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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय


समाज

यादों में रची यात्रा
पी.सी. जोशी

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लेख
दलित अस्मिता और एजेण्डा ÷ जाति विनाश' का सुवीरा जायसवाल

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ

वीरेन्द्र यादव

150 वीं जयन्ती के अवसर पर 1857 का विप्लव एक बार फिर गम्भीर विमर्श व प्रश्नों के घेरे में है। क्या हैं इसकी विरासत के निहितार्थ? क्या यह वास्तव में आधुनिक राष्ट्र राज्य की प्रसव पीड़ा थी या कि भारत की कुलीन पितृसत्ता द्वारा अपने वर्चस्व को बचाने का अन्तिम प्रयास। इस ÷ जनविद्रोह' के प्रति क्या थी भारत के बहुजन समाज की प्रतिक्रिया? क्या है इसका रिश्ता 1947 की आजादी से? इन्हीं प्रश्नों व जिज्ञासा के दायरे में प्रस्तुत है चर्चित आलोचक वीरेन्द्र यादव का लेख।

 

÷÷... ब्रिटिश सरकार ने जमींदारियां स्थापित करके बढ़े हुए ÷ जमा' लगाये हैं और बकाया मालगुजारी की वसूली के लिए रियासतों का सार्वजनिक नीलाम करके कई जमींदारों को अपमानित एवं बर्बाद कर दिया है। यहां तक कि किसी नौकरानी अथवा गुलाम द्वारा दाखिल मुकदमे में इज्जतदार जमींदारों को अदालत में लाया जाता है और फिर गिरफ्तार कर अपमानित किया जाता है। ... बादशाही हुकूमत में ... जमींदारों का मान और उनकी इज्जत सुरक्षित रहेगी और प्रत्येक जमींदार का अपनी अपनी जमींदारी में स्वतन्त्र शासन होगा। शरह और शास्त्रों के अनुसार बिना किसी खर्चे के जमींदारी झगड़ों का सरकारी तौर पर निर्णय किया जाएगा।... पण्डित और फकीर क्रमशः हिन्दू और मुसलमान धर्म के रक्षक हैं और चूंकि यूरोप के निवासी दोनों धर्मों के शत्रु हैं तथा धर्म के कारण ही वर्तमान लड़ाई लड़ी जा रही है, इसलिए पण्डितों और फकीरों को चाहिए कि वे मेरे पास आये और धर्मयुद्ध में अपना सहयोग प्रदान करें।'' 1

(25 अगस्त 1857 को जारी बहादुरशाह जफर के घोषणापत्र से)

 

÷÷... हिन्दुस्तानियों की हुकूमत में... कभी कोई मजहब में दखल नहीं देता था; हर आदमी अपने दीन का कायल था और उसकी इज्जत उसके मुताबिक थी। अशराफ चाहे वे मुसलमान कौम के सैय्यद, शेख, मुगल या पठान खानदान के हों या हिन्दुओं में ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ हों, को उनकी हैसियत के अनुसार इज्जत और ओहदा दिया जाता था। कोई नीच पाजी, चूहड़, चमार, धानुक या पासी उनसे बराबरी का दावा नहीं कर सकता था।... लेकिन अंग्रेज... चाहते हैं कि हिन्दू और मुसलमान बेदीन होकर ईसाई बन जाएं।... वे ऊंची जमात के लोगों की इज्जत को नीची जमात के मेहतरों और चमारों के बराबर ले आये हैं। असलियत यह है कि अंग्रेज नीची जातियों को ऊंचे दर्जे के मुकाबले ज्यादा तरजीह देते हैं। एक मेहतर और चमार की शिकायत पर वे नवाब और राजा को पकड़ कर उसकी बेहुर्मती करते हैं।'' 2

( बेगम हजरत महल द्वारा शहजादा बिरजीस कद्र की ताजपोशी - 5 जुलाई 1857 - के अवसर पर जारी घोषणापत्र से)

 

÷÷ ऐसी अदालतों की स्थापना करना जिससे सम्पत्तिशाली लोग मुकदमे के भारी खर्चे से बर्बाद हो जाएं और ऐसे कानून लागू किये जाएं, जो उनकी पवित्र मान्यताओं और धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध हैं। मन्दिर मस्जिद का ध्वस्तीकरण, सती और विरासत सम्बन्धी हिन्दू प्रथा में हस्तक्षेप ... हिन्दुस्तानियों के धार्मिक रीति रिवाजों को भ्रष्ट करने की योजना... अंग्रेजी सरकार के अन्याय और फरेब के कारनामे सूरज की रोशनी की तरह हर तरफ फैले हैं।'' 3

( नाना साहब द्वारा नैपोलियन बोनापार्ट को 28 अप्रैल 1858 को भेजे गये पत्र से)

अठारह सौ सत्तावन के विप्लव की डेढ़ शताब्दी के बाद यह जानना वास्तव में दिलचस्प है कि किस तरह आधुनिक इतिहास की एक समूची परिघटना को ÷ राष्ट्रवाद' के मनोनुकूल मिथक में ढाला जा सकता है। 1857 को प्रथम राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाना क्या ऐसी ही एक गढ़न्त है? क्या यह तथ्य विचारणीय नहीं है कि जिन राजाओं, नवाबों, सामन्तों, तालुकेदारों, पुरोहितों एवं सैनिकों के बल पर भारत में अंग्रेजी सत्ता के पांव जमे थे, वे ही विद्रोह क्यों कर बैठे? प्रश्न यह भी है कि जो बहादुरशाह जफर, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल और नाना साहब अंग्रेजों द्वारा दी गयी पेंशन व आर्थिक सहायता द्वारा अपनी राजशाही का तामझाम बरकरार रखे हुए थे, क्या उन्हें उस भारतीय जनता का नायक कहा जा सकता है, जो अंगे्रजों और सवर्ण सामन्ती सत्ता की दुहरी गुलामी से त्रस्त थी? क्या इस समूचे घटनाक्रम में पुरातन व्यवस्था के कुलीन संस्कारों व आधुनिक जीवन मूल्यों की टकराहट का भी कुछ योगदान था? क्या अंगे्रज सेना के सिपाही मंगल पाण्डे और देश की मुक्कमल आजादी के योद्धा भगत सिंह के प्राणोत्सर्ग के एक ही निहितार्थ हैं? क्या यह पड़ताल जरूरी नहीं कि न्यस्त हितों से प्रेरित 1857 के सैनिक व सामन्ती विप्लव की प्रकृति उन संथाल आदिवासियों के संघर्ष से किस तरह भिन्न थी, जो जंगल और जमीन पर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए जमींदारों व साहूकारों के साथ उनकी संरक्षक अंग्रेजी सत्ता को भी चुनौती दे रहे थे? और अन्त में यह भी कि बादशाहों, राजाओं, तालुकेदारों, जमींदारों, और कुलीनजन का जो उत्तर भारत केन्द्रित यह गठबन्धन अंगे्रजों के द्वारा पराजित हुआ, उसका भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन से क्या वर्गीय रिश्ता बना? क्या है 1857 की विरासत? आधुनिक राष्ट्रवाद या विकलांग राष्ट्रवाद? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनसे मुठभेड़ किये बिना न तो 1857 को सही ऐतिहासिक सन्दर्भों में समझा जा सकता है और न ही इसका मिथक भेदन किया जा सकता है।

1857 के विप्लव की संरचना को समझने के लिए आवश्यक है यह जानना कि भारत पर राज करने के लिए अंगे्रजों ने किन देशी बिचौलियों का सहारा लिया था। विप्लव के ठीक सौ वर्ष पूर्व 1757 में प्लासी युद्ध में अपनी विजय के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ज्यों ज्यों बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर भारत और मद्रास में अपनी शासन सत्ता का विस्तार किया, त्यों त्यों उसने उस सामन्ती व पुरोहिती सत्ता के सामाजिक आधार को पोषित व पुनर्जीवित किया जिसका आधिपत्य पहले से ही भारतीय समाज पर था। अपने शासन के प्रारम्भिक दौर में अंगे्रजों ने भारतीय समाज के धार्मिक व सामन्ती तानेबाने में किसी प्रकार के हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी। कारण यह कि मुगल सत्ता के जिस पराभव युग में अंग्रेजों का भारत आगमन हुआ, वह किसी सुदृढ़ केन्द्रीय सत्ता के अभाव में एक अराजक राजनीतिक समय था। जिस राजा की जितनी सामर्थ्य और सैन्य बल, उसका उतना ही बड़ा राज्य। अपनी राजसत्ता को वैधता प्रदान करने के लिए राजाओं में धर्म पर निर्भरता और धार्मिक कर्मकाण्डों को अपनाने की प्रवृत्ति इस दौर में तेजी से बढ़ी। परिणामस्वरूप ÷ अठारहवीं शताब्दी में देशी शासकों ने अपने राज्यतन्त्र का धिकाधिक ब्राह्मणीकरण किया और कुछ ने तो राज्य के महत्वपूर्ण पद और कार्य ब्राह्मण मूल के ही लोगों को सौंपे।'4 अंग्रजों ने इस नीति रीति को बरकरार ही नहीं रखा उसे संस्थाबद्ध भी किया।

भारत के प्रथम अंगे्रज गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हैस्ंिटग्स की राय थी कि ÷ एक समुदाय के रूप में हिन्दुओं के पास ऐसे कानून रहे हैं, जो प्राचीनतम समय से अपरिवर्तित रहे हैं, उसका कहना था कि ÷ ये अब भी मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि, यदि अंग्रेजों को भारत पर सफलता से शासन करना है तो वे इन कानूनों और जिस संस्कृत भाषा में ये उपलब्ध हैं, उन पर महारत हासिल करें।...' उसकी राय में यह शासन के लिए उपयोगी होगा क्योंकि इससे ÷ गुलामी की उन जंजीरों का भार कुछ हल्का होजाएगा जिससे जनता को जकड़ा जाना है।'5 इस दिशा में वारेन हैस्टिंग्स के प्रयासों का ही परिणाम था कि इन्हीं दिनों (1767) जे. जेड. हावेल की पुस्तक ÷ रिलीजियस टेनेट्स आफ जेन्ट्ज' और सर विलियम जोन्स के शोधपरक लेख ÷ एशियाटिक रिसर्चेज' के अंकों में प्रकाशित हुए, जिनसे ब्रिटिशों की निगाह में हिन्दू धर्म की विधिवत्‌ पहचान बनी। हिन्दू धर्म की यह संरचना ब्रिटिश अध्येताओं और ब्राह्मण पण्डितों के संयुक्त प्रयासों का फल थी, जिसके लाभार्थी प्रमुखतः ब्राह्मण थे। कारण यह कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद के पूर्व भारत में ब्राह्मण ग्रन्थों की विधिक साक्ष्यों के रूप में सर्वस्वीकृति नहीं थी। अलग अलग समुदायों व जातियों की अपनी विधिक मान्यताएं थीं। डी. डी. कौशाम्बी का मत है कि अंगे्रजों की ÷ ब्राह्मणीकरण की प्रवृत्ति के चलते ही विभिन्न जाति समुदायों के कानूनों की उपेक्षा हुई और ब्राह्मण ग्रन्थों को हिन्दू कानून का आधार बनाया गया।'6 शासन सत्ता में धार्मिक परिप्रेक्ष्य अपनाते हुए अंगेजों ने न्यायिक अदालतों में ब्राह्मण पण्डितों और मौलवियों को विशेष भूमिका प्रदान की। थामस आर. मेटकॉफ के अनुसार, ÷ अंगे्रज हिन्दुस्तानी बिचौलियों पर काफी कुछ निर्भर थे। अदालतों के काम और रोजमर्रा के शासन व कर वसूली में ब्राह्मणों की अपरिहार्य भूमिका थी। यद्यपि यह ब्राह्मण निर्भरता ब्रिटेन में बैठे अंगे्रज उच्चाधिकारियों के मन में झुंझलाहट और खीझ भी पैदा करती थी।'7 कारण यह कि उन्हें इन पण्डितों की निष्पक्षता और ईमानदारी पर भरोसा नहीं था। अपने अनुभवों से जेम्स ग्राण्ट डफ सरीखे भारत विषयक अंग्रेज नीतिकारों की इस दौर में यह धारणा बनी थी कि ÷ हिन्दुस्तान का मेहनती और सादगी पसन्द किसान, जहां कहीं भी ब्राह्मणों के चंगुल में है, दुर्दशाग्रस्त है'8 इसके बावजूद व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए अंग्रेजों ने यह नीति अपनायी कि हिन्दुस्तानी उपनिवेश में ÷ उच्चवर्णी हिन्दू ही महत्व देने योग्य असली जमात है और जो व्यक्ति अनुकूल राजनीतिक व आर्थिक परिस्थिति में उच्च वर्ण जाति की रीति निति का अनुगमन करेगा, वह अकूत लाभ कमा सकता है।'9

देशी शासकों व कुलीन हिन्दुओं का हित रक्षण करते हुए अंग्रेजों ने भारत में अपनी लूट का साम्राज्य स्थापित करने की जो नीति अपनायी , उसी का परिणाम था भूमि के लगान की वह व्यवस्था जिसके अन्तर्गत सवर्ण जातियों को शूद्र व दलितों की तुलना में समान भूमि के लिए कम दर से लगान देना होता था। आदि काल से प्रचलित इस व्यवस्था में अंगे्रजों ने कोई परिवर्तन नहीं किया। कारण यह कि जिस प्रभुत्वशाली कुलीन वर्ग से उनका गठबन्धन था वह उच्च जााति का ही था, जो अपनी ताकत के बल पर अपना आधिपत्य बनाये रखता था। इस लगान व्यवस्था के बारे में डी.डी. कौशाम्बी का मत है कि, ÷ जाति का सम्बन्ध आर्थिक स्थिति से था। ब्राह्मण उतनी ही भूमि पर कम दर से कर देता था। इसकी दावेदारी परम्परागत विशेषाधिकार के रूप में की जाती थी।'10 अंग्रेजों ने सेना की भर्ती में भी उच्च सवर्णों को विशेष प्राथमिकता दी, मुख्यतः ब्राह्मणों, भूमिहारों व राजपूतों को। इसके पीछे उनकी बलिष्ठ देहयष्टि और निष्ठा भाव तो था ही, साथ ही साथ वारेन हैस्टिंग्स के ही शब्दों में ÷ सेना का उच्च वर्ण केलोगों से युक्त होना कम्पनी शासन को वैधता भी प्रदान करता था।'11 उच्च सवर्ण पृष्ठभूमि के इन सैनिकों की धार्मिक श्रेष्ठता व कुलीन संस्कारों को दृष्टिगत रखते हुए इनकी खानपान की अपनी व्यवस्था सुनिश्चित की जाती थी और समुद्र पार की सैन्य सेवा से भी इन्हें मुक्त रखा जाता था। 1779 में प्रथम मराठा युद्ध के दौरान वारेन हैस्ंिटग्स ने सेना को बंगाल से बम्बई भेजने के लिए लम्बा थल मार्ग अपनाया क्योंकि उसे पता था कि समुद्र मार्ग से होकर जाने में सिपाहियों की धार्मिक भावनाएं आाहत होतीं क्योंकि इसमें जाति गंवाने का खतरा था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर में बंगाल नैटिव आर्मी के सिपाहियों की खुराक, भोजन तैयार करने की विधि और खाने का तरीका जटिल नियमावली द्वारा संचालित होता था। ÷ सिपाही ऐसा खाना खाते थे जो सिर्फ उच्च जाति व शुद्ध संस्कारों से सम्बद्ध था। वे अपने गांव में रह कर अपने जातिगत संस्कारों की जितनी रक्षा नहीं कर पाते थे, उससे अधिक सेना में सम्भव था। एक अर्थ में कम्पनी द्वारा ÷ सेना के संस्कृतीकरण' को बढ़ावा दिया जा रहा था।'12 सेना द्वारा स्वपाकी ब्राह्मणों को अपना खाना स्वयं बनाने की सुविधा और पर्याप्त समय दिया जाता था। कम्पनी अपने उच्चवर्णी सिपाहियों के लिए ब्राह्मण एवं राजपूत वेश्याओं का भी प्रबन्ध करती थी, दरअस्ल ÷ सिपाही सवर्ण भूस्वामी भी होते थे, जिनकी अपने गांव में पैतृक खेती होती थी और वे अपने साथ सामान ढोने के लिए सेवक रखते थे, जो सैन्य अभियान में भी उनके साथ रहते थे। ये सैनिक स्वाभिमानी जवान थे.. जो अंग्रेज साहिब का नमक खाकर अपनी जिन्दगी उसकी सेवा में अर्पित कर देते थे। सिर्फ एक चीज वे इससे ऊपर रखते थे, वह था उनका धर्म।'13

भारतीय मुहावरे में वैधता प्राप्त करने के अंग्रेजी सत्ता के इस परम्परा केन्द्रित धार्मिक परिप्रेक्ष्य को लेकर ब्रिटेन के चिन्तकों व राजनीतिज्ञों में उन दिनों तीखी बहस छिड़ी हुई थी। जहां लार्ड वेलिंगटन जैसे अनुदारवादी पुरातनपंथी भारतीय धर्म और संस्कृति को पवित्रतम मानते हुए ब्रिटिश प्रशासन का सर्वोच्च कर्तव्य ÷ देश की प्राचीन विधि व्यवस्था, परम्परा और धर्म की सुरक्षा' मानते थे; वहीं बेन्थेम की तर्ज पर जेम्स मिल जैसे उदारवादी चिन्तकों का कहना था कि ÷ हर संस्था के लिए तर्क और उपयोगिता की कसौटी लागू की जानी चाहिए और मात्र प्राचीनता और परम्परा के नाम पर किसी चीज को न्यायोचित नहीं ठहराना चाहिए।'14 लेकिन बाद में भारत प्रवास के अपने अनुभवों से सीख लेकर जेम्स मिल ने सुधारों को तेज गति से न किये जाने की चेतावनी भी दी थी। कारण यह कि, ÷ उच्च जाति के ब्राह्मणों को कानून के समक्ष समानता की ब्रिटिश अवधारणा अप्रिय लगने के कारण इसे मन्द गति और कई चरणों में लागू किया जाना चाहिए।'15 लेकिन इस सारे बहस मुबाहिसे को विराम देते हुए जब उदारवादी सुधारपंथियों के दबाव में ब्रिटेन की संसद ने 1833 में इण्डिया चार्टर को मंजूरी दी तो सुधार की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उससे औपनिवेशिक भारत में एक भूचाल सा आ गया। सुधार की इस प्रक्रिया से अंगे्रजी शासन के ब्राह्मणवादी परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन आया और शासन प्रशासन, न्याय व्यवस्था व सेना में समाज के अन्य वर्गों के प्रवेश का रास्ता खुला। लेकिन विडम्बना यह कि इन्हीं सुधारों ने 1857 के विप्लव की भूमिका भी तैयार की।

1833 के बाद अंग्रेज शासन की सोच में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया कि भारत के कुलीन जन का मुखापेक्षी होते हुए उसने सामन्ती संस्थाओं व परम्पराओं में हस्तक्षेप न करने की जो नीति अपना रखी थी, अब वह बदलने लगी। अदालतों, सेना की छावनियों से लेकर जेल तक में इसे देखा जा सकता था। सरकारी कार्य व्यापार में अब धर्म, वर्ण और जाति के भेदभाव को प्रश्रय न देने एवं इन तौर तरीकों से दूरी बनाने के प्रयत्न स्पष्ट दीखने लगे थे। मन्दिरों, दरगाहों व धार्मिक उत्सवों के सरकारी प्रबन्धन व खर्च आदि से भी सरकार अपने हाथ खींचने लगी थी। जेल प्रशासन ने कैदियों के जातिगत संस्कारों को दृष्टिगत रखते हुए अपना भोजन स्वयं बनाने की जो सुविधा प्रदान कर रखी थी, उसे वापस लेकर ब्राह्मण रसाईए द्वारा सम्मिलित भोजन बनाने की नयी व्यवस्था की गयी। जेलों में पीतल के लोटों के स्थान पर मिट्टी के बर्तनों के इस्तेमाल के निर्देश दिये गये ताकि मारपीट व झगड़ों में कैदी इसका इस्तेमाल न कर सकें, लेकिन जाति शुद्धता के नाम पर यह उच्च जातियों के बन्दियों में असन्तोष का कारण बना क्योंकि मिट्टी के इन पात्रों को मांजा नहीं जा सकता था। साफ सुथरा रहने का तर्क देकर मुसलमान कैदियों से दाढ़ी कटाने को कहा गया, जिसे धर्म में हस्तक्षेप माना गया। अस्पतालों में हर धर्म और जाति के रोगियों का एक ही वार्ड में भर्ती किया जाना और गरीब व अमीर तथा पर्दानशीं स्त्रियों के साथ समान व्यवहार हैसियतदारों की इज्जत के साथ खिलवाड़, सामाजिक जीवन में अवांछित हस्तक्षेप माना गया। अदालतों के नये कानून तथा कानून के समक्ष समानता का सिद्धान्त भी पारम्परिक न्याय व्यवस्था के कुलीन पक्षघरों के बीच गहरे असन्तोष का कारण बना। अदालतों में देशी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार और कानूनी पेचीदिगियों ने भी उसके विरुद्ध वातावरण तैयार किया।

पारम्परिक चलन व धार्मिक विश्वासों के अनुकूल न होने के कारण इन आधुनिक परिवर्तनों को भारत के सामाजिक तानेबाने में जबरिया हस्तक्षेप माना गया। इसे तब और बल मिला जब हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म अपनाने वालों को विरासत अधिकारों की कानूनी सुरक्षा प्रदान की गयी। इसके पूर्व हिन्दू विधि के प्रावधानों के अनुसार धर्म परिवर्तन करने वालों को विरासत सम्बन्धी अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था। जब कम्पनी राज ने हिन्दू विधवाओं के पुनर्विवाह और इन विवाहों से उत्पन्न सन्तानों को वैधता प्रदान की तो सवर्ण हिन्दुओं ने इसे अपनी धार्मिक परम्पराओं में सीधा हस्तक्षेप माना। इसके पूर्व लार्ड विलियम बेंटिक द्वारा सती प्रथा को प्रतिबन्धित किये जाने की स्मृति तो उनके मन में ताजा ही थी। इस दौर में शिक्षा के प्रसार हेतु अंग्रेजी माध्यम के सरकारी और मिशनरी स्कूलों का खोला जाना तथा इसमें दलितों व स्त्रियों को भी शिक्षा का अधिकार देना कुलीन समाज को रास नहीं आया। शिक्षा के क्षेत्र में मिशनरियों की आमद और अंगे्रजी शिक्षा का विरोध मुस्लिम समाज में भी हुआ। ÷ बिहार और अवध के मुस्लिम जमींदारों में अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की हैसियत के बावजूद अंग्रेजी शिक्षा के प्रति अरुचि थी। उदाहरण के लिए 1867 में लखनऊ में सम्पन्न वायसराय के दरबार में 260 मुस्लिम तालुकेदार उपस्थित थे, लेकिन 1869 तक इन परिवारों के कुल 70 बच्चे ही शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। मुसलमानों के अंग्रेजी स्कूल पूरी तरह अलोकप्रिय थे।16 कुछ ही वर्षों पूर्व ÷ जब 1835 में लार्ड विलियम बेंटिक ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा के आदेश लागू किये थे, तब 8000 मुसलमानों ने हस्ताक्षर कर सरकारी खर्च से अंग्रेजी शिक्षा दिये जाने का इस आधार पर विरोध किया था कि इससे हिन्दुस्तान की नयी पीढ़ी का अपने मजहब में यकीदा कम होगा और उनमें ईसाईयत के प्रचार का दरवाजा खुलेगा।'17

हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समुदायों के मन में धार्मिक हस्तक्षेप की यह आशंका निर्मूल नहीं थी। कारण यह कि 1833 के इण्डिया चार्टर के लागू होने के साथ साथ ईसाई मिशनरियों को भी धर्म प्रचार की छूट मिल गयी थी। उन दिनों मिशनरी प्रचारकों को स्कूल, अस्पताल, जेल व बाजार हर कहीं प्रचार करते हुए देखा जा सकता था। वे ईसाई धर्म की श्रेष्ठता का बखान करते हुए हिन्दू और इस्लाम धर्म को कमतर ठहराते और इनका उपहास भी करते थे। इन दिनों मिशनरी स्कूलों के साथ साथ सरकारी स्कूलों में भी बाइबिल का पाठ किया जाने लगा था। जेलों में भी कैदियों को सामान्य शिक्षा के साथ ईसाई मत की शिक्षा दी जाने लगी थी। पटवारियों को हिन्दी सीखने के लिए मिशन स्कूलों में भेजा जाता था, जहां उन्हें हिन्दी सीखने के साथ ईसाई मत के उपदेश भी सुनने पड़ते और बाइबिल की प्रति भी भेंट की जाती थी। मिशनरियों की इन गतिविधियों से हिन्दू और मुसलमान दोनों में ही यह धारणा घर कर गयी कि यह सब कम्पनी सरकार की मिलीभगत और इशारे पर हो रहा है।

यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि जहां हिन्दू व मुसलमानों के सम्भ्रान्त खाते पीते वर्ग में धर्म और मिशनरी की भूमिका को लेकर ये आशंकाएं व्याप्त थीं , वहीं शिक्षा, नौकरियों एवं न्याय व्यवस्था में समानता के अवसरों ने एक नये शिक्षित मध्य वर्ग के उदय की सम्भावनाओं को भी जन्म दिया था। 1817 में मराठा राज्य को ब्राह्मणवादी पेशवाशाही की गिरफ्त से मुक्त करके अंग्रेजों ने दलितों व निम्न जन में जिस आशा का संचार किया था, वह नयी चेतना का स्वरूप ग्रहण करने लगी थी। भारत में अंग्रेजी राज की यही वह परिवर्तनकारी भूमिका थी जिसे कार्ल मार्क्स ने ÷ इतिहास का अवचेतन उपकरण' (Unconscious tool of History) करार दिया था। भारत में भी जोतिबा फूले जैसे दलित समाज सुधारक अंग्रेजी राज में अन्तर्निहित इन सकारात्मक परिवर्तनों को रेखांकित कर रहे थे। इसका श्रेय अंग्रेजी राज को देते हुए जोतिबा फूले ने उस दौर में लिखा था, ÷... इस देश में अंग्रेजों की सत्ता कायम हुई और उनके द्वारा ये दलित लोग ब्राह्मणशाही की शारीरिक गुलामी से मुक्त हुए। इसीलिए ये लोग अंग्रेजी राजसत्ता का शुक्रिया अदा करते हैं। ये लोग अंग्रेजों के उपकारों को कभी भूलेंगे नहीं। उन्होंने इन्हें आज सैकड़ों साल से चली आ रही ब्राह्मणशाही की गुलामी की फौलादी जंजीरों को तोड़ करके मुक्ति की राह दिखाई है।'18 चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मी पण्डिता रमाबाई ने भी सती प्रथा को समाप्त करने के लिए अंगे्रज सरकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए लिखा था कि ÷ लार्ड विलियम बैण्टिक भारतीय गवर्नर जनरल थे। उनके पास वह नैतिक साहस था, जिससे वह 1829 का वह प्रसिद्ध कानून लागू करवा सके जो ब्रिटिश शासन में सती के धार्मिक रिवाज को प्रतिबन्धित करता था।'19

दलित व स्त्रियों के प्रति अंग्रेज शासकों की सकारात्मक भूमिका का स्वागत करने के साथ साथ जोतिबा फूले और पण्डिता रमाबाई दोनों ने ही अंग्रेजों के ब्राह्मण सत्ता से गठजोड़ की आलोचना भी की। जोतिबा फूले ने अपने एक लेख में लिखा था , ÷ अंग्रेज सरकार ने आज तक रॉयल और लोकल फण्ड का करोड़ों रुपया ब्राह्मण पुरोहित नाम की केवल एक जाति पर खर्च करके उन्हें विद्वान बनाया और सरकारी नौकरियों में उन्हें बड़ी बड़ी जिम्मेदारी के अधिकार पद देकर पूरी तरह से सुविधाभोगी बनाया है और इसका कारण भी यही हो सकता है कि ऐसे आपातकाल में ब्राह्मण विद्वान सरकार के लिए उपयोगी होंगे।'20 पण्डिता रमाबाई भी अंग्रेजी राज रूपी इस साधन की सीमाओं को जानती थीं, इसीलिए वे कह सकीं कि, ÷ हम ब्रिटिश सरकार को असहाय स्त्री की रक्षा नहीं करने के लिए दोष नहीं दे सकते, क्योंकि वे तो मात्र भारत के पुरुषों के साथ की गयी अपनी संधियों को ही पूरा कर रही है।... प्राचीन संस्थाओं के सिद्धान्तों एवं ताकतों के विरोध में जाकर... भारत में ब्रिटिश शासन का लाभ खतरे में पड़ जाएगा।'21 और सचमुच यही हुआ, जब ब्रिटिश शासन ने भारत की पुरातन सामन्ती संरचना व प्रथा में हस्तक्षेप किया तो 1857 की वह उथलपुथल हुई, जिससे ब्रिटिश शासन खतरे में पड़ गया।...

 

ना ईरान ने किया , ना शाह रूस ने

अंग्रेज को तबाह किया कारतूस ने

बहादुरशाह जफर की उपरोक्त पंक्तियां जिस कारतूस को अंग्रेजों की तबाही का कारण मानती हैं वह बेअसर हो जाता यदि उत्तर भारत की अंग्रेज सेना ( बंगाल नेटिव आर्मी) पर उच्च हिन्दू सवर्णों ( ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहारों) का आधिपत्य न होता। यद्यपि 1833 के सुधारों के फलस्वरूप सेना की संरचना में भी परिवर्तन आने लगा था, जहां 1815 में बंगाल पैदल सेना में 80 प्रतिशत सैनिक उच्च सवर्ण जाति के थे, वहीं 1842 तक आते आते यह संख्या कम होकर दो तिहाई हो गयी थी और 1857 के आसपास यह 55 से 60 प्रतिशत तक ही थी। इसका कारण उदारवादी नीतियों के चलते ÷ लार्ड विलियम बेण्टिक और उसके सलाहकारों का यह निष्कर्ष था कि ब्राह्मणों और राजपूतों द्वारा तैनाती के दौरान जाति श्रेष्ठता के मुद्दों को अधिक वरीयता देना सेना के अनुशासन के लिए गम्भीर खतरा था।'22 अतः सेना में अन्य वर्गों को शामिल करने के लिए 1834 में ÷ जनरल आर्डर' जारी कर वह सरकारी प्रतिबन्ध हटा लिया गया ÷ जिसके अनुसार मुसलमानों में कुछ समुदायों एवं हिन्दुओं में अहीर, भाट, कायस्थ और कुर्मियों की भर्ती पर रोक थी।'23 बंगाल सेना में उच्च जातियों का एकाधिकार 1840 के दशक में तब और कमजोर हुआ, जब पंजाब की सीमा की रक्षा के लिए सिख इन्फैन्ट्री की दो स्थानीय रेजीमेण्टों का गठन कर, इसमें पठान, पंजाबी, मुसलमान, सिख और सभी जातियों के हिन्दू शामिल किये गये। दरअस्ल इन नयी रेजीमेण्टों के गठन के मूल में ब्राह्मण और राजपूत सैनिकों का वह आक्रोश था, जो उन्होंने अपना बट्टा भत्ता छीनने पर दिखाया था। यह भत्ता ब्रिटिश नियंत्रण के बाहर के इलाकों में तैनाती के दौरान सैनिकों को दिया जाता था। उच्च वर्ण सैनिकों के एकाधिकार को तोड़ने के अपने इरादे को तत्कालीन कमाण्डर इन चीफ सर चार्ल्स नैपियर ने लार्ड डलहौजी को 27 फरवरी 1850 को लिखे गये अपने पत्र में इन शब्दों में व्यक्त किया था, ÷ मैंने यह पक्का इरादा कर लिया था कि इन ब्राह्मणों को मैं दिखा कर रहूंगा कि सेना में भर्ती उनके द्वारा नहीं नियंत्रित की जाती।'24

बंगाल प्रेसीडेन्सी की सेना में उच्च जातियों के एकाधिकार को सबसे बड़ा आघात तब लगा जब नये गवनर जरनल लार्ड कैनिंग ने 1856 में यह आदेश दिया कि सेना में होने वाली सभी भर्तियां अब ÷ जनरल सर्विस' के लिए होंगी। यानी कि अब समुद्र पार की सैन्य कार्रवाईयों पर भेजा जाना सैनिकों के लिए ऐच्छिक नहीं रह सकेगा। इसके पूर्व ÷ बंगाल आर्मी के ब्राह्मण व राजपूत सिपाहियों के धार्मिक संस्कारों को दृष्टिगत रखते हुए समुद्र पार की सैन्य कार्रवाईयों में शामिल होने के लिए उनकी इच्छा अनिच्छा का ध्यान रखा जाता था।'25

सेना में भर्त्ती के इस नये निर्देश से बंगाल आर्मी की नयी सेवा शर्तें बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सी की सेनाओं के समकक्ष हो गयी थीं। यद्यपि यह नया ÷ जनरल इनलिस्टमेण्ट एक्ट' नयी भर्तियों पर ही लागू था, लेकिन बंगाल आर्मी, जहां अवध के सवर्णों की बहुतायत थी, में यह आशंका व्याप्त कर गयी थी कि अंग्रेज इस नये सैन्य कानून से उनके धर्म को भ्रष्ट कर देना चाहते थे। यह डर स्वाभाविक भी था, क्योंकि इसके पूर्व अफगान युद्ध में जिन उच्च सवर्ण हिन्दुओं ने भाग लिया था, उन्हें सिन्धु नदी पार करने व मुस्लिम देश में रहने के कारण अपनी जाति से बहिष्कृत कर दिया गया था। सूबेदार सीताराम पांड़े ने जाति से बहिष्कृत होने का दंश कुछ यूं व्यक्त किया हैः

÷÷ हमरे साथ अबहीं तक अछूतन वाला ब्यौहार होत रहा। हमसे खाली मुसलमान, ईसाई नगाड़ची औ बाजा बजाने वाले बोलत बतियात रहे। हमरे लगे यतना पइसा नहीं रहा कि हम ऊ दइकै अपने जात मा आइ जाई।'' 26

धर्म और जाति भ्रष्ट होने को लेकर 1806 में वेल्लोर के सैनिकों ने विद्रोह कर अपनी आहत भावनाओं का परिचय पहले ही दे दिया था। सैनिकों में इतनी संवेदनशीलता थी कि 1824 मंें बैरकपुर छावनी की तीन टुकड़ियों ने समुद्र पार कर बर्मा के युद्ध में शामिल होने से मना कर दिया और ÷ इसी को लेकर बैरकपुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह किया, जिसके दमन के दौरान दो सौ सैनिक मारे गये और बारह को फांसी दी गयी थी। इसी दौरान रंगपुर ( असम) में भी बर्मा मोर्चे पर भेजे जाने को लेकर सैनिकों ने विद्रोह किया था। वेल्लोर, बैरकपुर और रंगपुर तीनों ही स्थानों पर सैनिकों ने जाति भ्रष्ट होने के प्रश्न पर विद्रोह किया था।'27 यह भी अजब संयोग है कि जिस बैरकपुर छावनी में जाति भ्रष्ट होने के सवाल पर इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों को मारा और फांसी चढ़ाया गया था, वहीं 1857 के शुरुआती दिनों में यह अफवाह फैली कि अब सेना में ऐसे कारतूस बांटे जा रहे हैं, जिन पर गाय और सुअर की चर्बी मढ़ी है। इस अफवाह का रोचक वर्णन गदर के चश्मदीद गवाह विष्णु भट्ट गोडसे ने ÷ मांझा प्रवास' शीर्षक अपने संस्मरणों में निम्नवत्‌ किया है :

÷÷ अंग्रेज सरकार आज तक तो अच्छी तरह से राज्य करती आयी, परन्तु अंग्रेजों की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है। पिछले साल विलायत से बढ़िया कमानीदार बन्दूकें आयीं। उनके लिए कारतूस भी तैयार किये गये। वे दांत से तोड़ने पड़ते थे। एक छावनी में ऐसी घटना घटी कि एक ब्राह्मण सिपाही स्नान करने के लिये कुएं पर गया, वहां एक चमार ने उससे पानी पीने के लिए लोटा मांगा। ब्राह्मण बोला; ÷ मैं तुझे लोटा दूंगा तो वह भ्रष्ट हो जाएगा।' यह सुन कर चमार गुस्से में बोला, ÷ अरे जाओ जाओ। बहुत जात की डींग मारते हो। इधर जो कारतूसें तैयार होती हैं, उनमें गाय और सुअर की चर्बी लगती है; वह चर्बी हम ही तैयार करके देते हैं, और तुम लोग उसे मुंह से लगाते हो। फिर बेकार में धर्म का घमण्ड क्यों करते हो?' इन सब बातों से बड़ी गर्मा गर्मी बढ़ गयी और मारपीट की नौबत आ गयी। गाय की चर्बी से हिन्दू और सुअर की चर्बी से मुसलमान बड़े नाराज हो गये। सरकार अपनी चालबाजियों से सबको क्रिस्तान बनाना चाहती है; यह डर सबके मन में समा गया और सब लोग अपने अपने धर्मों की रक्षा का विचार करने लगे'' । 28

ब्राह्मण सैनिक व दलित खलासी के बीच घटित उपरोक्त प्रकरण 22 जनवरी 1857 का है क्योंकि उसी दिन शाम की परेड में बैरकपुर डिपो की दो तिहाई भारतीय सेना ने, जिनमें अधिकारी भी शामिल थे, कथित चर्बीयुक्त कारतूसों को लेकर अपनी आपत्ति प्रकट की थी और चर्बी के बदले मोम और तेल के विकल्प का सुझाव दिया था। चर्बीयुक्त कारतूसों की इन अफवाहों पर फौरन कार्रवाई करते हुए अंग्रेज सेना के मिलेट्री सेक्रेटरी ने ÷27 जनवरी को आदेश दिया कि कारतूसों में पहले से चिकनाई का लेप न किया जाए और सिपाही जैसी ग्रीज चाहें स्वयं इस्तेमाल करें।'29 यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यूं तो विधिवत्‌ इस तथ्य की कभी पुष्टि नहीं हुई कि ग्रीज में गाय और सुअर की चर्बी का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन परिस्थितिगत साक्ष्यों को दृष्टिगत रखते हुए गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने यह स्वीकार किया था कि ग्रीज की समस्या का ठोस आधार है। 23 फरवरी 1857 के ÷ दि टाइम्स' ( लन्दन) में प्रकाशित एक समाचार के अनुसारः

÷÷ नयी एनफील्ड राइफल के कारतूसों के एक सिरे पर ग्रीस का इस्तेमाल किया जाता है ताकि वे आसानी से बैरल में जा सकें। सरकार ने इसके लिए मटन का आदेश दिया था। लेकिन कुछ ठेकेदारों ने ज्यादा मुनाफे के लिए सुअरों और बछड़ों का इस्तेमाल किया। उल्लेखनीय यह है कि चर्बी की आपूर्ति एक ब्राह्मण बंगाली ठेकेदार द्वारा की जाती थी और उसके आदमियों द्वारा बाजार में उपलब्ध सस्ते माल की सप्लाई से इंकार नहीं किया जा सकता।'' 3 0

उपरोक्त परिस्थितियों के चलते अंग्रेज अधिकारियों द्वारा चर्बी युक्त कारतूस की चर्चा का खण्डन करने के सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए और सैनिक छावनियों में रात्रिकालीन बैठकों में यह गहन चर्चा का विषय बने। सम्भवतः इन विचार विमर्शों का ही परिणाम था बैकरपुर छावनी की 43 वीं रेजीमेण्ट के कमाण्डर मेजर मैथ्यूज के पास सैनिकों द्वारा गोपनीय तरीके से पहुंचाया गया वह प्रतिवेदन जिसमें मुख्यतः निम्न मुद्दों को उठाया गया थाः

÷÷ पूरी छावनी की ओर से हमारा यह प्रतिवेदन है कि हम अपना धर्म नहीं छोडं+ेगे। हम अपने मरजाद और धर्म के लिए नौकरी करते हैं; अगर हम अपना धर्म खो देंगें तो हिन्दू और मुसलमान धर्म समाप्त हो जाएगा। ... आप इस मुल्क के मालिक हैं। कम्पनी से हुक्म पाकर लार्ड साहब ने सारे कमाण्डिग अफसरों को हमारे मुल्क के धर्म और दीन को नष्ट करने का आदेश दिया है। हम यह जानते हैं क्योंकि यह सब सरकार द्वारा किया जा रहा है। साल्ट डिपार्टमेण्ट के अफसरों द्वारा नमक में हड्डी मिलायी जाती है। तीसरी बात यह है कि शकर के इंचार्ज साहब हड्डियों को गला कर शकर की चासनी में मिलाते हैं, यह सबको मालूम है, सब जानते हैं। चौथी यह कि इस मुल्क में बड़े साहिबों ने राजा, ठाकुर, जमींदार, महाजन और रैय्यत सभी को साथ खाने का आर्डर दिया है और उनके पास अंग्रेजी रोटी भेजी गयी है, यह भी सब जानते हैं। और दूसरा मसला यह कि सारे मुल्क में इज्जतदार लोगों की विधवाओं, खासकर हर तबके की हिन्दू औरतों को पुनर्विवाह की छूट दी जा रही है। इसलिए हम खुद को मृत समान समझ रहे हैं। कोई राजा या जो कोई भी अन्याय करता है, रह नहीं पाता। जहां तक सिपाहियों का सवाल है वे आपके नौकर हैं, लेकिन उनकी जाति को नष्ट करने के लिए चर्बी वाले कारतूसों को दांत से काटने का फैसला लिया गया, यह भी जगजाहिर है। हम जनरल साहब को यह बता देना चाहते हैं कि हमें यह नयी कारतूस मंजूर नहीं है और सिपाही इन्हें इस्तेमाल नहीं कर सकते। आप मुल्क के मालिक हैं, अगर आप हमें फौज सें आजाद कर देंगें तो हम अपने वतन चले जाएंगें।'' 31

बैरकपुर छावनी के सिपाहियों के बीच व्याप्त इस असन्तोष को मेजर जनरल हर्सी ने ÷ विस्फोट के लिए बिछी सुरंग' करार देते हुए असैनिक तत्वों को भी इसके लिए उत्तरदायी माना जिनमें कलकत्ता की कट्टर ब्राह्मणपन्थी संस्या ÷ हिन्दू धर्म सभा' भी शामिल थी। लार्ड कैनिंग ने अवध राज के कुछ उन दरबारियों को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जो फरवरी 1856 में अवध की सत्ता अपहरण के बाद कम्पनी सरकार के विरुद्ध सक्रिय थे। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि बैरकपुर छावनी जहां यह असन्तोष अधिक मुखर था, वहां बड़ी संख्या में 19 वीं व 34 वीं रेजीमेण्ट के वे सिपाही भी थे, जो वाजिद अली शाह को हटाये जाने के दौरान लखनऊ में ही तैनात थे। उनके मन पर सत्ता हस्तांतरण का जो भी असर हुआ हो, लेकिन इसकी मुखर अभिव्यक्ति उन्होंने उन दिनों नहीं की थी। सूबेदार सीताराम पांड़े की निम्नलिखित टिप्पणी इस सम्बन्ध में दृष्टव्य हैः

÷÷ एक अफवाह ई चलि गय रही कि सरकार अवध पै पूरै कब्जा करै वाली है। एहसे फौज वाले बहुतै खुस होइ गये काहे कि ज्यादा सिपाही तौ अवधै के रहे। अवध पै कब्जा होइ गय और केहू चीं चूं नाय किहिस।'' 32

दरअस्ल कम्पनी सेना में होने के कारण अवध के सिपाहियों को कुछ विशेषाधिकार मिले हुए थे। ÷ उन्हें यह; अधिकार प्राप्त था कि अवध के नवाबी राज्य में अगर स्वयं या उनके परिवार के हितों पर किसी तरह की आंच आती है तो वे ब्रिटिश रेजीडेण्ट के पास पेटिशन दे सकते थे। ब्रिटिश रेजीडेण्ट का प्रतिनिधि उनके वकील की भूमिका में स्थानीय अदालतों में उनका पक्षकार होता था। इन अदालतों के देशी जजों पर वकील के रूप में अंग्रेज रेजीडेण्ट के रुतबे का ही परिणाम था कि शायद ही अवध का कोई प्रतिष्ठित परिवार हो जिसका एक प्रतिनिधि सेना में न हो।'33 वे पीढ़ी दर पीढ़ी इस विशेषाधिकार से लाभान्वित होते आये थे। सूबेदार सीताराम पांड़े ने भी सेना में अपनी भर्त्ती को लेकर इसी आशय की स्वीकारोक्ति की हैः

÷÷ वहि समय बाबू के खिलाफ 400 पेड़ कै आम कै एक बगीचा के बारे मा मुकदमा चलत रहा और वै सोचिन कि एक लड़िका कम्पनी बहादुर के नौकरी मा रही तौ लखनऊ के अदालत मा मामला कै सुनवाई होइ जाई। ई बात सबका पता रही कि अगर कौनो सिपाही कै अर्जी ओकर अफसर दस्खत कइकै लखनऊ मा रेजीडेण्ट साहब का भेजि देय तो वह पै जल्दी सुनवाई होय जात रही और वह कै वजन घूस से या रियासत के कौनो और मनई के बात से ज्यादा होत रही।'' 34

वाजिद अली शाह के सत्ताच्युत होने के बाद अवध के सिपाहियों का यह विशेषाधिकार जाता रहा , कारण यह कि अब कम्पनी का रेजीडेण्ट सिपाहियों का पक्षकार एडवोकेट न रह कर स्वयं निर्णायक भूमिका में आ बैठा था। कम्पनी राज के हितों की रक्षा के लिए उसे अपने ही सिपाहियों के विरुद्ध निर्णय लेने पड़ सकते थे। इन दिनों अवध इलाके के कम्पनी सैनिकों की नाराजगी का एक कारण वह नया भूमि बन्दोबस्त भी था जिसके द्वारा तालुकेदारों व जमीदारों को बेदखल करके भू स्वामी से सीधे लगान वसूलने की व्यवस्था लागू की गयी थी। इस नयी व्यवस्था से अकेले अवध में लगभग इक्कीस हजार तालुकेदार जमीदार बेदखल हो गये थे और इस नयी व्यवस्था से खाते पीते किसान भी सन्तुष्ट नहीं थे, क्योंकि तयशुदा राशि की यह लगान व्यवस्था उन्हें साहूकारों के चंगुल में फंसने के लिए विवश करती थी। अवध के गांवों में व्याप्त यह असन्तोष इन इलाकों से गये कम्पनी सेना के सैनिकों को भी संतप्त कर रहा था। फलस्वरूप इस इलाके के 14000 सैनिकों ने इस नयी भूमि व्यवस्था के विरोध में कम्पनी सरकार को ज्ञापन भी दिया था। सूबेदार सीताराम पांड़े ने इन हालात पर निम्नवत टिप्पणी की हैः

÷÷ तालुकदार और मुखिया लोग सरकार के खिलाफ रहे। वै सबका समझावत घूमत रहे कि सरकार उलटा सीधा कानून बनाइ कै सबकै जमीन हड़पि लेई और कगजे मा ई देखाइ दिहा जाई कि ऊ जमीन जायदाद ओनकै कब्बौं रहबै नहीं किही। अवध मां बहुत जने दायें बायें कइकै खुब जमीन हथियाये रहे और यही से डेरान रहे कि कहूं सरकार ओकै तफतीस आडर कइकै खोजौ न करै लागै। ओनके सबकै बड़ा बड़ा परिवार रहे, मुलाजिम रहे, नौकर रहे। उहसे पता चलत है कि अवध मा वहि जमाना का यस हबड़ दबड़ काहे मची रही। यही कै असर सरकार के फौजौ पै परत रहा।'' 35

1857 के शुरुआती महीनों में अवध के गावों में व्याप्त इस असन्तोष व सेना के चर्बी लगे कारतूसों की चर्चा के साथ कुछ अन्य अफवाहों का बाजार भी गर्म था। इन दिनों रहस्यमय तरीके से एक गांव से दूसरे गांव चौकीदारों के द्वारा चपाती घुमाये जाने की खबर को लेकर अटकलें लगायी जा रही थीं। कुछ का कहना था कि यह किसी आसन्न संकट को टालने का टोटका है तो कुछ इसे कालरा की महामारी से बचने के लिए दैवी शक्तियों को मनाने का उपक्रम मान रहे थे। दिल्ली के पहाड़गंज थाने के कोतवाल मोईनुद्दीन हसन ने सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में निम्नांकित विवरण प्रस्तुत कियाः

÷÷ जब मराठों का शासन बदला था तो कई महीने पहले इसी तरह रोटी और चने का साग गांव में बाटा गया था, यह बात मैंने अपने बाप से सुनी थी। मेरे विचार से यह ÷ चपाती का विवरण' किसी विद्रोह के होने का पता देता है।'' 36

ब्रिटिश जासूस जाटमल जो दिल्ली का निवासी था , के अनुसार जहां कुछ लोग चपातियों को अनिष्ट निवारण का उपक्रम मानते थे, वहीं कुछ दूसरे लोग इसे सरकार द्वारा ईसाईयत थोपने और यह बताने का माध्यम मानते थे कि भविष्य में हिन्दुस्तानियों को ईसाईयों की तरह का भोजन और धर्म अपनाना पड़ेगा। यह चर्चा भी थी कि छावनी छावनी में कमल का फूल और बैंगन के पत्ते भी घुमाये जा रहे थे और सिपाहियों के कान में ÷ सब लाल हो जाएगा' का सन्देश दिया जा रहा था। घरों घरों पर खास तरह के निशान लगाये जाने, बाजारों में नये ताबीज बिकने और गांव गांव में फकीरों और मौलवियों द्वारा फिरंगियों के खिलाफ प्रचार किये जाने की भी कानाफूसी लोगों के बीच थी। ÷ निश्चित रूप से सत्ता से बेदखल राजा महाराजे, उनके कारिन्दे और आन्दोलनकारी इस दौर में सक्रिय थे और हिन्दुस्तानी सिपाहियों को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि ब्रिटिश अब अजेय नहीं रहे, जैसा कि अफगान युद्ध से सिद्ध हो चुका है और यह भी कि महारानी विक्टोरिया ने लार्ड कैनिंग को विशेष रूप से उन्हें ईसाई बनाने के लिए भेजा है। इसमें यह चेतावनी भी शामिल थी कि अब समुद्र पार की लड़ाइयों में भेज कर उनका धर्म और जाति भी नष्ट की जाएगी। और यह भी कि क्रीमिया के युद्ध में जो अंग्रेज मारे गये हैं, उनकी विधवाओं को हिन्दुस्तान भेजा जा रहा है और बड़े बड़े जमींदारों से जबरन उनका विवाह कराया जाएगा ताकि उनकी रियासतों पर ईसाइयों का कब्जा होजाए।'37 इसके साथ ही हिन्दू ज्योतिषियों की यह भविष्यवाणी भी चर्चा का विषय थी कि अंग्रेजी राज के 1857 में सौ साल पूरे होने पर इसका अन्त हो जाएगा। सूबेदार सीताराम पांड़े के शब्दों में:

÷÷ अवध कै नवाब और दिल्ली कै बादसाह मुलुक भर मा आपन मनई भेजि कै ई अन्दाजा लगावै कै कोसिस करै लागे कि फौज मा सरकार के खिलाफ केतना गुस्सा है। वै जाइ जाइ कै सिपहियन से कहत रहे कि सरकार बादसाह के साथे धोखा किहिस है। वै हजारन झूठ बाति गढ़ि कै सिपाहियन का समझाइन कि वै अंगरेजन के खिलाफ बगावत कइ देंय। वै कहिन कि येसे दिल्ली के बादसाह फिर गददी पै बैहठि जइहैं और सब ठिकाय जाई। वै सबसै कहिन कि सब सिपाही एकट्ठा होइ जाएं और जौन ओनसे कहा जाय उहै करैं तौ ई काम होय सकत है। एक रोज ऊ हम्मै बादसाह के हुकुमनामा देखाइस। वह मा सिपहियन से कहा गय रहा कि वै बगावत कइदेंय और अंगरेज का तबाह कइ डारैं। ... वह मा एक बात और रही कि अंगरेज सरकार कुल बरहमनन का किरिस्चन बनावै चाहत है और ऐकरे खातिर सौ ठू पादरी अवध मां भेजा जाय वाला है। जात बिगाडै+ खातिर सबका गाय और सुअर कै मांस खियावा जाई।'' 38

अवध के गांवों से लेकर सेना की छावनियों तक विस्तृत यही वह वातावरण था जिसमें चर्बीयुक्त कारतूस का मुद्दा अन्तिम चिंगारी सिद्ध हुआ।

चर्बी लगे कारतूस से धर्म जाति भ्रष्ट होने के सवाल पर पहली आक्रोशमय प्रतिक्रिया अवध के मंगल पाण्डे की थी , जो बंगाल सेना की 34 वीं रेजीमेण्ट की पांचवीं कम्पनी के सिपाही थे और बैरकपुर छावनी में तैनात थे। लेकिन मंगल पाण्डे की यह प्रतिक्रिया 1824 में जाति भ्रष्ट होने की आशंका से व्यक्त उस सामूहिक रोष से भिन्न थी जिसमें 200 हिन्दुस्तानी सैनिक मारे गये थे और बारह को फांसी की सजा दी गयी थी। संयोग यह कि बैरकपुर छावनी के जिस परेड ग्राउण्ड में यह नृशंस गोलीकाण्ड हुआ था, उसी मैदान में मंगल पाण्डे ने अंग्रेज अफसरों पर गोली चला कर अपना आक्रोश व्यक्त किया था। ध्यान देने की बात यह है कि मंगल पाण्डे के आहृवान के बावजूद 29 मार्च 1857 की इस घटना में किसी हिन्दुस्तानी सैनिक ने उनका साथ न दिया। बाद में इतिहासकारों ने अलग अलग घटनाओं को इतिहासबद्ध करते हुए जिस तरह मंगल पाण्डे प्रकरण को 1857 के विप्लव की शुरुआत करार दिया है, उस पर ठहर कर विचार करने की आवश्यकता है। क्या 10 मई 1857 को मेरठ में जो कुछ हुआ वह 8 अप्रैल को मंगल पाण्डे को फांसी दिये जाने का परिणाम था? यदि ऐसा था तो बैरकपुर की छावनी में जहां मंगल पाण्डे को सारे सैनिकों के समने सरेआम फांसी दी गयी वहां इसकी उग्र प्रतिक्रिया तुरन्त या बाद में क्यों नहीं हुई? हुआ यह कि मंगल पाण्डे प्रकरण के परिणामस्वरूप अंग्रेज अधिकारियों ने मंगल पाण्डे की समूची 34 वीं बटालियन को संदिग्ध मानते हुए 21 अप्रैल को निःशस्त्र एवं भंग कर दिया था। लेकिन सिपाहियों ने परेड ग्राउण्ड छोड़ने के पहले अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति मात्र अपनी टोपियों को पैरों से कुचल कर की थी। यह वास्तव में अचरजकारी है कि जब समूचा उत्तर भारत सैन्य विद्रोह की लपटों में झुलस रहा था तो बैरकपुर की छावनी कलकत्ता की ही तरह शान्त थी।

विनायक दामोदर सावरकर ने मंगल पाण्डे को 1857 का पहला शहीद करार देते हुए उन्हें विद्रोह का सूत्रधार करार दिया है। लेकिन रुद्रांक्षु मुखर्जी का अभिमत है किः

÷÷ राष्ट्रवाद अपने मिथक गढ़ता है और मंगल पाण्डे उसी कल्पना के परिणाम हैं। मंगल पाण्डे के मन में देशभक्ति या भारत की कोई अवधारणा नहीं थी। उनके लिए उनका मुल्क अवध का अपना गांव था और वतन भूमि का वह छोटा सा भाग जिस पर उनके पुरखे खेती करते आये थे। उनके ऊपर देशभक्ति थोपना उन्हें उनके समय और सन्दर्भ से अलग करना है। यदि वे देशप्रेम से संचालित होते तो अंग्रेजों की सेना के सिपाही तो कतई न होते।'' 39

रुद्राक्षु मुखर्जी का यह मत सही ही है कि यदि मेरठ में सेना की बगावत न होती तो मंगल पाण्डे प्रकरण पर उसी तरह धूल पड़ जाती जिस तरह 1824-25 के बैरकपुर काण्ड पर। और यदि दिल्ली का पतन न हुआ होता तो मेरठ का विद्रोह भी भारत में विद्रोहों के इतिहास का एक अध्याय भर होता।

 

अंगरेजन के पलटनि सगरी , बैरक बैरक से भागि चललि

 

उत्तर भारत की अधिसंख्य सैनिक छावनियों की तरह मेरठ में भी चर्बीयुक्त कारतूसों की अफवाहें सरगर्म थीं। मेरठ की सैन्य छावनी में इन कारतूसों की चर्चा का यह असर हुआ कि मुस्लिम सिपाहियों ने कुरान और हिन्दू सिपाहियों ने गंगा जल लेकर शपथ ली कि वे इन कारतूसों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। सेना के अंग्रेज अधिकारियों ने इस मसले को गम्भीरता से लेते हुए उच्च अधिकारियों को आगाह किया कि यद्यपि कारतूसों में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है , फिर भी छावनी का वातावरण विस्फोटक है और यदि समय रहते उचित सुधारात्मक उपाय न लिये गये तो आधे घण्टे में बगावत हो सकती है। लेकिन जिस कर्नल जार्ज स्मिथ को इस पर प्रभावी कारवाई करनी थी, वह अत्यन्त बदमिजाज और जिद्दी था। उसकी सोच थी कि जब कारतूसों में कुछ भी गड़बड़ नहीं है तो सिपाहियों को इसे इस्तेमाल करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। परिणामस्वरूप 24 अप्रैल 1857 को मेरठ ग्राउण्ड में परेड के दौरान नब्बे सिपाहियों के बीच ये कारतूस बांटे जाने थे। सिपाहियों ने इन कारतूसों को लेने से मना कर दिया। ÷ हर सिपाही यही कहता कि यदि सब लेंगे तो हम भी ले लेंगे। इनमें 48 मुसलमान और 37 हिन्दू शामिल थे। जिन पांच गैर कमीशन अधिकारियों ने कारतूस लिये उनमें तीन मुसलमान और दो हिन्दू थे।'40

सेना के आदेश का उल्लंघन करने के अपराध में कारतूस न लेने वाले इन 85 सैनिकों का कोर्ट मार्शल किया गया और उन्हें 10 वर्ष के कठोर सश्रम कारावास का दण्ड दिया गया। इस दण्ड की पुष्टि करने वाले 15 हिन्दुस्तानी सदस्यों के पैनल में से मात्र एक को छोड़ कर चौदह ने इस दण्ड की पुष्टि की। 9 मई 1857 को सभी सजायाफ्ता सैनिकों को परेड ग्राउण्ड में हाजिर कर मेरठ में तैनात ÷ समूची सेना के अधिकारियों व सैनिकों के सामने वर्दी और पेटी उतरवायी गयी। सभी के पैरों में बेड़ियां डाली गयीं। अधिसंख्य ने चुपचाप इस बर्ताव को सह लिया, लेकिन कुछ ने चीख चीख कर कोसते हुए अंग्रेज फौजों से बदला लेने का इरादा जाहिर किया और वहां उपस्थित हिन्दुस्तानी सैनिकों को उनकी कोई मदद न करने के लिए लानत मलामत की। बाद में जेल ले जाते समय कुछ ने अंग्रेजों पर जूते भी फेंके। कुछ पुराने सिपाही, जिन्होंने जान की बाजी लगा कर अंग्रेज मालिकों के लिए कई युद्ध लड़े और मेडल जीते थे, फूट फूट कर रोये, अपने दुर्र्भाग्य को कोसा और अंग्रेज अफसरों से मदद की याचना की। कुछ नौजवान सैनिक भी इसमें शामिल थे। एक अंग्रेज अफसर के अनुसार इससे अधिक हृदयद्रावक दृश्य उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था।'41

सैनिकों के पैरों में बेड़ियां डाल कर जेल ले जाए जाने की मेरठ के छावनी इलाके और बाजार में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। वेश्याओं तक ने बचे हुए हिन्दुस्तानी सैनिकों पर अपने साथियों के लिए कुछ न करने पर व्यंग्य कसे। अगले दिन 10 मई को यह खबर फैल गयी कि सभी हिन्दुस्तानी सिपाहियों से शस्त्र रखवा लिए जाएंगे। अफरातफरी के इस वातावरण में मेरठ छावनी के सिपाहियों ने शस्त्रघर पर हमला करके हथियारों पर कब्जा कर लिया और नयी जेल में बन्द अपने साथियों को छुड़ाने के अभियान में शामिल हो गये। जेल से अपने साथियों को मुक्त कराने के बाद पुरानी जेल पर हमला बोल कर सारे कैदियों को साथ लेकर सबने मिल कर अंग्रेजों पर हमला बोल दिया और छावनी व बाजार जहां कोई अंग्रेज दीखा उसे मौत के घाट उतारने का सिलसिला शुरू हो गया। ÷ उस अवसर पर जो अधिकारी सैनिकों को समझाने बुझाने आये उनमें से अधिकतर मारे गये और शहर व देहात के बदमाश लोग भी इन फसादियों के साथ मिल गये। बड़ा रक्तपात और लूटपाट हुई। फसादियों और शहर व देहात के बदमाशों ने अत्यधिक अत्याचार किया। रात को गोरों की सेना तोपखाने सहित फसादी सिपाहियों को सजा देने के लिए छावनी में आयी। छावनी में कोई फसादी सिपाही नहीं मिला क्योंकि वह लोग गोरी सेना के पहुंचने से पहले ही मेरठ शहर में चले गये थे। इसके बाद फसादी सेना जो शहर मेरठ से दिल्ली को जा रही थी, उसने रास्ते में ईसाई यात्रियों को मारा और डाकबंगलों आदि को जलाया और यही करते हुए वह सुबह दिल्ली में यमुना नदी के पुल पर पहुंची।'42

यहां प्रश्न यह है कि क्या मेरठ की बगावत की कोई पूर्व योजना थी ? सामान्य धारणा है कि यह तब शुरू हुआ जब यह चर्चा शुरू हुई कि 10 मई की शाम सभी हिन्दुस्तानी सिपाहियों को निःशस्त्र कर दिया जाएगा। कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार मेरठ की छावनी में बगावत के एक महीने पूर्व एक रहस्यमय फकीर सैनिकों के बीच अक्सर देखा गया था, जिसे मैजिस्टेट के आदेश से छावनी के बाहर निकाला गया था। इसी फकीर ( मौलवी) को कुछ दिन पूर्व अम्बाला छावनी में देखा गया था। कहा जाता है कि ये मौलवी फकीर अब्दुल्लाह शाह थे, जो छावनियों में घूम घूम कर ÷ दीन' को बचाने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिकों को तैयार कर रहे थे। सारे घटनाक्रम को देख कर ऐसा लगता है कि कुछ ऐसे लोग जरूर थे जो सैनिकों, अवध के पूर्व दरबारियों एवं दिल्ली के असंतुष्ट तत्वों के बीच सम्पर्कसूत्र का कार्य कर रहे थे। मोईनुद्दीन हसन की राय थी कि ÷ यह सब रेजीमेण्ट न. 70 के उस गोरा सिपाही की कारस्तानी थी, जो अब्दुला बेग के नाम से जाना जाता था, जिसे सेना से निकाल दिया गया था। वही विद्रोही सेना का सरगना और सलाहकार था।'43 सूबेदार सीताराम पाड़े का कहना था कि ÷ गदर कै आग मुसलमान लगाइन और हिन्दू भेड़ी यस ओनके पीछे पीछे नदी मा चला गये। बगावत कै असल कारन ई रहा कि सिपाहिन का ताकत कै नसा होइ गय रहा और अफसरन के लगे ओन्है रोकै कै ताकत नहीं रही।'44

जब मेरठ के बागी घुड़सवार 11 मई की सुबह दिल्ली पहुंचे और दीन पर मरने की कसम खाते हुए बादशाह से अंग्रेजों के खिलाफ मदद की फरियाद करने लगे तो भयभीत बहादुरशाह जफर की पहली प्रतिक्रिया अंग्रेज कमाण्डर कैप्टेन डगलस को बुला कर महल की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबन्द करने की थी। लेकिन दोपहर होते होते जब बागियों द्वारा अंग्रेज अफसरों व ईसाइयों को मारने का सिलसिला शुरू हो गया तो सारी व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। मोईनुद्दीन हसन कोतवाल की भूमिका का निर्वाह करते हुए बहादुरशाह जफर के पास गये और कहा, ÷ इसलिए हाजिर हुआ हूं कि अंग्रेज हाकिम बागियों के हाथों कत्ल हुए हैं और शहर लुट रहा है। जो कोई अंग्रेज मेम, बच्चे व ईसाई उन्हें मिलता है, कत्ल कर देते हैं। बड़ा जुल्म हो रहा है, हुजूर इस समय शहर के लिए कोई इंतजाम करें। यह सुन कर बादशाह ने कहा कि ÷ मेरे सारे आदमी न मालूम कहां भाग गये हैं? मैं अकेला हूं मेरे पास सिपाही भी नहीं हैं, मैं क्या इंतजाम कर सकता हूं, मैंने निवेदन किया कि अंग्रेजों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए जो भी हो सकेगा मैं करुंगा बादशाह ने कहा कि,÷ मुझे तुमसे ऐसी ही उम्मीद है। तुम इस आफत के वक्त मेरे पास आये हो जो ठीक समझो करो'45 बादशाह की सहमति प्राप्त कर मोइनुद्दीन हसन ने लगभग पचास यूरोपियन औरतों व बच्चों की जान बचाने के लिए किले की एक अंधेरी कोठरी में छिपा दिया। लेकिन बागियों ने बादशाह पर इतना दबाव बनाया और अंग्रेजों से मिलीभगत का आरोप लगाया कि अंततः इन अंग्रेज औरतों व बच्चों को उनके सुपुर्द करना पड़ा और वे बागियों के हाथों कत्ल होने से बचाये न जा सके। बादशाह ने उन्हें बचाने के लिए बागियों से मिन्नतें भी कीं रोये भी लेकिन उन्होंने कहा कि हम इन्हें यहीं महल में ही कत्ल करेंगे ताकि मौका आने पर अंग्रेजों के सामने इस जुर्म के गुनहगार तुम भी होगे।

बहादुर शाह जफर की बेबसी तब देखने वाली थी जब बागी सिपाही उन्हें ÷ ऐ बादशाह, ऐ बुड्ढे' सम्बोधित करते हुए उनकी दाढ़ी तक पर हाथ लगा देते थे और बादशाह इसकी शिकायत अकेले में अपने नौकरों से करके अपना मन हल्का कर लेते थे। विडम्बना यह थी कि इन्ही बागियों ने उन्हें एक दिन पहले अपना नेतृत्व प्रदान करने के लिए मान मनौव्वल की थी। ÷ बादशाह अब उन लोगों के हाथ में कठपुतली थे जो उनके इशारे पर खुशी खुशी हुक्म बजाया करते थे लेकिन अब बरबादी और दंगे के इस दौर में जब हुक्मउदूली कीे हवा शहर के हर तबके में फैली हुई थी तो उन्हीं लोगों को बादशाह का मजाक उड़ाते और बेहुरमती करते शर्म न आती थीं।'46 लेकिन अभी भी उन्हें किले से बाहर आते जाते इक्कीस तोपों की सलामी देने का चलन बदस्तूर जारी था।

 

÷ अंग्रेजन के गुलाम राजा तिनके हम गुलाम'

 

÷ बुदेलखण्ड की जनता रोवै , भयै राजा अत्याचारी अंग्रेजन के गुलाम राजा, तिनके हम गुलाम भारी।' बुंदेलखण्डी लोकगीत की ये पंक्तियां 1857 के पूर्व उन सभी देशी राज्यों व रियासतों पर लागू होती हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी न किसी रूप में अंग्रेजों के साथ सन्धि से जुडे+ हुए थे। बहादुरशाह जफर हिन्दुस्तान के एक ऐसे ही शहंशाह थे, जिनका राज्य अब सिमट कर लालकिले से पालम गांव तक रह गया था। एक लाख रुपये की मासिक पेंशन प्राप्त कर अपनी इस बादशाहत से वे तब तक सन्तुष्ट थे जब तक अंगे्रज गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में सबसे छोटे बेटे मिर्जा जवां बख्त को नियुक्त करने से मना न कर दिया। दरअसल मिर्जा जवां बख्त बादशाह की उस महत्वाकांक्षी बेगम जीनत महल का बेटा था जिसने उन्नीस साल की उम्र में चौसठ साल के बादशाह से शादी करके बड़ी बेगम ताज महल को महत्वहीन बना दिया था। यूं तो बादशाह के हरम में पांच बेगमों के अलावा कई उप पत्नियां थीं, जिनसे उन्हें सोलह बेटे और इकत्तीस बेटियां थीं। विप्लव के दौरान इन बेगमों और शाही बेटों ने अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए जो हथकण्डे अपनाये, वे इस अन्तिम मुगल बादशाह की नायक छवि को निश्चित ही धूमिल करते हैं।

सच यह है कि बहादुर शाह जफर अपने जिस छोटे लाडले बेटे मिर्जा जवां बख्त को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे वह अपनी मां के साथ इस विप्लव का विरोधी और अंगे्रजों का समर्थक था। कारण यह कि ÷ जीनत महल को यह भरोसा था कि अंगे्रज बहुत जल्द वापस होंगे और बागियों को हरायेंगे और तब अंगे्रजों के प्रति उनकी इस निष्ठा के फलस्वरूप उनके प्यारे बेटे को उत्तराधिकार का हक मिल जाएगा।'46 जीनत महल की अपने बेटे को लेकर यह महत्वाकांक्षा इतनी प्रबल थी कि जब अंगे्रजों द्वारा बादशाह के तीन अन्य बेटों के कत्ल की सूचना उसे दी गयी तो ÷ खबर सुन कर जीनत महल खुशी से उछल पड़ी। उसका कहना था कि वह खुश इसलिए है कि बड़े बेटों की मौत के बाद अब उसके अपने बेटे की ताजपोशी का रास्ता साफ हो जाएगा।'47 लालकिले की चहारदिवारी के भीतर षडयन्त्रों का यह आलम था कि जिस बेटे की ताजपोशी के लिए जीनत महल इतनी बेसब्र थी, वही बेटा अपनी मां के खजाने और बादशाह पिता के ठिकाने की मुखबिरी अंगे्रजों से कर रहा था। सम्भवतः बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी के पूर्व उनके गुप्त ठिकाने का सुराग भी ÷ बेगम जीनत महल के इशारे पर मिर्जा इलाही बख्श ने अंगे्रज गुप्तचर अधिकारी विलियम हडसन को दिया था।'48 दूसरी ओर बहादुरशाह जफर के उन बेटों के लिए जिन पर जवां बख्त के कारण ग्रहण लग गया था, 1857 की बगावत एक बड़ा अवसर थी। ÷ शहजादों ने यह तरीका अपनाया कि अपनी पलटन, जिसके वे अफसर बने हुए थे, की मदद से शहर के सम्मानित महाजनों को बुला कर बन्दी बना लिया और दण्डस्वरूप जो भी रुपया मिला ले लिया। वे रोते बकते अपने घर चले गये और वह रुपया वस्त्र बनाने व भोग विलास में व्यय हो गया। शहर के अधिकांश सम्भ्रान्त रईस विद्रोही सिपाहियों एवं शहजादों के डर से रोजाना बादशाह के दरबार में उपस्थित होने लगे।'49 शहजादा मिर्जा मुगल इन सबमें प्रशासकीय रूप से सर्वाधिक सक्रिय व कुशल था। उसने हिन्दुस्तान के सारे राजाओं एवं नवाबों के नाम एक परिपत्र जारी कर इस धर्मयुद्ध में शामिल होने का आह्नान भी किया था। बाद में जब दिल्ली पर अंगे्रजों का पुनः नियन्त्रण हुआ तो इसी मिर्जा मुगल को दो अन्य शहजादों खिज्र सुल्तान और अबू बक्र के साथ अत्यन्त निर्ममता से अंगे्रज अफसर हडसन ने नंगा करके गोली मार कर हत्या कर दी। कोतवाली में उनकी नंगी लाशों को देखने के लिए ब्रिटिश सैनिकों का तांता लग गया। तीन दिन के बाद उनके मृत शवों को बेहुरमती के साथ जमींदोज कर दिया गया। आर्मी कैप्टन फ्रेड मैसे ने स्वयं इन शवों को देख कर लिखा था ÷÷.... मुझे उन्हें उस हालत में देख कर खुशी हुई थी क्योंकि उनकी गुनहगारी के बारे में कोई सन्देह नहीं था और मैं सचमुच विश्वास करता हूं कि बादशाह काफी हद तक उनके हाथों में कठपुतली था।''50

सच भी यही था , बहादुरशाह जफर ने 9 मार्च, 1858 को अपने मुकदमे के दौरान दी गयी गवाही में यही स्वीकारोक्ति की थी :

÷÷ मेरी मोहर और दस्तावेजों के सम्बन्ध में असली बात यह है कि जिस रोज से बागी आये, उन्होंने अंगे्रजों को मारा और मुझे कैद कर लिया। मैं उनके बस में रहा, जैसा कि अब हूं। जो कागज वह मुनासिब समझते मेरे पास लाते और मोहर लगाने पर मजबूर करते।'' 51

एक शायरदिल बादशाह की यह बेबसी निश्चित रूप से 1857 के विप्लव का एक त्रासद अध्यायहै।

 

बेगम हजरत महल इस विप्लवी हलचल की केन्द्रीय व्यक्तित्व थीं , अवध की कमान उन्हीं के हाथों में थी। यूं तो 1765 से ही नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि के बाद अवध राज्य अंगे्रजों की चारागाह बन गया था, लेकिन जब 1797 में शुजाउद्दौला के उत्तराधिकारी आसफउद्दौला की मृत्यु हुई तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अवध के बड़े भू भाग को अपने सीधे नियन्त्रण में ले लिया। यह 1801 में नवाब सआदत अली के साथ उस सन्धि के चलते हुआ जिसके अनुसार एक करोड़ पैंतीस लाख के राजस्व वाला समूचा रुहेलखण्ड, कानपुर तथा बनारस अंगे्रजों के हवाले हो गया। अवध के नवाब को अब अपनी सेना के रखरखाव का भी अधिकार नहीं था क्योंकि उसकी सुरक्षा का भार भी अब कम्पनी सेना का था। नवाब को इतनी छूट दी गयी थी कि वह अपने अन्तःपुर आदि की व्यवस्था के लिए कुछ अनुचरों व हथियारबन्द घुड़सवारों आदि की तैनाती कर सकता था। वाजिद अली शाह अवध की इसी पंगु सत्ता पर 13 फरवरी, 1847 को ÷ अबुल मुजफ्फर नासिरुद्दीन सिकन्दर जाह बादशाह-ए-आदिल कैसर जमा सुल्तान-ए-आलम' के खिताब से गद्दीनशीन हुए थे। अंगे्रज रेजीडेण्ट ने अपनी दुतरफा चाल से जहां एक ओर उन्हें ऐय्याशी और रास की महफिलों में डूबने का प्रबन्धन किया वहीं कुशासन और जनता की तबाही का हवाला देकर अवध राज्य को हड़पने के अपने मंसूबों को भी अन्जाम दिया।

भारत के बड़े भू भाग पर अपने सीधे प्रशासन और सतारा , झांसी और नागपुर सरीखी बड़ी रियासतों को हड़पने के बाद अंग्रेजों की निगाह अवध पर होनी स्वाभाविक ही था, क्योंकि इससे कम्पनी सरकार को एक करोड़ तीन लाख पौण्ड की प्रति वर्ष आमदनी का लाभ भी था। परिणामस्वरूप 7 फरवरी, 1856 को वाजिद अली शाह को सत्ताच्युत कर अंगे्रजों ने अवध की सत्ता सम्भाली और बदले में नवाब के लिए पन्द्रह लाख रुपये की सालाना पेंशन की पेशकश की। आंखों में आंसू लिए नवाब तख्तो ताज से बेदखल हुए और लार्ड डलहौजी के पास फरियाद करने के लिए 13 मार्च, 1856 को अंगे्रजों के सुरक्षा घेरे में कलकत्ता के लिए रवाना हुए। इस समूचे दौर में भोग विलास और अंगे्रजों से गठजोड़ के चलते वाजिद अली शाह ने जो राजनीतिक नियन्त्रण और नैतिक सत्ता खोयी थी, उसी का परिणाम था कि उनकी बर्खास्तगी और अवध के सत्तापरहरण पर लखनऊ की सड़कों पर एक कतरा खून भी न बहा। इस समूचे हालात पर अपनी कहानी ÷ शतरंज के खिलाड़ी' में प्रेमचन्द ने ठीक ही टिप्पणी की है :-

÷÷...... शहर में न कोई हलचल थी, न मार काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से, इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं। यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े बड़े कायर भी आंसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।'' 52

अमृतलाल नागर ने भी ÷ गदर का इतिहास' के लेखक देवीदत्त शुक्ल के हवाले से निम्नवत टिप्पणी की है :

÷÷...... विरोध करने की बात तो अलग रही उल्टा अंगे्रज अमलदारी का स्वागत सा किया गया था। जो ताल्लुकेदार राजी राजी मालगुजारी नहीं देते थे वे अंगे्रजी शासन होने पर ठीक समय पर मालगुजारी ही नहीं देने लगे, बल्कि अधिकारियों की आज्ञानुसार उन्होंने वे जायदादें भी उनके असली स्वामियों को चुपचाप लौटा दीं, जिन्हें नवाबी अमलदारी में बलपूर्वक छीन लिया गया था।'' 53

कलकत्ता रवाना होते समय वाजिद अली शाह का इरादा तो इंग्लैण्ड जाकर मलिका विक्टोरिया तक अपने राज की वापसी की फरियाद करने का था , लेकिन शरीर से थुलथुल बादशाह इतने थक गये थे कि उन्होंने वहीं हुगली नदी के किनारे गार्डेन रीच के एक विशालकाय बंगले में अपने अमले के साथ आरामकशी का फैसला लिया। उनकी मां, भाई और बड़ी बेटी जरूर इस अभियान पर लन्दन रवाना हुए लेकिन यह अभियान निष्फल रहा, क्योंकि मां और भाई का लम्बी यात्रा के दौरान रास्ते में ही इन्तकाल हो गया और बेटा अपने मिशन में असफल होने के बाद कम्पनी से आधा लाख रुपये की रकम उधार लेकर वापस हिन्दुस्तान लौट आया। इस बीच वाजिद अली शाह ने कम्पनी सरकार की पेंशन की पेशकश स्वीकार करते हुए अंगे्रज वायसराय को यह लिख भेजा कि ÷ मुझे अंगे्रजी सरकार की पेंशन स्वीकार है। अब तक की तनख्वाह दे दी जाए और मेरा जो मुकदमा लन्दन में दायर हुआ है, उसे खारिज किया जाए।'54 इतना ही नहीं जब उन्हें लखनऊ के सैनिक विद्रोह की जानकारी मिली तो उन्होंने अपनी एक बेगम शैदा साहबा को खत में लिखा कि :

÷÷ मालूम हुआ कि अवध में कुछ बलबाई लोग जमा हुए हैं और अंगे्रजी सरकार के खिलाफ हो गये हैं। कम्बख्तों से कहो, हम चुपचाप चले आये, तुम लोग काहे को दंगा मचा रहे हो।'' 55

सच तो यह है कि अवध की राजसत्ता के उत्तराधिकारी के रूप में बिरजिस कद्र की ताजपोशी और बेगम हजरत महल का 1857 की वीरांगना बनना एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक संयोग है। सैनिक विद्रोह के बाद अवध के ताल्लुकेदारों व जमींदारों को सत्ता के क्षत्रप के रूप में एक प्रतीक की आवश्यकता थी। लखनऊ में चिनहट की विजय के बाद देशी दल के सेना सूबेदारों ने अपनी एक पंचायत बुलायी और आम सहमति से यह तय किया कि सत्ताच्युत अवध के बादशाह के उत्तराधिकारी को ही अपना नेतृत्व प्रदान किया जाए। ÷ जब भूतपूर्व बादशाह के किसी पुत्र को राजगद्दी पर बिठलाने की बात आयी तो पहले किसी का ध्यान बिरजिस कद्र की ओर न गया। यदि और किसी शहजादे अथवा उसकी उच्च कुल की मां ने वाजिद अली शाह की गद्दी से राजनैतिक सम्बन्ध जोड़ना स्वीकार कर लिया होता तो इतिहास के सम्मुख बेगम हजरतमहल का चरित्र शायद कभी न आया होता।'56

जब शाही बेगमों ने जान माल के डर से अपने बेटों को शाही वारिस बनाने से इन्कार कर दिया और बेगम हजरत महल ने अपने बेटे बिरजिस के पक्ष में यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो उन्हें शाही परिवार के व्यंग्य बाणों से आहत होना पड़ा। शाही कुनबे के इस असहयोगी रवैये एवं विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जब बेगम हजरत महल को ऊंची बेगमात के बेटों के रहते हुए भी बिरजिस कद्र को अवध का उत्तराधिकारी बनाने का गौरव प्राप्त हो गया तो उन्होंने स्वयं को इस नयी भूमिका के योग्य भी सिद्ध किया। वली अहद ( राजकुमार) बिरजिस कद्र की संरक्षिका मां के रूप में अवध की इस नयी विद्रोही सत्ता संरचना में बेगम हजरत महल की केन्द्रीय भूमिका होना स्वाभाविक ही था। ÷ उन्होंने इस विद्रोही सत्ता के दरबार में मम्मू खां को प्रधान न्यायाधीश का पद दिया, जो उनका प्रेमी माना जाता था और बरकत अहमद को जिसने चिनहट के युद्ध में अंगे्रजों को मात दी थी, कोई पद नहीं मिल पाया, कारण यह कि उत्तराधिकारी के चयन में उन्होंने बिरजिस कद्र का पक्ष नहीं लिया था। मौलवी अहमदुल्लाह को भी कोई पद नही दिया गया। यद्यपि उनकी इस नयी सभा में आधे हिन्दू और आधे मुसलमान थे।'57

नये सत्ता तंत्र की इस शतरंजी संरचना के साथ साथ उन्होंने राजमाता की भूमिका का निर्वाह जिस शौर्य व साहस के साथ किया , वह एक स्त्री के व्यक्त्विांतरण की किंवदन्ती सरीखा है। वाजिद अली शाह के हरम में भोग्या की नियति के लिए अभिशप्त हजरत महल ने हाथी पर सवार होकर अवध के मैदाने जंग में जो रणकौशल दिखाया, उसकी एक बानगी एक अन्य बेगम के शब्दों में कुछ यूं है :

÷÷ मैं नहीं समझती थी कि हजरत महल ऐसी आफत की परकाला है, खुद हाथी पर बैठ कर तिलंगों के आगे आगे फिरंगियों से मुकाबला करती है। आंख का पानी ढल गया है और इसको हिरास मुतलक नहंीहै।'' 58

बेगम हजरत महल के बारे में एक पर्दानशीं बेगम की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी क्योंकि बकौल अमृतलाल नागर , ÷ पर्दे के अदब कायदे से वे भी उसी तरह बंधी थीं जैसे दूसरी बेगमें, हर मुसलमान स्त्री बंधी थी। उनका पर्दे से बाहर आना खतरे से खाली नहीं था। बेचारी के पास कुलीनता का सर्टीफिकेट भी नहीं था। .... वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल हर्गिज पर्दा प्रथा तोड़ कर बाहर नहीं निकल सकती थीं, किन्तु बेगम आलिया राजमाता हजरत महल पर्दे की झूठी कैद से बाहर निकलने लायक आत्मविश्वास से कवचमण्डित, पूर्ण सुरक्षित थीं।'59

गदर के चश्मदीद गवाह आइरिश पत्रकार विलियम हावर्ड रसेल ने अपनी इस दौर की डायरी में दर्ज किया कि ÷ बेगम हजरत महल अपने बादशाह पति से अच्छी मर्द थीं। .... अपने बेटों के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने सारे अवध को उत्तेजित कर दिया है और मुखिया लोगों ने उसके ( बिरजिस कद्र) प्रति वफादार रहने की कस्में खायी हैं।'60 सम्भवतः इसी पुत्र मोह के चलते उन्होंने पराजय के बाद नेपाल में निर्वासन के दौरान पहले तो अंगे्रजों की पेंशन की पेशकश ठुकरायी, लेकिन फिर उन्हें इस आशय का पत्र लिख दिया कि ÷ बिरजिस कद्र और बेगम ने सिपाहियों के भय से गदर में भाग लिया था' और ÷ अंगे्रज सरकार ने भी नरम रुख अपनाते हुए कलकत्ता में उनके जाने पर पूरी आवभगत की और मेहमानखाने में रखा।'61 विडम्बना यह कि अपने जिस बेटे को अंगे्रजों के प्रतिशोध से बचाने के लिए बेगम हजरत महल ने अंगे्रजों के समक्ष समर्पण का कलंक लिया वही उत्तराधिकार के पारिवारिक झगड़ों के चलते अपने चचा के षडयन्त्र का शिकार होकर सपरिवार जहरखुरानी में मारा गया। निश्चित रूप से अवध के वली अहद का यह त्रासद अन्त था।

 

÷ रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी'

 

1857 के विप्लव में रानी लक्ष्मीबाई का प्रवेश बहुत देर से हुआ। जिन दिनों दिल्ली, लखनऊ, कानपुर व इलाहाबाद सहित समूचे अवध में बगावत के शोले भड़क रहे थे, लक्ष्मीबाई कम्पनी सरकार की प्रतिनिधि के रूप में झांसी राज्य का शासन संभाल रही थीं। अविश्वसनीय सच यह है कि देश के अन्य क्षेत्रों में विद्रोह फैलने के कारण ही ऐसी परिस्थितियां बनीं कि अंगे्रजों ने 2 जुलाई, 1857 को लक्ष्मी बाई को अपने प्रतिनिधि के रूप में झांसी की शासन सत्ता सौंप दी। इसके पूर्व लक्ष्मीबाई झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु (1853) के बाद से उनकी विधवा के रूप में अंग्रेजों की पेंशन के सहारे अपने दिन बिता रही थीं। इन दिनों उनका शासन अपने किले की चहारदिवारी के भीतर तक ही सीमित था, क्योंकि लार्ड डलहौजी ने ÷ डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स' ( राज्य लय) का सहारा लेकर झांसी के महाराजा की मृत्यु के बाद उनके दत्तक पुत्र को राज्य की विरासत से बेदखल कर दिया था। ÷ राज्य लय' का यह सिद्धान्त कम्पनी सरकार की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को सुधारने की दिशा में देशी रियासतों की बलि की कीमत पर उठाया गया वह उपाय था जिसकी संस्तुति लार्ड डलहौजी की कौंसिल ने 1848 में की थी। इसके अनुसार स्वाभाविक उत्तराधिकारी न होने पर दत्तक पुत्र को राज्य के उत्तराधिकार का अधिकार नहीं था। सतारा, सम्भलपुर और नागपुर के बाद अब झांसी में इस सिद्धान्त को लागू किया गया था। राज्य हड़पने के बदले में कम्पनी सरकार ने रानी को साठ हजार रुपये की वार्षिक पेंशन और महल में रहने का अधिकार दिया था। ब्रिटिश अदालतों के न्याय क्षेत्र से भी वे मुक्त थीं और उनके अमले को भी ये विशेषाधिकार प्राप्तथे।

रानी लक्ष्मीबाई कम्पनी राज के इस निर्णय से असन्तुष्ट थीं और उन्होंने कलकत्ता में गवर्नर जनरल और लन्दन में लार्ड इन कौंसिल के समक्ष अपने पुत्र के पक्ष में राज वापसी की कोशिशें जारी रखीं। इस हेतु उन्होंने झांसी के पूर्व राजाओं की ब्रिटिश शासन के प्रति पारम्परिक निष्ठा व समर्पण की दुहाई से लेकर उनकी हर अनुनय विनय की। अन्ततः उन्होंने उस अंगे्रज बैरिस्टर जान लैंग की सेवाएं भी लीं जिसने नाना साहब की पेंशन के लिए भी लन्दन तक नाकाम पैरवी की थी। इस सिलसिले में जान लैंग के झांसी आने पर रानी द्वारा उसका जो सत्कार किया गया उसका विस्तृत वर्णन स्वयं जान लैंग ने अत्यन्त रोचक ढंग से दिया है :

÷÷ भीषण गर्मी के दिन थे, लेकिन रानी ने एक बड़ी पालकीनुमा गाड़ी मेरे लिए भेजी थी, जोकि गाड़ी कम एक बड़ा कमरा सरीखा अधिक थी, जिसमें सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं। यहां तक कि पंखा भी जो बाहर बैठे एक नौकर द्वारा खींचा जा रहा था। साथ में रानी के मन्त्री और वकील तथा खानसामा भी था जो मदिरा, बियर और पानी को बर्फ से ठण्डा करता रहता था ताकि मेरी जरूरतों में कोई दिक्कत न हो। मेरी गाड़ी फ्रांस से आयातित घोड़ों द्वारा खींची जा रही थी।'' 62

जान लैंग को विदाई के रूप में रानी ने शाही प्रथा के अनुसार एक एक हाथी , ऊंट व घोड़ा, दो ग्रे हाउण्ड तथा सिल्क के वस्त्र व शाल भेंट किये थे। लैंग के अतिरिक्त जिन अन्य अंगे्रज अधिकारियों से रानी की मुलाकात का विवरण उपलब्ध है उनमें झांसी के प्रशासक कैप्टन स्किन और ब्रिटिश प्रशासन के प्रतिनिधि लार्ड हैमिल्टन प्रमुख हैं। इन तीनों ने रानी के आकर्षक व्यक्तित्व, तीक्ष्ण बुद्धि व प्रशासकीय क्षमता की मुक्त प्रशंसा की है। साथ ही इन तीनों ने अपने अलग अलग संस्मरणों में इस दिलचस्प तथ्य को भी रेखांकित किया है कि यूं तो रानी पर्दे की ओट से बात करती थीं, लेकिन संवाद के दौरान एक क्षण किसी न किसी बहाने ऐसा अवश्य आता था, जब पर्दा इस तरह हट जाता था कि रानी के अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व की एक झलक दीख जाती थी। लार्ड हैमिल्टन से उनकी कई मुलाकातें हुई थीं और एक मुलाकात के दौरान तो बीच में पर्दा भी नहीं था। रानी से अपनी मुलाकात के बाद जान लैंग ने रानी की आकर्षक छवि का वर्णन निम्नवत्‌ किया है :

÷÷ वह ( रानी) मंझोले कद व गठीली देहयष्टि की थीं। कमसिन वय में वे और अधिक आकर्षक रही होंगी, अभी भी उनमें बहुत आकर्षण था। यद्यपि मेरी सौन्दर्य दृष्टि में वे कुछ अधिक गोलमटोल थीं। उनका चेहरा अत्यन्त मुखर और तेजस्वी था। आंखें बला की खूबसूरत थीं और नाक सुतवा थी। वह बहुत गोरी तो न थीं, लेकिन सांवली भी नहीं थीं। आश्चर्य यह कि कान में सोने के बाले के अलावा वह कोई आभूषण नहीं पहने हुए थीं। उन्होंने दूधिया मलमल की झीनी बुनावट की एक चुश्त पोशाक इस तरह पहन रखी थी कि उनकी सुन्दर देहयष्टि आसानी से देखी जा सकती थी। बस उनकी आवाज बेसुरी थी...।'' 63

जान लैंग रानी के चित्ताकर्षक व्यक्तित्व से इतना प्रभावित था कि जब मुलाकात की समाप्ति पर रानी ने उनसे पूछा कि उनकी झलक देख लेने के बाद कहीं उनके मसले और कठिनाइयों के प्रति सहानुभूति कम तो नहीं हो जाएगी , तो लैंग ने उत्तर दिया :

÷÷.... काश यदि गवर्नर जनरल मेरी ही तरह सौभाग्यशाली होते और चन्द लमहों की भी भेंट आपसे हो पाती तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि वे झांसी का राज उसकी इस खूबसूरत रानी को वापस कर देते ताकि वह शासन कर सके।'' 64

जान लैंग और कैप्टेन स्किन सरीखे शुभचिन्तक अंगे्रजों के प्रयत्नों के बावजूद रानी को झांसी का राज वापस न मिल सका। लेकिन यह अवसर तब आया जब सेना में विद्रोह के बाद बागी सिपाही झांसी पहुंचे और उन्होंने 8 जून, 1857 को झांसी के किले में छिपे अंगे्रज व ईसाई परिवारों को बाहर निकाल कर नगर के जोखनबाग मैदान में सामूहिक हत्या कर दी। बागियों के दिल्ली कूच करने के बाद रानी ने अपने 12 जून के पत्र के माध्यम से उच्च अंगे्रज अधिकारियों को आश्वस्त किया कि इस हत्याकाण्ड से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। इसे न रोक पाने के लिए उन्होंने खेद भी व्यक्त किया और कहाः

÷÷ उनके ( रानी) पास अपने घर की सुरक्षा के लिए सौ पचास लोग हैं इसलिए वह हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थीं। वह स्वयं बागियों की कृपा पर थीं और हर समय उन्हें अपने और अपने लोगों के जीवन पर संकट घिरता दीख रहा था। बागियों ने रानी और उनके सेवकों के साथ जोर जबरदस्ती करके काफी रकम वसूल की और धमकी दी कि अगर उनकी बातें न मानी गयीं तो वे महल को उड़ा देंगे। अपनी स्थिति व जान माल की सुरक्षा को देखते हुए वे बागियों की बातें मानने को विवश हुईं।'' 65

दो दिन बाद रानी ने अंग्रेज अफसरों को फिर पत्र लिखा कि ÷ समूचे जिले में अराजकता का वातावरण है। मुकामी लोगों ने जगह जगह कब्जा कर लिया है और लूटपाट जारी है। कोई इन्तजाम किया जाना वश में नहीं है, क्योंकि इसमें धन की आवश्यकता है जो उनके पास नहीं है और महाजन भी ऐसे समय में पैसा उधार न देंगे। मेरे वश में जितना था अपने साधनों से किया, अब सरकार आगे जैसा हुकुम देगी वैसा ही वह करेंगी।'66

रानी की इस खतोकिताब के उत्तर में कैप्टेन सर एर्स्किन ने अपने 2 जुलाई, 1857 के आदेश के द्वारा झांसी का शासन प्रबन्धन रानी के सुपुर्द कर दिया। उसने अपने आदेश में रानी को लिखा कि ÷ यदि वह लगान व करवसूली, पुलिस बन्दोबस्त व शासन व्यवस्था को पुनर्स्थापित कर सकीं तो वापसी पर अंगे्रज सरकार उनके साथ उदारता से पेश आयेगी।'67 एर्स्किन को अंगे्रजों के प्रति रानी की नेकनीयती पर पूरा भरोसा था, लेकिन गवर्नर जनलर लार्ड कैनिंग को रानी की निष्ठा पर सन्देह था।

अंगे्रजों से झांसी पर शासन की अनुमति मिलने के बाद रानी की प्रसन्नता स्वाभाविक थी। बगावत के कारण समूचे बुन्देलखण्ड में अव्यवस्था और अराजकता का वातावरण था और इलाकों पर कब्जों की होड़ मची थी। रानी भी इसमें पीछे न रहना चाहती थीं। इस प्रक्रिया में बगल की ओरछा व दतिया राज्य की रानियों से उनकी मुठभेड़ हो गयी। संयोग से ये दोनों रियासतें पारम्परिक रूप से अंगे्रजी राज के प्रति वफादार रही थीं। सितम्बर की शुरुआत में जब ओरछा की सेना ने झांसी का रुख किया तो रानी ने कैप्टेन एर्स्किन से सेना की मदद मांगी। एर्स्किन ने ठण्डा सा जवाब दिया , ÷ इस समय हमारी प्राथमिकता झांसी न होकर जबलपुर और सागर है और जब हम वापस झांसी आयेंगे तो बड़े छोटे सबके आचरण को देख कर बर्ताव करेंगे।' रानी के लिए यह पत्र बड़ा आघात था। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने ÷1 जनवरी, 1858 को सर राबर्ट हैमिल्टन को पत्र लिख कर दतिया व ओरछा राज्य द्वारा झांसी पर हमले की आशंका से आगाह किया और मदद की गुहार की लेकिन हैमिल्टन ने उन्हें कोई उत्तर न दिया क्योंकि इस बीच रानी ने ओरछा से मुकाबले के लिए बानपुर के उस राजा से सहायता ली थी, जो बागियों का हमदर्द था। हैमिल्टन दतिया और ओरछा की वफादार रानियों से उनके बिगाड़ से भी अप्रसन्न था।'68

रानी लक्ष्मी बाई मार्च , 1858 के पूर्व तक अंगे्रजों से संघर्ष का अन्तिम निर्णय नहीं कर पायी थीं। उनकी सलाहकार परिषद इस मसले पर विभाजित थी। रानी के पिता मोरोपन्त तांबे का कहना था कि जो राज्य इतनी कठिनाई से मिला है उसे युद्ध में हारे बिना नहीं देना चाहिए। जबकि दूसरी राय यह थी कि जब कुछ समय के लिए महाराजा गंगाधर राव भी झांसी का राज्य अंगे्रजों को सौंप सकते थे तो रानी क्यों नहीं सौंप सकतीं। गंगाधर राव द्वारा अंगे्रजों को झांसी का राज सौंपने का यह सन्दर्भ 1839 का है जब उत्तराधिकार के पारिवारिक विवाद के चलते यह किया गया था। गंगाधर राव इस विवाद के उनके पक्ष में हल हो जाने के बाद भी चार वर्ष तक बिना राज के राजा रहे थे और अंगे्रजों द्वारा दी गयी मासिक पेंशन पर गुजारा करते थे। झांसी का राज उन्हें उसी वर्ष मिला जिस वर्ष (1839) उनका विवाह लक्ष्मीबाई के साथ हुआ। दरअसल झांसी का राजपरिवार पारम्परिक रूप से अंगे्रजों के प्रति इतना विनत और श्रद्धानत रहता था कि :

÷... जब 1832 में गवर्नर जनलर लार्ड विलियम बेण्ंिटक ने अपनी झांसी यात्रा के दौरान यहां के तत्कालीन राजा रामचन्द्र राव को महाराजा की पदवी प्रदान करते हुए उन्हें ÷ इंग्लैण्ड के देदीप्यमान सम्राट' का समर्पित सेवक करार दिया, तो उन्होंने सम्राट से करबद्ध याचना की कि उन्हें यूनियन जैक को झांसी राज्य के ध्वज के रूप में अपनाने की अनुमति दी जाए। बेण्ंिटक ने उनकी इस याचना को मंजूर किया और झांसी के किले की सबसे ऊंची बुर्जी पर यूनियन जैक फहराने लगा।'' 69

स्वाभाविक ही था कि जो झांसी राज्य पीढ़ियों से अंगे्रज सत्ता के प्रति इतना आसक्त और आश्रित रहा हो , उसके द्वारा अंगे्रजों के विरुद्ध संघर्ष का निर्णय कठिन ही होना था। सच तो यह है कि अंगे्रजों ने रानी के समक्ष युद्ध के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प छोड़ा ही न था। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर एवं अन्य इलाकों को पुनः अपने नियन्त्रण में लेने के बाद अब उन्हें मध्य भारत व बुन्देलखण्ड में अपनी राजसत्ता के पैर वापस जमाने थे। इस अभियान पर जब अंगे्रज झांसी पहुंचे तो रानी ने जिस वीरता के साथ मोर्चा संभाला, वह स्त्री सशक्तीकरण का विरल उदाहरण है।

सचमुच यह बिडम्बना ही है कि जो रानी लक्ष्मीबाई अपने पुरखों के राज की वापसी के लिए खड्गहस्त हुईं , वही अपने पति व झांसी के राजा की गुलामी से कितनी त्रस्त थीं। रानी झांसी के कृपा पात्र विष्णु भट्ट गोडसे के शब्दों में :

÷÷ विवाह हो जाने पर लक्ष्मीबाई सुखी न हुईं। पति बड़े कड़े स्वभाव का था और उसका शासन भी बड़ा कठोर था। उसे जरा भी स्वतंत्रता नहीं दी गयी थी। महल के बाहर निकलने की तो बात ही न की जाए, महल के अन्दर भी बाई साहब अधिकतर ताले में रहती थीं। सशस्त्र स्त्रियां हर समय पहरा दिया करती थीं। पुरुषों की तो वहां हवा भी न पहुंचने पाती थी। ऐसे जुलुम जोर होने के कारण छुटपन में सीखे हुए उनके चमत्कारी गुण तो छूटने ही लगे थे, कुछ दुर्गुण भी आने लगे थे, परन्तु सुदैव से विवाह होने के बाद गंगाधर बाबा अधिक दिनों तक जी न सके..।'' 70

सच यही है कि राजा गंगाधर की मृत्यु के बाद ही रानी लक्ष्मीबाई का व्यक्तित्वान्तरण हुआ लेकिन विरोधाभास यह कि यह व्यक्तित्व परिवर्तन पुरुष सत्ता की ही शर्तों पर हुआ वरना उनके नाम से 1857 में जारी घोषणापत्रों में सती प्रथा का समर्थन और विधवा विवाह के विरोध जैसे मुद्दे तो न शामिल किये जाते। लक्ष्मीबाई ब्राह्मणी विधवा थीं फिर भी पति की मृत्यु के बाद केश न कटाये थे, इसलिए प्रायश्चित के रूप में उन्हें नित्य तीन अतिरिक्त पूजाएं करनी पड़ती थीं। वीरांगना होकर भी ब्राह्मण पेशवा नाना राव से मुलाकात में उनकी ब्राह्मणी विधवा की नियति कितनी बाधक थी, इसका वर्णन विष्णु भट्ट गोडसे के शब्दों में निम्नवत्‌ है :

÷÷.... सेबेरे प्रातः कर्मों से निपट कर वह विचार कर ही रही थीं कि पेशवा से किस तरह मिला जाए, किसी स्त्री धर्म के अनुसार वे अस्पर्श दशा को प्राप्त थीं। उस समय बाई साहब ( रानी) के अन्तःकरण में पहले से भी दस गुना अधिक दुःख हुआ-स्त्रियों ने यदि अति शौर्य भी किया तो उसका उपयोग ही क्या?''71

लेकिन इसके बावजूद रानी उस धर्म की रक्षा के लिए अभिशप्त थीं , जिसने उनके पांवों में बेड़ियां डाल रखी थीं। रानी लक्ष्मीबाई के ही शब्दों में :

÷÷.... मैं आध सेर चावल की हकदार, मेरी ऐसी रांडमुड़ को विधवा धर्म छोड़ कर यह सब उद्योग करने की कुछ जरूरत नही थीं; परन्तु धर्म की रक्षा के लिए जब इस कर्म में प्रवृत्त हुई हूं तो इसके लिए ऐश्वर्य, सुख, मान, प्राण सबकी आशा छोड़ बैठी हूं।'' 72

येनकेन प्रकारेण बेटे के हक में झांसी राज्य की वापसी का लक्ष्य यहां जिस तरह ÷ धर्म की रक्षा' में विलयित हो जाता है, वह रानी के व्यावहारिक राजनय का सटीक प्रमाण है। दो राय नहीं कि रानी लक्ष्मीबाई उत्कृष्ट राजनय, व अदम्य सैन्य कौशल का ऐसा दुर्दमनीय उदाहरण हैं, जिसने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को खुली चुनौती न देते हुए भी अनजाने ही उसकी असहायता को उजागर किया। यह अवश्य विडम्बनात्मक है कि उन्होंने यह सब उसी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के सांचे में किया जिसकी शिकार वह स्वयं थीं। 18 जून, 1858 को अंगे्रजों से बहादुरी से संघर्ष करते हुए कालपी के निकट रणक्षेत्र में लक्ष्मीबाई की शहादत भारतीय इतिहास का एक ऐसा अविस्मरणीय अध्याय है, जिसका राष्ट्रवादी विमर्श में तर्पण करने के बजाए नये सन्दर्भों में पुनर्पाठ किया जाना चाहिए।

नाना साहब ( गोविन्द ढोंदू पन्त) 1857 के विप्लव के जुझारू नायक माने जाते हैं, वे मराठा राजशाही के अन्तिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। तीसरे मराठा युद्ध में हार के बाद अंगे्रजों से समझौता करके बाजीराव उनके पेंशनभोगी के रूप में फरवरी, 1819 से बिठूर में अपने ब्राह्मण कुनबे व हजारों अनुयायियों के साथ रहने लगे थे। अंगे्रजों द्वारा प्राप्त आठ लाख रुपये की वार्षिक पेंशन व अपनी पैतृक सम्पदा से वे अपने कुनबे व अनुयायियों का भरण पोषण करते हुए किसी राजपुरुष की ही गरिमा व शानशौकत से रहते थे। उन्होंने अपनी सुख सुविधा के लिए बिठूर में गंगा किनारे एक विशाल महल ÷ सैटरडे हाउस' का निर्माण कराया था, जिसमें यूरोपीय झाड़फानूस, मखमीले गलीचे और संगीत लहरियों की अनुगूंज करती पच्चीस बेशकीमती विदेशी घड़ियों के साथ ऐशोआराम के सभी साधन उपलब्ध थे। लेकिन ग्यारह पत्नियों एवं अगणित उपपत्नियों से भोग संसर्ग के बावजूद उनके मात्र दो पुत्र पैदा हुए, जो नवजात अवस्था में ही चल बसे। इसके बाद उन्होंने कुलीन दकिनी ब्राह्मण माधव राव के दो पुत्रों को गोद लिया, नाना राव इन्हीं में से एक थे।

1851 में बाजीराव की मृत्यु के बाद वसीयत के अनुसार नाना साहब उनकी पेशवाशाही व बिठूर की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी घोषित हुए। यद्यपि अंगे्रजों ने पूर्व समझौते का सन्दर्भ देते हुए बाजीराव के जीवन काल में ही स्पष्ट कर दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी पेंशन व अन्य सुविधाओं का अधिकारी न होगा। इसके बावजूद नाना साहब ने अंगे्रज शासकों से लगातार यह अनुनय विनय किया कि पूरी नहीं तो आंशिक पेंशन तो उन्हें अवश्य ही दी जाए। अंगे्रज कमिश्नर की सहानुभूति भी उनके साथ थी, लेकिन गवर्नर जनरल सहमत न हुआ। नाना साहब ने लन्दन में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर से अपील की, लेकिन जब वह भी अस्वीकृत हो गयी तो उन्होंने अंगे्रज बैरिस्टर जान लैंग की सहायता ली। इस बैरिस्टर ने चन्द दिन पूर्व ही आगरा के एक व्यापारी जोति प्रसाद के मुकदमे की पैरवी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध करके जीत हासिल की थी। जान लैंग की आवभगत में नाना साहब ने अपने ब्राह्मण संस्कारों का परित्याग करके किस तरह पलक पांवड़े बिछाये, इसकी बानगी निम्नवतहै :

÷÷.... लैंग को अतिथि कक्ष में ले जाया गया, जहां उन्हें हर प्रकार की यूरोपीय मदिरा और यहां तक की बीफ ( गाय का गोश्त) भोज में परोसा गया। लेकिन नाना की ब्राह्मणवादी संवेदनाओं को दृष्टिगत रखते हुए उसने सब्जी और चावल ही खाया। .... दावत के बाद नाना ने उसे अपना हुक्का पेश किया। एक मुंशी ने लार्ड डलहौजी के समक्ष प्रस्तुत की गयी पेंशन सम्बन्धी याचिका को बुलन्द आवाज में सुनाया। ... लैंग ने नींद से लड़ते हुए नाना से कहा कि ÷ अरे, ऐसा जुल्म!' और फिर लैंग को उसके शयनकक्ष में ले जाया गया, जहां चार मुस्टण्डे मालिशियों ने उसे मालिश करके आराम की नींद सुलाया।...'' 73

नाना अंगे्रज अफसरों की आवभगत में कोई कमी नहीं रखते थे , लेकिन स्वयं उनके यहां जाकर खाने पीने में उन्हें हिचक थी, कारण यह कि अंगे्रज अफसरों के यहां उनके सम्मान में सलामी नहीं दी जाती थी। लेकिन इसके बावजूद नाना अंगे्रजों के खास विश्वासपात्र थे और जब अंग्रजों पर संकट आया तो उन्होंने बेहिचक होकर उनसे सहायता मांगी। इन मधुर सम्बन्धों का ही परिणाम था कि :

÷÷...... कानपुर के जिलाधिकारी स्पिंकी साहब ने मेरठ के उपद्रव की सूचना पाते ही पत्र भेज कर नाना राव को थम्बूर से बुलाया। एकान्त में भेंट के समय नाना राव को सेना की संख्या बढ़ाने की अनुमति के साथ अंगे्रज सरकारी खजाने की सुरक्षा का दायित्व भी दिया। नाना राव ने अपने दो सौ जवानों का दो तोपों साहित सरकारी खजाने पर पहरा नियुक्त किया।...'' 74

नाना की इन गतिविधियों का जब बागी सिपाहियों को पता चला तो ÷ उन्होंने दो टूक लहजे में उन्हें चेतावनी दी कि, ÷ महाराजा अगर आप हमारे साथ होंगे तो सल्तनत आपके कदमों तले है लेकिन यदि आप दुश्मनों का साथ देंगे तो मौत आपके सामने है।' नाना साहब ने तुरन्त उत्तर दिया, ÷ मेरा अंगे्रजों से क्या वास्ता, मैं तो उन्हें मदद करने का स्वांग कर रहा था। मैं दिल से उनका दुश्मन हूं... मैं पूरी तरह तुम्हारे साथ हूं।'75 अंगे्रजों को नाना के इस रुख पर आश्चर्य हुआ क्योंकि कानपुर छावनी के जनरल सर व्हीलर को विश्वास था कि नाना पूरी तरह वफादार रहेंगे। बाद में नाना और उनके विश्वासपात्रों ने फरारी के दौरान यह स्वीकार किया कि वे बागियों के साथ शामिल होने के लिए विवश किये गये और यह धमकी उनके लिए कम नहीं थी कि बागी उनकी सम्पत्ति लूट लेंगे। नाना के इस व्यवहार परिवर्तन के पीछे पेंशन के मसले पर अंगे्रजों से मिली नाउम्मीदी भी थी। बागियों की इस धमकी में नाना की महत्वाकांक्षा पूर्ति का एक अवसर भी उपलब्ध था। इसे उन्होंने इस विश्वास के भरोसे हथिया लिया कि अब अंगे्रजी शासन बिखराव के कगार पर है और अन्ततः 6 जून, 1857 को अपनी तोपों व सैन्य अनुचरों के साथ जनरल व्हीलर के सैन्य ठिकाने पर हमला बोल दिया। इसके बाद अंगे्रजों व यूरोपियनों के सफाये का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसकी चरम परिणति सावदा हाउस, बीबीघर और सत्तीचौरा के उन सामूहिक हत्याकाण्डों में हुआ, जिसे याद कर करके अंगे्रजों ने अपनी वापसी पर हिन्दुस्तानियों की वीभत्स हत्याएं की थीं।

अंगे्रजों पर नाना साहब का यह विजय अभियान , बिठूर में पेशवाशाही की घोषणा और राजतिलक के साथ सम्पन्न हुआ। भगवा ध्वजों के बीच हर रात अपनी मनपसन्द तवायफ का मुजरा सुनने सुनाने का यह जश्न अभी जारी ही था कि अंगे्रजों की फिर वापसी का सिलसिला शुरू हुआ। नाना साहब अंगे्रजों की फौजों का मुकाबला करते, लड़ते छिपते किसी अज्ञात ठिकाने पर शरणागत हुए। उनके बारे में आखिरी सूचना वह इश्तिहारनामा था जिसे 27 अपै्रल, 1859 को गोरखपुर के कमिश्नर ने गवर्नर जनरल के पास भेजा था। महारानी विक्टोरिया को सम्बोधित इश्तिहारनामे में नाना साहब ने अपने आक्रोश व विवशताओं को निम्नवत्‌ व्यक्त किया था :

÷÷ आपने सारे हिन्दुस्तान के गुनाह को माफ कर दिया है और हत्यारों को क्षमादान दे दिया है। ... मुझे आश्चर्य है कि मैंने जिसने बेबसी में बागियों का साथ दिया, उसे माफ नहीं किया गया। मैंने कोई हत्या नहीं की। ... कानपुर में सिपाहियों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया और अंगे्रजों औरतों को मारा। मैं जिनको बचा सकता था बचाया। ... आपने सबके अपराधों को माफ कर दिया। नेपाल के राजा आपके मित्र हैं, लेकिन आपने मेरे लिए कुछ नहीं किया। ... अब मेरे पास और क्या रास्ता है... मैं मरने को तैयार हूं...'' । 76

नाना साहब का यह अन्तिम उपलब्ध बयान अंगे्रजों के साथ उनके मेलजोल व संघर्ष के द्वन्द्व को बखूबी उजागर करता है। जहां अंगे्रजों से उनकी मैत्री उनके निजी स्वार्थों से संचालित थी , वहीं उनका संघर्ष बगावत से उत्पन्न परिस्थितियों की वह अनिवार्य परिणति थी, जिससे वह बच नहीं सकते थे।

 

÷ बाबू कुंवर सिंह तोहरे राज बिनु , अब न रंगइबो केसरिया' बिहार के शाहाबाद जिले के जिस जमींदार को सम्बोधित है, वे 1857 के विरल नायकों में थे। उनकी लोकप्रियता व शौर्य के किस्से समूचे उत्तर भारत के लोकमानस में रचेबसे थे, क्योंकि जमींदार होते हुए भी वे जालिम न होकर इतने परोपकारी व उदार थे कि उनके इलाके के लोग उन पर जान देते थे। उनके व्यक्तित्व का सबसे कमजोर पक्ष उनका निरक्षर होना था, जिसका दुरुपयोग उनके कारिन्दों व टहलुओं ने इतनी निर्ममता से किया कि उनकी समूची रियासत दीवालिया होने के कगार पर पहुंच गयी। तीन लाख की मालियत की जिस विशाल भूसम्पत्ति का वे वार्षिक कर ही 1,48,000 रुपये देते थे, उस पर एक करोड़ तीन लाख का कर्ज हो गयाथा।

बाबू कुंवर सिंह अच्छे खिलाड़ी थे और अंगे्रज अफसरों से उनके मित्रवत सम्बन्ध थे। सभी यूरोपीय उनका आदर करते थे और उन्हें इस वित्तीय संकट से मुक्त कराने के लिए प्रयत्नशील भी थे। लेकिन अन्ततः मसला सुलझ नहीं पाया और बोर्ड ऑफ रेवन्यू के निर्णय के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी सम्पूर्ण रियासत जब्त हो जाएगी। इसी बीच सैनिक विद्रोह हुआ और एक विवरण के अनुसार कुंवर सिंह ने बागी सिपाहियों के दबाव में इस विद्रोह में भाग लिया। विद्रोह की समाप्ति के बाद कुंवर सिंह के विशेष सहयोगी व विश्वस्त मित्र निशान सिंह ने गिरफ्तारी के पश्चात दिये गये बयान में कहा था कि ÷ दीनाजपुर के बागी आरा पहुंचे, शहर लूट लिया और उन्होंने कुंवर सिंह के नौकरों को धमकी दी कि वे तुरन्त कुंवर सिंह को वहां बुलाएं वरना वे जगदीशपुर लूट लेंगे।'77 इसके बाद ही कुंवर सिंह बागियों के साथ शामिल हुए। पटना के कमिश्नर सैमुअल्स के अनुसार, ÷ कुंवर सिंह के विद्रोह के मूल में उनकी रियासत की आर्थिक कठिनाइयां थीं। कुंवर सिंह को आशंका थी कि बागियों की उथल पुथल के चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उन्होंने अपने इलाके में प्रचारित कर दिया कि सरकार उन्हें फांसी देना चाहती है, इसलिए उनकी रक्षा करें ताकि वे डोमों के हाथों मरने से बच सकें।'78

घटनाक्रम जो भी हो , यह तथ्य निर्विवाद है कि अंगे्रजों के विरुद्ध संघर्ष का मन बनाने के बाद 80 वर्ष की वृद्धावस्था के बावजूद उन्होंने जिस पराक्रम व रणकौशलत का प्रदर्शन किया वह राजपूती शौर्य की गौरवगाथा है। बिहार, बुन्देलखण्ड व अवध से लेकर नेपाल की तराई तक उन्होंने जिस तरह अंगे्रजी सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध किया, वह बेमिसाल है। लेकिन उनके अपने ही निकट सम्बन्धी रेवा के राजा ने जिस तरह विश्वासघात कर उनके विरुद्ध अंगे्रजों का साथ दिया उससे उन्हें काफी आघात लगा। लेकिन इन सारी प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ आजमगढ़ पर नियन्त्रण कर लिया। यहां अंगे्रजों का दबाव बढ़ने के बाद वे अपने पैतृक गांव जगदीशपुर की ओर बढ़े, जहां गंगा पार करने के दौरान तोप का गोला लगने से उनकी एक बांह जख्मी हो गयी। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी तलवार के एक वार से उस जख्मी बांह को काटकर ÷ गंगा मैया' को भेंट कर दिया और यहां हुए संघर्ष में अंग्रजों को पराजित करने के बाद 24 अपै्रल, 1858 को उनकी मृत्यु हुई।

 

किसका संग्राम , किसकी स्वाधीनता?

 

कहना न होगा कि 1857 के विप्लव में नेतृत्वकारी भूमिका का निर्वाह करते हुए बेगम हजरत महल, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, मौलवी अहमदुल्ला शाह तथा कुंवर सिंह सरीखे योद्धाओं ने जिस दुर्दम्य साहस के साथ गोरी फौजों का मुकाबला किया, वह भारत में ब्रिटिश राज को दी जाने वाली सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन विडम्बना यह भी कि यही वे लोग थे जिनके वंशजों के बल पर अंगे्रजी राज के पैर भारत में जमे थे। स्वीकार करना होगा कि अंगे्रजों के विरुद्ध इन सभी का संघर्ष इनकी स्वेच्छा का परिणाम न होकर अंगे्रजों द्वारा थोपी गयी विवशता थी। अपने राज रियासत के लिए देशहित और स्वाभिमान को तिलांजलि देकर जिस प्रकार इन्होंने अंगे्रजों के लिए पलक पांवड़े बिछाये थे वह स्वाभिमानी हिन्दुस्तानी मानस को लज्जित करने वाला है।

अंगे्रजों से दया की भीख मांगते हुए वाजिद अली शाह ने अवध के रेजीडेण्ट जनरल आउट्रम के हाथों में अपना ताज सौंपते हुए रुआंसे सवर में कहा था कि :

÷÷ ब्रिटिश सरकार ने हमारे दादा को यह गद्दी दी थी और उसकी मर्जी है तो चाहे हमें खाक में मिला दे। लेकिन इसकी फरियाद यूरोप तक होगी, क्योंकि हिन्दुस्तान में अब इंसाफ नहीं मिलने वाला है।'' 79

अंगे्रजों के न्याय पर वाजिद अली शाह , रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब को इतना भरोसा था कि अन्तिम क्षण तक वे अपने राज और पेंशन वापसी की फरियाद करते रहे। नाना साहब ने तो 1857 के युद्ध के बाद भी अंगे्रजों से जिस तरह माफी और रहम की याचना की वह सहज रूप से विश्वसनीय नहीं हैं। सच यह है कि अगर अंगे्रज ÷ डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स' का सहारा लेकर कम्पनी के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए देशी राज्यों व रियासतों को हड़पने की हड़बड़ी में न होते तो अन्य वफादार रियासतों की ही तरह ये भी हिन्दुस्तानी जनता की गुलामी का साधन ही बने रहते। लेकिन सैनिक विद्रोह ने समूची परिस्थितियों को भिन्न परिप्रेक्ष्य प्रदान कर दिया। तथ्य इस बात के गवाह हैं कि बागी सैनिकों के दबाव ने ही बहादुरशाह जफर, बेगम हजरत महल, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और कुंवर सिंह को विप्लव में शामिल होने के लिए अन्तिम रूप से उकसाया और इसके लिए इन सबके पास अपने अलग अलग कारण थे, लेकिन यह कारण न तो देशभक्ति था और न राष्ट्रीयता।

अंगे्रजों के विरुद्ध शिविरबद्ध होते हुए भारतीय श्रमशील बहुजन समाज के बारे में इन राजा महाराजाओं व जमींदारों की क्या सोच थी , इसका खुलासा उन घोषणापत्रों से होता है जो 1857 के विल्पव के दौरान जारी किये गये थे। ये सारे घोषणा पत्र दीन धर्म की दुहाई देते हुए सामन्ती व पुनरुत्थानवादी मूल्यों की पुनर्स्थापना के अधिकार पत्र थे। 25 अगस्त, 1857 को बहादुरशाह जफर के नाम से जारी घोषणापत्र में ÷ शरह और शास्त्रों' के अनुसार शासन चलाने का वायदा करते हुए अंगे्रजों की उस व्यवस्था पर चिन्ता प्रकट की गयी थी जिसमें :

÷÷ मामूली रैय्यत, नौकरानी या गुलाम द्वारा दाखिल मुकदमें में इज्जतदार जमींदारों को अदालत में लाया जाता है।.....स्कूल, अस्पताल व सड़कों के लिए उनसे टैक्स लिया जाता है। बादशाही सरकार में इस तरह की वसूली नहीं होगी...और जमींदारी के सारे मसले शराह व शास्त्रों के अनुसार हल किये जाएंगे।...व्यापारियों को गैर हैसियतदार लोगों की शिकायत पर सजा दी जाती है, बादशाही हुकूमत इसे दुरुस्त करेगी। 80

बहादुरशाह जफर का यह घोषणापत्र ÷ आजमगढ़ घोषणापत्र' के नाम से भी चर्चित रहा है। विलियम डैलरिम्पल का मत है कि यह शहजादा फीरोजशाह द्वारा जारी किया गया था, जो मुख्यतः अवध के बागियों के साथ सक्रिय था। इसी प्रकार बेगम हजरत महल द्वारा शहजादा बिरजिस कद्र के नाम से 5 जुलाई, 1857 को लखनऊ में जारी घोषणापत्र में कहा गया था कि :

÷÷ हर हिन्दू और मुसलमान जानता है कि इन्सान को चार चीजें प्यारी होती हैं 1. मजहब और यकीदा 2. इज्जत और आत्मसम्मान 3. खुद और अपनों की जिन्दगी 4. जायदाद। हिन्दुस्तानियों की हुकूमत के दौरान ये चारों चीजें सुरक्षित थीं, कोई मजहब में दखलंदाजी नहीं करता था। हर आदमी अपने धर्म को मानता था और हर एक की इज्जत अपने अनुसार सुरक्षित थी। अशरफ ( कुलीन) चाहे वे मुसलमानों में सैय्यद, शेख, मुगल या पठान खानदान के हों या हिन्दुओं में ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य या क्षत्रिय हों, सभी को अपनी हैसियत के अनुसार इज्जत और ओहदा दिया जाता था। कोई नीच पाजी, चूहड़, चमार, धानुक या पासी उनसे बराबरी का दावा नहीं कर सकता था। ... लेकिन अंग्रेज इन चारों बातों के दुश्मन हैं। वे चाहते हैं कि हिन्दू और मुसलमान का मजहब खत्म हो जाए। वे ऊंचे दर्जे के लोगों की इज्जत नीच दर्जे के मेहतर व चमारों के बराबर ले आये हैं। असलियत में अंगे्रज नीची जातियों के लोगों को ऊंची जातियों पर तरजीह देते हैं। एक मेहतर व चमार की शिकायत पर वे नवाब और राजा को पकड़ कर उसकी बेहुर्मती करते हैं।'' 81

एक अन्य घोषणापत्र जिसे ÷ रानी झांसी का घोषणापत्र' प्रचारित करके समूचे अवध व बुन्देलखण्ड में व्यापक रूप से वितरित किया गया था और जो मौलवी सैय्यद कुतुब शाह के निर्देश पर बहादुरी प्रेस बरेली से प्रकाशित हुआ था, में अन्य बातों के अलावा कहा गया था कि :

÷÷.... तुम्हारे धर्मग्रन्थों में लिखा है कि दूसरे के धर्म को अपनाने से शहादत बेहतर है।....सोचो कि हमारे धर्म को समाप्त करने के लिए क्या क्या सोची समझी तरकीबें अपनायी जा रही हैं। उदाहरण के लिए 1. जब औरत विधवा हो जाती है तो दूसरी शादी के लिए कहा जाता है। 2. पति की मृत्यु पर पत्नी द्वारा सती होने की धार्मिक प्रथा पर रोक लगा दी गयी है और इसे समाप्त करने के लिए अंगे्रज सरकार द्वारा कानून बनाये गये हैं। 3. धर्म परिवर्तन करने पर सम्मानित किया जा रहा है। 4. विरासत के कानून बदले जा रहे हैं।'' 82

इसके अतिरिक्त इस घोषणापत्र में विस्तार से जेलों में कैदियों को अंगे्रजों द्वारा अपनी रोटी खिलाने , शक्कर और आटे में हड्डियों का चूरा मिलाने एवं गो हत्या सम्बन्धी अन्य मुद्दों के साथ हिन्दुओं को गंगा, तुलसी और सालिग्राम तथा मुसलमानों को कुरान की कसम दिलाते हुए धर्म भ्रष्ट करने वाले अंग्रेजों को नेस्तनाबूद करने का आह्नान किया गया था। इसी दौरान बहादुरशाह जफर के पांचवे बेटे मिर्जा मुगल, जो बगावत के दिनों में दिल्ली के कमाण्डर इन चीफ थे, द्वारा एक गश्ती इश्तहार जारी किया गया जिसमें सती प्रथा की समाप्ति और धर्म परिवर्तन का विशेष उल्लेख करते हुए इस ÷ धर्मयुद्ध' में शामिल होने की अपील की गयी थी।

बहादुरशाह , बेगम हजरत महल, रानी लक्ष्मीबाई व मिर्जा मुगल की ही तर्ज पर नाना साहब को भी अंग्रजी राज से शिकायत थी कि :

÷÷ अंगे्रज सरकार सम्पत्तिशाली लोगों को खर्चीले मुकदमे से बर्बाद कर देती है और उन कानून कायदों को लागू करती है, जो शास्त्रों की पवित्र संहिता व धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध हैं। ... मन्दिर मस्जिदों को नष्ट कर ये सती और विरासत सरीखी हिन्दू परम्पराओं में हस्तक्षेप करते हैं...'' 83

इन सारी घोषणाओं से स्पष्ट है कि अंगे्रजों को नेस्तनाबूद करने का यह उद्घोष हिन्दुस्तान की आजादी के उद्देश्य से संचालित न होकर उस धार्मिक जकड़बन्दी एवं सामन्ती मूल्यों को बचाये रखने का अन्तिम प्रयास था जो कुलीन जन के आधिपत्य की आधारशिला थीं। ये घोषणाएं दलितों व स्त्रियों की गुलामी के भी दस्तावेज हैं। अंगे्रजों ने सती प्रथा को समाप्त कर विधवा विवाह के पक्ष में कानून बना कर एवं दलितों के लिए समान शिक्षा व न्याय व्यवस्था का प्रावधान कर जो सुधार किये थे , उन्हें समाप्त कर बर्बर सामन्ती प्रथाओं की वापसी का यह अमानवीय अभियान था। जोतिबा फूले और पण्डिता रमा बाई ने अंगे्रजों द्वारा किये गये इन सुधारों का समर्थन करके स्त्रियों व दलितों के प्रति सामन्ती दृष्टिकोण के बरक्स अंगे्रजों के आधुनिक व मानवतावादी दृष्टिकोण को ही रेखांकित किया था, इसलिए उन्हें उन राजभक्तों की कोटि में नहीं रखा जा सकता, जो अपने निजी राज पाट व सुख ऐश्वर्य के लिए यूनियन जैक फहराने की याचना कर रहे थे।

यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि अगर बहादुरशाह जफर के घोषणापत्र में दस्तकारों व जुलाहों की भी चर्चा की गयी तो उसका सन्दर्भ राज दरबार ही था। इस घोषणा में कहा गया था कि बादशाही शासन में देशी कारीगरों को अलग से बादशाहों , राजाओं और धनाढ्य वर्ग की सेवा में लगाया जाएगा। शायद इसीलिए कि उस व्यवस्था में ग्रामीण जमींदार स्वयं भी निम्न वर्गों के उन किसानों, कारीगरों और अस्पृश्यों का शोषण करते थे, जो उनकी मिल्कियत के गांवों में रहते थे। दरबारशाही और सामन्ती वैभव से मुक्त दस्तकारी व कारीगरी के विकास की उस व्यवस्था में न तो कोई सम्भावना थी और न ही योजना, उल्टे इन कारीगरों के प्रति शासक वर्ग में अवमानना का ही भाव था। बिरजिस कद्र के नाम से जारी बेगम हजरत महल के घोषणापत्र में पासी समुदाय का उल्लेख करते हुए यह आश्वासन दिया गया था कि उनका परम्परागत चौकीदारी का पेशा बरकरार रखा जाएगा। स्पष्ट है कि यह आश्वासन घोषणापत्र की उस मूल भावना के अनुकूल ही है जिसमें यह चिन्ता प्रकट की गयी थी कि अंगे्रजों द्वारा निम्न जातियों को ऊंची जातियों के समकक्ष माना जाने लगा है।

1857 के विप्लव के नेतृत्वकारी वर्ग की इस सोच का ही परिणाम था कि व्यापक बहुजन समाज इस समूची परिघटना से उत्साहित नहीं था। इस सम्बन्ध में इलाहाबाद के अंगे्रज कलेक्टर एम0 एच0 कोर्ट की यह गोपनीय रिपोर्ट दृष्टव्य है :

÷÷ मेरा विश्वास है, बल्कि मेरी दृढ़ राय है कि गरीब हिन्दू दिल से हमारे पक्ष में हैं और वे हमें पक्के तौर पर शासन में देखना चाहते हैं लेकिन उन्हें लगता है कि हमारी सत्ता चली गयी है और इस कारण वे हमारी सरकार के खिलाफ लूट पाट और बलवे में शामिल हो जाते हैं। मेरी राय है कि यह सब ब्राह्मण धर्म द्वारा संचालित है। ... वे यह जानते हैं कि शास्त्रों में लोगों का विश्वास तेजी से कम होता जा रहा है। वे यह भी जानते हैं कि इसके साथ वे भी गिरते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप उनका हित उन लोगों के खात्मे में है, जो उनके अनुयायियों में तर्क व ज्ञान की भूख जगाकर, उनके शास्त्र वचनों से विमुख करना चाहते हैं। हिन्दुओं में ब्राह्मणों ने और मुसलमानों में मौलवियों ने यह घोषणा कर रखी है कि इस वर्ष अंगे्रजी सत्ता जाने वाली है। गरीब लोगों में यह विश्वास घर कर गया है, अतः वे सजा के डर से या आने वाले हुक्मरानों के मुखापेक्षी होकर हमारे विरुद्ध कार्य कर रहे हैं।'' 84

यह तथ्य भी विचारणीय है कि उपरोक्त तथ्यों के बावजूद क्या 1857 को ÷ जन विद्रोह' कहा जा सकता है? मेरठ में जिन दिनों सैनिक विद्रोह हुआ, वहां खुली लूट का बाजार गर्म था। अंग्रेजों के ठिकानों पर हमला स्वाभाविक था लेकिन ÷ देशी दुकानदारों पर हमला किया जा रहा था और उनके प्रतिष्ठानों को लूटा जा रहा था। ... देशी पुलिस के अधिकतर लोग तमाशबीन थे या खुद भी लूट में शामिल थे। बाद में पास के गांवों से लुटेरों के गिरोह चाकू और जलती मशालें लिए हुए पूरे शहर पर टूट पड़े।'85 अराजकता और लूट का यह माहौल लोक स्मृति में इतना रचबस गया कि दशकों बाद भी आस पास के इलाकों की गूजर स्त्रियां उन लोकगीतों को गाती गुनगुनाती दीख जाती थीं जिनका आशय था। ÷ लोगों को मिले बड़े छोटे शाल दुशाले, मेरा पिया रुमाल ले आया। मेरठ के बड़े बाजार में/ मेरे पिया को लूटना न आया/ लोगों ने लूटा चांदी सोना/ मेरा पितया अधन्ना ले आया।' ( अंगे्रजी से रूपानतरित)86

बगावत के दिनों की दिल्ली के हालात को मिर्जा गालिब ने 1857 के दिनों की अपनी डायरी ÷ दस्तम्बू' मे कुछ यूं दर्ज किया है :

÷÷ लुटेरे हर तरह से आजाद हैं।....बस्तियां वीराने में बदल चुकी हैं और घरों में बेनाम शरणार्थी घुस कर उन्हें लुटपाट की जगह समझ बैठे हैं। वे अपनी लीला में मस्त हैं। बागी नंगी तलवार लिए एक गिरोह से दूसरे गिरोह में आ जा रहे हैं। अगर शान्त और शरीफ लोग बाजार में खरीदारी करने के लिए आते हैं तो उन्हें ये बागी आंख दिखाते हैं। उन्हें मजबूर किया जाता है कि वे अपनी हार मान लें और अपनी प्रतिष्ठा को नीलाम कर दें। सारा दिन ये डाकू चांदी सोना लूटते हैं और शाम को रेशमी बिस्तर पर विराजमान होते हैं। ... यह अराजकता और अशासनिक व्यवस्था मातम करने योग्य नहीं है क्या?'' 87

लखनऊ के हालात भी कुछ ऐसे ही थे ÷ गुजिश्ता लखनऊ' के लेखक अब्दुल हलीम ÷ शरर' ने इसे कुछ यूं व्यक्त किया है :

÷÷ बागी फौज के अलावा अवध के अक्सर जमींदार और ताल्लुकेदार और बादशाह के जमाने में अलग किये गये सिपाही बहुत बड़ी संख्या में मौजूद थे। उनमें शहर के बहुत से व्यभिचारियों और हर वर्ग के लोगों का तूफाने बेतमीजी भी शरीक हो गया था। .... घेरा डालने वालों में सिवाय शहर के लफंगों और .... उद्दण्ड लोगों के एक भी ऐसा व्यक्ति न था जो युद्ध कला से परिचित हो......'' 88

लखनऊ के इस समर में जनता की भागीदारी के बारे में मोइनुद्दीन हसन का बयान है :

÷÷ पन्द्रह दिन तक लखनऊ में इस प्रकार यह महायुद्ध होता रहा कि कोई नगरवासी किसी पक्ष की ओर से इसमें सम्मिलित नहीं हुआ। वरन जनता बाजार में अनाज आदि की खरीदारी करती रही। जब युद्ध में तोपों व बन्दूकों की गरज सुनाई देती थी तो जनता रास्तों पर खड़ी होकर रास्ता बन्द कर देती थी।''89

1857 की सारी उथल पुथल के बावजूद सोनपुर का प्रसिद्ध मेला शान्तिपूर्वक सम्पन्न हुआ। बिहार में शाहाबाद अवश्य एक ऐसा अपवाद था जहां की जनता ने कुंवर सिंह के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर अंगे्रजी सेना के छक्के छुड़ा दिये थे। इस सम्बन्ध में सुरेन्द्र नाथ सेन का मत है कि ÷ यह अन्दाजा लगाना कठिन नहीं है कि शाहाबाद के किसान अपने राजपूत नायक ( कुंवर सिंह) के प्रति पारम्परिक निष्ठा व समर्पण की भावना से अधिक गतिशील थे, लक्ष्य के प्रति लगाव के कारण नहीं।'90 उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों खासकर अवध में जहां तालुकेदारों की पकड़ मजबूत थी और भूमि के स्थायी बन्दोबस्त से उन्हें अधिक हानि हुई थी, बागियों का आन्दोलन अधिक सशक्त था। इस समूची ग्रामीण भागीदारी की व्याख्या करते हुए रंजीत गुहा का मत है कि :

÷÷1857 के दौरान समूचे मध्य व उत्तरी भारत के गांवों में मौजा दर मौजा बागी आन्दोलन फैलने का मुख्य कारण पुश्त दर पुश्त से बने ग्रामीण सम्बन्ध थे। मालिक तालुकेदारों का प्रभाव हो या उनकी स्वयं की पहलकदमी, हर क्षेत्र में यह प्रभाव जाति कुल सम्बन्धों के अनुसार अलग अलग था। अक्सर बागी सिपाही गांव लौटते हुए अपने रिश्तेदारों को गदर में शामिल होने के लिए प्रेरित करने में सफल होते थे।''91

आवश्यक है कि 1857 की वास्तविक प्रकृति को समझने के लिए कारण व प्रभाव तथा विप्लव और अराजकता में अन्तर किया जाए। सच है कि इस विप्लव में अवध के पासी समुदाय की बहादुरीपूर्ण भागीदारी थी, लेकिन स्मरण रखना चाहिए कि यह इसलिए थी कि अंगे्रजों ने गांव में चौकीदारी के उनके पारम्परिक पेशे के एकाधिकार को समाप्त कर सभी जातियों से बरकंदाज ( सशस्त्र पहरेदार) की भर्ती शुरू कर दी थी। बागियों के साथ गूजर समुदाय भी शामिल था लेकिन उसकी भूमिका पक्ष निरपेक्ष लूट पाट की थी, न कि अंगे्रजों से लड़ने की। गूजरों ने कई जगह अलग अलग अपने राजाओं की घोषणा कर रखी थी तो बंजारों ने सहारनपुर में अपना राजा बना लिया था। मथुरा में देवी सिंह ने भी अपने को ÷ चौदह गांव' का ÷ बागी राजा' घोषित कर रखा था। दरअसल ये सभी बंजारा, गूजर और बागी राजा गदर के उपजीव्य थे, जिन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल किया लेकिन उन्हें इसके लक्ष्य से कोई वास्ता नहीं था। यहां वफादारी व बगावत मूल्यगत न होकर व्यक्तिगत हितों द्वारा अभिप्रेरित थी। स्थिति यह थी कि यदि एक सामन्त विद्रोहियों के साथ होता तो उसका प्रतिद्वन्द्वी लाभ की आकांक्षा में अंगे्रजों का साथ देता।

कुछ ÷ राष्ट्रवादी' विमर्शकार जनजातियों एवं आदिवासियों के संघर्षों को 1857 के विप्लव में विलयित कर इसे जन विद्रोह होने का तर्क देते हैं। जबकि सच यह है कि मुण्डा, संथाल व अन्य आदिवासियों का यह विद्रोह भू स्वामियों, दिकुओं व जमींदारों के उस गठबन्धन के विरुद्ध था, जो अपने हितों की रक्षा के लिए विप्लव के सैलाब में बह चला था। जब जब, जहां जहां अंगे्रजों ने इन जमींदारों व दिकुओं का हित सम्वर्धन किया, वहां वहां आदिवासियों ने उनका विरोध किया। 1855 की संथाल क्रान्ति ( हूल) जमींदार, महाजन और सरकार तीनों के ही विरुद्ध थी। अंगे्रजों ने जमींदारों व महाजनों की हित रक्षा करते हुए इस ÷ हूल' का दमन किया था। इस सम्बन्ध में सूबेदार सीताराम पांडे+ जो स्वयं इस दमनचक्र में अंग्रेज सरकार के सिपाही के रूप में शामिल थे की यह टिप्पणी दृष्टव्य है :

÷÷..... संथाल लोग हमसे कहिन कि वै यहि मारे बगावत किहिन काहे कि ओन्है दीवानी अदालत से नियाय नहीं मिलत रहा। वहिं कै साहूकार और जमींदार संथालन का तबाह किहे रहे और संथालन कै सुनवाई नहीं होत रहे काहे कि वै देसी अफसरन का घूस नही दइ पावत रहे। यहि बाती पै लड़ाई होब अजीबै लागत है। ई लड़ाई यहू मारे अजीब रही कि एक ओर हमरे सब जंगल मा ओनसे लड़त रहेन और दुसरी ओर सरकार ओन्है अनाज देत रही गाड़ी भरि भरि कै।'' 92

यह निर्विवाद है कि उन दिनों आदिवासियों के बीच ईसाई मिशनरियों के काम से उन्हें राहत व नयी चेतना प्राप्त हुई थी , उनके मुख्य शोषक अंगे्रज न होकर अंगे्रजों के कृपाकांक्षी जमींदार व महाजन थे। भूस्वामियों एवं दिकुओं के शोषण से मुक्ति के ही लिए उन्होंने धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपनाया था। इसीलिए ÷1857 के दौर में जमींदारों ने ईसाई रैय्यतों को सताया। क्रान्ति दबा दिये जाने के फलस्वरूप ईसाई रैय्यतों की बन आयी। ... उनका उद्देश्य जमींदारों को निकाल बाहर करना था... एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने यह मांग रखी कि उन्हें सीधा ब्रिटिश शासन के अधीन कर दिया जाए।'93

यहां आवश्यकता है आदिवासियों , दलितों व स्त्रियों की उस पराधीन नियति को समझने की जिसका प्रत्यक्ष शत्रु अंगे्रजी शासन सत्ता न होकर वह सवर्ण पुरुष सत्ता थी जो अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए 1857 के विप्लव में शामिल थी। दुर्भाग्य यह कि इस अन्तर्विरोध को समझे बिना आदिवासियों, दलितों व स्त्रियों के प्रवक्ताओं को अंगे्रजपरस्त व साम्राज्यवाद का समर्थक करार दे दिया जाता है। यह सवर्ण पुरुष सत्ता का षडयन्त्रकारी दुराग्रह ही है कि जोतिबा फूले, पण्डिता रमा बाई एवं आम्बेडकर को दलित बहुजन समाज का समर्थक होने के कारण लांक्षित किया जाता है, जबकि उन राजा, रजवाड़ों, नवाबों और तालुकेदारों को ÷ प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम' का नायक करार दिया जाता है, जिन्होंने अपने न्यस्त स्वार्थों के लिए अंगे्रजों का कृपापात्र बने रहने की हर सम्भव कोशिश की।

इनमें से कुछ तो 1857 के दौरान भी अंगे्रजों के मुखर समर्थक व प्रचारक बने रहे। 1857 और उसके बाद के दौर में ÷ शिव प्रसाद सितारे हिन्द और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र दोनों ही सरकार के वफादार थे। हिन्दी के एक तीसरे लेखक लक्ष्मण सिंह भी, जो इटावा के डिप्टी कलक्टर थे और जिन्हें अंगे्रज सरकार ने राजा की उपाधि दी थी, ऐसे ही वफादार थे। वफादारी और समर्थन के बदले में इन तीनों को अंगे्रजी शासन ने समय समय पर तरह तरह के सम्मान व पुरस्कारों से नवाजा। भारतेन्दु और शिव प्रसाद दोनों के पुरखों ने जो पहले दिल्ली के बादशाहों के करीब थे बाद में बंगाल के नवाब के खिलाफ अंगे्रजों को लड़ने में मदद की। इस मदद के एवज में ही बीस साल के लड़के हरिश्चन्द्र को बनारस शहर का आनरेरी मजिस्टे्रट बनाया गया और लक्ष्मण सिंह को काफी बड़ी जागीर माफी दी गयी।'94

हिन्दुस्तानी कुलीन सवर्ण समाज की यही वह रीढ़विहीनता थी , जो अंगे्रज को निष्कंटक राज करने की आजादी देती थी और बदले में बहुजन समाज को दास बनाये रखने की छूट चाहती थी। सर सैय्यद अहमद की भी भूमिका 1857 के दौरान अंगे्रज सरकार के अधिकारी के रूप में ब्रिटिश समर्थन की ही थी, लेकिन उनका यह समर्थन निजी हित लाभ से प्रेरित न होकर उपनिवेशवादी शासन में सन्निहित आधुनिकता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का परिणाम था।

 

1857 के विप्लव को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल बताते हुए प्रायः यह मत प्रतिपादित किया जाता है कि इस दौरान दोनों धर्मों के विभाजक मुद्दे नहीं उठाये गये। दरअस्ल यह हिन्दू-मुस्लिम एकता न होकर दोनों धर्मों के कुलीन नेतृत्व की आम सहमति थी, जो गंगा जल और कुरान का वास्ता देकर दोनों समुदायों के मेहनतकश लोगों व स्त्रियों को पराधीन रखते हुए अपनी सुख सुविधा व विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए अंगे्रजों के विरुद्ध धर्मयुद्ध का उद्घोष कर रही थी। इस कुलीन पुरुष सत्ता के लिए धर्म एक हथियार और हिन्दू मुस्लिम एकता एक कवच सरीखी थी। बहादुरशाह जफर, बेगम हजरत महल से लेकर खान बहादुर खान तक सभी के घोषणापत्रों में गो हत्या पर रोक, सती प्रथा का समर्थन तथा विधवा विवाह एवं दलितों को बराबरी के अधिकार का विरोध मुस्लिम आभिजात्य वर्ग द्वारा हिन्दू आभिजात्य वर्ग का तुष्टीकरण नहीं तो और क्या है!

1857 की समूची उथल पुथल का परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों ने अपनी सुधारवादी भूमिका पर पुनर्विचार किया और अपने उन सुधारवादी निर्णयों को उल्टा, जो इस विप्लव के मुख्य कारक थे। जिस कुलीन सामन्ती सवर्ण नेतृत्व ने 1857 की अगुवाई की थी वह व्यक्तिगत रूप से पराजित हुआ लेकिन उसके वर्गीय हितों की विजय हुई। 1 नवम्बर, 1858 को महारानी विक्टोरिया ने भारत में कम्पनी शासन को समाप्त करते हुए सीधे ब्रिटिश राज की घोषणा की। अपनी पहली घोषणा में ही उन्होंने आश्वासन दिया कि भारतीय राजा महाराजाओं के अधिकार, सम्मान व मर्यादा की रक्षा की जाएगी और धार्मिक आस्थाओं व परम्पराओं में किसी तरह का हस्तक्षेप न किया जाएगा। परिणामस्वरूप अंगे्रज सरकार से अभयदान प्राप्त करके भारत की निम्नवर्गीय मेहनतकश जनता पर राजा रजवाड़ों का शिकंजा और कसा। सभी अंगे्रज गवर्नर जनरलों ने राजाओं के मामले तथा उनकी ज्यादतियों के विरुद्ध हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी। 1857 के बाद लार्ड डलहौजी ने राज्य लय ( डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स) का सिद्धान्त पूरी तरह त्याग दिया। पटियाला, नाभा और झिंद में सती प्रथा, बंधुआ गुलामी तथा कन्या भ्रूण हत्या चलती रही। नये राज में पुरानी जियो और जीने दो की नीति पुनजीर्वित हो गयी और पुरानी कुप्रथाएं जहांतहां चलती रहीं। मणिपुर राज्य में 1891 तक गुलामी प्रथा कायम रही, जहां महाराजा अपने चहेतों को उपहार स्वरूप गुलाम भेंट करते थे और गुलामों की खरीद फरोख्त पर छूट थी।

इन सबके बदले देशी कुलीन शासक वर्ग ने महारानी विक्टोरिया की ÷ जयति राज राजेश्वरी जय युवराज कुमार' की तर्ज पर वन्दना आराधना शुरू की। आभिजात्य जन के पूजागृहों में देवी देवताओं के साथ एक चित्र महारानी का भी टंग गया और चांदी के सिक्कों पर महारानी की छाप की पूजा की जाने लगी। बदले में महारानी की ओर से पद, पदवियों तथा इनाम इकराम की झड़ी लग गयी। हिन्दुस्तानी जनता के प्रति आत्मीयता प्रदर्शित करते हुए महारानी ने हिन्दुस्तानी सीखना शुरू किया, इसके लिए उन्होंने एक हिन्दुस्तानी मुंशी भी रखा। महारानी के इस हिन्दुस्तानी रंग और देशी शासक वर्ग के ब्रिटिश राज के प्रति भक्ति भाव ने भारत में सुधारों को लेकर ब्रिटेन के उदारवादियों का बुखार काफी कुछ ठण्डा कर दिया। उन्होंने पस्त होकर यह स्वीकार कर लिया कि हिन्दुस्तानी पारम्परिक समाज में फिलहाल सुधार सम्भव नही है। थामस मेटकाफ ने सुधारवादियों की इस परिवर्तित मनोदशा को ÷ कन्जरवेटिव ब्राण्ड ऑफ लिबरलिज्म' करार देते हुए कहा कि ÷ यह कुलीन पुरातनपन्थियों के ठोस समर्थन और भारतीय समाज की पारम्परिक संरचना में किसी तरह के हस्तक्षेप न करने के सिद्धान्त पर टिका था।'95

1857 के बाद राजाओं, जमींदारों एवं ग्रामीण व शहरी आभिजात्य वर्ग के साथ अंगे्रजों के नये सम्बन्ध बने और सुदृढ़ हुए थे। भारत के 662 देशी राजा तो अन्त तक ब्रिटिश सरकार की निष्ठावान रक्षा पंक्ति बने रहे। मैकाले ने शिक्षित बुद्धिजीवी हिन्दुस्तानी वर्ग की ÷ रंग में काली किन्तु विचारों और रुचियों में अंगे्रज होती जिस नस्ल का स्वप्न देखा था वह टूटने लगा था। अंगे्रजों की इस सुधार विरोधी अनुदारवादी मनोदशा ने ब्रिटिश साम्राज्य को और निरकुंश बनाया और इससे उस शिक्षित
मध्य वर्ग को आघात पहुंचा, जो 1857 का भागीदार नहीं था और जिसने अंगे्रजी शासन व प्रशासन में हिस्सेदारी की आकांक्षा संजो रखी थी। उन्नीसवीं शताब्दी के ढलते वर्षों में भारतीय शिक्षित मध्य वर्ग की इसी हताशा से उस आधुनिक राष्ट्रवाद का जन्म हुआ जो आज भारतीय राष्ट्र राज्य की आधारशिला है। यह राजा राम मोहन राय, रवीन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू सरीखे आधुनिक दृष्टिकोण से लैस चिन्तकों व राजनेताओं का राष्ट्रवाद था, न कि ÷ दीन धर्म' का परचम फहराते सामन्तों का।

1857 की भावुक राष्ट्रवादी व्याख्या करते हुए कुछ लोग लाला हरदयाल की ÷ गदर पार्टी' से इसका रिश्ता जोड़ते हैं और यह सैद्धान्तिकी गढ़ते हैं कि ÷ गदर पार्टी को साम्राज्यवाद विरोधी पार्टी माना जाय तो 1857 के गदर को प्रतिक्रियावादियों का संघर्ष कहना कठिन होगा'96 यहां यह बेहिचक स्वीकार किया जाना चाहिए कि गदर पार्टी साम्राज्यवाद विरोधी पार्टी थी, लेकिन वह रूढ़िवादी सामन्ती व्यवस्था' के विरोध एवं समता, समानता व पूर्ण स्वतन्त्रता के जिस लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध थी उसका 1857 के लक्ष्यों से कोई वास्ता न था। हां, 1857 के शौर्य व वीरता के किस्से तथा अंगे्रजों के विरुद्ध संघर्ष इसके प्रेरक तत्व अवश्य थे, लेकिन जिस तरह मंगल पाण्डे के ÷ शौर्य' को भगत सिंह की क्रान्तिकारी समझ का पर्याय नहीं माना जा सकता, उसी तरह 1857 को गदर पार्टी की क्रान्तिकारी भूमिका के साथ एकमेव नहीं किया जा सकता।

जरूरत है 1857 को गलदश्रु भावुकता से विलग कर इसके निहितार्थों को अनावृत्त एवं प्रश्नांकित करने की। दो राय नहीं कि 1857 अंगे्रजी सत्ता के लिए देशी शक्तियों द्वारा दी गयी उस समय तक की सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन यह साम्राज्यवाद के विरुद्ध सुविचारित व सुसंगठित आन्दोलन न होकर धर्म आधारित वह नस्ली विरोध था जिसके निशाने पर अंगे्रजी राज न होकर समूची अंगे्रज कौम और ईसाईयत थी। यह धार्मिक मुहावरे में लड़ी गयी देश की आजादी की लड़ाई न होकर धर्म आधारित सामन्ती व्यवस्था के विशेषाधिकारों के बचाने की लड़ाई थी, जिसमें देश महज एक रणक्षेत्र था। यह देश की जनता द्वारा देश के लिए लड़ी गयी लड़ाई न होकर देशी शासक वर्ग द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए लड़ा गया वह धार्मिक संग्राम था, जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों धर्मों की अनुयायी जनता कच्चे माल की तरह इस्तेमाल की गयी। देशी शासकों के जुल्म-ओ-सितम से त्रस्त रहने के बावजूद गुलाम प्रजा द्वारा 1857 में जो भी हिस्सेदारी थी, वह उनकी सजग साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का परिणाम न होकर उस सामन्ती अनुकूलन का परिणाम थी जो उनके अपने हित में किसी स्वतन्त्र निर्णय को बाधित करती थी। हां, उत्पीड़ित जन के मन में अंगे्रजों के प्रति जो स्वाभाविक दूरी व विलगाव की भावना थी उसने इस हिस्सेदारी को और सहज बनाया। तब तक पराधीन जनता में न तो सामन्ती गुलामी से मुक्ति की क्षमता थी और न ही साम्राज्यवाद से मुक्ति की चेतना। सामन्ती सत्ता ने ही उस पर अंगे्रजों की गुलामी थोपी थी और उसी ने उसके मन में उनके विरुद्ध विद्रोह के बीज बोये। इसलिए 1857 को जन विद्रोह कहना एक नये मिथक को गढ़ना है।

यहां यह सच है कि पराधीन रहते हुए भी जनता ने अपने स्वाभाविक सद्गुणों का परिचय देते हुए न तो लोभवश अंगे्रजों का साथ दिया और न ही उनके लिए मुखबिरी की। यह विशेषाधिकार सामन्तों के ही हिस्से में रहा। स्वीकार करना चाहिए कि 1857 का विप्लव अगर अंगे्रजी सत्ता की चूलें हिला सका तो उसके पीछे जनता का वह देशज मानस था, जो पराये अंगे्रजों के विरुद्ध अपने उत्पीड़िकों का भी साथ देने में पीछे न था। यह विडम्बना ही है कि हिन्दुस्तानी जनता की इस भोली ÷ कर्त्तव्यपरायणता' का दोहन उन सामन्ती शक्तियों ने किया, जो उसका शोषकी थी। अंगे्रजों द्वारा तोपों के मुहानों से बांध कर उड़ाये गये और पेड़ों की डालों पर फांसी लटकाये गये अगणित लोगों में उन भोले ग्रामीणों व निम्नजन की संख्या अधिक थी, जो सामन्ती उत्पीड़न से भी त्रस्त थे और बगावत सफल होने पर उनकी स्थिति बदतर ही होती। भोली जनता के इस निःस्वार्थ बलिदान को 1857 के स्वार्थी सामन्ती नेतृत्व की गौरवगाथा से विच्छिन्न कर इसे सही जन परिपे्रक्ष्य प्रदान किया जाना चाहिए।

इस सम्बन्ध में ÷1857' के लेखक इतिहासकार सुरेन्द्र नाथ सेन का निष्कर्ष ध्यान देने योग्य हैः

÷÷.... अंगे्रजी शासन ने अपने प्रयासों से एक सामाजिक क्रान्ति की थी। उन्होंने स्त्रियों की असमर्थता को एक सीमा तक दूर किया, कानून की दृष्टि में समानता का सिद्धान्त लागू करने का प्रयत्न किया एवं श्रमशील किसानों एवं बंधुआ मजदूरों की दशा में सुधार करने का प्रयत्न किया। गदर के नेता घड़ी की सुई को वापस कर देते, वे उन सुधारों को नये आदेशों से समाप्त कर देते और अपने उन्हीं वैभवशाली दिनों में वापस लौट जाते, जब एक मामूली आदमी कुलीन जन के समक्ष न्याय की आशा नहीं कर सकता था, जब जोतदार तालुकेदार का कृपाकांक्षी होता और चोरी की सजा अंग भंग होती।'' 97

सचमुच कैसा होता यदि 1857 में बागियों की जीत होती, दिल्ली में मुगलशाही की वापसी होती और नाना साहब अपने राज्य में पेशवाशाही स्थापित करते। निश्चित रूप से यह दृश्य हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल न कायम करके ÷ सभ्यताओं के संघर्ष' का ही होता। यह राष्ट्रवाद की प्रसव पीड़ा न होकर धार्मिक राज्य की वापसी होती। जर्जर सामन्ती व्यवस्था द्वारा अपनी खोयी हुई शान की वापसी के इस अन्तिम प्रयास की असफलता ने जिन नयी शक्तियों के उदय एवं नये समाज की स्थापना का पथ प्रशस्त किया था, वहीं से आधुनिक राष्ट्रवाद की राह फूटती थी। अच्छा ही हुआ कि 1857 की कोख बंजर रही, वरना जिस विकलांग राष्ट्रवाद का जन्म होता वह विनायक दामोदर सावरकर के ÷ प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम' के ÷ स्वधर्म' और ÷ स्वराज्य' के रास्ते हिन्दू राष्ट्रवाद तक पहुंचता।

आज 1857 की 150 वीं जयन्ती जहां इस विरासत की पड़ताल के बहाने तत्कालीन देशी सत्ता संरचना के कुलीन पितृसत्तात्मक मूल्यों की पुनर्व्याख्या व पुनर्पाठ का अवसर प्रदान करती है, वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के लिए अपने मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा का चोर द्वार भी खोलती है। प्रश्न यह है कि आधुनिक राष्ट्रवाद की पूर्व पीठिका क्या है? वर्णाश्रमी पितृसत्तात्मक सामन्ती आधार या कि धर्म, वर्ण, जाति व लिंग की असमानता से मुक्त समान नागरिकता का सिद्धान्त। 1857 और 1947 की विच्छिन्नता के सूत्र यहीं अन्तर्निहित हैं, इसीलिए 1857 की विरासत से मुक्त होकर ही 1947 के आधुनिक राष्ट्र की विरासत को संभाला जा सकता है। जरूरत है सर्वसहमति के राष्ट्रवाद से चकाचौंध हुए बिना 1857 के मिथक भेदन की। परिवर्तनकामी जनपक्षधर शक्तियों का यही ऐतिहासिक दायित्व है, वरना एक और ÷ ऐतिहासिक भूल' उनकी बाट जोह रही है।

 

सन्दर्भ

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