याद आ गयीं, जो पूरी दोपहर बॉलकनी में खड़ी रहती हैं। बाबू सम्पत ने बताया, तो उसको यकीन नहीं आया था ᄉ इन सबके मरद बिजनेस में जास्ती लगे रहते हैं, घर में कम ध्यान देते हैं। तो बेचारी दिन भर बालकनी में खड़ी रहती हैं और कोई जास्ती देर तक इनको टापे, तो घर में बुला लेती हैं। एक बार जाओ, तो बार बार जाने को मिलता है।
उसे बाबू सम्पत याद आने लगा। उससे छोटा है। ऑर्डर पर एसी ठीक करने जाता है। क्या एक से एक किस्से सुनाता है। विश्वास ही नहीं होता। कैसे एसी ठीक करने के बाद उसी घर में मजे करता है। बोला है, मेर्को ऑफिस में फोन आता है कि कल दोपहर को मेरा एसी खराब हो जाएंगा, आने का ठीक करने को। मेर्को क्या, मैं भी एडे्रस नोट कर लेता है। जाएंगा न, फुक्कट में मिलता है, कायको छोड़ने का? घिस थोड़े ई जाएंगा मेरा।
डेविड शराब पीता है और बाबू सम्पत की बातों पर सोचता है। डेविड शराब पीता है और नईम केलेवाले के बारे में सोचता है। डेविड शराब पीता है और डिम्पा की मां के बारे में सोचता है।
डिम्म्पा की मां सिर्फ छह महीने नौकरी कर पायी। छोड़ कर घर बैठना पड़ा। अस्पताल में बताने तक नहीं जा पायी कि क्या हो गया है और क्यों उसे नौकरी छोड़नी पड़ रही है। उसने डिम्पा को डॉ. कस्बेकर का फोन नम्बर दिया और कहा उनको बता देना, मैं दस पंद्रह दिन की छुट्टी पर हूं। जास्ती मत बोलना, सिर्फ इतना ही।
लम्बे समय के बाद उसके जीवन में ऐसी दोपहर आयी थी। जब से वह जॉब करने लगी थी, उसकी दोपहर घर में नहीं होती थी। अस्पताल में ड्यूटी पालियों में होती थी, लेकिन उसे एक घंटे टे्रन का सफर करना होता है और घर में छोटा बच्चा है, यह कह कर उसने मोहलत ले ली थी कि वह सिर्फ दिन में ही काम कर पायेगी। संडे के दिन घर में रहती थी। डिम्पा के बाप से ज्यादातर शाम या सुबह ही मुलाकात हो पाती थी। बहुत दिनों से वह कुछ नहीं बोल रहा था, पर एक दिन डिम्पा के बाप ने सुबह उसे लोकल नहीं पकड़ने दी।
वह नाइट शिफ्ट पर था और सुबह सात बजे घर पहुंचा, तो डिम्पा की मां तैयार हो रही थी। जब से वह नौकरी करने लगी थी, डेविड ज्यादातर नाइट शि¬फ्ट पर ही रहता था। दिन में डिम्पा की देखभाल करता था। डिम्पा की मां के नौकरी पर जाने से डेविड ने बहुत खुशी जतायी थी। उसे लगा था कि यह ज्यादा समय बाहर रहेगी, तो इसके बारे में बातें नहीं फैलेंगी। तब कॉलोनी के लोगों से इसका मिलना जुलना भी कम हो जायेगा। प्यार के नाजुक लम्हों में, जब उसकी आंखों की कोरें गीली होती थीं, वह कई बार डिम्पा की मां को समझा चुका है कि कॉलोनी में उल्टी सीधी बातें चलती ही रहती हैं। हर किसी के बारे में कुछ न कुछ बोला जाता है। एक बार वह सावंत की लड़कियों के बारे में कहने लगा। अभी उमर ही क्या है उनकी? कैसी कैसी बातें कही जाती हैं उनके बारे में? बड़ी वाली को तो कई लोगों ने बैठी चॉल के पीछे लड़कों के साथ देखा हैᄉ अजीब हालत में। उसकी मां के बारे में भी सुना है न कि दीनानाथ काम्बले के साथ चिपकी रहती है। बेचारा विजू सावंत, आईचा नंदी बैल है। पीछे बीवी तो गुल खिलायेगी ही।
÷÷हां, करमरकर की बीवी के बारे में भी ऐसा ही बोलते हैं सब लोग।''
÷÷पता नहीं, तुझसे मिलने आती है वो तो।''
÷÷नहीं, लोग बोलते हैं कि वो तुमसे मिलने आती है, साहिब।''
÷÷क्या बोलना चाहती है तू कि मैं उसको लेकर घूमता हूं?''
÷÷मैंने तो ऐसा नहीं कहा, लोग बोल रहे थे, तो तुमको बता दिया। मुझे सलाह दे रही थीं कुछ बुजुर्ग औरतें कि करमरकर की बीवी को ज्यादा घर में मत आने दिया करो। वह मर्दों को फांस लेती है।''
÷÷और तूने सलाह नहीं मानी?''
÷÷मैं क्या बोलती?''
÷÷मुझे भी बहुत सारे बुजुर्ग सलाह देते हैं कि डिम्पा की मां सबके साथ हंस हंस कर बातें करती है, श्री.पु. जोशी के साथ घंटे घंटे लाइट के खम्भे के नीचे खड़ी रहती है। उसको पता होता है कि आनंद कटपीस सेण्टर वाले की जांघ में चोट लगी है। पता नहीं कब देख ली उसने उसकी जांघ? नईम उससे पैसे नहीं लेता। भाजी मार्केट में वह लड़कों को देखती रहती है केवल। मैं क्या बोलूं उनको?''
÷÷मुझे नहीं पता, मेरे बारे में ऐसा बोलते हैं। मैं तो सबसे ही बात करती हूं। जो मिल जाता है, उससे। आनंद वाले को चोट लगी थी, तो उसको एक दवा बता दी थी मैंने। बस। मेरा नेचर ही ऐसा है, मैं सबसे मिलती हूं। बात करती हूं। वे लोग भी मुझसे बात करते हैं। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं खराब औरत हूं।''
÷÷हां, तो मैं भी यही सोचता हूं, पर लोगों का मुंह बंद करते बैठने से तो अच्छा है कि अपन अपने नेचर को बदल डालें। किसी को बोलने का मौका ही नहीं देने का।''
उनमें देर तक बात होती रही। कई दिनों बाद डिम्पा की मां को ऐसा लग रहा था कि साहिब सच में बहुत समझदार है। वह बात को गम्भीरता से लेने लगा है। शक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में बात करना भी अब अच्छा नही लगता। इसे बातचीत और आपसी समझ विश्वास से ही दूर किया जाता है, साहिब यह बात समझ ले, तो अच्छा होगा। साहिब मुझ पर इतना शक करता है, लेकिन इसके बारे में क्या कम बोला जाता है। अभी उसी दिन जोशी भाई साहब बोल रहे थे कि डेविड को समझाओ जरा, वह काम पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहा। उसका मन कहीं और लगा हुआ है। शराब भी बहुत ज्यादा पीने लगा है। काम पर भी पीकर ही आता है। यूनियन है, जिसके कारण कोई कुछ नहीं कर रहा, वरना किसी दिन मुश्किल हो जाएगी। करमकर की बीवी जब घर में आती है, तो उसी को देखता रहता है। उसके आगे पीछे घूमता रहता है। एक बार करमकर की बीवी घर में आयी। लो कट गले का सूट पहन रखा था। कैसे उचक उचक कर उसके गले में देख रहा था मैंने टोका भी थाᄉ काय हो? खरगोश खोज रहे हो क्या? कैसे सकपका गया था। इधर उधर देखने लगा था।
साहिब को