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शताब्दी इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह लम्बी कहानी कहानिया मीमांसा कविताएं विशेष वृत्तान्त पत्र उपन्यास |
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अपूर्णता ही आखिरी मंजिल है - ईब्स बोनफ्वाय
धरती पर देह पड़ी थी। माधव दयाल ने अचानक आंखें खोलीं। जैसे कोई सपना टूटा हो। दोनों ओर एक एक आकृति नजर आयी। स्त्री आकृति थी। मगर दोनों ओर धुंधलापन था। आकृतियां लम्बे धब्बों सी लगती थीं। धब्बे लम्बे थे। धरती पर लेटे माधव दयाल को धब्बे और लम्बे लगे। ÷÷ चश्मा!'' वे चीखे। सुनन्दा ने चश्मा मेज से उठाया , उसकी कमानियां सीधी कीं और झुक कर उसे जमीन पर लेटे माधव दयाल की आंखों पर लगा दिया। वह खुद अचम्भे में थी। उसके गालों पर आंसू की लड़ियां थीं। उसने एकाएक पिता की आंखें खुलती देखी थीं। जैसे किसी बन्द गुफा का दरवाजा खुल रहा हो। ÷÷ सुनन्दा।'' माधव दयाल सहज स्वर में बोले। ÷÷ जी, पापा।'' सुनन्दा ने रूमाल से आंसू पोछते हुए कहा। ÷÷ क्यों रो रही हो?'' ÷÷ आप अच्छे हो गये, पापा!'' वे हंसे , ÷÷ क्या मैं मर गया था?'' चुप्पी। ÷÷ इसीलिए मुझे जमीन पर रखा था!'' वे फिर हंसे। उनकी आंखें सिर और दाढ़ी के सफेद बालों से घिरी थीं। सफेद ऊबड़खाबड़ भौंहें चश्मे के ऊपर झांक रहीं थीं। उनके मन में कोई सन्देह नहीं बचा। सचमुच कुछ देर पहले उनकी सांस रुकी थी। तभी उन्हें पलंग से उतार कर जमीन को सौंप दिया गया था। कितनी देर पहले ? कितनी देर वे जमीन पर थे? ÷÷ मैं कब मरा था, सुनन्दा?'' सुनन्दा पहले अचकचायी , फिर उसने पिता की क्षैतिज देह के दूसरी ओर खड़ी आकृति की ओर देखा। माधव दयाल ने सुनन्दा की नजर का पीछा किया जैसे वह अपने सवाल का जवाब पाने का कोई रास्ता हो। उनकी नजर उस चेहरे पर ठिठक गयी : एक लम्बी बूढ़ी औरत थी, जिसके गोल चेहरे पर कुछ झुर्रियां थीं; सांवला चेहरा खिचड़ी बालों से घिरा था। वह हौले से मुस्करायी। उनकी उलझन बढ़ गयी। ÷÷ कौन है?'' वे बुदबुदाये। मुस्कान चित्र की तरह खिंची रही। ÷÷ आप कौन हैं? वे फिर बोले। तभी उनकी नजरें मिलीं। वही चमक थी। जैसे कोई दूसरे जन्म में मिल रहा हो। ÷÷ मधु...'' उनके मुंह से अस्फुट स्वर फूटे। ÷÷ हां, पापा।'' सुनन्दा ने सहज होने की भरसक कोशिश की, ÷÷ मम्मी हैं। आज सुबह दिल्ली से आयी थीं। आपकी तबियत देखने आ गयीं।'' मधु के चित्र से स्वर भ+रे, ÷÷ अब तबियत कैसी है?'' ÷÷ मगर मैं मरा कब था?'' यह कहते हुए माधव बैठ गये जैसे लेटा हुआ आदमी बैठ जाता है। जब वे बैठे तो सीधे देख रहे थे। पहले उन्होंने बायें देखा जहां सुनन्दा खड़ी थी , फिर दायीं ओर जहां मधु थी। दोनों चुप थीं। उन्होंने दायीं ओर से नजर बायीं ओर घुमायी, फिर बायीं ओर से दाहिनी ओर। चुप्पी जारी थी। क्या चुप्पी ही सवाल का जवाब थी? तभी सुनन्दा बोली , ÷÷ आप मरे नहीं थे, पापा।'' ÷÷ फिर?'' माधव दयाल की नजर फिर बायीं ओर धूमी। ÷÷ आप कहीं और थे।'' ÷÷ कहां?'' ÷÷ पता नहीं।'' ÷÷ क्या यही पता करने को मुझे नीचे उतारा गया था?'' वे हंसे। कोई और नहीं हंसा। ÷÷ नीचे हमने नहीं उतारा था, पापा।'' माधव ने प्रश्नवाचक नजर से मधु की ओर देखा। ÷÷ पण्डित ने उतारा था।'' सुनन्दा ने झट कहा। ÷÷ पण्डित?... कौन सा पण्डित?'' माधव ने कमरे में चारों ओर देखा। ÷÷ जो आपको गीता सुना रहा था।'' ÷÷ मैंने न गीता सुनी, न पण्डित को देखा।'' ÷÷ तब आपकी आंखें बन्द थीं।'' ÷÷ शायद मैं कहीं और था।'' वे फिर हंसे। ÷÷ हां, पापा, तभी पण्डित जी आये और गीता का पाठ करने लगे।'' ÷÷ वे कहां गये।'' माधव ने फिर चारों ओर नजरें दौड़ायीं। ÷÷ आपकी आंखें खुलते ही चले गये।'' ÷÷ चले गये?'' ÷÷ हां।'' माधव दयाल सहसा खड़े हो गये और मधु के पार देखने लगे। मधु के पीछे खिड़की थी। खिड़की खुली थी। खिड़की में कुछ दूर गुलमोहर की पत्तियां हिल रही थीं। सांवला उजाला पत्तियों को घेरे था। उन्हें लगा जैसे सूर्य अगले क्षण निकलेगा और पत्तियां चमकने लगेंगी। ÷÷ कितना बजा है?'' माधव दयाल ने पूछा। ÷÷ छः।'' सुनन्दा ने कहा। ÷÷ सूरज अभी तक नहीं निकला?'' उन्होंने भंवें सिकोड़ीं। सुनन्दा हंसी , ÷÷ सूरज डूब रहा है।'' माधव ने सवालिया नजरें उसकी ओर घुमायीं। ÷÷ पापा, अभी शाम के छः बजे हैं।'' एकाएक उन्हें याद आया कि वे सुबह गहरी प्रतीक्षा में थे। क्या वह आज ही की सुबह थी ? ÷÷ आज क्या तारीख है?'' ÷÷13 मई।'' वे बाहर के हॉल में टी.वी. की ओर भागे। उन्होंने रिमोट से एन.डी.टी.वी. लगाया। खबरें आ रहीं थीं। यह अप्रत्याशित था। ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी। समाचार वाचक कह रहा था कि भाजपा का सूरज आम चुनाव में डूब गया है। वे सोफे पर पसर गये। उन्होंने आंखें मूंद लीं। उनके होठों से ये शब्द निकले , ÷÷ सुनन्दा, जरा पंखा तेज कर दो।'' उन्हें सहसा बहुत गर्मी लगी थी। उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। दिल की सबसे भीतरी परत में जरूर एक उम्मीद छिपी थी। लेकिन वह ऐसी शाश्वत उम्मीद थी जो तभी टूटती है जब सांस टूटती है। ऐसी हताश उम्मीद सच निकलेगी , यह माधव दयाल ने नहीं सोचा था। यह 1978 के इमर्जेंसी के चुनावफल की तरह ही था जब वे बूढ़े नहीं हुए थे - मगर बेचैनी ऐसी ही थी। यह बेचैनी कुछ उसी मोमबत्ती की तरह थी जिसे हाथ में लिए वे पिछले हफ्ते की एक गर्म शाम शहीद स्मारक से आम्बेडकर पार्क तक जुलूस में चले थे। अंधेरा हो गया था। यह भाजपा के विरुद्ध चुनावचिन्ह का मोमबत्ती जुलूस था। दो लम्बीं कतारों में अंधेरे में चलती जलती मोमबत्तियां किसी चमत्कार सी लगती थीं। अगले दिन अखबारों में छपे चित्रों को देख कर यही लगा था। शहर के लोगों ने बूढ़ा जान कर उन्हें आने के लिए फोन नहीं किया था। लेकिन अखबार में सूचना देख वे खुद ही चले गये थे। वे जानते थे कि इससे उनकी बेचैनी कुछ देर को ही सही, दूर होगी। माधव दयाल को लगा कि वही हाथ की मोमबत्ती अभी दिल के अंधेरे में फिर जल गयी थी। उन्होंने आंखें खोल दीं। ÷÷ कॉफी पियेंगे?'' यह सुनन्दा की आवाज नहीं थी। उसकी मां की आवाज थी, जिसमें समय का बोझ घुल गया था। वह पारे सी भारी थी। माधव ने बायीं ओर देखा जहां मधु बैठी थी। उसका चेहरा निर्विकार था। उसमें जीवाश्म सी यह जानकारी थी कि माधव दिन के तीसरे पहर कॉफी पीते हैं। ÷÷ पापा, कॉफी बनाऊं?'' दूसरी ओर से सुनन्दा की आवाज आयी। ÷÷ हां।'' माधव ने कहा। जब सुनन्दा किचन में चली गयी तो माधव मधु की ओर देखते हुए बोले , ÷÷ तुम्हें पच्चीस बरस बाद देख रहा हूं। पहली नजर में पहचान नहीं सका।'' मधु मुस्कुरायी , ÷÷ तुम्हें देखने आयी थी। ... सोचा नहीं था कि हम फिर इस तरह बैठ कर बात करेंगे।'' वे हंसे , ÷÷ क्या बात करें हम?'' चुप्पी। ÷÷ तुम्हारा नाम है। तुम सफल हो।'' मधु ने कहा। ÷ शायद।'' माधव के होंठ मुस्कान में तिरछे हो गये थे। ÷÷ क्या तुमने जीवन से वह पा लिया जो तुम पाना चाहते थे?'' ÷÷ मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं क्या चाहता हूं।'' वे हंसे। ÷÷ जब हम अलग हुए तुम्हें पता था?'' ÷÷ तब मुझे यह पता था कि मुझे क्या नहीं चाहिए।'' चुप्पी। चुप्पी की बर्फ। जिसमें ठण्डक नहीं थी। सुनन्दा खिलखिलाती हुई हाथ में कॉफी की ट्रे लिए हुए आयी। कुछ घुंघरुओं का बिखरते जाना याद आता था। मां की तरह सांवली थी। लम्बी भी। हंसती हुई सुन्दर लगती थी जैसे झीने बादलों में सूर्य उग रहा हो। मगर घुंघरू नकली थे। माधव दयाल उसके चेहरे की ओर ताक रहे थे। उसने एक एक कप माता पिता के सामने रखा और तीसरा कप अपने हाथ में लेकर बैठ गयी। वह अब हंस नहीं रही थी। वह कॉफी का कप अपने होठों की ओर ले जा रही थी जो कॉफी का इंतजार कर रहे थे। अब वह सहज लगती थी। सुनन्दा अपनी मां की बेटी लगती थी। उन्होंने बायीं आंख से मधु को और दायीं आंख से सुनन्दा को देखा। फिर दोनों को एक साथ देखा। वे अचम्भे में आ गये। सुनन्दा वैसी ही दिख रही थी जैसी मधु तब लगती थी जब वे अलग हुए थे। सामने मधु को देख कर उन्हें यह अहसास हुआ था। सुनन्दा को अकेले देखते हुए कभी ऐसा नहीं लगा। मधु शायद तसव्वुर के दायरे से बाहर चली गयी थी। कुछ पल दोनों को ताकते हुए उन्हें याद आया कि सुनन्दा जब पैदा हुई तो उसकी नाक देख कर वे चौंके थे। उसकी नाक मां की तरह तोता नाक नहीं थी , जिस पर वे फिदा थे। सुनन्दा की नाक कुछ चपटी थी। तब उन्होंने मधु से कहा था कि अच्छा है, यह तुम्हारी तरह मिर्च मिजाज नहीं होगी। माधव दयाल ने अपने को झकझोरा। उन्हें लगा जैसे चलते चलते अचानक उनका पैर धूल में चला गया हो। उन्होंने अपना पैर वापिस खींचा। ÷÷ लगता ही नहीं।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷ कि कुछ देर पहले आप बीमार थे।'' ÷÷ मुझे भी नहीं लगता।'' कह कर माधव दयाल ठठा कर हंसे। उन्हें कुछ याद नहीं था। उन्हें सिर्फ दोपहर में खाना खाकर लेटना याद था। फिर अभी कुछ देर पहले अपने शरीर को जमीन पर पड़ा हुआ पाना। जमीन पर पड़ा हुआ पाना और अपने ही जिस्म को उठा कर बिठाना और खड़ा करना जैसे किसी दूसरे का जिस्म हो। मधु और सुनन्दा से नजर बचा कर उन्होंने एक बार ऊपर से नीचे तक अपने कुर्ते पाजामे में छिपे जिस्म को देखा और मुस्कराये। उन्हें अचानक अपनी देह का अतिक्रमण करने की पुरानी इच्छा और न कर पाने की हताशा याद आयी। वे सोफे पर सधे सन्तुलित बैठे थे। सुनन्दा ने बताया कि तीसरे पहर जब वह हाथ मे कॉफी का कप लिए उनके कमरे में घुसी और उन्हें पुकारा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था। तीसरी बार पुकार कर उसने उनका हाथ और सीना छुआ जहां कोई हरकत नहीं थी। फिर वह चीखी थी। चीख सुन कर पड़ोस से पण्डित जी आ गये थे। उन्होंने देह को धरती पर उतार दिया और गीता का पाठ शुरू कर दियाः वासांसि जीर्णानि..... जैसे कोई पुराने वस्त्र उतार कर नये वस्त्र पहनता है , उसी तरह आत्मा शरीर बदलती है। आत्मा अमर है। इसे न आग जलाती है, न पानी भिगोता है, और न हवा सुखाती है। माधव दयाल हंसने लगे। ÷÷ क्यों हंसे, पापा?'' ÷÷ अपनी अमर आत्मा के लिए।'' वे अब भी हंस रहे थे। ÷÷ क्या आपको अमर आत्मा पर विश्वास नहीं?'' ÷÷ अमर आत्मा पर नहीं।'' वे मुस्कराते हुए बोले, ÷÷ आत्मा पर विश्वास है जो शरीर के साथ जल जाती है।'' ÷÷ मैं समझी नहीं।'' सुनन्दा ने कहा। मधु निर्विकार थी। उसका चेहरा सपाट था। जैसे वह किसी अजायबघर में बैठी हो। ÷÷ तुमने जरूर अखबार में ऐसी खबर पढ़ी होगी।'' माधव ने कहा, ÷÷ किसी बच्चे को कोई लोमड़ी उठा ले गयी और फिर बच्चा जंगल में जानवर की तरह बड़ा हुआ। उसकी आत्मा कहां गयी? असल में बच्चे को अपनी आत्मा अपने समाज से मिलती है।'' ÷÷ लेकिन उसके जीन्स?'' सुनन्दा ने आंखें ऊपर उठायीं। वह मुस्करायी। मधु भी। ÷÷ जीन्स को भी समाज ही जगाता है जिसे हम बचपन के संस्कार कहते हैं। जीन्स को जरूर अमर आत्मा की श्रृंखला कह सकते हैं।'' मधु और सुनन्दा की आंखें बिल्कुल एक सी थीं। कुछ नुकीली और ज्यादा गहरी। माधव दयाल फिर हंसे। उन्होंने कहा , ÷÷ देखो, मेरा अभी पुनर्जन्म हुआ है और मैं दर्शन बघार रहा हूं।'' ÷÷ चलो।'' मधु बोली, ÷÷ कम से कम तुम पुनर्जन्म में तो विश्वास करते हो।'' ÷÷ हां।'' माधव ने कहा, ÷÷ इसी जन्म में पुनर्जन्म। जैसे आदमी मौत के पहले कभी कभी मरता है, उसी तरह मौत के पहले कभी कभी दुबारा पैदा भी हो जा जाता है।'' सब चुप हो गये। कोई हवा का झोंका खिड़की से अन्दर घुसा। खिड़की में अंधेरा घिरने लगा था। सुनन्दा ने उठ कर ट्यूब जला दिया। ÷÷ बधाई।'' दरवाजे से आवाज आयी। माधव दयाल ने पलट कर देखा और एकदम खड़े हो गये। वे मुस्कराते हुए आगन्तुक की ओर बढ़े , जो उन्हीं की उम्र के आसपास था लेकिन काले बालों और सफाचट दाढ़ी की वजह से छोटा लगता था। उन्होंने सवालिया नजर से मदन मोहन की ओर देखा। ÷÷ देश की नयी आजादी के लिए बधाई।'' मदन मोहन ने कहा। ÷÷ हां।'' माधव मुस्कराये, ÷÷ बधाई।'' मोहन ने मुस्कराते हुए सुनन्दा से कहा , ÷÷ कैसी हो?'' फिर उन्होंने मधु की ओर देखा। ÷÷ सुनन्दा की मां है।'' माधव ने परिचय कराया। मधु ने नमस्ते किया। फिर अन्दर चली गयी। उसके पीछे पीछे सुनन्दा गयी। ÷÷ आज शताब्दी से दिल्ली से लौटा हूं, ÷÷ मोहन बोले, ÷÷ कल अकादमी की मीटिंग थी शाम हुई तो सोचा कि तुम्हें बधाई दे दूं।'' एकबारगी माधव की समझ में न आया कि मोहन बधाई दे रहे हैं या उन्हें यह बता रहे हैं कि वे कल साहित्य अकादेमी की मीटिंग में गये जिसके वे उपाध्यक्ष हैं। यह भी जानते थे कि मोहन को खुद इसका इल्म नहीं है। इल्म न होने के अपने फायदे थे। सबसे बड़ा फायदा यही था कि आदमी अपने में प्रसन्न रहता था। चुनाव के पहले मोमबत्ती जलूस में दोनों एक साथ शामिल हुए थे। एक कतार में पहले मदन मोहन थे , दूसरी कतार में आगे माधव दयाल थे। दोनों शहर के वरिष्ठतम लेखक थे। नारे युवा संस्कृतिकर्मी लगा रहे थे। कुछ के हाथों में नारे लिखीं पट्टियां थीं। दो लड़के सबसे आगे एक लम्बी पट्टी लिए चल रहे थे जिस पर लिखा थाः कुछ और औरतें चाहिए जो मरें साड़ी बांट की भगदड़ में अटल जी फिर एक बार कहें देश में जरूर कहीं अंधेरा है संकेत लखनऊ के चन्द्रशेखर पार्क के हालिया साड़ी काण्ड में इक्कीस महिलाओं की मृत्यु की ओर था , जिसकी भोली प्रतिक्रिया में अटल जी ने दो बातें कहीं थीं : एक, ÷ इण्डिया शाइनिंग' में अंधेरा भी है; दो, काश! मैं मर जाता। माधव दयाल हैरत में आ गये थे। अपनी जवानी में पुराने लखनऊ की गलियों में पत्रकार होकर रहे निम्नमध्यवर्गीय प्रधानमंत्री को देश का अंधेरा देखने के लिए अपना तन ढांकने को साड़ी लूटती इक्कीस महिलाओं की मृत्यु दरकार थी। उनकी आंखों के सामने बार बार एक दृश्य कौंधता : चन्द्रशेखर पार्क। शामियाना लगा है। जगरमगर रोशनी है। एक मंत्री का जन्मदिन मनाया जा रहा है। यह मुनादी कर दी गयी है कि साड़ियां बटेंगी। औरतें...बेशुमार औरतें जमा हो गयी हैं। औरतों का हुजूम देख कर आयोजक साड़ियों के गट्ठर उनके बीच फेंक देते हैं। लूट की भगदड़ में इक्कीस औरतें मरतीं हैं, बहुत सी घायल हो जाती हैं। यह बात अलग है कि जिन साडियों पर वे झपटी थीं, वे असल में चालीस रुपये की सूती धोतियां थीं। ÷ साड़ियां' क्यों कहा? ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के लिए। ताकि साड़ियां लूटती हुई इक्कीस औरतें जब मरें तो उन्हें यह मालूम ही न हो कि जिन साड़ियों के लिए वे जान दे रहीं हैं, वे चालीस रुपये की धोतियां हैं! दोनों ने फिर देश के बच जाने की बात की। माधव दयाल ने कहा कि इमर्जेन्सी के बाद 1978 के चुनाव के नतीजों की याद आ रही है। तब भी ऐसा ही अनिश्चय था, मोहन बोले। ÷÷ और ऐसा ही डर!'' माधव ने कहा। सुनन्दा कॉफी के दो प्याले रख गयी। वे दोनों कॉफी सुड़कने लगे। खिड़की के बाहर अब पूूरा अंधेरा था। लेकिन यह मई का अंधेरा था। घना नहीं था। यह छितरा हुआ अंधेरा था। ÷÷ वैसे आज का यह वक्त कॉफी के लिए नहीं है।'' मोहन ने पहला घूंट लेकर कहा। ÷÷ व्हिस्की के लिए है।'' माधव हंसे, ÷÷ मेरे पास कुछ स्कॉच पड़ी है।'' माधव दयाल इतनी तेजी से अन्दर गये कि अन्दर बैठी मधु और सुनन्दा दोनों चौंक गयी। ÷÷ क्या हुआ, पापा?'' सुनन्दा ने कहा। ÷÷ कुछ नहीं।'' कहते हुए माधव ने अलमारी खोली और एक बोतल निकाली जिसमें आधी शराबथी। मधु शराब को देख कर मुस्करायी। वह मुस्कान तिरछी थी जिसमें नीचे का होंठ टेढ़ा हो जाता था। उसकी नाक की नोक लाल हो गयी - जैसे कोई जहर उतर रहा हो। माधव ने उस नाक को देखा। उन्हें लगा कि कोई पुरानी चोट एकाएक हरी हो गयी है। बीच का समय क्या कोई गुब्बारा था जो अचानक फुस्स होकर सिकुड़ गया था ? माधव दयाल ने मधु की सिर्फ नाक देखी थी। न आंखें देखीं , न चेहरा। वे बोतल हाथ में लिए हॉल की ओर बढ़े जहां मोहन उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। ÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?'' माधव को लगा जैसे उसी चेहरे की आवाज उनका पीछा कर रही है जिसे उन्होंने नहीं देखा था। उन्होंने सिर पीछे घुमाया। सुनन्दा उनका पीछा कर रही थी। जब माधव ने बीच की मेज पर बोतल रखी सुनन्दा तीसरी ओर सोफे पर बैठ गयी। उसने मदन मोहन को माधव का दिन भर का स्वास्थ्य बुलेटिन सुनाया और पूछाः ÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?'' ÷ हां।'' जब यह आवाज सुनन्दा के कानों में पड़ी तो उसने हैरत से मदन मोहन के मुंह की ओर देखा , जो बन्द था। तब तक कुछ हंसी भी उसके कानों में पड़ी। न कोई बन्द मुंह से बोल सकता था, न हंस सकता था। दरअसल माधव दयाल खुद हंस रहे थे। सुनन्दा ने झट गर्दन घुमा कर उनकी ओर देखा। ÷÷ क्यों?'' सुनन्दा का स्वर था। ÷÷ मेरा पुनर्जन्म मनाने के लिए।'' मदन मोहन हतप्रभ थे। वे लगातार तिरछी , चोर नजर से माधव की जानिब देख रहे थे जैसे माधव अचानक किसी आश्चर्यलोक से अवतरित हुए हों। यह आश्चर्यलोक मृत्यु का नगर था। ÷÷ विश्वास नहीं होता।'' मोहन के मुंह से शब्द फूटे। ÷÷ क्या?'' माधव ने कहा। ÷÷ यही कि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ। मैंने ऐसी बातें गांवों में सुनी और अखबारों में पढ़ी थीं।'' ÷÷ मुझे खुद विश्वास नहीं होता।'' माधव बोले। ÷÷ क्या?'' ÷÷ कि मैं आज ही मरा और उसी शरीर में पैदा हो गया।'' वे हंसे। ÷÷ यह हंसने की बात है।'' मोहन ने विस्मय से माधव के हंसते चेहरे को देखा। ÷÷ पापा देर से इसी तरह हंस रहे हैं।'' सुनन्दा बोली। ÷÷ यह उम्र।'' माधव ने मुस्कराते हुए कहा, ÷÷ मौत पर रोने की नहीं है।'' ÷÷ क्या मौत हंसने की बात है?'' मोहन माधव की तरफ ताक रहे थे। ÷÷ कम से कम जब अपनी हो।'' माधव फिर हंसे। मोहन का चेहरा स्तब्ध था। ÷÷ तुम इतने संजीदा क्यों हो गये?'' माधव अब मुस्कुरा रहे थे। दरअसल मोहन सोच रहे थे कि यदि माधव आज धरती से न उठते तो इस समय यहां मातम छाया होता। चारों ओर मृत्यु की छाया होती। मोहन मृत्यु के बारे में सोचते नहीं थे। उन्हें लगता था कि अभी जीवन बाकी है। ÷÷ क्या मृत्यु एक गम्भीर विषय नहीं है?'' मोहन मुस्कराये। ÷÷ जरूर।'' माधव ने कहा, ÷÷ प्लैटो इस विषय पर रोज मनन करने की सलाह देता है।'' ÷÷ रोज?'' ÷÷ हां।'' ÷÷ रोज मैं जीवन के बारे में सोचता हूं।'' मोहन बोले, ÷÷ अपनी अगली कहानी के बारे में।'' फिर कुछ रुक कर, ÷÷ क्या तुम अगली कविता के बारे में नहीं सोचते?'' ÷÷ सोचता हूं।'' माधव ने कहा, ÷÷ लेकिन मृत्यु के बारे में हर सुबह सोचता हूं।'' ÷÷ मृत्यु के बारे में सोचने के लिए क्या है?'' मोहन के स्वर में खीझ थी। ÷÷ मैं यही सोचता हूं।'' माधव हंसने लगे। मेज पर शराब की बोतल रखी थी जो आधी खाली आधी भरी थी। सुनन्दा अन्दर चली गयीथी। माधव ने दोनों गिलासों में शराब , शराब में पानी और पानी में बर्फ डालते हुए सोचा कि सचमुच मृत्यु में कुछ नहीं है। शायद इसीलिए उन्हें इस मसले पर आज बार बार हंसी आ रही थी। उन्हें हंसी इस बार इस बात पर भी आयी कि मोहन जिस अगली कहानी या अगले उपन्यास की बात कर रहे थे वह दो तीन साल से आने का ऐलान कर रहा था, मगर आ नहीं रहा था। ÷÷ क्यों हंस रहे हो?'' मोहन ने गिलास हाथ में लेते हुए पूछा। ÷÷ हम जीवन पर तो हंस ही सकते हैं।'' माधव मुस्करा रहे थे। ÷÷ हां।'' मोहन ने एक घूंट पीकर कहा, ÷÷ हम इसे क्या कहें कि जब आज तुम्हारा पुजर्जन्म हुआ तो देश ने भी मुक्ति की सांस ली।'' ÷÷ संयोग।'' माधव ने गिलास ऊपर उठाया, ÷÷ विशुद्ध संयोग!'' ऐसा संयोग माधव दयाल के जीवन में एक बार पहले भी हुआ था , जिसे उन्होंने फिर याद किया। 1978 के अप्रैल में वे दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। जब देश इमर्जेन्सी से मुक्त हुआ, वे मधु से अलग हुए थे। दिल्ली के फ्लैट की घुटन यहां नहीं थीं। इन्दिरानगर की बरसाती के सामने खुली छत थी, जिस पर वे उसी तरह सोते थे जैसे चिड़िया पेड़ पर सोती है। न रोज रोज की कलह थी, न हर दूसरी शाम शराब के बहाने पैसों के लिए टोका जाना था। शाम को वे हजरतगंज की खुली हवा में घूमते या काफी हाउस में बहस करते। क्या इतिहास मेरे जिस्म से गुजरता है ? माधव दयाल इस ख्याल से चौंके। वे चौंके इस बात पर भी थे कि उन्हें सुनन्दा की दो चोटियों की वह बचपन की तस्वीर याद आ गयी थी जिसे वे दिल्ली छोड़ते हुए अपने साथ लाये थे। दिन में दो चार बार जब वे अकेले होते, उसे जेब से निकाल कर देख लेते जैसे तस्वीर कोई आईना हो। ÷÷ एक बात कहूं।'' मोहन अन्दर के कमरे की ओर देखते हुए बोले। ÷÷ कहो!'' ÷÷ आज यह फ्लैट घर जैसा लग रहा है।'' माधव मुस्कराये। ÷÷ मैं।'' मोहन ने फिर कहा, ÷÷ मैं घर के बिना नहीं रह सकता।'' ÷÷ तुम भाग्यशाली हो।'' माधव बोले। खिड़की के बाहर अंधेरा था , जिसमें कुछ पेड़ों की आकृतियां थीं। पेड़ चुप थे। कोई आवाज नहीं थी। आवाज अन्दर भी नहीं थी। गिलासों में फिर शराब डाली गयी थी। शराब में पानी और पानी में बर्फ डाला गया था। फिर गिलास दोनों ओर होठों की जानिब बढ़े थे। एक पल ऐसा लगा जैसे गति सिर्फ गिलासों में है। ÷÷ क्या यह फ्लैट इसी तरह घर नहीं रह सकता?'' मोहन ने एक घूंट लेकर कहा। माधव मुस्कराये। ÷÷ इस उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।'' ÷÷ इस उम्र में क्या।'' माधव हंसे, ÷÷ किसी भी उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।'' मोहन गौर से माधव की ओर देख रहे थे। वे समझ नहीं पाते थे कि कोई इस तरह अकेले कैसे जिन्दगी गुजार सकता है। बरसों पहले उन्होंने शहर में माधव की मोहब्बत के चर्चे सुने थे। मगर विवाह तक बात नहीं पहुंची। यह सुनने में आया था कि उनकी प्रेमिका पाकिस्तान चली गयी। वह शाइरा थी। खूबसूरत थी। उसका रंग सोने की तरह दमकता था। उसका नाम शहनाज था। जब एक बार शहनाज के बारे में मोहन ने माधव से पूछा था , तो माधव चुप रह गये थे जैसे उन्हें यह नागवार गुजरा हो। यह शहनाज के पाकिस्तान जाने के पहले की बात है। बाद में किसी ने बताया था कि शहनाज ने पाकिस्तान में शादी कर ली है और माधव की कविताओं के उर्दू में अनुवाद की पुस्तक छपायी है। ÷÷ मैं अकेला नहीं रह सकता।'' मोहन ने कहा। ÷÷ कोई अकेला नहीं रहना चाहता।'' माधव ने जोड़ा। मोहन माधव से कहना चाहते थे कि अब मधु रिटायर हो गयी है , अकेली दिल्ली में रहती है जैसे तुम अकेले लखनऊ में रहते हो। मधु तुम्हारी बेटी की मां है। अब एक बार साथ रहने की कोशिश करने में क्या हर्ज है? लेकिन वे जानते थे कि माधव को अच्छा नहीं लगेगा। वे शहनाज के बारे में सवाल का माधव का शून्य उत्तर भूले नहीं थे। उन्हें यह सोच कर ताज्जुब होता था कि वे माधव को अपने पारिवारिक रिश्तों के बारे में सब कुछ बताते थे और माधव उन्हें कुछ नहीं बताते थे। इस तरह कोई अपने में ही रहे तो रुंध नहीं जाएगा? वे अपने से पूछते। लेकिन माधव ऐसे नहीं लगते थे। उनकी मुस्कान चौड़ी थी। वे खुल कर ठहाका लगाते थे। दोनों गिलास खाली हो गये थे। वे रोशनी में चमक रहे थे। माधव ने दोनों गिलासों में फिर शराब उड़ेली। शराब को पानी और बर्फ से ढक दिया। मोहन ने गिलास उठाते हुए कहा , ÷÷ अरे मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गया।'' ÷÷ क्या?'' ÷÷ कल शाम पांच बजे हिन्दी संस्थान में कंचन कुमारी के कहानी संकलन का लोकार्पण है। तुम जरूर आना।'' माधव दयाल ने तेज नजर से मदन मोहन की जानिब देखा। ÷÷ ये कंचन कुमारी कौन हैं?'' ÷÷ कंचन कुमारी नारीवादी आन्दोलन का प्रमुख नाम है। वे सूचना विभाग में काम करती हैं।'' माधव को पुस्तक के लोकार्पण उत्सव से चिढ़ थी। उनका कहना था कि किताब कोई बांध या बिजलीघर नहीं है जिसे खोल कर जनता को सौंपा जाए। किताब का लोकार्पण उसका पढ़ा जाना है। लोकार्पण में किताब को उल्टा पकड़े खड़े लोगों की अखबार में छपी तस्वीरों को देख कर वे मुस्कराने लगते। मोहन यह जानते थे। फिर भी उन्हें इस उत्सव में बुला रहे थे। दरअसल पिछले दो वर्षों में मोहन की ये गतिविधियां बढ़ी थीं जबसे उन्होंने साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीते। यह संयोग हो सकता है कि तभी से उनका अगला उपन्यास आने का ऐलान करता रहा , आया नहीं। या यह किसी खालीपन को भरने की जुगत थी - जिसका अहसास मोहन को खुद नहीं था? जबकि माधव शहर की गोष्ठियों की अध्यक्षता से बचते थे , मोहन की सप्ताह में दो तीन बार अखबारों में अध्यक्षता या लोकार्पण करते तस्वीर छपती थी। अक्सर देवानन्द की तरह काले बालों और सफाचट चेहरे की वजह से अखबारों की तस्वीरों में मदन मोहन की उम्र पता नहीं चलती थी। जब कोई उनसे पूछता कि क्या आप अभी यूनीवर्सिटी में पढ़ाते हैं , तो वे मुस्कराने लगते थे। वे यह बताना भूल जाते कि उन्हें रिटायर हुए डेढ़ दशक से ऊपर हो गया। एक बार होली के अवसर पर जब किसी युवा कवि ने उन्हें देवानन्द कहा, तो उन्होंने हंस कर उसके चेहरे पर गुलाल मला और उसे सीने से लगा लिया था। माधव बगल में खड़े मुस्कुरा रहे थे। जब वह युवा कवि चला गया तो माधव बोले, ÷÷ मोहन, एक बात बताऊं।'' ÷ क्या?'' ÷÷ यह देवानन्द बड़ी खतरनाक शै है।'' ÷÷ क्यों?'' ÷÷ क्योंकि वह कभी बूढ़ा नहीं होता।'' ÷÷ अच्छा है।'', मोहन हंसे, ÷÷ कभी मरेगा भी नहीं।'' ÷÷ यह और भी खतरनाक है।'' ÷÷ क्यों?'' वे उस समय मदन मोहन की कोठी के सामने लॉन पर बैठे थे। धूप मोहन के चेहरे पर गिर रही थी , जिस पर पीला और लाल गुलाल चमक रहा था। माधव दयाल के चेहरे पर धूप नहीं थी। फिर भी उनकी सफेद दाढ़ी चमक रही थी। ÷÷ अरे।'' सफेद दाढ़ी हंसी, ÷÷ जो मरेगा नहीं, वह जिएगा कैसे?'' बोतल मे थोड़ी सी बची थी। जब मदन मोहन ने चलने को कहा तो माधव दयाल ने बोतल उठा कर दोनों खाली गिलासों में आधी आधी डाल दी। मोहन ने पानी डालने को मना कर दिया। एक घूंट में गिलास खाली करके वे खड़े हो गये। खड़े खड़े उन्होंने कहा, ÷÷ चलता हूं। कल हिन्दी संस्थान में मिलेंगे।'' माधव भी खड़े हो गये थे। वे हंसे , ÷÷ अरे, आज तो मैं पैदा ही हुआ हूं। कल की कल देखेंगे।'' दरवाजे के बाहर सड़क के पार यूक्लिप्टस के पेड़ अंधेरे में खड़े थे। बिजली के खम्भे की मरी सी रोशनी सड़क पर थी , जिस पर मदन मोहन की गाड़ी फिसलती सी लगती थी। माधव दयाल उस गाड़ी की टिमटिमाती बत्तियां तब तक देखते रहे जब तक वह नजर से ओझल नहीं हुई।
अपनी दीवार देख कर उन्हें बर्लिन की दीवार याद आयी , चीन की दीवार याद आयी, और हंसी आयी। हंसी इसलिए आयी कि इस याद के साथ कोई टीस नहीं थी। माधव दयाल अपनी स्टडी में सेटी पर लेटे उस दीवार को ताक रहे थे जिसके दूसरी ओर मधु और सुनन्दा बेड रूम में लेटे थे। असल में आज कुछ शराब ज्यादा हो गयी थी। जब वे मदन मोहन को बाहर छोड़ कर अन्दर आये तो उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। अन्दर हॉल में सुनन्दा और मधु आ गयी थीं और उन्होंने लड़खड़ाते पैर देखे थे। खाने के बाद माधव ने सुनन्दा से कहा था कि मैं ठीक हूं, तुम लोग जाओ। इसके जवाब में उसने अपने पति को फोन किया कि मैं और मम्मी आज रात यहीं रुकेंगे, तुम जय को संभाल लेना और कल सुबह उसे स्कूल भेज देना। ÷÷ इसकी क्या जरूरत है?'' जब माधव ने कहा तो सुनन्दा बोली, ÷÷ जरूरत है, पापा!'' फिर वह मुस्करायी और बोली, ÷÷ अगर मैं और मम्मी आज रात यहां रुक जाएं, तो क्या आपको एतराज है?'' ÷÷ नहीं।'' मधु कुछ नहीं बोली थी। इस शक की गुंजाइश थी कि उसने ही सुनन्दा को वह कहने को कहा जो उसने कहा। हो सकता है उसने नहीं कहा हो। यह ऊहापोह अब सिर्फ कौतूहल था। इसमें कोर्ई तकलीफ नहीं थी , माधव ने दीवार देखते हुए सोचा। उन्हें यह जान कर अचरज हुआ कि वे दीवार देख कर किंचित् प्रसन्न थे। उनकी खुशी आहिस्ता आहिस्ता भीतर फैली जैसे दीवार कोई नेमत हो। वे सेटी पर लेटे थे। चारों ओर दीवारें थीं। तीन दीवारों से टिकी अलमारियां थीं, जिनमें किताबें भरी थीं। चौथी दीवार की खिड़की से सटी लिखने की मेज थी, जो खाली थी। मेज पर कुछ कोरे पन्ने फड़फड़ा रहे थे। ऊपर पंखा चल रहा था। हवा कमरे में चारों ओर घूम रही थी। माधव दयाल ने सिर्फ कुर्ता पाजामा पहना। चेहरे पर लम्बी दाढ़ी थी। हवा जिस्म और चेहरे तक छन कर पहुंचती थी। जिस्म के बालों की जड़ों में हमेशा कोई पसीना थकान की तरह रुका लगता था। यह थकान मौसम की थी या समय की ? माधव खुद नहीं जानते थे। वे सिर्फ थकान को जानते थे। हालांकि आज दिन में धरती पर जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो उन्हें पहले क्षण एक शिशु की तरह लगा था। अपनी उम्र का अहसास तब हुआ जब दोनों ओर उन्होंने दो छायाएं देखीं। उम्र के अहसास के साथ उनका हाथ अपनी क्षैतिज दाढ़ी पर गया था, जिस पर दायां हाथ फेरते हुए वे फिर पचहत्तर वर्ष के हो गये थे। उनकी अमृत जयन्ती तीनों वामपन्थी संगठनों ने मिल कर मनायी थी , जिसका आयोजन रायउमानाथ बली पे्रक्षागृह के बैठक कक्ष मेेेेें था जिसमें चौकोर लम्बी मेजें चारों ओर लगीं थीं और दो ओर पीछे दीवार से टिकी कुर्सियां थीं। सब कुर्सियां भरी थीं। युवा और अधेड़ लेखकों ने उनके अवदान को महान् बताया था। वे सामने बीच में बैठे हुए कभी सिर झुका लेते, कभी मुस्कराने लगते। यह मुस्कान ऐसी थी जो दिखाई नहीं देती थी। जिसका एक कारण दाढ़ी भी हो सकती थी। दूसरा कारण शायद मुस्कान पर पड़ा संशय का कोई पर्दा था जो उतना ही ज्यादा फड़फड़ाता जितना ज्यादा अभिनन्दन होता। अन्त में उन्होंने हंस कर कहा था कि शायद अब मेरा वह दौर है जिसे मुक्तिबोध ने ÷ कीर्ति की पेंशन' का दौर कहा है। मुझे यह ज्यादा रास नहीं आता। विवाह के बाद माधव के पहले जन्मदिन पर जब मधु ने एक पार्टी का आयोजन किया तो उसने कहा , ÷÷ यह मेरा असली जन्मदिन नहीं है।'' ÷÷ फिर असली जन्मदिन क्या है?'' मधु ने पूछा तो जवाब आया, ÷÷ मुझे नहीं मालूम।'' तब मधु ठहाका मार कर हंसी थी। हंसी रुकने पर उसने कहा, ÷÷ जब तुम अपना जन्मदिन नहीं जानते, तो दुनिया क्या जानोगे?'' ÷÷ वाह, दुनिया जानने के लिए मुझे अपने जन्मदिन की क्या जरूरत?'' ÷÷ जरूरत है!'' ÷÷ क्यों?'' ÷÷ क्योंकि दुनिया अपने आप से शुरू होती है।'' ÷÷ दुनिया अपने आप से शुरू नहीं होती।'' ÷÷ तो!'' ÷÷ दुनिया अपने आप पर खत्म होती है।'' वह फिर हंसी थी। यह हंसी तेजाब की तरह तीखी थी। यह उस दीवार की नींव में भरी थी , जो आज दोनों के बीच तनी खड़ी थी। विवाह के बाद पहली बार जब वे झांसी गये तो मधु ने माधव की मां से माधव की जन्मपत्री मांगी थी। जन्मपत्री बहुत ढूढ़ी गयी , लेकिन मिली नहीं। माधव की बाई खुद भूल गयी थीं, उन्होंने यही कहा। वे काफी बूढ़ी हो गयी थीं और अपनी उम्र भूल गयी थीं। मधु को यह शक भी हुआ कि बाई माधव की विजातीय लड़की से शादी करने पर खुश नहीं हैं। इसलिए कुछ छिपा रहीं हैं। जब बाई ने पूछा कि अब तुम्हें माधव की जन्मपत्री से क्या काम, तो मधु ने कहा कि मुझे इनका सही जन्मदिन पता करना है। यह सुन कर बाई हंसीं और अपने पोपले मुंह से बोलीं, ÷÷ बसन्त पंचमी!'' यह सुन कर माधव सन्न रह गया था। उसने बसन्त पंचमी को निराला का पैदा होना सुना था जैसे उनका इस त्यौहार पर एकाधिकार हो। कोई और भी इस दिन पैदा हो सकता है इसकी उसने कल्पना नहीं की थी। और अब वह खुद इस दिन पैदा हो गया था और उसे मालूम नहीं था! जैसे तैसे उसने अपने को संभाला। अगली बसन्त पंचमी की रात वह अकेला दिल्ली की सड़क पर घूमने निकला। वह कुर्ता पजामा पहने था। कुछ सर्दी थी। बाहर निकलते हुए मधु ने उसे अपनी भूरी शॉल उढ़ा दी थी। वह सड़क पर चला जा रहा था। इसी अंधेरे से उसके कानों में आवाज आयी , ÷÷ बाबू, ठण्ड है। कुछ दे, दो।'' उसने आवाज की ओर देखा। आवाज एक गठरी से आयी थी , जो सड़क के किनारे रखी थी। वह गठरी की ओर बढ़ा। गठरी से एक फैला हुआ हाथ बाहर आया। हाथ कांप रहा था। उसने आवाज की ओर देखा। आवाज एक गठरी से आयी थी , जो सड़के के किनारे रखी थी। वह गठरी की ओर बढ़ा। गठरी से एक फैला हुआ हाथ बाहर आया। हाथ कांप रहा था। यद्यपि झीना अंधेरा था, मगर हाथ का कांपना माधव दयाल ने देखा। उसे लगा कि हाथ ठण्ड से कांप रहा है। उसके हाथ स्वचालित से अपने कन्धों की ओर बढ़े जहां गर्म शाल पड़ा था। उसके दोनों हाथों ने शॉल कन्धों से उतार कर उस गठरी पर डाल दिया जो सड़क के किनारे रखी कांप रही थी। आगे बढ़ते हुए उसने आगे फैले हाथ को शॉल के भीतर जाते देखा। असल में उसके पेट में शराब और मुर्गे की गर्मी थी और उसे लगा कि उसे भीतर बाहर दोनों गर्मियों का अधिकार नहीं है। इस सोच का उत्स निराला के जीवन की प्रसिद्ध घटना थी जिसमें उन्होंने अपनी गर्म चादर एक भिखारी को दे दी थी। अगली सुबह माधव दयाल को यह सोच कर कोफ्त हुई थी कि वे शराब के नशे में ही ऐसा कर सके। पिछली रात घर पहुंच कर घमासान हुआ था जब मधु ने शॉल के बारे में पूछा और माधव ने कहा कि मैंने उसे एक भिखारी को दे दिया , जो बाहर ठण्ड में कांप रहा था। मधु स्तब्ध रह गयी। वह भूरा शॉल मधु को बहुत प्यारा था। वह उसे कश्मीर एम्पोरियम में पहली नजर में ही भा गया था। उसकी एक हजार रुपये कीमत देख कर उसने उसे भूलने की कोशिश की थी। मगर वह एम्पोरियम के दरवाजे से वापिस अन्दर गयी थी और शॉल लेकर बाहर आयी थी। पहली बार आज माधव के जन्मदिन पर उसने भूरे शॉल को निकाला था और दानवीर कर्ण उसे भिखारी को दे आये थे। एक तो खुद अपना जेबखर्च भी नहीं कमाते थे, ऊपर से यह दरियादिली!! मधु बिखर गयी , ÷÷ एक भिखारी दूसरे भिखारी को क्या नहीं दे सकता?'' उसकी आवाज तेजाब में बुझी थी। उसके होंठ खुले थे जैसे वह हंसी हो। उसका स्पष्ट संकेत माधव के स्वतन्त्र लेखन की कैफियत की ओर था। मधु लेडी इरविन कॉलेज में पढ़ाती थी और स्टॉफ फ्लैट में रहती थी। शादी के बाद उसी ने माधव से कहा था कि तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है , घर तो चलता ही है। मुझे गर्व है कि मैं एक लेखक की पत्नी हूं। वह अंग्रेजी पढ़ाती थी। उसे हिन्दी लेखक की नियति का अन्दाजा नहीं था। कॉलेज के फ्लैट में माधव अपने को घर का मालिक तो नहीं मानता था। लेकिन गुस्से में ही सही , जब उसे भिखारी कहा गया तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अलग रहने की पेशकश की। यह उनके विवाह के बाद दूसरी बसन्त पंचमी का अगला सवेरा था। मधु रोने लगी। उसने रोते रोते कहा कि उसका यह मतलब नहीं था। ÷÷ फिर क्या मतलब था?'' माधव ने पूछा। ÷÷ यही कि तुम्हें सफल होना है।'' जब माधव कुछ नहीं बोला तो मधु ने उसे चूम कर भरोसा दिलाया कि वह उसे बहुत प्यार करती है। चूमते हुए वह उसी पलंग पर बैठ गयी जिस पर माधव किंकर्त्तव्यविमूढ़ बैठा था। उसे पता ही नहीं चला कब वह उसकी गोद में बैठी और कब वे अपने वस्त्रों से अलग हो गये। वह विस्मरण की नदी में डूब गया और हांफते हुए ऊपर किनारे पर आया। उसे बाद में केवल अपना सिगरेट पीना याद रहा। लेकिन अगले जाड़ों में पूस की रात मण्डी हाउस की सड़क पर फिर वही हुआ। माधव घर लौट रहा था। वीरान सड़क पर बिजली के खम्भे के नीचे बैठा कोई कांप रहा था। जब माधव उसके निकट पहुंचा तो उस आदमी ने अपनी निरीह आंखें ऊपर उठायीं। माधव अपने भीतर हाहाकर न झेल सका और उसने अपनी जैकेट उतार कर उसके ऊपर डाल दी। लौटते हुए उसे सर्दी नहीं लगी क्योंकि उसने बहुत पी थी। अगली सुबह उसे अफसोस था। क्या अब निराला की करुणा के लिए शराब की जरूरत थी ? लेखक होने की क्या जरूरत थी ? यह तात्विक प्रश्न भी उठा जब सुनन्दा पैदा हुई। खर्चे बढ़े। आमदनी नहीं बढ़ी। माधव का स्वतन्त्र लेखन उसका जेबखर्च ही बना रहा। यद्यपि वह अब एक बेटी का बाप था। शुरू शुरू में जब बच्ची पलंग या पालने पर सोयी होती, तो कभी वह उसके पैर चूमता, कभी हाथ चूमता और उसे लगता कि वह उसे चूमता ही रहे। उसे तब यह सोच कर शर्म आती कि वह सुनन्दा के पैदा होने के पहले कोई बच्चा नहीं चाहता था। कारण विशुद्ध आर्थिक था। वह नौ से पांच की कोई नौकरी नहीं करना चाहता था। इसीलिए वह हमेशा कण्डोम इस्तेमाल करता था। एक रात मधु ने कहा कि मैंने कॉपर टी लगवा ली है, तुम्हें कण्डोम लगाने की जरूरत नहीं। उसी सप्ताह गर्भ रह गया था। यह बताते हुए मधु हंसी थी और उसने कहा था कि कोई कॉपर टी नहीं है, मैं बच्चा चाहती हूं। और तुम उसे पालने की फिक्र न करो, उसने कहा था, ÷÷ उसे मैं पाल लूंगी।'' ÷÷ जैसे तुम मुझे पाल रही हो।'' माधव ने ठहाका लगाया था। लेकिन यह हंसी की बात नहीं थी। जब बच्ची के आने से पैसे की कमी पहसूस हुई तो उसके लिए माधव मन ही मन अपने को दोषी मानने लगा। सिकंदरा रोड के दोनों ओर घने पेड़ों के सायों में फुटपाथ पर चलते हुए वह सोचता कि इस आजादी की कीमत क्या भीतर की घुटन है ? साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी में घण्टों मेज पर किताब खोले बैठे रहने के बाद जब वह कैण्टीन में जाकर कॉफी पीता और गंगाधर से बातें करता तो उसे लगता कि वह यही कॉफी पीने के लिए पैदा हुआ है। अपना लेखन वह घर पर करता था। सुबह या आधी रात को - जब मधु कॉलेज चली जाती थी या सो जाती थी। जब माधव ने पहली बार यह महसूस किया कि वह लिखने के लिए सुबह मधु के कॉलेज जाने या रात को सो जाने का इंतजार करता है तो उसे कुछ अजीब लगा था। तब सुनन्दा पैदा हो गयी थी। यही भीतर की घुटन थी। एक ओर अकादेमी कैण्टीन की कॉफी थी , दूसरी ओर मधु के सोने या घर से जाने का इंतजार था, तीसरी ओर सुनन्दा की दो तीन दांतों की रोज बढ़ती खिलखिलाहट थी। आहिस्ता आहिस्ता यह बात मन में जड़ जमाने लगी कि वह इस खिलखिलाहट की कीमत नहीं चुका रहा। अब मधु का माधव के लिए लेखकीय सम्मान भी दरकने लगा था। वह कुछ कहती नहीं थी। मगर कहने के लिए हमेशा जुबान की जरूरत नहीं होती। माधव ने देखा था कि जब कोई सहयोगी या सहेली घर आती तो मधु को उसका परिचय कराने में कोई उत्साह नहीं होता था। यदि वह दूसरे कमरे में होता तो वह उसे बुलाती नहीं थी। शुरू शुरू में वह चहकती हुई उसका परिचय कराती थी : ÷÷ ये मेरे कवि पति हैं मिस्टर माधव दयाल।'' हिन्दी युवा कवि माधव दयाल का नाम राजधानी में बजता नहीं था। आगन्तुक उसे नहीं जानता था। एक बार मधु की एक वरिष्ठ सहयोगी मिसेज गुप्ता जो सुनहरा चश्मा लगाती थीं और अर्थशास्त्र पढ़ाती थीं - उन्होंने आंख उठा कर पूछा था, ÷÷ कवि हैं, पर करते क्या है?'' मधु अचकचा गयी थी। माधव हॉल से उठ कर बाहर चला गया था। उसे पहली बार शंका हुई थी कि लेडी इरविन कॉलेज के परिसर में उसका नाम खो गया है। कभी उसकी आंखों के सामने मिसेज गुप्ता की सुनहरी आंखें आ जातीं , कभी मिस कुलकर्णी की चंचल, कजरारी आंखें, उससे पूछती हुई : ÷÷ कवि हैं, पर करते क्या हैं?'' ÷÷ प्यार करते हैं।'' मधु ने मिस कुलकर्णी से हंसते हुए कहा था। मिस कुलकर्णी के मुंह से लगातार सौ कंचों के फर्श पर बिखरने की आवाज आयी थी। माधव हंस नहीं सका था। वह कई दिन , हफ्तों और महीनों मधु के उपर्युक्त संवाद का अर्थ जानने की कोशिश करता रहा। जब उसने मधु को प्यार किया तो मधु उसके लिए उसका शहर हो गयी थी। मधु के पहले दिल्ली डग्गामार बसों, चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों, और राजमा रोटी का वीरान शहर थी - हालांकि हर जगह भीड़ थी। फिर दिल्ली गालिब के इश्क का शहर हो गयी जहां लालकिला सचमुच लाल था और लड़के लड़कियां एक दूसरे को हसरत की नजर से देखते थे और उनके चेहरों पर कभी कभी इन्द्रधनुष के रंग खिंच जाते। माधव को यह अजनबी शहर पहली बार अपना लगा था। मधु एकाएक पूरे शहर पर छा गयी थी। वे शहर भर में घूमते और टी.एस. ईलियट और जेम्स जॉयस और हेमिंग्वे पर बातें करते। वे उस शाम लोदी गार्डन्स में घूम रहे थे। मार्च का महीना था। हवा दिन में थोड़ी गर्म होकर ठण्डी हो गयी थी। वे दहकते फूलों की क्यारियों के बीच चल रहे थे। ÷ फेयरवेल टु आर्म्स' पर बात हो रही थी। धीरे धीरे सूरज डूब गया। शाम गहरायी। वे क्यारियों से हट कर कुछ दूर एक पेड़ के नीचे चले गये जहां धुंधलका पैदा होने लगा था। मधु ने कहा, ÷÷ नायिका का वह भोला संवाद कितना सुन्दर है?'' ÷÷ कौन सा?'' ÷÷ वही।'' मधु मुस्करायी, ÷÷ नाकें कहां जातीं हैं?'' ÷÷ देखते हैं।'' कहते हुए माधव ने उसे होठों पर चूमा। पता ही नहीं चला था कि नाकें कहां गयी। सेटी पर चित लेटे हुए माधव दयाल अंधेरी दीवारों से घिरे मुस्कुराये। खिड़की के बाहर गुलमोहर की पत्तियां आहिस्ता आहिस्ता हिल रहीं थी। हवा चल रही थी। बाहर कुछ चांदनी भी थी। ऐसी ही चांदनी में माधव उसी रात रैगड़पुरा की तीसरी मंजिल के अपने कमरे के बाहर छत पर निकल आया था और उसने ऊपर आकाश की ओर देखा था जैसे वहां सचमुच कोई हो। बचपन के देवी देवता बचपन में बिला गये थे। मगर फिर भी वह खाली आकाश में मद्धिम तारों को देख रहा था। असल में उसी रात उसने अपनी पहली लम्बी कविता शुरू की थी। वह चाहता था कि उसे पूरी कर सके। यदि बचपन के जीवन्त देवी देवता होते , तो वह उन्हीं से प्रार्थना करता। वे नहीं थे। वह खाली आकाश में देख रहा था। दिल्ली में यह उसकी पहली अतल कातरता थी। उसी शाम उसने मधु को पहली बार चूमा था। उसका पहला कविता संग्रह जब आया तो इमर्जेन्सी शुरू हो गई थी। वह कुछ लेखकों और जे.एन.यू. के कुछ मित्रों के साथ बैठकों में भाग लेता , कुछ गुप्त पर्चे तैयार करता और उदास रहता। एक रात उसने कुछ युवा मित्रों के साथ मण्डी हाउस के इलाके में कुछ पोस्टर भी चिपकाये। एक पोस्टर में इन्दिरा गांधी सलाखों के पीछे थीं और नीचे लिखा था : तानाशाह का भविष्य। यह भविष्यवाणी थी - यह तब किसी को मालूम नहीं था। उस रात वह देर से घर पहुंचा। मधु ने दरवाजा खोला। एक बज रहा था। वह सोयी नहीं थी न उसकी आंखों में नींद थी, न मुंह में जमुहाई। ÷÷ तुम सोई नहीं?'' ÷÷ नहीं।'' उसने कहा, ÷÷ तुम कहां थे?'' वह चुप रहा। वह उसके नजदीक आयी। उसने माधव का मुंह सूंघा और हंसी , ÷÷ तुमने आज पी भी नहीं।'' फिर कुछ रुक कर बोली, ÷÷ हां, सिगरेट बहुत पी है। क्या बेचैनी है? कहां थे?'' ÷÷ सड़क पर।'' ÷÷ सड़क पर क्या कर रहे थे?'' ÷÷ पोस्टर चिपका रहा था।'' वह चुप रही। वह पेण्ट कमीज उतार कर पाजामा कुर्ता पहनने लगा। जब उसका एक पैर पाजामे में था , मधु ने कहा, ÷÷ आज कॉलेज के स्टाफ रूम में रेलों और सरकारी दफ्तरों के ठीक टाइम पर चलने की बात हो रही थी।'' ÷÷ ठीक टाइम सब कुछ नहीं है।'' ÷÷ बसों और सड़कों पर भी हुड़दंग नहीं।'' ÷÷ सड़कें सुधरने से देश नहीं सुधरता।'' ÷÷ फिर कैसे सुघरता है?'' ÷÷ जब सबकी मर्जी से चले। एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं।'' ÷÷ लेकिन यदि उसकी मर्जी सही हो?'' ÷÷ वह तभी सही होगी जब सब तस्दीक करेंगे।'' मधु चुप रही। माधव ने पाजामें में गांठ लगा ली थी। वह पलंग की ओर बढ़ रहा था। पलंग पर बैठते हुए उसने खड़ी हुई मधु से कहा , ÷÷ चाहे देश हो या घर, सबकी मर्जी जरूरी है।'' उस रात कोई और बात नहीं हुई। वे दोनों उल्टी तरफ मुंह करके सो गये। माधव की उदासी और गहरी हो गयी थी। पुलिस की तहकीकात और रेड बढ़ने लगे। ज्यादातर लोग चुप हो गये। कुछ दिल्ली से बाहर चले गये। कुछ जेल में सीखचों के पीछे गये। इन्हीं में उसका दोस्त चन्द्रकान्त था। चन्द्रकान्त एक पाक्षिक पत्र का सम्पादक था। इमर्जेन्सी के पहले उसने जे.पी. की जनसभा की एक रपट छापी थी , जिसका अन्त इस टिप्पणी से हुआ था कि जनसभा के एकाग्र चेहरे जे.पी. की बातें इस तरह सुन रहे थे जैसे वे उन्हीं के मन की बातें हों। इसे राजद्रोह माना गया और चन्द्रकान्त को धर लिया गया। चन्द्रकान्त की पेशी तीसहजारी कोर्ट में होती थी। माधव हर पेशी पर जाता था। चन्द्रकान्त की पत्नी सुलोचना भी अपनी तीन साल की बेटी के साथ आती थी। एक बार बेटी हथकड़ी पहने कोर्ट में आते चन्द्रकान्त की ओर दौड़ी, ÷ पापा पापा' चीखती हुई। मुश्किल से उसे रोका गया। वह रोने लगी। चन्द्रकान्त ने मुस्कुराते हुए अपना दायां हाथ हवा में ऊपर हिलाया। दायें के साथ बायां हाथ भी हथकड़ी से बंधा ऊपर उठ गया। तब चन्द्रकान्त हंसा और उसने अपनी हथकड़ी दोनों हाथों से बजायी। इस आवाज से या चन्द्रकान्त की हंसी देख कर बेटी भी हंसने लगी हालांकि उसके गालों पर आंसू लुढ़क रहे थे। उस दिन माधव सुलोचना को छोड़ने उसके घर ओल्ड राजेन्द्र नगर गया। रास्ते में उसने बेटी के लिए टॉफी का डिब्बा खरीदा था। चन्द्रकान्त एक बरसाती में रहता था , जिसमें छत पर रेल के डिब्बों से जुड़े दो कमरे थे। वह पहले भी चन्द्रकान्त के साथ इस घर में आ चुका था। इस बार घर वीरान था जैसे घर देख कर दश्त याद आया हो। जब चाय के लिए दूध निकालने को सुचोलना ने फ्रिज खोला तो उसमें केवल दूध का कटोरा था, जो खाली था। ÷÷ ओह, मैं भूल गयी'' उसने कहा, ÷÷ मैंने बेटी को सारा दूध दे दिया था।'' ÷÷ सुलोचना जी, आपको पता नहीं।'' माधव तुरन्त हंसा, ÷÷ इधर अरसे से मैं चाय दूध के बिना ही पीता हूं। चन्द्रकान्त जानता है।'' जब चाय के कप किचन में रखने सुलोचना कमरे से बाहर गयी तो उसने अपनी जेब से सारे रुपये पैसे निकाल कर अलमारी में रखी घड़ी के नीचे रख दिये - ढाई सौ रुपये और कुछ रेजगारी थी। सीढ़ियों से उतरते हुए उसके आंसू आंखों से उतरने लगे। वह पैदल सिकंदरा रोड की ओर बढ़ा क्योंकि उसकी जेब में बस के टिकट के लिए पैसे नहीं थे। उसी शाम मधु ने उससे घूमने चलने को कहा। उसने अपने पैर सामने फैला कर टेबिल पर रखते हुए कहा , ÷÷ मैं बहुत थक गया हूं।'' ÷÷ क्यों?'' ÷÷ मैं ओल्ड राजेन्द्र नगर से यहां तक पैदल आया।'' वह मुस्कुराया। ÷÷ क्यों?'' मधु की आंखें चौड़ी हो गयीं। ÷÷ क्योंकि जेब में पैसे नहीं थे।'' वह हंसा। ÷÷ कहां गये पैसे?'' मधु की भंवें सिकुड़ गयीं, ÷÷ पिछले हफ्ते ही मैंने तुम्हें पांच सौ रुपये दिये थे।'' फिर उसने जल्दी से जोड़ा, ÷÷ उधार!'' वह शायद मुस्कुरायी भी। ÷÷ ढाई सौ रुपये बचे थे।'' माधव ने कहा। ÷÷ तो!'' ÷÷ आज चन्द्रकान्त की पेशी थी। मैं सुलोचना को छोड़ने उसके घर गया। फ्रिज में बच्ची के लिए दूध नहीं था। मैंने जेब में जो कुछ था, वहीं छोड़ दिया।'' ÷÷ कम से कम बस के लिए तो पैसे रख लेते।'' मधु ने खीझ कर कहा। ÷÷ मुझे होश नहीं था।'' माधव ने पैर जमीन पर रख दिये। मधु की आंखों में आंसू छलछला आये। उन्हीं आंखों से वह बोली , ÷÷ जिस तरह दूसरों के लिए बेहोश हो जाते हो, कभी अपनी पत्नी और बेटी के लिए सोचते हो?'' वह रोने लगी। माधव लाचार सी रोती मधु को देखने लगा। उसकी समझ में नहीं आया कि वह रो क्यों रही है। ÷÷ रो क्यों रही हो?'' ÷÷ अपनी किस्मत को रो रही हूं।'' वह रोती हुई बोली। फिर वह एकाएक चुप हो गयी। वह सामने कुर्सी से उठी और अन्दर चली गयी। अन्दर अलमारी खोलने की आवाज हुई , फिर बन्द करने की। क्षण भर बाद वह वापिस हॉल में आ गयी। उसके हाथ में कुछ सौ के नोट थे। उसने नोट माधव के सामने मेज पर पटकते हुए कहा, ÷÷ तुम्हारी जेब खाली हो गयी है। कुछ और उधार रख लो।'' बल ÷ उधार' पर था। क्या मधु रुपयों की वजह से ही रो रही थी ? अगली शाम एक दोस्त से उधार लेकर उसने मधु का उधार चुकता कर दिया। मगर जी और उदास हो गया। क्या मधु अब ऐसी दोस्त नहीं रही थी जो उसे उधार दे सके ? उसी ने कहा था कि तुम्हें नौ से पांच की नौकरी करने की जरूरत नहीं है - मैं घर सम्भान लूंगी। या शायद वह मेरी कथित दरियादिली के दौरों से आजिज आ जाती है। लेकिन यह मेरी दरियादिली नहीं है। यह मेरा दिल है। दिल पर लगातार कोई बोझ रहने लगा। जब वह घर से बाहर शहर के चौराहों पर पुलिस को देखता, तो वह दबाव और बढ़ जाता। कहीं कहीं पुलिस के सिपाही घोड़ों पर चढ़े नजर आते। घोड़ों के तगडे+ पुट्ठे धूप में चमकते। दिल में हौल पैदा हो जाता। वह समझ नहीं पाता कि वह बाहर का डर घर के अन्दर ले आता है या घर की घुटन बाहर ले जाता है। जब जेल की एक मुलाकात में चन्द्रकान्त ने हंसते हुए पूछा , ÷÷ इतने उदास क्यों लग रहे हो?'' तो उसने कहा, ÷÷ कोई खास बात नहीं।'' ÷÷ फिर भी?'' ÷÷ गू के पहाड़ के बारे में सोच रहा था।'' माधव मुस्कुराया। कुछ देर पहले चन्द्रकान्त ने भरी जेल के अन्दर सफाई की गड़बड़ियों का जिक्र किया था। माधव पल भर चुप रहा। फिर उसके मुंह से शब्द फूटे , ÷÷ मुझे लगता है जैसे मेरे अन्दर जेल उग आयी है... जिसमें सींखचे हैं .. और सींखचों के पीछे गू है।'' एक क्षण चुप्पी रही। जेल के उस कमरे में मक्खियों की भिनभिनाहट के अलावा कुछ नहीं था। ÷÷ यह कविता का समय नहीं है।'' चन्द्रकान्त ने कहा। यह सच था। यह कविता का समय नहीं था। घर बाहर लगता जैसे जी सांसत में है। अखबार घर में फीकी मुस्कानों की तरह बताते कि सब कुछ ठीक है। मगर कुछ भी ठीक नहीं था। शहरों में बुलडोजर झुग्गी झोपड़ियां मिटा कर सफाई अभियान चला रहे थे। किसान अपने श्श्नि थामे खेतों में भाग रहे थे। अखबारों में साफ सुथरी सड़कों की तस्वीरें थीं या हंसते किसान भांगड़ा नाच रहे थे। टी.वी. पर यही देखते हुए कभी कभी माधव सो जाता और उसे खेत की ओर भागते किसानों और बुलडोजर से कुचली जाती झोपड़ियों के सपने आते जिनमें कोई चीख गूंजती रहती । वह घबरा कर जाग जाता। वह जिस तरह हड़बड़ा कर बिस्तर पर बैठता , उससे मधु की नींद खुल जाती। वह लेटे लेटे पूछती, ÷÷ क्या हुआ? कोई सपना देखा?'' माधव आंखें फाडे+ अंधेरे में देख रहा होता। जब मधु दुबारा पूछती, तो वह कहता, ÷÷ कुछ नहीं।'' ÷÷ सो जाओ।'' वह जमहाई लेकर कहती, ÷÷ कल मुझे जल्दी उठना है।'' वह अगले क्षण सो जाती। अगली शाम मधु ने उससे मेहरौली में एक प्लॉट खरीदने की बात की। माधव ने उसकी ओर ताज्जुब से देखते हुए पूछा , ÷÷ रुपये कहां हैं?'' ÷÷ मैं पी.एफ. से लोन ले लूंगी।'' उसने कहा। ÷÷ ऐसी जल्दी क्या है?'' ÷÷ जब तक इमर्जेन्सी है।'' मधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ÷÷ दाम ठीक है। वरना रेट फिर आसमान छुएंगे।'' यह इमर्जेन्सी का अनोखा इस्तेमाल था! ÷÷ मेहरौली शहर से दूर नहीं है?'' माधव ने जैसे उसका मन टटोलने के लिए पूछा। ÷÷ कुछ बरसों में जब तुम भी सफल हो जाओगे और हम अपनी कोठी बनवायेंगे, तो हमारे पास गाड़ी भी होगी। तब कुछ दूर नहीं होगा।'' मधु हॉल की छत देखते हुए मुस्कुरा रही थी। माधव मधु का मुस्कुराता चेहरा देख रहा था। उस तिलिस्मी मुस्कान से उसके दिल में हौल पैदा हो गया। उसे लगा जैसे गुलजार बाजार में घोडे+ दौड़ रहे हैं और लोग चारों ओर भाग रहे हैं। आपातकाल के दूसरे जाड़े उतर रहे थे। दिन हल्के हो गये थे। बाहर सड़कों पर पेड़ और धूप और हवा भी हल्के लगते। ऐसा लगता कि धरती हल्की हो गयी है और उसे दोनों हाथों से उठाया जा सकता है। चुनावों का एलान हो चुका था। एक दोपहर जब माधव घर में घुसा तो मधु घर में नहीं थी और सुनन्दा अपने कमरे में थी। वह अब सात साल की थी। तीसरी में पढ़ती थी। उसे अचानक लगा कि जो उसने सुना वह सुनन्दा की सुबकी थी। वह दबे पांव उसके कमरे की ओर बढ़ा। जब उसने दरवाजा खोला तो सुनन्दा ने नजरें उठा कर देखा। उसे देख कर वह आंसू पोंछने लगी। वह स्कूल की नीली डे्रस पहने थी। अलबत्ता उसने स्वेटर उतार दिया था। उसकी दोनों आंखों के पास दोनों चोटियां झूल रही थीं। माधव की नजर अभी उसकी दोनों आंखों पर थी , जो लाल थीं। ÷÷ क्या हुआ?'' कोई आवाज नहीं। ÷÷ क्या हुआ, बेटा?'' ÷÷ कुछ नहीं।'' माधव उसके पास आ गया था। वह पलंग पर बैठी थी। उसने दायें हाथ से उसकी ठोढ़ी ऊपर उठायी , ÷÷ क्या हुआ?'' ÷÷ पापा।'' ÷ हां।'' ÷÷ अदिति के पापा मर गये।'' माधव जानता था कि अदिति सुनन्दा की जिगरी दोस्त है। उसे समझ में नहीं आया , क्या कहे। सुनन्दा ने अचानक कहा , ÷÷ पापा, क्या तुम भी एक दिन मर जाओगे?'' माधव मुस्कुराया। ÷÷ तुम नहीं मरना, पापा।'' उसकी दोनों आंखों में फिर एक एक आंसू आ गया। वह उसी की ओर देख रही थी। माधव ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह बड़ी हो रही थी। माधव को लगा , वह अब इतनी बड़ी हो गयी है कि किसी का जाना जान ले। ÷÷ सुनन्दा।'' माधव ने कहा, ÷÷ अब तुम बड़ी हो गयी हो।'' ÷÷ हां।'' सुनन्दा के मुंह से निकला। ÷÷ तुम्हें अब जान लेना चाहिए कि कोई भी कभी भी जा सकता है।'' यह कह कर हंसते हुए उसने सुनन्दा को अपनी बाहों में भींच लिया। माधव की आंखें भर आयी। सुनन्दा को बाहों में भरे उसकी पीठ के पीछे उसने तुरन्त अपनी आंखें पोंछ लीं। उसी रात माधव जब व्हिस्की का दूसरा पेग बना रहा था तो मधु ने उसे बताया कि कल उसे मिस कुलकर्णी के पिता से दस बजे उनके ऑफिस में मिलना है। जब उसने गिलास से अपनी नजर उठा कर मधु की आंखों में देखा तो वहां खालीपन था। मधु ने बताया कि मिस कुलकर्णी के पिता एक बड़ी कम्पनी में जनरल मैनेजर हैं , उनके यहां पी.आर.ओ. की जगह खाली है, वेतन पांच हजार है। पांच हजार! उसने फिर दोहराया। ÷÷ तुम यह नौकरी करोगे।'' उसकी आंखों में रोशनी लौट आयी, ÷÷ तो हम अपने मेहरौली के प्लॉट पर मकान की नींव रख देंगे।'' माधव चुपचाप गिलास से शराब के घूंट लेता रहा। वह कुछ नहीं बोला। तब मधु बोली - ÷÷ नौकरी करते हुए भी लोग लिखते हैं।'' माधव ने एक और घूंट लिया। ÷÷ अगर कोई एक क्षेत्र में असफल हो।'' मधु ने फिर कहा, ÷÷ तो दूसरा क्षेत्र चुनने में क्या दिक्कत है?'' उसका इशारा माधव के स्वतन्त्र लेखन की ओर था। ÷÷ सफलता मेरे जीवन का लक्ष्य नहीं है!'' माधव एकाएक चीखा। तब मधु की नजर दूसरी तरफ थी। वह पलटी। उसके होंठ फैले और सफेद दांतों की पंक्ति चमकी। जब वह हंसती थी तो उसका ऊपरी मसूढ़ा नंगा हो जाता था। नंगे मसूढ़े में खुभे पैने दांत थे। यह उनके बीच अन्तिम संवाद था। तलाक की कार्रवाई के दौरान उनके वकीलों ने ही बात कीथी।
बेड रूम में घुसते ही मधु की नजर पलंग के सामने रखी काठ की अलमारी पर मुस्कुराती सुनन्दा की तस्वीर पर पड़ी जो करीब तीस साल पुरानी थी जब सुनन्दा नीली ड्रेस पहन कर दो चोटियां लटकाये स्कूल जाती थी। दूसरी ओर सुनन्दा और दीपक की तस्वीर थी , जब उनका विवाह हुआ था। कमरे में कोई और तस्वीर नहीं थी। मधु ने चारों ओर नजरें घुमा कर देखा। सुनन्दा डबल बेड पर लेटते ही करवट लेकर सो गयी थी। उसका चेहरा दूसरी ओर था। गर्मी बहुत थी। सुनन्दा ने पंखा तेज कर दिया था। तभी अचानक कोई पुरानी गन्ध मधु के नथुनों में सुरसुरायी। वह चौंकी। उसने गहरी सांस ली। वह माधव के शरीर की गन्ध थी जो बिस्तर के चादर और तकिये में बसी थी, जिस पर मधु का शरीर फैला था। वह सिहर गयी। मधु अग्रवाल अभी भी समझ नहीं पाती कि माधव दयाल अचानक क्यों दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। मधु ने अपनी मां की इच्छा के विरुद्ध विजातीय विवाह अदालत में किया था। उसे पता नहीं था कि यह एक दिन अदालत में ही खत्म हो जाएगा और सुनन्दा उस विवाह की स्मृति की तरह बचेगी। मगर यह गन्ध भी थी जिसने उसे घेर लिया था। गन्ध कुछ गाढ़ी हो गयी थी। उम्र की तरह। कितना अजीब था। माधव की जो बातें मधु के आकर्षण के बिन्दु बनी थीं , वही बातें बिदकने का कारण बनीं। उसका जो कलाकार सुलभ आवारापन मन को मोहता था, वही कुछ बरस बाद असमंजस पैदा करने लगा जब वह उसे अपनी सहेलियों या सहयोगियों से मिलाती। उसके बिखरे बाल और रंगीन मुचड़ा कुर्ता जब लोगों की भौंहें ऊपर उठाते तो मधु को भी अखरता। आहिस्ता आहिस्ता वह इरविन कॉलेज कैम्पस में एक अजूबा सा हो गया जिसके आने जाने का कोई समय नहीं था। वह क्या करता था, यह किसी को मालूम नहीं था। वह खुद भी ऐसे सवालों से बचता था। उसके हावभाव देख कर कभी कभी मधु को भी लगता कि शायद उसे खुद नहीं मालूम कि वह क्या करता है। उसने ऐसे कुछ लेखकों के बारे में किताबों में पढ़ा था। जो पढ़ा था, वह दिमाग में कैद था। माधव को देख कर वह याद आता था। इतने बरसों बाद आज माधव से बात करते हुए उसे वह शाम फिर याद आयी थी जब वे शुरू शुरू में एन.एस.डी. के खुले प्रांगण में ÷ लैला मजनूं' देखते हुए बैठे थे। रोशनी सिर्फ मंच पर थी। दर्शक दीर्घा में तिलिस्मी धुंधलका उतर आया था। नाटक का वह दृश्य था जिसमें मजनूं लैला को नहीं, लैला के तोते को देखता है। मजनूं पिंजरे को देखता है, पिंजरे के अन्दर तोते को देखता है और देखता रह जाता है... ऐसा लगता है जैसे मजनूं तोते को नहीं, लैला को देख रहा है... मजनूं के चेहरे पर वही विह्नल भावना का स्थिर चित्र है... शायद मजनूं अभी आंखें घुमा कर उन्हीं पेड़ों को देखेगा जिन्हें लैला देखती है... फिर लैला की दुनिया को। क्या दुनिया इतनी सुन्दर थी? तभी माधव ने अंधेरे में मधु का हाथ थामा था। माधव के हाथ में पसीना था। हालांकि फरवरी का अन्त था और गुलाबी सर्दी थी। माधव के हाथ में मधु का हाथ भी पसीज गया था। उन्होंने बाकी नाटक पसीजे हाथों से देखा था। तब उसे स्त्री होने की पूर्ण अनुभूति हुई थी जैसे लैला को मजनूं का जनून देख कर हुई थी। जब बत्तियां जलीं तो माधव की आंखें भी मजनू की आंखों की तरह थीं। इन्हीं आंखों से देखते हुए उसने कुछ दिन बाद लोदी गार्डन्स में एक पेड़ के पीछे उसे पहली बार चूमा था। माधव गोरा चिट्टा , ऊंचा पूरा था। जब वह शाम को बादामी या आसमानी कुर्ता पहन कर अपने कुछ उलझे से, घने काले बालों के नीचे चमकती आंखों से उसे देखता था तो वह बरबस मुस्कुराने लगती थी। तब वह दाढ़ी तो क्या, मूंछ भी नहीं रखता था। ऐसा लगता था जैसे उसका भीतर का उजाला चेहरे पर बार बार तैर आता हो। उन दिनों कभी कभी मधु को उसका चेहरा एक बालक की तरह भी लगता और तब उसकी इच्छा होती कि वह उसे अपने वक्ष से सटा ले। यह सही है कि तब वह अपने मन के इन्द्रधनुषी रंगों को ठीक से देख नहीं पाती थी। कैसा संयोग था कि आज सुबह ही वह लखनऊ आयी थी और सुनन्दा का फोन आया था कि पापा की सांस रुक गयी है। वह माधव दयाल की देह को आखिरी बार देखने आयी थी। वह सोचती थी कि अब माधव उसके भीतर मर गया है। लेकिन क्या माधव सचमुच उसके भीतर मर गया था? फिर वह अभी इस गन्ध से कैसे घिरी थी? वह कभी इसी गन्ध को दिल्ली भर में ढूंढती थी , और जब माधव त्रिवेणी की सीढ़ियों पर या श्रीराम सेण्टर में कॉफी के कप के पीछे मेज पर या किसी चित्रकला प्रदर्शनी में दिख जाता तो वह उसकी ओर ऐसे बढ़ती जैसे उससे बात करने नहीं, बल्कि उसे सूंघने जा रही हो। अब तो यह भी याद नहीं कि क्या सचमुच ऐसा होता था या वह अभी उसी गन्ध में लिपटी इस तरह तसव्वुर कर रही है? तब माधव की गन्ध में उसकी सिगरेट की गन्ध भी मिली होती थी और कभी कभी शराब की गन्ध भी। वह भरी भरी आंखों से उसकी ओर बढ़ता था। देह का आत्मा से क्या रिश्ता हो सकता है यह उसने माधव की देह से ही जाना था। देह खुद धुल कर आत्मा बन जाती थी और पंख फड़फड़ाते हुए आकाश में उड़ने लगती थी। एक फ्रांसीसी फिल्म देख कर उन्होंने पंखों की फड़फड़ाहट को ÷ मैच' का नाम दे दिया था, जिसमें दो नंगे जिस्म एक बड़ी चादर के नीचे गुत्थमगुत्था होते हैं और एक तान लेकर आहिस्ता आहिस्ता फिर सम पर आ जाते हैं। तभी मधु ने चादर से बाहर आकर उसका सिगरेट पीना देखा था और खुद सिगरेट का एक सूंटा मारा था। वह खांसते खांसते हलकान हो गयी थी। उस खांसने के बाद चार दशक बीत गये मगर वह खांसी गले में अभी भी फंसी लगती थी। मधु ने अपना दायां हाथ सचमुच अपने गले पर फेरा जैसे उसे सहला रही हो। जैसे चार दशक में सिर्फ एक चुटकी बजी हो। फिर उसने हड़बड़ा कर अपना हाथ गले से हटाया और बायीं ओर करवट ले ली। खिड़की खुली थी। अंधेरे में यूक्लिप्टस के पेड़ अपना सिर हिला रहे थे। पीछे बहुत दूर - कहीं आसमान था जो पेड़ों पर झुका लगता था। एकाएक मधु को प्यास लगी जैसे गला सूख रहा हो। वह उठी। कमरे के बाहर फ्रिज से उसने पानी की बोतल निकाली और गटागट पी गयी। फ्रिज बन्द करके लौटते हुए उसकी नजर दूसरे कमरे में लेटे माधव पर गयी। माधव चित लेटे थे। माधव कभी चित नहंीं सोते थे। वे हमेशा करवट लेकर सोते थे। क्या वे जाग रहे थे? क्या वह लौट कर पूछे? वापिस पलंग पर लेटते हुए उसने सोचा। वह पूछना चाहती थी कि क्या कोई और रास्ता नहीं था? क्या अलग हो जाना ही एक रास्ता था? क्या उनके रास्ते जैसे आपस में टकरा कर एक हो गये थे, उसी तरह उनका फिर से अलग हो जाना जरूरी था? जैसे बुढ़ाते लोग रिटायर होने के पहले अपना स्थाई घर बनाते हैं , उसी तरह मधु ने मेहरौली में अपना घर बना लिया था। दिल्ली की सड़कों पर अपनी मारुति चलाना उसने अरसा पहले शुरू कर दिया था जब उसके बाल बिल्कुल काले थे। जब उसके बाल सफेद होने लगे तब भी उसने डाई कराना शुरू नहीं किया। हो सकता है उसकी इस जिद में माधव का भी हाथ रहा हो। माधव को बाल रंगाने से चिढ़ थी। जब कोई उन लेखकों का जिक्र करता जो बाल रंगाते थे तो वह कहता, ÷÷ मैं जवानी में नहीं मरना चाहता। मैं बूढ़ा होकर ही मरना चाहता हूं।'' मधु के सहयोगियों और मित्रों का कहना था कि सफेद काले बाल उसके सांवले रंग पर फबते हैं। जब तक सुनन्दा साथ थी और वह पढ़ाती थी, वह व्यस्त थी। उसे अपने बारे में सोचने का ज्यादा वक्त ही नहीं मिलता था। फिर एकाएक दो तीन सालों के भीतर ही सुनन्दा दिल्ली छोड़ कर लखनऊ विश्वविद्यालय पढ़ाने चली आयी और उसने दीपक से शादी कर ली और मधु रिटायर होकर अपनी मारुति से मेहरौली रहने चली गयी। घर में तीन कमरे और एक हॉल था। कुछ महीनों वह हर कमरे में अकेली घूमती फिरी। फिर उसने एक एन.जी.ओ. ज्वाइन किया, जो आसपास के गांवों में शिक्षा अभियान चलाता था। पहले घर से निकलना, गांव में जाना और बच्चों बूढ़ों से बतियाना अच्छा लगा। फिर उसे ऊब होने लगी। उसे शेक्सपीयर और टी.एस. इलियट पढ़ाने की आदत थी। गन्देसन्दे बच्चों और तम्बाकू से गन्धाते बूढ़ों को ककहरा सिखाना उसे भारी पड़ता। ऊपर से मुस्कुराते रहने से क्या होता था? भीतर ही भीतर जलन होती रहती। सुनन्दा ने कई बार कहा कि मेरे पास आकर रहो। उसने एक बार कोशिश भी की। लेकिन महीना भी पूरा नहीं हुआ, उसे महसूस हुआ कि यह घर अपना नहीं है। भीतर की जलन फिर उभर आयी उन दिनों माधव सुनन्दा के घर नहीं आते थे। शायद उन्हें मेरा यहां रहना पता चल जाता होगा, मधु ने सोचा। वे कभी शहर की सड़कों पर भी नहीं दिखे। और तो और वे कभी दिल्ली में भी नहीं दिखे। कई बार दूर से किसी भीड़ में उनके होने का शक जरूर होता। मगर उस ओर बढ़ने पर वह छवि गायब हो जाती जैसे वह वहां कभी थी ही नहीं। हो सकता है, माधव उसे देख कर हट जाते हों या वे कभी वहां रहते ही न हों और यह सचमुच मधु की नजर का ही धोखा हो।
मधु की नजर को एक बार सचमुच घोखा हुआ था जब एक शाम सुनन्दा अपने दोस्त को लेकर घर आयी। तब वह रिटायर नहीं हुई थी और सुनन्दा जे.एन.यू. में पढ़ती थी। उस लड़के को घर के दरवाजे में घुसते हुए वह देखती रह गयी थी। शाम का उजास था। हॉल में कुछ धुंधलका सा छाने लगा था। बारिश का मौसम था। लेकिन उस दिन बारिश नहीं हुई थी। उमस थी। मधु को ऐसा लगा जैसे दरवाजे में माधव प्रवेश कर रहे हैं। वही कद, वही नाकनक्श, वही उलझे हुए बाल, वही मुचड़ा हुआ कुर्ता। जैसे माधव उस दोपहर से निकल कर सीधे इस शाम में आ गये हो - जब उन्होंने सप्रू हाउस की एक गोष्ठी में कविताएं पढ़ी थीं और मधु ने उन्हें पहली बार देखा था। क्या कोई समय को लांघ सकता था? या समय कोई खेल खेल रहा था जिसमें अतीत वर्तमान हो जाता था और वर्तमान खो जाता था। वह एकटक उस लड़के को घूर रही थी। वह चौंकी जब सुनन्दा ने उसका परिचय कराया। उस लड़के का नाम हरि था। वह सुनन्दा का सहपाठी था। जब वह सामने बैठा तो मधु ने देखा कि वह जीन्स पहने था - जिसका माधव की जवानी में कोई चलन नहीं था। उसके कुर्ते का रंग पीला था जो माधव कभी नहीं पहनते थे। हरि की आंखों में एक अजब तेजी थी जो हिंस्रता की हदों को छूती थी। मधु फिर चौंकी थी जब उसने अपना घर झांसी शहर बताया। वहां कोई नहीं जाता था। गेस्ट हाउस चोटी पर था। |