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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

कहानी की मेहराबें

अवधेश मिश्र

अवधेश मिश्र युवा आलोचक हैं। तद्भव में पहले प्रकाशित अपने लेखों को लेकर चर्चा में रहे। इधर उन्होंने कहानी की पाठ केन्द्रित आलोचना पर काम शुरू किया है। यहां प्रस्तुत है उनका युवा कथाकार नीलाक्षी सिंह की सुप्रसिद्ध कहानी ÷ परिन्दे के इंतजार सा कुछ' पर आलेख।

 

सात नासमझ लड़के लड़कियों की कहानी है नीलाक्षी सिंह की ÷ परिन्दे के इंतजार सा कुछ' ।

÷ नासमझ' सात नामों के पहले अंग्रेजी अक्षरों को मिला कर गढ़ा गया शब्द जो संयोग से हिन्दी में एक अर्थ भी देता है। मुश्किल समय में जब ÷ समझदारी' एक भयानक हकीकत की ओर ले जाए तो सहज और उन्मुक्त जीवन जीने की कोशिश एक नासमझी ही तो है। नासमझ का व्यंग्यार्थ भी शायद यही है। नसरीन, अतुल, शिरीष, मनी, अनन्या, ज्योति और हर्ष ᄉ ÷ नासमझ' ग्रुप के ये सभी सदस्य सहपाठी हैं, विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग पढ़ते हैं। लेकिन नसरीन और शिरीष का रिश्ता कुछ खास है, जिसे नसरीन दोस्ती ही कहना चाहती है। वह दोस्ती और इश्क के बीच जो पतली लकीर होती है उसकी कद्र करने को लेकर अतिरिक्त रूप से सतर्क है, शिरीष की भी इसमें सहमति शामिल है फिलहाल।

बहुत जरूरी है उस समय को जानना जिसमें ये खूबसूरत सा रिश्ता ᄉ ये सातों नासमझ सांस ले रहे हैं। यह स्वतन्त्र भारत का सबसे जहरीला समय है। यह हैᄉ पिछली सदी का 92 का साल जिसमें बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गयी थी।

 

शिरीष और नसर की पहली मुलाकात कुछ खास नहीं है। ÷ यह पहली मुलाकात बगैर कुछ घटवाये सस्ते भाव गुजर गयी।' कहानी की मुख्य चरित्र नसरीन अख्तर की इस उदासीनता का कारण उसका अपना पारिवारिक जीवन है, जहां किसी बाहरी व्यक्ति, रिश्तेदार या खानदान वालों का प्रवेश प्रतिबन्धित है। वह और उसकी विधवा मां, दोनों का ठण्डा, तरतीब सा चलता जीवन है। लेकिन अब कुछ बदल रहा है ᄉ शिरीष से दूसरी मुलाकात में वह कुछ मुखर है, शिरीष को कुछ गौर से देखती है ᄉ ÷ उसके नाखून बड़े भीतर तक कटे हुए थे। सांवला हाथ, बढ़े भरे बाल...।' इस मुलाकात में चेखव का भी जिक्र होता है, जिनसे शिरीष की वाकफियत कुछ ज्यादा लगती है और नसर ने शायद यों ही नाम ले लिया है और अब इस बात पर कायम है कि उसने चेखव को पढ़ा भी है। कैण्टीन में हुई बातचीन के ये दो बिन्दु कुछ खास तवज्जो की मांग करते हैं। ये शिरीष में नसर की बढ़ती दिलचस्पी की पहली झलक देने के साथ साथ कहानी के स्थापत्य की पहचान भी कराते हैं।

इतवारी पुस्तक बाजार में नसर काफी उहापोह के पश्चात पहुंचती है और चेखव की किताब पर नजर पड़ते ही सोचती है ᄉ

÷÷ चलो इसे तो पढ़ ही लिया जाय। मैं उस किताब पर नजर गड़ाये रास्ते में बैठ कर किताब तलाशते लोगों को धकिया हुए उस तक पहुंच गयी । उंगलियों के नाखून भीतर तक धंस कर कटे हुए .... सांवला हाथ ᄉ बढ़े भरे वाल...ऊपर... मैंने झट से अपने को पीछे कर लिया। शिरीष किताब को हवा में लहरा कर किताब वाले से मोलभाव करने लगा।''

यानी ÷ चेखव' और भीतर तक धंस कर कटे नाखून ᄉ सांवला हाथ ᄉ बढ़े भरे बाल' इतवारी बाजार के लोकेल में शिरीष से साक्षत्कार के दो चमकते बिन्दु बन जाते हैं। इस प्रकार एक मेहराब ( arch ) पूरी होती है जो कैण्टीन के लोकेल से शुरू हुई थी। हम कहना चाहते हैं कि नीलाक्षी की इस कहानी में एकाधिक मेहराबें हैं जो कहानी को पठनीय के साथ साथ चाक्षुष अनुभव भी बनाती हैं। खास बात यह है कि यह शिल्पविधि कहीं भी आरोपित आ आयातित नहीं लगती अपितु कहानी के जैविक अस्तित्व में घुलमिल जाती है।

कहानी का आरम्भ शिरीष के इस कथन से होता है ᄉ

÷÷ नसर को लगातार सांस लेते जाने पर ऐतराज था और मैं सांसों को हर बार बेवजह छोड़ दिये जाने के खिलाफ था। हम दोनों में देखा जाय तो फर्क सिर्फ यही था।''

इसकी आवृत्ति होती है शिरीष और नसर के मध्य हो रही बातचीत में , जब वे यूनिवर्सिटी के मेन गेट से डिपार्टमेण्ट तक साथ साथ जा रहे हैं ᄉ

÷÷ उसने कहा ᄉ मैं सांसों को हर बार वेवजह छोडे+ दिये जाने के खिलाफ हूं। मैंने कहा, मुझे लगातार धुन में सांसे लेते जाने पर ऐतराज है।''

इस बार नैरेटर नसरीन है।

कहानी के स्थापत्य में एक मेहराब यहां भी बनती है। स्थापत्य के अध्येता जानते हैं कि मेहराबों का अस्तित्व भार के आनुपातिक वितरण पर आधारित है , यह वास्तव में सन्तुलन का सौन्दर्य है। हम कहना चाहते हैं कि कहानी के पाठ में यह सन्तुलन बड़े कौशल से साधा गया है। संवाद, विवरण और वाक्यों की बुनावट कई स्थानों पर एकरैखिक न होकर भी आन्तरिक सन्तुलन से एक दूसरे से जुड़ी हुई है, जमी हुई है।

हम शिरीष और नसर की बातचीत का जिक्र कर रहे थे। आरम्भिक छोटी छोटी मुलाकातों के बाद नसर और शिरीष की यह मुलाकात ज्यादा सहज है , वे उतने अपरिचित भी नहीं हैं अब, बातें ज्यादा हैं, दूरी कम, वे एक बार फिर रास्ता दुहराते हैं। इसी बातचीत में दोनों एक दूसरे की दोस्ती कुबूल फरमाते हैं। बातों का सिलसिला शिरीष ही शुरू करता है ᄉ

÷÷ उसने पहले कहा सर्दी जोर की पड़ रही है, नहीं? मैंने कहा ᄉ उतनी ठण्ड तो नहीं हां।''

÷ हां', ÷ नहीं' यहां परस्पर स्वीकृति की आकांक्षा व्यक्त करते हैं, अपने विपरीत अर्थी अस्तित्व को खोकर। यह अन्तर्धारा पूरी बातचीत में बह रही है, जहां विपरीत अर्थ एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। ताल एवं तार की संगीतमय जुगलबन्दी की खासियत से भरी हुई दो खास दोस्तों की यह बातचीत कहानी के उत्तम अंशों में से एक है, एक उपलब्धि है।

कहानी की खासियत यह भी है कि वह शिरीष और नसर के रिश्ते के विकास के साथ साथ यह भी बताती चलती है कि किस प्रकार सामाजिक विक्षोभ ( साम्प्रदायिक दंगे, प्राकृतिक आपदा, युद्ध आदि) पारिवारिक व्यवस्थाआंें, निजी रिश्तों को प्रभावित करते हैं। हमें कहना है सरकारी अभिलेख, अखबारी रिपोर्टों एवं सर्वेक्षणों में इन परिवर्तनों का कोई उल्लेख नहीं हुआ करता क्योंकि जिन संस्थानों द्वारा ये मुख्यधारा नैरेटिव पालित पोषित किये जाने हैं उनका कोई सरोकार इन निजी पीड़ाओं से नहीें होता।

 

÷÷ अम्मी बोलना चाहती हैं। अम्मी चुप रह कर बोल जाती हैं। अम्मी को हालांकि बोलने का यह तरीका पसन्द नहीं , क्योंकि पसन्द नापसन्द क्या चीज होती है उन्हें मालूम नहीं। अम्मी की इस चुप्पी को तमाम लोग उनका घमण्ड मान लेते हैं।''

अम्मी की शख्सियत का बयान करते इन पांच वाक्यों में छुपी विडम्बना देखी जा सकती है। तमाम छोटी बड़ी उथलपुथल के ऊपर सायास ओढ़ी चुप्पी , जिसके मध्य है असहमति और नापसन्दगी की परोक्ष उपस्थिति। प्रायः चुप्पी किसी स्वीकृति का लक्षण भी मान ली जाती है, क्योंकि भाषिक संस्कृतियां मौन को सुनने समझने की क्षमता नहीं रखतीं या समझना नहीं चाहतीं। अम्मी की चुप्पी ÷ मौनं स्वीकृति लक्षणम' का प्रत्याख्यान है। बोलने ( चुप रहने) और समझने की द्विपक्ष में चुप्पी घमण्ड मान ली जाती है, इसे समाज के शक्ति ( power ) सम्बन्धों के आधार पर भी समझा जा सकता है।

पूरी कहानी में ÷ अम्मी' एक सामान्य सम्बोधन ( generic name ) से जानी जाती हैं। सिर्फ एक स्थल पर उन्हें नाम से पुकारा जाता है जब वे और नसर शहर की गड़बड़ियों से बचने के लिए हर्ष के घर में पनाह लिए हुए हैं। अम्मी का नाम लेने वाला शख्स है ÷ मामू' ᄉ अम्मी का भाई ᄉ जो इन दोनों को इस असुरक्षित(?) जगह से निकाल कर अपने साथ ले जाना चाहता है। उसके साथ के गुण्डे हर्ष का घर तबाह कर रहे हैं। मामू तो नसर के लिए अजनबी हैं ही, ÷ रौशनआरा' ( अम्मी) भी उसे कहीं सुना गया नाम ही लगता है। और अम्मी इस स्थिति में भी कोई सक्रिय प्रतिक्रिया नहीं दर्ज करा पातीं।

अम्मी की यह जेनेरिक शख्सियत उनकी सक्रियता को बहुत कुछ महदूद कर देती है। इस पूर्वनिर्धारण में कोई अवकाश ही कहां बचता है जहां वे भाषा के माध्यम से कोई हस्तक्षेप करें ᄉ अपनी भागीदारी से कोई सक्रिय भूमिका निभायें।

अम्मी की चुप्पी अब्बू के कत्ल के बाद की चीज होगी। कहानी के पाठ में इस बात का प्रत्यक्ष जिक्र तो नहीं है , किन्तु इस पर अविश्वास करने का भी कोई कारण नहीं। अब्बू का कत्ल सम्भवतः पेशागत प्रतिद्वन्द्विता में हुआ था। उसके बाद बेटी ( नसर) की परवरिश की खातिर अम्मी ने अपनी मेहनत बेचनी शुरू की और बचे हुए पैसे से चुप्पी खरीदनी शुरू की। यानी चुप्पी अम्मी का मूल स्वभाव नहीं है। हो भी कैसे सकता है, अम्मी तो वह हैं जिन्होंने मां बाप की मर्जी के बगैर शादी करने का फैसला किया था, खानदान वालों और रिश्तेदारों से दूर शहर के दूसरे छोर पर अपनी अलग दुनिया भी बसायी थी। एक और सिलसिला अब्बू की शहादत के दिन से अब तक बदस्तूर अठारह साल से जारी है। रोजाना एक रुपये का सिक्का जमा करना और साल के अन्त में इन सबको रुपये में बदल कर सहेज देना। यह सब इसलिए क्योंकि वे नहीं चाहती थीं कि उन्हें या मुझे कुछ हो तो जनाजे का इंतजाम खैरात के पैसों से हो।'' यानी चुप्पी खरीदना और एक सम्मानजनक मृत्यु की आश्वस्ति, इन दो अक्षांशों के बीच परिभाषित मन्द, मंथर और ठण्डी गति से चलता अम्मी का जीवन।

हम इसके बरक्स नसर के एक दोस्त और ÷ नासमझ' के मेम्बर हर्ष के परिवार को रखना चाहते हैं। विस्थापन और परिवार के पुरुष सदस्य(मास्टर, हर्ष के पिता) के अपहरण ( सम्भवतः हत्या) की त्रासदियां यह परिवार भी झेल चुका है। किन्तु इसकी परिणतियां यहां भिन्न हैंᄉ

÷÷ घर के सारे लोग मास्टर की याद को और अपने आप को भूल कर मेहनत करते हैं। घर आबाद हो जाता है और हर्ष जवान। उसकी छोटी, दुबली पतली गाढे+ रंग की मां सिन्दूर लगाती और इस यकीन से मुस्कराती जाती है कि मास्टर को उठा कर ले जाने वाले उसे मार नहीं पाये होंगे। बल्कि इतने दिनों में मास्टर ने उनकी सोच को बदल दिया होगा। मोनालिसा की इस मुस्कान का रहस्य खोलने में लोग चूकने लगे हैं।''

जाहिर है मास्टर की जनान्दोलनों में सहभागिता , लिखना लिखवाना, पढ़ना पढ़वाना, सोचना सोचवाना उसके अपने परिवार में भी प्रतिफलित हुआ है। यहां पारिवारिक क्षति जीवन संघर्षों को नयी धार देती है, यही मास्टर की अशरीरी उपस्थिति है, जो हर्ष की मां के सिन्दूर के रूप में भौतिक रूप से सत्यापित है।

दूसरी ओर नसर के पारिवारिक अतीत के बारे में इतना तो कहा ही जा सकता है कि अब्बू की तिजारत का क्षेत्र ऐसा तो नहीं ही रहा होगा जहां कोई अवकाश अम्मी की सहभागिता के लिए भी मौजूद हो। प्रेम के लिए संघर्ष और उसके उपरान्त उपलब्ध एक सुरक्षित घर। राजनीतिक रूप से सही गलत या विचारधारा का प्रश्न उठाये बिना इतना तो कहा ही जा सकता है कि व्यक्तिगत संघर्ष चाहे कितनी ही ईमानदारी एवं गम्भीरता से लडे+ जाएं उनकी परिणति इसी प्रकार के मुत्युबोध के आसपास होती है , जहां अम्मी और उनकी गुल्लक है, अम्मी की चुप्पी है, जिसके भीतर की खदबदाहट में किसी की भी हिस्सेदारी नहीं ᄉ नसर की भी नहीं।

 

विश्वविद्यालयीय नौजवानों का यह समूह सभी प्रकार की युवोचित गतिविधियों में मसरूफ है। ऐसी ही एक पिकनिक से लौटते समय इनका सामना हिन्दू दंगाइयों की भीड़ से हो जाता है। अनन्या की कार में सवार ये सातों अपने अपने घर सुरक्षित पहुंच तो जाते हैं , किन्तु यह घटना कहानी के पाठ में बहुत महत्वपूर्ण है, इसी बिन्दु पर इन नौजवानों का सामना साम्द्रायिकता के विषाक्त वातावरण से होता है। यह नसर की अम्मी की अनसुनी कर दी गयी चेतावनी का प्रत्यक्ष था। नसर अब नयी नजर से अपने साथियों को देखने के लिए मजबूर थीᄉ

÷÷ हम बाजार पार कर गये थे, जब गाड़ी रुक गयी। थोड़ा जाम लगा था। हमने उचक कर देखा तो मजमा जैसा दिखा। नारेबाजी चल रही थी। दूर से आती आवाज का कोई मतलब नहीं निकल रहा था। जब आवाज पास से गुजरी तो टुकड़ों में पसर गयी ᄉ ÷ हिन्दू हैं हम हिन्दू यारों, कटुए सालों को देखो मारो' । हमारी कार भी बढ़ी। पर कार के भीतर कुछ रुक गया जहां तहां। पहले के चले आ रहे शोरशराबे गीत ठहाके सब अकड़ गये। मुझे इस सन्नाटे का खौफ होने लगा। मेरे भीतर से आवाज उठी जो कहती थी ᄉ बोलो --- कोई तो बोलो पहले की तरह बोलते क्यों नहीं। कोई तो नजरअंदाज करे इस शोर को, जो हमारे भीतर अजनबीपन बो रहा है। कोई तो बोलो --- शिरीष। कार में कुछ हिन्दू और एक मुसलमान रह गये। कार रुकी पहले एक हिन्दू के घर, फिर दूसरे हिन्दू के घर, फिर मुसलमान के घर। सब कुछ बड़ा निबटाना किस्म का रह गया था। मैं उतरी। हल्की मुस्कुराहट, जिसे मुस्कुराना जितना मुश्किल था, लोगों के लिए जवाब देना उतना ही मुश्किल रहा।''

यह समय था , जब दंगाइयों ने धार्मिक पहचान की पुष्टि के लिए कई स्थानों पर पुरुषों के अधोवस्त्र तक उतरवा लिये थे। ÷ कटुआ' या ÷ लंडिया' धार्मिक पहचान के अपमानजनक सम्बोधन तो हैं ही किन्तु जब इनका उपयोग ÷ कटुए सालों को देखो मारो' या ÷ लंडिया लोग पाकिस्तान जाओ' सरीखे नारों में होता है तो ये भाषिक हिंसा के शर्मनाक उदाहरण बन जाते हैं। भीड़ द्वारा रास्ता चलते अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों को रोक कर ÷ जय श्रीराम' के नारे लगवाना भी भाषिक हिंसा का एक अन्य उदाहरण है।

हम फिलहाल कहानी के पाठ तक ही अपने आप को महदूद कर लें ᄉ तो यही पहला स्थल है जहां हिन्दू, मुसलमान शब्द अपनी सारी खतरनाक अर्थछवियों के साथ मौजूद हैं। यहां से ही कहानी खतरनाक समकालीन सच्चाइयों से साक्षात करना शुरू करती है।

शुक्र है नसर सही सलामत घर पहुंच गयी। अम्मी दरवाजे पर खड़ी थीं।

÷÷ अम्मी को देख कर मुझे लगा कि वह हुजूम मेरे घर की ओर बढ़ चला था उस वक्त। अजब पागलपन था, वे लोग इधर ही आते होंगे तो भी मुझे पहले पहुंचना था। मै कार से जो आयी थी। मतलब अभी तक ठीक था, आगे गड़बड़ हो सकता था।''

हम पीछे सामाजिक राजनीतिक गड़बड़ियों से निजी एवं पारिवारिक अवकाश में होने वाले परिवर्तनों का जिक्र कर चुके हैं। हम कहना चाहते हैं कि नीलाक्षी सिंह ऐसे परिवर्तनों को पूरी शिद्दत के साथ इस कहानी में महसूस कराती हैं। पिकनिक वाले दिन की शाम नसर की दुनिया में भी हलचल मची हुई है। शाम होने से पहले तक की खुशहाल जिन्दगी तबाह होने लगी है। कुछ ऐसे सवाल उसके सामने दरपेश हैं जिनकी ओर अब तक उसने कोई ध्यान नहीं दिया था , नासमझी में ही सही-

÷÷ कभी मेरा जेण्डर मुझे पीछे खींच रहा था, कभी मेरा मजहब। मैं अगर लड़का होती तो न शिरीष मेरे बारे में उस तरीके से सोचता, न मैं ही डरती रहती। हम कितने प्यारे दोस्त हो सकते थे। या कि मजहब हमारे बीच में न आता तो हम कितनी बेफिक्र जिन्दगी जी सकते थे।''

यहां नसर , शिरीष और अपने सम्बन्ध में पहली बार मजहब को लेकर चिन्तित है। लेकिन क्या जिस बेफिक्री को बात नसर कर रही है वह सहज सम्भाव्य है। अम्मी अब्बू की शादी का उदाहरण कहानी के पाठ में ही मौजूद है। उनकी शादी कोई गैर मजहबी शादी नहीं थी। लेकिन मामू हंसुआ लेकर अब्बा के पीछे पड़ गये थे और अब्बू के अब्बू ने भी उन्हें घर से निकाल दिया था। किन्तु नसर की पारिवारिक संरचना थोड़ी भिन्न है। उसमें कोई पुरुष सदस्य नहीं है और रिश्ते नातेदारों से भी उनका कोई सम्पर्क नहीं है। यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं कि पुरुषविहीन परिवारों में हिंसक प्रतिक्रिया की गुंजायश कम ही रहती है।

अम्मी के मन में भी हलचल है। वे कुछ दिन पहले उन्हीं मामू को फोन कर चुकी हैं , जिनसे जनम भर न मिलने की कसमें वे खा चुकीं थीं। लेकिन बाबरी मस्जिद पर हमला होने से पहले अपने लोगों के बीच जाना चाहती हैं। यहां अपने लोगों की पहचान का एकमात्र आधार मजहब और रिश्तेदारी है जिनकी कोई भूमिका इन मां बेटी के अब तक के जीवन में नहीं थी। अम्मी मामू से अपनी पुरानी तल्खियां भुलाने तैयार बैठी हैं और नसर के दोस्तों के बारे में उनका मानना हैं -

÷÷ जिस रोज मजहब की आग जोर पकडे+गी, उस रोज सारा नक्शा ही बदल जाएगा। तू उनके लिए मन्दिर को तोड़ कर उसकी जगह खुदा को रख देने वाली काफिर बन जाएगी। उधर अयोध्या में कोई पण्डा एक पत्थर किसी मुसलमान पर उठायेगा और तू इधर पत्थरों से लाद दी जाएगी। मजहब की आग में इन्सान वहशी बन जाता है।''

हम कहना चाहते हैं कि अपने लोगों के बीच सुरक्षित स्थान की तलाश की जो बात नीलाक्षी , अम्मी के माध्यम से उठा रही हैं, वह अधिसंख्य उत्तर भारतीय नगरों की एक तल्ख समकालीन हकीकत है। इसकी शुरुआत जरूर पिछली सदी की अन्तिम दहाई में हुई थी, किन्तु ये मिनी विस्थापन छिटपुट रूप से अब तक जारी हैं। यह समझना भी जरूरी है कि प्रत्यक्ष रूप से भय एवं असुरक्षा से परिचालित इन विस्थापानों के पीछे प्रापर्टी डीलरों, बिल्डरों और राजनेताओं का गठजोड़ भी सक्रिय रहता है।

प्रसंगवश हम सईद मिर्जा की फिल्म ÷ नसीम' का जिक्र करना चाहेंगे। नसीम भी उन्हीं दिनोंका हाल सेल्यूलाइड के माध्यम से कहती है, जिनकी कहानी ÷ परिन्दे के इन्तजार सा कुछ' में कही गयीहै।

बाहर सड़क पर , दूरदर्शन समाचारों की क्लिपिंग में, नेताओं के भाषणों में जहरीले नारे गूंज रहे हैं। फिल्म का पात्र सज्जाद ( नसीम का पिता) हताशा में कहता है - कहां जाएं हम, हम तो यहीं के हैं।

यह परिवार अपने लोगों के बीच ही रह रहा है , एक साथ तीन पीढ़ियों को समेटे। सवाल अख्तर मियां ( दादा जी) से भी किया जाता है - आप पाकिस्तान क्यों नहीं गये?

दादा जी के पास तो हर सवाल का जवाब है , अतीत के किस्सों में, पर जिनके पास ऐसा अतीत न हो, या जो विभिन्न कारणों से इस अतीत से अपने को न जोड़ पायें वे क्या करें?

ऐन 6 दिसम्बर के दिन दादा जी की मृत्यु और बाबरी मस्जिद का टूटना यानी सन्‌ सैतालीस में अपनी मिट्टी, तहजीब, पेड़ पौधों से जुड़ कर देश के विभाजन का प्रत्याख्यान रचने वाले विश्वास का खत्म हो जाना - दादा जी की यह महाकाव्यात्मक मृत्यु बहुत गम्भीर सवाल उठाती है। दादा जी का जनाजा उठ रहा है, उधर बाबरी मस्जिद के गुम्बद एक एक कर टूटने से नौजवानों में बेचैनी है। एक नौजवान जफर तल्खी से कहता है - बहुत माकूल दिन चुना है आपने यहां से जाने का। कहना यह है कि अपने लोगों में सभी लोग ÷ मामू' नहीं होते और जो लोग मामू नहीं होते उनकी दुश्वारियां वही होती हैं वे चाहे अपनों के बीच रहें या गैरों के। मामू जैसे लोग किसी मुश्किल का हल नहीं हैं यह बात ÷ परिन्दे के इंतजार सा कुछ' के पाठ में बहुत पुरजोर ढंग से साबित होती है, जब वे अपने साथियों के साथ हर्ष के घर उत्पात मचाते हैं, नसर के साथ हिंसक वर्ताव करते हैं।

हम एक बार फिर नसर और शिरीष की ओर लौटते हैं। स्थितियां अब उतनी सहज नहीं रह गयी हैं। मजहब और जेण्डर के नये निर्देशांक इस रिश्ते को जकड़ लेना चाहते हैं। नसर , शिरीष से कुछ बातें करना चाहती है। इसकी भूमिका चाहे अनचाहे तैयार हो गयी है जब उनका सामना पिकनिक से लौटते समय हिंसक भीड़ से हुआ था। आज नसर दोस्ती और इश्क में फर्क कर रही है, जिसका अन्त शिरीष की सिसकियों से होता है -

÷÷ दोस्ती और इश्क के बीच जो पतली लकीर होती है इसकी कद्र तुम्हें भी करनी है और मुझे भी।''

यहां नसर मजहब के तर्क को जानबूझ कर पीछे कर रही है , पर शिरीष के एक सवाल के आगे निरस्त्र हो जाती है -

÷÷ अब मैं उसके सामने चेहरा करके खड़ी थी और कोई तैयारी नहीं थीं मेरी इस सवाल से टकराने की, मेरे मुंह से निकलता गया - नहीं इसलिए न मैं एक लड़की की तरह जीना चाहती हूं, न मुसलमान की तरह। जिसके लिए मेरे मन में जो अहसास जागे उसे वही दर्जा देना चाहती हूं। यह न हो कि मेरे लड़की होने की वजह से या मजहब के चलते इस अहसास को दूसरे खाने में फिट कर दूं।''

यहां हमेें गीतांजलि श्री के उपन्यास ÷ हमारा शहर उस बरस' के डा. हनीफ की दुविधा भी ध्यान में आती है। एक समझदार प्रोफेसर होने के बावजूद साम्प्रदायिक अखबार में मजमून लिखने की गलती उनसे भी हो जाती है। दरअसल धार्मिक अल्पसंख्यक और स्त्री ये दोनों वर्तमान में उत्पीड़ित पहचानें हैं। भारत में साम्प्रदायिक एवं सामुदायिक पहचानों के जेण्डरीकरण का एक लम्बा इतिहास रहा है। इसकी शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई जब कुछ समुदायों को बहादुर कौम मान कर उन्हें मर्दाना कहा गया। लेकिन उपनिवेशित समुदाय को व्यापक रूप से महिलोचित ही कहा गया। हम कहना चाहते हैं कि महिला पहचान उतपीड़ितों के एक व्यापक रूपक की तरह इस्तेमाल होती रही है।

नसर इससे अलग पहचान बनाने की बात करती है , किन्तु इसके लिए रिश्तों में अतिरिक्त सतर्कता आवश्यक है क्या। असल में नसर में यह चेतना अभी अंकुरित ही हो रही है, उसके लिए जिस वैचारिक तैयारी और समझदारी की जरूरत होती है, उसकी कोई सूचना अथवा साक्ष्य इस कहानी के पाठ में नहीं है।

 

खैर न तो अम्मी ही अपने लोगों के बीच जा पाती हैं , और न नसर ही दोस्ती और इश्क के बीच की पतली लकीर को कायम रख पाती है। यह सब होता है हर्ष के घर मंें, जहां नसर के ÷ नासमझ' दोस्त उसे और अम्मी को ले आये हैं, बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद। यहां वे आये तो मोहाजिर बन कर थे, पर हर्ष के परिवार की आत्मीयता से सब कुछ बदलने लगा है।

कहानी के पाठ में हमने अभी तक भाषिक हिंसा का ही प्रत्यक्ष जिक्र देखा था , जब नसर और उसके दोस्त पिकनिक से लौटते समय भीड़ में फंस गये थे। हर्ष के घर भौतिक हिंसा भी प्रत्यक्ष होती है, जब अम्मी के अपने लोग(?) मामू और उनके साथी उन्हें खोजते हुए आ धमकते हैं। उनका इरादा सिर्फ नसर और अम्मी को ले जाना ही नहीं अपितु हर्ष के घर को नेस्तनाबूद करना भी है। आग तो वे आते ही लगा देते हैं, लेकिन नसर जिस हिम्मत और समझदारी से उनका मुकाबला करती है वह काबिले तारीफ है। यह उसके व्यक्तित्व की नयी चमक है। वास्तव में दंगे स्त्रियों की सुपरिभाषित बंधी बंधायी भूमिका में एक विक्षोभ पैदा करते हैं, जिससे उन्हें कुछ नया करने का अवसर भी उपलब्ध होता है। इसके अच्छे और बुरे दोनों प्रतिफलन हो सकते हैं। गुजरात के दंगों में महिलाओं की दंगाई भूमिका का उदाहरण भी हमारे सामने है। नसर की हिम्मत और समझदारी को इसी आलोक में देखा जा सकता है।

अम्मी के पास चुप्पी के अलावा अब आंसू भी हैं , जिसे बहा कर ही वे इस घर का कर्ज सधा देती हैैं।

शाम को अतुल और शिरीष हर्ष के घर आते हैं। यों हर्ष के घर में सब कुछ सामान्य हो चुका है। शिरीष नसर को अलग कमरे में ले जाता है -

÷ नसर तुमने दोस्ती निभा दी। हमारे रहते कोई तुम्हें छू नहीं सकेगा।'

÷ शिरीष तुम लोगों ने क्या कम किया है। मेरे लिए...मैं सोचती हूं तो...। मैं इतनी अमीर थी मुझे अहसास ही न था...।'

अचानक मेरी पलकों में एक आंसू फंस गया... मैंने महसूस किया।

÷ तुम बहुत अच्छी हो नसर।'

मेरी पलकें झिलमिलायीं।

÷ बहुत बहुत अच्छी! नसर एक बात कहूं?'

÷ हूं।'

÷ प्लीज न मत कहना...। एक हसरत है बस एक...प्लीज।

÷ कहो।'

÷ मैं एक बार तुम्हारी पलकें चूमना चाहता हूं, बस एक...'

पलकों ने उस आंसू को आजाद कर दिया। वो मेरे गाल पर फिसल गया - ÷ शि...'

दोस्ती से शुरू होने वाली यह बातचीत जिस भी मुकाम तक पहुंच रही हो पर इतना तो निश्चित ही है कि इश्क और दोस्ती के बीच जो पतली लकीर होती है उसकी बात इस क्षण करना बेमानी है।

कहानी के पाठ में यह शाम बहुत मानीखेज है। फैसला हुआ है हर्ष का घर अब सेफ नहीं है , अब नसर और अम्मी को ज्योति के घर जाना है। इसी शाम नसर को पता चला है कि उसको इस मुश्किल दौर से निकालने की जो लड़ाई उसके ये प्यारे दोस्त जिस शिद्दत से लड़ रहे हैं, इसमें उनके परिवार वालों की शिरकत धीरे धीरे कम हो रही है। अनन्या की गाड़ी अब नहीं आयेगी, अतुल अपने मां बाप को नहीं मना पा रहा है, और ज्योति की बात को इंकार करने की स्थिति उसके परिवार में किसी की है नहीं, तो फाइनल रहा ज्योति का घर।

हर्ष के घर की इस आखिरी रात , नसरीन उससे कुछ बात करना चाहती है। दोनों ड्रा