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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय


समाज

यादों में रची यात्रा
पी.सी. जोशी

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लेख
दलित अस्मिता और एजेण्डा ÷ जाति विनाश' का सुवीरा जायसवाल

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ

वीरेन्द्र यादव

150 वीं जयन्ती के अवसर पर 1857 का विप्लव एक बार फिर गम्भीर विमर्श व प्रश्नों के घेरे में है। क्या हैं इसकी विरासत के निहितार्थ? क्या यह वास्तव में आधुनिक राष्ट्र राज्य की प्रसव पीड़ा थी या कि भारत की कुलीन पितृसत्ता द्वारा अपने वर्चस्व को बचाने का अन्तिम प्रयास। इस ÷ जनविद्रोह' के प्रति क्या थी भारत के बहुजन समाज की प्रतिक्रिया? क्या है इसका रिश्ता 1947 की आजादी से? इन्हीं प्रश्नों व जिज्ञासा के दायरे में प्रस्तुत है चर्चित आलोचक वीरेन्द्र यादव का लेख।

 

÷÷... ब्रिटिश सरकार ने जमींदारियां स्थापित करके बढ़े हुए ÷ जमा' लगाये हैं और बकाया मालगुजारी की वसूली के लिए रियासतों का सार्वजनिक नीलाम करके कई जमींदारों को अपमानित एवं बर्बाद कर दिया है। यहां तक कि किसी नौकरानी अथवा गुलाम द्वारा दाखिल मुकदमे में इज्जतदार जमींदारों को अदालत में लाया जाता है और फिर गिरफ्तार कर अपमानित किया जाता है। ... बादशाही हुकूमत में ... जमींदारों का मान और उनकी इज्जत सुरक्षित रहेगी और प्रत्येक जमींदार का अपनी अपनी जमींदारी में स्वतन्त्र शासन होगा। शरह और शास्त्रों के अनुसार बिना किसी खर्चे के जमींदारी झगड़ों का सरकारी तौर पर निर्णय किया जाएगा।... पण्डित और फकीर क्रमशः हिन्दू और मुसलमान धर्म के रक्षक हैं और चूंकि यूरोप के निवासी दोनों धर्मों के शत्रु हैं तथा धर्म के कारण ही वर्तमान लड़ाई लड़ी जा रही है, इसलिए पण्डितों और फकीरों को चाहिए कि वे मेरे पास आये और धर्मयुद्ध में अपना सहयोग प्रदान करें।'' 1

(25 अगस्त 1857 को जारी बहादुरशाह जफर के घोषणापत्र से)

 

÷÷... हिन्दुस्तानियों की हुकूमत में... कभी कोई मजहब में दखल नहीं देता था; हर आदमी अपने दीन का कायल था और उसकी इज्जत उसके मुताबिक थी। अशराफ चाहे वे मुसलमान कौम के सैय्यद, शेख, मुगल या पठान खानदान के हों या हिन्दुओं में ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ हों, को उनकी हैसियत के अनुसार इज्जत और ओहदा दिया जाता था। कोई नीच पाजी, चूहड़, चमार, धानुक या पासी उनसे बराबरी का दावा नहीं कर सकता था।... लेकिन अंग्रेज... चाहते हैं कि हिन्दू और मुसलमान बेदीन होकर ईसाई बन जाएं।... वे ऊंची जमात के लोगों की इज्जत को नीची जमात के मेहतरों और चमारों के बराबर ले आये हैं। असलियत यह है कि अंग्रेज नीची जातियों को ऊंचे दर्जे के मुकाबले ज्यादा तरजीह देते हैं। एक मेहतर और चमार की शिकायत पर वे नवाब और राजा को पकड़ कर उसकी बेहुर्मती करते हैं।'' 2

( बेगम हजरत महल द्वारा शहजादा बिरजीस कद्र की ताजपोशी - 5 जुलाई 1857 - के अवसर पर जारी घोषणापत्र से)

 

÷÷ ऐसी अदालतों की स्थापना करना जिससे सम्पत्तिशाली लोग मुकदमे के भारी खर्चे से बर्बाद हो जाएं और ऐसे कानून लागू किये जाएं, जो उनकी पवित्र मान्यताओं और धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध हैं। मन्दिर मस्जिद का ध्वस्तीकरण, सती और विरासत सम्बन्धी हिन्दू प्रथा में हस्तक्षेप ... हिन्दुस्तानियों के धार्मिक रीति रिवाजों को भ्रष्ट करने की योजना... अंग्रेजी सरकार के अन्याय और फरेब के कारनामे सूरज की रोशनी की तरह हर तरफ फैले हैं।'' 3

( नाना साहब द्वारा नैपोलियन बोनापार्ट को 28 अप्रैल 1858 को भेजे गये पत्र से)

अठारह सौ सत्तावन के विप्लव की डेढ़ शताब्दी के बाद यह जानना वास्तव में दिलचस्प है कि किस तरह आधुनिक इतिहास की एक समूची परिघटना को ÷ राष्ट्रवाद' के मनोनुकूल मिथक में ढाला जा सकता है। 1857 को प्रथम राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाना क्या ऐसी ही एक गढ़न्त है? क्या यह तथ्य विचारणीय नहीं है कि जिन राजाओं, नवाबों, सामन्तों, तालुकेदारों, पुरोहितों एवं सैनिकों के बल पर भारत में अंग्रेजी सत्ता के पांव जमे थे, वे ही विद्रोह क्यों कर बैठे? प्रश्न यह भी है कि जो बहादुरशाह जफर, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल और नाना साहब अंग्रेजों द्वारा दी गयी पेंशन व आर्थिक सहायता द्वारा अपनी राजशाही का तामझाम बरकरार रखे हुए थे, क्या उन्हें उस भारतीय जनता का नायक कहा जा सकता है, जो अंगे्रजों और सवर्ण सामन्ती सत्ता की दुहरी गुलामी से त्रस्त थी? क्या इस समूचे घटनाक्रम में पुरातन व्यवस्था के कुलीन संस्कारों व आधुनिक जीवन मूल्यों की टकराहट का भी कुछ योगदान था? क्या अंगे्रज सेना के सिपाही मंगल पाण्डे और देश की मुक्कमल आजादी के योद्धा भगत सिंह के प्राणोत्सर्ग के एक ही निहितार्थ हैं? क्या यह पड़ताल जरूरी नहीं कि न्यस्त हितों से प्रेरित 1857 के सैनिक व सामन्ती विप्लव की प्रकृति उन संथाल आदिवासियों के संघर्ष से किस तरह भिन्न थी, जो जंगल और जमीन पर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए जमींदारों व साहूकारों के साथ उनकी संरक्षक अंग्रेजी सत्ता को भी चुनौती दे रहे थे? और अन्त में यह भी कि बादशाहों, राजाओं, तालुकेदारों, जमींदारों, और कुलीनजन का जो उत्तर भारत केन्द्रित यह गठबन्धन अंगे्रजों के द्वारा पराजित हुआ, उसका भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन से क्या वर्गीय रिश्ता बना? क्या है 1857 की विरासत? आधुनिक राष्ट्रवाद या विकलांग राष्ट्रवाद? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनसे मुठभेड़ किये बिना न तो 1857 को सही ऐतिहासिक सन्दर्भों में समझा जा सकता है और न ही इसका मिथक भेदन किया जा सकता है।

1857 के विप्लव की संरचना को समझने के लिए आवश्यक है यह जानना कि भारत पर राज करने के लिए अंगे्रजों ने किन देशी बिचौलियों का सहारा लिया था। विप्लव के ठीक सौ वर्ष पूर्व 1757 में प्लासी युद्ध में अपनी विजय के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ज्यों ज्यों बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर भारत और मद्रास में अपनी शासन सत्ता का विस्तार किया, त्यों त्यों उसने उस सामन्ती व पुरोहिती सत्ता के सामाजिक आधार को पोषित व पुनर्जीवित किया जिसका आधिपत्य पहले से ही भारतीय समाज पर था। अपने शासन के प्रारम्भिक दौर में अंगे्रजों ने भारतीय समाज के धार्मिक व सामन्ती तानेबाने में किसी प्रकार के हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी। कारण यह कि मुगल सत्ता के जिस पराभव युग में अंग्रेजों का भारत आगमन हुआ, वह किसी सुदृढ़ केन्द्रीय सत्ता के अभाव में एक अराजक राजनीतिक समय था। जिस राजा की जितनी सामर्थ्य और सैन्य बल, उसका उतना ही बड़ा राज्य। अपनी राजसत्ता को वैधता प्रदान करने के लिए राजाओं में धर्म पर निर्भरता और धार्मिक कर्मकाण्डों को अपनाने की प्रवृत्ति इस दौर में तेजी से बढ़ी। परिणामस्वरूप ÷ अठारहवीं शताब्दी में देशी शासकों ने अपने राज्यतन्त्र का धिकाधिक ब्राह्मणीकरण किया और कुछ ने तो राज्य के महत्वपूर्ण पद और कार्य ब्राह्मण मूल के ही लोगों को सौंपे।'4 अंग्रजों ने इस नीति रीति को बरकरार ही नहीं रखा उसे संस्थाबद्ध भी किया।

भारत के प्रथम अंगे्रज गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हैस्ंिटग्स की राय थी कि ÷ एक समुदाय के रूप में हिन्दुओं के पास ऐसे कानून रहे हैं, जो प्राचीनतम समय से अपरिवर्तित रहे हैं, उसका कहना था कि ÷ ये अब भी मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि, यदि अंग्रेजों को भारत पर सफलता से शासन करना है तो वे इन कानूनों और जिस संस्कृत भाषा में ये उपलब्ध हैं, उन पर महारत हासिल करें।...' उसकी राय में यह शासन के लिए उपयोगी होगा क्योंकि इससे ÷ गुलामी की उन जंजीरों का भार कुछ हल्का होजाएगा जिससे जनता को जकड़ा जाना है।'5 इस दिशा में वारेन हैस्टिंग्स के प्रयासों का ही परिणाम था कि इन्हीं दिनों (1767) जे. जेड. हावेल की पुस्तक ÷ रिलीजियस टेनेट्स आफ जेन्ट्ज' और सर विलियम जोन्स के शोधपरक लेख ÷ एशियाटिक रिसर्चेज' के अंकों में प्रकाशित हुए, जिनसे ब्रिटिशों की निगाह में हिन्दू धर्म की विधिवत्‌ पहचान बनी। हिन्दू धर्म की यह संरचना ब्रिटिश अध्येताओं और ब्राह्मण पण्डितों के संयुक्त प्रयासों का फल थी, जिसके लाभार्थी प्रमुखतः ब्राह्मण थे। कारण यह कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद के पूर्व भारत में ब्राह्मण ग्रन्थों की विधिक साक्ष्यों के रूप में सर्वस्वीकृति नहीं थी। अलग अलग समुदायों व जातियों की अपनी विधिक मान्यताएं थीं। डी. डी. कौशाम्बी का मत है कि अंगे्रजों की ÷ ब्राह्मणीकरण की प्रवृत्ति के चलते ही विभिन्न जाति समुदायों के कानूनों की उपेक्षा हुई और ब्राह्मण ग्रन्थों को हिन्दू कानून का आधार बनाया गया।'6 शासन सत्ता में धार्मिक परिप्रेक्ष्य अपनाते हुए अंगेजों ने न्यायिक अदालतों में ब्राह्मण पण्डितों और मौलवियों को विशेष भूमिका प्रदान की। थामस आर. मेटकॉफ के अनुसार, ÷ अंगे्रज हिन्दुस्तानी बिचौलियों पर काफी कुछ निर्भर थे। अदालतों के काम और रोजमर्रा के शासन व कर वसूली में ब्राह्मणों की अपरिहार्य भूमिका थी। यद्यपि यह ब्राह्मण निर्भरता ब्रिटेन में बैठे अंगे्रज उच्चाधिकारियों के मन में झुंझलाहट और खीझ भी पैदा करती थी।'7 कारण यह कि उन्हें इन पण्डितों की निष्पक्षता और ईमानदारी पर भरोसा नहीं था। अपने अनुभवों से जेम्स ग्राण्ट डफ सरीखे भारत विषयक अंग्रेज नीतिकारों की इस दौर में यह धारणा बनी थी कि ÷ हिन्दुस्तान का मेहनती और सादगी पसन्द किसान, जहां कहीं भी ब्राह्मणों के चंगुल में है, दुर्दशाग्रस्त है'8 इसके बावजूद व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए अंग्रेजों ने यह नीति अपनायी कि हिन्दुस्तानी उपनिवेश में ÷ उच्चवर्णी हिन्दू ही महत्व देने योग्य असली जमात है और जो व्यक्ति अनुकूल राजनीतिक व आर्थिक परिस्थिति में उच्च वर्ण जाति की रीति निति का अनुगमन करेगा, वह अकूत लाभ कमा सकता है।'9

देशी शासकों व कुलीन हिन्दुओं का हित रक्षण करते हुए अंग्रेजों ने भारत में अपनी लूट का साम्राज्य स्थापित करने की जो नीति अपनायी , उसी का परिणाम था भूमि के लगान की वह व्यवस्था जिसके अन्तर्गत सवर्ण जातियों को शूद्र व दलितों की तुलना में समान भूमि के लिए कम दर से लगान देना होता था। आदि काल से प्रचलित इस व्यवस्था में अंगे्रजों ने कोई परिवर्तन नहीं किया। कारण यह कि जिस प्रभुत्वशाली कुलीन वर्ग से उनका गठबन्धन था वह उच्च जााति का ही था, जो अपनी ताकत के बल पर अपना आधिपत्य बनाये रखता था। इस लगान व्यवस्था के बारे में डी.डी. कौशाम्बी का मत है कि, ÷ जाति का सम्बन्ध आर्थिक स्थिति से था। ब्राह्मण उतनी ही भूमि पर कम दर से कर देता था। इसकी दावेदारी परम्परागत विशेषाधिकार के रूप में की जाती थी।'10 अंग्रेजों ने सेना की भर्ती में भी उच्च सवर्णों को विशेष प्राथमिकता दी, मुख्यतः ब्राह्मणों, भूमिहारों व राजपूतों को। इसके पीछे उनकी बलिष्ठ देहयष्टि और निष्ठा भाव तो था ही, साथ ही साथ वारेन हैस्टिंग्स के ही शब्दों में ÷ सेना का उच्च वर्ण केलोगों से युक्त होना कम्पनी शासन को वैधता भी प्रदान करता था।'11 उच्च सवर्ण पृष्ठभूमि के इन सैनिकों की धार्मिक श्रेष्ठता व कुलीन संस्कारों को दृष्टिगत रखते हुए इनकी खानपान की अपनी व्यवस्था सुनिश्चित की जाती थी और समुद्र पार की सैन्य सेवा से भी इन्हें मुक्त रखा जाता था। 1779 में प्रथम मराठा युद्ध के दौरान वारेन हैस्ंिटग्स ने सेना को बंगाल से बम्बई भेजने के लिए लम्बा थल मार्ग अपनाया क्योंकि उसे पता था कि समुद्र मार्ग से होकर जाने में सिपाहियों की धार्मिक भावनाएं आाहत होतीं क्योंकि इसमें जाति गंवाने का खतरा था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर में बंगाल नैटिव आर्मी के सिपाहियों की खुराक, भोजन तैयार करने की विधि और खाने का तरीका जटिल नियमावली द्वारा संचालित होता था। ÷ सिपाही ऐसा खाना खाते थे जो सिर्फ उच्च जाति व शुद्ध संस्कारों से सम्बद्ध था। वे अपने गांव में रह कर अपने जातिगत संस्कारों की जितनी रक्षा नहीं कर पाते थे, उससे अधिक सेना में सम्भव था। एक अर्थ में कम्पनी द्वारा ÷ सेना के संस्कृतीकरण' को बढ़ावा दिया जा रहा था।'12 सेना द्वारा स्वपाकी ब्राह्मणों को अपना खाना स्वयं बनाने की सुविधा और पर्याप्त समय दिया जाता था। कम्पनी अपने उच्चवर्णी सिपाहियों के लिए ब्राह्मण एवं राजपूत वेश्याओं का भी प्रबन्ध करती थी, दरअस्ल ÷ सिपाही सवर्ण भूस्वामी भी होते थे, जिनकी अपने गांव में पैतृक खेती होती थी और वे अपने साथ सामान ढोने के लिए सेवक रखते थे, जो सैन्य अभियान में भी उनके साथ रहते थे। ये सैनिक स्वाभिमानी जवान थे.. जो अंग्रेज साहिब का नमक खाकर अपनी जिन्दगी उसकी सेवा में अर्पित कर देते थे। सिर्फ एक चीज वे इससे ऊपर रखते थे, वह था उनका धर्म।'13

भारतीय मुहावरे में वैधता प्राप्त करने के अंग्रेजी सत्ता के इस परम्परा केन्द्रित धार्मिक परिप्रेक्ष्य को लेकर ब्रिटेन के चिन्तकों व राजनीतिज्ञों में उन दिनों तीखी बहस छिड़ी हुई थी। जहां लार्ड वेलिंगटन जैसे अनुदारवादी पुरातनपंथी भारतीय धर्म और संस्कृति को पवित्रतम मानते हुए ब्रिटिश प्रशासन का सर्वोच्च कर्तव्य ÷ देश की प्राचीन विधि व्यवस्था, परम्परा और धर्म की सुरक्षा' मानते थे; वहीं बेन्थेम की तर्ज पर जेम्स मिल जैसे उदारवादी चिन्तकों का कहना था कि ÷ हर संस्था के लिए तर्क और उपयोगिता की कसौटी लागू की जानी चाहिए और मात्र प्राचीनता और परम्परा के नाम पर किसी चीज को न्यायोचित नहीं ठहराना चाहिए।'14 लेकिन बाद में भारत प्रवास के अपने अनुभवों से सीख लेकर जेम्स मिल ने सुधारों को तेज गति से न किये जाने की चेतावनी भी दी थी। कारण यह कि, ÷ उच्च जाति के ब्राह्मणों को कानून के समक्ष समानता की ब्रिटिश अवधारणा अप्रिय लगने के कारण इसे मन्द गति और कई चरणों में लागू किया जाना चाहिए।'15 लेकिन इस सारे बहस मुबाहिसे को विराम देते हुए जब उदारवादी सुधारपंथियों के दबाव में ब्रिटेन की संसद ने 1833 में इण्डिया चार्टर को मंजूरी दी तो सुधार की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उससे औपनिवेशिक भारत में एक भूचाल सा आ गया। सुधार की इस प्रक्रिया से अंगे्रजी शासन के ब्राह्मणवादी परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन आया और शासन प्रशासन, न्याय व्यवस्था व सेना में समाज के अन्य वर्गों के प्रवेश का रास्ता खुला। लेकिन विडम्बना यह कि इन्हीं सुधारों ने 1857 के विप्लव की भूमिका भी तैयार की।

1833 के बाद अंग्रेज शासन की सोच में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया कि भारत के कुलीन जन का मुखापेक्षी होते हुए उसने सामन्ती संस्थाओं व परम्पराओं में हस्तक्षेप न करने की जो नीति अपना रखी थी, अब वह बदलने लगी। अदालतों, सेना की छावनियों से लेकर जेल तक में इसे देखा जा सकता था। सरकारी कार्य व्यापार में अब धर्म, वर्ण और जाति के भेदभाव को प्रश्रय न देने एवं इन तौर तरीकों से दूरी बनाने के प्रयत्न स्पष्ट दीखने लगे थे। मन्दिरों, दरगाहों व धार्मिक उत्सवों के सरकारी प्रबन्धन व खर्च आदि से भी सरकार अपने हाथ खींचने लगी थी। जेल प्रशासन ने कैदियों के जातिगत संस्कारों को दृष्टिगत रखते हुए अपना भोजन स्वयं बनाने की जो सुविधा प्रदान कर रखी थी, उसे वापस लेकर ब्राह्मण रसाईए द्वारा सम्मिलित भोजन बनाने की नयी व्यवस्था की गयी। जेलों में पीतल के लोटों के स्थान पर मिट्टी के बर्तनों के इस्तेमाल के निर्देश दिये गये ताकि मारपीट व झगड़ों में कैदी इसका इस्तेमाल न कर सकें, लेकिन जाति शुद्धता के नाम पर यह उच्च जातियों के बन्दियों में असन्तोष का कारण बना क्योंकि मिट्टी के इन पात्रों को मांजा नहीं जा सकता था। साफ सुथरा रहने का तर्क देकर मुसलमान कैदियों से दाढ़ी कटाने को कहा गया, जिसे धर्म में हस्तक्षेप माना गया। अस्पतालों में हर धर्म और जाति के रोगियों का एक ही वार्ड में भर्ती किया जाना और गरीब व अमीर तथा पर्दानशीं स्त्रियों के साथ समान व्यवहार हैसियतदारों की इज्जत के साथ खिलवाड़, सामाजिक जीवन में अवांछित हस्तक्षेप माना गया। अदालतों के नये कानून तथा कानून के समक्ष समानता का सिद्धान्त भी पारम्परिक न्याय व्यवस्था के कुलीन पक्षघरों के बीच गहरे असन्तोष का कारण बना। अदालतों में देशी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार और कानूनी पेचीदिगियों ने भी उसके विरुद्ध वातावरण तैयार किया।

पारम्परिक चलन व धार्मिक विश्वासों के अनुकूल न होने के कारण इन आधुनिक परिवर्तनों को भारत के सामाजिक तानेबाने में जबरिया हस्तक्षेप माना गया। इसे तब और बल मिला जब हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म अपनाने वालों को विरासत अधिकारों की कानूनी सुरक्षा प्रदान की गयी। इसके पूर्व हिन्दू विधि के प्रावधानों के अनुसार धर्म परिवर्तन करने वालों को विरासत सम्बन्धी अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था। जब कम्पनी राज ने हिन्दू विधवाओं के पुनर्विवाह और इन विवाहों से उत्पन्न सन्तानों को वैधता प्रदान की तो सवर्ण हिन्दुओं ने इसे अपनी धार्मिक परम्पराओं में सीधा हस्तक्षेप माना। इसके पूर्व लार्ड विलियम बेंटिक द्वारा सती प्रथा को प्रतिबन्धित किये जाने की स्मृति तो उनके मन में ताजा ही थी। इस दौर में शिक्षा के प्रसार हेतु अंग्रेजी माध्यम के सरकारी और मिशनरी स्कूलों का खोला जाना तथा इसमें दलितों व स्त्रियों को भी शिक्षा का अधिकार देना कुलीन समाज को रास नहीं आया। शिक्षा के क्षेत्र में मिशनरियों की आमद और अंगे्रजी शिक्षा का विरोध मुस्लिम समाज में भी हुआ। ÷ बिहार और अवध के मुस्लिम जमींदारों में अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की हैसियत के बावजूद अंग्रेजी शिक्षा के प्रति अरुचि थी। उदाहरण के लिए 1867 में लखनऊ में सम्पन्न वायसराय के दरबार में 260 मुस्लिम तालुकेदार उपस्थित थे, लेकिन 1869 तक इन परिवारों के कुल 70 बच्चे ही शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। मुसलमानों के अंग्रेजी स्कूल पूरी तरह अलोकप्रिय थे।16 कुछ ही वर्षों पूर्व ÷ जब 1835 में लार्ड विलियम बेंटिक ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा के आदेश लागू किये थे, तब 8000 मुसलमानों ने हस्ताक्षर कर सरकारी खर्च से अंग्रेजी शिक्षा दिये जाने का इस आधार पर विरोध किया था कि इससे हिन्दुस्तान की नयी पीढ़ी का अपने मजहब में यकीदा कम होगा और उनमें ईसाईयत के प्रचार का दरवाजा खुलेगा।'17

हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समुदायों के मन में धार्मिक हस्तक्षेप की यह आशंका निर्मूल नहीं थी। कारण यह कि 1833 के इण्डिया चार्टर के लागू होने के साथ साथ ईसाई मिशनरियों को भी धर्म प्रचार की छूट मिल गयी थी। उन दिनों मिशनरी प्रचारकों को स्कूल, अस्पताल, जेल व बाजार हर कहीं प्रचार करते हुए देखा जा सकता था। वे ईसाई धर्म की श्रेष्ठता का बखान करते हुए हिन्दू और इस्लाम धर्म को कमतर ठहराते और इनका उपहास भी करते थे। इन दिनों मिशनरी स्कूलों के साथ साथ सरकारी स्कूलों में भी बाइबिल का पाठ किया जाने लगा था। जेलों में भी कैदियों को सामान्य शिक्षा के साथ ईसाई मत की शिक्षा दी जाने लगी थी। पटवारियों को हिन्दी सीखने के लिए मिशन स्कूलों में भेजा जाता था, जहां उन्हें हिन्दी सीखने के साथ ईसाई मत के उपदेश भी सुनने पड़ते और बाइबिल की प्रति भी भेंट की जाती थी। मिशनरियों की इन गतिविधियों से हिन्दू और मुसलमान दोनों में ही यह धारणा घर कर गयी कि यह सब कम्पनी सरकार की मिलीभगत और इशारे पर हो रहा है।

यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि जहां हिन्दू व मुसलमानों के सम्भ्रान्त खाते पीते वर्ग में धर्म और मिशनरी की भूमिका को लेकर ये आशंकाएं व्याप्त थीं , वहीं शिक्षा, नौकरियों एवं न्याय व्यवस्था में समानता के अवसरों ने एक नये शिक्षित मध्य वर्ग के उदय की सम्भावनाओं को भी जन्म दिया था। 1817 में मराठा राज्य को ब्राह्मणवादी पेशवाशाही की गिरफ्त से मुक्त करके अंग्रेजों ने दलितों व निम्न जन में जिस आशा का संचार किया था, वह नयी चेतना का स्वरूप ग्रहण करने लगी थी। भारत में अंग्रेजी राज की यही वह परिवर्तनकारी भूमिका थी जिसे कार्ल मार्क्स ने ÷ इतिहास का अवचेतन उपकरण' (Unconscious tool of History) करार दिया था। भारत में भी जोतिबा फूले जैसे दलित समाज सुधारक अंग्रेजी राज में अन्तर्निहित इन सकारात्मक परिवर्तनों को रेखांकित कर रहे थे। इसका श्रेय अंग्रेजी राज को देते हुए जोतिबा फूले ने उस दौर में लिखा था, ÷... इस देश में अंग्रेजों की सत्ता कायम हुई और उनके द्वारा ये दलित लोग ब्राह्मणशाही की शारीरिक गुलामी से मुक्त हुए। इसीलिए ये लोग अंग्रेजी राजसत्ता का शुक्रिया अदा करते हैं। ये लोग अंग्रेजों के उपकारों को कभी भूलेंगे नहीं। उन्होंने इन्हें आज सैकड़ों साल से चली आ रही ब्राह्मणशाही की गुलामी की फौलादी जंजीरों को तोड़ करके मुक्ति की राह दिखाई है।'18 चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मी पण्डिता रमाबाई ने भी सती प्रथा को समाप्त करने के लिए अंगे्रज सरकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए लिखा था कि ÷ लार्ड विलियम बैण्टिक भारतीय गवर्नर जनरल थे। उनके पास वह नैतिक साहस था, जिससे वह 1829 का वह प्रसिद्ध कानून लागू करवा सके जो ब्रिटिश शासन में सती के धार्मिक रिवाज को प्रतिबन्धित करता था।'19

दलित व स्त्रियों के प्रति अंग्रेज शासकों की सकारात्मक भूमिका का स्वागत करने के साथ साथ जोतिबा फूले और पण्डिता रमाबाई दोनों ने ही अंग्रेजों के ब्राह्मण सत्ता से गठजोड़ की आलोचना भी की। जोतिबा फूले ने अपने एक लेख में लिखा था , ÷ अंग्रेज सरकार ने आज तक रॉयल और लोकल फण्ड का करोड़ों रुपया ब्राह्मण पुरोहित नाम की केवल एक जाति पर खर्च करके उन्हें विद्वान बनाया और सरकारी नौकरियों में उन्हें बड़ी बड़ी जिम्मेदारी के अधिकार पद देकर पूरी तरह से सुविधाभोगी बनाया है और इसका कारण भी यही हो सकता है कि ऐसे आपातकाल में ब्राह्मण विद्वान सरकार के लिए उपयोगी होंगे।'20 पण्डिता रमाबाई भी अंग्रेजी राज रूपी इस साधन की सीमाओं को जानती थीं, इसीलिए वे कह सकीं कि, ÷ हम ब्रिटिश सरकार को असहाय स्त्री की रक्षा नहीं करने के लिए दोष नहीं दे सकते, क्योंकि वे तो मात्र भारत के पुरुषों के साथ की गयी अपनी संधियों को ही पूरा कर रही है।... प्राचीन संस्थाओं के सिद्धान्तों एवं ताकतों के विरोध में जाकर... भारत में ब्रिटिश शासन का लाभ खतरे में पड़ जाएगा।'21 और सचमुच यही हुआ, जब ब्रिटिश शासन ने भारत की पुरातन सामन्ती संरचना व प्रथा में हस्तक्षेप किया तो 1857 की वह उथलपुथल हुई, जिससे ब्रिटिश शासन खतरे में पड़ गया।...

 

ना ईरान ने किया , ना शाह रूस ने

अंग्रेज को तबाह किया कारतूस ने

बहादुरशाह जफर की उपरोक्त पंक्तियां जिस कारतूस को अंग्रेजों की तबाही का कारण मानती हैं वह बेअसर हो जाता यदि उत्तर भारत की अंग्रेज सेना ( बंगाल नेटिव आर्मी) पर उच्च हिन्दू सवर्णों ( ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहारों) का आधिपत्य न होता। यद्यपि 1833 के सुधारों के फलस्वरूप सेना की संरचना में भी परिवर्तन आने लगा था, जहां 1815 में बंगाल पैदल सेना में 80 प्रतिशत सैनिक उच्च सवर्ण जाति के थे, वहीं 1842 तक आते आते यह संख्या कम होकर दो तिहाई हो गयी थी और 1857 के आसपास यह 55 से 60 प्रतिशत तक ही थी। इसका कारण उदारवादी नीतियों के चलते ÷ लार्ड विलियम बेण्टिक और उसके सलाहकारों का यह निष्कर्ष था कि ब्राह्मणों और राजपूतों द्वारा तैनाती के दौरान जाति श्रेष्ठता के मुद्दों को अधिक वरीयता देना सेना के अनुशासन के लिए गम्भीर खतरा था।'22 अतः सेना में अन्य वर्गों को शामिल करने के लिए 1834 में ÷ जनरल आर्डर' जारी कर वह सरकारी प्रतिबन्ध हटा लिया गया ÷ जिसके अनुसार मुसलमानों में कुछ समुदायों एवं हिन्दुओं में अहीर, भाट, कायस्थ और कुर्मियों की भर्ती पर रोक थी।'23 बंगाल सेना में उच्च जातियों का एकाधिकार 1840 के दशक में तब और कमजोर हुआ, जब पंजाब की सीमा की रक्षा के लिए सिख इन्फैन्ट्री की दो स्थानीय रेजीमेण्टों का गठन कर, इसमें पठान, पंजाबी, मुसलमान, सिख और सभी जातियों के हिन्दू शामिल किये गये। दरअस्ल इन नयी रेजीमेण्टों के गठन के मूल में ब्राह्मण और राजपूत सैनिकों का वह आक्रोश था, जो उन्होंने अपना बट्टा भत्ता छीनने पर दिखाया था। यह भत्ता ब्रिटिश नियंत्रण के बाहर के इलाकों में तैनाती के दौरान सैनिकों को दिया जात&#