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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

दलित अस्मिता और एजेण्डा
÷ जाति विनाश' का

सुवीरा जायसवाल

हिन्दू समाज में ÷ अछूत' मानी जाने वाली जातियों के लिए सम्भवतः सबसे पहले उन्नीसवी सदी में जोतिराव फुले ने ÷ दलित' शब्द का प्रयोग किया। उन्हें जाति विरोधी आन्दोलनों का अग्रदूत कहा जा सकता है। 1840 में उन्होंने मुम्बई में खास तौर पर ÷ अछूतों' के लिए एक स्कूल खोला और 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ÷ शूद्र' और ÷ अतिशूद्र' कही जाने वाली जातियों को अपने मानवाधिकारों के प्रति जागरूक बनाना और उन्हें ब्राह्मण धर्मशास्त्राों में प्रतिपादित विचारधारा के प्रभाव से मुक्त कराना था। महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत के प्रदेशों में विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों वश, जिनका विवेचन हमने अन्यत्र किया है, पूर्व मध्य युग से ही वर्ण जाति व्यवस्था का स्वरूप उत्तर भारत से कुछ भिन्न था क्योंकि वहां ÷ क्षत्रिाय' अथवा ÷ वैश्य' के रूप में अपनी पहचान सर्वसम्मत रूप से स्थापित करने वाले जाति समुदायों का अभाव था और मोटे तौर पर वर्णव्यवस्थित समाज की तीन कोटियां थीं, शीर्षस्थ ब्राह्मण जातियां, उनके नीचे ÷ शूद्र' कहीं जानी वाली फिर भी अपेक्षाकृत सम्पन्न और शुद्ध मानी जाने वाली जातियां, जिनमें एक ओर बहुसंख्य कृषक मराठा जाति थी जिसके हाथ में अधिकांश जमीन थी और जो सत्राहवीं अठारहवीं शताब्दियों में राजसत्ता से गौरवान्वित रही थी, तो दूसरे छोर पर माली, गावली, ढांगर कुम्हार आदि पिछड़ी जातियां थीं। इनके नीचे ÷ अतिशूद्रों' की श्रेणियां थीं जिनमें महार प्रमुख थे किन्तु इनके अतिरिक्त चम्मार ( चमार) मांग आदि भी थे जिनकी संख्या कुछ कम न थी। इस श्रेणीबद्ध समाज में जातियों का पदानुक्रम उनके स्वभावात्मक रूप से शुचित अथवा अशुचित होने के ब्राह्मणीय सिद्धान्त पर आधारित था, जो अवर जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न को औचित्य प्रदान करता था। उत्पीड़न के तर्क और ब्राह्मणीय भावबोध की जकड़ में उत्पीड़क और उत्पीड़ित सभी जातियां थीं। परन्तु जहां ऊंची जातियां दुनियावी मामलों में आपस में प्रतिद्वन्द्विता रखते हुए भी नीची जातियों के निदोहन के मामले में अपने विशेषाधिकारों के लिए एकजुट हो जाती थीं, निचले तबके की जातियों की आत्मचेतना बंटी हुई थी और शिक्षा के अभाव में वे आसानी से सभी प्रकार के शोषण का शिकार हो रही थीं। ब्रिटिश शासन में उनके शिक्षित होने पर कोई सैद्धान्तिक बाधा न होने पर भी वस्तुस्थिति यह थी कि 1857 में धारवाड़ ( कर्नाटक) में एक महार लड़के ने सरकारी स्कूल में दाखिले के लिए आवेदन किया परन्तु ऊंची जाति के लोगों के प्रबल विरोध के कारण सरकार से उसे अनुमति नहीं मिली।2 ऐसी परिस्थितियों में फुले ने जाति व्यवस्था का जबर्दस्त विरोध किया और उसे ÷ गुलामगीरी' कहा। इसी नाम से उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने बतलाया कि किस प्रकार धोखाधड़ी और बल का प्रयोग कर ब्राह्मणों ने इस व्यवस्था को भारत के मूल निवासियों पर लागू कर दिया था।

उन्नीसवी सदी में प्राच्पविदों में यह परिकल्पना लगभग सर्वसम्मत थी कि आयोर्ं की एक समांगी नस्ल यूरोपीय स्टेपी प्रदेश से अथवा काकेशस से पश्चिमी एशिया होते हुए भारत आयी। उसने यहां के मूल निवासियों को , जिन्हें ऋग्वेद में दास एवं दस्यु कहा गया है, हराया और वर्ण व्यवस्था में उन्हें ÷ शूद्र' का दर्जा दिया। इस धारणा के मूल में वह महत्वपूर्ण भाषा वैज्ञानिक अनुसन्धान था जिससे यह प्रमाणित हो गया था कि संस्कृत, लैटिन और ग्रीक भाषाओं के क्रिया मूलों, व्याकरण एवं शब्द भण्डार में इतनी समानता है कि वह आकस्मिक नहीं हो सकती। इन भाषाओं के बोलने वालों के पूर्वज एक ही कौम के रहे होंगे। भाषा की एकता को नस्ल की एकता भी मान लिया गया। फ्रीडिश मैक्समूलर (1823-1900) ने राजा राम मोहन राय की इंग्लैण्ड की यात्राा का उल्लेख करते हुए बड़ी भावुकता से कहा -

÷÷ अपने आर्य भाइयों से विचार विमर्श करने के लिए पूर्व से पश्चिम आने वालों में राम मोहन राय सर्वप्रथम थे... जिससे हमें एक बार फिर उस प्राचीन भाईचारे का एक अहसास होता है जो सम्पूर्ण आर्य नस्ल को एक सूत्रा में बांधता है, प्रेरणा देता है...।''3

यद्यपि बाद में मैक्समूलर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्य नस्ल की अवधारणा बिल्कुल गलत है, ÷ आर्य' भाषा का सूचक है किसी विशिष्ट प्रजाति का नहीं, परन्तु तत्कालीन वातावरण में पश्चिमी भारतविद् चाहे वे मिशनरी रहे हों या औपनिवेशिक शासक, अन्वेषक या प्राच्यविद्याविद्, सभी मनीषी भाषाओं की सभ्यता को नस्ल की सभ्यता का लक्षण मान कर चल रहे थे और हिन्दू समाज को आर्य और अनार्य नस्लों के संघर्ष और सम्मिश्रण के प्रसंग से ही परिभाषित कर रहे थे। किस प्रकार विभिन्न उद्देश्यों से प्रेरित अध्ययन एक ही निष्कर्ष पर पहुंच रहे थे, इसका काफी विवेचन हो चुका है, परन्तु इस सिद्धान्त का भारतीय मनीषियों पर भी काफी प्रभाव पड़ा था।

1877 में कलकत्ता में आयोजित एक सभा में ब्रह्मसमाजी नेता केशव चन्द्र सेन (1834-84) ने भारत में अंग्रेजों के आगमन को आर्य नस्ल के दो भिन्न परिवारों के वंशजों का, बिछुड़े हुए बन्धुओं का, पुनर्मिलन बताया।4 बालगंगाधर तिलक (1856-1920) ब्रिटिश शासन के कटु आलोचक थे और हिन्दू धार्मिक परम्पराओं के कट्टे समर्थक। फिर भी उनका विचार था कि गौरवर्णी आर्य आर्कटिक प्रदेश से भारत आये और ब्राह्मण तथा ऊंची जाति के हिन्दू उन्हीं की सन्तान हैं। यद्यपि उन्होंने गणेशोत्सव द्वारा महाराष्ट्र में सभी हिन्दुओं को एकजुट करने का प्रयत्न किया, वे वेद और ब्राह्मण को सर्वोपरि मानते थे और परम्परानुसार जाति प्रथा ही नहीं बल्कि बाल विवाह तक का समर्थन करने के लिए उद्यत थे।

इस प्रकार चाहे बंगाल के ब्राह्मण नेता केशव चन्द्र सेन हों या महाराष्ट्र के बालगंगाधर तिलक - शुरुआती दौर में ऊंची जाति के मनीषियों ने आयोर्ं के नस्लवादी सिद्धान्त को गर्व से अपनाया। जोतिबा फुले ने इसी सिद्धान्त को उलट कर दलितों के अधिकारों की लड़ाई के लिए महत्वपूर्ण औजार बना दिया। 1856 में बिशप काल्डवेल ने गहन अनुसन्धान कर द्रविड़भाषाशार पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने यह सफलतापूर्वक सिद्ध कर दिया कि भाषाविज्ञान की दृष्टि से दक्षिण भारत की भाषाएं संस्कृत से नहीं बल्कि एक अन्य पुरातन द्रविड़ भाषा से निकली हैं। तत्कालीन प्रचलित अवधारणा के अनुसार उन्होंने भी भाषा को नस्ल का सूचक माना और कहा कि दक्षिण भारत के ब्राह्मण उत्तर से आये हुए आप्रवासी हैं और यद्यपि ब्राह्मण धर्मशास्त्राकारों ने द्रविड़ जाति के लोगों को ÷ पतित क्षत्रिाय' माना है, वस्तुतः आयोर्ं के अलावा और कोई द्विज हो ही नहीं सकता था, इस लिए अधिसंख्य द्रविड़ों को ब्राह्मणों ने शूद्र का दर्जा ही दिया। फुले ने आर्य द्रविड़ की द्वन्द्वात्मक अवधारणा को आधार बनाया और कहा कि शूद्र और अतिशूद्र कही जाने वाली जातियां दक्षिण भारत के मूल निवासियों की सन्तान हैं। ब्राह्मणों ने बाहर से आकर हिंसा, छलकपट आदि सभी हथकण्डों का प्रयोग कर मूल निवासियों की जमीन हड़प ली। इसलिए ब्राह्मणों का भूमि पर कोई नैतिक, वैध, अधिकार नहीं है। जाति व्यवस्था भी सामाजिक स्तरीकरण की ब्राह्मणों की चाल है। दलितों को ब्राह्मणों के प्रभाव से अपने आप को मुक्त करना होगा और सामाजिक परिवर्तन के लिए दलितों का शिक्षित होना बहुत जरूरी है।

दलित अस्मिता के उभरने में उनके मूल निवासी होने का दावा बहुत प्रभावशाली रहा। दक्षिण भारत में अनेक दलित जातियों ने अपनी पहचान आदि द्रविड़ , आदि कर्नाटक और आदि आन्ध्र के रूप में अभिज्ञापित करने की कोशिश की और 1931 की सेन्सस रिपोर्टों में कुछ की गणना भी इन्हीं नामों से हुई। उत्तर भारत में बीसवीं शती के पूर्वार्ध में पंजाब में आद्धर्म का आन्दोलन चला जो न केवल तथाकथित अछूतों को भारत का मूल निवासी मानता था बल्कि इस बात का प्रचार कर रहा था कि उनका धर्म हिन्दू धर्म से अलग है और वह अपने मूल और शुद्ध रूप में सन्त रविदास के उपदेशों में पुनः प्रसारित हुआ है। आर्यपूर्व मूल निवासी होने की धारणा आज भी अनेक दलित लेखकों और विचारकों में विद्यमान है, परन्तु दलितों के सर्वप्रमुख नेता बाबा साहब आम्बेडकर ने इसे पूरी तरह खारिज कर दियाथा।

डा. भीमराव आम्बेडकर केवल दलितों के सर्वप्रमुख राजनेता ही नहीं , मौलिक चिन्तक तथा असाधारण विद्वान थे जिन्होंने हिन्दू समाज की व्याधियों और दलितों की समस्या पर बहुत कुछ लिखा, जिनमें तीन कृतियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 1935 में लाहौर के जातपात तोड़क मण्डल ने उन्हें अपने वार्षिक सम्मेलन का अध्यक्ष चुना और भाषण देने के लिए निमन्त्रिात किया। परन्तु भाषण की प्रति पढ़ने के बाद मण्डल ने कई अंशों पर आपत्ति जतायी और आम्बेडकर से उन अंशों को निकाल देने का अनुरोध किया। आम्बेडकर के मना करने पर अधिवेशन ही रद्द कर दिया गया। भाषण की आलोचना महात्मा गांधी ने भी हरिजन में की थी। अतः 1936 में आम्बेडकर ने स्वयं ही भाषण को महात्मा गांधी को दिये गये प्रत्युत्तर के साथ Annihilation of Caste with a Reply to Mahatma Gandhi के नाम से प्रकाशित कर दिया। मुल्कराज आनन्द के शब्दों में यह छोटी सी पुस्तिका किसी भी निरपेक्ष पाठक को ÷ अस्पृश्यों की गीता' प्रतीत होगी। मधुलिमए ने इसकी तुलना कार्ल मार्क्स के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से कीहै।

इसके अतिरिक्त आम्बेडकर की Who were the Sudras 1946 में और The Untouchable 1948 में प्रकाशित हुईं। इन कृतियों में लेखक के गहन अध्ययन के साथ साथ गहरी संवेदना, दलितों की पीड़ा और हिन्दू धर्म में उनके उत्पीड़न के प्रति आक्रोश भी स्पष्टतः मुखरित हुए हैं। यद्यपि प्राचीन काल के आधिकारिक सुप्रतिष्ठित इतिहास लेखन में आम्बेडकर की ÷ शूद्र' और अछूत जातियों की उत्पत्ति विषयक स्थापनाएं आसानी से खारिज कर दी गयी हैं,4 उन्होंने जाति व्यवस्था के अनेक ऐसे पक्षों की ओर ध्यान आकर्षित किया जो आज भी अर्थपूर्ण और प्रासंगिक हैं।

आम्बेडकर ने जातियों के उद्गम की नस्लवादी व्याख्या का जम कर खण्डन किया। सर हर्बट रिजले ने बीसवीं शती के आरम्भ में अपने मानवमितिकीय (anthrometric) परीक्षणों को आधार बना कर यह मत प्रतिपादित किया था कि आर्य विजेता अपनी नस्ल की शुद्धता कायम रखना चाहते थे और पराजित आदिवासी अनायोर्ं को हेय दृष्टि से देखते थे। फिर भी सम्मिश्रण एकदम रोका नहीं जा सका और जिस समुदाय में जितना अधिक अनार्य रक्त का अनुपात रहा उसे समाज में उतना ही नीचा दर्जा मिला। इस मत के अनुसार शीर्षस्थ ब्राहमण अपने रक्त की शुद्धता सुरक्षित रख सके थे और निचली जातियां मुख्य रूप से अनार्य आदिवासियों की सन्तान थीं। यह मत काफी प्रभावशाली रहा है। परन्तु आम्बेडकर ने प्रोफेसर जी.एस.धुर्ऐ की पुस्तक ÷ कास्ट एण्ड रेस इन इण्डिया' को उद्धृत करते हुए दिखलाया5 कि कई प्रदेशों में मानवमितिकीय अभिसूचकों के अनुसार ब्राह्मणों में और वहां की कुछ अछूत मानी जाने वाली जातियों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। वस्तुतः भारत में आयी प्रजातियों का रक्त सम्मिश्रण जाति प्रथा के उदय से बहुत पहले प्राक्‌ऐतिहासिक काल में ही हो चुका था। आम्बेडकर ने कई स्थानों पर जोर देकर कहा है कि आर्य कोई नस्ल न थी बल्कि वह ऐसा जनसमूह था जिसमें सांस्कृतिक एकता थी और आर्य संस्कृति के हितों की रक्षा के तार ही उन्हें एक दूसरे से जोड़े रहते थे।

परन्तु आम्बेडकर की भारतीय इतिहास सम्बन्धी अवधारणाओं में काफी अन्तर्विरोध भी देखा जा सकता है। एक ओर तो उन्होंने ऋग्वेद में वर्णित आयोर्ं का दासों और दस्युओं से संघर्ष , दो नस्लों का टकराव नहीं बल्कि दो पृथक धमोर्ं के अनुयाइयों का टकराव बतलाया और कहा कि ऋग्वेद में आर्य शब्द का नस्ल के अर्थ में कहीं प्रयोग नहीं हुआ है। दूसरी ओर उसी पुस्तक में उन्होंने ऋग्वेदिक आयोर्ं और शूद्रों को दो भिन्न नस्लों के आर्य माना और शूद्रों का सम्बन्ध अथर्ववेद से जोड़ा। ऋग्वेद में उल्लिखित दशराज युद्ध के नायक सुदास को खींचतान कर शूद्र ठहराने की कोशिश की जबकि ऋग्वेद में प्रक्षिप्त पुरुष सूक्त को छोड़ शूद्रों का कोई उल्लेख नहीं है। शूद्रों की उत्पत्ति पर लिखी गयी पुस्तक का मुख्य ध्येय उनका प्राचीन गौरवमय अतीत और ब्राह्मणों के षड़यन्त्रा से उनका पतन सिद्ध करना ही प्रतीत होता है। यद्यपि वे यह भी कहते हैं कि प्राचीन काल की हिन्द आर्य नस्ल की शूद्र जाति से आज की शूद्र जातियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। शूद्र नाम की एक आर्य जनजाति, जिसका उल्लेख यूनानी इतिहासकारों के विवरण तथा पतंजलि के महाभाष्य में हुआ है, पहले क्षत्रिाय वर्ण की थी। परन्तु उनका ब्राह्मणों से संघर्ष हुआ, फलस्वरूप ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन करना बन्द कर दिया और उन्हें वेदों के पठन पाठन से वंचित कर दिया। शूद्रों पर अनेक कठोर प्रतिबन्ध थोप दिये गये और उनकी अवस्था इतनी हीन हो गयी कि ÷ शूद्र' निम्न वर्ग का पर्याय बन गया। ब्राह्मण शास्त्राकारों ने जो सामाजिक प्रतिबन्ध द्वेष के कारण मूल शूद्रों पर लगाये थे वे बाद में उन सभी समुदायों पर लागू कर दिये गये जो सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हुए थे, निम्न वर्ग के थे और जिनकी समाज में कोई हैसियत न थी।

डा. आम्बेडकर ने पुस्तक के प्राक्कथन में लिखा है कि यद्यपि वे शूद्र जनों के गैर ब्राह्मण राजनीतिक आन्दोलन से जुड़े हुए हैं , फिर भी शूद्रों के बारे में लिखते समय उन्होंने वस्तुपरक ऐतिहासिक दृष्टि ही अपनायी है। परन्तु इस कृति के मूल्यांकन में विषय के चयन से लेकर उसके विस्तार तक इसे तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक वातावरण तथा डा. अम्बेडकर के जीवन लक्ष्य से अलग कर देखना मुश्किल है। वे ब्राह्मणीय सामाजिक संरचना में सभी शोषित वगोर्ं को एकजुट कर जाति प्रथा को समूल उखाड़ फेंकना चाहते थे। यह भी रोचक है कि आम्बेडकर ने अतिशूद्र कही जाने वाली ÷ अछूत' जातियों की उत्पत्ति को शूद्र वर्ण से नहीं जोड़ा।

अछूतों की उत्पत्ति के बारे में डा. आम्बेडकर का मत और भी जटिल है। पहले तो उन्होंने इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की कि अछूतों की बस्तियां गांव के बाहर क्यों होती हैं और शास्त्राों में उन्हें ÷ अन्त्यवासिन्‌' ( अन्त्यावसायिन्‌) क्यों कहा गया है। इसका समाधान उन्होंने प्रागैतिहासिक काल के कबायली जीवन में ढूंढा। उनके अनुसार आदिम युग में पशुपालक घुमन्तू कबीले कृषि उत्पादक कबीलों की बस्तियों पर लूटपाट के लिए अक्सर आक्रमण कर दिया करते थे। कबीलों में बराबर युद्ध होते रहते थे। हारे हुए कबीलों की बची हुई खण्डित टुकड़ियां, यानी खण्डित जन (broken men) भोजन और आश्रय के लिए दूसरे गांवों की सीमा पर जाकर बस गये। गांव वालों ने उन्हें घुमन्तू कबीलों के आक्रमण से अपनी सुरक्षा के लिए गांव का पहरेदार नियुक्त कर दिया। बाद में इन्हीें खण्डित जन समुदायों के वंशजों ने बौद्ध धर्म अपना लिया। गुप्त युग में जब ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान हुआ तो ब्राहमणों ने द्वेष वश बौद्ध धर्म मानने वाली जातियों को ÷ अस्पृश्य' घोषित कर दिया। इसका एक कारण यह भी था कि ब्राह्मणों ने तो बौद्धों से प्रतिस्पर्धा में अहिंसा की लोकप्रियता देख न केवल यज्ञों में पशुबलि त्याग दी बल्कि मांस खाना भी छोड़ दिया और एक कदम आगे बढ़ कर गाय की पूजा शुरू कर दी तथा पूरी तरह शाकाहारी बन गये। उनका अनुसरण कर अन्य हिन्दुओं ने भी मांसाहार छोड़ दिया और गाय को पूज्य माना। परन्तु बौद्ध धर्म में स्वाभाविक कारणों से मरे हुए पशु का मांस खाने का निषेध नहीं था। अतः बौद्ध मरे हुए गाय बैल का मांस खाते रहे और इसलिए उन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा। वे अस्पृश्य बन गये।

कहा जा सकता है कि ÷ अन्त्यवासिन्‌' और खण्डित जन की व्याख्या में डा. आम्बेडकर ने महार जाति के अनुभवों का सामान्यीकरण कर दिया है। महाराष्ट्र के हर गांव की सीमा पर महारवाड़ा होता था और महारों का परम्परागत काम था गांव के पहरेदार और सन्देशवाहक का काम करना, मरी हुई ढोर को ले जाना, जमीन सम्बन्धी विवादों को निबटाने में गांव के पाटिल की मदद करना आदि। बदले में उन्हें हर किसान से फसल के समय उपज का कुछ भाग और अपने भरण पोषण के लिए छोटी सी जमीन जिसे ÷ वतन, कहा जाता था', मिलता था। आम्बेडकर लिखते हैं कि सम्भवतः इस तरह की प्रथा देश के अन्य भागों में भी रही होगी, परन्तु ऐसे खण्डित जन समुदाय का अस्पृश्य बना दिया जाना ब्राह्मणों का बौद्ध मतावलम्बियों से विद्वेष का परिणाम था और ब्राह्मण और बौद्ध धर्म के संघर्ष और अन्त में भारत से बौद्ध धर्म लगभग लुप्त हो जाने का सही इतिहास लिखा जाना अभी बाकी है।

यह कहना सही है कि अन्य महार नेताओं की तरह आम्बेडकर ने अस्पृश्यों के लिए पहले कभी ऊंची जाति के होने का दावा नहीं किया और न यह कहा कि वे भारत के मूल निवासी थे और आयोर्ं के आने से पहले जमीन के मालिक थे आम्बेडकर ने अस्पृश्यों की उत्पत्ति का जो मिथक गढ़ा वह एलिनोर जेलियट के शब्दों में ÷ अस्पृश्यता का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण था जो अस्पृश्यों को भारतीय दर्शन की एक मुख्यधारा से अभिज्ञापित करता था और उनके अलग निवास स्थान और अपवर्जित पदार्थों के खाने का कारण भी स्पष्ट करता था।7 परन्तु नयी पहचान बनाने के लिए था तो यह एक नया मिथक ही। जन्मजात अस्पृश्यता की समस्या को केवल ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा सृजित धार्मिक परिघटना के रूप में ही निरूपित करने से इसके आर्थिक सामाजिक पहलुओं की अनदेखी हो जाती है और उन विशिष्ट परिस्थितियों का भी सही रेखांकन नहीं होता जिन्होंने इसे जन्म दिया और जीवित रखा। इस कथन8 में काफी सत्य है कि फ्रांसीसी समाजशास्त्राी लुई ड्यूमों जिनकी जातिप्रथा पर प्रसिद्ध पुस्तक9 होमो हाइरार्किकस जिस को ÷ जाति का ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण' कहा गया है और आम्बेडकर के लेखन में असाधारण सादृश्य है। दोनों में ब्राह्मणों द्वारा आविष्कृत शौच और अशौच की परिकल्पना का ही प्राबल्य है जिसका अन्यायपूर्ण चरित्रा आम्बेडकर की रचनाओं में तीव्रता से मुखरित होता है।

परन्तु यह सादृश्य जातिप्रथा के उदय में ब्राह्मणों के अभिकर्तृब्य को जिम्मेदार ठहराने तक और ब्राह्मणीय मूल्यबोधों के वर्चस्व को रेखांकित करने तक ही सीमित है। वस्तुतः ड्यूमों और आम्बेडकर के जाति सम्बन्धी सिद्धान्तों में मूलभूत अन्तर है। ड्यूमों का मत है कि भारतीयों में अशौच की धारणाएं दो प्रकार की हैं , स्थाई अशौच और अस्थाई अशौच, लेकिन दोनों का सार तत्व एक ही है। मानव जीवन की ऐन्द्रिक प्रक्रियाएं या अपवित्रा मानी जाने वाली वस्तुओं से क्षणिक सम्पर्क अस्थाई अशौच की अवस्था उत्पन्न करती है, परन्तु जो अपवित्रा वस्तुओं के सतत सम्पर्क में रहते हैं, वे स्थाई रूप से अशुचित होते हैं। परम्परानुसार पेशे और शिल्प वंशानुगत होते थे, इसलिए जिन समुदायों का पेशा उन्हें लगातार अपवित्रा वस्तुओं के सम्पर्क में रखता था वे स्थाई रूप से अपवित्रा और अस्पृश्य बन गये। इस तरह के विचार महामहोपाध्याय पाण्डुरंग काणे10 और अन्य इतिहासकारों ने भी व्यक्त किये हैं। इसे पूर्वाग्रह ही कहा जाय कि इन मनीषियों का इस बात पर ध्यान नहीं गया कि धर्मशास्त्राों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ÷ अपवित्रा' जातियों के मूल पूर्वजों ने वर्ण नियमों का अतिक्रमण कर प्रतिलोम विवाह किया था अतः उनके वर्णसंकर वंशज जन्म से ही अशुद्ध हो गये और उनके लिए केवल नीच और अतिशूद्र व्यवसाय ही निर्धारित हैं। यानी अतिशूद्र जातियां मूल पूर्वजों के पाप के कारण अधम मानी गयी हैं और अपवित्रा व्यवसायों द्वारा जीवन निर्वाह उनकी मजबूरी है - उनकी अपवित्राता का कारण नहीं।

जो भी हो , डा. आम्बेडकर ने इस सिद्धान्त का कि जातीय अस्पृश्यता समाज में अपवित्रा माने जाने वाले कामों के करने से उत्पन्न हुई है, जोरदार खण्डन किया। उन्होंने नारदस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और मिताक्षरा के उद्धरण देकर दिखलाया कि प्राचीन काल में मल मूत्रा की सफाई, झाडू बुहारी आदि का काम दास करते थे जो किसी भी वर्ण के हो सकते थे परन्तु चातुर्वण्य में निहित असमानता के अनुकूल ब्राह्मण केवल ब्राह्मण का ही दास हो सकता था और अन्य वर्णों के व्यक्ति अनुलोम क्रम में ही अपने वर्ण अथवा अपने से ऊंचे वर्ण के व्यक्ति द्वारा ही दास बनाये जा सकते थे। यदि इस प्रकार दास बनाये गये आयोर्ं को अपवित्रा काम करना होता था तो यह कैसे कहा जा सकता है कि जन्मजात अस्पृश्यता का उदय गन्दा पेशा अपनाने से हुआ।11

आम्बेडकर के इस विवेचन का समर्थन सोलहवीं/सत्राहवीं सदी में संकलित दस्तावेजों के संग्रह ÷ लेखपद्धति' में तेरहवीं सदी के एक दस्तावेज12 से भी मिलता है। इसके अनुसार मही नदी के किनारे बसा हुआ सिरनार नामक गांव अकाल और म्लेच्छों से त्रास्त था। राष्ट्रकूटों ने सारे प्रदेश में लूटपाट मचा रखी थी। ऐसी हालत में उस गांव की सम्पूरी नाम की एक दस वर्षीया राजपूत लड़की जिसे उसके मायके और ससुराल के सभी लोगों ने छोड़ दिया था, भीख मांग कर जीवन यापन करने पर मजबूर हो गयी। अन्त में उसने चाहड़ नाम के एक ( वैश्य) व्यापारी की दासी बनना स्वीकार कर लिया और यह तय हुआ कि वह सभी घरेलू काम जैसे कि पीसना, कूटना, झाडू लगाना, पीने का पानी लाना, गोबर से घर लीपना, विष्ठा फेंकना आदि और बाहरी काम जैसे कि जोताई और खेती से जुड़े अन्य काम, बिना कोई सवाल जवाब किये अनथक रूप से दिन रात हर ऋतु में करेगी और बदले में व्यापारी चाहड़ भोजन और कपड़े देगा। स्पष्टतः स्मृतियों के विधान के बावजूद क्षत्रिायवर्णा राजपूत लड़की को परिस्थितियोंवश एक व्यापारी वैश्य की दासी बनना पड़ा। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिसे पीने का पानी लाने जैसा पवित्रा काम करना था उसे ही विष्ठा फेंकने जैसा अपवित्रा काम भी करना था। आज किसी हिन्दू घर में यह स्वीकार्य नहीं होगा। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शौचाशौच सम्बन्धी धारणाएं प्रागाधुनिक युग में उत्तरोत्तर उग्र होती गयीं। स्मृतियों के अनुसार अशुचित काम करना दासों की विवशता थी, भृतक अथवा कर्मकर ऐसा नहीं करते थे।

चमड़ा अपवित्रा वस्तु माना जाता है। ऐसी धारणा है कि उत्तर भारत की बहुसंख्य चमार जाति , तमिलनाडु की चक्किलियन और आन्ध्रप्रदेश की माडिगा जाति को चमड़े का काम करने के कारण ÷ अस्पृश्य' माना गया, यद्यपि यह निर्विवाद है कि इनका अधिकांश भाग खेतों में ही काम करता चला आ रहा है। उत्तर वैदिक काल में चमड़ा अशुद्ध नहीं माना जाता था और पंचविंश ब्राहमण (XVI 13.13) में यज्ञ के लिए चमड़े के थैलों में भरे हुए दूध के प्रयोग का उल्लेख हुआ है। बौधायन श्रौत सूत्रा (XV 6) में घी, शहद, चावल और भुने हुए अनाजों से भरे चमड़े के सैकड़ों थैलों का जिक्र है। स्पष्ट ही चमड़े को और चर्मकारों को अपवित्रा मानना बाद की कल्पना है। अमरावती के एक प्राकृत अभिलेख13 में एक बौद्ध चर्मकार विधिक का उल्लेख है जिसने एक पूर्णघट और पट्ट का दान किया। उसे उपाध्याय नाग का पुत्रा कहा गया है, जिससे पता चलता है कि वह ब्राह्मण पुत्रा था। यह दान उसने अपने पिता और सम्बन्धियों के साथ दिया था। लिपि के आधार पर यह अभिलेख तीसरी चौथी सदी का हो सकता है। बाद में बृहन्नारदीय पुराण में चर्मकार को चाण्डाल से भी नीचा माना गया है।14

परन्तु इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अधिसंख्य चर्मकार बौद्ध थे और बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण ब्राह्मणों ने , जो हिन्दू धर्म के ठेकेदार थे, बौद्धों को अस्पृश्य करार कर दिया और इस प्रकार अस्पृश्य जातियां अस्तित्व में आयीं। प्राचीन धर्मसूत्राों और गृह्यसूत्राों में तथा पाली बौद्ध ग्रन्थों में चाण्डाल, पौल्कस आदि कुछ जनसमूहों के ÷ æ