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शताब्दी लेख इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह लम्बी कहानी कहानिया मीमांसा कविताएं विशेष वृत्तान्त पत्र उपन्यास |
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हवाएं रेत पर चित्र बना देती थीं। सभी चित्र एक से नहीं होते थे। कभी गोले के अन्दर सर्पिल गोले , जैसे तालाब में उठती हिलोरें, कभी किनारों पर उथले, बीच में गहरे भंवर, तो कभी बालू पर एकदम बराबर से बनी हुई सिलवटें। कैसी सुडौल, सुन्दर आकृतियां थीं। जैसे किसी कलाकार ने बड़ी मेहनत और हाथ की सफाई से उन्हें बनाया हो। मगर हवाएं तो बस यूं ही चला करती थीं दिन भर, और चलने में ही यह निशान छोड़ जाती थीं...। महानगर के अस्पताल का कमरा अस्पताल के कमरे की तरह ही शून्य था। साफ सुथरा , चमाचम। दीवारों पर खुशनुमा तस्वीरें, पर्दों पर फूलों की छींट। ए.सी. से निकलती हवा दिल तक ठण्डक पहुंचा रही थी। मगर इन कमरों में रौनक कब हुआ करती है? ऊंची पलंग की झक सफेद चादर पर अमृता आंखें मूदें लेटी थी। डाक्टर ने हाथ मलते हुए कहा था - ÷ आइ ऐम सॉरी, सो सॉरी। इट इज वेरी सैड। यह रोग बिलकुल दबे पांव आता है। मरीज को खबर ही नहीं होती। और घातक कोशिकाएं हवा की रफ्तार से बदन में सफर करती हैं। एक से एक बढ़ते बढ़ते वे कहां से कहां पहुंच जाती हैं। अच्छे स्वस्थ सैल्स को निगल जाती हैं। कुछ महीनों के लिए केमोथेरपी तो देनी ही पड़ेगी...।' यह तो हो गयी कई दिनों पहले की बात। दस दिन या पन्द्रह दिन। महेश को ठीक ठीक याद नहीं रहा। महेश डाक्टर की बात सुन रहा था। डाक्टर की पीठ के पीछे खिड़की थी। थोड़ी देर के लिए खिड़की खोली गयी थी। खिड़की के बाहर एक गाड़ी आकर रुकी थी। एक आदमी नीली कमीज और काला पैण्ट पहने आकर गाड़ी में बैठा और गाड़ी आगे बढ़ गयी। महेश के जी में आया था कि काश वह भी उस गाड़ी में बैठ इस स्थिति के बाहर जा सकता। कहीं जहां पच्चीस साल पहले वाली स्वस्थ और हंसमुख अमृता जिससे उसने तभी शादी की थी, उसका इन्तजार कर रही होती। मगर अमृता तो यहीं थी, अस्पताल के कमरे में इस भयंकर बीमारी से जूझती हुई, अस्पताल के ही बिस्तर पर सोयी हुई। नींद की सुरंग में अमृता गुड़मुड़ायी हुई सो रही थी। सुरंग गहरी थी। कहां से शुरू हुई थी , कहां खत्म? उसका तो बस होना ही महसूस किया जा सकता था। कैसा लगता था, नींद की इतनी गहराई में उतर जाना? न दृष्टि थी, न स्वप्न, न स्पर्श। सब कुछ सुन्न पड़ा था। बस अंधेरे में से बहता हुआ अंधेरा। फिर अंधेरे की कगार पर चमकता हुआ रुपहली रेत का टीला कहीं दूरी में दिखता धीमे धीमे उग आया। अभी अभी तो था नहीं, अभी अभी हो गया। वह थार मरु था , मीलों तक फैला। रेत ही रेत। रेत से लदी आंधियां आती थीं। सपाट भूगोल का चेहरा मिटता था और बनता था। अभी दो साल भी तो पूरे नहीं हुए थे उन्हें राजस्थान में थार मरु गये। और थार मरु में ही थे सम के टीले। कैसे लगे थे टीले। जैसे सचमुच जिन्दा हों। वे सिर्फ बालू के टीले नहीं थे। वे सांस लेते, जागते जीव थे। सुबह की हवा उनकी कोमल गोलाइयों को सहलाती थी तब वे लहरों से चमचमा उठते थे। उन पर लगी छोटी छोटी कटीली झाड़ियां और पेड़ों के ठूंठ धूप की तेजी में सिहरने लगते। चमकीली रेत से बने यह अस्थायी टीबे हवा के इशारे पर उड़ते बैठते रहते थे। वे भी रेगिस्तान के यात्री थे, ऊंटों के कारवां और गाय बकरियों के झुण्ड की तरह। अमृता उन टीलों और उन पर बनी आकृतियों को मंत्रमुग्ध होकर देखा करती थी। उसको लगता था वह अनन्तकाल तक बैठी उन्हें देखती रह सकती थी। वह टीले पर कस कस के पैर गड़ाती ऊपर चढ़ जाती थी। फिर उतरती थी उसी तरह , मगर दूसरी तरफ से। पूरे टीबे पर ढेर सारे पैरों के निशान बन जाते थे। फिर दूर बैठी वह हवा को उन्हें मिटाते देखती रहती थी। थार की रेत सारी आवाजें अन्दर खींच लेती थी। पैरों के चाप सुनायी नहीं देते थे और एक ऐसी खामोशी उतरती थी जो सिर्फ आवाज की अनुपस्थिति भर नहीं थी। अमृता अपने शरीर के अन्दर दिल के धौंकने , फेफड़ों के घरघराने और पेट के गुड़गुड़ाने को कितनी सफाई से सुन सकती थी, मगर बाहर की पूरी फिजा पर एक सुनहरी खामोशी की चादर पड़ी रहती थी। वह बालू पर बैठ कर देखने और सुनने के सम्मोहन में फंस जाती थी। उस समय भी, जब वह अपने शरीर के अन्दर की आवाजें सुना करती थी, क्या उसी शरीर में उन भयावह कोशिकाओं की यात्रा शुरू हो गयी थी? जैसलमेर में एक रात बिताने के बाद वे थार मरु के सुनसान विस्तार में पहुंचे थे। और जहां मरुभूमि शुरू होती थी , उसके आगे जाके थे सम के टीबे। वैसे तो जैसलमेर से सिर्फ चालीस या बयालीस किलोमीटर की दूरी पर थे वे टीले, पर उनको वहां पहुंचने में घण्टे भर से ऊपर लग गया था जब कि अफसर के पास बड़े बड़े पहियों वाली ÷ क्वालिस' गाड़ी थी। अफसर महेश के ही विभाग का स्थानीय नुमाइंदा था जिसके निमन्त्रण पर वे यहां आये थे। जहां तक सड़क साफ समतल थी, ÷ क्वालिस' मीलों को तेजी से निगलती चली गयी थी, जैसे वह जाने कब की भूखी हो। मगर यहां तो रेत ही रेत थी, जिस पर तेजी से आगे बढ़ने में अड़चन होती थी। वे तीन ही जन थे। आखिरी वक्त पर अफसर की पत्नी आते आते रह गयी थी। महेश और अफसर यानी पंकज माथुर , तो सहकर्मी थे। रास्ते भर वे दोनों आगे वाली सीट पर बैठे विभाग की ही बातें करते रहे थे। अमृता को इनसे कोई मतलब नहीं था, न ही वह सुन रही थी। उसकी आंखें खिड़की के बाहर धीमी रफ्तार से बदलते परिदृश्य पर टिकी थीं। जैसे वह चलचित्र देख रही हो। कीकर और अकेशिया के कंटीले झाड़, कही कहीं नागफनी के बड़े बड़े घेरे। दूर दूर तक और कुछ नहीं, बस बालू के ढूह और सन्नाटा। सड़क पर एकदम आगे , शायद क्षितिज के बस पहले, जहां पर उसका देखना खत्म होता था, पानी सी चमकती मरीचिका दिखाई देती थी, जो पास पहुंचने पर और आगे खिसक जाती थी। भूले भटके कीकर के दुर्लभ साये में ऊंट जुगाली करता दिख जाता। यहां फिर आयेंगे, उसने सोचा था। तब मन्टू को भी साथ लेते आयेंगे। कहेंगे चार दिन की छुटटी ले लो। लड़का तो कहीं जाता ही नहीं था। बैंक में नौकरी क्या कर ली थी मानो दफ्तर से चिपक ही गया था। जैसे भी हो उसे लेकर ही आयेंगे, चाहे घसीट कर ही लाना पड़े। यह जगह तो कमाल की थी। इस तरह बिना किसी रुकावट के देखने का सुख तो आंखों को पहली बार मिल रहा था। जब सम से लगभग पांच किलोमीटर की ही दूरी बची रह गयी थी , पंकज माथुर ने गाड़ी रोक दीथी। ÷÷ यहां से ऊंट पर जाएंगे।'' उसने मुस्कुराते हुए कहा था। ÷÷ मगर गाड़ी...'' ÷÷ उसे यहीं छोड़ना होगा।'' तभी चमकती रेत और चौंधियाने वाली रोशनी में से एक ऊंट नमूदार हुआ था और उसके पीछे एक और ऊंट। जैसे कि वह बस पंकज के यह कहने भर के लिए वहां रुके हुए हों ? जाने कहां छुपे हुए थे ये ऊंट कि अब तक बिल्कुल दिखायी ही नहीं दिये थे। उनका रंग एकदम रेत के रंग का था। ऊंटों की बड़ी बड़ी और लम्बी पलकों वाली आंखों में बहुत गहरे तक रेत की ही परछाइर्ं थी, जैसे कि पूरी मरुभूमि उन्हीं की आंखों में इस छवि का प्रतिबिम्ब हो? ऊंट हांकने वाला एक छोटा बच्चा था। उम्र मुश्किल से आठ नौ बरस होगी। उसका नाम अलिफ था। दूसरे ऊंट के साथ इरफान था। उसकी एक आवाज पर ऊंट बैठ गये। तब अलिफ ने अमृता का बैग वगैरह ऊंट की जीन में बनी हुई टांगने की जगह पर टांग दिया और वे ऊंट की पीठ पर बैठे , अमृता आगे और उसको पकड़ कर महेश पीछे। फिर ऊंट खड़ा हुआ तो लगा भूचाल आ गया। बड़ी तेजी से वे आगे की तरफ लुढ़के, फिर पीछे की तरफ। मगर जल्दी ही संतुलन बन गया। एक छोटी सी लकड़ी से अलिफ ने ऊंट की पीठ पर मारा और जोर से चिल्लाया -÷÷ गो! माइकिल जैकसन गो!'' और ऊंट अपने लम्बे पैरों को मोड़ता समेटता बड़ी लचक के साथ चल पड़ा। उसके गले में पड़ा बड़े बड़े रंगीन मोतियों और कौड़ियों से बना सुन्दर गोरबन्ध उसके घुटनों तक लटक रहा था। ऊंट की चाल के साथ साथ वह भी झूम उठता था। उसके गले में घण्टी भी थी जो जब तब बज जाती थी। अमृता को ऊंट का नाम सुन कर हंसी आ रही थी। माइकिल जैकसन! दुनिया का यह सुदूर कोना और यहां माइकिल जैकसन ? मगर वह माइकिल जैकसन से जरा भी कम नहीं था। ऐसा दौड़ा कि माइकिल जैकसन भी क्या नाचता। अलिफ भी ऊंट की बगल में उसी रफ्तार से दौड़ रहा था। ÷÷ अरे रोको! रोको!'' अमृता चिल्लायी थी। उसे लगा हड्डी पसली चूर, अंतड़ी पचौनी सब बाहर आ जाएगी। अलिफ ने फौरन ऊंट को रोक लिया था और एक टेढ़ी सी मुस्कुराहट के साथ गाने लगा- ÷÷ क्यों हाल बिगड़ गया मम्मीजी।'' बड़ा शरीर था! अभी इतना कमसिन जो था। पंकज माथुर के ऊंट का नाम राजा था। वह इतनी तेज नहीं चल रहा था। जबकि उस पर सिर्फ अफसर ही अकेला बैठा था। अफसर ने टोपी लगा ली थी और धूप का चश्मा भी। उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। अलिफ बड़ा बातूनी था। ÷÷ मालूम है?'' वह बोला - ÷÷ यह रेत तो हमेशा से यहीं है। यह तो मुझसे भी पहले की है।'' ÷÷ अच्छा।'' महेश ने आंख मार कर आश्चर्य जताया था - ÷÷ तुझसे भी पहले की है? तो बता कितने सौ साल हुए?'' ÷÷ सौ नहीं बाबू जी, हजारों साल!'' उसने गम्भीरता से कहा था -÷÷ मगर ये टीले देख रहे हैं, न? ये तो एक जगह पर टिकते ही नहीं। पूरे के पूरे उड़ जाते हैं। अभी यह रास्ता है न, शाम तक यहां टीबा बन जाएगा। रोज रास्ते बन्द होते हैं और नये रास्ते खुलते हैं यहां।'' सचमुच ऐसा ही था। अमृता ने पीछे घूम कर देखा था की माइकिल जैकसन के पैरों के निशान फौरन ही मिट चले थे। कैसी दुनिया थी यह जिसमें कुछ भी स्थायी नहीं रहता था। जब जमीन पर ही भरोसा न हो तो और किस चीज पर होगा? ऊंट चलते चले जा रहे थे। जिधर देखो उधर रेत फिसलती हुई, दूर तक बालू से जन्मे टीलों की हल्की गोलाइयां। टीले समतल बालू में से धीरे से उठ आते थे जैसे कि आने वालों की आंख बचा कर चुपचाप खड़े हो जाने का कोई खेल खेल रहे हों, आंख मिचौली जैसा। रेत में ऊंट के पैर धंस जाते थे पर वे अविचलित आगे बढ़े जा रहे थे। बालों और भौहों में आंख नाक कान सब में बालू ही बालू था और बोलने के लिये मुंह खोलो तो दांतों के नीचे भी रेत की किरकिराहट महसूस हो रही थी। इसलिए वे सभी चुप थे। आवाज होती थी तो बस बीच बीच में ऊंटों के बलबलाने की। पंकज के ऊंट राजा की रफ्तार कुछ बढ़ी थी। अब वह बगल में ही चल रहा था। कभी अमृता को ऊंट के चौड़े और पीले दांतों की झलक मिल जाती थी। क्षितिज तक का भूगोल एकदम साफ था। न आदमी न आदमजात। ऊपर आसमान का विशाल गुम्बद और नीचे रेत का अनन्त। दूर पर , एकदम दूर वाले टीले पर कुछ हिलता हुआ दिखा। एक काला भूरा सा तिकोन जो एक बार हल्का सा खिसका, फिर स्थिर हो गया। कैसा आकार था वह, पेड़ या परछाईं? वे देर तक उसे देखते रहे पर उसमें फिर से हरकत न हुई। रेत के रंग से थोड़ा गहरा, बस मिलता जुलता ही, वह हिला न होता तो शायद वे उसे देख ही न पाते। ÷÷ वह क्या है?'' महेश ने उसकी तरफ इशारा करते हुए पूछा था। दूरबीन तो बैग में ही बन्द हो गयी थी, जिसे हिलते हुए ऊंट पर निकालना मुश्किल था। अलिफ की तेज आंखों ने पहले ही उसे देख लिया था। ÷÷ वह तो सोहन पक्षी है, रेत का राजा। हम लोग उसे गोदान पंछी कहते हैं। यहीं बालू पर उसका ठिकाना है। मुझ पता है आप लोग इंग्रेजी में उसे क्या कहते हैं।'' ÷÷ क्या?'' ÷÷ बास्टर्ड!'' उसने बड़े गर्व के साथ कहा। पंकज ठहाका मार कर हंसा - ÷÷ इसका मतलब है ÷ बस्टर्ड' द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड। यह तो कानून के तहत संरक्षित है। अरे अलिफ! तूने तो रेत के राजा को अभी अभी गाली दी।'' अलिफ ने मानो सुना ही नहीं वह बोलता जा रहा था - ÷÷ बस खुले में ही बैठता है यह। जिसमें दूर दूर तक देख सके। दिन में तो हिलता ही नहीं। वह अभी हिला था न? क्योंकि उसने हमें आते देख लिया है। अब वह चुप्पे बैठा रहेगा सिर छुपा कर। मगर चांदनी रातों में इसे देखो... सांप, टिड्डा, छिपकिली सब खा जाएगा। और जब उड़ता है तो बस देखते रह जाओ। कितना सुन्दर! आप से भी ज्यादा सुन्दर!'' उसने शरारत भरी निगाह अमृता पर डाली। ÷÷ अरे, अरे! इसे देखो तो।'' अमृता सकपका कर बोली थी - ÷÷ बित्ते भर का है और बातें गज भर की। तुझे किसने बताया यह सब इसके बारे में?'' ÷÷ अरे मैं तो यहीं रहता हूं। मुझे यहां की एक एक बात पता है। अब वह देखो बालू में फिसलते हुए निशान? वह तो बिस्तुइया ने बनाये हैं और वह चिड़िया के पैरों के निशान देख रहे हैं? यहां चील भी आती है और बाज भी... और यह नन्हें एकदम नन्हें छेद गुबरैले कीड़े ने बनाये हैं। यहां गाय बकरी सभी आते हैं न।'' अलिफ ने शेखी बघारने के अन्दाज में कहा। कैसी मायावी दुनिया थी वह। हर चीज एक संकेत थी , हर निशान का कोई मतलब था। जैसे कि जो दुनिया दिख रही हो आंखों से, उससे कहीं बड़ी जीती जागती एक और दुनिया भी जो सदा आंखों से ओझल मगर सांस लेती रहती थी। एक अदृश्य दुनिया जो कायम थी हजारों साल से। यह दुनिया बदलती खिसकती रहती थी मगर थी कितनी प्राचीन। अमृता को यह एक विरोधाभास की तरह जान पड़ा था। यहां रेत के टीले तो दिन भर में गायब हो जाते थे और मरुभूमि थी कि जाने कब से इसी जगह बनी हुईथी? वे टीलों के पार सूर्यास्त देखने जा रहे थे। थार मरु में आये हुए सैलानियों के प्रोग्राम में सूर्यास्त देखने की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। दूर दूर से वे आते थे , दुनिया के हर कोने से और सूरज के डूबने को खामोशी से देखते थे। सूरज तो रोज ही ढलता था, उनके देश में भी, मगर थार मरु के टीलों पर सूरज को डूबता देखने के लिये वे कितनी लम्बी यात्राएं करते थे। इन सैलानियों के ठहरने के लिये बड़े बड़े पंचसितारा तम्बू भी गड़े थे जिनमें सोने का कमरा, बाथरूम वगैरह अलग अलग बने हुए थे। जब राजा और माइकिल जैकसन अपनी सवारी लेकर टीले पर पहुंचे थे तो काफी लोग दूरबीन और मोबाइल फोन लिये पहले से ही वहां मौजूद थे। जैसे कि उनका सूर्यदेवता को दूरबीन में फंसा कर , उनसे मोबाइल पर बातें करने का इरादा हो। सारी भीड़ एक ही टीले पर नहीं थी। लगभग सभी टीलों की ढलान पर लोग खड़े थे। गुलाबी आसमान पर उनकी प्रतिच्छाया गहरी हो चली थी। ढलती रोशनी के इस खेल में मालूम देता था जैसे आसमान पर ढेर सारे दफ्ती के कटआउट चिपका दिये गये हैं। लाल सुनहरे सूरज का गुरूब होता हुआ गोला दूर रेत के टीले के पीछे गायब हो गया। खामोश इन्तजार का जो माहौल बना हुआ था एकदम से टूटा और अलिफ की ही उम्र के बच्चे पानी पेप्सी और फ्रुटी बेचते हुए सैलानियों के बीच फिरने लगे। रेगिस्तान में बसेरा करने वाले गवइयों के छोटे छोटे झुण्ड भी जहां तहां गा रहे थे। इनमें अकसर बच्चे भी शामिल रहते थे। जैसे रेगिस्तान की निर्जन प्रकृति से ही उपजे , यह ज्यादातर लांगा और मंगनियार होते थे जो एक जमाने से इस इलाके के गानेवाले रहे थे। उनके गाने शास्त्रीय रागों पर आधारित, लम्बी, अकेली तारों भरी रातों से ही फूट कर जन्मे थे और उनका स्वर थार मरु के फैले हुए एकान्त में गूंजता था। एक छोटा लड़का बिजली की तेजी के साथ खड़ताल बजा रहा था और उसके साथ बड़ा सा नीला साफा बांधे बूढ़ा कमैचे पर गाने लगा - ÷÷ केसरिया बालम आओ म्हारे देस...'' उसकी बूढ़ी आवाज की दरारें किसी पुरानी चिटकी हुई चट्टान की सी थीं जो अपने आप में बेइन्तिहा कशिश से भरी हुई मालूम दे रही थी। पूरी पार्टी शायद एक ही परिवार की थी। एक छोटी बच्ची हाथ हिला हिला कर नाचे जा रही थी। यह छोटे बच्चे भी कैसे कलाकार थे। क्या यह गाते बजाते ही पैदा हुए थे ? उन्होंने ऐसे मुश्किल ताल और सुर कब सीख लिये? गाने से एक समां बंध गया था और गाना खत्म होते ही सैलानी बिखरने लगे थे। बस दूर वाले टीले पर इक्का दुक्का लोग दिखायी दे रहे थे। तारे एकदम से नीचे लटक आये थे। वे तीन रेत में वहीं पलट गये थे। महेश ऊंट पर बैठ उचकते उचकते काफी थक गया था। पंकज उनसे थोड़ी दूर अपनी टोपी पर सिर रख कर लेट गया था। बस अमृता थकने के बजाये और तरोताजा महसूस कर रही थी। सम का वातावरण ठण्डी चांदनी , ऊंटों के गले की घण्टियां, नयी जगह के यह सारे आकर्षण उसके अन्दर एक नये जोश के एलान की तरह आये थे। ÷÷ कैसा सन्नाटा है!'' उसने कहा। वह बोली तो धीमे से थी मगर गूंजती हुई खामोशी में उसकी आवाज कुछ ज्यादा ही जोर से सुनायी दी। ÷÷ हम मण्टू को भी लेकर यहां दोबारा आयेंगे, नहीं महेश? कितनी ठण्डी रेत है। इसमें पैर घुसाओ तो जी चाहता है कि पूरे के पूरे अन्दर लेट जाओ। महेश...? ÷÷ हमम।'' ÷÷ रेगिस्तान कितना पुराना है?'' महेश ने हंसकर जवाब दिया - ÷÷ अलिफ से भी ज्यादा पुराना।'' ÷÷ मजाक मत करो। मैं सच में जानना चाहती हूं।'' ÷÷ मुझे क्या मालूम। होगा दस पन्द्रह हजार साल पुराना...।'' उसने ऐसी आसानी से यह जुमला फेका जैसे उसने दस पन्द्रह हज+ार न कहकर सिर्फ दस पन्द्रह ही कहा हो। मगर अमृता का दिमाग वर्षों का पीछा करते करते हजारों साल को बेधने की कोशिश करने लगा था। तब कैसा रहा होगा यहां ? रेत के टीले तो यकीनन तब भी ऐसे ही रहे होंगे। और झाड़ झंकाड़, अकेशिया और कीकर और सोहन पक्षी? सृष्टि के ÷ इवलुशन' के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं जानती थी मगर उसको लगा कि यहां के जीव जन्तु जानवर किसी पूर्वनिर्धारित क्रम में ही पैदा हुए होंगे। इन्सान का विकास तो और बाद में शायद सबसे बाद में हुआ होगा। सम के रास्ते में एक गांव पड़ा था जो ढाई सौ साल पुराना था। एकदम निर्जन था ; खाली सड़कें, खाली घर, बिना दरवाजे खिड़की के खाली दर, सभी कुछ मिट्टी के रंग का। वहां कोई कुआं नहीं था, न ही पानी का और कोई ह्लोत। तभी गांव वाले गाय गोरु लेकर वहां से चले गये थे। यहां के सभी रहने वाले, इन्सान और जन्तु, यहां तक कि टीले भी खानाबदोश थे। एक ठिकाने पर टिक ही नहीं पाते थे। बस यहां घर खड़े थे, एक संकेत और प्रमाण की तरह कि कभी यहां कोई रहता था। अमृता उन्हें देख कर रोमांचित हो उठी थी। लेकिन यह तो महज दो ढाई सौ साल पहले की बात थी। दस हजार या और भी ज्यादा साल पहले तक तो उसकी कल्पना पहुंचती ही नहीं थी। ÷÷ महेश, क्या यह रेगिस्तान दस पन्द्रह हजार साल आगे तक भी रहेगा?'' ÷÷ अरे तुम भी कैसे अटपटे सवाल पूछती हो! मैं क्या खुदा हूं जो तुम्हारे इन सवालों का जवाब दे पाऊंगा?'' महेश बेरुखी से बोला था। उसे नींद आ रही थी। अमृता के साथ ऐसा ही था। उसका दिमाग धुंधले ख्यालों से भरा रहता था और कल्पना की किसी डोर को पकड़े पकड़े वह जाने कितनी दूर निकल जाती थी। वह ठोस सच्चाइयों के घेरे में बंधना नहीं चाहती थी ; उनसे उसका दम घुंटता था। महेश के साथ उलटा ही था। उसका ठोस यथार्थ में ही विश्वास था और वह धरती पर पैर जमा कर रखता था। उसके लिए मतलब उन्हीं चीजों का था जिन्हें वह छू सके, सूंघ सके, पकड़ सके। अमृता का रोमांच की तरफ सदा खिंचता अव्यवहारिक सा स्वभाव उसे आकर्षित तो जरूर करता था मगर जहां तक उसका अपना सवाल था, वह यथार्थ को ही सत्य मानता था। अमृता के साथ रहते रहते वह अपने को उसका संरक्षक जैसा कुछ मानने लगा था। उसको लगता था वह अमृता को उसकी व्यर्थ की आकांक्षाओं से उबरने में मदद कर सकता है। रोजमर्रा की दिनचर्या, वास्तविक जीवन, वह समझता था जिन्दगी की गिरफ्त खुद ही अमृता को तराश कर असलियत का सामना करने लायक बना देगी। रात को वे सोते तो वह अपनी एक टांग अमृता के बदन पर डाल कर उसे अपने घेरे में ले आता था। उस घेरे में बन्द , अमृता उसकी बराबर से चलती हुई सांसों को सुनती रहती थी। रात के अंधेरे सन्नाटे में उसको महेश की यह जीवन शक्ति किसी बहुत बड़े राज से भरी मालूम देती। फिर एकदम से बेचैनी उसे बेतरह घेरने लगती और उसका मन तड़प उठता कि कहीं चली जाए, कहीं भी, बस इसी वक्त। थार मरु की टूरिस्ट कुटिया में उस रात वह देर तक जागती हुई पड़ी रही थी। महेश बेखबर सो रहा था। उसकी एक टांग अमृता के निचले धड़ पर लापरवाही से पड़ी थी। ऊंटों को लेकर अलिफ अपने साथी के साथ कब का जा चुका था। ऊंटवालों का डेरा टूरिस्ट कुटिया के सामने ही तो करीब दो सौ गज की दूरी पर था। अमृता ने महेश की भारी टांग अपने बदन पर से हटायी और जाकर खुली खिड़की के सामने खड़ी हो गयी। रेगिस्तान पर चांदनी सिहर रही थी , परत दर परत, वर्क की तरह। तारों से लदे आकाश के नीचे ऊंट की काली छाया विचित्र लग रही थी। इतने ढेर सारे नये दृश्य और आवाजों से अमृता का दिमाग एकदम सजग हो चुका था और उसकी रात जागती हुई बीती। भोर में वह फिर खिड़की पर खड़ी थी और उसने आश्चर्य से देखा था कि चांद चमकता हुआ अभी आकाश में मौजूद था और दूसरी तरफ उदय होते हुए सूरज का गोला भी धीरे धीरे आसमान में चढ़ रहा था। चांद और सूरज का इस तरह आकाश में एक साथ होना उसे बहुत आश्चर्यजनक लगा था। यहां की पूरी दुनिया ही आश्चर्यजनक थी। उन लोगों की बेहद मामूली रोजमर्रा की जिन्दगी से कितनी फर्कथी। सुहाने दिनों की खास सिफत होती है कि वे बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में लौटने में वक्त नहीं लगा था। आखिर तो चार दिन कितने लम्बे चलते। सम की तिलिस्मी दुनिया को भी वह इल्म हासिल नहीं था जो चार दिन को खींच कर शाश्वतकाल में बदल देता। चार दिन। जिनमें से एक तो जैसलमेर में ही निकल गया था। वे दिन पूरे के पूरे उड़ गये थे , बालू के टीलों की तरह। दिन महीने में बदले, फिर साल में और फिर दो साल में। अस्पताल का कमरा। जिन्दगी कितनी कठोर थी मगर कितनी हसीन। अमृता को सोच कर बहुत अजीब लगा कि तभी , जब वह सम की जादुई दुनिया के सम्मोहन में फंस रही थी, ठीक उसी वक्त उसके शरीर के अन्दर एक दूसरी भयावह दुनिया बननी शुरू हो गयी थी। कहां से कहां तक फैली थी इस दुनिया की सीमाएं? डाक्टर बोली थी- ÷÷ आप दो साल पहले आयी होतीं तो... दरअसल यह सैल्स बहुत तेजी से बढ़ते हैं। माइक्रोस्कोप के नीचे देखिए तो शरीर के अन्दर एक दूसरी ही दुनिया बसी हुई है। देखने में बहुत रंगीन है यह दुनिया, मगर जितनी रंगीन है, उतनी ही खतरनाक। आइ एम सारी।'' जिस वक्त वह सम के पर्यावरण के जादू में फंसी थी , तभी उसके शरीर का लैण्डस्केप बदल रहा था। कितने गहरे तक उतरती चली गयी थी वह सम की दुनिया में। उसका जी चाहा था कि अनन्तकाल तक बैठी वह बालू के टीलों पर हवा की लिपि को पढ़ती रहे। यह जीवन का कैसा विरोधाभास था कि यह दो जगत एक साथ चल रहे थे, एक बाहर वाला इतना सुन्दर, खुशनुमा और दूसरा इतना विकृत, विक्षिप्त? और एक तीसरी दुनिया भी तो थी, जिसे उसने महसूस किया था उसके संकेतों में मगर जो आंखों से ओझल ही रही थी? वह आंखें बन्द किये पड़ी थी। सोने का नाटक कर रही थी। शायद आंख लग ही गयी थी। अस्पताल के कमरे में उसको कितनी नींद आती थी। ऐसी नींद तो उसे घर पर भी कम ही आती थी। रोजाना उसकी यही शिकायत रहती थी , कि नींद नहीं आती और यहां तो बस आंख बन्द करते ही वह अंधेरे में लुढ़क जाती थी। शायद उसकी दवाओं में नींद की गोली भी शामिल हो। उसकी आंखें खुलीं तो वह फौरन महेश की परेशान आंखों से मिलीं। दोनों की आंखों के बीच की किसी गुमनाम जगह पर वह खौफनाक सत्य लटक रहा था जिसका सामना करने की गम्भीर कोशिश में दोनों मुबतिला थे। इन दोनों की आंखों के अलावा उस तीसरे की आंखें भी थीं। मण्टू की। मण्टू , उनका चौबीस साल का संजीदा बेटा। जिसकी आंखों में अम्मां की आंचल पकड़े वह तीन साल का मण्टू लौट आया था जैसे वह कहीं गया ही न हो। ÷÷ अम्मां...।'' खोये हुए बच्चे की आवाज फैले हुए थार मरु के निःसीम, निर्विकार शून्य में गूंजती हुई, हवा पर डूबती उतराती लौट आयी। ÷÷ अम्मां!'' मण्टू मां के सिरहाने पहुंच गया था - ÷÷ तुम जरा भी घबराना नहीं। मैं नौकरी छोड़ कर फुल टाइम तुम्हारी देखभाल करूंगा।'' ÷÷ ऐसी बेबकूफी की बात फिर मत करना।'' अमृता बोली - ÷÷ मेरे लिए जो कुछ हो सकता है वह तुम्हारे पापा तो कर ही रहे हैं। नौकरी छोड़ने से क्या होगा? क्या बार बार मिलती रहती है नौकरी? ÷÷ हां अमि! कुछ कह रही हो?'' ÷÷ महेश, थार का रेगिस्तान क्या दस हजार साल आगे तक भी रहेगा?'' फिर वही सवाल। दो साल पहले भी उसके दिमाग में यही प्रश्न आया था। और आज भी वह यही पूछ रही थी। उसके दिमाग में तो थार मरु जैसे बस ही गया था। क्या लेना देना था उसे थार से ? इतनी भीषण बीमारी और उसे पड़ी थी थार मरु की। ÷÷ बताओ महेश, रहेगा?'' प्रश्न वजनी ह |