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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

आवाज भी नहीं आती यहां तक
न आवाज की रोशनी, न रोशनी की आवाज

आशीष त्रि‍पाठी

राजेश जोशी ने गंगा तट ' को ÷ दूसरी नागरिकता' की कविता कहा था। ऐसा लिखते हुए उन्होंने कवि ज्ञानेन्द्रपति द्वारा ÷ पहली नागरिकता' की अनदेखी का भी प्रश्न उठाया था। ÷ संशयात्मा' की कविताएं पढ़ते हुए हमारा ध्यान सबसे पहले इस ओर जाता है कि जनपदीयता से स्वाभाविक जुड़ाव रखने वाले कवि ज्ञानेन्द्रपति ने अपने जनपद के जीवन पर अनेक कविताएं लिखी हैं जो उनके नवीनतम संग्रह में मौजूद हैं। कवि का अपना घर, अपना गांव, अपना ÷ देश' यहां स्थान पा सका है। इन कविताओं में निजी जीवन स्मृतियों से प्रायः बचने वाले कवि की निजी स्मृतियां भी दिखायी देती हैं हालांकि उनमें भी एक तरह की तटस्थता और निस्संगता मौजूद है। स्मृतियों से गुजरने के बाद भी ये बड़े प्रश्नों को सामने रखने वाली कविताएं हैं। भारतीय लोकतां में विकास और औद्योगीकरण के नाम पर गांवों में ÷ सहज पारम्परिक गांव' के गायब होते जाने जैसे अनेक बदलावों को ये लक्षित करती हैं। ÷ गांव का घर' कविता में पंचायती राज के नारों के बीच पंच परमेश्वर से लेकर लोकगीतों के खोते जाने की टीस हैः

लालटेनें हैं अब भी, दिन भर आलों में कैलेण्डरों से ढंकी-

रात उजाले से अधिक अंधेरा उगलतीं

अंधेरे में छोड़ दिये जाने के भाव से भरतीं

जबकि चकाचौंध रोशनी में मदमस्त आर्केस्ट्रा बज रहा है कहीं, बहुत दूर पर भड़काये कि आवाज भी नहीं आती यहां तक, न आवाज की रोशनी, न रोशनी की आवाज होरी चैती बिरहा आल्हा गूंगे

लोकगीतों की जन्मभूमि में भटकता है एक शोकगीत अनगाया अनसुना

यह शहरों से दौड़ में पिछड़ चुका गांव है , जो अपनी पारम्परिक निजता खो चुका है और नये को प्राप्त नहीं कर पाया है। ÷ आवाज भी नहीं आती यहां तक, न आवाज की रोशनी, न रोशनी की आवाज' - इस गांव का सटीक रूपक प्रस्तुत करती है। शहरों की विकृतियों की नकल करते गांव में मैदान मिट रहे हैं। ÷ मिट गये मैदानों वाला गांव' में मैदानों के मिटने के बहाने मिटती सामूहिकता और सामूहिकता के लिए घटती जगह का, विकास के दबाव में बच्चों की सिकुड़ती दुनिया का मार्मिक चिा है। महत्वपूर्ण है कि पहली स्थानीयता का आसरा लेने के बावजूद ये कविताएं स्मृतियों में सुरक्षित गांव का ही चिा नहीं खींचतीं, वरन स्मृतियों में मौजूद गांव के समानान्तर आज के गांव को सामने रख कर त्रासदी को गहरा बना देती हैं। इन कविताओं को ÷ एक आदिवासी गांव से गुजरती सड़क', ÷ झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन', ÷ खेवली तक सड़क नहीें आती' और ÷ जीवन यात्रा के अधरास्ते' के साथ जोड़ कर देखने पर स्पष्ट होता है कि कवि ज्ञानेन्द्रपति की कविताएं अंततः साधरण मनुष्य, उसके स्वाभाविक जीवन और उसके जीवन के लिये जरूरी प्रकृति के खिलाफ खड़ी विकास की प्रक्रिया और उसकी वर्ग राजनीति का प्रतिरोध करती हैं। झारखण्ड के आदिवासियों और आदिवासियों की जीवन स्थली पहाड़ों के बहाने कवि आधुनिक भारतीय राजनीति और लोकतंत्र द्वारा चयनित ÷ अर्थ तंत्र' के भयावह परिणामों को सामने लाता है। आदिवासी गांव को विकसित करने और विकास की मुख्य धारा में लाने का दम भरने वाला ÷ विकास' और उसके आधार माने जाने वाले ÷ सड़क' जैसे उपकरण वस्तुतः शोषण की सभ्यता के उपकरण हैं जो आदिवासियों के नहीं ÷ अत्याचारियों के गुजरने का रास्ता' हैं:

चमक पड़ा मर्म / आदिवासी गांव की छाती से गुजरती सड़क का / कि हमारी शोषण की सभ्यता का / कि जिसकी बांह राजधानी सें यहां तक आयी है / लुटेरी बांह / टटोलती इसकी छाती के कोयले आत्मा का अबरख / यह सड़क / कि यह नहीं राजधानी से बहती आयी सभ्यता की नदी / कि इससे कोई नहीं सम्बन्ध / इसके किनारे बसे हुओं का / सिवा इसके कि / पिपासु पहियों के नीचे आ जाते हैं जब तब / इनके चूजे और बच्चे और अड़हुल सा खिला किसी युवती का यौवन रौंदा जाता है।

÷ विकास' की यह त्राासदी अधिक तीखी और लगभग मानव विरोधी दिखायी देने लगती है जब ÷ अपने कलपने को / अपने भी कानों से दूर / हिरदै की मुट्ठी में कसे हुए' छोटा नागपुर के ठिगने पहाड़ों का अरण्यरोदन सुनायी देता है। स्पष्ट और निर्भान्त पक्षधरता के साथ कवि देखता है कि पहाड़ों पर अमूल्य खनिज सम्पदा होने, उसका दोहन किये जाने के बावजूद उस धरती की वास्तविक संततियां रोटी की खोज में पंजाब के लिए विस्थपित होने को विवश हैं, ÷ जहां सूर्य पूरी रोटी की तरह गोल' है। जबकि इन ÷ पर्वतों के पंख काटने वाले बज्रधर इन्द्र के वंशज' दिनोंदिन मालामाल हो रहे हैं। वर्ग विभाजित समाज में विकास की प्रक्रिया प्रभु वर्ग को ही सशक्त बना रही है। रोटी रोजी के लिये पंजाब जाने वाले मजदूरों पर ÷ जीवन यात्राा के अधरस्ते' कविता इस श्रृंखला में ही पढ़ी जानी चाहिए। वातानुकूलित और आरक्षित शयनयानों में जगह न पाने के कारण ट्रेन की छतों पर चढ़ कर यात्रा करने वाले मजदूरों की नींद ÷ ज्वालामुखी के तृणाच्छादित मुंह पर / कन्दमूल चुनने वालों' की नींद की तरह होती है, जो अंततः कविता में तीन मजदूरों की मृत्यु का कारण बनती है। ÷ समाजवाद' का दम भरने वाले भारतीय लोकतंत्र में विकास की पूरी राजनीति का सारा बोझ अंततः साधारण और निर्विकल्प किसान और मजदूर सह रहे हैं। ( सह रही है किसानों और मजदूरों की जीवन स्थली यह धरती) ये वे हैं ÷ जीवन युद्ध में किसी और के लिये अंततः मरना जिनकी नियति है।'

स्पष्ट है कि अपने गांव देश की बात कवि राष्ट्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य के साथ करता है , जिसमें हमारे समय के प्रमुख विमशोर्ं की भी झांकी मिलती है। ज्ञानेन्द्रपति ने कवि और नागरिक के रूप में अपनी राजनीति को सतत अपनी कविता में अभिव्यक्त होने दिया है तथा किसी अर्थ धुन्ध की जगह नहीं छोड़ी है। इसीलिए मनुष्य विरोधी कुचक्रों से निरन्तर टकराते उठ रहे सामाजिक राजनैतिक विमशोर्ं के बिना ज्ञानेन्द्रपति की कविता की गहराई और विस्तार को समझना कठिन है। अनेक रास्तों पर चलने के बावजूद, ठेठ स्थान, देश और वस्तुओं से उठ कर वह इन सवालों से जुड़ जाती है। एक अर्थ में ज्ञानेन्द्रपति की कविता की धुरी राजनीति है। मनुष्य की मुक्ति की दीर्घकालिक राजनीति। यह अकारण नहीं है कि ÷ संशयात्मा' की कविताओं में हमारे समय के अनेक विमशोर्ं के काव्यान्तरित रूप की झलक मिलती है तथा राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि के पारिभषिक शब्दों और चर्चित व्यक्तियों के नामों का उपयोग है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन कविताओं में कवि की राजनीति ज्यादा साफ और संकेन्द्रित हुई है, जिसकी तीन स्पष्ट दिशाएं हैं: पहला, पूंजीवाद का नया स्वरूप जो मुक्त बाजार व्यवस्था, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रभुत्व, अमेरिका नियंत्रित एक ध्रुवीय विश्व, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, विभिन्न देशों के बीच युद्ध, गृहयुद्ध, शस्त्र उद्योग और गम्भीर पर्यावरण संकट में अभिव्यक्त हो रहा है, दूसरा, पुनरुत्थान जो साम्प्रदायिक संघषोर्ं, अन्धविश्वासों के पुनर्जन्म, धर्म के बाजारीकरण और धर्मस्थलों के बढ़ते प्रभुत्व में प्रकट हो रहा है; तीसरा, भारतीय लोकतंत्र की असफलताएं जिसके कारण निचले स्तरों में असमानता तीव्रतर स्थितियों में पहुंच रही है, जिससे रोजगार व विस्थापन की समस्या बढ़ी है। ÷ संशयात्मा' की ज्यादातर कविताएं प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः इन विषयों को छूती हैं। ÷ कदम कदम पर', ÷ राजधानी में', ÷ पांव जिन्हें पखारे सागर', ÷ मशरूम वल्द कुकुरमुत्ता', ÷ कुबेर की बेर', ÷ टेलिविजन को देखो' कविताएं बाजारवाद के प्रभावों का अंकन करती हैं। ÷ शीतयुद्ध की समाप्ति पर', ÷ आत्मा के शिकारी', ÷ एक विज्ञापन पट', कविताएं ÷ युद्ध के विरुद्ध', ÷ अधरात घास गन्ध', ÷ आजादी उर्फ गुलामी', उत्तर परमात्मा' के साथ पढे+ जाने पर नवपूंजीवाद जनित नयी स्थितियों का समग्रता में पूरी पक्षधर ज्ञानात्मकता के साथ वर्णन करती हैं। इन कविताओं में बहस का भी एक सिलसिला मिलता है और कवि की प्रखर प्रतिरोधी चेतना की झलक भी । इस श्रृंखला की सम्भवतः सर्वोत्तम कविताएं ÷ सूखे से जिनका सामना', ÷ इथियोपिया' और ÷ यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है' हैं। ÷ सूखे से जिनका सामना' बढ़ते वर्ग अन्तराल का मार्मिक चित्रण करती है। भीषण अकाल का भी सुख का जीवन जीते सम्पन्न वर्ग पर कोई भौतिक या मानसिक प्रभाव नहीं। मनुष्य जाति को खुशहाल बनाने वाली वैज्ञानिक प्रगति से उपजी तकनीक भी वर्ग विभाजित दुनिया में अन्ततः समृद्ध वर्ग की गुलाम बन कर रह गयी है। समृद्धों की छोटी दुनिया पर, इसीलिए बहुसंख्य जनों की बड़ी दुनिया के दुख कोई असर नहीं डाल पाते। अमानवीयता की हद तक जाने वाली यह असम्पृक्ति अनायास नहीं है, बल्कि इसमें नव पूंजीवादी उपभोक्तावाद और उदारीकरण की प्रभावी भूमिका है। ÷ इथियोपिया' कविता में कवि निर्विकल्प साधारण जन के बीच से उभरती प्रतिरोधी शक्ति का प्रभावी चित्र खींचता है।

इथियोपिया! इथियोपिया!

अनाज और अनुदान लेकर तुम्हारे पास गये गोरे गदोले हाथ

अभी दया से और अभी गुस्से से कांपते हैं

घुटनों से पेट बांधे सर झकाये बैठे हुओं के बीच से उठ कर

क्यों दौड़ जाते हैं मैराथन दौड़ों में सबसे आगे

इथियोपियाई धावक! क्यों भला, क्यों?

÷ यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है' पूछते हुए कवि पृथ्वी पर सबके समान अधिकार के बुनियादी सिद्धान्त और मानवीयता की वृहत्तर भावना से परिचलित है, जहां ÷ धरती के लिए केंचुओं से ज्यादा जरूरी नहीं है मनुष्य':

क्या तुम्हें

एक केंचुए के पास जाकर

पृथ्वी को उर्वर करने में तल्लीन केंचुए के पास

नहीं पूछना चाहिए

पृथ्वी के बारे में कोई भी अहम फैसला लेने से पहले!

इस तरह संग्रह की अनेक कविताएं पृथ्वी की जैविक विविधता को बचाने की चिन्ता से जुड़ जाती हैं।

संशयात्मा ' की अनेक कविताएं ( पृथ्वी से विदा ले रही वस्तुओं, जीवों और सुन्दरताओं के लिए) विदा गीत की तरह हैं। इनमें कवि के प्रियजन जैसे बाबा, गोरख पाण्डेय, सफदर हाशमी, राजेश शर्मा, सोमदत्त और मान बहादुर सिंह हैं तो गांव के मैदान, लोकगीत, सर्कस, घण्टाघर, ( शहरों में) क्षितिज, रामलीला, सुग्गे, बीज, खेसाड़ी दाल, फासला और खिरनी, भाप इंजन, चन्द्रबिन्दु, मूर्धन्य ष तथा झारखण्ड के पहाड़ों के खनिज तथा जीवन में प्रेम भी हैं। कवि अलग अलग कविताओं में इन सबकी समवेत महाविदायी का विदागीत रचता है। यह एक तरह से ÷ स्वाभाविक धरती' और ÷ स्वाभाविक प्रकृति संगी मनुष्य' के लिए शोकगीत भी है। परन्तु, इनमें भावनात्मक प्रतिक्रिया मात्र नहीं है। कवि पूरी वैचारिकता और तर्कपरकता के साथ इनके विदा होने के पीछे की जीवन स्थितियों का खुलासा करता है। उदाहरण के तौर पर ÷ बीज कथा' कविता को लिया जा सकता है, जो भूमण्डलीकृत विश्वग्राम में बीजों के पेटेण्ट के बहाने दुनिया में फैल रही तकनीक आधारित जैविक एकरूपता की साम्राज्यवादी राजनीति का खुलासा करती है। यह कविता प्राकृतिक जैविक लोकतंत्र के लिये शोकगीत है। यह हमारे दौर के वर्ग प्रभुओं की इतिहास की सबसे खतरनाक और भयावह हिंसा है, जिसमें अन्ततः ÷ मनुष्य' और ÷ धरती' के ही विलुप्त और नष्ट हो जाने का खतरा मौजूद है।

÷ संशयात्मा' संग्रह की कविताएं हमारे दौर की मुकम्मल तसवीर पेश करती हैं। पिछले पच्चीस वषोर्ं में लिखी गयी 152 कविताओं में आज के जीवन की प्रमुख चिन्ताएं बार बार और एक दूसरे से जुड़ कर एक समग्रता में प्रस्तुत होती हैं। यह टुकड़ों टुकड़ों में बंटा जीवन के महासमर का महावृत्तान्त है। कुछ स्थायी चिन्ताएं कविताओं में बार बार उभरती हैं। यह एक चिन्तित और आक्रान्त विचारवान कवि का संसार है, इनमें एक पुनरावृत्ति भी है, परन्तु कवि की चिन्ताओं और उनसे उसकी गहरी संलग्नता का पता भी लगता है। एक विषय पर एक कविता लिख कर छोड़ देने वाले कवि नहीं हैं ज्ञानेन्द्रपति। वे लगातार लिखते हैं, और अपनी एक चिन्ता अनेक रास्तों से कविता में रखते हैं। यह एक बिन्दु है जो कवि को आन्दोलनकर्ता कवि में बदल देता है। जब दुनिया नहीं बदली, चिन्ता समाप्त नहीं हुई तो वह कविता से ही क्यों विदा ले?

 

ज्ञानेन्द्रपति की बेहद गम्भीर और सघन वैचारिकता से ओतप्रोत कविताओं से बाहर निकल कर विष्णु नागर की कविताओं में आना एक भिन्न रंग की कविताओं की ओर आना है। विष्णु नागर अपनी पीढ़ी में अपनी तरह के इकलौते और समकालीन काव्य परिदृश्य को विविधवर्णी बनाने वाले महत्वपूर्ण कवि हैं। उनके नये संग्रह ÷ हंसने की तरह रोना' की कविताओं में उनके द्वारा ईजाद की गयी हिकमतों को अपने चरम पर पहुंचते देखा जा सकता है। ये कविताएं इतनी सहज हैं कि उनमें किसी तरह की सायासता खोजना कठिन है। एक अर्थ में ये महत्वाकांक्षाहीन कविताएं हैं। आप इन्हें कविता ही मानें इतनी भी इनकी आकांक्षा नहीं है। दुनिया की गम्भीर से गम्भीर और चिन्ताजनक स्थितियां और समस्याएं भी कविता की इस दुनिया में आकर खेल खेल में पाठक के भीतर उतरती हैं। चिन्ताओं को ठेंगे पर रखने वाले गप्पबाजों, मजाकिया लोगों और विदूषकों की बातचीत का ढंग इन कविताओं का प्राणतत्व है। इससे इन कविताओं का ÷ कथ्य' भी प्रभवित हुआ है और ÷ कहन' भी। खिलन्दड़ापन, कौतुक और विनोद इन कविताओं को ज्ञानीजनों से भिन्न मार्ग अपनाने वाले साधरणजनों की लोकवार्ता की ओर ले जाते हैं। माथे पर बल डालने वाली, चिन्तातुर, लटके चेहरे वाली, हंसी ठिठोली को देश निकाला दे चुकी तथाकथित गम्भीर कविताओं के समानान्तर विष्णु नागर की कविता समकालीन हिन्दी कविता में एक नया द्वार खोलती है। परन्तु, इसका लक्ष्य हंसाना या मनोरंजन करना नहीं है; यह गम्भीर प्रभाव डालने वाली कविता है क्योंकि इसमें गहरी संवेदना और व्यंग्य की चुभन मौजूद है। संयमित व्यंग्य ने इन कविताओं को कलात्मक उठान दी है। भारतेन्दु, नागार्जुन, केदार और कुछ हद तक रघुवीर सहाय की कविता धारा को नया प्रस्थान देती ये कविताएं दिखलाती हैं कि आज भी सहज बोलचाल की भाषा में कविता में व्यंग्य का सटीक इस्तेमाल किया जा सकता है।

संग्रह में व्यंग्य और खिलन्दडे+पन का सर्वाधिक तीक्ष्ण और प्रभावी प्रयोग राजनैतिक कविताओं में हुआ है। खास तौर पर अमेरिकी साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता सम्बन्धी कविताओं में हरिशंकर परसाई और नागार्जुन जैसी धार है। फैण्टसी के हल्के से स्पर्श से व्यंग्य में हमेशा ही एक नयी चमक देखी जाती है। वह यहां भी मौजूद है। समकालीन चरित्रों के नामों से परहेज न होकर यहां उनका औचित्यपूर्ण उपयोग देखने को मिलता है। ÷ अमेरिका का प्यार' शीतयुद्धोतर दुनिया में अमेरिकी नीति और उसके तथाकथित मानवतावाद, मानवाधिकार और लोकतांत्रिकता पर गहरा कटाक्ष है। अपने विशिष्ट अन्दाज में कवि हमारे सामने तर्क रखता है कि अमेरिका की शतोर्ं पर अमेरिका से एकतरफा सम्बन्ध दुनिया के साधारण देशों के लिये क्यों जरूरी होते जा रहे हैंं। साम्राज्यवादी कारगुजारियों से भरे इन तकोर्ं का एक ही अर्थ है - शक्ति अर्थात ÷ जिसकी लाठी उसकी भैंस':

अमेरिका चाहता है कि इस धरती के समस्त जन उसे प्यार करें

क्योंकि उन्हें मालूम पड़ गया होगा कि वह दुनिया में कहीं भी,

कभी भी, कुछ भी कर सकता है

वह अफ्रीका में गन्दगी पर भिनभिनाती एक मक्खी को

खतरनाक घोषित करके उसे मारने के लिए फौजें भेज सकता है

और उस मक्खी के सिवाय सब कुछ को तबाह कर सकता है

धौंस और दादागिरी में आकर उसका हुक्म बजाने वालों के लिए यह सन्देश महत्वपूर्ण है :

उससे प्यार करने की सजा है मौत , जो कि संयोग से उसे प्यार करने का पुरस्कार भी है।

विडम्बनापूर्ण स्थितियों का नाटकीय तरीके से उद्घाटन कवि के ऐसे काव्य प्रयासों में अनेक बार दिखायी देता है जो व्यंग्य को अर्थगर्भी और परतदार बनाता है। ÷ बुश बेचारा' उपर्युक्त स्थिति का ही भिन्न रूपान्तर है-

बुश बेचारा तो शान्ति चाहता था

वह तो कह रहा था

सद्दाम तू मेरे को पसन्द नहीं

और भैया तू अपना मुल्क छोड़ कर चला जा

मैं फिर से कह रहा हूं मेरे बाप, मेरे दायजी, चला जा

सद्दाम गया नहीं तो बुश बेचारा क्या करता?

व्यंग्य की यह धार अपेक्षित कलात्मक ऊचाई प्राप्त कर सकी है , उसके पीछे कवि की स्पष्ट समाजिक राजनैतिक चेतना और वैचारिक पक्षधरता है। विष्णु नागर की खूबी यह है कि वे दूर देश के खलनायकों के साथ ही अपने नजदीक के जनशत्रुओं की भी ठीक ठीक पहचान करते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि सर्वनामों पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और राजनैतिक शक्ति रखने वाले मौजूद सार्वजनिक प्रसिद्ध व्यक्तियों पर कवि के व्यंग्य बाण कवि की प्रतिबद्धता का प्रतिफल हैं। अमेरिका और बुश पर लिखी उपर्युक्त कविताओं के क्रम में ÷ साम्प्रदायिकता' और ÷ मोदी' विषयक कविताएं देखना चाहिए। यह ठीक है कि साम्प्रदायिकता, विशेष रूप से गुजरात की योजनाबद्ध हिंसा का विरोध प्रत्येक रचनाकार, विचारक और चेतना सम्पन्न व्यक्ति के लिए, लिटमस पेपर टेस्ट की तरह है और हिन्दी के ज्यादातर रचनाकारों विचारकों ने इस प्रसंग में स्पष्ट दृष्टि का परिचय दिया है। इसमें भी विष्णु नागर की इस संग्रह की कविताएं रचनात्मक साहस की दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखती हैं। ÷ अब मैं उतना अकेला नहीं हूं' हिन्दू साम्प्रदायिकों की हिंसा का मण्टो और परसाई की शैली में खुलासा करती है। सरकार द्वारा उन्हें ÷ जनसंख्या नियन्त्रण कार्यक्रम' को सफल बनाने वाले कार्यकर्ता बना कर सम्मानित करना कविता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिनके सामाजिक अभिप्राय डराने वाले हैं, परन्तु जो कल्पना नहीं है, वास्तव में परदों के पीछे यह घटित हो रहा है। ÷ वे जला दिये गये' जलने वालों द्वारा खाली कर दी गयी वस्तुओं का उपयोग कर प्रसन्न होने वाले अमानुषों का चित्र खींचती है ÷ जिनकी हरकतों को देख कर / पागलखानों में बन्द पागल तक भयभीत हो रहे हैं।' ÷ सरस्वती' कविता अतीत और विलुप्तों के प्रति प्रेम का रहस्य बतलाती है - ÷ ताकि जो आंखों के सामने है / उसका विलोपन किया जा सके।'

इस श्रृंखला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कविता है - ÷ बेचारों का हिन्दू राष्ट्र' । दुखद है कि अनगिनत कार्यक्रमों, रणनीतियों, नारों, षडयन्त्रों, रथयात्राओं और साम्प्रदायिक दंगों के बावजूद अब तक यह हिन्दू राष्ट्र नहीं बन सका। ÷ दुखद परिस्थिति' के अनुसार ÷ टोन' का चुनाव और कविता में ÷ बेचारों' शब्द का प्रयोग व्यंग्य को एक खास भंगिमा देता है, जिसे सहयोग देते हैं ÷ हाय हाय', ÷ आह आह', ÷ गरीब', ÷ मुसीबत के मारे' आदि पदों के सटीक प्रयोग :

उन्होंने मारे/और और मारे/और और मारे लोग/उन्होंने मारने में

पचास से भी ज्यादा साल लगा दिये/फिर भी बना नहीं, हां जी बन ही

नहीं सका, बेचारों का हिन्दू राष्ट्र

x x x

हा हा/ये क्या हुआ रे इनके साथ/हो हो, हाय हाय। हाय हाय, हो हो
/ आह आह, अरे वाह/बन ही नहीं सका/बेचारों का, गरीबों का, मुसीबत
के मारों का/काली टोपी, केसरिया पटके वालों का हिन्दू राष्ट्र

÷ भोलेपन' और ÷ अबोधता' की भंगिमा में कहे जाने के कारण व्यंग्य खिल उठा है। वाचक की भोली और सहानुभूतिपूर्ण मुद्रा व्यंग्य के प्रभाव को, ÷ बुश बेचारा' कविता की ही तरह यहां भी, कई गुना बढ़ा देती है। धर्म के नाम पर सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाले साम्प्रदायिकों के नायक ÷ मोदी' को ÷ बुश' की बगल बिठा कर कवि ने खेल खेल में जन शत्रुओं को सही ढंग से पंक्तिवद्ध किया हैः

ग्लोबलाइजेशन के इस जमाने में

हत्यारे का नाम कुछ भी हो सकता है-

जार्ज मोदी भी और नरेन्द्र बुश भी

x x x

उसका पता वाशिंगटन, लन्दन

दिल्ली या गांधीनगर कुछ भी हो सकता है

वह तेल के लिए लोगों को मार सकता है और चुनाव जीतने के लिए भी। कवि ने नवसाम्राज्यवादियों और नवफासीवादियों की एक पूरी बिरादरी का खुलासा अपनी ही शैली में सहज ही कर दिया है।

विष्णु नागर दूसरों के साथ साथ स्वयं पर भी व्यंग्य करने का साहस करते हैं। आत्म व्यंग्य के साथ आत्मालोचन और आत्मस्वीकार द्वारा अपने काव्य संसार को व्यापक और विश्वसनीय बनाते हैं। ÷ मैं' के बहाने ये वस्तुतः मध्यवर्ग की कविताएं हैं। ÷ सन्देह दूर करना' इसका सटीक उदाहरण है :

कभी कभी मुझे सन्देह होता है कि मैं भी दूसरों की तरह

एक साधारण आदमी हूं

तो मैं इस सन्देह को दूर करने के लिए

किसी की नौकरी ले लेता हूं

किसी को ऐसा डांटता हूं कि वह थर थर कांपने लगता है

किसी को दरवाजे के बाहर इतनी देर तक खड़ा रखता हूं कि

वह अपमानित होकर चुपचाप चला जाता है

यह स्पष्ट है कि यह मध्यवर्गीय नायक ÷ मैं' मुक्तिबोध के युग का नहीं उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जमाने का व्यक्ति है, जो अनेक रास्तों पर बैठे गधे को भी सलाम करता है ( गधा), जरूरत पड़ने पर गरीबी को ग्लैमराइज करता है ( गरीब), पद पर बैठ कर शेर हो जाता है ( पद पर बैठा शेर), गुलामी में थोड़ी सी भी कमी उसे अखरती है पर वह उसे त्याग की मुद्रा में स्वीकारता है ( गुलाम), वह लुटेरों के सम्प्रदाय में शामिल होकर प्रसन्नता का अनुभव करता है ( लुटेरे), हर बात पर अपनी अकर्मण्यता और भय को ÷ नो कमेण्टस' कह कर छुपाता है ( नो कमेण्टस), दो रास्तों पर एक साथ चलता है ( कवि जी), अमानवीय कार्यवाहियों में शामिल होकर भी शराफत भरी भाषा बोलता है ( शरीफों की भाषा)। ÷ दलालों के स्वर्ण युग' में घटते मानुषपन की भी चिन्ता इन कविताओं में मौजूद है - ÷ वह आदमी नहीं रहा / मशीन बन चुका था / इसलिए वह थकता नहीं था / गर्म जरूर हो जाता था।' मनुष्य मशीनवत हो जाना - एक भयावह सच्चाई है। घटते मानुषपन को अंकित करने के लिए कवि ने मनुष्य को, मुर्गा, मशीन, कुत्ता, गधा या शेर आदि के साथ जोड़ा है। ऐसा करते हुए उन्होंने हमारी बंधी बधायी ÷ सुरुचि' पर भी हमला किया है।

विष्णु नागर छोटी कविताओं के कवि हैं। कम शब्दों , कम पंक्तियों वाली कविताएं उनके यहां बड़ी संख्या में हैं, जिनमें शब्दों की मितव्ययिता के साथ एक चुस्ती और तीक्ष्णता दिखायी देती है। ब्योरों में जाने से वे बचे हैं। उन्होंने ÷ कथन' की एक खास भंगिमा अपनायी है ( या इजाद की है) जिसमें नुकीलापन भी है और नाटकीयता भी, खिलन्दड़ापन और व्यंग्य भी, त्रासदी और विडम्बना भीः

वह रो रही थी ऐसे / जैसे हंस रही हो / सिर्फ उसकी मां को मालूम था कि /
वह रो रही है मां ने कहा, हमेशा इसी तरह रोना बेटी / वरना ससुराल वाले कहेंगे कि इसे तो हंसना भी नहीं आता !

÷ मुड़ कर जो देख नहीं सकता', ÷ सार और थोथा', ÷ राजनीतिक का सच', ÷ किसी दिन ईश्वर', जैसी कविताएं कवि की परिपक्वता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। कवि की कविताओं में ÷ यथास्थिति' से एक गहरा प्रतिरोध मौजूद है। दुनिया के शक्तिशाली जनों या हारते हुए मानुषों का चित्रांकन करते हुए हलका सा ट्विस्ट देकर वे यह प्रतिरोध रचते हैं। ÷ मां सब कुछ कर सकती है', ÷ पद पर बैठा शेर', ÷ प्रेम के पक्ष में', ÷ घर में शोर', ÷ अमेरिका का प्यार', ÷ ग्लोबलाइज्ड हत्यारे', ÷ गधा', ÷ ताकत का पुजारी', ÷ बेचारों का हिन्दू राष्ट्र' आदि कविताओं में इसे देखा जा सकता है। कविताओं में संवाद की प्रविधि का अनेक तरह ेसे इस्तेमाल है। खास तौर पर व्यंग्य कविताओं में लोकवार्ता के लहजे का इस्तेमाल प्रभावी ढंग से हुआ है। इससे एक खास तरह की नाटकीयता पैदा की गयी है। कभी किसी शब्द या वाक्य के प्रयोग से इसमें गजब की अनौपचारिकता उभरती है, ÷ जब बचेंगे हम' में ÷ कौनो', ÷ नो कमेण्टस' में ÷ विष्णु नागर' नाम और ÷ बेचारों का हिन्दू राष्ट्र' में ÷ हां जी' ÷ हा हा' ÷ रे' आदि का प्रयोग इसके सटीक उदाहरण हैं।

भावुकता से बचने के बावजूद ÷ वे जो', ÷ दोस्त की बेटी', ÷ हालात को देखते हुए', ÷ मैं कुछ नहीं कर सकता' जैसी कविताएं संयत भावनात्मकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। वे बतलाती हैं कि अनेक विधाओं में लिखने के बावजूद विष्णु नागर बार बार कविता की ओर क्यों लौटते हैं? संग्रह की स्त्री पुरुष सम्बम्धों पर केन्द्रित कविताओं में रोजमर्रा की साधारण घटनाओं के बीच आत्मीयता, उत्साह, छोटी छोटी खुशियों और खिलन्दड़ेपन से भरा प्रेम और दाम्पत्य एक नये तरह की प्रेम कथा रचता है, जिसे पढ़ कर विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ÷ दीवार में एक खिड़की रहती थी' की याद आती है।

संग्रह कवि विष्णु नागर के अगले काव्य प्रयासों के प्रति गहरी उत्सुकता जगाता है।

व्यंग्यधर्मिता विष्णु नागर की कविताओं से पंकज चतुर्वेदी की कविताओं को जोड़ती है। पंकज चतुर्वेदी के दूसरे कविता संग्रह ÷ एक ही चेहरा' की कविताओं में व्यंग्य का प्रयोग हमारा ध्यान आकर्षित करता है। परन्तु, पंकज विष्णु नागर की तरह ÷ कथन' की भंगिमा और भाषा के खास प्रयोगों से व्यंग्य नहीं रचते, बल्कि उनके यहां स्थ्तियों और प्रसंगों के पूरेपन से व्यंग्य पैदा होता है। पेशेवर व्यंग्यकार होने और गद्य विधाओं में व्यंग्य का बहुविध प्रयोग करने के कारण विष्णु नागर के व्यंग्य में चुस्ती और नुकीलापन है। इसके समानान्तर पंकज चतुर्वेदी की कविताओं में व्यंग्य का प्रायः हल्का स्पर्श ही है, जो कविता में कुछ खास अंशों में आता है और प्रायः कविता की आन्तरिक संरचना को प्रभावित नहीं करता। उनकी कविताओं में गम्भीर वैचारिकता के साथ भी वह मौजूद है। उदाहरण के तौर पर ÷ देश नहीं चिड़िया' कविता को लिया जा सकता है। बड़े आकार की 53 पंक्तियों की कविता की अन्तिम दो पंक्तियां पूर्व 51 पंक्तियों में खडे+ किये गये वैचारिक ढांचे को सटीक व्यंग्य से तोड़ती हैं - मुझे लगा वे देश की नहीं / किसी चिड़िया की बात कर रहे हैं।'

संग्रह की कविताओं में खास प्रवृत्ति दिखती है , कवि द्वारा स्वयं की अनुपस्थित कर देने की। अपनी कथात्मक कविताओं में पंकज एक स्थिति के सामने दूसरी स्थिति रख कर, वैचारिक ढांचे की कविताओं में एक वक्तव्य के समानान्तर दूसरा वक्तव्य रख कर एक जटिल संश्लिष्ट स्थिति रचते हैं कि यह समक्षीकरण ( सादृश्य और विसदृशता) स्वयं एक कवि वक्तव्य बन जाता है। इन कविताओं में आख्यानात्मकता मौजूद है। अनेक कविताओं में छोटी कथाएं प्रायः अपने पूरेपन में दीख पड़ती हैं। इनमें अनेक चरित्र भी बेहद स्वाभाविक तरीके से आ जाते हैं, उनके वक्तव्य और आपसी वार्तालाप भी। ऐसा लगता है कि पंकज की दिलचस्पी कवियों की तरह जीवन चित्रों और जीवन स्थितियों में कम कथाकारों की तरह आगे बढ़ते गतिशील जीवन प्रसंगों में ज्यादा है। कवि की तरह वे कविता में अपनी भावनात्मक और वैचारिक प्रतिक्रिया खुल कर व्यक्त नहीं करते बल्कि जीवन प्रसंग और घटनाएं उनकी कविता में स्वयं बोलते हैं। अनेक बार कविता के ढांचे को वाद विवाद या विमर्श में बदल कर भी उन्होंने स्वयं को अनुपस्थित किया है। वे पढ़े गये या सुने गये किसी विचार के समक्ष दूसरा विचार रखते हैं। एक वक्तव्य के समानान्तर दूसरे वक्तव्य की योजना से कविता एक बहस का रूप ले लेती है। कई बार कवि इसमें बहस के दूसरे पक्ष के रूप में उपस्थित होता है, तो कई बार वह अनुपस्थित है। इसीलिए इन कविताओं में कवि की उपस्थिति सर्वव्यापी नहीं है, बल्कि वह कथाकार की तरह या बहस के संयोजक की तरह अनुपस्थित हो गया है।

संग्रह की अनेक कविताओं में एक कथात्मकता है। यह भी कह सकते हैं कि कवि ने कविता की रूप सम्बन्धी और भाषायी शतेर्ं पूरी करते हुए छोटी छोटी कहानियां ही रची हैं। स्पष्ट ही है कि वे कथाकारों की तरह कथा कहने में रस नहीं लेते बल्कि एक परिपक्व और नियोजित कवि की तरह तीक्ष्ण ढंग से घटनाओं को उनकी कथात्मकता के साथ आने देते हैं। ÷ गांव' एवं गंवई चरित्रों से सम्बन्धित कविताओं तूफान, इन बातों को पन्द्रह बीस बरस बीते, दिल्ली प्रसंग, लिफ्ट का संस्मरण, वजह, देवी चबूतरा, नमस्ते से बरजिये, मानसिक शान्ति का उपाय, रास्ता सुझाएं मान्यवर तथा ह.च.रा., हिन्दी के विभागाध्यक्ष और दिल्ली में एक स्त्री जैसी अनेक कविताओं में यह कथात्मकता पूरेपन में मौजूद है। इनमें कवि ÷ मैं' नाम के दर्शक, चरित्र या सिर्फ वाचक के रूप में उभरता है। तूफान, इन बातों को.., दिल्ली प्रसंग और लिफ्ट का संस्मरण कविताओं में आधुनिक तकनीक से परिचित होते युगसन्धि पर खड़े गांव का चित्र उभरता है। इन कविताओं में विनोद भरी चुहल, व्यंग्य और खिलन्दड़पन मौजूद है तो समाज के बारे में गम्भीर टीप भी।

अन्य कविताओं में गांव की अन्य छवियां उभरती हैं , जिनमें गंवई चरित्रों की बनक देखने लायक है। ÷ हिन्दी के विभागाध्यक्ष', ÷ हमारे समय का गुरुकुल' और ÷ एक महाविद्यालय से' इस मायने में विशिष्ट कविताएं हैं कि वे वर्ग विभाजित समाज में शिक्षा के वर्ग चरित्र पर, हिन्दी में प्रायः पहली बार, गम्भीर टिप्पणी करती हैं। सामन्ती मानसिकता के अकादमिकों की जातिवादी, वर्णवादी पुरुषसत्तावादी वृत्तियां, दिशाहीन ज्ञान और पलायनवादी रवैया लकवाग्रस्त चेतना का सबूत है जो शिक्षा की वर्गीय राजनीति से बावस्ता है। यह सार्वजनिक उच्च शिक्षा की भयावह तसवीर है। इसका सीधा सम्बन्ध पिछड़ों, दलितों और स्त्रियों को ÷ यथास्थिति' में बनाये रखने के मन्तव्य से है। ÷ दिल्ली में स्त्री', प्रेम के माध्यम से मुक्ति का रास्ता तलाशने वाली स्त्री के विडम्बनापूर्ण जीवन का चित्र खींचती है - ÷ वह स्त्री पूछ रही थी / और मैं सोच रहा था / दण्डित तो यह सभ्यता है / जिसमें स्त्री करती है प्रेम / कितनी यातनाएं हैं / जो अपनी मुक्ति के लिए उसकी प्रतीक्षा करती हैं।' कथात्मक प्रकृति की कविताओं में कवि प्रायः इसी तरह अपने लिए काव्यात्मक अवकाश निर्मित कर कविता को वैचारिकता की आभा देता है।

पंकज चतुर्वेदी की ये कविताएं जीवन के छोटे अनुभवों में अपना रूपाकार ग्रहण करती हैं। कोई छोटा अनुभव , किसी व्यक्ति से वार्तालाप, कोई पढ़ी हुई पंक्ति, किसी का दिखना या मिल जाना - कविता कहीं से भी प्रारम्भ होती है और आगे बढ़ती है। कविता में एक विमर्श या बहस रचना कवि को बेहद प्रिय है। किसी प्रसंग में अनेक व्यक्तियों के विचार सामने रख कर या एक विचार के समानान्तर दूसरा विचार रख कर यथार्थ को समग्रता में रखने की उनकी कोशिश में उनका कवि अपना निजी काव्य शिल्प रचता हुआ दिखाई देता है। उसने कहा था, देश नहीं चिड़िया, पहला घर दूसरा घर, मछली की चाह, जबलपुर में क्या है, अलीगढ़ कितना खुशनसीब है जैसी कविताओं में विभिन्न और विपरीत विचारों के समक्षीकरण से कवि ने अपने अभिप्रायों को सम्प्रेषित किया है। ÷ देश नहीं चिड़िया' कविता में 1857 की क्रान्ति को लेकर दो शिक्षित जनों के वक्तव्यों के माध्यम से कवि ने भिन्न प्रायः समानान्तर वैचारिकी को आमने सामने रख कर शिक्षित मध्यवर्ग द्वारा देश और साधारण जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से भागने को उनकी यथास्थितिवादी और कुछ हद तक औपनिवेशिक मानसिकता को - तीखे ढंग से स्पष्ट किया है। कवि ने कविता के इस ढांचे का सटीक इस्तेमाल खूबसूरती से जहां शिक्षित मध्यवर्ग की पलायनवादिता, जातिवादी मानसिकता, दोमुंहे आचरण, आडम्बर और वैचारिक दीवालियेपन को उभारने में किया है, वहीं ÷ अलीगढ़' जैसी कविताओं में भारत में विकसित हो रही वैचारिक लोकतांत्रिकता को चित्रित करने में। कुंवरपाल सिंह और इरफान हबीब के प्रायः विपरीत दिखने वाले विचारों को उद्धृत करने के बाद कवि की टिप्पणी है - ÷ यह जो लगता है / यह भी गौर करने की बात है।' देखें कि जोर ÷ होने ( सत्य)' की बजाय ÷ लगने ( व्यक्ति ग्रहीत सत्य)' पर है। फ्लैप में आशुतोष कुमार ने उचित ही लिखा है कि यह कवि की बौद्धिक दृढ़ता का परिचायक है। ÷ मछली की चाह' कविता दो वक्तव्यों को आमने सामने रख कर अबौद्धिक कवि संवेदना और निरर्थक गर्व का प्रत्याख्यान करती है। ÷ घर' को केन्द्र में रख कर अनेक तरह के विचारों का बयान करते हुए कवि ÷ अन्धकार की सत्ता', ÷ पहला घर दूसरा घर' और ÷ हकीकत नहीं मुहावरा' कविताओं में अर्थहीन भावुकता और भावुक वक्तव्यों का प्रतिकार करता है। सामान्य जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं ( जैसे घर) की अनुपलब्धता को निजी उदारता के वशीभूत भावुकता में उदात्तीकृत करना समस्या को मुल्तवी रखने का ही दूसरा नाम है। कवि ने वैचारिक दृढ़ता से इसका प्रत्याख्यान किया हैः

ऐसे ही समय में / मुझे हैरत हुई / कि एक कवि ने घोषित कियाः आज

से मेरा घर / उन सबका पता हो / जिनका कोई पता नहीं / यह बहुत अजीब

था और जाहिर है / कि यह एक गम्भीर समस्या को / पीठ दिखाता हुआ

समाधान था / अब यह पूछा जाता / तो कविता के पारखी कहतेः / यह बात

हकीकत में नहीं / मुहावरे में कही गयी है / तब तुझे यही कहना था मित्रो /

कि उन मुहावरों से बचो / जिनकी कोई हकीकत न हो /

इस तरह हम देखते हैं कि पंकज चतुर्वेदी की कविताओं में वैचारिक दुनिया से काव्य प्रेरणा प्राप्त करने की प्रवृत्ति है। यह आधुनिक और वैज्ञानिक युग की कविता है , तार्किकता जिसका आन्तरिक स्वभाव है। इसे कवि द्वारा अपने अध्यापन के पेशे और आलोचना कर्म से प्राप्त हुआ माना जा सकता है। यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि संग्रह की अनेक कविताओं में दूसरे कवियों, विचारकों और गद्य लेखकों की पंक्तियों / वक्तव्यों का बड़ी मात्रा में प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद, बुद्ध, बुद्धजातक से लेकर तुलसी, मीर, गालिब, निराला, गुलेरी, बनार्डशॉ, नामवर सिंह, मिलान कुन्देरा, त्रिलोचन, पाश और निदा फाजली जैसे अनेक स्रोतों का अनेक बार नाम सहित इस्तेमाल हुआ है। अनेक कविताएं तो ऐसी पंक्तियों से ही आगे बढ़ती हैं। ÷ उसने कहा था' कविता की 05 पंक्तियों को छोड़ दें तो शेष अन्य कवियों के उद्धरण मात्र हैं। ÷ पुरस्कार' नामवर सिेह के भाषण का सार संक्षेप मात्र है। अनेक बार इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता और यह एक तरह का जड़ाऊ काम दिखाई देता है। ऐसा करके कवि को कविता के लिए व्यापक जीवन का अवलोकन करने की बजाय एक छोटा रास्ता प्राप्त हो जाता है। एक सचेत और जागरूक कवि को ऐसे रास्तों से बचना चाहिए और अपने अनुभवों को अपनी वैचारिकता और अपनी भाषा में कविता में उतरने का समय देना चाहिए।

प्रेम पर केन्द्रित लगभग 15 कविताओं में कवि ÷ पारम्परिक काव्यात्मकता' से बंधा दिखाई देता है, जिनसे संग्रह का एक और आयाम खुलता है। एक साथ पढ़े जाने पर ये एक ही स्थिति की कविताएं दिखायी देती हैं, जिनमें असफल प्रेम का दंश गहराई से मौजूद है। ये अलग हो गये प्रेमियों के असमाप्त सम्बन्ध की कविताएं हैं जिनमें मिलन की स्मृतियां हैं तो अलग होने के क्षणों का मर्म और मिलने की तीव्र इच्छा भी। इनमें एक ÷ चेहराहीन सर्वनाम' ÷ तुम' उपस्थित है, जैसे कि प्रेम की शाश्वत मानवीयता व्यक्त करता हुआ। उत्कट इच्छाओं के बावजूद इनमें भावुक विकलता नहीं है। विवेकवान विचार, संयत भावना मौजूद है। यह नये मूल्यों के लिये संघर्ष करता हुआ प्रेम है जिसमें पुरुष अपनी पुरातन सत्ता से विलग होकर समानता की चेतना से भरे साहचर्य जनित और संघर्षों में बल देने वाले ऐसे प्रेम की मांग करता दिखायी देता हैं ÷ जहां प्यार का मतलब परिष्कार होता है / अपना और इस दुनिया का / जिसमें हम रहते हैं।' ये सामन्ती संस्कारों से मुक्त नये जमाने के पुरुष के प्रेम की कविताएं हैं। प्रेम, बुखार में लिखी गयी चिट्ठी, अगर तुम, प्यार से पृथक, मेरे लिए तो, तुम मुझे मिलीं, व्याकुलता से ज्यादा, इच्छा और तुम्हारा साथ आदि इस श्रृंखला की प्रायः सभी कविताओं में ÷ पयर्ााप्त कविता' मौजूद है, जिसके तार प्रगीतात्मकता से भी जुड़े हैं। यही वे कविताएं हैं जो कवि की प्रारम्भिक काव्य संवेदना से भी सघनता से जुड़ी हैं। ÷ निरावरण वह' कवि की सघन संवेदना और कलात्मकता के सन्तुलन की अदभुत बानगी है।

पंकज चतुर्वेदी की प्रायः सभी कविताएं शार्प , चुस्त और कसी हुई हैं। स्फीति प्रायः नहीं है। मितव्ययिता इतनी है कि पंक्तियां 04 से 07 शब्दों में बुनी गयी हैं। उन्होंने भी विष्णु नागर की तरह एक कौंध की छोटी कविताएं लिखी हैं। जहां इनमें से अनेक में एक आकर्षक आइडिया, संयत भावनात्मक संस्पर्श और नयायन है, वहीं अनेक कविताओं में प्रचलित जुमलों सी अगम्भीरता है। कवि के रूप में पंकज चतुर्वेदी, दरअसल, आधुनिक कविता में प्रचलित ÷ काव्यात्मकता' से परहेज सा करते हैं और कविता के भीतर कथात्मकता और वैचारिक विमर्श का जो संसार रचते हैं, उनमें से अनेक कविताएं कविता होने की शर्त को पूरा नहीं करतीं। ÷ शिमला में', ÷ अखण्ड मानस पाठ', ÷ जबलपुर में क्या है', ÷ रकीब' जैसी कविताओं में एक किस्म का अधबनापन, हड़बड़ी और जल्दबाजी दिखायी देती है। बावजूद इसके, उनका यह संग्रह उनके काव्य विकास का अगला सोपान तो है ही, जो उन्हें महत्वपूर्ण युवा कवि के रूप में स्थापित भी करता है।

राजकुमार केशवानी पेशे से पत्रकार हैं। परन्तु , उनकी कविता पर उनके पत्रकार होने की प्रायः कोई छाप नहीं है। हिन्दी में रघुवीर सहाय और विष्णु खरे जैसे पत्रकारों द्वारा रची गयी विशिष्ट कविता दुनिया से उनकी कविताएं अनेक अथोर्ं में भिन्न हैं। न तो उनके वर्णन पर ठोस अखबारी तथ्यात्मकता हावी है और न उनके कथन में वैसी निर्वेयक्तिकता है। उनकी कविताओं में सपाटबयानी को अपनाने की भी कोशिश नहीं है। राजकुमार केशवानी के पहले काव्य संग्रह बाकी बचें जो की कविताएं पढ़ते हुएं हमारा ध्यान सबसे पहले इस ओर जाता है कि कवि ने कविताओं को ÷ काव्यात्मक भंगिमा ' में ही प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यह कविता की सहज प्रकृति पर विश्वास रखने वाले कवि की कविताएं हैं, जहां कविता मूलतः संवेदना का ही रूपांतर है। जीवन के ज्ञानात्मक सन्दभोर्ं से, उन सन्दभोर्ं से भी, जिन्हें वे अपनी पत्रकारिता में प्रौढ़ता से आजमाते होंगे, उनसे भी वे प्रायः कविता को बचा ले जाते हैं। ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान के यौगिक के मुक्तिबोधीय, एक हद तक आधुनिक प्रारूप से एक दूरी यहां सप्रयास दिखायी देती है। राजकुमार केशवानी वृहद वैश्विक विमशोर्ं और बड़ी सामाजिक चिन्ताओं की ओर जाने की बजाय अपने आसपास के जीवन के माध्यम से मनुष्य की सहज कविता रचते हैं। आधुनिक जीवन प्रणाली और लोभ लाभ की संस्कृति में ईमानदारी और सच्चाई की पराजय, आसपास के जीवन में पैदा होने वाली सामाजिक क्रूरताएं उनकी कविताओं में पूरी संवेदना के साथ मानवीय दंश की तरह उभरती हैं। क्रूर और अमानवीय होती दुनिया में मानवीयता, कोमलता, संवेदनशीलता, सद्भाव और सदिच्छाओं को बचा पाने की चिन्ता कवि की मूल चिन्ता है, जिसमें जीवन के प्रति सहज भावात्मक और संवेदनशील प्रतिक्रियाएं हैं। यह अकारण नहीं है कि कविताओं में स्मृतियां काफी जगह घेरती हैं। ÷ परछाइयां' कविता में कवि इसका कारण स्पष्ट करता हैः

नहीं जानता क्या है आगे

मगर पता है

क्या था पीछे

इसीलिए बार बार

दौड़ जाता हूं

दूर दूर तक पीछे

स्मृतियों का भरपूर इस्तेमाल करने और अपने आसपास के जीवन से काव्य विषय प्राप्त करने के कारण , अक्सर ही ये कविताएं पढ़ते हुए हम अनायास ही ÷ मैं' से टकरा जाते हैं जो हमारा हाथ पकड़ कर उस दुनिया की ओर ले जाता है, जो अनेक अथोर्ं में हमारी भी दुनिया है। ये कविताएं अपने पाठकों से एक साझा कायम कर लेती हैं। ÷ मैं' के माध्यम से ही कवि ने कविताओं में कहानियां रची हैं, इसीलिए इनमें एक आत्मकथात्कमता, वैयक्तिक रागात्मकता दीख पड़ती है। स्पष्ट है कि संग्रह की अनेक कविताओं में एक कथात्मकता मौजूद है। प्रायः ये खास चरित्रों को लेकर लिखी गयी हैं, जो वास्तविक जिन्दगी में दूर होने के बावजूद स्मृतियों में जीवित हैं। महत्वपूर्ण यह है कि स्मृति की कविताएं होने के बावजूद ये स्मृति जीविता की कविताएं नहीं हैं, बल्कि जीवन की क्रूरताओं का बयान करने के लिए स्मृति का सकारात्मक उपयोग करती हैं। इनमें कवि स्मृतियों के बहाने ठहरे हुए समाज से टकराता है और समाज के क्रूर रवैये का खुलासा करता है। ÷ लत्तू पागल और मैं: एक असमाप्त कहानी' का लत्तू उर्फ लतीफ अहमद कवि के बचपन का मित्र था जो बेसहारा और फटेहाल होने के कारण निम्नमध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों का मित्र होने की हैसियत खो चुका था। जीवन की विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि लत्तू को पागल कहने वाली दुनिया, संवेदनशील होने के कारण उसके मित्र कवि को पागल कहने से नहीं चूकती। पंकज चतुर्वेदी के गंवई चरित्रों की तरह निम्नवर्गीय समाज के ये चरित्र कवि की कविता के आख्यान को एक अलग चेहरा देते हैं। ÷ मुन्ने भाई रांग साइड' कविता एक विलक्षण ओर ठेठ देशज ( भोपाली) चरित्र मुन्ने भाई को उभारती है, जिसे रांग साइड में चलने के कारण ÷ रांग साइड' कह कर पुकारा जाने लगता है, मगर जो दुनिया में रांग साइड चलने वालों की बखिया उधेड़ने से नहीं चूकताः

भाई मियां / सारी दुनिया चल रही है रांग साइड / मगर बस मानते नहीं

हैं / खुद को रांग साइड / अब जरा देखिए बुश को / इराक में घुस

गये / रांग साइड / मुशर्रफ को देखिए / कारगिल में घुस गये / रांग साइड /

आडवाणी को देखिए / अयोध्या में घुस गये / रांग साइड / मोदी को

देखिए / बेकरी में घुस गये / रांग साइड

जन प्रतिक्रिया के माध्यम से खेल खेल में गम्भीर राजनैतिक व्यंग्य करने की यह अदा विष्णु नागर की कविताओं से मिलने लगती है। कवि का यह टोन ÷ गली का कुत्ता' जैसी कविताओं में भी मौजूदहै।

÷ कल्लू नाई' जीवन में लोगों के उनकी अपनी जगह से निर्वासित होते जाने और समाज में बढ़ रही क्रूर स्मृतिहीनता का रूपक गढ़ती है। कभी जीवन का अपरिहार्य अंग रहे कल्लू नाई के बारे में, बरसों बाद उसकी अपनी जगह जाकर पूछने पर लोग चौंक कर पूछते हैं - कौन था कल्लू नाई? स्मृतियों में मौजूद जीवन को आज के जीवन के समक्ष रख कर कवि विकास की दिशा के प्रति एक आलोचनात्मक रवैया सामने रखता है। ठेठ जीवन से अपने नामों के साथ कविता तक चले आते ऐसे अनेक चरित्र राजकुमार केशवानी की कविता को एक चेहरा देते हेैं। इनसे निम्नवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय लोगों और साधारण जिन्दगी से कवि की गहरी संलग्नता और अपनापे का भी सबूत मिलता है। हम देखते हैं कि इनके बहाने कवि व्यापक सामाजिक समस्याओं और विसंगतियों का खुलासा करता है। ये चरित्र हमें भगवत रावत की कविताओं में आये अनेक चरित्रों की भी याद दिलाते हैं।

संग्रह की अनेक कविताओं में मध्यवर्गीय व्यक्ति की पीड़ाओं का अंकन है। वह एक ऐसी दुनिया का नागरिक है ÷ जहां लगी हैं कैचियां / चारों तरफ / पर कतरने के लिए।' पर यहीं दुनिया में कवि की आस्था का केन्द्र वह बच्चा भी है जो मुसकुराता है - हर शाम पंख देने के लिए। इस बच्चे का संगाती कवि का अपना बेटा है जो उसे सर्वसमर्थ शक्तिवान मानता है पर वास्तविकता यह है कि ÷ उसके पापा / उतने ही असमर्थ / उतने ही लाचार हैं / जितना सड़क के इस पार के बाकी सारे लोग।'

कवि सड़क के इस पार के जनों और उस पार के जनों का विभाजन संकेत में खूबसूरती से सामने रखता है। ÷ बच्चों देखो' कविता इस विभाजन को पूरी विडम्बना के साथ उभारती है - ÷ देखो / बच्चों देखो / ये सब जो घूमते हैं चमचमाती कारों में / ये सब तुम्हारे भाई बहन हैं / उधर देखो / वे जो खूबसूरत बंगले / वे जो बहुमंजिला इमारते हैं / ये सब भी तुम्हारे ही भाइयों की हैं / सोचो / तुम कितने खुशनसीब हो / तुम्हारे भाइयों के पास क्या नहीं है?' । हम देखते हैं कि विडम्बना बोध कवि की गहरी शक्ति है। ÷ चरखील' एक महत्वपूर्ण कविता है जो व्यवस्था में इन बच्चों के परिजनों अर्थात साधारण मनुष्य की स्थिति का विडम्बनापूर्ण रूपक गढ़ती है -

पतंग उड़ाना नहीं जानता

मांजा सूतना नहीं जानता

नहीं जानता

लड़ाना पेंच

काटना पतंग औरों की

 

इसी वजह से

हर बार

मेरे हाथों में

थमा दी जाती है बस चरखील

जो होती रहती है लगातार खाली

मेरे हाथों में

जबकि किसी और के हाथ

उड़ा रहे होते हैं पतंग

वर्ग विभाजित समाज में साधारण मनुष्यों के प्रति कवि की पक्षधरता स्पष्ट है और मध्यवर्ग और निम्नवर्ग की एकता की आकांक्षा भी। ÷ नाम' कविता भी इस वर्ग अन्तराल का एक और सार्थक चित्र खींचती है। ÷ पर क्या करूं', ÷ जब वह सच जानेगा', ÷ वे बोलते कम हैं', जैसी कविताओं में आज के जीवन की कई विडम्बनाएं अभिव्यक्त हुई हैं तो ÷ सरकारी गरीब', ÷ महानायक का सपना', ÷ आय', ÷ टुकड़ों टुकड़ों में मैं', ÷ विषम परिस्थितियों के बीच', ÷ कैसा लगता है', ÷ ताजा खबर' जैसी अनेक कविताएं समकालीन जीवन की अनेक विसंगतियों और गुत्थियों को सामने लाती हैं। इनमें शासन और व्यवस्था से लेकर विस्थापन और गरीबी, भूख छुपाने और मीडिया के व्यवसायी चरित्र जैसे विषयों को पूरी गम्भीरता से उठाया गया है। ÷ भदभदे के गेट' जैसी भोपाल के जीवन की रंगत पेश करने वाली कविताएं यहां हैं। समन्वयी संस्कृति के शहर का प्रभाव यूं भी है कि अनेक अल्पसंख्यक चरित्र यहां कविताओं की दुनिया में पूरी जगह लेकर आये हैं।

कहना न होगा कि राजकुमार केशवानी अपने इस संग्रह में अपनी साधारणता से पाठकों को असाधारण रूप से अपना बना लेते हैं। कविता को अनावश्यक गम्भीर और बौद्धिक बनाये बिना, शिल्प और भाषा की सहजता और अनायासता से यह प्रभाव निर्मित करते हैं। वे प्रायः कविता के शास्त्र और प्रचलित शर्तों की परवाह किये बिना ऐसी कविताएं रचते हैं जो सहज ही पाठक को अपना बना लेती हैं। पाठक से साझा कायम करने का यह अदभुत गुण ठीक वैसा ही है जैसे भगवत रावत की कविताओं का।

अनिरुद्ध उमट मूलतः कहानियां और उपन्यास लिखते हैं। परन्तु , उनकी उतनी ही दिलचस्पी कविता में भी है। कह गया जो आता हूं अभी उनका पहला प्रकाशित काव्य संग्रह है। कथा में रुचि के कारण उनकी कविताओं की संरचना पर गहरा असर देखा जा सकता है। उनकी कविताओं में ÷ आख्यान' की मौजूदगी ने कविता की प्रकृति को गहरे तक प्रभावित किया है, परन्तु वे कविताओं में जो ÷ आख्यान' रचते हैं उसमें ÷ कथा रस' से गहरा परहेज दिखायी देता है और साथ ही ÷ काव्यात्मकता' की गहरी जिद भी। यह इसके बावजूद है कि ऊपरी तौर पर देखने पर उनकी कविताओं में कथात्मक संरचना बार बार दिखायी देती है। अनेक कविताओं में ÷ पूरी कहानियां' दिखायी पड़ती हैं - बिना ब्योरों और आन्तरिक रेखाओं के। उनकी कविता का आख्यान एक तरह से यथार्थवादी कथाहीनता का आख्यान है, जिसमें ÷ फंतासी' और ÷ लोककथात्मकता' के प्रति गहरा रुझान भी दिखायी देता है। उसका भी वे पूरा इस्तेमाल नहीं करते। वे लोककथाओं से एक वैचित्रय, अति प्राकृतता लेते हैं। प्रकृति अंगों और मानवेतर जीवों का मनुष्य की तरह मौजूद होना, यह भी उसी परम्परा से ग्रहण किया गया है। घटनाओं को उन्होंने तर्कसम्मत और क्रमबद्ध नहीं रहने दिया है। कविताओं में मौजूद दुनिया हमारे आसपास की है। परन्तु हमारे निकट के जीवन को भी कविता में लाते हुए उसके ÷ नैकट्य' को इतनी सावधानी से अलगा दिया गया है कि वह निर्वैयक्तिकता की सीमा को न छुए, बल्कि ÷ निजी' की सीमा में ही बना रहे।

इन कविताओं में कवि यथार्थ के साथ एक सच्चे और परिपक्व कवि की तरह खेलता है। वास्तविक और अतिपरिचित को उसकी परिचित छवि से बाहर लाकर उलटपुलट कर अवास्तविक अपरिचित सा बना दिया गया है। यथार्थ से कवि का यह खेल अनेक बार यथार्थ का चेहरा धुधंला देता है। शायद कवि के रूप में वह यही करना भी चाहता है। यथार्थ की पहचान मूलतः सुनिश्चित क्रमबद्धता में होती है। कवि ने कभी तो क्रम बदल दिये हैं या उनकी बीच की किन्हीं कड़ियों को गायब कर दिया है। एक दृश्य और दूसरे दृश्य, एक चित्र और दूसरे चित्र के बीच की सम्बन्ध रेखा छिपाने से या न दिखाने से यह सम्भव हुआ है। कविताओं में वस्तुओं में वस्तुएं अपनी मूल पहचान में मौजूद नहीं हैं, वे उन्हें खोकर या कम करके यहां आयी हैं। कवि अपने आसपास के जीवन के लिए एक कथात्मक रूपक रचता है, जो गहरी काव्यात्मकता की तलाश से उपजा है। एक सपनीला जादुई संसार कम प्रकाश में यहां उभरता है। इसीलिए इन कविताओं के आस्वाद के रास्ते में अनेक बाधाएं हैं। ये कविताएं एक खास तरह की कविता के लिए अनुकूलित पाठकों के समक्ष सार्थक चुनौती प्रस्तुत करती हैं। सामान्य अथोर्ं में ये कलावादी रुझान की कविताएं हैं जो अनेक बार कलात्मक उलटबांसियां सी भी मालूम पड़तीहैं।

अनिरुद्ध उमट की इन कविताओं में गहरा अवसाद दिखायी देता है। यह एक त्रासद दुनिया है। यहां एक बच्चा जन्म लेने से इन्कार करता है। यहां पृथ्वी पर निरीह प्राणियों की हत्या का अभियोग लगा है और वह किसी गीले कागज सी थरथरा रही थी। यहां ÷ दीमक ने / उस डायरी में डेरा डाला / जहां अजन्मे शिशु की किलकारी दर्ज थी।' यहां ÷ पृथ्वी के गर्भ में एक चीख मरोड़ खा रही थाी।' इन कविताओं की केन्द्रीय विषयवस्तु ÷ अनुपस्थिति' है। कुएं में जल की, प्रेम के वक्त एक पक्ष की, प्रेम के आलम्बनों में प्रेम की - अनुपस्थिति के कुछ रूपक मात्र हैं। यहां ÷ दूसरे के भीतर / मर चुका था / दूसरा।' सपने लापता थे। यह अकारण नहीं है कि कविताओं में निषेधात्मक वाक्यों की बहुतायत है और ÷ नहीं' शब्द का खूब इस्तेमाल हुआ है। लापता, ढूंढना, अन्तिम क्रिया, तर्पण, धोखा, घात, जाना, क्षरण, भटकन, सूनापन, गूंगापन, अन्धा, हारा जैसे शब्द जो त्रासदी रचते हैं, वह कविताओं में सभी जगहों पर मौजूद है। ÷ अनुपस्थिति' अपने चरम रूप में ÷ मृत्यु' है - जो इन कविताओं में कई रूपों में दिखायी देती है। अनुपस्थिति इतनी करीबी और मृत्यु इतनी पुनरावर्तिक है, कि कवि ÷ दोस्त के पिता' और ÷ मौत की घड़ी' ÷ आधी बाजी' जैसी कविताओं में उससे एक खेल खेलता हुआ भी मालूम पड़ता है। अनिरुद्ध उमट की कविता की खूबियां ÷ सजा' जैसी कविता में देखी जा सकती हैं:

ईश्वर की अदालत में

एक नदी गिड़गिड़ा रही थी

कोई तालाब हाथ बांधे

बैठा था उकडूं

 

समन्दर उम्मीद हारे खड़े थे

पर्वत अनमने से पसर गये थे

बावड़ियां ऊंघ रही थीं

 

एक एक कर सभी को थी प्रतीक्षा

फैसले की

निश्चित सजा की

 

उधर ईश्वर प्यास के मारे था बेहाल

कह भी नहीं पा रहा था

कोई भी उठे मेरे कण्ठ में बैठ जाये

 

मैं प्यासा नहीं मरना चाहता

स्पष्ट है कि कविता में ाासदी दोतरफा है। इस कविता में हमारी जिन्दगी का एक रूपक फैण्टसी के सहारे गढ़ा गया है जिसमें पर्याप्त लोककथात्मकता है। संग्रह में अनेक ऐसी कविताएं हैं जो अपनी सघन संवेदना और कलात्मक संयम से हमें अचरज में डालती हैं। इनमें ÷ नवीन सागर के जाने और हमारे रह जाने के नाम', ÷ आधी बाजी', ÷ अलीमियां', ÷ पांव भर रखने की जगह', ÷ वसीयत' और ÷ कपूर गन्ध' जैसी कविताएं बतलाती हैं कि कवि रूप में अनिरुद्ध उमट एक नया रास्ता खोजने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनकी अगली कविताओं के प्रति जिज्ञासा जगाती हैं।

संशयात्माः ज्ञानेन्द्रपति , प्रकाशकः राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्यः 295/-

हंसने की तरह रोनाः विष्णु नागर , प्रकाशकः मेधा बुक्स, नयी दिल्ली, मूल्यः 50/-

एक ही चेहराः पंकज चतुर्वेदी , प्रकाशकः वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्यः 150/-

बाकी बचें जोः राजकुमार केसवानी , प्रकाशकः शिल्पायन, नयी दिल्ली, मूल्यः 110/-

कह गया जो आता हूं अभीः अनिरुद्ध उमट , प्रकाशकः वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्यः 125/-

 


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