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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

आलोचना के आयाम

राजीव कुमार

कविता की यह विधागत विशेषता है कि इसमें भावों , विचारों की किसी न किसी अर्थ में ÷ कोडिंग' होती है। अभिव्यंजना के विभिन्न उपकरणों बिम्ब, प्रतीक, मिथक, उपमा, उपमान, लक्षणा, व्यंजना एवं अन्यन्य शिल्पगत युक्तियों में कवि अपने भावों एवं विचारों ( वस्तु) को संकलित करता है। इनमें कवि की संवेदना भूमि, वैचारिक दृष्टिकोण तथा सरोकारजन्य आग्रह की भूमिका होती है। गद्य अपनी वर्णनात्मकता एवं विश्लेषणात्मकता के साथ पाठक तक जाता है लेकिन कविता में पाठक को रचनाकार के भाव जगत तक पहुंचना पड़ता है। सपाटबयानी के कवि समझे जाने वाले धूमिल को भी उनके समय सरोकार को समझे बिना हम आत्मसात नहीं कर सकते। क्या ÷ बैलमुत्ती इबारत' को धूमिल के किसानी संस्कार को जाने बिना ÷ डिकोड' करना सम्भव है? इसीलिए कविता के क्षेत्र में आलोचक/समीक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

आलोचना के भी दो आयाम हैं। एक तो आलोचक कृति के युगबोध , कृतिकार की संवेदना एवं अभिव्यंजना पक्ष की ( विवेचन, विश्लेषण करते हुए लेखक को) विशिष्टता अथवा विचलन को परखता है। दूसरी ओर कई बार आलोचक विचार एवं मूल्य के स्तर पर सक्रिय होता है। वह चीजों को नये सिरे से विश्लेषित करता है। चली आ रही स्थापनाओं में हस्तक्षेप करते हुए परख एवं बहस के लिए नवीन स्थापना, विश्लेषण एवं नये प्रश्नों को रखता है। विजयदेव नारायण साही ने ÷ पद्मावत' की चली आ रही अवधारणा ÷ सूफीज्म' के रूपक से अलग हट कर उसमें लोकजीवन की अभिव्यक्ति पाया। कविता का वैभव ( विनोद दास) तथा मुक्तिबोध : स्वप्न और संघर्ष ( कृष्णमोहन) आलोचना के इन्हीं दो अलग अलग आयामों से सम्बद्ध हैं। ÷ कविता का वैभव' में विनोद दास ने एक ओर समकालीन कविता के प्रभाव एवं सम्प्रेषण की समस्या को ÷ लोकेट' किया है तो साथ ही अज्ञेय, मुक्तिबोध से लेकर उदय प्रकाश तक विभिन्न कवियों की संवेदना, अभिव्यक्ति कौशल पर लिखते हुए उनके विरोधाभासों को भी सामने रखा है। कृष्णमोहन की आलोचना के केन्द्र में मुक्तिबोध हैं। ÷ मुक्तिबोध : स्वप्न और संघर्ष' जिसे स्वयं लेखक ने ÷ कविताओं की हार्दिक पहचान का माध्यम' कहा है, में ÷ हार्दिक पहचान' के क्रम में मुक्तिबोध की काव्य दुरूहता का परिहार करने का कार्य उनकी अर्थगर्भित शब्दावलियों एवं काव्य मुहावरों को विश्लेषित करके तो किया ही है साथ ही मुक्तिबोध पर चस्पा कुछ भ्रामक एवं सन्दर्भहीन प्रवादों तथा मार्क्सवादी आलोचना के अन्दर पनप आयी कुछ जड़ रूढ़ियों से भी जिरह की है।

 

आज की कविता प्लास्टिक बोध की कविता लगती है

 

हमारे वांड्मय में ÷ काव्य' से कविता तक की यात्रा में अनेक पड़ाव आये हैं। समय से जूझती हुई इस यात्रा में बोध एवं अभिव्यक्ति के स्तर पर अनेक परिवर्तन घटित हुए। इस प्रक्रिया के पीछे युगीन दबाव एवं सम्प्रेषण का प्रश्न मुख्य था। आज की कविता में शिल्प का स्थान प्रायः ÷ क्राफ्टिंग' ने ले लिया है तो सहज भावमयता के स्थान पर कृत्रिम करुणा अथवा उधार की संवेदनशीलता दृष्टिगोचर होती है। विनोद दास ने ÷ कविता का वैभव' की शुरुआत में इसी चिन्ता को स्वर दिया है। ÷ कठिन समय में कविता' शीर्षक लेख में समकालीन कविता में पहली नजर की विषयगत सकारात्मकता के बावजूद आलोचक को पाब्लो नेरूदा की भविष्य की कविता विषयक यह आशंका सत्य होती प्रतीत होती है कि हर कवि केवल दूसरे कवि के लिए रचनाएं प्रकाशित करेगा और अपनी जेब से कविता पुस्तिका निकाल कर दूसरे कवि की जेब में ठूंस देगा। ( पृ. 12) विनोद दास ऐसी आशंका बावजूद इस स्थिति के पाते हैं ÷÷ कविता की अन्तर्वस्तु पर यदि हम सरसरी तौर पर नजर डालें तो कोई भी यह कह सकता है कि उसने हमारे समय और समाज में चल रहे राजनैतिक एवं सांस्कृतिक पतन के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा है।'' ( पृ. 12) साथ ही ÷÷ समकालीन कवि सतही यथार्थवादी और प्रचारात्मक रुग्ण परम्परा से मुक्त हैं। इनके यहां सामाजिक मुद्दों को केवल अवधारणात्मक स्तर पर व्यक्त करने की प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती। ( पृ. 13) फिर ऐसा क्या है कि आलोचक महसूस करते हैं कि इधर की कविता ÷ प्लास्टिक बोध' की कविता हो गयी है। कविता एवं पाठक के बीच स्वतः स्फूर्त सम्बन्ध खत्म हो गये हैं। विनोद दास इसके पीछे दो कारण देखते हैं। एक, ब्लर्ब लेखन की आशीर्वादी परम्परा जो ÷ अभिरुचियों की कंडिशनिंग' कर देती है। दूसरा, मध्यवर्गीय कवि का छल। दास के अनुसार मध्यवर्गीय कवि बेहद चौकन्ना है। वह सामाजिक वैधता की फिराक में ही सामाजिक, राजनीतिक, मानवमूल्यों की वकालत करता है। उनका यह भी मानना है कि नया कवि एक किताबी एवं गढ़े हुए आत्म से कविता लिखता है। व्यवस्था और सत्ता के विरुद्ध सच्चा आक्रोश नहीं होने के कारण उसके दृश्य या बिम्ब या चरित्र जड़ीभूत सौन्दर्य के नमूने बन कर रह जाते हैं। एक अन्य लेख ÷ कविता एक सम्भावना है' में दास इस प्रश्न के कायल नहीं हैं कि कविता अपने समय की गवाही नहीं दे पा रही है। आलोचक की दृष्टि में समय की गवाही मात्र ही मुद्दा नहीं है। दास का जोर ÷ वैकल्पिक समाज की परिकल्पना' पर है। इसी लेख में वे समकालीन कविता की दो और प्रवृत्तियों को प्रश्नों के दायरे में लाते हैं। एक, मानक खड़ी बोली के बरक्स बोलियों एवं जातीय चेतना की उपेक्षा, दूसरा, पश्चिम के बने बनाये ढांचे का अनुकरण।

दरअसल इन लेखों में कवि हृदय आलोचक की कविता के प्रति चिन्ता व्यक्त हुई है। आलोचक ने जो प्रश्न उठाये हैं वह वर्तमान परिदृश्य के सन्दर्भ में तथ्यपूर्ण एवं विचारणीय हैं। इन प्रश्नों से मुठभेड़ करके ही समकालीन कविता में ÷ कविता तत्व' के हृास से बचा जा सकता है। लेकिन यहीं एक बात उभर कर आती है कि आलोचक ने अपनी चिन्ता का सामान्यीकरण कर लिया है। आज की कविता में भी जातीय चेतना, लोकभाषा अथवा ÷ अनकण्डीशण्ड संवेदनशीलता' की मौजूदगी को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। स्वयं दास ने इसी पुस्तक में उदय प्रकाश तक कई कवियों की सराहना के क्रम में इन तत्वों की उपस्थिति किसी न किसी रूप में चिह्नित की है तो सवाल उठता है कि क्या निराशाजनक परिदृश्य उदय प्रकाश के बाद की पीढ़ी से बना है?

÷ कविता का वैभव' में ज्यादा ÷ स्पेस' नयी कविता के कवियों से लेकर समकालीन कवियों ( उदय प्रकाश तक) को दिया गया है तथा उनके संग्रहों/कविताओं के माध्यम से पाठकों को उनकी काव्य दुनिया से परिचित कराया गया है। कवि केन्द्रित इन लेखों में आलोचक ने स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाया है। जातीय चेतना एवं लोकतत्व की उपस्थिति के कारण विनोद दास नागार्जुन एवं अरुण कमल पर रीझे हैं तो साही की प्रशंसा दार्शनिक दृष्टिकोण के लिए की है। एक कदम आगे बढ़ कर ÷ शुद्ध कविता' के आधार पर उनकी वकालत भी की है लेकिन सब कुछ अच्छा ही अच्छा वाला स्वर भी नहीं है। दास केदारनाथ सिंह की प्रशंसा के साथ उनकी सीमा को भी रेखांकित करते हैं तो तुकों से खिलवाड़ के लिए इब्बार रब्बी की आलोचना भी करते हैं। कवि आलोचक वाले खण्ड में कुंवर नारायण एवं मलयज के सकारात्मक पक्ष को सामने रखा गया है तो अशोक बाजपेयी को ÷ खराब आलोचना का उदाहरण' के रूप में देखा गया है।

÷ आधुनिक कविता के पांच स्तम्भ' में अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन एवं केदारनाथ अग्रवाल पर इकट्ठे विचार किया गया है। यह लेख एक ही युग में उपस्थित इन कवियों की संवेदनात्मक विशिष्टता, युगीन स्थितियों के प्रति उनके पक्ष को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अज्ञेय एवं मुक्तिबोध पर दास की टिप्पणी के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता हैः

÷÷ नेहरू की तरह भव्यता एवं उदात्तता अज्ञेय की पूंजी थी। लेकिन इनकी बौद्धिकता और सोच में उस सोच और सामाजिकता के बोध का अभाव था जिनके लिए नेहरू जाने जाते थे। दरअसल अज्ञेय का काव्य संसार मूलतः छायावाद से अपनी ऊर्जा प्राप्त करता था। फर्क सिर्फ इतना था कि छायावाद अपना संवाद वैश्विक स्तर पर सम्पूर्ण मानव जाति से करता था जबकि अज्ञेय की दुनिया स्वकेन्द्रित थी'' ( पृ34)

 

÷÷ मुक्तिबोध की कविताएं एक ऐसे झुंझलाये हुए मनुष्य की बड़+बड़ाहट और क्षुब्धता की अभिव्यक्ति हैं जो आजादी के बाद स्वाधीन भारत को लेकर एक विराट स्वप्न देखता है और उसके चकनाचूर होने पर इन दोनों पाटों के बीच नीच ट्रेजेडी बन कर जीवन सहने को अभिशप्त है। .... मुक्तिबोध की कविता निराशा की कविता नहीं है। उनकी कविता में संघर्षशील व्यक्ति नयी समाज व्यवस्था के लिए लड़ता है। ( पृ. 35)

इसी लेख में दास ने शमशेर को सौन्दर्य , प्रेम और संघर्ष के अद्वितीय कवि के रूप में देखा है जो सामाजिक गलाजत के विरुद्ध प्रेम और सौन्दर्य की अप्रतिम दुनिया रचते हैं जबकि नागार्जुन को भारतीय राजनीति की हलचल का सबसे प्रखर, प्रमुख और उत्तेजक कवि माना गया है। केदारनाथ अग्रवाल को श्रम और संस्कृति का कवि मानने के साथ ही पत्नी प्रेम एवं साहचर्य को उनकी संवेदना के विशिष्ट पक्ष के रूप में देखा गया है।

आधुनिक कविता के इन ÷ पांच स्तम्भों' के अतिरिक्त ÷ कविता का वैभव' में त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, इब्बार रब्बी, विष्णु नागर एवं उदय प्रकाश पर विचार किया गया है। रघुवीर सहाय को दास ऐसे महत्वपूर्ण कवि के रूप में देखते हैं जो समय और समाज की धूल से बचने के लिए अपनी नाक पर रुमाल नहीं रखता। आलोचक के अनुसार रघुवीर सहाय की कविता स्वाधीन भारत की कोख से जन्म लेकर लोकतंत्र की गोद में परिपक्व हुई। इस कारण उनकी काव्यात्मा लोकतंत्र के इधर उधर घूमती है। विनोद दास की आलोचकीय दृष्टि की यह विशिष्टता है कि वह कवि की संवेदना की परख सतही स्तर पर न करके उसके आन्तरिक स्तर की पड़ताल करते हैं। यद्यपि सुथन्ना पहने हरचरना, गर्भवती मजदूरन उनकी कविता में है। लेकिन दास के अनुसार ÷ प्रतिनिधि चरित्र एक निम्नवर्गीय गृहस्थ मतदाता है जो थोड़ा शिक्षित और नागर है। .... कविता में जिरह करता है, सवाल उठाता है।'

जातीय चेतना , लोकभाषा, आम आदमी की चिन्ता विनोद दास के यहां प्रमुख जरूर है लेकिन सकारात्मक पक्ष यह है कि उनमें मानदण्ड की रूढ़िबद्धता नहीं है। उन्होंने वैज्ञानिक दार्शनिकता, मानवता के सार्वभौम पक्ष, सांस्कृतिक चेतना - संवेदना के इन पक्षों के प्रति भी खुले मन से विचार किया है। प्रायः ऐसा देखा गया है कि लोकोन्मुख धारा के प्रति ( अति) आग्रही भावबोध के इन पक्षों के प्रति उपेक्षात्मक रुख अपनाते हैं। दास के यहां ऐसा नहीं है। उनके यहां साही, कुंवर नारायण पर भी विचार हुआ है, बल्कि साही की सकारात्मकता के प्रति वे मुखर हैं

÷÷ मैं यहां जोर देकर कहना चाहूंगा कि साही की कविता आध्यात्मिक कविता नहीं है, बल्कि उनकी कविता में एक दार्शनिक, एक वैज्ञानिक का मिजाज मिलता है।'' ( पृ. 60) एवं ÷÷ यदि कुछ लोग साही की इन कविताओं के विचार पक्ष को नापसन्द करते हैं तो वे शुद्ध कविता की दृष्टि से भी उनकी कविता का रसास्वादन कर सकते हैं।'' ( पृ. 61)

लेकिन शुद्ध कविता का यह तर्क हमेशा स्थिर नहीं रहता। कुंवर नारायण की प्रशंसा के साथ ही उनकी सीमा का भी निर्धारण है ÷÷ कुंवर नारायण का यह काव्य स्वभाव है कि वह जिन्दगी को सीधे कुछ कम किसी माध्यम के जरिए अधिक देखते हैं।'' ( पृ. 73)

इस पुस्तक में केदारनाथ सिंह पर एक महत्वपूर्ण लेख है ÷ धारदार चाकू नहीं, सुन्दर चाकू' । विनोद दास ने केदारनाथ सिंह को जीवन सौन्दर्य का कवि माना है जिनकी प्रकृति से गहरी रागात्मक सम्पृक्ति है। साथ ही उन्हें ग्रामीण जीवन पर लिखने वाला ऐसा कवि माना गया है जहां गांव फैशन या दया की तरह नहीं आता। लेख में ग्रामीण पक्ष की सराहना तो है लेकिन साथ ही ÷ प्रकृति के प्रसन्न पक्ष के कवि' के रूप में चिह्नित करते हुए आधुनिक युग के जटिल भावबोध की अभिव्यक्ति में उन्हें सक्षम नहीं पाया गया है-

÷÷ वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति के फलस्वरूप वर्तमान समय में मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों में जो तनाव, जटिलता और बदलाव आया है, उसकी समझ, विडम्बना और अंतर्द्वद की तस्वीरें इनके यहां कम ही मिलती हैं।'' ( पृ. 79)

इस लेख से इतर इब्बार रब्बी , विष्णु नागर एवं उदय प्रकाश पर लिखे लेख भी महत्वपूर्ण हैं।

÷ कविता का वैभव' में ÷ कवि आलोचक' के नाम से एक अलग खण्ड है जिसमें कुंवर नारायण, मलयज एवं अशोक वाजपेयी की आलोचकीय दृष्टि पर बात की गयी है। दास कुंवर नारायण की सराहना इस बात के लिए करते हैं कि वे कृति का मूल्यांकन कृति के तर्क से करते हैं, वैचारिक आग्रह से प्रेरित होकर नहीं। लेख में आलोचना को लेकर उनमें ( कुंवर नारायण) आधुनिकता एवं मार्क्सवादी दृष्टि के द्वन्द्व को भी रेखांकित किया गया है। मलयज को ऐसे आलोचक के रूप में देखा गया है जो ÷ पूर्व निर्दिष्ट निष्कर्ष' के साथ रचना को नहीं परखते तथा कृति की प्रशंसा एवं भर्त्सना की बजाए ÷ उसमें उपस्थित जीवन के विविधवर्णी रूपों को पहचानना और समय के सापेक्ष उन्हें रख कर उनकी सार्थकता को तलाशना' उनकी आलोचना का प्रमुख पक्ष है। पुस्तक के अन्तिम लेख में दास ने ÷ खराब आलोचना का उदाहरण' कहते हुए अशोक वाजपेयी की आलोचकीय दृष्टि से अपनी असहमति जतायी है।

इस आलोचना पुस्तक में एक साथ इतने कवियों एवं आलोचकों की दुनिया से गुजरना आजादी के बाद की कविता के संवेदनात्मक इतिहास को जानना है।

 

कविता की हार्दिक पहचान के लिए एक जिरह

 

मुक्तिबोध की कविता को तत्कालीन समाज की भयावहता का एक्स रे कहा जाता है। यह ऐसा समय था जब विश्व फासीवाद का भारतीय संस्करण खण्डित आजादी के छद्म आलोक को भी अंधेरे में बदल देने पर तुला हुआ था। रोजी रोटी के प्रश्न में उलझा बुद्धिजीवी अवसादग्रस्त होकर निष्क्रिय अथवा पलायनवादी हो रहा था। मुक्तिबोध ने इस चुनौती को स्वीकारा। मुक्तिबोध अपनी प्रखर मेधा एवं अद्भुत कला क्षमता के कारण लेखकों आलोचकों के लिए कई मायनों में अबूझ रहे तो जटिल यथार्थ की संश्लिष्ट अभिव्यक्ति के कारण पाठकों के लिए भी दुरूह बने रहे। स्वप्न, यथार्थ, अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के बीच निरन्तर आवाजाही वाली शैली उतनी सहज नहीं थी। समस्या तब हुई जब कुछ आलोचकों ने इसे सुलझाने और सही परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करने की बजाए सुविधानुसार दूसरी दिशाओं में मोड़ दिया। कुछ अलोचकों ने तो इसे व्यर्थ ही मुक्तिबोध के मनोविक्षेप से जोड़ दिया।

मुक्तिबोध : स्वप्न और संघर्ष जिसे स्वयं लेखक कृष्णमोहन ने ÷ कविताओं की हार्दिक पहचान का माध्यम' कहा है, में प्रारम्भिक तौर पर मुक्तिबोध को सही परिप्रेक्ष्य में रखने, उनकी अवधारणाओं को स्पष्ट करने तथा उनकी भविष्य दृष्टि के माध्यम से वर्तमान को पहचानने का प्रयास है।

हिन्दी आलोचना परम्परा में चीजों को सतही स्तर पर देखने या शब्दों अथवा सन्दर्भों को सुविधानुसार संकीर्णतावादी अतीतवादी , पुनरुत्थानवादी कहते हुए खारिज कर देने या पसन्दानुसार युग या समाज की सीमा बतलाते हुए उसे जायज ठहराने वाले तत्वों की भी उपस्थिति रही है। जाहिर है कि मतभिन्नता लोक अथवा साहित्य के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है लेकिन सन्दर्भयुक्त प्रवाद एक किस्म का भ्रम उत्पन्न करता है तथा संघर्षशील लोकोन्मुख काव्य की धार को कुन्द भी करता है। मुक्तिबोध की कुछ कविताओं ÷ भूल गलती', ÷ चांद का मुंह टेढ़ा है' आदि में उर्दू शब्दों एवं मध्ययुगीन शब्दावलियों के प्रयोग हैं। कुछ विचारकों ने इसे मुस्लिम शासकों के प्रति आक्षेप के रूप देखा है। मुक्तिबोध की ऐसी ही एक कविता का अंश है - ÷ देख, उसने कहा कि वाह वाह/रात के जहांपनाह/इसलिए आज कल/ दिन के उजाले में अंधेरे की साव है', इस कविता के सन्दर्भ से कृष्णमोहन ने मुक्तिबोध से सम्बन्धित उपरोक्त प्रवाद का खण्डन करते हुए चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में रखा है - जहांपनाह का प्रयोग किसी बादशाह के लिए नहीं, सन्‌ तिरपन्‌ के सत्ताधारियों के प्रति हुआ है। हां, इस आधुनिक सत्ता में घुलेमिले सामन्ती तत्वों की तरफ संकेत जरूर हो सकता है किन्तु इसके पूंजीवादी पहचान के प्रति भी मुक्तिबोध सजग हैं। ( पृ. 51)

मुक्तिबोध के लेखन में भाव , विचार, यथार्थ अथवा सौन्दर्य के प्रश्न, इनमें से कोई उथले ढंग से नहीं आते। तब जबकि यथार्थ जटिल है, सत्ता लोकतन्त्र का लबादा ओढ़े हुए सामन्ती मानसिकता की पोषक एवं पूंजीवादी क्रूरता से लैश है और स्वयं मध्यवर्ग वैचारिक विखण्डन का शिकार होकर अहमन्यता की गिरफ्त में है ऐसे में कवि को अपनी वैचारिकता एवं उद्देश्य के लिए कई स्तरों पर जूझना पड़ता है। मुक्तिबोध न तो सतही समाधान को स्वीकारते हैं और न ही कला की उपेक्षा करते हैं। इस द्वन्द्व के निर्वाह के लिए उनकी कविताओं में विशिष्ट सन्दर्भयुक्त शब्दावलियां आती हैं जिसके पीछे एक नयी दृष्टि है और बहुधा वह प्रचलित अर्थ से गहरे अर्थ की द्योतक होती है।

कला के किसी भी अनुशासन का एक लक्ष्य सौन्दर्य सृष्टि होता है। लेकिन जीवन की तरह ही इसके अभिप्राय देश/काल/विचार के अनुसार अलग अलग निर्मित होते हैं , गढ़े जाते हैं। भाववादी सौन्दर्यशास्त्र सत्य और सौन्दर्य को लेकर लोकसम्पृक्ति को तरजीह तो नहीं ही देता वहां जीवन जगत से जुड़ी कर्मजनित संवेदना भी महत्वपूर्ण नहीं है। मुक्तिबोध के लिये सौन्दर्य जीवन में ही निहित है। उनके अनुसार सौन्दर्य ÷ सृजनशील कल्पना के सहारे संवेदित अनुभव का विस्तार' है ÷... अनुभव प्रसूत फैण्टेसी में जीवन के अर्थ खोजने और उसमें आनन्द लेने की इस प्रक्रिया में ही जो प्रसन्न भावना पैदा होती है, वही एस्थेटिक एक्सीपीरिएंस का मर्म है।' इसे विश्लेषित करते हुए कृष्णमोहन लिखते हैं -

÷÷ सौन्दर्य अपने अस्तित्व के लिए सत्य पर निर्भर है और सत्य अपनी अभिव्यक्ति के लिए सौंदर्य पर आश्रित है। सत्य से कटा हुआ सौन्दर्य निराधार है और सौंदर्य से वंचित सत्य शक्तिहीन। ..... सौंदर्य से यहां हमारा आशय उस बहुस्तरीय, संश्लिष्ट और सुष्ठ संरचना से है जिसमें परत दर परत जीवन के वे अर्थ छुपे रहते हैं जिनके उद्घाटन से ज्ञानात्मक संवेदना से युक्त मस्तिष्क आनन्द का अनुभव करता है। जाहिर है, जीवन में दुःख और विषाद उत्पन्न करने वाले अर्थों की भरमार है, इसलिए यह कोई उथला आनंद नहीं, एक चिन्तनशील प्राणी के रूप में अपनी चरितार्थता से जुड़ा हुआ भाव है।''( पृ. 13-14)

मुक्तिबोध जिस वर्ग से सम्बोधित हैं यह मुख्यतः अन्तर्विरोध से ग्रस्त मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी है। यह वर्ग अपनी वर्गीय जकड़न में बद्ध रहते हुए किसी भी क्रान्तिकारी भूमिका से हिचकता है। इसके लिए मुक्तिबोध व्यक्तित्वान्तरण को जरूरी मानते हैं जिसके लिए आत्मसंघर्ष से गुजरना होता है कर्म के दो रूप मिलते हैं प्रेम और संघर्ष। .... संघर्ष शासक पूंजीपति वर्ग से भी है और अपने अन्दर ज्ञान को हासिल करने और उसे व्यवहार में लाने वाली रुकावटों से भी। इसे मुक्तिबोध आत्मसंघर्ष कहते हैं। ( पृ. 22) मध्यवर्ग जो वर्गीय सीमा से बद्ध होकर संघर्ष विमुख हो जाता है लेकिन सकारात्मकता के लिए छटपटाहट किसी न किसी रूप में उसके अन्दर मौजूद रहती है। कृष्णमोहन ने इसे मुक्तिबोध की संवेदना के विशिष्ट पक्ष के रूप में रेखांकित करते हुए कहा है -

÷÷ वे हिन्दी के अकेले कवि हैं जिसने उस पीड़ा को स्वर दिया है जिसे मध्यवर्ग का हर आदर्शवादी व्यक्ति कभी न कभी अपने मन प्राणों से महसूस करता है।'' ( पृ. 25)

कृष्णमोहन की शोध ( स्थापना) परक आलोचनात्मक दृष्टि तथा यथार्थ की समझ को हम इस पुस्तक के एक लेख ÷ सभ्यता के मर्म' के इन दो उदाहरणों से समझ सकते हैं जिसमें उन्होंने मुक्तिबोध के बहाने मध्यवर्ग की ऐतिहासिक भूमिका तथा पूर्व औपनिवेशिक भारतीय परम्परा के सकारात्मक पक्ष को रखा है-

÷÷ मुक्तिबोध की कविताओं को, सर्वहारा में बदलने को व्याकुल मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के आत्मसंघर्ष के रूप में तो पहचाना गया है, लेकिन उसके ऐतिहासिक राष्ट्रीय सन्दर्भ की अब तक अनदेखी ही हुई है। वास्तव में, आधुनिक पूंजीवादी युग में मध्यवर्ग ही राष्ट्रीय जीवन की अगुआई करता है। इसलिए भविष्य के समतापरक समाज की स्थापना के लिए मुक्तिबोध उसके रूपान्तरण को पर्याप्त महत्व देते हैं और ज्ञान के अनुरूप कर्म करने की समस्या को उसकी मूलभूत समस्या के रूप में चिह्नित करते हैं।'' ( पृ. 28)

÷÷ हमारी आध्यात्मिकता को ऐकान्तिक ढंग से हाईलाइट करने का काम सबसे अधिक पूरबवादियों ( ओरिएंटलिस्टों) ने किया है। हमें हमारी भौतिक परम्परा से काट कर एक नकली और अधूरी आध्यात्मिक पहचान हमारे ऊपर थोप दी गयी। उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों के हाथों हमारा जो पुनर्संस्कार हुआ, जिसे हम अपना पुनर्जागरण या नवजागरण कहते समझते हैं, यह उसकी सबसे बड़ी खासियत है। इसने हमारी स्मृति और चेतना में गहरी दरार डाल दी। मुक्तिबोध इसी परम्परा की पैदाइश हैं, लेकिन वे इसकी असलियत को पहचान गये हैं और अपनी पूर्व औपनिवेशिक परम्परा से मुखातिब है।'' ( पृ. 34)

सभ्यता , इतिहास अथवा परम्परा की पड़ताल एवं विवेचन से प्राप्त विवेक का परीक्षण वर्तमान को परखने और भविष्य के आकलन में ही होता है। मुक्तिबोध की एक कविता ÷ चांद का मुंह टेढ़ा है' की एक पंक्ति है- ÷ भयानक स्याह सन्‌ तिरपन्‌ का चांद वह!!', इसे विश्लेषित करते हुए कृष्णमोहन कहते हैं कि ÷ मुक्तिबोध शायद अकेले ऐसे कवि थे जिन्होंने नेहरू युग के आरम्भ में ही उसके अन्त को देख लिया था।' ( पृ. 48) वर्तमान के प्रश्न एवं भविष्य दृष्टि के साथ मुक्तिबोध की कविताओं में परम्परा एवं आधुनिकता के सन्दर्भ बार बार आये हैं। समय का विकास परम्परा एवं आधुनिकता के द्वन्द्व से ही होता है। किसी निश्चित समय को प्राप्त परम्परा में कुछ संकीर्णतावादी तत्व होते हैं तो कुछ विकासोन्मुख भी। बहुधा परम्परा को अतीतोन्मुख मान लिया जाता है। ÷ परम्परावादी संकीर्ण' बड़ा ही चलताऊ मुहावरा है। मुक्तिबोध इसे इस रूप में न लेकर विकासमान तत्व के रूप में देखते हैं। ÷ परम्परा एवं आधुनिकता' शीर्षक लेख में कृष्णमोहन इसे स्पष्ट करते हैं -

÷ मुक्तिबोध के लिए परम्परा अतीत की वस्तु नहीं है। वह व्यक्ति की भावनाओं संस्कारों में, धमनी में रक्त की तरह प्रवाहित रहती है। ..... आधुनिकता परम्परा की ही गुणात्मक रूप से परिवर्तित या रूपान्तरित अवस्था है। रूपान्तरण के इस संघर्ष में कर्म के अनेक रूपों का निष्पादन होता है।' ( पृ. 79)

कृष्णमोहन की विश्लेषण शैली की यह विशेषता है कि वे पुनरुत्थानवाद या नियतिवाद की ओर दबा रुझान भी नहीं दिखाते और इस मानदण्ड पर वे मार्क्सवाद की मनमानी व्याख्या से भी सहमति नहीं रखते। पुस्तक के प्रथम अध्याय ÷ सत्य और सौन्दर्य' में वे विचार रखते हैं कि सिर्फ सर्वहारा के उद्घोष से कुछ नहीं मिलने वाला है। इसी अध्याय में आगे लिखते हैं-

÷÷ हमारे यहां कुछ विचारकों में नियतिवाद के प्रति आकर्षण इस कदर था कि जब वे ऐतिहासिक भौतिकवाद के सम्पर्क में आए तो उन्होंने उसे ऐतिहासिक नियतिवाद बना कर स्वीकार किया..... लेकिन अन्तिम विजय के नाम पर वे दैनन्दिन की गैर राजनीतिक, अर्थवादी गतिविधियों में उलझे रहे और प्रतिक्रियावाद के पहले ही धक्के में यह समूचा विजय अभियान बिखर गया। मुक्तिबोध हिन्दी के पहले विचारक थे जिन्होंने सत्य के इस अकेलेपन को पहचाना था और उसे शक्ति से युक्त करने की ठानी थी।'' ( पृ. 19)

विचारधारा के सुविधाजनक विश्लेषण के प्रतिकार के साथ ही ÷ मुक्तिबोध : स्वप्न और संघर्ष' में जीवन के कतिपय पक्ष के प्रति एकाकी अथवा उपेक्षात्मक हो जाने के मुद्दे को भी उठाया गया है। प्रेम जीवन