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शताब्दी लेख इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह लम्बी कहानी कहानिया मीमांसा कविताएं विशेष वृत्तान्त पत्र उपन्यास |
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प्रिय नीलू , शेरू, ककू, पूत्रक और तुम सबकी ममी तुम सबको खूब प्यार। आज यहां पहुंचे एक हफ्ता हो गया। मौसम अच्छा चल रहा है। यहां बसन्त आ रहा है। सारे पेड़ नंगे खड़े हैं ; एक अपनी विद्या जैसा पेड़ है जो हरा है, एक और जो नये साल पर घर घर लगाया जाता है । फिर भी फूल आ रहे हैं। एक नीले और बैंगनी रंग का फूल हैं जो अपने यहां की सफेद कुमुदनी जैसे होते हैं। कुछ लाल, कुछ पीले। खुशबू नहीं होती। आज इतवार है - सो एक बजे खाना खाकर आये और लिखने बैठ गये। आज हमने जो खाना खाया वह योगर्ट से शुरू हुआ - जैसा आइसक्रीम कप होता है वैसा बड़े कप में। रोज सूप होता है कभी टोमेटो सूप, कभी चिकन सूप, कभी मीट सूप। इसके बाद आज ÷ चिकन स्ट्यू विद बीन' खाया। चिकन करी उसमें सफेद सेम जैसी - यहां की बीन लम्बी और पतली होती है - बरबटी जैसी। फिर आइसक्रीम। यही तीन कोर्स रोज सुबह शाम होते हैं। खाते खाते उकताहट हो रही है। कभी कभी चावल होता है - ÷ स्ट्यू' याने करी के साथ खाने के लिए। एक दिन खरे सिके चिल्ले जैसी एक मिठाई आयी उसमें खट्टी बेरी का गूदा भरा था। सेवइयां पानी में उबली - सूप में या स्ट्यू में रहती हैं। और ब्रेड। सुबह ब्रेड बटर, मार्मलेड ( जेली) या शहद। 30 ग्राम की छोटी छोटी प्लास्टिक डिबियों में। शहर के बीच ÷ दूना' (Danube) नदी बहती है। यह यूरोप के कई देशों में बहती है। नक्शे में देखोगे तो मिल जाएगी, NOVISAD शहर भी मिल जाएगा। हमने तुम लोगों के लिए इटली के सिक्के, यहां के सिक्के, एक सिक्का इण्डोनेशिया का - मॉरिशस की कुछ टिकटें इकट्ठे किये हैं। चीजें यहां बहुत मंहगी हैं - लोग कहते हैं मत खरीदो ! रोज बाजार से गुजरते हैं तो तुम लोगों की याद आती है बच्चों को देख कर। स्त्रियों को देख कर तुम्हारी मां की। जो नदी है उसमें बड़े बड़े यात्री जहाज चलते हैं। इस देश के भी और हंगरी के भी। कल हमने देखे। यहां फुटबॉल बहुत खेलते हैं। 14 से 20 अप्रेल तक यहां विश्व टेबल टेनिस चैम्पियनशिप होने वाली है। एकाध रोज देखेंगे। बाजार मे 20 - 20 मंजिल, 10 - 10 मंजिल की बिल्ंिडगें हैं। यहां इस शहर में हजारों वर्षों पहले आये भारतीयों की सन्तानें हैं - यूरोपीय मालूम होते हैं। यहीं की वेशभूषा, भाषा। लड़के स्केटिंग के बहुत शौकीन हैं। हमारे कमरे की खिड़की से खेल के मैदान दिखते हैं। इस समय एक मैदान में फुटबॉल मैच हो रहा है। एक टीम की वर्दी सफेद है दूसरे की लाल। मैदान यहां से लगभग आधा फर्लांग दूर है पर हमारा कमरा पांचवीं मंजिल पर है - इसलिए साफ दिखता है। कमरे की खिड़की कमरे के बराबर ऊंची और चौड़ी है। अब हम लोग 22 हो गये हैं - 17 देश। माल्टा, मारीशस, मेक्सिको, बोलीविया, नाइजीरिया, माली, अंगोला, बंगलादेश, अफगानिस्तान, इजिप्ट, जॉर्डन, इण्डोनेशिया, भारत, चीन कोरिया, थाइलैण्ड। नेपाल का एक लड़का दुभाषिया हैं टंक प्रसाद ढकाल। कल हम लोग शहर से बाहर एक पाल्ट्री फार्म देखने जाएंगे - यूनिवर्सिटी की बस से। कल दोपहर हमने शादी पार्टी के बाद घर जा रही एक दुल्हन भी देखी , अपनी खिड़की से। सफेद कपड़े पहने थी, नीचे से ऊपर तक। सर पर सफेद टोपी जैसी दिख रही थी। पचासेक लोग थे। आगे के हाल बाद की चिट्ठी में लिखेंगे। तुम लोग गौतम से एरोग्राम मंगा कर हमको चिट्ठी लिखना। तुम सबको प्यार। अच्छे से रहना ताकि मां को तकलीफ न हो। तु. पापा
22 मार्च 89 यूगोस्लाविया नेविसाद किनी पहली चिट्ठियां बच्चों ने पढ़ी होंगी , तुमने सोचा होगा हमारे लिये कुछ नहीं लिखा। क्या लिखता - याद आती है - रह रह कर । दूरी की मजबूरी है - अब समय लम्बा लगता है। आज बाइस तारीख है। इतवार का दिन। लगभग सभी लोग शहर से पन्द्रह किलोमीटर दूर एक पिकनिक स्पॉट, राष्ट्रीय उद्यान गये थे - समुद्र सतह से 1000 मीटर ऊपर पहाड़ पर। नाम है ÷ फ्रुस्का गोरा' । पहाड़ पर दो चार रोज पहले बर्फ गिरी होगी क्योंकि सड़कों के किनारे किनारे बर्फ अब भी जमी थी। बर्फ वैसी थी जैसी रन्दे पे घिसके - गोला बना कर बरफ वाले मीठा रंग डाल के बेचते हैं - गर्मियों में। ज्यादातर पेड़ नंगे थे - कनखे फूट रहे थे - हरे पेड़ों के भी कुछ झुण्ड थे। वहीं कुछ और ऊंचाई पर एक विशाल स्मारक है। लगभग बीस फुट ऊंचे चबूतरे पर एक औरत और पांच आदमियों की आदमकद मूर्तियां हैं। इसी बीस फुट ऊंचे चबूतरे पर लगभग सौ फुट ऊंची 10 - 12 फुट चौड़ी एक मीनार जैसी है - उस पर एक स्त्री की आगे बढ़ कर मानो ललकारती हुई मूर्ति है। यह उस स्त्री की मूर्ति है जिसके नेतृत्व में यहां के लोगों ने दूसरे विश्वयुद्ध के जमाने में जर्मन नाजियों से (1939 -42) लोहा लिया था और उनके दांत खट्टे कर दिये थे। सुबह उठ कर एक कप कॉफी पी और दोपहर के खाने का पैकेट लेकर हम सब रवाना हो गये थे। खाने से याद आया कि इन दिनों हमने अपना पेट छोटा करने के लिए सुबह 5 - 10 मिनिट का छोटा व्यायाम शुरू कर दिया है। सुबह नाश्ते में भी हम अब केवल एक या दो कप कॉफी लेते हैं। ब्रेड बटर वगैरह बन्द। दो बजे खाना। आलू और चावल बन्द। रात के खाने में भी बीच वाली दूसरी डिश जो मीट या चिकन या फिश की होती है, आधी ही खाता हूं। रात में सोने से पहले गरम पानी में दो चम्मच शहद। असल में यहां 10 रोज में पेट तेजी से बढ़ा क्योंकि खाना और सोना ही काम रहा। एक दिन कोरिया वाले एक लड़के ने, जो मुझसे पांच बरस छोटा होने के बावजूद बूढ़ा सा दिखता है - टोक दिया, कहा ये बुरा है। ध्यान दो। शायद इसी बहाने घर पहुंचते पहुंचते कुछ बदन बन जाए। कल हम लोग इस शहर के पुराने हिस्से में जो दूना नदी के किनारे पहाड़ पर बसा है गये। वहां इस शहर के मूल निवासियों सर्बियन लोगों का पुराना किला है। यह किला लगभग 500 बरस पहले सर्बों ने तुर्कों से लड़ने के लिए पहाड़ पर बनाया था। नदी के इस पार हंगारी राज्य था ( जहां इन दिनों नया शहर बसा है - जिसमें हम हैं) - उस पर तुर्क राज करते थे - ये तुर्क बार बार हमला करते थे। किले की दीवारें लगभग सात आठ फुट गहरी - दसेक फुट चौड़ी नहर है ताकि हमलावर आ न सकें। अन्दर भारी भारी सुरंगें हैं। सुरंगें हम लोग नहीं देख सके क्योंकि उनमें आजकल बिजली फिटिंग का काम चल रहा है। अप्रेल में यहां टेबिल टेनिस की प्रतियोगिता होने वाली है - उससे पहले तैयार हो जाएगी। अभी अंधेरी सुरंगों में लोग टॉर्च लेकर चलते थे। तब फिर वैसे ही देखेंगे। ऊपर किले के भीतर ही लगभग 150 बरस पुराने एक भवन में म्यूजियम है जहां इस इलाके की पुरानी चीजें हैं। सबसे ज्यादा अच्छे पॉटरी - पकी मिट्टी - चीनी मिट्टी कह लो - के रंग भरे चित्रकारी किये बर्तन हैं - प्लेटें, घड़े, फूलदान। यहीं बीच बीच में दीवारों के बीच कमरों को कांच की खिड़कियों के पार प्राकृतिक ढंग से तैयार किया गया है - सचमुच के घास, पेड़, फूल, पौधे, पानी, कीचड़, पत्थर। उनके बीच कहीं हिरन खरगोश बारहसिंगे। कहीं भालू, सियार, लोमड़ी, कहीं सांप मेढक, चिड़ियां, बाज। सब कुछ ऐसा कि सजीव लगे। गिद्ध, बत्तख, सारस, कौआ नहीं दिखा। तोते और मुनिया दिखीं - केनेरीज कई कई रंगों की। यहां एक तस्वीर लगी है सितम्बर 1961 की। बेलग्रेद में जब तटस्थ राष्ट्रों का सम्मेलन हुआ था तब मार्शल टीटो राष्ट्रप्रमुखों को यहां लाये थे। उस तस्वीर में हेलेसिलासी ( इथोपिया के तबके राष्ट्रपति), माली के तबके प्रधानमंत्री, कुछ और लोग। बीच में हेलेसिलासी के बायीं ओर मार्शल टीटो, फिर उनके बायीं ओर जवाहर लाल नेहरू, नेहरू जी आगे की ओर झुक कर माथा कुछ ऊपर उठाये, उत्सुक आंखों से कुछ देखते हुए, उनके बाजू में श्रीमती टीटो, फिर कोई और - मुझे लगा शायद केन्या के राष्ट्रपति जोमो केन्याटा। बहुत से फोटो लिये गये। हमें भी शायद मिले। कैमरा सोचते थे खरीद लें, पर लोग कहते हैं हॉलैण्ड से खरीदो - वहां सस्ते मिलेंगे, मिक्सी वगैरह भी। देखो क्या होता है। अभी एक लेडीज कोट खरीदा है - नायलॉन जैसी चीज का गुलाबी रंग का। बच्चों के कंधों के नाप सेण्टीमीटर में लिख कर भेजो। सोचते हैं तुम्हारे लिए थोड़ा सा ऊन भी खरीदें। वैसे ऊन कोई खास अच्छा और सस्ता नहीं है - फिर भी। एक गरम कोट मेरे साथी ने खरीदा है - घुटनों के नीचे तक का - नीले ब्लेजर का - अपने यहां के डेढ़ सौ रुपयों के बराबर। सोचते हैं खरीद लें। बाबू जी के लिए - अपने नाप का। ककू शेरू मनू नीलू के लिए क्या लें? हां यहां पहाड़ मिट्टी के हैं - चट्टानें पत्थरों की नहीं - और यहां पत्थर भी मुुश्किल से देखने को मिलते हैं। कहते हैं यहां दुनिया की सबसे अच्छी जमीन है। 990 मीटर नीचे तक मिट्टी ही मिट्टी। ककड़ी, टमाटर, शिमलामिर्च, मटर, नाशपाती, सेब सभी होते हैं। मसाले भी। एक बैंगनी फूल जो अपनी क्यारी में खिलता है नल के बाजू से - यहां भी घरों की क्यारियों में लगा है - इन दिनों खिल रहा है। हां , यहां एक अखबार में हमारा फोटो और इण्टरव्यू छपेगा - अखबार वाला आया था स्कूल में। चार से बात की बाईस में से। हां बी में एक रोज बेचेई और एक एग्रीकल्चर स्कूलरी गये थे। - बेचेई में शुद्ध नस्ल की मुर्गियां हैं - अपने भारत की पुरानी नस्ल भी वहां पहली बार देखी। तु.सोम
सुबोतिचा 12/4/81 प्यारे बच्चो और बच्चों की अच्छी मां तुम लोगों की चिट्ठी हमें 9 अप्रैल को मिली - दोनों एक साथ - तब तक की हमारी परेशानी और बाद के गुस्से का पता तुम्हें हमारी चिट्ठी से मिल गया होगा। यह चिट्ठी हम सुबोतिचा से लिख रहे हैं - यह नोवीसाद से 60 कि.मी. दूर है - हंगरी देश की सीमा से केवल 11 किलोमीटर। इतनी ही दूरी हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट की है। अभी वीसा नहीं मिला। मिल गया तो अगले हफ्ते वहां जाएंगे। यह शहर अब से सौ बरस पहले यूगोस्लाविया की राजधानी बेलगे्रड से भी बड़ा था, लेकिन पहले विश्वयुद्ध (1914) के बाद इसका महत्व घटता गया। अब यह केवल कृषि प्रधान राज्य का एक शहर भर रह गया है। पुराने गिरजे और भवन हैं। इन पर भी इटली का प्रभाव है जैसे रोम में है। हम यहां 11- 4 को आये - और उसी रोज ÷ पालिच' नाम की एक झील देखने गये। वह झील 1809 में पालिश्चोविच नाम के एक धनी ने अपनी शिकरगाह की तरह बनायी थी। फिर उसकी प्रसिद्धि यों हुई कि उसमें नहाने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। पर यह अपने भोपाल ताल से छोटी है - हां उसमें लोग पालदार नावें और मोटर लांच दोनों चलाते है। इन दिनों चारों ओर चेरी के सफेद फूलों से लदे पेड़ दिखाई देते हैं। चेरी, बेर की तरह एक खटमिट्ठा फल होता है। कतार कतार झुण्ड झुण्ड फूलों लदे पेड़ बहुत अच्छे लगते हैं। खेतों में कहीं कहीं मक्का बोये हैं - पौधे चार छः इंच के हो गये हैं। ज्यादातर खेत तैयार पड़े हैं - कुछ बोने के लिए। जिस होटल में हम ठहरे हैं उसका नाम है ÷ होटल पात्रिया' - कमरा नं. 301 - 7 मंजिल का है। यूगोस्लाविया में इस तरह के सारे होटल सरकारी हैं। खाने की खास तकलीफ नहीं है - दही मिलता है पर सूप की जगह। बहुत कम खट्टा - उसे ÷ योगर्ट' कहते हैं। यहां एक काला बाजार भी है जिसमें पड़ोस के देशों से ÷ स्मगल' करके लायी चीजें बिकती हैं - सस्ती , बहुत नहीं। यहां मूंगफली, मूंगफली की लैया ( पर थोड़ा फर्क) - गुड़ की बहुत कड़ी तार की चाशनी वाली, तिली की लैया - और एक हलवा भी मिलता है - ये सारी चीजें शायद हजारों बरसों पहले अपने देश से चले जिप्सी अपने साथ लाये थे। मूंगफली बहुत अच्छी नहीं है, और मंहगी भी है। 2 रु. की 10 ग्राम छिले दाने। 2 रु. के 10 ग्राम भुने चने। मूंगफली यहां केवल ÷ मेकेडोनिया नामक राज्य में हाती है। बाकी कहीं नहीं, उसे ÷ किकिरी' कहते हैं। आज एक बेयरा को हमने ÷ पनीर' शब्द कहते सुना - शाम को पूछेंगे कि क्या। cheese को ही वह पनीर कहता है - कुछ और को। मनु शब्द पढ़ने लगा है जान कर खूब खुशी हुई PSC के विज्ञापन - डिप्टी डायरेक्टर ( उप संचालक) का ध्यान रखना। 15 मई के बाद जो भी चट्ठी लिखना वह हालैण्ड के पते पर देना। सबको खूब प्यार - चिट्ठी लिफाफे में भेजना। मां अलग लिखेगी, बच्चे अलग। तुम्हारे पापा
प्यारे बच्चो और बच्चों की प्यारी मां तुम लोगों ने फिर दसेक रोज से चिट्ठी नहीं लिखी - अब तो सबके रिजल्ट भी खुल गये होंगे और सभी अच्छे नम्बरों से पास भी हो गये होंगे। जल्द खबर दो। साथ में एक फोटो है। यह यहां के राष्ट्रीय पार्क में लिया गया था - जब हम वहां गये थे तब वहां थोड़ी थोड़ी बर्फ दिखाई दे रही थी। दो रोज पहले गिरी थी। घूमते घूमते हम लोग एक जगह पहुंचे जब कुछ यूगोस्लाव फुटबॉल खेल रहे थे। फुटबाल यहां का सबसे लोकप्रिय खेल है। जब बड़े फुटबॉल मैच होते हैं तो टेलीविजन रूम में खड़े होने की जगह नहीं रहती। हम लोगों ने उनके साथ फुटबॉल खेली और फोटो उसके बाद लिया गया। पिछली 2 मई को हम लोग क्रागुएवात्स नाम की एक जगह गये। वहां 21 अक्टूबर स्मारक है। 21 अक्टूबर 1940 को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन सेनाओं ने, उस जगह के आसपास के गांवों से इकट्ठा किये गये 6000 पुरुषों, बच्चों, मास्टरों को गोलियों से भूना था। सुबह 7 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच। हर मृत जर्मन सिपाही के पीछे 100 यूगोस्लाव और हर घायल जर्मन के पीछे 50 यूगोस्लाव मारे गये। स्कूलों से पकड़ कर बच्चे और उनके मास्टर लाये गये - 350 बच्चे और भून दिये गये। वहां की यात्रा करना एक बहुत ही तकलीफ भरी बात थी। जरा जरा से बच्चे - उनमें से कुछ ने कागज के पुर्जों में अपनी मां के लिए या और किसी के लिए, पिता ने अपने बच्चों या मां के लिए कुछ शब्द लिखे - उन सात हजार लोगों की कब्रें उस 350 एकड़ जमीन में जहांतहां बिखरी पड़ी हैं। हर कब्र में 200 - 400 - 500 लोग दफ्न हैं। यूगोस्लाव लोगों ने वहां बहुत अच्छे स्मारक बनाये हैं। फूलों के पेड़ रोपे हैं। चारों ओर हरियाली है। हर बरस 21 अक्टूबर को उनमें से एक स्मारक पर - जिसका नाम Lesson है - पूरे यूगो. से कवि इकट्ठे होते हैं। और खुले आसमान के नीचे बैठे लगभग 80 हजार लोगों के सामने - उस अविस्मरणीय घटना को लेकर लिखी गयी कविताएं सुनाते हैं। उसी रोज हम ÷ तोपोला' नाम की एक जगह भी गये जहां सर्बियन राजसत्ता की कब्रें हैं। बाहर से वह एक सीधा चर्च सा दिखाई देता है। यह भवन 1807 में जन्मे पहले सर्बियन बादशाह ने बनवाना शुरू किया था, उसने तुर्कों के विरुद्ध विद्रोह और संघर्ष का पहला बिगुल फूंका था। पूरे भवन में 28 के आसपास कब्रें हैं। लगभग चार किस्म का संगमरमर - हरा, गुलाबी, काला, सफेद। कब्रें सफेद संगमरमर की हैं। पूरे भवन में मोजेक - रंगबिरंगी चीनी मिट्टी की चिप्पियों से दृश्य और लोगों के चित्र बनाये गये हैं। उसकी दीवार और छत का चप्पा चप्पा रंगीन मोजेक के काम से भरा है। बहुत सुन्दर है। केवल अन्तिम सर्बियन राजा पीटर II की कब्र यहां नहीं है क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वह लन्दन चला गया था। लन्दन जाने की वजह यह थी कि कम्युनिस्ट पार्टी ने जर्मनों से लड़ाई ठानने का निश्चय किया था, और पीटर जर्मनों की ओर था - उन्हें मदद दे रहा था। यूगो. लोगों ने जो उसकी मृत्यु के समय स्वतन्त्र होकर साम्यवादी गणतंत्र ( समाजवादी)बन चुके थे, उसकी लाश को जन्मभूमि लाने की इजाजत नहीं दी। यूगोस्लाविया यात्रा का समय अब धीरे धीरे खत्म हो रहा है। 22 तारीख को हम यहां से याने नोवीसाद से ÷ रूमा' नाम की एक जगह जाएंगे। वहां 28 तक रहेंगे और 29 को वहीं से बेलग्रेड चले जाएंगे, फिर बेलगे्रड से एम्सटर्डम, हॉलैण्ड। फिर तुम लोगों के पास आने के लिए बस एक महीना रह जाएगा। आज 9 मई और छुट्टी का दिन है। शाम को नेपाली मित्र के कमरे में - वह हॉस्टल में रहता है - पूड़ी साग बनाने का प्रोग्राम है देखो क्या होता है। परसों हमारे कोर्स की इंचार्ज डॉ. वीश्निच हम सबको अपने घर ले गयीं। वे अविवाहित हैं। उमर 55 बरस होगी। वे अपनी मां के साथ जिनकी उम्र 85 बरस है, रहती हैं। उनका जन्म यूगो. के मोण्टेनेग्रो नामक स्थान में हुआ था - जहां उनके पिता का घर था। वह रूसी जार साम्राज्य के दिन थे। हमेशा लड़ाइयां होतीं और आक्रामक मोन्टेनेग्रो का चप्पा चप्पा खाक में मिला देते। ऐसी ही एक लड़ाई में उनके पिता उनके बचपन में ही मारे गये। वे 11-12 बरस की थीं। उनके दो छोटे भाई हैं। वे अलग रहते हैं। उनकी मां ने बीफ मटन का पफ बनाया - बिना तला समोसा, प्रोफेसर ने। मीठी चीज का बिना तला समोसा। साथ में कारलोस्की वाइन। हमने उन्हें धूप का एक पैकेट दिया। कुछ और चीज बाद में देंगे। हां मेक्सिको के एक दोस्त की पत्नी मेक्सिको से यूरोप घूमने आयी है - वह अब उसके साथ रहेगी, उसने तुम लोगों के लिए - मेक्सिको के सारे सिक्के, लगभग दस; अमेरिका के दो और स्पेन के दो सिक्के दिये हैं। उसकी पत्नी के लिए तुम लोग - अगली चिट्ठी में, जो लिफाफे में भेजना - उसके अन्दर टिकुलियों का - रंगबिरंगी - मीडियम साइज की बारह टिकुलियों का सेट भेजना। मोटा गत्ता निकाल लेना सिर्फ प्लास्टिक के अन्दर रहने देना। यह चिट्ठी हॉलेण्ड के पते से देना। तुम सबको पप्पी। खूब ढेर सारा प्यार। और समाचार देना। तुम्हारे पापा
9 मई 81 नोवीसाद प्यारे बच्चों की प्यारी मां और प्यारी नीलू ककू प्यारे शेरू मनू बेटे तुम्हारी चिट्ठी हमें कल यहां हॉलेण्ड आने पर बर्नवेल्ड में मिली। एक महीने कोई चिट्ठी न आने से हमें बहुत फिक्र हो गयी थी , रुपये मिल गये हैं। अब सोचते हैं ज्यादा मंगा लेते तो अच्छा रहता, कुछ और चीजें खरीद लेते क्योंकि यहां शायद रुपये गिल्डर में बदल जाते हैं। देखेंगे। यूगोस्लाविया का कोर्स 28 को खत्म हुआ। अब तक अच्छा रहा है। हमें सबसे अच्छे विद्यार्थी का पुरस्कार मिला है - यूगोस्लाविया का झण्डा और एक अलग सर्टिफिकेट। उस रोज विदाई की आखिरी पार्टी में सब विद्यार्थियों की ओर से हमने भाषण दिया। फिर हमारे प्रस्ताव पर हर एक ने अपने अपने राष्ट्रगान की कुछ पंक्तियां गायीं। उत्सव का वातावरण था। यह सारे कार्यक्रम रूमा नाम की एक बस्ती में हुए जहां हम लोग 23 मई से 29 मई की सुबह तक कमरा नं. 301 रूमा होटल में रहे। इस बीच सबसे शानदार बात यह हुई कि हमारी मुलाकात यूगोस्लाविया के सबसे बड़े कवि - विश्व के महान कवियों में से एक - वास्को पोपा से हुई। पहले उन्होंने हमें बेलग्रड के एक होटल - एक्सेलसियर में बुलाया। एक घण्टा दिया गया था। वे किसी को अपने घर नहीं ले जाते। यह बात हमें उस लड़की ने बतायी जो हमें मिलाने ले गयी थी। वह उन्हें पन्द्रह बरस से जानती है, पर कभी उनके घर नहीं गयी। खैर बातें शुरू हुईं - एक घण्टा कब बीत गया पता नहीं चला। 11 बजे से हमारी बातें शुरू हुईं थीं - लगभग दो बजे वे बोले - हिन्दुस्तानी खाना भी खाते हैं या नहीं - मैंने शर्मिन्दा होकर उनसे इजाजत मांगी। बुलेवार रोवोल्यूशिया होते हुए हम एक होटल में गये। धूप खिली थी। खाना शुरू हुआ। हमने उन्हें छत्तीसगढ़ी मूर्ति दी, अपनी किताब, अगरबत्ती और बीड़ी कट्टा। साढ़े तीन बज गये। मैंने फिर इजाजत मांगी। कहा, आपने एक घण्टा दिया था। बोले ÷ माई ब्वॉय यू हेव नॉट सीन माई होम यट' मैं खुशी से भर उठा। वह लड़की भी - बोली जाने क्या बात है आप पर बहुत ज्यादा मेहरबान नजर आते हैं। बुलेवार रेवोल्यूशिया के लगभग 200 बरस पुराने एक बहुत बड़े भवन में तीन कमरों के छोटे फ्लैट में वो रहते हैं। उनके बच्चे नहीं हैं - बच्चों की - तुम लोगों की बात भी खाने के समय हुई। फिर वो अपने कमरे से किताब निकाल कर लाये - अपनी सम्पूर्ण कविताएं और मुझे भेंट की। लिखने के बाद उन्होंने अपने हाथ के पंजे का निशान बनाया पेन्सिल से। मैंने पूछा यह क्यों - वे बोले यह लगाव का, भाईचारे का, मैत्री का प्रतीक है। लड़की ने कहा - आप बहुत भाग्यवान हैं - यह छापा बिरलों को मिलता है। उस रोज का दिन मेरी जिन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से एक है। हमने एक फोटो भी लिया है। अगर अच्छा आया होगा तो क्या बात है। बात खत्म होने का नाम नहीं था - 6 बजने वाले थे, लड़की भी बेचारी बैठी थी। मुझे लगा बहुत हुआ। मैंने इजाजत मांगी। बोले बेलग्रेड से नोवीसाद रेल रात बारह बजे भी जाती है। मैंने कहा नहीं बहुत हुआ। चलते वक्त उनने हाथ बढ़ाया। मैंने हाथ नहीं मिलाया कहा - हमारे यहां गुरुजनों से हाथ नहीं मिलाते - उन्हें प्रणाम करते हैं। वे हंसे - कैसी अद्भुत हंसी है उनकी, जैसे किसी गुम्बद में फैलती आवाज। उनने मुझे अपनी कविताएं अनुदित करने की अनुमति भी दी है लिखित में और कहा है - तुम्हें फिर यूगोस्लाविया आना है- इस बार कविताएं पढ़ने - मैं इन्दिरा गांधी से कहूंगा। इसके बाद तो रोज नये लोगों से मिलना। इतने लोग इतने लोग कि क्या कहूं। आते आते लगा , एक माह यहीं रहते। लेकिन यह भी ठीक है - कि नये जगह आये हैं। मनू बेटे - पूत्रम के लिए हमने एक ट्रेक सूट खरीदा है - ठण्ड में काम आयेगा - ककू के लिए ऊपर की बनियान, नायलॉन की चॉकलेट भी ली है। पैसे बचे तो एक खिलौना भी लायेंगे। यहां से कमरा और टेपरिकॉर्डर लेंगे। देखे हैं। वैसे तो छोटे टेलिविजन भी सस्ते हैं - पर ले जाने की झंझट है। यहां बर्नेवेल्ड में हम जिस जगह ठहरे हैं , वहां एक महल है - पुराने बहुत पुराने जमींदार का - ÷ बेरोन' कहते हैं यहां, छोटा राजा समझो। उसके महल को छोटे छोटे कमरों में बांट दिया गया है। दूसरी मंजिल पर 215 नम्बर का कमरा है। हम अकेले हैं, अलग। सभी अलग अलग कमरों में हैं। पूरे मकान में पेण्टिंग है। खाने अपने हाथ लो - किचिन में - खाओ। तुम लोग समझते हो हम बहुत पीते हैं , ऐसी बात नहीं है- नहीं मिलती नहीं पीते- पर यहां रिवाज है - जहां जाओ वहां - जैसे हमारे यहां चाय काफी। पर मेरा स्वास्थ्य सुधरा है। आंखों के नीचे पतलापन नहीं है। अब डायटिंग बन्द कर दी है। व्यायाम जारी है। लेकिन देख कर अंतर करना मुश्किलहै। पूत्रम बेटे , हम यहां से 28 जून की दोपहर, 3.00 पर चलेंगे - सीधे दिल्ली। शायद 12 घण्टे की उड़ान हो। मेरा ख्याल है 29 को रात दिल्ली पहुंचेंगे - 9 बजे। यहां के और दिल्ली के समय में लगभग 6 घण्टे का फर्क। फिर एक दो रोज में घर। दिल्ली से हुआ तो बात करेंगे। चिट्ठी लिखो। हमें कोई कष्ट नहीं। सबको प्यार खूब खूब। हां , एक बढ़िया बात - हमें यहां टीटो के जन्मदिन पर नोवीसाद टेलीविजन में इण्टरव्यू पर दिखाया गया। बाईस में से हमें चुना गया। हमने दस मिनट का इण्टरव्यू दिया। 30 मई बर्नेवेल्ड ( हालैण्ड) तुम्हारे पापा सौजन्य : नेहा तिवारी
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