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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
 
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

समाज
यादों से रची यात्रा : पी.सी. जोशी

शताब्दी
दिनकर
की काव्य चेतना : पुनर्मूल्यांकन खगेन्द्र ठाकुर

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित

लेख
माधवराव सप्रे का महत्व मैनेजर पांडेय

मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह

कहानियां
तमाशे
में डूबा हुआ देश असगर वजाहत

जिद्दी रेडियो पंकज मित्र

फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा

स्वीट होम उमा शंकर चौधरी

विशेष
सागू
मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

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संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये
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अंक/17 जनवरी/08

   सम्‍पादकीय

न दिनों कुछ लोगों के जरिए यह विचार प्रकट किया जा रहा है कि हिन्दी में साहित्य की पुस्तकें बिकती नहीं हैं, बिकाऊ हैं − विषय और विमर्श केन्द्रित ग्रंथ। यदि यह महज एक तथ्य हो तो इसे धैर्यपूर्वक सुना जा सकता है अथवा अनसुना भी किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत तब होती है जब इस तथ्य में निर्णय भी शामिल रहता है। निर्णय यह होता है कि साहित्य बिकता नहीं इसलिए कमतर है। इसी कड़ी में एक टी.वी. चैनल पर आयोजित परिचर्चा में एक प्रसिद्ध आलोचक द्वारा यह स्थापना प्रस्तुत की गयी कि हिन्दी साहित्यकार की दृष्टि में पाठक रहता ही नहीं है वह तो बस लिखे जा रहा है। वे मशविरा देते हैं कि चार पांच साल के लिए कविता, कहानी, उपन्यास वगैरह को छापना बंद कर देना चाहिए। यह हिन्दी में सृजनात्मक लेखन करने वालों पर महान कृपा हुई कि उनकी पुस्तकों के प्रकाशन पर प्रतिबंध की अवधि चार पांच साल ही मुकर्रर की गयी है। इस सौभाग्य के लिए निश्चय ही हिन्दी लेखकों को कृतज्ञ और ऋणी होना चाहिए।
दरअसल कुछ मौलिक शुभचिन्तक हमेशा हिन्दी साहित्य के पास रहे हैं। ये लोग समय समय पर भेष बदल कर नयी नयी आवाजों में अपनी शुभचिन्ता व्यक्त करते रहते हैं। इनके पूर्वजों ने तब भी चिन्ता प्रकट की थी जब प्रेमचंद अपनी रचनाओं के माध्यम से विशाल पाठक वर्ग को आकर्षित कर रहे थे। तब इनकी चिन्ता यह थी कि यह तो किस्सा, कहानी, गल्प है। यह साहित्य नहीं प्रोपेगैण्डा है, इसमें साहित्य के दार्शनिक शाश्वत मूल्यों का गाम्भीर्य कहां। इसी प्रकार कबीर को कवि नहीं समाज सुधारक कह कर उनके कविता में प्रवेश पर चिन्ता की गयी थी। काफी पहले तुलसीदास के अवधी में कविता करने पर भृकुटि टेढ़ी हुई थी कि ÷भाखा' में भी कविता भला कभी सम्भव है।
कथा साहित्य को प्रारम्भ में हमारे आचार्यों ने हल्के फुल्के ढंग से लिया था किन्तु जब कथा सािहत्य ने उसकी परवाह करने के प्रति उदासीन होकर अपने पाठकीय और सृजनात्मक संसार को विस्तार, गरिमा, ऊंचाई दी तो शुभचिन्तकों को फिक्र सताने लगी। उन्होंने भविष्यवाणी की कि सिनेमा इसे खा जाएगा। जब यह भविष्य कथन गलत निकला तो कुछ वर्षों के बाद कहा गया, महाबली टेलिविजन आ गया, अब हो गया काम तमाम। अब किस्से कहानियां उपन्यास अपना अस्तित्व भी शायद ही महफूज रख सकें। लेकिन इस चुनौती से संकटग्रस्त होने के बजाय हिन्दी साहित्य ने उत्कर्ष की दिशा में कदम बढ़ाये। टेलिविजन क्रांति के समानांतर हिन्दी साहित्य ने अपनी अनेक विधाओं में नयी बुलंदियां हासिल कीं। अब पुनः चिन्ता करने की जरूरत थी और वजह मिल ही गयी। घोषणा होने लगी− इंटरनेट आ गया, अब किताबों पत्र पत्रिाकाओं के दिन खत्म। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत उपस्थित हुई। उदाहरण के लिए एक दशक के समय को साक्ष्य माना जाए तो परिदृश्य यह सच स्थापित करता है कि किताबों का जीवन खत्म नहीं, बल्कि पुनर्नवा हुआ है। इसी अवधि में उपन्यास की विधा में सर्वोत्तम सक्रियता और समृद्धि रही है। कहानी की दुनिया में रचनाशीलता का विस्फोटक उभार दिखाई देता है। संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, आत्मकथा, निबंध जैसे कथेतर गद्य रूपों की दृष्टि से यह समय हिन्दी में अभूतपूर्व है। इसी अवधि में साहित्यिक पत्रिाकाओं की न केवल संख्या में अभिवृद्धि हुई है वरन्‌ वे नयी तैयारी और विवेक के साथ ज्यादा विस्तृत पाठक समुदाय तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब हो रही हैं।
स्थिति का जायजा इससे भी लिया जा सकता है कि साहित्यिक पुस्तकों को प्रश्नांकित करने की प्रबल कोशिशों के बावजूद एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलेगा कि किसी प्रकाशक ने घाटे के कारण अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया हो। इतना ही नहीं, इन्हीं साहित्य की पुस्तकों से मुनाफा कमाने के लिए करीब दर्जन भर नये प्रकाशक महत्वाकांक्षी प्रयासों के साथ इस उद्योग में शामिल हो गये हैं। इस संदर्भ में दिलचस्प यह है कि अंग्रेजी के आक्रामक विस्तार और उसके तले हिन्दी के नेस्तनाबूत हो जाने की आशंकाओं के समय में ही अंग्रेजी के प्रतिष्ठित प्रकाशक हिन्दी साहित्य के प्रकाशन व्यवसाय में पदार्पण कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य का प्रकाशन व्यवसाय अब लाखों नहीं अरबों में पहुंच चुका है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का एक उदाहरण यहां देना गैरजरूरी न होगा। सन्‌ 1889 में नेशनल बुक ट्रस्ट ने बेगम हजरत महल पार्क (भाजपा सरकार बनने के बाद उसका नामकरण ÷उर्मिला वाटिका' कर दिया गया) में राष्ट्रीय पुस्तक मेले का आयोजन किया था जिसमें देश भर से अनेक छोटे बड़े प्रकाशक आये थे और सारे के सारे निराश हुए थे। बिक्री के आंकड़े अवसादकारी थे। पाठकों की उपस्थिति शर्मनाक की हद तक कम थी। लेकिन पिछले कुछ समय से लखनऊ में प्रतिवर्ष पुस्तक मेला आयोजित किया जाता है और बिक्री करोड़ रुपयों के करीब होती है। स्थिति यह है कि किसी किसी दिन कुछ प्रकाशकों के लिए पाठकों के समूह को संभालना मुश्किल हो जाता है। शायद इसी का नतीजा है कि अब छोटे छोटे जनपदों में भी सफलतापूर्वक पुस्तक मेले आयोजित किये जाने लगे हैं। यहां हमारा यह आशय कदापि नहीं है कि हिन्दी साहित्य का कोई स्वर्णयुग आ गया है और लेखक विशाल पाठक समुदाय हासिल करने में सफल हो रहे हैं। निश्चय ही पाठकों की दृष्टि से बहुत बड़े भू भाग की भाषा हिन्दी में रचा जाने वाला साहित्य आज भी अभागा ही कहा जाएगा। उपरोक्त विश्लेषण के द्वारा हम महज यह कहना चाहते हैं कि कुछ लोग हिन्दी साहित्य का जितना अंधकारपूर्ण वर्तमान और भविष्य देखते हैं या देखना चाहते हैं, उतना है नहीं। कम से कम अपने अतीत की तुलना में बिल्कुल नहीं। लेकिन यह भी सच है कि हमें आश्वस्त होने और किसी प्रकार के मुगालते में रहने की आवश्यकता नहीं है। निश्चय ही व्यापक पाठक वर्ग निर्मित करने और उस तक साहित्य को पहुंचाने के ठोस उपाय ढूंढने ही पडें+गे। इस संदर्भ में देखना होगा कि पुराने सन्नाटे को तोड़ कर पुस्तक मेलों में पाठकों की आमद में जो आशातीत बढ़ोत्तरी हुई है उसका आधार क्या है। कहना न होगा कि हिन्दी साहित्य का अधिसंख्य पाठक मध्य वर्ग से सम्बद्ध रहा है और बीते दिनों में इस वर्ग की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी आयी है जिससे उसकी क्रयशक्ति बढ़ी। किताबों के कारोबार में जन्मी बढ़त का मध्य वर्ग की उक्त बढ़ी हुई क्रयशक्ति से गहरा सम्बंध है। लेकिन इस अवसर का जितना उपयोग किया जाना चाहिए उसका शतांश भी नहीं किया जा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
निश्चय ही बाजारवाद के अनेक घातक प्रभाव समकालीन मनुष्य और समाज पर दिखाई पड़ रहे हैं लेकिन उसके चाहे अनचाहे एक सकारात्मक परिणाम यह सामने आया है कि लोग हिन्दी की ताकत को स्वीकार करने के लिए बाध्य हुए हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि आने वाले समय में हिन्दी दुनिया की एक महत्वपूर्ण भाषा के रूप में जानी जाएगी। लेकिन इस संदर्भ का त्रासद पक्ष यह है कि हिन्दी भाषा की इस मजबूती और विस्तार में साहित्य अपने फैलाव के लिए समुचित स्पेस नहीं बना सका है। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही इस दिशा में कुछ ठोस एवं सार्थक प्रयत्न सामने आयेंगे।
यहां ठहर कर इस प्रश्न पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि यदि हिन्दी के सृजनात्मक साहित्य का अपेक्षित बाजार नहीं बन पा रहा है तो उसका जिम्मेदार कौन है? लेखक, प्रकाशक, हिन्दी समाज की सांस्कृतिक चेतना, साक्षरता दर, राजनीति − कौन है जिम्मेदार! इसका उत्तर जो भी हो लेकिन इतना तय है कि जवाब एकवचन में नहीं होगा। पाठकों के अभाव के निश्चय ही कई कारण होंगे किन्तु जिस टी.वी. परिचर्चा का हमने प्रारम्भ में जिक्र किया है, उसमें बढ़ी दृढ़ता के साथ एक स्वर यह भी था कि लेखक ही इस स्थिति का अपराधी है, क्योंकि उसके सामने उसका पाठक रहता ही नहीं है, वह स्वांतः सुखाय लिखता रहता है। यह व्याख्या सही लग सकती है या अशुद्ध, या अधिक से अधिक इसे सच्चाई के बजाय किसी व्यक्ति की खीझ समझा जा सकता है। परंतु हम कहना चाहते हैं कि इस तरह के विचारों − और यह भी कि साहित्य अब बिकता नहीं अतः बेकार है − और यह भी कि कुछ वर्षों के लिए उसे छापना बंद कर देना चाहिए जैसे विचारों − का विखंडन किया जाए तो हम पायेंगे कि ऐसी धारणाओं के प्रवक्ता अपने अपार आत्मविश्वास और खीझ में जो बातें कह रहे हैं उनमें उनके जाने अनजाने अत्यंत खतरनाक अवधारणाएं निहित हैं।
पहली बात तो यह है कि यहां यह सैद्धांतिकी स्थापित करने का यत्न है कि जो बिकता है, वही श्रेष्ठ है। यही नारा बाजारवाद का है − जिसका शेयर मूल्य अधिक चढ़ान पर है, जिसका सेंसेक्स ऊंचा, वही सफल है वही स्वागत योग्य है। इसी पद्धति से एक दिन गुलशननंदा, वेद प्रकाश शर्मा जैसे बिक्री शिरोमणि रेणु और अमरकांत से श्रेष्ठतर ठहराये जाने लगेंगे और मुक्तिबोध जैसे हिन्दी के महान रचनाकार कठोर से कठोर सजा के हकदार माने जायेंगे। गहराई में जाएं तो इस तरह की विपणनवादी मीमांसाएं लेखक को न बिकने अपराधी का ठहराने की प्रक्रिया में पूंजी की शक्ति रखने वाले प्रकाशकों और राजनीति की सत्ता को बचाने का खेल खेलती हैं। उनको कवच प्रदान करती हैं। इतना ही नहीं यहां यह आग्रह भी है कि साहित्य अपने विचार, प्रयोगशीलता, असहमति के अधिकार और प्रतिरोध के साहस को त्याग कर बिक्री हेतु लुभावन शब्दों में बदल जाए। यह साहित्य को तीसरा चेहरा देने या कहें कि साहित्य का चेहरा बिगाड़ने का अभियान है। अभी तक कुछ लोग साहित्य को सामाजिक संरचना के रूप में स्वीकार करने के पक्षधर रहे हैं तो कुछ उसे कलाकृति अथवा साहित्यिक संरचना के रूप में मान्यता देते हैं। अब तीसरी बयार बह रही है जिसके मुताबिक साहित्य इन दोनों से इतर एक बिकाऊ संरचना है−प्रोडक्ट। जबकि वास्तविकता यह है कि साहित्य इन तीनों में से कोई भी एकमात्र चीज नहीं है। वह तीनों का समुचित सहमेल है। और जब भी कोई व्याक्ति, संगठन अथवा समुदाय उसे एक ही रंग में रंगना चाहता है तो वह उसका भला करने की भांगिमा में उसका बुरा कर रहा होता है।
लेकिन बहुत ज्यादा तनाव लेने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि इतिहास साक्षी है कि तमाम वक्तव्यों, मंतव्यों, फरमानों, सनकों और तोहमतों के बावजूद हिन्दी साहित्य सही और नयी चाल में बढ़ता रहा है।

इस बीच त्रिलोचन, कुर्रतुलऐनहैदर, विजेन्द्र अनिल, विनय दुबे शरद देवड़ा, राधा रमण लक्ष्मीमल सिंधवी, शुकदेव सिंह, डा. रणवीर रांगा, गोविन्द चातक, चिरंजीत, राजेन्द्र प्रसाद सिंह जैसे महत्वपूर्ण लेखकों को हमने खो दिया− तद्भव इन विभूतियों के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

अखिलेश

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