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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

आखिरी मंजिल

रवीन्द्र वर्मा

अपूर्णता ही आखिरी मंजिल है

- ईब्स बोनफ्वाय

 

धरती पर देह पड़ी थी।

माधव दयाल ने अचानक आंखें खोलीं। जैसे कोई सपना टूटा हो। दोनों ओर एक एक आकृति नजर आयी। स्त्री आकृति थी। मगर दोनों ओर धुंधलापन था। आकृतियां लम्बे धब्बों सी लगती थीं। धब्बे लम्बे थे। धरती पर लेटे माधव दयाल को धब्बे और लम्बे लगे।

÷÷ चश्मा!'' वे चीखे।

सुनन्दा ने चश्मा मेज से उठाया , उसकी कमानियां सीधी कीं और झुक कर उसे जमीन पर लेटे माधव दयाल की आंखों पर लगा दिया। वह खुद अचम्भे में थी। उसके गालों पर आंसू की लड़ियां थीं। उसने एकाएक पिता की आंखें खुलती देखी थीं। जैसे किसी बन्द गुफा का दरवाजा खुल रहा हो।

÷÷ सुनन्दा।'' माधव दयाल सहज स्वर में बोले।

÷÷ जी, पापा।'' सुनन्दा ने रूमाल से आंसू पोछते हुए कहा।

÷÷ क्यों रो रही हो?''

÷÷ आप अच्छे हो गये, पापा!''

वे हंसे , ÷÷ क्या मैं मर गया था?''

चुप्पी।

÷÷ इसीलिए मुझे जमीन पर रखा था!'' वे फिर हंसे।

उनकी आंखें सिर और दाढ़ी के सफेद बालों से घिरी थीं। सफेद ऊबड़खाबड़ भौंहें चश्मे के ऊपर झांक रहीं थीं। उनके मन में कोई सन्देह नहीं बचा। सचमुच कुछ देर पहले उनकी सांस रुकी थी। तभी उन्हें पलंग से उतार कर जमीन को सौंप दिया गया था। कितनी देर पहले ? कितनी देर वे जमीन पर थे?

÷÷ मैं कब मरा था, सुनन्दा?''

सुनन्दा पहले अचकचायी , फिर उसने पिता की क्षैतिज देह के दूसरी ओर खड़ी आकृति की ओर देखा। माधव दयाल ने सुनन्दा की नजर का पीछा किया जैसे वह अपने सवाल का जवाब पाने का कोई रास्ता हो। उनकी नजर उस चेहरे पर ठिठक गयी : एक लम्बी बूढ़ी औरत थी, जिसके गोल चेहरे पर कुछ झुर्रियां थीं; सांवला चेहरा खिचड़ी बालों से घिरा था। वह हौले से मुस्करायी। उनकी उलझन बढ़ गयी।

÷÷ कौन है?'' वे बुदबुदाये।

मुस्कान चित्र की तरह खिंची रही।

÷÷ आप कौन हैं? वे फिर बोले। तभी उनकी नजरें मिलीं। वही चमक थी। जैसे कोई दूसरे जन्म में मिल रहा हो।

÷÷ मधु...'' उनके मुंह से अस्फुट स्वर फूटे।

÷÷ हां, पापा।'' सुनन्दा ने सहज होने की भरसक कोशिश की, ÷÷ मम्मी हैं। आज सुबह दिल्ली से आयी थीं। आपकी तबियत देखने आ गयीं।'' मधु के चित्र से स्वर भ+रे, ÷÷ अब तबियत कैसी है?''

÷÷ मगर मैं मरा कब था?'' यह कहते हुए माधव बैठ गये जैसे लेटा हुआ आदमी बैठ जाता है।

जब वे बैठे तो सीधे देख रहे थे। पहले उन्होंने बायें देखा जहां सुनन्दा खड़ी थी , फिर दायीं ओर जहां मधु थी। दोनों चुप थीं। उन्होंने दायीं ओर से नजर बायीं ओर घुमायी, फिर बायीं ओर से दाहिनी ओर। चुप्पी जारी थी। क्या चुप्पी ही सवाल का जवाब थी?

तभी सुनन्दा बोली , ÷÷ आप मरे नहीं थे, पापा।''

÷÷ फिर?'' माधव दयाल की नजर फिर बायीं ओर धूमी।

÷÷ आप कहीं और थे।''

÷÷ कहां?''

÷÷ पता नहीं।''

÷÷ क्या यही पता करने को मुझे नीचे उतारा गया था?'' वे हंसे।

कोई और नहीं हंसा।

÷÷ नीचे हमने नहीं उतारा था, पापा।''

माधव ने प्रश्नवाचक नजर से मधु की ओर देखा।

÷÷ पण्डित ने उतारा था।'' सुनन्दा ने झट कहा।

÷÷ पण्डित?... कौन सा पण्डित?'' माधव ने कमरे में चारों ओर देखा।

÷÷ जो आपको गीता सुना रहा था।''

÷÷ मैंने न गीता सुनी, न पण्डित को देखा।''

÷÷ तब आपकी आंखें बन्द थीं।''

÷÷ शायद मैं कहीं और था।'' वे फिर हंसे।

÷÷ हां, पापा, तभी पण्डित जी आये और गीता का पाठ करने लगे।''

÷÷ वे कहां गये।'' माधव ने फिर चारों ओर नजरें दौड़ायीं।

÷÷ आपकी आंखें खुलते ही चले गये।''

÷÷ चले गये?''

÷÷ हां।''

माधव दयाल सहसा खड़े हो गये और मधु के पार देखने लगे। मधु के पीछे खिड़की थी। खिड़की खुली थी। खिड़की में कुछ दूर गुलमोहर की पत्तियां हिल रही थीं। सांवला उजाला पत्तियों को घेरे था। उन्हें लगा जैसे सूर्य अगले क्षण निकलेगा और पत्तियां चमकने लगेंगी।

÷÷ कितना बजा है?'' माधव दयाल ने पूछा।

÷÷ छः।'' सुनन्दा ने कहा।

÷÷ सूरज अभी तक नहीं निकला?'' उन्होंने भंवें सिकोड़ीं।

सुनन्दा हंसी , ÷÷ सूरज डूब रहा है।''

माधव ने सवालिया नजरें उसकी ओर घुमायीं।

÷÷ पापा, अभी शाम के छः बजे हैं।''

एकाएक उन्हें याद आया कि वे सुबह गहरी प्रतीक्षा में थे। क्या वह आज ही की सुबह थी ?

÷÷ आज क्या तारीख है?''

÷÷13 मई।''

वे बाहर के हॉल में टी.वी. की ओर भागे। उन्होंने रिमोट से एन.डी.टी.वी. लगाया। खबरें आ रहीं थीं। यह अप्रत्याशित था। ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी। समाचार वाचक कह रहा था कि भाजपा का सूरज आम चुनाव में डूब गया है। वे सोफे पर पसर गये। उन्होंने आंखें मूंद लीं। उनके होठों से ये शब्द निकले , ÷÷ सुनन्दा, जरा पंखा तेज कर दो।''

उन्हें सहसा बहुत गर्मी लगी थी।

उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। दिल की सबसे भीतरी परत में जरूर एक उम्मीद छिपी थी। लेकिन वह ऐसी शाश्वत उम्मीद थी जो तभी टूटती है जब सांस टूटती है। ऐसी हताश उम्मीद सच निकलेगी , यह माधव दयाल ने नहीं सोचा था। यह 1978 के इमर्जेंसी के चुनावफल की तरह ही था जब वे बूढ़े नहीं हुए थे - मगर बेचैनी ऐसी ही थी। यह बेचैनी कुछ उसी मोमबत्ती की तरह थी जिसे हाथ में लिए वे पिछले हफ्ते की एक गर्म शाम शहीद स्मारक से आम्बेडकर पार्क तक जुलूस में चले थे। अंधेरा हो गया था। यह भाजपा के विरुद्ध चुनावचिन्ह का मोमबत्ती जुलूस था। दो लम्बीं कतारों में अंधेरे में चलती जलती मोमबत्तियां किसी चमत्कार सी लगती थीं। अगले दिन अखबारों में छपे चित्रों को देख कर यही लगा था। शहर के लोगों ने बूढ़ा जान कर उन्हें आने के लिए फोन नहीं किया था। लेकिन अखबार में सूचना देख वे खुद ही चले गये थे। वे जानते थे कि इससे उनकी बेचैनी कुछ देर को ही सही, दूर होगी।

माधव दयाल को लगा कि वही हाथ की मोमबत्ती अभी दिल के अंधेरे में फिर जल गयी थी। उन्होंने आंखें खोल दीं।

÷÷ कॉफी पियेंगे?'' यह सुनन्दा की आवाज नहीं थी। उसकी मां की आवाज थी, जिसमें समय का बोझ घुल गया था। वह पारे सी भारी थी। माधव ने बायीं ओर देखा जहां मधु बैठी थी। उसका चेहरा निर्विकार था। उसमें जीवाश्म सी यह जानकारी थी कि माधव दिन के तीसरे पहर कॉफी पीते हैं।

÷÷ पापा, कॉफी बनाऊं?'' दूसरी ओर से सुनन्दा की आवाज आयी।

÷÷ हां।'' माधव ने कहा।

जब सुनन्दा किचन में चली गयी तो माधव मधु की ओर देखते हुए बोले , ÷÷ तुम्हें पच्चीस बरस बाद देख रहा हूं। पहली नजर में पहचान नहीं सका।''

मधु मुस्कुरायी , ÷÷ तुम्हें देखने आयी थी। ... सोचा नहीं था कि हम फिर इस तरह बैठ कर बात करेंगे।''

वे हंसे , ÷÷ क्या बात करें हम?''

चुप्पी।

÷÷ तुम्हारा नाम है। तुम सफल हो।'' मधु ने कहा।

÷ शायद।'' माधव के होंठ मुस्कान में तिरछे हो गये थे।

÷÷ क्या तुमने जीवन से वह पा लिया जो तुम पाना चाहते थे?''

÷÷ मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं क्या चाहता हूं।'' वे हंसे।

÷÷ जब हम अलग हुए तुम्हें पता था?''

÷÷ तब मुझे यह पता था कि मुझे क्या नहीं चाहिए।''

चुप्पी। चुप्पी की बर्फ। जिसमें ठण्डक नहीं थी।

सुनन्दा खिलखिलाती हुई हाथ में कॉफी की ट्रे लिए हुए आयी। कुछ घुंघरुओं का बिखरते जाना याद आता था। मां की तरह सांवली थी। लम्बी भी। हंसती हुई सुन्दर लगती थी जैसे झीने बादलों में सूर्य उग रहा हो। मगर घुंघरू नकली थे। माधव दयाल उसके चेहरे की ओर ताक रहे थे। उसने एक एक कप माता पिता के सामने रखा और तीसरा कप अपने हाथ में लेकर बैठ गयी। वह अब हंस नहीं रही थी। वह कॉफी का कप अपने होठों की ओर ले जा रही थी जो कॉफी का इंतजार कर रहे थे। अब वह सहज लगती थी। सुनन्दा अपनी मां की बेटी लगती थी। उन्होंने बायीं आंख से मधु को और दायीं आंख से सुनन्दा को देखा। फिर दोनों को एक साथ देखा। वे अचम्भे में आ गये। सुनन्दा वैसी ही दिख रही थी जैसी मधु तब लगती थी जब वे अलग हुए थे। सामने मधु को देख कर उन्हें यह अहसास हुआ था। सुनन्दा को अकेले देखते हुए कभी ऐसा नहीं लगा। मधु शायद तसव्वुर के दायरे से बाहर चली गयी थी।

कुछ पल दोनों को ताकते हुए उन्हें याद आया कि सुनन्दा जब पैदा हुई तो उसकी नाक देख कर वे चौंके थे। उसकी नाक मां की तरह तोता नाक नहीं थी , जिस पर वे फिदा थे। सुनन्दा की नाक कुछ चपटी थी। तब उन्होंने मधु से कहा था कि अच्छा है, यह तुम्हारी तरह मिर्च मिजाज नहीं होगी। माधव दयाल ने अपने को झकझोरा। उन्हें लगा जैसे चलते चलते अचानक उनका पैर धूल में चला गया हो। उन्होंने अपना पैर वापिस खींचा।

÷÷ लगता ही नहीं।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷ कि कुछ देर पहले आप बीमार थे।''

÷÷ मुझे भी नहीं लगता।'' कह कर माधव दयाल ठठा कर हंसे।

उन्हें कुछ याद नहीं था। उन्हें सिर्फ दोपहर में खाना खाकर लेटना याद था। फिर अभी कुछ देर पहले अपने शरीर को जमीन पर पड़ा हुआ पाना। जमीन पर पड़ा हुआ पाना और अपने ही जिस्म को उठा कर बिठाना और खड़ा करना जैसे किसी दूसरे का जिस्म हो। मधु और सुनन्दा से नजर बचा कर उन्होंने एक बार ऊपर से नीचे तक अपने कुर्ते पाजामे में छिपे जिस्म को देखा और मुस्कराये। उन्हें अचानक अपनी देह का अतिक्रमण करने की पुरानी इच्छा और न कर पाने की हताशा याद आयी।

वे सोफे पर सधे सन्तुलित बैठे थे।

सुनन्दा ने बताया कि तीसरे पहर जब वह हाथ मे कॉफी का कप लिए उनके कमरे में घुसी और उन्हें पुकारा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था। तीसरी बार पुकार कर उसने उनका हाथ और सीना छुआ जहां कोई हरकत नहीं थी। फिर वह चीखी थी। चीख सुन कर पड़ोस से पण्डित जी आ गये थे। उन्होंने देह को धरती पर उतार दिया और गीता का पाठ शुरू कर दियाः वासांसि जीर्णानि.....

जैसे कोई पुराने वस्त्र उतार कर नये वस्त्र पहनता है , उसी तरह आत्मा शरीर बदलती है। आत्मा अमर है। इसे न आग जलाती है, न पानी भिगोता है, और न हवा सुखाती है।

माधव दयाल हंसने लगे।

÷÷ क्यों हंसे, पापा?''

÷÷ अपनी अमर आत्मा के लिए।'' वे अब भी हंस रहे थे।

÷÷ क्या आपको अमर आत्मा पर विश्वास नहीं?''

÷÷ अमर आत्मा पर नहीं।'' वे मुस्कराते हुए बोले, ÷÷ आत्मा पर विश्वास है जो शरीर के साथ जल जाती है।''

÷÷ मैं समझी नहीं।'' सुनन्दा ने कहा। मधु निर्विकार थी। उसका चेहरा सपाट था। जैसे वह किसी अजायबघर में बैठी हो।

÷÷ तुमने जरूर अखबार में ऐसी खबर पढ़ी होगी।'' माधव ने कहा, ÷÷ किसी बच्चे को कोई लोमड़ी उठा ले गयी और फिर बच्चा जंगल में जानवर की तरह बड़ा हुआ। उसकी आत्मा कहां गयी? असल में बच्चे को अपनी आत्मा अपने समाज से मिलती है।''

÷÷ लेकिन उसके जीन्स?'' सुनन्दा ने आंखें ऊपर उठायीं। वह मुस्करायी। मधु भी।

÷÷ जीन्स को भी समाज ही जगाता है जिसे हम बचपन के संस्कार कहते हैं। जीन्स को जरूर अमर आत्मा की श्रृंखला कह सकते हैं।''

मधु और सुनन्दा की आंखें बिल्कुल एक सी थीं। कुछ नुकीली और ज्यादा गहरी।

माधव दयाल फिर हंसे। उन्होंने कहा , ÷÷ देखो, मेरा अभी पुनर्जन्म हुआ है और मैं दर्शन बघार रहा हूं।''

÷÷ चलो।'' मधु बोली, ÷÷ कम से कम तुम पुनर्जन्म में तो विश्वास करते हो।''

÷÷ हां।'' माधव ने कहा, ÷÷ इसी जन्म में पुनर्जन्म। जैसे आदमी मौत के पहले कभी कभी मरता है, उसी तरह मौत के पहले कभी कभी दुबारा पैदा भी हो जा जाता है।''

सब चुप हो गये। कोई हवा का झोंका खिड़की से अन्दर घुसा। खिड़की में अंधेरा घिरने लगा था। सुनन्दा ने उठ कर ट्यूब जला दिया।

÷÷ बधाई।'' दरवाजे से आवाज आयी।

माधव दयाल ने पलट कर देखा और एकदम खड़े हो गये। वे मुस्कराते हुए आगन्तुक की ओर बढ़े , जो उन्हीं की उम्र के आसपास था लेकिन काले बालों और सफाचट दाढ़ी की वजह से छोटा लगता था। उन्होंने सवालिया नजर से मदन मोहन की ओर देखा।

÷÷ देश की नयी आजादी के लिए बधाई।'' मदन मोहन ने कहा।

÷÷ हां।'' माधव मुस्कराये, ÷÷ बधाई।''

मोहन ने मुस्कराते हुए सुनन्दा से कहा , ÷÷ कैसी हो?'' फिर उन्होंने मधु की ओर देखा। ÷÷ सुनन्दा की मां है।'' माधव ने परिचय कराया।

मधु ने नमस्ते किया। फिर अन्दर चली गयी। उसके पीछे पीछे सुनन्दा गयी।

÷÷ आज शताब्दी से दिल्ली से लौटा हूं, ÷÷ मोहन बोले, ÷÷ कल अकादमी की मीटिंग थी शाम हुई तो सोचा कि तुम्हें बधाई दे दूं।''

एकबारगी माधव की समझ में न आया कि मोहन बधाई दे रहे हैं या उन्हें यह बता रहे हैं कि वे कल साहित्य अकादेमी की मीटिंग में गये जिसके वे उपाध्यक्ष हैं। यह भी जानते थे कि मोहन को खुद इसका इल्म नहीं है। इल्म न होने के अपने फायदे थे। सबसे बड़ा फायदा यही था कि आदमी अपने में प्रसन्न रहता था।

चुनाव के पहले मोमबत्ती जलूस में दोनों एक साथ शामिल हुए थे। एक कतार में पहले मदन मोहन थे , दूसरी कतार में आगे माधव दयाल थे। दोनों शहर के वरिष्ठतम लेखक थे। नारे युवा संस्कृतिकर्मी लगा रहे थे। कुछ के हाथों में नारे लिखीं पट्टियां थीं। दो लड़के सबसे आगे एक लम्बी पट्टी लिए चल रहे थे जिस पर लिखा थाः

कुछ और औरतें चाहिए जो मरें

साड़ी बांट की भगदड़ में

अटल जी फिर एक बार कहें

देश में जरूर कहीं अंधेरा है

संकेत लखनऊ के चन्द्रशेखर पार्क के हालिया साड़ी काण्ड में इक्कीस महिलाओं की मृत्यु की ओर था , जिसकी भोली प्रतिक्रिया में अटल जी ने दो बातें कहीं थीं : एक, ÷ इण्डिया शाइनिंग' में अंधेरा भी है; दो, काश! मैं मर जाता। माधव दयाल हैरत में आ गये थे। अपनी जवानी में पुराने लखनऊ की गलियों में पत्रकार होकर रहे निम्नमध्यवर्गीय प्रधानमंत्री को देश का अंधेरा देखने के लिए अपना तन ढांकने को साड़ी लूटती इक्कीस महिलाओं की मृत्यु दरकार थी। उनकी आंखों के सामने बार बार एक दृश्य कौंधता : चन्द्रशेखर पार्क। शामियाना लगा है। जगरमगर रोशनी है। एक मंत्री का जन्मदिन मनाया जा रहा है। यह मुनादी कर दी गयी है कि साड़ियां बटेंगी। औरतें...बेशुमार औरतें जमा हो गयी हैं। औरतों का हुजूम देख कर आयोजक साड़ियों के गट्ठर उनके बीच फेंक देते हैं। लूट की भगदड़ में इक्कीस औरतें मरतीं हैं, बहुत सी घायल हो जाती हैं। यह बात अलग है कि जिन साडियों पर वे झपटी थीं, वे असल में चालीस रुपये की सूती धोतियां थीं। ÷ साड़ियां' क्यों कहा? ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के लिए। ताकि साड़ियां लूटती हुई इक्कीस औरतें जब मरें तो उन्हें यह मालूम ही न हो कि जिन साड़ियों के लिए वे जान दे रहीं हैं, वे चालीस रुपये की धोतियां हैं!

दोनों ने फिर देश के बच जाने की बात की। माधव दयाल ने कहा कि इमर्जेन्सी के बाद 1978 के चुनाव के नतीजों की याद आ रही है। तब भी ऐसा ही अनिश्चय था, मोहन बोले।

÷÷ और ऐसा ही डर!'' माधव ने कहा।

सुनन्दा कॉफी के दो प्याले रख गयी। वे दोनों कॉफी सुड़कने लगे। खिड़की के बाहर अब पूूरा अंधेरा था। लेकिन यह मई का अंधेरा था। घना नहीं था। यह छितरा हुआ अंधेरा था।

÷÷ वैसे आज का यह वक्त कॉफी के लिए नहीं है।'' मोहन ने पहला घूंट लेकर कहा।

÷÷ व्हिस्की के लिए है।'' माधव हंसे, ÷÷ मेरे पास कुछ स्कॉच पड़ी है।''

माधव दयाल इतनी तेजी से अन्दर गये कि अन्दर बैठी मधु और सुनन्दा दोनों चौंक गयी।

÷÷ क्या हुआ, पापा?'' सुनन्दा ने कहा।

÷÷ कुछ नहीं।'' कहते हुए माधव ने अलमारी खोली और एक बोतल निकाली जिसमें आधी शराबथी।

मधु शराब को देख कर मुस्करायी। वह मुस्कान तिरछी थी जिसमें नीचे का होंठ टेढ़ा हो जाता था। उसकी नाक की नोक लाल हो गयी - जैसे कोई जहर उतर रहा हो। माधव ने उस नाक को देखा। उन्हें लगा कि कोई पुरानी चोट एकाएक हरी हो गयी है।

बीच का समय क्या कोई गुब्बारा था जो अचानक फुस्स होकर सिकुड़ गया था ?

माधव दयाल ने मधु की सिर्फ नाक देखी थी। न आंखें देखीं , न चेहरा। वे बोतल हाथ में लिए हॉल की ओर बढ़े जहां मोहन उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?''

माधव को लगा जैसे उसी चेहरे की आवाज उनका पीछा कर रही है जिसे उन्होंने नहीं देखा था। उन्होंने सिर पीछे घुमाया। सुनन्दा उनका पीछा कर रही थी। जब माधव ने बीच की मेज पर बोतल रखी सुनन्दा तीसरी ओर सोफे पर बैठ गयी। उसने मदन मोहन को माधव का दिन भर का स्वास्थ्य बुलेटिन सुनाया और पूछाः ÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?''

÷ हां।''

जब यह आवाज सुनन्दा के कानों में पड़ी तो उसने हैरत से मदन मोहन के मुंह की ओर देखा , जो बन्द था। तब तक कुछ हंसी भी उसके कानों में पड़ी। न कोई बन्द मुंह से बोल सकता था, न हंस सकता था। दरअसल माधव दयाल खुद हंस रहे थे। सुनन्दा ने झट गर्दन घुमा कर उनकी ओर देखा।

÷÷ क्यों?'' सुनन्दा का स्वर था।

÷÷ मेरा पुनर्जन्म मनाने के लिए।''

मदन मोहन हतप्रभ थे। वे लगातार तिरछी , चोर नजर से माधव की जानिब देख रहे थे जैसे माधव अचानक किसी आश्चर्यलोक से अवतरित हुए हों। यह आश्चर्यलोक मृत्यु का नगर था।

÷÷ विश्वास नहीं होता।'' मोहन के मुंह से शब्द फूटे।

÷÷ क्या?'' माधव ने कहा।

÷÷ यही कि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ। मैंने ऐसी बातें गांवों में सुनी और अखबारों में पढ़ी थीं।''

÷÷ मुझे खुद विश्वास नहीं होता।'' माधव बोले।

÷÷ क्या?''

÷÷ कि मैं आज ही मरा और उसी शरीर में पैदा हो गया।'' वे हंसे।

÷÷ यह हंसने की बात है।'' मोहन ने विस्मय से माधव के हंसते चेहरे को देखा।

÷÷ पापा देर से इसी तरह हंस रहे हैं।'' सुनन्दा बोली।

÷÷ यह उम्र।'' माधव ने मुस्कराते हुए कहा, ÷÷ मौत पर रोने की नहीं है।''

÷÷ क्या मौत हंसने की बात है?'' मोहन माधव की तरफ ताक रहे थे।

÷÷ कम से कम जब अपनी हो।'' माधव फिर हंसे।

मोहन का चेहरा स्तब्ध था।

÷÷ तुम इतने संजीदा क्यों हो गये?'' माधव अब मुस्कुरा रहे थे।

दरअसल मोहन सोच रहे थे कि यदि माधव आज धरती से न उठते तो इस समय यहां मातम छाया होता। चारों ओर मृत्यु की छाया होती। मोहन मृत्यु के बारे में सोचते नहीं थे। उन्हें लगता था कि अभी जीवन बाकी है।

÷÷ क्या मृत्यु एक गम्भीर विषय नहीं है?'' मोहन मुस्कराये।

÷÷ जरूर।'' माधव ने कहा, ÷÷ प्लैटो इस विषय पर रोज मनन करने की सलाह देता है।''

÷÷ रोज?''

÷÷ हां।''

÷÷ रोज मैं जीवन के बारे में सोचता हूं।'' मोहन बोले, ÷÷ अपनी अगली कहानी के बारे में।'' फिर कुछ रुक कर, ÷÷ क्या तुम अगली कविता के बारे में नहीं सोचते?''

÷÷ सोचता हूं।'' माधव ने कहा, ÷÷ लेकिन मृत्यु के बारे में हर सुबह सोचता हूं।''

÷÷ मृत्यु के बारे में सोचने के लिए क्या है?'' मोहन के स्वर में खीझ थी।

÷÷ मैं यही सोचता हूं।'' माधव हंसने लगे।

मेज पर शराब की बोतल रखी थी जो आधी खाली आधी भरी थी। सुनन्दा अन्दर चली गयीथी।

माधव ने दोनों गिलासों में शराब , शराब में पानी और पानी में बर्फ डालते हुए सोचा कि सचमुच मृत्यु में कुछ नहीं है। शायद इसीलिए उन्हें इस मसले पर आज बार बार हंसी आ रही थी। उन्हें हंसी इस बार इस बात पर भी आयी कि मोहन जिस अगली कहानी या अगले उपन्यास की बात कर रहे थे वह दो तीन साल से आने का ऐलान कर रहा था, मगर आ नहीं रहा था।

÷÷ क्यों हंस रहे हो?'' मोहन ने गिलास हाथ में लेते हुए पूछा।

÷÷ हम जीवन पर तो हंस ही सकते हैं।'' माधव मुस्करा रहे थे।

÷÷ हां।'' मोहन ने एक घूंट पीकर कहा, ÷÷ हम इसे क्या कहें कि जब आज तुम्हारा पुजर्जन्म हुआ तो देश ने भी मुक्ति की सांस ली।''

÷÷ संयोग।'' माधव ने गिलास ऊपर उठाया, ÷÷ विशुद्ध संयोग!''

ऐसा संयोग माधव दयाल के जीवन में एक बार पहले भी हुआ था , जिसे उन्होंने फिर याद किया। 1978 के अप्रैल में वे दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। जब देश इमर्जेन्सी से मुक्त हुआ, वे मधु से अलग हुए थे। दिल्ली के फ्लैट की घुटन यहां नहीं थीं। इन्दिरानगर की बरसाती के सामने खुली छत थी, जिस पर वे उसी तरह सोते थे जैसे चिड़िया पेड़ पर सोती है। न रोज रोज की कलह थी, न हर दूसरी शाम शराब के बहाने पैसों के लिए टोका जाना था। शाम को वे हजरतगंज की खुली हवा में घूमते या काफी हाउस में बहस करते।

क्या इतिहास मेरे जिस्म से गुजरता है ? माधव दयाल इस ख्याल से चौंके। वे चौंके इस बात पर भी थे कि उन्हें सुनन्दा की दो चोटियों की वह बचपन की तस्वीर याद आ गयी थी जिसे वे दिल्ली छोड़ते हुए अपने साथ लाये थे। दिन में दो चार बार जब वे अकेले होते, उसे जेब से निकाल कर देख लेते जैसे तस्वीर कोई आईना हो।

÷÷ एक बात कहूं।'' मोहन अन्दर के कमरे की ओर देखते हुए बोले।

÷÷ कहो!''

÷÷ आज यह फ्लैट घर जैसा लग रहा है।''

माधव मुस्कराये।

÷÷ मैं।'' मोहन ने फिर कहा, ÷÷ मैं घर के बिना नहीं रह सकता।''

÷÷ तुम भाग्यशाली हो।'' माधव बोले।

खिड़की के बाहर अंधेरा था , जिसमें कुछ पेड़ों की आकृतियां थीं।

पेड़ चुप थे। कोई आवाज नहीं थी। आवाज अन्दर भी नहीं थी।

गिलासों में फिर शराब डाली गयी थी। शराब में पानी और पानी में बर्फ डाला गया था। फिर गिलास दोनों ओर होठों की जानिब बढ़े थे। एक पल ऐसा लगा जैसे गति सिर्फ गिलासों में है।

÷÷ क्या यह फ्लैट इसी तरह घर नहीं रह सकता?'' मोहन ने एक घूंट लेकर कहा।

माधव मुस्कराये।

÷÷ इस उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।''

÷÷ इस उम्र में क्या।'' माधव हंसे, ÷÷ किसी भी उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।''

मोहन गौर से माधव की ओर देख रहे थे। वे समझ नहीं पाते थे कि कोई इस तरह अकेले कैसे जिन्दगी गुजार सकता है। बरसों पहले उन्होंने शहर में माधव की मोहब्बत के चर्चे सुने थे। मगर विवाह तक बात नहीं पहुंची। यह सुनने में आया था कि उनकी प्रेमिका पाकिस्तान चली गयी। वह शाइरा थी। खूबसूरत थी। उसका रंग सोने की तरह दमकता था। उसका नाम शहनाज था। जब एक बार शहनाज के बारे में मोहन ने माधव से पूछा था , तो माधव चुप रह गये थे जैसे उन्हें यह नागवार गुजरा हो। यह शहनाज के पाकिस्तान जाने के पहले की बात है। बाद में किसी ने बताया था कि शहनाज ने पाकिस्तान में शादी कर ली है और माधव की कविताओं के उर्दू में अनुवाद की पुस्तक छपायी है।

÷÷ मैं अकेला नहीं रह सकता।'' मोहन ने कहा।

÷÷ कोई अकेला नहीं रहना चाहता।'' माधव ने जोड़ा।

मोहन माधव से कहना चाहते थे कि अब मधु रिटायर हो गयी है , अकेली दिल्ली में रहती है जैसे तुम अकेले लखनऊ में रहते हो। मधु तुम्हारी बेटी की मां है। अब एक बार साथ रहने की कोशिश करने में क्या हर्ज है? लेकिन वे जानते थे कि माधव को अच्छा नहीं लगेगा। वे शहनाज के बारे में सवाल का माधव का शून्य उत्तर भूले नहीं थे। उन्हें यह सोच कर ताज्जुब होता था कि वे माधव को अपने पारिवारिक रिश्तों के बारे में सब कुछ बताते थे और माधव उन्हें कुछ नहीं बताते थे। इस तरह कोई अपने में ही रहे तो रुंध नहीं जाएगा? वे अपने से पूछते। लेकिन माधव ऐसे नहीं लगते थे। उनकी मुस्कान चौड़ी थी। वे खुल कर ठहाका लगाते थे।

दोनों गिलास खाली हो गये थे। वे रोशनी में चमक रहे थे।

माधव ने दोनों गिलासों में फिर शराब उड़ेली। शराब को पानी और बर्फ से ढक दिया।

मोहन ने गिलास उठाते हुए कहा , ÷÷ अरे मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गया।''

÷÷ क्या?''

÷÷ कल शाम पांच बजे हिन्दी संस्थान में कंचन कुमारी के कहानी संकलन का लोकार्पण है। तुम जरूर आना।''

माधव दयाल ने तेज नजर से मदन मोहन की जानिब देखा।

÷÷ ये कंचन कुमारी कौन हैं?''

÷÷ कंचन कुमारी नारीवादी आन्दोलन का प्रमुख नाम है। वे सूचना विभाग में काम करती हैं।''

माधव को पुस्तक के लोकार्पण उत्सव से चिढ़ थी। उनका कहना था कि किताब कोई बांध या बिजलीघर नहीं है जिसे खोल कर जनता को सौंपा जाए। किताब का लोकार्पण उसका पढ़ा जाना है। लोकार्पण में किताब को उल्टा पकड़े खड़े लोगों की अखबार में छपी तस्वीरों को देख कर वे मुस्कराने लगते। मोहन यह जानते थे। फिर भी उन्हें इस उत्सव में बुला रहे थे। दरअसल पिछले दो वर्षों में मोहन की ये गतिविधियां बढ़ी थीं जबसे उन्होंने साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीते। यह संयोग हो सकता है कि तभी से उनका अगला उपन्यास आने का ऐलान करता रहा , आया नहीं। या यह किसी खालीपन को भरने की जुगत थी - जिसका अहसास मोहन को खुद नहीं था?

जबकि माधव शहर की गोष्ठियों की अध्यक्षता से बचते थे , मोहन की सप्ताह में दो तीन बार अखबारों में अध्यक्षता या लोकार्पण करते तस्वीर छपती थी।

अक्सर देवानन्द की तरह काले बालों और सफाचट चेहरे की वजह से अखबारों की तस्वीरों में मदन मोहन की उम्र पता नहीं चलती थी। जब कोई उनसे पूछता कि क्या आप अभी यूनीवर्सिटी में पढ़ाते हैं , तो वे मुस्कराने लगते थे। वे यह बताना भूल जाते कि उन्हें रिटायर हुए डेढ़ दशक से ऊपर हो गया। एक बार होली के अवसर पर जब किसी युवा कवि ने उन्हें देवानन्द कहा, तो उन्होंने हंस कर उसके चेहरे पर गुलाल मला और उसे सीने से लगा लिया था। माधव बगल में खड़े मुस्कुरा रहे थे। जब वह युवा कवि चला गया तो माधव बोले, ÷÷ मोहन, एक बात बताऊं।''

÷ क्या?''

÷÷ यह देवानन्द बड़ी खतरनाक शै है।''

÷÷ क्यों?''

÷÷ क्योंकि वह कभी बूढ़ा नहीं होता।''

÷÷ अच्छा है।'', मोहन हंसे, ÷÷ कभी मरेगा भी नहीं।''

÷÷ यह और भी खतरनाक है।''

÷÷ क्यों?''

वे उस समय मदन मोहन की कोठी के सामने लॉन पर बैठे थे। धूप मोहन के चेहरे पर गिर रही थी , जिस पर पीला और लाल गुलाल चमक रहा था। माधव दयाल के चेहरे पर धूप नहीं थी। फिर भी उनकी सफेद दाढ़ी चमक रही थी।

÷÷ अरे।'' सफेद दाढ़ी हंसी, ÷÷ जो मरेगा नहीं, वह जिएगा कैसे?''

बोतल मे थोड़ी सी बची थी। जब मदन मोहन ने चलने को कहा तो माधव दयाल ने बोतल उठा कर दोनों खाली गिलासों में आधी आधी डाल दी। मोहन ने पानी डालने को मना कर दिया। एक घूंट में गिलास खाली करके वे खड़े हो गये। खड़े खड़े उन्होंने कहा, ÷÷ चलता हूं। कल हिन्दी संस्थान में मिलेंगे।''

माधव भी खड़े हो गये थे। वे हंसे , ÷÷ अरे, आज तो मैं पैदा ही हुआ हूं। कल की कल देखेंगे।''

दरवाजे के बाहर सड़क के पार यूक्लिप्टस के पेड़ अंधेरे में खड़े थे। बिजली के खम्भे की मरी सी रोशनी सड़क पर थी , जिस पर मदन मोहन की गाड़ी फिसलती सी लगती थी। माधव दयाल उस गाड़ी की टिमटिमाती बत्तियां तब तक देखते रहे जब तक वह नजर से ओझल नहीं हुई।

 

अपनी दीवार देख कर उन्हें बर्लिन की दीवार याद आयी , चीन की दीवार याद आयी, और हंसी आयी। हंसी इसलिए आयी कि इस याद के साथ कोई टीस नहीं थी। माधव दयाल अपनी स्टडी में सेटी पर लेटे उस दीवार को ताक रहे थे जिसके दूसरी ओर मधु और सुनन्दा बेड रूम में लेटे थे। असल में आज कुछ शराब ज्यादा हो गयी थी। जब वे मदन मोहन को बाहर छोड़ कर अन्दर आये तो उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। अन्दर हॉल में सुनन्दा और मधु आ गयी थीं और उन्होंने लड़खड़ाते पैर देखे थे। खाने के बाद माधव ने सुनन्दा से कहा था कि मैं ठीक हूं, तुम लोग जाओ। इसके जवाब में उसने अपने पति को फोन किया कि मैं और मम्मी आज रात यहीं रुकेंगे, तुम जय को संभाल लेना और कल सुबह उसे स्कूल भेज देना। ÷÷ इसकी क्या जरूरत है?'' जब माधव ने कहा तो सुनन्दा बोली, ÷÷ जरूरत है, पापा!'' फिर वह मुस्करायी और बोली, ÷÷ अगर मैं और मम्मी आज रात यहां रुक जाएं, तो क्या आपको एतराज है?''

÷÷ नहीं।''

मधु कुछ नहीं बोली थी। इस शक की गुंजाइश थी कि उसने ही सुनन्दा को वह कहने को कहा जो उसने कहा। हो सकता है उसने नहीं कहा हो। यह ऊहापोह अब सिर्फ कौतूहल था। इसमें कोर्ई तकलीफ नहीं थी , माधव ने दीवार देखते हुए सोचा। उन्हें यह जान कर अचरज हुआ कि वे दीवार देख कर किंचित्‌ प्रसन्न थे। उनकी खुशी आहिस्ता आहिस्ता भीतर फैली जैसे दीवार कोई नेमत हो। वे सेटी पर लेटे थे। चारों ओर दीवारें थीं। तीन दीवारों से टिकी अलमारियां थीं, जिनमें किताबें भरी थीं। चौथी दीवार की खिड़की से सटी लिखने की मेज थी, जो खाली थी। मेज पर कुछ कोरे पन्ने फड़फड़ा रहे थे।

ऊपर पंखा चल रहा था। हवा कमरे में चारों ओर घूम रही थी। माधव दयाल ने सिर्फ कुर्ता पाजामा पहना। चेहरे पर लम्बी दाढ़ी थी। हवा जिस्म और चेहरे तक छन कर पहुंचती थी। जिस्म के बालों की जड़ों में हमेशा कोई पसीना थकान की तरह रुका लगता था। यह थकान मौसम की थी या समय की ? माधव खुद नहीं जानते थे। वे सिर्फ थकान को जानते थे। हालांकि आज दिन में धरती पर जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो उन्हें पहले क्षण एक शिशु की तरह लगा था। अपनी उम्र का अहसास तब हुआ जब दोनों ओर उन्होंने दो छायाएं देखीं। उम्र के अहसास के साथ उनका हाथ अपनी क्षैतिज दाढ़ी पर गया था, जिस पर दायां हाथ फेरते हुए वे फिर पचहत्तर वर्ष के हो गये थे।

उनकी अमृत जयन्ती तीनों वामपन्थी संगठनों ने मिल कर मनायी थी , जिसका आयोजन रायउमानाथ बली पे्रक्षागृह के बैठक कक्ष मेेेेें था जिसमें चौकोर लम्बी मेजें चारों ओर लगीं थीं और दो ओर पीछे दीवार से टिकी कुर्सियां थीं। सब कुर्सियां भरी थीं। युवा और अधेड़ लेखकों ने उनके अवदान को महान्‌ बताया था। वे सामने बीच में बैठे हुए कभी सिर झुका लेते, कभी मुस्कराने लगते। यह मुस्कान ऐसी थी जो दिखाई नहीं देती थी। जिसका एक कारण दाढ़ी भी हो सकती थी। दूसरा कारण शायद मुस्कान पर पड़ा संशय का कोई पर्दा था जो उतना ही ज्यादा फड़फड़ाता जितना ज्यादा अभिनन्दन होता। अन्त में उन्होंने हंस कर कहा था कि शायद अब मेरा वह दौर है जिसे मुक्तिबोध ने ÷ कीर्ति की पेंशन' का दौर कहा है। मुझे यह ज्यादा रास नहीं आता।

विवाह के बाद माधव के पहले जन्मदिन पर जब मधु ने एक पार्टी का आयोजन किया तो उसने कहा , ÷÷ यह मेरा असली जन्मदिन नहीं है।'' ÷÷ फिर असली जन्मदिन क्या है?'' मधु ने पूछा तो जवाब आया, ÷÷ मुझे नहीं मालूम।'' तब मधु ठहाका मार कर हंसी थी। हंसी रुकने पर उसने कहा, ÷÷ जब तुम अपना जन्मदिन नहीं जानते, तो दुनिया क्या जानोगे?''

÷÷ वाह, दुनिया जानने के लिए मुझे अपने जन्मदिन की क्या जरूरत?''

÷÷ जरूरत है!''

÷÷ क्यों?''

÷÷ क्योंकि दुनिया अपने आप से शुरू होती है।''

÷÷ दुनिया अपने आप से शुरू नहीं होती।''

÷÷ तो!''

÷÷ दुनिया अपने आप पर खत्म होती है।''

वह फिर हंसी थी। यह हंसी तेजाब की तरह तीखी थी। यह उस दीवार की नींव में भरी थी , जो आज दोनों के बीच तनी खड़ी थी।

विवाह के बाद पहली बार जब वे झांसी गये तो मधु ने माधव की मां से माधव की जन्मपत्री मांगी थी। जन्मपत्री बहुत ढूढ़ी गयी , लेकिन मिली नहीं। माधव की बाई खुद भूल गयी थीं, उन्होंने यही कहा। वे काफी बूढ़ी हो गयी थीं और अपनी उम्र भूल गयी थीं। मधु को यह शक भी हुआ कि बाई माधव की विजातीय लड़की से शादी करने पर खुश नहीं हैं। इसलिए कुछ छिपा रहीं हैं। जब बाई ने पूछा कि अब तुम्हें माधव की जन्मपत्री से क्या काम, तो मधु ने कहा कि मुझे इनका सही जन्मदिन पता करना है। यह सुन कर बाई हंसीं और अपने पोपले मुंह से बोलीं, ÷÷ बसन्त पंचमी!''

यह सुन कर माधव सन्न रह गया था। उसने बसन्त पंचमी को निराला का पैदा होना सुना था जैसे उनका इस त्यौहार पर एकाधिकार हो। कोई और भी इस दिन पैदा हो सकता है इसकी उसने कल्पना नहीं की थी। और अब वह खुद इस दिन पैदा हो गया था और उसे मालूम नहीं था! जैसे तैसे उसने अपने को संभाला। अगली बसन्त पंचमी की रात वह अकेला दिल्ली की सड़क पर घूमने निकला। वह कुर्ता पजामा पहने था। कुछ सर्दी थी। बाहर निकलते हुए मधु ने उसे अपनी भूरी शॉल उढ़ा दी थी। वह सड़क पर चला जा रहा था। इसी अंधेरे से उसके कानों में आवाज आयी , ÷÷ बाबू, ठण्ड है। कुछ दे, दो।''

उसने आवाज की ओर देखा। आवाज एक गठरी से आयी थी , जो सड़क के किनारे रखी थी। वह गठरी की ओर बढ़ा। गठरी से एक फैला हुआ हाथ बाहर आया। हाथ कांप रहा था।

उसने आवाज की ओर देखा। आवाज एक गठरी से आयी थी , जो सड़के के किनारे रखी थी। वह गठरी की ओर बढ़ा। गठरी से एक फैला हुआ हाथ बाहर आया। हाथ कांप रहा था। यद्यपि झीना अंधेरा था, मगर हाथ का कांपना माधव दयाल ने देखा। उसे लगा कि हाथ ठण्ड से कांप रहा है। उसके हाथ स्वचालित से अपने कन्धों की ओर बढ़े जहां गर्म शाल पड़ा था। उसके दोनों हाथों ने शॉल कन्धों से उतार कर उस गठरी पर डाल दिया जो सड़क के किनारे रखी कांप रही थी। आगे बढ़ते हुए उसने आगे फैले हाथ को शॉल के भीतर जाते देखा। असल में उसके पेट में शराब और मुर्गे की गर्मी थी और उसे लगा कि उसे भीतर बाहर दोनों गर्मियों का अधिकार नहीं है। इस सोच का उत्स निराला के जीवन की प्रसिद्ध घटना थी जिसमें उन्होंने अपनी गर्म चादर एक भिखारी को दे दी थी। अगली सुबह माधव दयाल को यह सोच कर कोफ्त हुई थी कि वे शराब के नशे में ही ऐसा कर सके।

पिछली रात घर पहुंच कर घमासान हुआ था जब मधु ने शॉल के बारे में पूछा और माधव ने कहा कि मैंने उसे एक भिखारी को दे दिया , जो बाहर ठण्ड में कांप रहा था। मधु स्तब्ध रह गयी। वह भूरा शॉल मधु को बहुत प्यारा था। वह उसे कश्मीर एम्पोरियम में पहली नजर में ही भा गया था। उसकी एक हजार रुपये कीमत देख कर उसने उसे भूलने की कोशिश की थी। मगर वह एम्पोरियम के दरवाजे से वापिस अन्दर गयी थी और शॉल लेकर बाहर आयी थी। पहली बार आज माधव के जन्मदिन पर उसने भूरे शॉल को निकाला था और दानवीर कर्ण उसे भिखारी को दे आये थे। एक तो खुद अपना जेबखर्च भी नहीं कमाते थे, ऊपर से यह दरियादिली!!

मधु बिखर गयी , ÷÷ एक भिखारी दूसरे भिखारी को क्या नहीं दे सकता?''

उसकी आवाज तेजाब में बुझी थी। उसके होंठ खुले थे जैसे वह हंसी हो। उसका स्पष्ट संकेत माधव के स्वतन्त्र लेखन की कैफियत की ओर था। मधु लेडी इरविन कॉलेज में पढ़ाती थी और स्टॉफ फ्लैट में रहती थी। शादी के बाद उसी ने माधव से कहा था कि तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है , घर तो चलता ही है। मुझे गर्व है कि मैं एक लेखक की पत्नी हूं। वह अंग्रेजी पढ़ाती थी। उसे हिन्दी लेखक की नियति का अन्दाजा नहीं था।

कॉलेज के फ्लैट में माधव अपने को घर का मालिक तो नहीं मानता था। लेकिन गुस्से में ही सही , जब उसे भिखारी कहा गया तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अलग रहने की पेशकश की। यह उनके विवाह के बाद दूसरी बसन्त पंचमी का अगला सवेरा था। मधु रोने लगी। उसने रोते रोते कहा कि उसका यह मतलब नहीं था।

÷÷ फिर क्या मतलब था?'' माधव ने पूछा।

÷÷ यही कि तुम्हें सफल होना है।''

जब माधव कुछ नहीं बोला तो मधु ने उसे चूम कर भरोसा दिलाया कि वह उसे बहुत प्यार करती है। चूमते हुए वह उसी पलंग पर बैठ गयी जिस पर माधव किंकर्त्तव्यविमूढ़ बैठा था। उसे पता ही नहीं चला कब वह उसकी गोद में बैठी और कब वे अपने वस्त्रों से अलग हो गये। वह विस्मरण की नदी में डूब गया और हांफते हुए ऊपर किनारे पर आया। उसे बाद में केवल अपना सिगरेट पीना याद रहा।

लेकिन अगले जाड़ों में पूस की रात मण्डी हाउस की सड़क पर फिर वही हुआ। माधव घर लौट रहा था। वीरान सड़क पर बिजली के खम्भे के नीचे बैठा कोई कांप रहा था। जब माधव उसके निकट पहुंचा तो उस आदमी ने अपनी निरीह आंखें ऊपर उठायीं। माधव अपने भीतर हाहाकर न झेल सका और उसने अपनी जैकेट उतार कर उसके ऊपर डाल दी। लौटते हुए उसे सर्दी नहीं लगी क्योंकि उसने बहुत पी थी। अगली सुबह उसे अफसोस था। क्या अब निराला की करुणा के लिए शराब की जरूरत थी ?

लेखक होने की क्या जरूरत थी ? यह तात्विक प्रश्न भी उठा जब सुनन्दा पैदा हुई। खर्चे बढ़े। आमदनी नहीं बढ़ी। माधव का स्वतन्त्र लेखन उसका जेबखर्च ही बना रहा। यद्यपि वह अब एक बेटी का बाप था। शुरू शुरू में जब बच्ची पलंग या पालने पर सोयी होती, तो कभी वह उसके पैर चूमता, कभी हाथ चूमता और उसे लगता कि वह उसे चूमता ही रहे। उसे तब यह सोच कर शर्म आती कि वह सुनन्दा के पैदा होने के पहले कोई बच्चा नहीं चाहता था। कारण विशुद्ध आर्थिक था। वह नौ से पांच की कोई नौकरी नहीं करना चाहता था। इसीलिए वह हमेशा कण्डोम इस्तेमाल करता था। एक रात मधु ने कहा कि मैंने कॉपर टी लगवा ली है, तुम्हें कण्डोम लगाने की जरूरत नहीं। उसी सप्ताह गर्भ रह गया था। यह बताते हुए मधु हंसी थी और उसने कहा था कि कोई कॉपर टी नहीं है, मैं बच्चा चाहती हूं। और तुम उसे पालने की फिक्र न करो, उसने कहा था, ÷÷ उसे मैं पाल लूंगी।''

÷÷ जैसे तुम मुझे पाल रही हो।'' माधव ने ठहाका लगाया था।

लेकिन यह हंसी की बात नहीं थी। जब बच्ची के आने से पैसे की कमी पहसूस हुई तो उसके लिए माधव मन ही मन अपने को दोषी मानने लगा। सिकंदरा रोड के दोनों ओर घने पेड़ों के सायों में फुटपाथ पर चलते हुए वह सोचता कि इस आजादी की कीमत क्या भीतर की घुटन है ? साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी में घण्टों मेज पर किताब खोले बैठे रहने के बाद जब वह कैण्टीन में जाकर कॉफी पीता और गंगाधर से बातें करता तो उसे लगता कि वह यही कॉफी पीने के लिए पैदा हुआ है। अपना लेखन वह घर पर करता था। सुबह या आधी रात को - जब मधु कॉलेज चली जाती थी या सो जाती थी। जब माधव ने पहली बार यह महसूस किया कि वह लिखने के लिए सुबह मधु के कॉलेज जाने या रात को सो जाने का इंतजार करता है तो उसे कुछ अजीब लगा था। तब सुनन्दा पैदा हो गयी थी।

यही भीतर की घुटन थी। एक ओर अकादेमी कैण्टीन की कॉफी थी , दूसरी ओर मधु के सोने या घर से जाने का इंतजार था, तीसरी ओर सुनन्दा की दो तीन दांतों की रोज बढ़ती खिलखिलाहट थी। आहिस्ता आहिस्ता यह बात मन में जड़ जमाने लगी कि वह इस खिलखिलाहट की कीमत नहीं चुका रहा। अब मधु का माधव के लिए लेखकीय सम्मान भी दरकने लगा था। वह कुछ कहती नहीं थी। मगर कहने के लिए हमेशा जुबान की जरूरत नहीं होती। माधव ने देखा था कि जब कोई सहयोगी या सहेली घर आती तो मधु को उसका परिचय कराने में कोई उत्साह नहीं होता था। यदि वह दूसरे कमरे में होता तो वह उसे बुलाती नहीं थी। शुरू शुरू में वह चहकती हुई उसका परिचय कराती थी : ÷÷ ये मेरे कवि पति हैं मिस्टर माधव दयाल।''

हिन्दी युवा कवि माधव दयाल का नाम राजधानी में बजता नहीं था। आगन्तुक उसे नहीं जानता था। एक बार मधु की एक वरिष्ठ सहयोगी मिसेज गुप्ता जो सुनहरा चश्मा लगाती थीं और अर्थशास्त्र पढ़ाती थीं - उन्होंने आंख उठा कर पूछा था, ÷÷ कवि हैं, पर करते क्या है?''

मधु अचकचा गयी थी। माधव हॉल से उठ कर बाहर चला गया था। उसे पहली बार शंका हुई थी कि लेडी इरविन कॉलेज के परिसर में उसका नाम खो गया है। कभी उसकी आंखों के सामने मिसेज गुप्ता की सुनहरी आंखें आ जातीं , कभी मिस कुलकर्णी की चंचल, कजरारी आंखें, उससे पूछती हुई :

÷÷ कवि हैं, पर करते क्या हैं?''

÷÷ प्यार करते हैं।'' मधु ने मिस कुलकर्णी से हंसते हुए कहा था।

मिस कुलकर्णी के मुंह से लगातार सौ कंचों के फर्श पर बिखरने की आवाज आयी थी।

माधव हंस नहीं सका था।

वह कई दिन , हफ्तों और महीनों मधु के उपर्युक्त संवाद का अर्थ जानने की कोशिश करता रहा। जब उसने मधु को प्यार किया तो मधु उसके लिए उसका शहर हो गयी थी। मधु के पहले दिल्ली डग्गामार बसों, चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों, और राजमा रोटी का वीरान शहर थी - हालांकि हर जगह भीड़ थी। फिर दिल्ली गालिब के इश्क का शहर हो गयी जहां लालकिला सचमुच लाल था और लड़के लड़कियां एक दूसरे को हसरत की नजर से देखते थे और उनके चेहरों पर कभी कभी इन्द्रधनुष के रंग खिंच जाते। माधव को यह अजनबी शहर पहली बार अपना लगा था। मधु एकाएक पूरे शहर पर छा गयी थी। वे शहर भर में घूमते और टी.एस. ईलियट और जेम्स जॉयस और हेमिंग्वे पर बातें करते। वे उस शाम लोदी गार्डन्स में घूम रहे थे। मार्च का महीना था। हवा दिन में थोड़ी गर्म होकर ठण्डी हो गयी थी। वे दहकते फूलों की क्यारियों के बीच चल रहे थे। ÷ फेयरवेल टु आर्म्स' पर बात हो रही थी। धीरे धीरे सूरज डूब गया। शाम गहरायी। वे क्यारियों से हट कर कुछ दूर एक पेड़ के नीचे चले गये जहां धुंधलका पैदा होने लगा था। मधु ने कहा, ÷÷ नायिका का वह भोला संवाद कितना सुन्दर है?''

÷÷ कौन सा?''

÷÷ वही।'' मधु मुस्करायी, ÷÷ नाकें कहां जातीं हैं?''

÷÷ देखते हैं।'' कहते हुए माधव ने उसे होठों पर चूमा। पता ही नहीं चला था कि नाकें कहां गयी।

सेटी पर चित लेटे हुए माधव दयाल अंधेरी दीवारों से घिरे मुस्कुराये। खिड़की के बाहर गुलमोहर की पत्तियां आहिस्ता आहिस्ता हिल रहीं थी। हवा चल रही थी। बाहर कुछ चांदनी भी थी। ऐसी ही चांदनी में माधव उसी रात रैगड़पुरा की तीसरी मंजिल के अपने कमरे के बाहर छत पर निकल आया था और उसने ऊपर आकाश की ओर देखा था जैसे वहां सचमुच कोई हो। बचपन के देवी देवता बचपन में बिला गये थे। मगर फिर भी वह खाली आकाश में मद्धिम तारों को देख रहा था। असल में उसी रात उसने अपनी पहली लम्बी कविता शुरू की थी। वह चाहता था कि उसे पूरी कर सके। यदि बचपन के जीवन्त देवी देवता होते , तो वह उन्हीं से प्रार्थना करता। वे नहीं थे। वह खाली आकाश में देख रहा था। दिल्ली में यह उसकी पहली अतल कातरता थी। उसी शाम उसने मधु को पहली बार चूमा था।

उसका पहला कविता संग्रह जब आया तो इमर्जेन्सी शुरू हो गई थी। वह कुछ लेखकों और जे.एन.यू. के कुछ मित्रों के साथ बैठकों में भाग लेता , कुछ गुप्त पर्चे तैयार करता और उदास रहता। एक रात उसने कुछ युवा मित्रों के साथ मण्डी हाउस के इलाके में कुछ पोस्टर भी चिपकाये। एक पोस्टर में इन्दिरा गांधी सलाखों के पीछे थीं और नीचे लिखा था : तानाशाह का भविष्य। यह भविष्यवाणी थी - यह तब किसी को मालूम नहीं था। उस रात वह देर से घर पहुंचा। मधु ने दरवाजा खोला। एक बज रहा था। वह सोयी नहीं थी न उसकी आंखों में नींद थी, न मुंह में जमुहाई।

÷÷ तुम सोई नहीं?''

÷÷ नहीं।'' उसने कहा, ÷÷ तुम कहां थे?''

वह चुप रहा। वह उसके नजदीक आयी। उसने माधव का मुंह सूंघा और हंसी , ÷÷ तुमने आज पी भी नहीं।'' फिर कुछ रुक कर बोली, ÷÷ हां, सिगरेट बहुत पी है। क्या बेचैनी है? कहां थे?''

÷÷ सड़क पर।''

÷÷ सड़क पर क्या कर रहे थे?''

÷÷ पोस्टर चिपका रहा था।''

वह चुप रही। वह पेण्ट कमीज उतार कर पाजामा कुर्ता पहनने लगा। जब उसका एक पैर पाजामे में था , मधु ने कहा, ÷÷ आज कॉलेज के स्टाफ रूम में रेलों और सरकारी दफ्तरों के ठीक टाइम पर चलने की बात हो रही थी।''

÷÷ ठीक टाइम सब कुछ नहीं है।''

÷÷ बसों और सड़कों पर भी हुड़दंग नहीं।''

÷÷ सड़कें सुधरने से देश नहीं सुधरता।''

÷÷ फिर कैसे सुघरता है?''

÷÷ जब सबकी मर्जी से चले। एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं।''

÷÷ लेकिन यदि उसकी मर्जी सही हो?''

÷÷ वह तभी सही होगी जब सब तस्दीक करेंगे।''

मधु चुप रही। माधव ने पाजामें में गांठ लगा ली थी। वह पलंग की ओर बढ़ रहा था। पलंग पर बैठते हुए उसने खड़ी हुई मधु से कहा , ÷÷ चाहे देश हो या घर, सबकी मर्जी जरूरी है।''

उस रात कोई और बात नहीं हुई। वे दोनों उल्टी तरफ मुंह करके सो गये।

माधव की उदासी और गहरी हो गयी थी। पुलिस की तहकीकात और रेड बढ़ने लगे। ज्यादातर लोग चुप हो गये। कुछ दिल्ली से बाहर चले गये। कुछ जेल में सीखचों के पीछे गये। इन्हीं में उसका दोस्त चन्द्रकान्त था। चन्द्रकान्त एक पाक्षिक पत्र का सम्पादक था। इमर्जेन्सी के पहले उसने जे.पी. की जनसभा की एक रपट छापी थी , जिसका अन्त इस टिप्पणी से हुआ था कि जनसभा के एकाग्र चेहरे जे.पी. की बातें इस तरह सुन रहे थे जैसे वे उन्हीं के मन की बातें हों। इसे राजद्रोह माना गया और चन्द्रकान्त को धर लिया गया। चन्द्रकान्त की पेशी तीसहजारी कोर्ट में होती थी। माधव हर पेशी पर जाता था। चन्द्रकान्त की पत्नी सुलोचना भी अपनी तीन साल की बेटी के साथ आती थी। एक बार बेटी हथकड़ी पहने कोर्ट में आते चन्द्रकान्त की ओर दौड़ी, ÷ पापा पापा' चीखती हुई। मुश्किल से उसे रोका गया। वह रोने लगी। चन्द्रकान्त ने मुस्कुराते हुए अपना दायां हाथ हवा में ऊपर हिलाया। दायें के साथ बायां हाथ भी हथकड़ी से बंधा ऊपर उठ गया। तब चन्द्रकान्त हंसा और उसने अपनी हथकड़ी दोनों हाथों से बजायी। इस आवाज से या चन्द्रकान्त की हंसी देख कर बेटी भी हंसने लगी हालांकि उसके गालों पर आंसू लुढ़क रहे थे।

उस दिन माधव सुलोचना को छोड़ने उसके घर ओल्ड राजेन्द्र नगर गया। रास्ते में उसने बेटी के लिए टॉफी का डिब्बा खरीदा था। चन्द्रकान्त एक बरसाती में रहता था , जिसमें छत पर रेल के डिब्बों से जुड़े दो कमरे थे। वह पहले भी चन्द्रकान्त के साथ इस घर में आ चुका था। इस बार घर वीरान था जैसे घर देख कर दश्त याद आया हो। जब चाय के लिए दूध निकालने को सुचोलना ने फ्रिज खोला तो उसमें केवल दूध का कटोरा था, जो खाली था। ÷÷ ओह, मैं भूल गयी'' उसने कहा, ÷÷ मैंने बेटी को सारा दूध दे दिया था।'' ÷÷ सुलोचना जी, आपको पता नहीं।'' माधव तुरन्त हंसा, ÷÷ इधर अरसे से मैं चाय दूध के बिना ही पीता हूं। चन्द्रकान्त जानता है।'' जब चाय के कप किचन में रखने सुलोचना कमरे से बाहर गयी तो उसने अपनी जेब से सारे रुपये पैसे निकाल कर अलमारी में रखी घड़ी के नीचे रख दिये - ढाई सौ रुपये और कुछ रेजगारी थी। सीढ़ियों से उतरते हुए उसके आंसू आंखों से उतरने लगे। वह पैदल सिकंदरा रोड की ओर बढ़ा क्योंकि उसकी जेब में बस के टिकट के लिए पैसे नहीं थे।

उसी शाम मधु ने उससे घूमने चलने को कहा। उसने अपने पैर सामने फैला कर टेबिल पर रखते हुए कहा , ÷÷ मैं बहुत थक गया हूं।''

÷÷ क्यों?''

÷÷ मैं ओल्ड राजेन्द्र नगर से यहां तक पैदल आया।'' वह मुस्कुराया।

÷÷ क्यों?'' मधु की आंखें चौड़ी हो गयीं।

÷÷ क्योंकि जेब में पैसे नहीं थे।'' वह हंसा।

÷÷ कहां गये पैसे?'' मधु की भंवें सिकुड़ गयीं, ÷÷ पिछले हफ्ते ही मैंने तुम्हें पांच सौ रुपये दिये थे।'' फिर उसने जल्दी से जोड़ा, ÷÷ उधार!'' वह शायद मुस्कुरायी भी।

÷÷ ढाई सौ रुपये बचे थे।'' माधव ने कहा।

÷÷ तो!''

÷÷ आज चन्द्रकान्त की पेशी थी। मैं सुलोचना को छोड़ने उसके घर गया। फ्रिज में बच्ची के लिए दूध नहीं था। मैंने जेब में जो कुछ था, वहीं छोड़ दिया।''

÷÷ कम से कम बस के लिए तो पैसे रख लेते।'' मधु ने खीझ कर कहा।

÷÷ मुझे होश नहीं था।'' माधव ने पैर जमीन पर रख दिये।

मधु की आंखों में आंसू छलछला आये। उन्हीं आंखों से वह बोली , ÷÷ जिस तरह दूसरों के लिए बेहोश हो जाते हो, कभी अपनी पत्नी और बेटी के लिए सोचते हो?'' वह रोने लगी।

माधव लाचार सी रोती मधु को देखने लगा। उसकी समझ में नहीं आया कि वह रो क्यों रही है।

÷÷ रो क्यों रही हो?''

÷÷ अपनी किस्मत को रो रही हूं।'' वह रोती हुई बोली।

फिर वह एकाएक चुप हो गयी। वह सामने कुर्सी से उठी और अन्दर चली गयी। अन्दर अलमारी खोलने की आवाज हुई , फिर बन्द करने की। क्षण भर बाद वह वापिस हॉल में आ गयी। उसके हाथ में कुछ सौ के नोट थे। उसने नोट माधव के सामने मेज पर पटकते हुए कहा, ÷÷ तुम्हारी जेब खाली हो गयी है। कुछ और उधार रख लो।'' बल ÷ उधार' पर था।

क्या मधु रुपयों की वजह से ही रो रही थी ?

अगली शाम एक दोस्त से उधार लेकर उसने मधु का उधार चुकता कर दिया। मगर जी और उदास हो गया। क्या मधु अब ऐसी दोस्त नहीं रही थी जो उसे उधार दे सके ? उसी ने कहा था कि तुम्हें नौ से पांच की नौकरी करने की जरूरत नहीं है - मैं घर सम्भान लूंगी। या शायद वह मेरी कथित दरियादिली के दौरों से आजिज आ जाती है। लेकिन यह मेरी दरियादिली नहीं है। यह मेरा दिल है। दिल पर लगातार कोई बोझ रहने लगा। जब वह घर से बाहर शहर के चौराहों पर पुलिस को देखता, तो वह दबाव और बढ़ जाता। कहीं कहीं पुलिस के सिपाही घोड़ों पर चढ़े नजर आते। घोड़ों के तगडे+ पुट्ठे धूप में चमकते। दिल में हौल पैदा हो जाता। वह समझ नहीं पाता कि वह बाहर का डर घर के अन्दर ले आता है या घर की घुटन बाहर ले जाता है।

जब जेल की एक मुलाकात में चन्द्रकान्त ने हंसते हुए पूछा , ÷÷ इतने उदास क्यों लग रहे हो?'' तो उसने कहा, ÷÷ कोई खास बात नहीं।''

÷÷ फिर भी?''

÷÷ गू के पहाड़ के बारे में सोच रहा था।'' माधव मुस्कुराया। कुछ देर पहले चन्द्रकान्त ने भरी जेल के अन्दर सफाई की गड़बड़ियों का जिक्र किया था।

माधव पल भर चुप रहा। फिर उसके मुंह से शब्द फूटे , ÷÷ मुझे लगता है जैसे मेरे अन्दर जेल उग आयी है... जिसमें सींखचे हैं .. और सींखचों के पीछे गू है।''

एक क्षण चुप्पी रही। जेल के उस कमरे में मक्खियों की भिनभिनाहट के अलावा कुछ नहीं था।

÷÷ यह कविता का समय नहीं है।'' चन्द्रकान्त ने कहा।

यह सच था। यह कविता का समय नहीं था। घर बाहर लगता जैसे जी सांसत में है। अखबार घर में फीकी मुस्कानों की तरह बताते कि सब कुछ ठीक है। मगर कुछ भी ठीक नहीं था। शहरों में बुलडोजर झुग्गी झोपड़ियां मिटा कर सफाई अभियान चला रहे थे। किसान अपने श्श्नि थामे खेतों में भाग रहे थे। अखबारों में साफ सुथरी सड़कों की तस्वीरें थीं या हंसते किसान भांगड़ा नाच रहे थे। टी.वी. पर यही देखते हुए कभी कभी माधव सो जाता और उसे खेत की ओर भागते किसानों और बुलडोजर से कुचली जाती झोपड़ियों के सपने आते जिनमें कोई चीख गूंजती रहती । वह घबरा कर जाग जाता। वह जिस तरह हड़बड़ा कर बिस्तर पर बैठता , उससे मधु की नींद खुल जाती। वह लेटे लेटे पूछती, ÷÷ क्या हुआ? कोई सपना देखा?'' माधव आंखें फाडे+ अंधेरे में देख रहा होता। जब मधु दुबारा पूछती, तो वह कहता, ÷÷ कुछ नहीं।''

÷÷ सो जाओ।'' वह जमहाई लेकर कहती, ÷÷ कल मुझे जल्दी उठना है।''

वह अगले क्षण सो जाती।

अगली शाम मधु ने उससे मेहरौली में एक प्लॉट खरीदने की बात की। माधव ने उसकी ओर ताज्जुब से देखते हुए पूछा , ÷÷ रुपये कहां हैं?''

÷÷ मैं पी.एफ. से लोन ले लूंगी।'' उसने कहा।

÷÷ ऐसी जल्दी क्या है?''

÷÷ जब तक इमर्जेन्सी है।'' मधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ÷÷ दाम ठीक है। वरना रेट फिर आसमान छुएंगे।'' यह इमर्जेन्सी का अनोखा इस्तेमाल था!

÷÷ मेहरौली शहर से दूर नहीं है?'' माधव ने जैसे उसका मन टटोलने के लिए पूछा।

÷÷ कुछ बरसों में जब तुम भी सफल हो जाओगे और हम अपनी कोठी बनवायेंगे, तो हमारे पास गाड़ी भी होगी। तब कुछ दूर नहीं होगा।'' मधु हॉल की छत देखते हुए मुस्कुरा रही थी।

माधव मधु का मुस्कुराता चेहरा देख रहा था। उस तिलिस्मी मुस्कान से उसके दिल में हौल पैदा हो गया। उसे लगा जैसे गुलजार बाजार में घोडे+ दौड़ रहे हैं और लोग चारों ओर भाग रहे हैं।

आपातकाल के दूसरे जाड़े उतर रहे थे। दिन हल्के हो गये थे। बाहर सड़कों पर पेड़ और धूप और हवा भी हल्के लगते। ऐसा लगता कि धरती हल्की हो गयी है और उसे दोनों हाथों से उठाया जा सकता है। चुनावों का एलान हो चुका था। एक दोपहर जब माधव घर में घुसा तो मधु घर में नहीं थी और सुनन्दा अपने कमरे में थी। वह अब सात साल की थी। तीसरी में पढ़ती थी। उसे अचानक लगा कि जो उसने सुना वह सुनन्दा की सुबकी थी। वह दबे पांव उसके कमरे की ओर बढ़ा। जब उसने दरवाजा खोला तो सुनन्दा ने नजरें उठा कर देखा। उसे देख कर वह आंसू पोंछने लगी। वह स्कूल की नीली डे्रस पहने थी। अलबत्ता उसने स्वेटर उतार दिया था। उसकी दोनों आंखों के पास दोनों चोटियां झूल रही थीं। माधव की नजर अभी उसकी दोनों आंखों पर थी , जो लाल थीं।

÷÷ क्या हुआ?''

कोई आवाज नहीं।

÷÷ क्या हुआ, बेटा?''

÷÷ कुछ नहीं।''

माधव उसके पास आ गया था। वह पलंग पर बैठी थी। उसने दायें हाथ से उसकी ठोढ़ी ऊपर उठायी , ÷÷ क्या हुआ?''

÷÷ पापा।''

÷ हां।''

÷÷ अदिति के पापा मर गये।''

माधव जानता था कि अदिति सुनन्दा की जिगरी दोस्त है। उसे समझ में नहीं आया , क्या कहे।

सुनन्दा ने अचानक कहा , ÷÷ पापा, क्या तुम भी एक दिन मर जाओगे?''

माधव मुस्कुराया।

÷÷ तुम नहीं मरना, पापा।'' उसकी दोनों आंखों में फिर एक एक आंसू आ गया।

वह उसी की ओर देख रही थी।

माधव ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह बड़ी हो रही थी। माधव को लगा , वह अब इतनी बड़ी हो गयी है कि किसी का जाना जान ले।

÷÷ सुनन्दा।'' माधव ने कहा, ÷÷ अब तुम बड़ी हो गयी हो।''

÷÷ हां।'' सुनन्दा के मुंह से निकला।

÷÷ तुम्हें अब जान लेना चाहिए कि कोई भी कभी भी जा सकता है।''

यह कह कर हंसते हुए उसने सुनन्दा को अपनी बाहों में भींच लिया। माधव की आंखें भर आयी। सुनन्दा को बाहों में भरे उसकी पीठ के पीछे उसने तुरन्त अपनी आंखें पोंछ लीं।

उसी रात माधव जब व्हिस्की का दूसरा पेग बना रहा था तो मधु ने उसे बताया कि कल उसे मिस कुलकर्णी के पिता से दस बजे उनके ऑफिस में मिलना है। जब उसने गिलास से अपनी नजर उठा कर मधु की आंखों में देखा तो वहां खालीपन था। मधु ने बताया कि मिस कुलकर्णी के पिता एक बड़ी कम्पनी में जनरल मैनेजर हैं , उनके यहां पी.आर.ओ. की जगह खाली है, वेतन पांच हजार है। पांच हजार! उसने फिर दोहराया। ÷÷ तुम यह नौकरी करोगे।'' उसकी आंखों में रोशनी लौट आयी, ÷÷ तो हम अपने मेहरौली के प्लॉट पर मकान की नींव रख देंगे।''

माधव चुपचाप गिलास से शराब के घूंट लेता रहा। वह कुछ नहीं बोला। तब मधु बोली - ÷÷ नौकरी करते हुए भी लोग लिखते हैं।''

माधव ने एक और घूंट लिया।

÷÷ अगर कोई एक क्षेत्र में असफल हो।'' मधु ने फिर कहा, ÷÷ तो दूसरा क्षेत्र चुनने में क्या दिक्कत है?'' उसका इशारा माधव के स्वतन्त्र लेखन की ओर था।

÷÷ सफलता मेरे जीवन का लक्ष्य नहीं है!'' माधव एकाएक चीखा।

तब मधु की नजर दूसरी तरफ थी। वह पलटी। उसके होंठ फैले और सफेद दांतों की पंक्ति चमकी। जब वह हंसती थी तो उसका ऊपरी मसूढ़ा नंगा हो जाता था। नंगे मसूढ़े में खुभे पैने दांत थे।

यह उनके बीच अन्तिम संवाद था। तलाक की कार्रवाई के दौरान उनके वकीलों ने ही बात कीथी।

 

बेड रूम में घुसते ही मधु की नजर पलंग के सामने रखी काठ की अलमारी पर मुस्कुराती सुनन्दा की तस्वीर पर पड़ी जो करीब तीस साल पुरानी थी जब सुनन्दा नीली ड्रेस पहन कर दो चोटियां लटकाये स्कूल जाती थी। दूसरी ओर सुनन्दा और दीपक की तस्वीर थी , जब उनका विवाह हुआ था। कमरे में कोई और तस्वीर नहीं थी। मधु ने चारों ओर नजरें घुमा कर देखा। सुनन्दा डबल बेड पर लेटते ही करवट लेकर सो गयी थी। उसका चेहरा दूसरी ओर था। गर्मी बहुत थी। सुनन्दा ने पंखा तेज कर दिया था। तभी अचानक कोई पुरानी गन्ध मधु के नथुनों में सुरसुरायी। वह चौंकी। उसने गहरी सांस ली। वह माधव के शरीर की गन्ध थी जो बिस्तर के चादर और तकिये में बसी थी, जिस पर मधु का शरीर फैला था।

वह सिहर गयी।

मधु अग्रवाल अभी भी समझ नहीं पाती कि माधव दयाल अचानक क्यों दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। मधु ने अपनी मां की इच्छा के विरुद्ध विजातीय विवाह अदालत में किया था। उसे पता नहीं था कि यह एक दिन अदालत में ही खत्म हो जाएगा और सुनन्दा उस विवाह की स्मृति की तरह बचेगी। मगर यह गन्ध भी थी जिसने उसे घेर लिया था। गन्ध कुछ गाढ़ी हो गयी थी। उम्र की तरह। कितना अजीब था। माधव की जो बातें मधु के आकर्षण के बिन्दु बनी थीं , वही बातें बिदकने का कारण बनीं। उसका जो कलाकार सुलभ आवारापन मन को मोहता था, वही कुछ बरस बाद असमंजस पैदा करने लगा जब वह उसे अपनी सहेलियों या सहयोगियों से मिलाती। उसके बिखरे बाल और रंगीन मुचड़ा कुर्ता जब लोगों की भौंहें ऊपर उठाते तो मधु को भी अखरता। आहिस्ता आहिस्ता वह इरविन कॉलेज कैम्पस में एक अजूबा सा हो गया जिसके आने जाने का कोई समय नहीं था। वह क्या करता था, यह किसी को मालूम नहीं था। वह खुद भी ऐसे सवालों से बचता था। उसके हावभाव देख कर कभी कभी मधु को भी लगता कि शायद उसे खुद नहीं मालूम कि वह क्या करता है। उसने ऐसे कुछ लेखकों के बारे में किताबों में पढ़ा था। जो पढ़ा था, वह दिमाग में कैद था। माधव को देख कर वह याद आता था।

इतने बरसों बाद आज माधव से बात करते हुए उसे वह शाम फिर याद आयी थी जब वे शुरू शुरू में एन.एस.डी. के खुले प्रांगण में ÷ लैला मजनूं' देखते हुए बैठे थे। रोशनी सिर्फ मंच पर थी। दर्शक दीर्घा में तिलिस्मी धुंधलका उतर आया था। नाटक का वह दृश्य था जिसमें मजनूं लैला को नहीं, लैला के तोते को देखता है। मजनूं पिंजरे को देखता है, पिंजरे के अन्दर तोते को देखता है और देखता रह जाता है... ऐसा लगता है जैसे मजनूं तोते को नहीं, लैला को देख रहा है... मजनूं के चेहरे पर वही विह्नल भावना का स्थिर चित्र है... शायद मजनूं अभी आंखें घुमा कर उन्हीं पेड़ों को देखेगा जिन्हें लैला देखती है... फिर लैला की दुनिया को। क्या दुनिया इतनी सुन्दर थी? तभी माधव ने अंधेरे में मधु का हाथ थामा था। माधव के हाथ में पसीना था। हालांकि फरवरी का अन्त था और गुलाबी सर्दी थी। माधव के हाथ में मधु का हाथ भी पसीज गया था। उन्होंने बाकी नाटक पसीजे हाथों से देखा था। तब उसे स्त्री होने की पूर्ण अनुभूति हुई थी जैसे लैला को मजनूं का जनून देख कर हुई थी। जब बत्तियां जलीं तो माधव की आंखें भी मजनू की आंखों की तरह थीं। इन्हीं आंखों से देखते हुए उसने कुछ दिन बाद लोदी गार्डन्स में एक पेड़ के पीछे उसे पहली बार चूमा था।

माधव गोरा चिट्टा , ऊंचा पूरा था। जब वह शाम को बादामी या आसमानी कुर्ता पहन कर अपने कुछ उलझे से, घने काले बालों के नीचे चमकती आंखों से उसे देखता था तो वह बरबस मुस्कुराने लगती थी। तब वह दाढ़ी तो क्या, मूंछ भी नहीं रखता था। ऐसा लगता था जैसे उसका भीतर का उजाला चेहरे पर बार बार तैर आता हो। उन दिनों कभी कभी मधु को उसका चेहरा एक बालक की तरह भी लगता और तब उसकी इच्छा होती कि वह उसे अपने वक्ष से सटा ले। यह सही है कि तब वह अपने मन के इन्द्रधनुषी रंगों को ठीक से देख नहीं पाती थी। कैसा संयोग था कि आज सुबह ही वह लखनऊ आयी थी और सुनन्दा का फोन आया था कि पापा की सांस रुक गयी है। वह माधव दयाल की देह को आखिरी बार देखने आयी थी। वह सोचती थी कि अब माधव उसके भीतर मर गया है। लेकिन क्या माधव सचमुच उसके भीतर मर गया था? फिर वह अभी इस गन्ध से कैसे घिरी थी?

वह कभी इसी गन्ध को दिल्ली भर में ढूंढती थी , और जब माधव त्रिवेणी की सीढ़ियों पर या श्रीराम सेण्टर में कॉफी के कप के पीछे मेज पर या किसी चित्रकला प्रदर्शनी में दिख जाता तो वह उसकी ओर ऐसे बढ़ती जैसे उससे बात करने नहीं, बल्कि उसे सूंघने जा रही हो। अब तो यह भी याद नहीं कि क्या सचमुच ऐसा होता था या वह अभी उसी गन्ध में लिपटी इस तरह तसव्वुर कर रही है? तब माधव की गन्ध में उसकी सिगरेट की गन्ध भी मिली होती थी और कभी कभी शराब की गन्ध भी। वह भरी भरी आंखों से उसकी ओर बढ़ता था। देह का आत्मा से क्या रिश्ता हो सकता है यह उसने माधव की देह से ही जाना था। देह खुद धुल कर आत्मा बन जाती थी और पंख फड़फड़ाते हुए आकाश में उड़ने लगती थी। एक फ्रांसीसी फिल्म देख कर उन्होंने पंखों की फड़फड़ाहट को ÷ मैच' का नाम दे दिया था, जिसमें दो नंगे जिस्म एक बड़ी चादर के नीचे गुत्थमगुत्था होते हैं और एक तान लेकर आहिस्ता आहिस्ता फिर सम पर आ जाते हैं। तभी मधु ने चादर से बाहर आकर उसका सिगरेट पीना देखा था और खुद सिगरेट का एक सूंटा मारा था। वह खांसते खांसते हलकान हो गयी थी। उस खांसने के बाद चार दशक बीत गये मगर वह खांसी गले में अभी भी फंसी लगती थी। मधु ने अपना दायां हाथ सचमुच अपने गले पर फेरा जैसे उसे सहला रही हो। जैसे चार दशक में सिर्फ एक चुटकी बजी हो।

फिर उसने हड़बड़ा कर अपना हाथ गले से हटाया और बायीं ओर करवट ले ली। खिड़की खुली थी। अंधेरे में यूक्लिप्टस के पेड़ अपना सिर हिला रहे थे। पीछे बहुत दूर - कहीं आसमान था जो पेड़ों पर झुका लगता था। एकाएक मधु को प्यास लगी जैसे गला सूख रहा हो। वह उठी। कमरे के बाहर फ्रिज से उसने पानी की बोतल निकाली और गटागट पी गयी। फ्रिज बन्द करके लौटते हुए उसकी नजर दूसरे कमरे में लेटे माधव पर गयी। माधव चित लेटे थे। माधव कभी चित नहंीं सोते थे। वे हमेशा करवट लेकर सोते थे। क्या वे जाग रहे थे? क्या वह लौट कर पूछे? वापिस पलंग पर लेटते हुए उसने सोचा। वह पूछना चाहती थी कि क्या कोई और रास्ता नहीं था? क्या अलग हो जाना ही एक रास्ता था? क्या उनके रास्ते जैसे आपस में टकरा कर एक हो गये थे, उसी तरह उनका फिर से अलग हो जाना जरूरी था?

जैसे बुढ़ाते लोग रिटायर होने के पहले अपना स्थाई घर बनाते हैं , उसी तरह मधु ने मेहरौली में अपना घर बना लिया था। दिल्ली की सड़कों पर अपनी मारुति चलाना उसने अरसा पहले शुरू कर दिया था जब उसके बाल बिल्कुल काले थे। जब उसके बाल सफेद होने लगे तब भी उसने डाई कराना शुरू नहीं किया। हो सकता है उसकी इस जिद में माधव का भी हाथ रहा हो। माधव को बाल रंगाने से चिढ़ थी। जब कोई उन लेखकों का जिक्र करता जो बाल रंगाते थे तो वह कहता, ÷÷ मैं जवानी में नहीं मरना चाहता। मैं बूढ़ा होकर ही मरना चाहता हूं।'' मधु के सहयोगियों और मित्रों का कहना था कि सफेद काले बाल उसके सांवले रंग पर फबते हैं। जब तक सुनन्दा साथ थी और वह पढ़ाती थी, वह व्यस्त थी। उसे अपने बारे में सोचने का ज्यादा वक्त ही नहीं मिलता था। फिर एकाएक दो तीन सालों के भीतर ही सुनन्दा दिल्ली छोड़ कर लखनऊ विश्वविद्यालय पढ़ाने चली आयी और उसने दीपक से शादी कर ली और मधु रिटायर होकर अपनी मारुति से मेहरौली रहने चली गयी। घर में तीन कमरे और एक हॉल था। कुछ महीनों वह हर कमरे में अकेली घूमती फिरी। फिर उसने एक एन.जी.ओ. ज्वाइन किया, जो आसपास के गांवों में शिक्षा अभियान चलाता था। पहले घर से निकलना, गांव में जाना और बच्चों बूढ़ों से बतियाना अच्छा लगा। फिर उसे ऊब होने लगी। उसे शेक्सपीयर और टी.एस. इलियट पढ़ाने की आदत थी। गन्देसन्दे बच्चों और तम्बाकू से गन्धाते बूढ़ों को ककहरा सिखाना उसे भारी पड़ता। ऊपर से मुस्कुराते रहने से क्या होता था? भीतर ही भीतर जलन होती रहती। सुनन्दा ने कई बार कहा कि मेरे पास आकर रहो। उसने एक बार कोशिश भी की। लेकिन महीना भी पूरा नहीं हुआ, उसे महसूस हुआ कि यह घर अपना नहीं है। भीतर की जलन फिर उभर आयी उन दिनों माधव सुनन्दा के घर नहीं आते थे। शायद उन्हें मेरा यहां रहना पता चल जाता होगा, मधु ने सोचा। वे कभी शहर की सड़कों पर भी नहीं दिखे। और तो और वे कभी दिल्ली में भी नहीं दिखे। कई बार दूर से किसी भीड़ में उनके होने का शक जरूर होता। मगर उस ओर बढ़ने पर वह छवि गायब हो जाती जैसे वह वहां कभी थी ही नहीं। हो सकता है, माधव उसे देख कर हट जाते हों या वे कभी वहां रहते ही न हों और यह सचमुच मधु की नजर का ही धोखा हो।

 

मधु की नजर को एक बार सचमुच घोखा हुआ था जब एक शाम सुनन्दा अपने दोस्त को लेकर घर आयी। तब वह रिटायर नहीं हुई थी और सुनन्दा जे.एन.यू. में पढ़ती थी। उस लड़के को घर के दरवाजे में घुसते हुए वह देखती रह गयी थी। शाम का उजास था। हॉल में कुछ धुंधलका सा छाने लगा था। बारिश का मौसम था। लेकिन उस दिन बारिश नहीं हुई थी। उमस थी। मधु को ऐसा लगा जैसे दरवाजे में माधव प्रवेश कर रहे हैं। वही कद, वही नाकनक्श, वही उलझे हुए बाल, वही मुचड़ा हुआ कुर्ता। जैसे माधव उस दोपहर से निकल कर सीधे इस शाम में आ गये हो - जब उन्होंने सप्रू हाउस की एक गोष्ठी में कविताएं पढ़ी थीं और मधु ने उन्हें पहली बार देखा था। क्या कोई समय को लांघ सकता था? या समय कोई खेल खेल रहा था जिसमें अतीत वर्तमान हो जाता था और वर्तमान खो जाता था। वह एकटक उस लड़के को घूर रही थी। वह चौंकी जब सुनन्दा ने उसका परिचय कराया। उस लड़के का नाम हरि था। वह सुनन्दा का सहपाठी था। जब वह सामने बैठा तो मधु ने देखा कि वह जीन्स पहने था - जिसका माधव की जवानी में कोई चलन नहीं था। उसके कुर्ते का रंग पीला था जो माधव कभी नहीं पहनते थे। हरि की आंखों में एक अजब तेजी थी जो हिंस्रता की हदों को छूती थी। मधु फिर चौंकी थी जब उसने अपना घर झांसी शहर बताया।
÷÷तुम्हारे पिता क्या करते हैं?'' मधु ने पूछा।
÷÷मेरे पिता नहीं हैं।'' उसने कहा।
मधु उसकी समतल, सख्त आवाज से फिर चौंकी। उसकी आवाज में रेत भरी थी।
÷÷मां?'' उसने झिझकते हुए पूछा।
÷÷मेरी मां बर्तन मांजती है।'' जैसे किसी मशीन से चपटी आवाज आयी, ÷÷मैं दलित हूं।''
अन्तिम वाक्य बयान कम, चुनौती ज्यादा लगता था। या शायद वह एकरस, रेतीली आवाज का बयान ही था जो मधु को चुनौती लगा था। बाद में सुनन्दा ने यही कहा था। उसने कहा था कि ऐसे सवालों का जवाब देते देते ऐसे जवाब हरि के लिए यांत्रिक हो गये हैं - उसकी आवाज से संवेदना चू कर निकल गयी थी। वरना हरि दूसरों के लिए बहुत संवेदनशील था। हरि की बात करते हुए सुनन्दा के स्वर की कोमलता मधु को खटकी थी। एक दिन सुनन्दा ने उसे हरि की एक कविता सुनायी जिसमें एक बर्तन मांजती हुई स्त्री बिना पानी के बर्तन धो रही है... उसे पानी की जरूरत नहीं... उसकी आंखों से पानी बर्तनों पर अपने आप गिर रहा है। वह स्त्री मां है जो अपना अधभूखा बच्चा घर छोड़ आयी है। यह कविता सुनाते हुए हरि रोने लगता है, सुनन्दा ने कहा।
÷÷क्या हरि रोता है?'' मधु ने अचरज से आंखें फाड़ीं।
÷हां।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷किसी भी आदमी की तरह।''
÷÷उसे देख कर नहीं लगता।'' मधु ने आंखें सिकोड़ीं।
÷÷कि वह आदमी है।'' सुनन्दा हंसी, ÷÷हमें उनका सदियों का दर्द समझना चाहिए। मधु सुनन्दा का कोमल होता हुआ चेहरा और कुछ भीगती सी आवाज देख रही थी। उससे रहा नहीं गया। उसने कुछ चिढ़ कर कहा, ÷÷देश की सबसे बड़ी यूनीवर्सिटी में तुझे एक हरि ही मिला दोस्ती करने को?''
÷÷क्यों?'' सुनन्दा ने ताज्जुब से अपनी मां को देखा, ÷÷उसमें और किसी दूसरे में क्या फर्क है?''
÷÷तू।'' मधु खीझते हुए बोली, ÷÷कभी कभी बिल्कुल अपने बाप की आवाज में बोलती है।''
सुनन्दा हंसी ÷÷मम्मी।'' उसने कहा, ÷÷हमें सदियों का दर्द समझना होगा, जो अब चट्टान हो गया है।''
मधु का चेहरा सख्त था।
÷÷मम्मी।'' सुनन्दा ने फिर कहा, ÷÷झांसी चट्टानों का शहर है। मैं एक बार झांसी जाऊंगी। हरि बहुत कहता है।''
÷÷तू एक बार झांसी गयी थी।'' मधु ने कहा।
÷÷तब मैं छोटी थी। मुझे कुछ भी याद नहीं।''
फिर सुनन्दा एक बार हरि के साथ झांसी गयी थी। लेकिन उसके बाद उसने न हरि का जिक्र किया, न झांसी का। न कभी फिर हरि ही घर आया। तब सुनन्दा लखनऊ चली गयी थी और उसने दीपक से विवाह कर लिया था। मधु ने राहत की सांस ली थी जैसे उसने अभी सुनन्दा का चेहरा देखते हुए लम्बी सांस ली। सुनन्दा ने उसकी ओर करवट ले ली थी। उसकी आंखें बन्द थीं।
आंखें बन्द कर लो, तब भी जरूरी नहीं कि नींद आ ही जाए। फिर आहिस्ता आहिस्ता आंखें खुल जाती हैं जैसे दर्द से खुल गयीं हों। मधु खुली खिड़की के सामने खड़ी हो गयी। सामने तीन चार यूक्लिप्टस के लम्बे लम्बे तनों के पीछे, जगौली गांव फैला था, जिसे अब शहर ने घेर लिया था। यूक्लिप्टस के पीेछे भैसों के कुछ तबेले थे, कुछ सुअर घूमते थे और दिन में कुछ बच्चे यहां वहां खेलते या टट्टी करते नजर आते थे। इस वक्त रात का सन्नाटा खिंचा था। पशु पक्षी और आदमी सब सो रहे थे। शायद हवा चली। ऐसा लगा जैसे अंधेरे का पर्दा कुछ हिला हो। यूक्लिप्टस की पत्तियों पर आसमान कुछ फटा फटा सा टिका था। आसमान देखते हुए मधु ने सोचा कि माधव यदि इसलिए अलग हुए थे कि मधु ने उन्हें मिस कुलकर्णी के पिता से नौकरी के लिए मिलने को कहा था, तो उन्होंने लखनऊ में आकर भी एक अखबार में नौकरी की। अगर वे लखनऊ में अकेले नौकरी कर सकते थे, तो दिल्ली में साथ रह कर नौकरी क्यों नहीं कर सकते थे?
एक बड़ी कम्पनी में पी.आर.ओ. की नौकरी से किसी अखबार की नौकरी कैसे बेहतर हुई, यह वह समझ नहीं पाती थी। आखिरकार, अखबार को बोर्खेस जैसे महान लेखक ने ÷भंगुर छिटपुट का अजायबघर' कहा है। क्या एक संस्थान में पी.आर.ओ. एक सम्मानजनक पद नहीं था? या शायद माधव दयाल दिल्ली छोड़ने की ही ठान चुके थे क्योंकि दिल्ली सफलता का शहर था। माधव को सफलता की सुन्दरी से चिढ़ थी - जिसके पीछे दुनिया भाग रही थी। मधु यह चिढ़ समझ नहीं पाती थी। वह अपने विद्यार्थी जीवन में सदा एक मेधावी छात्रा रही थी। वह ऐसी छात्रा थी जो कक्षा या विद्यालय में उदाहरण बनती थी। स्कूल में वह हमेशा फर्स्ट आती थी। यूनीवर्सिटी में उसकी फर्स्ट डिवीजन होती थी। अंग्रेजी में एम.ए. करने का मूल कारण यही था कि अंग्रेजी का रुतबा था। वह शुरू से कॉन्वेण्ट में पढ़ी थी। उसके पिता पी.सी.एस. आफीसर थे। वह तब मिराण्डा हाउस में एम.ए. में पढ़ रही थी जब अचानक हृदयाघात से उनकी मौत हुई। उसकी मां बरेली में अकेली रहती थी। मधु बरेली नहीं लौटना चाहती थी। उसे एम.ए. करते ही लेडी इरविन में नौकरी मिल गयी थी। वह एक सफल अध्यापक थी। कॉलेज में यह किंवदन्ती थी कि मिस मधु अग्रवाल जब शेक्सपीयर पढ़ाती हैं तो दूसरी कक्षाओं की लड़कियां भी मेकबेथ या हेमलेट पढ़ने उनकी कक्षा में आ जाती हैं जब तक क्लास भर नहीं जाती।
÷टु बी ऑर नॉट टु बी' पर उसका चालीस मिनट का भाषण मशहूर था। यह भाषण हर साल बदलता भी था। जिस साल यह नहीं बदलता था, लड़कियों से ज्यादा खुद उसे ताज्जुब होता था। यह आरम्भिक वर्षों की बात है जब उसने प्रेम किया, विवाह किया और वह मां बनी - तभी उसके और माधव के बीच दरारें आने लगी थीं। दूसरी अध्यापिकाओं की राय थी कि जब तक सुनन्दा छोटी थी, मधु को अपने भाषण तैयार करने के लिए काफी समय मिल जाता था। जब वह बड़ी हुई तो मधु को अपनी बेटी पर ज्यादा ध्यान देना पड़ा। तब तक माधव अलग होकर लखनऊ चले गये थे। उसकी कुछ नजदीकी अध्यापिकाएं अकेले में हंस कर यह भी कहतीं कि अब मधु के जीवन में कोई दुविधा नहीं रही। तभी भाषण बासी होने लगा था।
मधु ने अक्सर सोचा था कि माधव से मिलने से पहले उसने कभी नहीं सोचा था कि वह माधव जैसे किसी युवक से प्रेम करेगी। जब वह पढ़ती थी, उसका दोस्त गिरीश था जिसमें उसे अपने पिता की झलक मिलती थी। उसने आई.ए.एस. में चुने जाने के बाद दिल्ली छोड़ दी थी। उसका शादी का कार्ड मिला था। वह बाद में दो बार दिल्ली में मिला था जब सुनन्दा बड़ी हो गयी थी और माधव लखनऊ चले गये थे। एक बार उसने फोन पर मधु को डिनर के लिए आमन्त्रित भी किया। लेकिन मधु गयी नहीं। उसे लगता जैसे उसके मन की गुफा के आगे कोई पत्थर सरक आया हो। गुफा में अंधेरा था जैसे अभी यूक्लिप्टस के पेड़ों के पीछे बस्ती के मकानों में था। मधु खिड़की से पलट कर फिर बिस्तर पर चित लेट गयी जिसमें सुनन्दा के पिता की गन्ध थी।
मधु को इन दिनों डैडी अक्सर याद आते थे। उसे यह भी याद था कि डैडी ने ही उसे डैडी कहना सिखाया था - अन्यथा पहले वह उन्हें दद्दा कहती थी। जब मधु ने आंखें खोलीं तो उसने चपरासियों को और दूसरे लोगों को चपरासियों की तरह डैडी को सलाम करते पाया। छोटे शहरों में डैडी अपने बंगले में सर्वशक्तिमान थे। ऐसा लगता कि बंगले के आसपास पेड़ों की पत्तियां भी उनकी मर्जी के बिना नहीं हिल सकतीं। डैडी उसे बहुत प्यार करते थे। वह जो मांगती, अलादीन के चिराग की तरह उसके सामने पेश कर दिया जाता। यह बात दीगर है कि बचपन के छोटे शहरों में मांगने को कुछ ज्यादा नहीं होता था। वह दिल्ली का बचपन नहीं था कि सुनन्दा एक दिन स्कूल से आकर अमरीका जाने की जिद करे क्योंकि उसकी सहेली गर्मियों की छुट्टियों में अमरीका जा रही है और जब उसे बताया जाय कि अमरीका जाने के लिए बहुत रुपए चाहिए तो वह ठुनक कर कहे, ÷÷क्या हम इतने गरीब है कि अमरीका नहीं जासकते?''
माधव यह सुन कर खूब हंसे थे और उन्होंने बेटी को समझाया था कि हम एक गरीब देश में रहते हैं जहां एक तिहाई लोग रोज रात को भूखे सोते हैं। मधु तब झगड़ी थी। उसने कहा था कि बेटी को यह सिखाओ कि तुम खूब पढ़ कर खूब लायक बनो ताकि बड़ी होकर हर साल अमरीका जाओ और चाहो तो वहीं बस जाओ। माधव इस पर आग बबूला हो गये थे और देर तक चीखते रहे थे, ÷÷मेरी बेटी अमरीका में बसेगी? मेरी बेटी अमरीका में बसेगी?''
डैडी के जमाने में अमरीका का जमाना शुरू नहीं हुआ था। वे यह जरूर चाहते थे कि मधु ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज जाए। मगर वे बीच में ही चले गये। वरना वह इंग्लैण्ड जरूर जाती। क्या पता, तब शायद गिरीश ही लपक कर उसका हाथ मांगता। मधु एक आई.ए.एस. से शादी करती, डैडी का सपना पूरा हो जाता। क्या यह कभी मधु का भी सपना था?
मधु ने बिस्तर पर करवट ली।
जब वह छोटी थी और बंगले में डैडी थे, तो मधु को लगता था कि वह कहीं भी हाथ बढ़ा कर कुछ भी पा सकती है। शायद उन दिनों यदि उसकी चांद को तोड़ने की इच्छा होती तो वह चांद भी अमरूद की तरह चपरासी से तुड़वा लेती। वह बिस्तर पर अंधेरे में मुस्करायी। जब माधव ने पहली बार नीमअंधेरे में उसे मजनूं की तरह देखा तो उसका कोई सपना नहीं था। वह दिन में शेक्सपीयर पढ़ाती और शाम को अक्सर किसी सहेली के साथ कनॉट प्लेस के गलियारों में घूमती जहां आहिस्ता आहिस्ता रोशनियां जलतीं और प्रदर्शन - खिड़कियां चमकने लगतीं। वह कभी किसी खिड़की के सामने ठिठक कर खड़ी हो जाती, फिर आगे बढ़ जाती। गलियारों के कोनों और मोड़ों पर अक्सर कुछ अंधेरा जमा हो जाता, जिसके ऊपर गोल मेहराब छाये होते।
अंधेरे पर छाये हुए गोल मेहराब... अंधेरे, गोल मेहराब... मधु को उन दिनों अंधेरे मेहराबों के सपने आते थे। कोई अन्तहीन मैदान था जिसमें अंधेरा था और दूर दूर तक मेहराबों की कतारें थीं... ऐसा लगता जैसे मेहराब हवा में टंगे हों... हालांकि हवा कहीं चलती हुई नजर नहीं आती थी क्योंकि कहीं कोई पेड़ नहीं था... कोई आवाज भी नहीं थी। सपने में सिर्फ अंधेरे की आवाजें थीं। फिर मेहराब कतार दर कतार टूट टूट कर बिखरने लगते और अन्त में सिर्फ अंधेरे की चादर बचती। तब मधु को पता चल जाता था कि यह सपना है और वह सपने की जकड़ से छूटने की कोशिश करती। सपने में समय का कुछ पता नहीं चलता था। यह घड़ी का समय नहीं था। यह समय के ईजाद होने के पहले का मैदान था जहां अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं था।
मधु ने अचानक हड़बडा+ कर आंखें खोलीं। करवट बदली। उसे सपने का अंधेरा मैदान याद था जिसमें कोई दूर जाती आकृति थी। यह एक दूर जाते पुरुष की आकृति थी जिसने सूट पहना था और जिसके सिर पर हैट था। यह वही हैट था जो डैडी पहना करते थे। डैडी के सिर के कुछ बाल सफेद होने के अलावा मधु को उनमें कोई और परिवर्तन याद नहीं था। हैट से सिर के बाल ढक जाते थे। मधु को लगा कि अभी सपने के मैदान में देखी डैडी की तस्वीर ही मुकम्मल डैडी थे जो उसे हमेशा बहुत प्यार करते थे जब से उसने आंखें खोलीं। वे उसे गोद में उठा कर आकाश की ओर उछालते और फिर हाथों हाथ ले लेते। उसे पता होता था कि वह कहीं भी कूदे, यदि वह गिरी तो डैडी उसे थाम लेंगे। यदि वह जिन्दा रहते, तो वह आकाश में जरूर उड़ती। उनकी मौत ने वह भरोसा तोड़ दिया था। उसे अक्सर बचपन के एक बाग में डैडी के पीछे, ÷डैडी, डैडी', चीखते हुए अपना दौड़ना याद आता था। तब उसने सफेद सिल्क का फ्राक पहना था जो हवा में पीछे की ओर उड़ता था। वह दूर से हवा में भागती एक झण्डी लगती थी - बंगले के बरामदे में खड़ी मां ने बाद में कहा था।
कांपती झण्डी एकाएक जमीन में गड़ गयी थी। पूर्ण पुरुष दूर चला गया था।
जिस शाम उसने माधव से पी.आर.ओ. की नौकरी की पेशकश की, उसी रात वे रैगड़पुरा अपने दोस्त के पास चले गये थे। कुछ कहा नहीं था। बिना कुछ कहे चले गये थे जैसे कुछ कहने की जरूरत न हो। अगले दिन दोपहर में आये थे और अपने कपड़े और किताबें लेकर चले गये थे जैसे घर में उनके अपने सिर्र्फ कपड़े और किताबें हों। अकेली सुनन्दा घर में थी। वह इतनी बड़ी नहीं थी कि राजकुमार सिद्धार्थ का घर छोड़ना समझ सके। वह समझती रही कि पापा शाम को लौट आयेंगे। जाते हुए उन्होंने उसे कई बार चूमा था। सुनन्दा ने उनकी आखों में आंसू देखे थे - यह उसने बाद में मधु को बताया। मधु को पता नहीं था कि महल छोड़ते समय सिद्धार्थ की आंखें भीगी थीं या नहीं। वह उस रात तेज टी.वी. के सामने सुनन्दा को बिठा कर बाथरूम बन्द करके फूट फूट कर रोयी थी।
यह पहली बार नहीं था। न आखिरी बार था। यह बन्द कमरे का अकेला रोना बार बार होता था जैसे अकेलेपन के मौसम का कोई उत्सव हो जिसे बन्द कमरे में ही मनाया जाना हो। चारों ओर से बन्द कमरा बियाबान लगता था चाहे उसमें कितना भी सामान भरा हो। ऐसा भी होता था कि कोई फिल्म देखते हुए, घर के पीछे पेड़ों के बीच टहलते हुए या आराम कुर्सी पर लेटे हुए अचानक मन में बादल घिरने लगते और बारिश शुरू हो जाती। सुनन्दा शुरू शुरू में सवाल पूछा करती थी। फिर उसने मधु से कुछ पूछना बन्द कर दिया था। शायद अपने से पूछती हो। मधु ने सुनन्दा का चेहरा देखा जो पलंग के दूसरे तकिये पर अभी उसी की ओर था। आंखें बन्द थीं। वह गहरी नींद में सो रही थी। अभी उसका चेहरा देखते हुए उसे स्कूल की नीली ड्रेस पहने दो चोटियां बांधे सुनन्दा का चेहरा याद आया।
ऐसा अक्सर हो जाता था जब मधु को बिल्कुल नींद नहीं आती या एक नींद के बाद आधी रात को नींद टूट जाती और फिर नींद न आती। वह हमेशा अपने पास नींद की गोलियां रखती थी। लखनऊ भी अपने साथ लायी थी। यहां नहीं लायी थी क्योंकि यहां रुकने की कोई बात नहीं थी। माधव को जगा कर उनसे नींद की गोलियों के बारे में पूछा जा सकता था। क्या वे सो गये थे?
मधु की रोती आंखें बन्द थीं जब उसके कानों में आवाज पड़ी : ÷÷क्या नींद नहीं आ रही?''
वह सीधी लेटी थी। बन्द आंखों में वह खोयी सी लड़खड़ाती हुई भीतर उतरती जा रही थी जब उसके कानों में आवाज गूंजी : ÷÷क्या नींद नहीं आ रही?''
उसने तुरन्त हड़बड़ा कर आंखें खोलीं। बगल में लेटी सुनन्दा की आंखें खुली थीं। तब उसने जाना कि माधव सुनन्दा की आवाज में नहीं बोल सकते थे।
सुनन्दा को मालूम था कि मधु कभी कभी नींद की गोली खाती थी और हमेशा इन गोलियों की शीशी अपने साथ रखती थी। मगर अभी वह शीशी उसके साथ नहीं होगी, वह जानती थी। उसे अफसोस हुआ कि सोने से पहले उसे यह याद नहीं आया। वह अपने घर जाकर वह शीशी ला सकती थी। उसकी मारुति बाहर खड़ी थी।
÷÷पापा नींद की गोली नहीं खाते।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷क्या मैं तुम्हारी शीशी घर से उठा लाऊं?''
÷÷आधी रात को?'' मधु हंसी।
÷÷घर दूर नहीं है।''
÷÷रात तो आधी है।''
कुछ देर कोई आवाज नहीं आयी। कमरे में थोड़ी सी हवा अंधेरे के साथ घूमती रही।
÷÷मम्मी।'' सुनन्दा बोली, ÷÷जब तक मैं दिल्ली में थी, तुम नींद की गोली नहीं लेती थीं।''
÷÷हां।''
÷÷फिर क्या हुआ?''
÷÷तुम लखनऊ चली आयीं।'' मधु हंसी, ÷÷या शायद मेरी उम्र का तकाजा हो।''
÷÷नहीं, उम्र नहीं है।''
÷÷क्यों?''
÷÷उम्र होती तो पापा भी नींद की गोलियां खाते।''
÷÷क्या वे बिल्कुल नहीं खाते?''
÷÷नहीं।''
सुनन्दा ने मधु की ओर करवट ली। उसने मां की आंखों में देखने की कोशिश कीःवहां अंधेरा था।

वहां कोई नहीं जाता था।
लोग सड़क पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक सुबह शाम घूमते रहते। कोई कभी कुछ दूर गोमती की ओर पगडण्डी पर चला जाता जहां आगे नाला था और नाले से वापिस लौट आता या सीधा न जाकर कोई दायीं ओर मुड़ जाता जहां सड़क के बायीं ओर ऊबड़खाबड़ मैदान था जिसमें सुबह शाम लोग हाथ में पानी की बोतल या मग लिए झाड़ियों की ओर जाते या वहां से लौटते नजर आते। सूरज उसी ओर आसमान के एक कोने में डूबता था जहां हर शाम सुनहरे रंग छितरा जाते - गोमती थोड़ी दूर वहीं सूर्य के नीचे बहती थी। सड़क से गोमती दीखती नहीं थी, मगर उस ओर उसके बहने का अहसास मन में रहता था जैसे वह मन में बह रही हो। सड़क पर सामने छोर पर, जगौली गांव के धूसर मकान नजर आते थे जो उदास और उजाड़ लगते। कोई आदमी या साइकिल उस छोर पर अक्सर दिखती।
सड़क पर घूमने वाले लोग अधिसंख्य अवकाशप्राप्त थे। वे जाड़ों में कुछ ज्यादा ही ढंके नजर आते थे - ऊपर से नीचे तक। गर्मियों में उनके शरीर अकबका कर खुल जाते थे जैसे अभी कुछ लोग सुबह - सुबह टी शर्ट निकर पहने निकल आये थे। एक दो अकेले लोगों के हाथ में छोटी रूल सी छड़ी भी नजर आती थी जैसी नेहरू हाथ में लेकर हिलाते हुए चलते थे। हाथ में डण्डी धुमाते हुए ये सिर्फ सीधे देखते थे और भागे बढ़े चलते जाते थे जब तक सड़क खत्म न हो - ये अक्सर भूतपूर्व नौकरशाह होते थे। कुछ लोग रोज एक साथ झुण्ड में दिखते थे। वे हंसते हुए क्रिकेट या राजनीति पर बातें करते या भजन गाने लगते... कब लोगे खबर भगवान, बड़ी देर भई। इनकी पोशाकें आजाद होती थीं। कभी कभी लगता कि कोई धोती कुर्ता पहने सीधा बिस्तर से उठ कर सड़क पर आ गया है।
सड़क से नीचे कोई नहीं उतरता था।
माधव दयाल रोज सड़क पार करते और दूसरी ओर पगडण्डी पर उतर जाते जहां दोनों ओर झाड़ियां थीं, कुछ कंटीले झाड़ थे और कुछ दूर यूक्लिप्टस के सिर हिलाते पेड़ों का झुरमुट था जैसे वे उनका इंतजार कर रहे हों। वे दूर से हां हां में सिर हिलाने लगते जब पूरब में सूर्य आहिस्ता आहिस्ता उगता और किरणें पेड़ों की ओर भागतीं। माधव दयाल पगडण्डी को ऐसे पकड़ते जैसे किसी का हाथ पकड़ रहे हों। वे एकटक उस हाथ को देखते। दोनों ओर सूनी झाड़ियां थीं। कभी कभी कोई कांटा उनके हाथ या पेट में चुभ जाता। वे ठिठकते। फिर आगे बढ़ जाते। पगडण्डी पर अभी कहीं कहीं सूखी घास थी जो झाड़ियों के बीच साबुत नजर आती थी। झाड़ियों के परे दूर मैदान में दायें बायें कुछेक पेड़ थे। कोई चिड़िया किसी झाड़ी से फुुर्र से उड़ती और दूसरी झाड़ी में घुस जाती जैसे किसी दूसरे घर में घुसी हो और उसने किवाड़ बन्द कर लिये हों। आकाश में फिर रोशनी भर रही थी। नीला रंग पिघलने लगा था। लगता था सुबह सुबह आसमान फिर पैदा हो रहा है। तीन चिड़ियां एक साथ ऊपर चहचहाती हुई निकलीं जैसे कोई सुबह का गीत गा रहीं हों। एक कुत्ता दायीं ओर से निकला और खड़ा होकर कान फड़फड़ाने लगा। माधव दयाल जब आगे बढ़े तो वह बायीं ओर भाग गया। पगडण्डी पर कुछ धूल और सूखी घास और कुछ कदमों के निशान बचे जो पता नहीं कहां से आये थे। वे आगे बढ़ते रहे। उनकी आंखें यूक्लिप्टस के पेड़ों की पत्तियों पर थीं जहां उजाला बढ़ता जा रहा था। आसमान में जहां उजाला बढ़ रहा था वहीं पेड़ों की पत्तियों की एक छत बन गयी थी। ऐसा लगता था जैसे हरी छत पर रोशनी की बारिश हो रही है। जब माधव दयाल छत के करीब पहुंचे तो सूर्य की किरणों का पुंज पत्तियों की दीवारें भेद कर तीन ओर से उनकी ओर लपका।
÷÷क्या खो गया है?''
पीछे से एक आवाज आयी। उन्होंने मुड़ कर देखा। एक सैनिक हाथ में पानी की बोतल लिये खड़ा था। उसका चेहरा बोतल की तरह खाली था।
÷÷पता नहीं।'' माधव दयाल के मुंह से निकला।
÷÷क्या ढूंढ रहे हैं?''
÷÷कुछ खो गया है।'' वे हंसे। उन्हें लगा कि कोई नसैनी हो तो हरी छत पर चढ़ जाएं।
सैनिक मुस्कराता हुआ पीछे मुड़ कर चला गया। वह उसी ओर गया था। जहां सेना का एक टेण्ट था जिसमें आठ दस लोग पहरे के लिए रहते थे। हरे मैदान में टेण्ट देख कर लगता था जैसे वे यूक्लिप्टस के पेड़ों की रखवाली कर रहे हों।
हरी छत के नीचे दो शैडों का लोहे का ढांचा था। शैड एक दूसरे के न आमने सामने थे, न आगे पीछे थे - एक दूसरे के पड़ोस में थे। इनमें न दीवारें थीं, न दरवाजे थे। या शायद हवा की दीवारें और हवा के दरवाजे थे जिनके चारों ओर लोहे का ढांचा था। ये कोई कारखाना या गोदाम कुछ भी हो सकते थे। मगर ये न गोदाम बने थे न कारखाना। ये सिर्फ ढांचे थे जिनकी जमीन पर घास उगी थी, दीवारों में हिलते हुए पेड़ थे और छत पर पेड़ों की पत्तियां थीं जैसे कोई पेड़ों का गोदाम या कारखाना हो। माधव दयाल को यही लगता जब वे किसी शैड के बीच में खड़े होकर चारों ओर निहारते। चारों ओर झाड़ियों और पेड़ों के हरेपन के बीच सुबह की रोशनी खुशी की तरह फैल जाती। पैरों के आसपास जमीन कहीं कहीें पोली थी जैसे अन्दर कोई तिलिस्मी गुफा हो।
पेड़ों के बीच अकेले खड़े हुए एकाएक माधव दयाल के कानों में पक्षियों की आवाजें आयीं। चिड़ियों की चूंचूं का समवेत कलरव था। कोयल का स्वर सबसे ऊपर था... कुहू कुहू... कुहू कुहू... जिसके चारों ओर चिड़ियां उड़ती हुई लगती थीं। माधव दयाल यह सोच कर विस्मित थे कि वे इतनी देर से यहां खड़े थे और पक्षियों की चहचहाहट उन्होंने अभी सुनी थी। क्या चिड़ियां पहले चुप थीं या उनके कान भी आंखों में समा गये थे?
आंखों के सामने एक यूक्लिपटस के तने पर चाकू से एक दिल खोदा गया था जिसमें एक तीर चुभा था। माधव दयाल अपलक कुछ देर उस तीर को देखते रहे। तने पर उसी जगह सूर्य की कोई किरण एकाएक चमकी। ऐसा लगा की तीर तने को भेद कर दूसरी ओर हवा में उड़ जाएगा। उन्होेंने अचरज से पेड़ के परे देखा और फिर ऊपर पत्तियों के बीच में नजर जमा दी जहां प्रकाश पुंज फूट रहा था। जब उनकी आंखें कुछ चौंधियाने लगीं तो उन्होंने आंखें नीची कीं और यूक्लिपटस के तने के चार चक्कर लगाये। पेड़ मे बिंधे तीर के आसपास कहीं कोई नाम नहीं था।
सूरज कल भी निकला था। कल भी आसमान में पत्तियों के बीच प्रकाश पुंज फूटा था। कल भी कोयल जरूर बोली होगी। लेकिन कल माधव दयाल ने न आसमान में कोई प्रकाश पुंज फूटता देखा था, न कोयल की बोली सुनी थी। उन्होंने ऊपर जरूर देखा था जैसे कोई गूंगी प्रार्थना कर रहे हों। चाहे उम्मीद न हो, प्रार्थना की गुंजाइश हमेशा थी। कोई उम्मीद नहीं थी। सारा मीडिया फिर दिल्ली में एन.डी.ए. के काबिज होने के संकेत दे रहा था। क्या अब फिर पांच साल तक देश को इसी अन्धी गली में जाता हुआ देखेंगे? क्या वे पांच वर्ष और जिएंगे? वे अपने भीतर इन्हीं खड़खड़ाते सवालों को लिए सुबह इन यूक्लिप्टस के पेड़ों से घर की ओर चले थे। चलने के पहले जब उन्होंने अपनी नजरें आकाश से नीचे उतारीं तो गले में कुछ फंसा था। शायद उन्हें पिछले दिनों साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन में मंच पर माइक के पीछे इरफान हबीब की टूटती, कुछ भीगी सी आवाज याद आ गयी थी। क्या कोई रुंधी हिचकी भी प्रार्थना हो सकती थी?
प्रार्थना के लिए ईश्वर की जरूरत नहीं थी।
पगडण्डी से सड़क पर लौट कर उनकी नजर दायीं ओर पेड़ के नीचे ताश के पत्तों सी खड़ी झोपड़ी पर पड़ी। दो ताश के पत्ते जैसे धूल में एक दूसरे से टिके खड़ें हों, घने पेड़ के नीचे छोटी सी झोपड़ी टेण्ट की तरह खड़ी थी। नन्हा सा टेण्ट एक चारपाई को घेरे था, जिस पर कुछ गूदड़ पड़े थे जैसे कोई अभी चारपाई से उठ कर कहीं चला गया हो। टेण्ट के बाहर एक सुराही थी, एक प्लास्टिक का डिब्बा था और तीन प्लास्टिक की तश्तरियां बिखरी थीं। तश्तरियां खाली थीं जैसे उड़नतश्तरियां हों। पता नहीं, सुराही या डिब्बे में कुछ था या नहीं। सड़क के किनारे यह अनोखा घर था। ऐसा घर माधव दयाल ने पहली बार देखा था। क्या यह इक्कीसवीं सदी का आविष्कार था? यह कुछ दिन पहले ही पहली बार नजर आया था। लेकिन इसका निवासी नजर नहीं आया था। हमेशा ऐसा लगता था जैसे कोई अभी गूदड़ों से उठ कर गया हो - जो अभी लौट कर आ जाएगा! वह कोई भी हो सकता था। वह किसी जंगल या नदी से विस्थापित कोई आदमी हो सकता था जिसका परिवार खो गया हो। वह ऋण में डूबा कोई किसान भी हो सकता था जो अचानक यहां पार लग गया हो। वह हमेशा अपने घर से बाहर कुछ ढूंढता था। वह कभी नजर नहीं आता था। ईश्वर की तरह। क्या यह ईश्वर का घर था?
माघव दयाल इस ख्याल पर मुस्कुराये। वे अपने घर की ओर जा रहे थे। सड़क पर धूप थी। कॉलोनी के भीतर पश्चिम की ओर इमारतों के लम्बे साये पड़े थे। इन्हीं सायों को रौंदते हुए लोग आ जा रहे थे और गाड़ियां भी आ जा रही थीं। अचानक उनकी नजर उसी काले सफेद कुत्ते पर पर पड़ी जो पहले पगडण्डी पर कान फड़फड़ा रहा था और अभी अपने दोनों सामने के पैर तान कर अंगड़ाई ले रहा था। अपने फ्लैट के सामने पहुंच कर माधव दयाल ने देखा कि दरवाजे पर ताला पड़ा है। बाहर सुनन्दा की सफेद मारुति भी नहीं थी। जब वे घूमने निकले तब मां बेटी दोनों सो रहीं थीं। तब धूप नहीं थी। अब धूप निकलते ही वे गायब हो गयी थीं। वे अपने फ्लैट के सामने कुछ भौंचक्के से खड़े थे जब पड़ोसी का दरवाजा खुला और उनकी बेटी कामना मुस्कराते हुए बाहर आयी। वह माधव के प्रति काफी कोमल थी जैसे अक्सर जवान लडकियां बूढों के प्रति होती हैं। फिर माधव अकेले रहते थे। कामना चहकी, ÷÷गुड र्मॉर्निग अंकल, सुनन्दा आपके लिए चाभी छोड़ गयी है।''
चाभी लेते हुए माधव दयाल की नजर बरबस कामना की छातियों पर पड़ी जो नाईटी से ऊपर झांक रहीं थीं। उन्हें ताज्जुब होता जब वे बाद में अपनी उस नजर को याद करते। ताज्जुब की बात यह थी कि उस क्षण उन्हें अपनी सफेद दाढ़ी याद नहीं रहती थी जैसे वे सिर्फ पुरुष थे और कामना स्त्री। वे चौंक जाते थे। दरवाजा खोल कर उन्होंने जब अखबार उठाया तो मुखपृष्ठ देख कर वे चौंके! वे नीचे दायीं ओर देख रहे थे जहां उनकी तस्वीर छपी थी। खबर यह थी कि सुप्रसिद्ध कवि माघव दयाल की कल अचानक दोपहर में हृदय गति रुक गयी थी जब देश भर में लोकसभा चुनाव की मतगणना चल रही थी। उन्हें धरती पर उतार दिया गया था। उनकी भूतपूर्व पत्नी और इकलौती बेटी मौजूद थीं। कुछ देर बाद एकाएक धरती पर उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और बिटर बिटर चारों ओर देखा जैसे अभी पैदा हुए हों। यह चमत्कार था। यह सही है कि ऐसा चमत्कार पहली बार नहीं हुआ था। किन्तु यह भी सही है कि ऐसा संयोग पहली बार घटित हुआ जब माधव दयाल और देश ने एक साथ दूसरे जन्म में आंखें खोलीं। लखनऊ के साहित्यकारों ने उनके शतायु होने की कामना की थी।
माधव दयाल अखबार एक ओर फेंक कर ठहाका मार कर हंसे और देर तक हंसते रहे। हंसते हुए वे सोफे पर पसर गये थे। क्या यह खबर सही थी? क्या हर खबर की तरह इसे भी अधिकतम सनसनीखेज नहीं बनाया गया था? इस खबर का स्रोत कहां था? उनकी हंसी चुक गयी थी। उदासी आंखों से निकल कर चेहरे पर झिलमिलाती हुई नीचे दाढ़ी में उतर रही थी। आहिस्ता आहिस्ता उनकी आंखों की पलकें नीचे गिरने लगीं। तभी घण्टी बजी। यह फोन की घण्टी नहीं थी। यह दरवाजे की घण्टी थी। बाहर कोई था। वे उठे। उन्होंने दरवाजा खोलाः चेहरा धुंधला था।
÷÷कौन?'' उन्होंने आंखें झुपझपाते हुए पूछा, ÷÷आप कौन हैं?''
अजनबी हंसा, ÷÷सर, आपने मुझे पहचाना नहीं।''
तब माधव को याद आया कि उनकी आंखें नंगी हैं। वे अपना चश्मा मेज पर भूल आये थे। वे मुड़े। उन्होंने अपना चश्मा उठा कर आंखों पर लगाया और फिर पीछे मुड़ कर सामने देखा।
÷÷अरे, हरि तुम हो।'' वे मुस्कराये। उनकी मुस्कान पर एक छाया सरकी थी। उन्होंने अपने को संभालते हुए कहा, ÷÷पिछली बार तै हुआ था कि तुम मुझे सर नहीं कहोगे और मेरे पास आकर रुकोगे।''
÷÷असल में मैं आज सुबह ही सरकारी काम से आया हूं।'' हरि बोला, ÷÷स्टेट गेस्ट हाउस में रुका हूं। अखबार में आपकी खबर देखी तो चला आया।''
माधव मुड़े। हरि पीछे पीछे अन्दर आया और सामने सोफे पर बैठ गया। वे बैठ गये थे और उसके चेहरे की ओर ताक रहे थे। उन्हें अपनी जवानी की तस्वीर याद आ रही थी। फर्क यही था कि कुर्ते की जगह उसने नफीस कमीज पहनी थी, बाल ढंग से संवारे थे और उसके पैरों में चप्पलों की जगह नये फैशन के काले मोकासो थे। वह एक भव्य सरकारी अफसर लगता था जिसके आसपास पत्तियों को भी उससे हिलने की इजाजत लेनी पड़े।
÷÷अब आपकी तबियत कैसी है?'' हरि ने पूछा।
÷÷ठीक है।'' वे हंसे, ÷÷मुझे कुछ नही हुआ था।''
÷÷अखबार की खबर?''
÷÷अखबार आजकल हर चीज को सरकस बना देते हैं।'' वे फिर हंसे।
हरि फ्लैट में इधर उधर देखने लगा। उसने कान लगा कर आवाज सुनने की भी कोशिश की। घर में कोई आवाज नहीं थी।
÷÷क्या आप अकेले रहते है, सर ?''
÷÷फिर तुमने मुझे सर कहा।'' वे बोले।
÷÷आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।''
÷÷अकेला।'' वे मुस्कराये, ÷÷हां, अकेला रहता हूं। नौकरानी सुबह शाम घर देखती है, खाना बनाती है। जब वह नहीं होती, तो सुनन्दा खाना भेज देती है। वह सड़क के दूसरी ओर विश्वास खण्ड में रहती है।''
हरि का चेहरा कुछ सख्त हो गया था। उसकी नाक पर पसीना आ गया था। माधव दयाल ने नाक पर पसीना देखा तो उन्हें याद आया कि उन्हें भी इसी तरह नाक पर पसीना आता था जब वे जवानथे।
÷÷आप कुछ दिनों मेरे पास पुणे क्यों नहीं आते?'' हरि ने सहज होने की कोशिश की।
÷÷आजकल पुणे में हो?''
÷÷हां, आप आइए।''
÷÷मैं कैसे आ सकता हूं?''
÷÷क्यों?'' हरि ने आंखें फाड़ीं, ÷÷आप क्यों नहीं आ सकते?आपकी बहू और पोती आपको याद करतीं हैं।''
÷÷उन्होंने तो मुझे देखा भी नहीं।''
÷÷इसीलिए तो और भी ज्यादा याद करती हैं।''
÷÷लेकिन मैं कैसे आ सकता हूं?''
÷÷क्यों?'' हरि कुछ खीझ गया।
÷÷तुम तो मुझे सर कहते हो।''
÷÷अब नहीं कहूंगा, पापा!'' वह मुस्कराया।
÷÷पापा!''
बरसों पहले एक नवयुवक एक सुबह उनके दरवाजे पर आकर खडा हो गया था जब वे इन्दिरा नगर की एक बरसाती में रहते थे और दरवाजा खुलते ही उसने कहा, ÷÷पापा!''
÷÷तुम कौन हो, बेटा?'' वे भौचक्के थे।
÷÷आप माधव दयाल हैं?''
÷÷हां।''
÷÷मैं आपका बेटा हूं।'' वह चीखा।
÷÷चीखते क्यों हो?'' उन्होंने हैरत से नवयुवक को देखते हुए ठण्ठी आवाज में कहा।
उसने हथियार डाल दिये और हताश स्वर में बोला, ÷÷मैं इसीलिए चीखा कि आपको पता नहीं कि मैं आपका बेटा हूं।''
÷÷मुझे सचमुच पता नहीं'' वे उस अपलक देख रहे थे, ÷÷मैं तुम्हें पहली बार देख रहा हूं।''
÷÷हमारे रिश्ते का देखने से कोई ताल्लुक नहीं है।'' उसने माधव दयाल की आंखों में देखते हुए कहा।
माधव दयाल दरवाजे पर खड़े थे। पीछे हटते हुए वे बोले, ÷÷अन्दर आओ।'' अन्दर मुड़ कर उन्होंने पंखा चला दिया। गर्मियों के दिन थे। सुबह का वक्त था। हवा गर्म होने लगी थी।
दोनों आमनेसामने बैठे थे। नवयुवक ने एक गन्दी सी जीन्स पहनी थी। उसकी भूरी कमीज कुछ मुचड़ी थी। पैरों में कोल्हापुरी चप्पल थी। हाथ में एक बैग था जो उसने अभी फर्र्श पर रख दिया था।
÷÷कहां से आ रहे हो?'' उन्होंने पूछा।
उसके बेतरतीब बाल पंखे की हवा में उड़ रहे थे। दाढ़ी बढ़ी थी जैसे दो तीन दिन से न बनी हो।
÷÷झांसी से।'' उसने कहा।
÷÷झांसी से?'' माधव दयाल ने आंखें फाड़ीं।
÷÷हां।''
÷÷झांसी में कहां रहते हो?'' उन्होंने फिर पूछा।
÷÷खुशीपुरा में।''
माधव दयाल उसे गौर से देख रहे थे। उसका रंग गोरा था। नाक लम्बी थी। कुछ लम्बोतरा सा चेहरा था। उसका चेहरा देखते हुए अचानक उन्हें अपनी तस्वीर याद आयी जब वे युवा थे। वे थोड़ी देर से ही सही उसी तरह चौंके जैसे मधु पहलेपहल हरि को देख कर चौंकी थी। लेकिन दुनिया में ऐसे संयोग कभी कभी परवान चढ़ जाते थे। आखिरकार, ईश्वर कहां तक नये चेहरे गढ़े? उनके साथ ऐसे संयोग घटे थे कि कोई मृत व्यक्ति बाजार में अपने चेहरे और चाल में उनके सामने से हंसता हुआ निकल जाता या कोई पुराना दोस्त अचानक सड़क पर बीस साल पहले की उम्र में नजर आ जाता। वे उसे हैरत से देखते रह जाते,बस।
÷÷तुम्हारा नाम क्या है?'' उन्होंने पूछा।
÷÷हरि...हरि वर्मा।''
÷÷कायस्थ हो?''
÷÷नहीं।'' उसने नाक सिकोड़ी,÷÷कोरी हूं।''
÷÷घर में कौन कौन है?''
÷÷सिर्फ मां है।'' उसने कहा।
वह माधव दयाल की जानिब देख रहा था। माधव दयाल उसकी जानिब देख रहे थे।
÷÷तुम्हारी मां का नाम क्या है?'' उन्होंने पूछा।
÷÷चम्पा।''
माधव दयाल की नजरें एक झटके से नीचे की ओर झुकीं।
अगले क्षण उन्होंने सिर ऊपर उठाया। वे फुसफुसाये, ÷÷तुम चम्पा के बेटे हो?''
÷÷और आपका!'' हरि ने कहा।
हरि ने बताया कि जब से उसने आंखें खोलीं, उसने बापू को अपने घर में पाया था। फिर बचपन में ही उसका बापू घर छोड़ कर चला गया। मां ने उसे पाला। वह अपने बापू को ही बापू समझता रहा - तब भी जब वह घर छोड़ कर चला गया था। वह पढ़ने में बहुत अच्छा था। उसे जे.एन.यू. में प्रवेश मिल गया। वहां सुनन्दा से उसकी दोस्ती हुई। वह पिछले माह सुनन्दा को झांसी घुमाने लाया। मां उसे देख कर खुश हुई। वह और भी खुश हुई जब हरि ने कहा कि मैं सुनन्दा से ब्याह करना चाहता हूं।
÷÷क्या वह एक कोरी से ब्याह करेगी?'' मां ने पूछा।
÷÷वह जातपात में विश्वास नहीं करती।'' हरि ने कहा।
जब चम्पा ने सुनन्दा से पूछा तो सुनन्दा ने कहा कि हरि के सामने तो मैं ही कोरिन लगती हूं। सुनन्दा का इशारा हरि के गोरे रंग की ओर था, जबकि वह खुद सांवली थी। चम्पा ने उसे गले से लगा लिया। उसने सुनन्दा के मां बाप के बारे में पूछा। दोनों अलग हैं, यह सुन कर उदास हुई। पिता झांसी के ही हैं, यह सुन कर वह चौंकी। पिता का नाम सुन कर वह तुरन्त उठी और भीतर के कोठे में चली गयी। दिन भर कोठरी से बाहर नहीं आयी। रात को उसने हरि से कहा कि यह ब्याह नहीं हो सकता।
÷÷क्यों?'' हरि बिखर गया,÷÷क्यों नहीं हो सकता?''
÷÷क्योंकि सुनन्दा तुम्हारी बहन है।''
हरि अंधेरी कोठरी में चीखा जब चम्पा ने उसे बताया कि उसके असली बापू माधव दयाल हैं।
यह हरि का दूसरा जन्म था। उसने जाना कि बचपन में छोटे बड़े उसे क्यों चिढ़ाते थे,÷÷तेरे मां बाप काले,तू गोरा कहां से आ गया?''उसका गोरा रंग मोहल्ले और स्कूल में कुछ अजूबा सा था। एक कारण यह भी था कि वह भरसक किताबों में डूबा रहता और हमेशा फर्स्ट आता। जैसे फर्स्ट आना एक कोरी के अपने गोरे रंग को छिपाने की आड़ थी।
÷÷आपका यह रंग।'' हरि ने हिकारत से अपनी नंगी बाहें फैलाते हुए कहा,÷÷ मेरे लिए अभिशाप हो गया।''
माघव दयाल शून्य में ताक रहे थे।
÷÷न मैं कोरी रहा।'' वह फिर बोला, ÷÷न कायस्थ।''
वे चुप थे।
÷÷पापा!'' वह चीखती सी आवाज में बोला, ÷÷मेरी प्रेमिका मेरी बहिन हो गयी।''
वह रो रहा था।
वे चुप थे जैसे कटघरे में खड़े आरोपी की जबान खो गयी हो।
वे उसके आंसू देखते रहे। उनके जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई। इस इच्छा का भी पता नहीं चला कि वे उठें और उसके आंसू पोंछें। उनका मुंह भी नहीं खुला कि कोई शब्द फूटे।
जब आंसू थमे तो उसने पूछा, ÷÷आपसे एक बात पूछना चाहता हूं।''
÷÷पूछो।''
÷÷क्या आपको मेरे होने की खबर थी?''
÷÷नहीं।''
हरि ने अपने आंसू खुद पोंछ लिये थे। उसका चेहरा मूर्ति की तरह सख्त था। माघव दयाल मूर्ति देख रहे थे। उनके भीतर एक आवेग जरूर उठा, जिसे उन्होंने थाम लिया।
÷÷मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं।'' माधव दयाल के मुंह से ये शब्द अपने आप निकले।
वह एकदम फूट पडा, ÷÷आप मेरा दर्द बिल्कुल नहीं समझते। कविता लिखने से क्या होता है? जिन्दगी कागज पर लिखी कोई इबारत नहीं है।''
वे कुछ देर अपलक उसकी ओर देखते रहे। फिर कहा, ÷÷तुम ठीक कहते हो।...मैं शर्मिन्दा हूं।''
उनकी आंखों में आंसू थे।
सन्नाटा छा गया। छत से लटका पंखा खाली खाली घूम रहा था।
कुर्ते से आंसू पोंछते हुए उन्होंने कहा, ÷÷तुम्हें भूख लगी होगी।''
÷÷पहले मैं नहाऊंगा।'' वह कहते हुए खड़ा हो गया।
÷÷ठीक है, तुम नहाओ। मैं तब तक ऑमलेट बनाता हूं।''
जब वे नाश्ता करने मेज पर आमनेसामने बैठे तो माघव ने धीरे से कहा, ÷÷तुमने मुझे पहले पापा कह कर पुकारा था। हमेशा यही कहना।''
हरि ने ऑमलेट चबाते हुए कहा, ÷शुरू से मैं बापू को अपना पिता मानता था। जवानी में कोई अपना पिता कैसे बदल सकता है?''
माधव एकटक उसे देख रहे थे।
÷÷जब बचपन में बापू घर छोड़ कर चला गया।'' हरि ने फिर कहा, ÷÷तो मैं अपने को सिर्फ अपनी मां का बेटा मानने लगा। बहुतों के पिता बचपन में मर जाते हैं।''
माघव चुप थे।
÷÷क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बचपन से जवानी तक मैं कैसे जिया?'' हरि ने आंखें ऊपर उठायीं।
माधव ने चाय का घूंट लेकर कहा, ÷÷सिर्फ कल्पना कर सकता हूं।''
बहुत देर तक सन्नाटा छाया रहा। सिर्फ चम्मचों और चबाने की आवाजें थीं। हरि ने हाथ में ऑमलेट लिये कहा, ÷÷एक बार जे.एन.यू. की एक गोष्ठी में मैंने अपने ब्राह्मण प्रोफेसर से पूछा कि क्या आप मानते हैं कि प्रेमचन्द घीसू माधव की लकलीफ को उन्हीं की तरह महसूस कर सकते थे? उन्होंने कहा, ÷हां'। मैंने कहा, ÷नहीं'।
उसने ऑमलेट का टुकड़ा मुंह में डाला और उसे चबाने लगा।
÷÷कैसे?'' माधव उसके चेहरे को ताक रहे थे।
उनके कानों में हरि के ऑमलेट चबाने की आवाज आ रही थी। उसने कौर पूरा चबाया। एक घूंट चाय पी। फिर कहा, ÷÷देखिए, पूरी ÷कफन' कहानी में घीसू माधव के चमार होने का सिर्फ एक बार सामूहिक जिक्र आता है, ÷चमारों का कुनबा था...' बस! उनके चमार होने की तकलीफ का कहीं और कोई बयान नहीं है।''
÷÷चमार होने की तकलीफ से मुराद?''
÷÷मेरा मतलब यह है कि चमारों के कुनबे की जगह कुम्हार या कायस्थ का कुनबा भी हो सकता था। प्रेमचन्द खुद चमार होते तो उनकी कलम अपने आप कुछ और आगे बढ़ जाती।''
माधव दयाल किंचित्‌ मुस्कुराये, ÷÷कैसे? जातिगत शोषण पर भी उनकी बेहतरीन कहानियां है... जैसे ÷ठाकुर का कुआं'' और ÷सद्गति'।''
÷÷यही गड़बड़ है'' हरि ने उत्तेजित होकर कहा, ÷÷पीड़ाएं अलग अलग डिब्बों में नहीं बांटी जा सकतीं। ÷कफन' के घीस्‌ माधव कभी सच्चे चमार नहीं हो पाते।''
माधव दयाल सोच में पड़ गये। उनकी चाय खत्म हो गयी थी।
÷÷मैंने एक प्रयोग किया है।'' हरि ने आखिरी घूंट लेकर कहा, ÷÷मैंने ÷कफन' फिर लिखी है।''
÷÷कफन' फिर लिखी है।'' माधव मुस्कुराये, ÷÷क्या मतलब?''
÷÷कहानी वही है।''
÷÷फिर?''
÷÷सिर्फ एक वाक्य जोड़ दिया है।'' हरि ने कहा, ÷÷एक बार एक गोष्ठी में मैंने वह वाक्य जोड़ कर कहानी पढ़ी। कोई फर्क न पकड़ सका। सबने ताली बजा दी।''
÷÷क्या वाक्य था?''
÷÷वह वाक्य इस तरह था, ÷चमरा' पुकारे जाने से जो हतक महसूस होती थी, वह कब की गायब हो गयी थी।''
माधव दयाल कुछ नहीं बोले। फिर उन्होंने पूछा, ÷÷क्या तुम कहानियां लिखते हो?''
÷÷नहीं, मैं आत्मकथा लिखूंगा।''
नाश्ता खत्म हो गया था। हरि ने कहा, ÷÷मैं अपनी आत्मकथा आपको समर्पित करूंगा।''
÷÷हां हां।'' माधव दयाल के मुंह से निकला।
उस गर्मी की सुबह के बाद जब जब हरि माधव दयाल से मिलने आया, उन्होंने उससे आत्मकथा के बारे में पूछा, जो अभी तक नहीं लिखी गयी थी।
जब हरि चला गया तो पुणे के बारे में सोचते हुए उन्होंने फिर अखबार उठा लिया जिसमें उनकी तस्वीर के बगल में आन्ध्र के तीन किसानों की आत्महत्या की खबर थी। सफेद दाढ़ी और बालों से घिरे चेहरे के नीचे माधव दयाल के मर कर जी जाने की खबर थी और तस्वीर के बगल में तीन किसानों के कीटनाशक पीकर मर जाने की खबर थी जैसे तस्वीर दोनों खबरों की अध्यक्षता कर रही हो। क्या किसान तीन ही थे? क्या चौथा किसान नहीं था? क्या चौथा किसान भाग कर नेहरू एनक्लेव के दरवाजे पर ईश्वर के घर में नहीं आ गया था?

गेस्ट हाउस चोटी पर था।
चोटी से नीचे की ओर सवा सौ सीढ़ियां थीं, जिन पर चढ़ते हुए माधव चोटी पर आया था। पहाड़ी की चोटी को समतल कर दिया गया था। पांच कमरे एक कतार में बने थे। कतार के सामने बरामदा था। बरामदे के आगे थोड़ी समतल जगह थी जिसे घेरे चोटी के अवशेष थे जिनमें पत्थर, कुछ चट्टानें और चट्टानों से घिरे कुछ पेड़ शामिल थे। पेड़ों के पत्तों के ऊपर आसमान था। सीढ़ियों के किनारे बेला, चमेली, गेंदा और कुछ गुलाब के फूल थे जिन्हें देखते हुए वह ऊपर चढ़ा था। जब वह ऊपर आया उसके नथुनों में मिलीजुली गन्ध थी। चोटी पर ऐसी गन्ध होगी, उसने सोचा नहीं था। गेस्ट हाउस बियाबान था। सारे कमरे बन्द थे। दूसरा कमरा माधव दयाल के लिए खोला गया था।
यह शहर के बाहर शहर के म्यूजियम का गेस्ट हाउस था। तिमंजिला म्यूजियम नीचे था। म्यूजियम की छत के पड़ोस में गेस्ट हाउस बना था। गेस्ट हाउस के बरामदे में खड़े हुए सुबह के पत्थरों और पेड़ों को देख कर माधव को लगा कि हो न हो यह वही जगह है जहां वह लड़कपन में अपने दोस्तों के साथ हर शाम घूमने आता था। तब वह रेत पर चलते हुए चोटी पर पहुंचता था। अभी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए पहुंचा था। चोटी उसी तरह वीरान थी।
वीरान चोटी पर गुलाब और चमेली की गन्ध जरूर थी।
बसन्त का मौसम था। जाड़े उतर रहे थे। यही मौसम था जब वह पिछले साल अपने शहर आया था। तब बाई अपने घर में मर गयी थी और कैलाश ने उसे दिल्ली फोन किया था। उसने तुरन्त ट्रेन पकड़ी थी। जब वह सुबह घर में घुसा तो आंगन में नीम की पत्तियां गिर रही थीं और दालान में बाई का शव रखा था। शव की आंखें खुली थीं। माधव ने हथेली से आंखें बन्द करने की कोशिश की थी। आंखें फिर फिर खुल जातीं। फिर मुंह पर चादर ढक दी गयी थी। कैलाश ने बताया कि बाई अकेली थी जब मरी। कुछ घण्टों बाद पड़ोसी कैलाश को पता चला था जब उसने घर की सांकल बजायी और घर नहीं खुला। ऊपर से छत पर कूद कर वह नीचे आया था जहां बाई आंखें खोले लेटी थी। जब शव को अर्थी पर रखने के लिए उठाया गया तो वह खाली घड़े की तरह बजा - जिसमें थोड़ा बासी पानी छूट गया हो। खाली शरीर की वह आवाज माधव कभी नहीं भूलेगा जैसे वही बाई की आखिरी आवाज हो। जो कभी घर था, उसके आंगन में अब सिर्फ नीम की गिरती पत्तियां थीं और बाई की मृत देह में गूंजती पानी की पुकार थी। अकेले घर में मरना वैसा ही था जैसे अकेले शरीर में मरना। शायद इसीलिए हड़बड़ाहट में बाई की आंखें खुली रह गयी थीं। बाई को अपने घर का कोना कोना पता था जैसे अपनी देह का। उनकी आंखें हर कोना अंतरा खोज आयी थीं और इंतजार कर रही थीं।
जब शव घर से बाहर निकला तो आंखों को चादर से ढक दिया गया। घर में सन्नाटा था। कोई रो नहीं रहा था। सिर्फ पत्तियों की आंगन में गिरने की आवाज थी। शवयात्रा मोहल्ले से बाजार में गयी। और कोई रास्ता नहीं था। बाजार में शवयात्री खरीदार की तरह लगता था। भीड़ थी। दिन चढ़ गया था। ÷राम नाम सत्य है' के बोल बाजार में गूंज जाते। शव पर कुछ पैसे और मेवे फेके गये। कुछ लड़कों ने लोगों की टांगों से उलझते हुए पैसे लूटे। बाजार में बाई की आंखें चादर के नीचे खुली थीं और चादर के पार ऊपर आसमान में देख रही थीं जैसे वहां कुछ ढूंढ रही हों। आहिस्ता आहिस्ता उन आंखों में इंतजार मर गया था जब श्मशान में आंखों से चादर हटायी गयी। ऐसा लगा जैसे बाई अब कहीं नहीं देख रहीं। तभी उन्हें आग दी गयी थी। माधव चिता के पास खड़ा देर तक देह का आग में पिघलना देखता रहा था। हाड़ जरैं जैसे सूखी लकरियां, केस जरैं जैसे घास। आग की लपटों में आंखें भी खो गयी थीं जैसे अब कुछ देखने को न बचा हो।
श्मशान में आग की लपटें थीं और धुआं था और बतियाते लोगों के झुण्ड थे जो धीरे धीरे कम हो रहे थे। किसी झुण्ड में कभी कोई हंस पड़ता, लेकिन फिर सहम जाता जब उसे याद आता कि वह श्मशान भूमि एक मुर्दे को फूंकने आया है। माधव देर तक बाई की आग देखता खड़ा रहा था। उसकी दोनों पुतलियों में आग की लपटें थीं। इसी अर्ध मूर्छा में उसने कपालक्रिया की... उसने एक डण्डे से बाई की नंगी खोपड़ी तोड़ दी। यह अन्तिम चोट थी जो बेटे ने मां को दी। मां मुक्त हो गयी।
लाल गुलाब का एक फूल हाथ में लिए कैलाश ऊपर आया और उसने वह फूल माधव के हाथ में रख दिया। वह म्यूजियम के ऑफिस में कुछ कार्रवाई पूरी करने के लिए नीचे रुक गया था। उसके पीछे पीछे हाथ में झाड़ू लिए चपरासी की बेटी आयी थी। वह झाड़ू लगाते हुए कनखियों से बार बार माधव की ओर देख रही थी। उसकी आंखें बड़ी थीं जैसे चोटी पर कुछ और खुल गयी हों। जब वे एक दो बार माधव की आंखों से टकरायी तो फौरन दूसरी ओर मुड़ गयीं।
क्या बसन्त लड़कियों के चेहरों में भी आता है? माधव ने सोचा।
÷÷धूल में खड़े क्यों मुस्कुरा रहो हो?'' कैलाश ने बाहर बरामदे की ओर चलते हुए कहा।
कमरे की फर्श से धूल ऊपर उठ रही थी। लड़की झाड़ू से धूल दरवाजे की ओर ठेलती, मगर थोड़ी धूल ऊपर हवा में धुएं की तरह उठने लगती। यह धूल दिखती कम थी, नाक में ज्यादा लगती थी।
माधव बाहर आ गया। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। वह चोटी पर फैली पेड़ पौधों में चमकती ध्ूाप को देख रहा था। धूप के परे आसमान था जिसमें रोशनी भर रही थी।
÷÷क्या सोच रहे हो?'' कैलाश ने पूछा।
÷÷हम लोग स्कूल के दिनों में इसी चोटी पर घूमने आते थे।'' माधव ने गुलाब मेज पर रखते हुए कहा, ÷÷तुम्हें याद है?''
÷÷हां, लेकिन एक फर्क है।''
÷÷क्या?''
÷÷मैं रोज इस चोटी को देखता हूं।'' कैलाश ने ठहाका लगाया।
लड़की दरवाजे पर असमंजस में खड़ी थी। वह चौंकी।
÷÷का हम जाएं?'' लड़की ने पूछा।
÷÷जाओ।'' कैलाश ने कहा, ÷÷तुम्हारा नाम क्या है?''
÷÷चम्पा।'' उसने कहा। वह मेज पर रखे गुलाब की ओर देख रही थी।
माधव की आंखें उसके चेहरे पर थीं - जिससे बुन्देली अभी अपनी लय में झरी थी। उसने चम्पा की नजर का पीछा किया और मेज से गुलाब उठ&