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शताब्दी लेख इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह लम्बी कहानी कहानिया मीमांसा कविताएं विशेष वृत्तान्त पत्र उपन्यास |
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दिल्ली जैसे दिलजले और दागदार शहर में , जिन्दगी की भागदौड़ और भड़भड़, नौकरियों की नकचढ़ी कुड़कुड़ के बीच दिल दिमाग के दरवाजे मुहब्बत के इन्तजार में खुले हुए थे, यह हमें अब पता चला। हमने अब तक किताबों में पढ़ा हुआ प्रेम जाना था। यह सोलहवीं शताब्दी का , यह उन्नीसवीं शताब्दी का, यह 1940 का, यह 1950 का, यह नौकुछियाताल का, यह भोपाल का, वह प्राग का, वह प्रयाग का प्रेम है। इन सब में कुछ खाली जगहें थीं जो हमें अपनी तरह से भरनी थीं। यह एहसास हो रहा था कि अकहानी ने कहानी की स्पेस खत्म नहीं की है और अकविता ने कविता को बेदखल नहीं किया है। एक ही दिन के परिचय ने मेरे अन्दर इतनी ऊर्जा , ऊष्मा और उमंग भर दी कि मैं एड़ी से चोटी तक हरी हो गयी। दिल्ली के खरदिमाग ऑटोचालकों के प्रति मन कृतज्ञ हो आया। अगर वे सीधे से मुझे शक्तिनगर पहुंचा आये होते तो कहां आता जीवन में प्रेम। पड़ी रहती किसी मनहूस महिला कॉलेज में, लड़कियों की कॉपियां जांचती। उम्र चौबीस से चौतीस से चौवालीस होती जाती, रेगिस्तान रोज नजदीक आता। कॉलेज में ऐसी सहकर्मियों की कमी नहीं थी जो लाल मिर्च की तरह तेज, पतली और रूखी दिखायी देतीं। वे अकेली मिकाडो में बैठी चाउमीन खातीं, ओडियन में फिल्म देख लेतीं और गर्मी की छुट्टियों में अकेली मसूरी घूमने चली जातीं। मेंहदी उनके हाथों की जगह बालों में लगती जाती और अपनी लाल केशराशि से वे अलग पहचान में आतीं। कॉमेडी पढ़ाते हुए भी उनकी मुखमुद्रा ट्रेजिक बनी रहती। इनके विपरीत विवाहित प्राध्यापिकाएं ज्यादा सुगम्य और सन्तुलित थीं। किंचित मृदुल, किंचित पृथुल, ये एक आन्तरिक लय से अपना काम सम्पादित करतीं। इन्हें क्लास में जाने की कोई जल्दी न होती। अल्बत्ता घर पहुंचने की बेकली जरूर दिखायी देती। कॉलेज में ये दोनों प्रजातियां प्रतिपक्षी सैन्यदलों की तरह रहतीं। अन्तस्थ क्षेत्र में हम जैसी नव नियुक्त लेक्चरर थीं जिनके पास अभी सम्भावनाओं का समूचा आसमान था। प्रिंसिपल हम पर काम का बोझ लाद देती फिर भी हम हंसने का, कोैण्टीन में बैठने का, कनॉट प्लेस घूमने का समय निकाल लेतीं। हमें खबर लगती हैण्डलूम हाउस में साड़ियों का नया स्टॉक आया है, हम कॉलेज से ही ग्रुप बना कर निकल पड़तीं। कभी हम पर गॉगल्स खरीदने की धुन सवार हो जाती। कभी हम शंकर मार्केट में नया दर्जी तलाश करने में घण्टों बिता देतीं। जनपथ के मुकाबले शंकर मार्केट ज्यादा टिकाऊ किस्म का बाजार था जिसके नुक्कड़ का चाटवाला हमारी मनपसन्द आलू टिक्की बनाता। अंग्रेजी विभाग की लक्ष्मी मेनन और मैं कनॉट प्लेस के सभी रेस्तरां में जा चुकी थीं सिवाय टी हाउस के। टी हाउस की संस्कृति में लड़कियों के प्रवेश का निषेध नहीं पर स्वागत भी नहीं था। वहां महिलाएं पुरुषों के संग तो कभी कभी दिख जातीं, अलग से अकेले टी हाउस जाने का रिवाज नहीं था। लक्ष्मी को हिन्दी साहित्य की सीमित जानकारी तक नही थीं इसलिए टी हाउस का उसके लिए कोई उपयोग नहीं था। मैं अपने को इतना लेखक नहीं समझती थी कि टी हाउस में जाना अनिवार्य लगे। रवि का मामला अलग था। वे न सिर्फ लेखन को गम्भीरता से लेते थे , उनकी संगत भी लेखकीय थी। वे दफ्तर खत्म कर सीधे टी हाउस आ जाते। उनमें अड्डेबाजी के बहुत से गुण थे। यारों के यार तो वे थे ही, अपने वरिष्ट रचनाकारों के साथ भी वे मित्र भाव रखते थे। इसलिए उनकी टोली हमेशा बड़ी ही रही। इन सबका दरबार टी हाउस था। यह मित्र भाव लेखिकाओं के बीच न तब था न अब है। उन वर्षों में युवा रचनाकारों की खासी अच्छी संख्या दिल्ली में थी - मन्नू भण्डारी, इन्दु जैन, स्नेहमयी चौधरी, कीर्ति चौधरी, निर्मला जैन जैसे प्रसिद्ध हस्ताक्षरों के साथ साथ अनीता औलक, कान्ता भारती, मणिका मोहिनी, मोना गुलाटी, मीरा महादेवन और प्रभा दीक्षित जैसे नये चेहरे भी थे। सभी की कोई न कोई रचना लोगों का ध्यान खींच चुकी थी। लेकिन इनमें से कुछ अपने दाम्पत्य के दायित्व में तो कुछ प्रेम प्रसंगों के लालित्य में फंसी हुई लेखिकाएं थीं। इनमें से किसी के भी लिए लेखन पूर्णकालिक काम नहीं था। सातवें दशक में स्त्री वर्ग के लिए लेखन कोई प्रदर्शनीय कला नहीं थी। कहानी कविताएं लिख कर आलमारी में साड़ियों की तहों में छुपा कर कर रख ली जातीं और कभी धीरे से किसी पत्रिका में सम्पादक के नाम बुक पोस्ट कर दी जातीं। इससे अधिक लोकोन्मुखता अपचर्चा का बायस बनती। सम्पादक के नाम न कोई पत्र न फोन। लेकिन यह एक यथास्थिति थी जिसे उलांकने की तड़प मेरे मन में रही होगी। तभी रवि की दोस्ती ने मेरे जगत के न सिर्फ ताले तोड़े बल्कि आत्मविश्वास का आकाश भी दिया। उसने मुझे प्यार करना सिखाया। सिर्फ उसको नहीं, मुझे अपने आप से प्यार करना सिखाया। जब उसकी निगाह से मैंने अपने आप को देखा मैं एक नयी लड़की बन गयी। कितनी सहजता से उसने अपने जीवन में मुझे मिला लिया। उसने मेरी जिन्दगी का तापमान कई डिग्री बढ़ा दिया। वह मेरे लिए सुबह का अखबार बन गया। वह मेरा हर दिन का त्यौहार बन गयाा। वह मेरा प्रतिपल पुरस्कार बन गया। अब मैं पहले वाली वह लड़की न रही, सूखा बदन, रूखी त्वचा और चुभने वाली हड्डियों से भरी काया। मेरी देह में लावण्य उतरने लगा। आंखों में सजलता के साथ सलज्जता आती गयी। मैं जो अपना गांधी आश्रम छाप हुलिया बना कर घूमने में अपनी सादगी को अपनी विशिष्टता समझती थी, अब चुपके चुपके जनपथ की दुकानों से गुलाबी रंग की लिपस्टिक तलाशने लगी। साड़ी पहनने के बाद दो बार देखती, पीछे से किनारा पलट तो नहीं रहा है। ब्लाउज के नये नमूने आजमाने की इच्छा जागने लगी। मुझे अपनी समस्त अविवाहित दोस्त मनहूस दिखाई देने लगीं॥ वे ममी पापा जिनके साथ मेरा शाश्वत तिगड्डा बनता था अब मुझे बोर लगने लगे। अपने पते 25/39 शक्तिनगर की जगह 5055 सन्तनगर मेरी चेतना में समा गया। वहां रवि रहता था। कॉलेज से लौटते हुए कहीं रुक कर, भरी दोपहर मैं राजकमल प्रकााशन को फोन घुमा देती, यह सोच कर कि रवि वहां शायद हों। राजकमल प्रकाशन से ÷ नयी कहानियां' मासिक पत्र निकलता। रवि का दफ्तर भी दरियागंज में ही था। कभी कभी वहां दोपहर में अड्डा लगता। कभी कमलेश्वर तो कभी जवाहर चौधरी मेरी आवाज सुन कर, हंसते हुए जवाब देते, ÷÷ नहीं कालिया यहां नहीं आया।'' मैं संकोच से गड़ जाती। कॉलेज से पैदल वापस चल पड़ती। मन में स्मृतियों का अलबम खुला होता। हर आवाज जलतरंग जैसी मधुर सुनायी देती। कई बार एकदम पास से , लगभग छूते हुए बस या ऑटो रिक्शा गुजर जाता। मन में गुलेरी जी की कहानी ÷ उसने कहा था' की चेतावनी सुनायी देने लगती ÷ हट जा जीणे जोगिये, हट जा करमावालियो' मैं हर तस्वीर में अपनी कल्पना मिला कर उसे और सजीव बना डालती। घर पहुंचने की कोई जल्दी भी न होती। घर की आवाजें मेरा रवि-इन्द्र-जाल तोड़ने लगतीं। उन वर्षों में दिल्ली में किसी को फोन करना इतना आसान नहीं था। आज की तरह न जगह जगह पी सी ओ थे न मोबाइल। दिल्ली के सरकारी अफसरों को भी फोन लम्बी प्रतीक्षा सूची में इन्तजार करने के बाद मिलता। तब तक , कई बार फिर तबादले का फरमान आ जाता। जिनके घर फोन होता वे फोन बैडरूम में नजर से बचा कर रखते। ज्यादा समझदार लोग उसके ऊपर एक कफन भी डाल देते। ÷ कैसे हो? क्या कर रहे हो' जैसी कैजुअल बातों के लिए फोन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। प्रायः फोन करने के लिए एक्सचेंज जाना पड़ता। वहां एक सरकारी आदमी सरकारी आवाज में आपसे नम्बर पूछता और सरकारी गति से नम्बर मिला कर फोन का काला, भद्दा भौंडा चोगा आपकी तरफ बढ़ा देता। आपकी आधी तरलता, सरलता और स्निग्धता पर इस माहौल में राख पड़ जाती। आपकी संवेदना आधी पीली आधी हरी हो जाती। तब तथ्य के सिवा और कुछ भी न फूटता जुबान से। 1965 की शुरुआत में ऐसे ही होता था प्रेम। भौतिक सुविधाओं की कमी को दिल दिमाग के अहसास, ख्याल और ख्वाब से पूरा कर लिया जाता। बल्कि ये उपकरण प्यार के स्वप्न को कुछ ऐसे पूरा करते कि कल्पना और यथार्थ के बीच जोड़ नजर ही न आता। कभी मैं कॉलेज से निकलती तो देखती रवि फाटक पर खड़े हैं इन्तजार में। मैं पूछती , ÷÷ आज तुम्हारी छुट्टी थी क्या?'' रवि हंस देते , ÷÷ हां थी, कोर्टशिप लीव।'' हम घूमने निकल जाते। पैदल चलते हुए मुझे लगता रात भर में मेरा कद एक दो इंच घट गया है। एक बार मैंने , लम्बी लगने के लिए ऊंची एड़ी की चप्पलें पहन लीं। रवि ने बालूजा से मुझे चपटी चप्पलें दिलायीं और कहा, ÷÷ जैसी हो, वैसी ही रहो, अच्छा लगता है।'' शहर उसी का होता है जो घूमता है ; शहर की सड़कें और सड़कों के मोड़ पहचानता है। हमें सिर्फ चलना होता, पहुंचना नहीं होता था। दिल्ली की कई सड़कें कितनी खूबसूरत थीं - मनुष्य के रचे शब्दों से परे, यहां पेड़ों के पत्ते बोलते, छायाएं गले मिलतीं और टहनियों में से अंधेरे उजाले की आइसपाइस चलती। रिज रोड के अलावा बाबर लेन, महरौली और ओखला की सड़कें उतरती शामों को भेदभरी हो जातीं, रहस्यमयी। धीरे धीरे सभी पेड़ों का अन्तर मिट जाता, केवल ताड़ अलग से अपनी उपस्थिति बतलाता रहता। मुझे वापस जाने की हड़बड़ी हो जाती। रवि नाराज होते, उदास होते। फिर घड़ी के आगे लाचार, टैक्सी ढूंढने लगते। घड़ी हम दोनों की दुश्मन थी लेकिन अलग ढंग से। मुझे शक्तिनगर छोड़ कर रवि अगले दिन की प्रतीक्षा आरम्भ कर देते। मैं अपनी घड़ी घण्टा भर पीछे कर घर में ऐण्ट्री लेती कि ममी का तना हुआ चेहरा और चुभती टिप्पणियां मेरा मन छलनी कर डालतीं। मन होता वापस रवि के पास चली जाऊं। मैं कपड़े बदलती, हाथ मुंह धोती, डाक देखती; ममी की भुन भुन मच्छर की तरह मेरा पीछा न छोड़ती - ÷÷ कहां गयी थी। इत्ती देर कैसे हो गयी। तेरे में और बड़ी वाली में फर्क क्या रह गया। ऐसे ही वह करती थी। आने दे आज तेरे पापा को। अभी बात पक्की है न कच्ची लेकिन घूमना जरूरी है।'' मेरे अच्छे दोस्त पापा भी गलत रपट के चलते थानेदार की भूमिका में आ जाते। वे कहते , ÷÷ नो नो मुन्नी दिस इज नॉट टु बी टॉलरेटेड। दीज हिन्दीवालाज आर वेरी रैकलैस। यू शुड बी बैक बाय सिक्स।'' ( नहीं नहीं मुन्नी , यह तो बर्दाश्त बाहर है। ये हिन्दी वाले बड़े लापरवाह होते हैं। तुम्हें छह बजे तक वापस आना ही आना है।) मेरा मुंह बन जाता। रवि का दफ्तर पांच बजे तक का था। अगर हम कनॉट प्लेस तक भी जाते तो हमारे पास बात करने को सिर्फ बीस मिनिट बचते। जिस तरह पापा आकाशवाणी में प्रोग्रामों के चन्क ( टुकड़े) मिनिट के हिसाब से तय करते, ऐसे हमारा जीवन भी तय करने का जिम्मा लेते। यह हक हम दोनों में से कोई किसी और को नहीं देना जानता था। भले हों पापा। फिर जिस शब्द से मेरे अन्दर उनके लिए खिलाफत आन्दोलन भड़क उठता वह था हिन्दीवाले। जाहिर है पापा अपने आप को अंग्रेजी वाला समझ कर फतवे जारी कर रहे थे। जब कि मैं इतने ही दिनों में सिर से पैर तक हिन्दीवाली हो गयी थी। इंग्लिश मेरे लिए सिर्फ नौकरी की भाषा रह गयी। मैं ढूंढ ढूंढ कर हिन्दी की पुस्तकें पढ़ती। रवि ने मुझे सर्वेश्वर की एक कविता सुनायी - ÷ इधर आओ चांदनी का स्कार्फ तुम्हारे चेहरे पर बांध दूं।' बावली होकर मैं सर्वेश्वर का समस्त साहित्य पढ़ गयी। रवि को मोहन राकेश के नाटक ÷ आषाढ का एक दिन' की कई पंक्तियां कंठस्थ थीं जिन्हें वे अक्सर दुहराया करते - ÷ लगता है तुमने अपनी आंखों से इन कोरे पृष्ठों पर बहुत कुछ लिखा है। ये पृष्ठ अब कोरे कहां हैं मल्लिका? इन पर एक महाकाव्य की रचना ही चुकी है। अनन्त सर्गों के एक महाकाव्य की!' मैं राकेश साहित्य का पारायण कर डालती। रवि सिर्फ हिन्दी तक सीमित नहीं थे। हेमिंग्वे उनके प्रिय लेखक थे। मैंने भी हेमिंग्वे पढ़ रखा था। हम किसी कहानी की शामिल याद कर सिहर उठते या हंस पड़ते : नाइदर निक नॉर निक्स बिग हैन्ड लिसिन्ड टु हर ( उसका कहना न निक न उसके विशाल हाथ ने माना ) हम ÷ ला बोहीम' में जा बैठते। वहां मुख्य हॉल के साथ एक और छोटा हॉल था ÷ गुफा' । गुफा अपने नाम की सार्थकता में इतनी अंधेरी जगह थी कि वहां बिल दिखाने के लिये वेटर को टॉर्च जलानी पड़ती। दिल्ली के बेताब जोड़े वहीं मिलते। इससे पहले मैं कभी ला बोहीम नहीं गयी थी। इससे पहले मैंने अंधेरा नहीं देखा था, इससे पहले मैंने नहीं जाना था विल्ज फिल्टर का धुआं इतना मनमोहक होता है। वहां हम तरह तरह की कॉफी पीते। लेकिन कैदियों की तरह हमारी मिल्लत का वक्त बहुत जल्द पूरा हो जाता । मैं सिर्फ एक लफ्ज बोलती ÷ पापा' और उठ देती। समूची सिम्फनी उखड़ जाती। रवि कहते, ÷÷ हाय यह प्रतिदिन पराजय दिन ढले के बाद।'' टी हाउस में रवि की गैरहाजिरी बराबर खटक रही थी। कहां तो वह वहां साल में तीन सौ पैंसठ दिन बैठा दिखता था। कहां वह जा ही नहीं रहा था। मैं कहती , ÷÷ मुझे छोड़ने के बाद टी हाउस चले जाया करो।'' रवि नहीं मानता। वह अपने आप को ज्यादा जानता था। कभी कभी टी हाउस की दुनिया के मित्र कनॉट प्लेस में टकरा जाते। एक दिन नामवर जी दिखे। रवि को उनसे जरूरी बातें करनी थी रवि ने साग्रह कहा , ÷÷ नामवर जी आप सात बजे लाबोहीम आ जाइएगा।'' उस शाम हम सात की जगह साढ़े सात तक इन्तजार करते रहे , नामवर जी नहीं आये। बाहर निकल कर हम टी हाउस की तरफ मुड़े। संयोग से वहीं नामवर जी दिख गये। रवि ने कहा , ÷÷ नामवर जी आप आये नहीं?'' नामवर जी ने कहा , ÷÷ मैं तो आया था, तुम दिखे ही नहीें।'' ÷÷ हम वहीं थे, अन्दर गुफा में।'' नामवर जी हंस दिये , ÷÷ भई मैं। जनरल वार्ड में घूम कर लौट गया।'' कभी कभी हम कनॉट प्लेस के पिछवाड़े घूमते। पीछे की गलियों को देख कर कोई सोच नहीं सकता था कि आगे के गोलार्द्ध में इतनी भीड़ और शोर होगा जिसे आम भाषा में रौनक कहते हैं। ये ज्यादातर पार्किंग लेन थीं। जहां तहां रेस्तराओं के पिछले दरवाजे यहां दिखते। यहां अण्डे , डबलरोटी और तरकारियों की डिलिवरी वैन से सामान उतारते सेवक दिखायी देते। यहां कमोबेश एकान्त होता पर उमंग न होती। पीछे से कनॉट प्लेस बेडौल नजर आता। कनॉट प्लेस से उसकी गोलाई छीन ली जाय और खम्भे हटा दिये जाएं तो कनॉट प्लेस और इमली बाजार में कोई फर्क न रह जाय, हमें ऐसा लगता। मेरे जेहन में अब तक दिल्ली का अजब भूगोल बसा था। एक तरफ मेरे लड़कपन का शहर था - कूचा पातीराम, सीताराम बाजार, चावड़ी बाजार। वहां चांदनी चौक का भीड़भड़क्का था, लाजपतराय मार्केट की रंगीनी थी, विज रेस्तरां में चम्मचों की छन्न पटक थी, गली परांठे वाली के किसिम किसिम के परांठे थे, खारी बावली में उड़ती मिर्च मसालों की गन्ध थी, फतहपुरी में अखबारवाले फूफा जी की घुमन्तू दुकान थी। एम. ए. पास करने तक पुरानी दिल्ली बदल गयी थी। चांदनी चौक में भीड़भड़क्का तो बढ़ गया था , बाकी हर चीज घट गयी थी। गली परांठावाली में परांठों का साइज घट गया था, संग परोसी सब्जियों की गिनती बढ़ गयी थी, उनकी लज्जत घट गयी थी। दरीबा कलां की चमक बढ़ गयी थी उसमें मौजूद घर्मकांटे की इज्जत घट गयी थी। खारी बावली के मसालों में मिलावट की शिकायत मिलने लगी थी। और फतहपुरी से अखबार वाले फूफा जी गायब हो गये थे। लाजपतराय मार्केट अपनी नूतन चकाचौंध से चांदनी चौक का खांटीपन खत्म कर रहा था। वहां कदीमी दुकानों के खानदानी सेल्समैन ऊंघते बैठे रहते और लाजपतराय मार्केट के चुस्त पंजाबी युवक नये कट और निराली काट के कपड़े फटाफट बेच डालते। व्यापार वहीं पनपता है जहां भीड़ जाय। भीड़ लाजपतराय जाती। इस मार्केट ने क्रय विक्रय के समस्त सिद्धान्त ध्वस्त कर डाले। उसी तरह जैसे जनपथ की गुमटियों ने कनॉट प्लेस की विशाल दुकानों को निद्रालयों में बदल दिया। इस लिहाज से सातवें दशक में बाजारवाद ने दिल्ली में दस्तक देनी शुरू कर दी थी पर दिल्ली हमेशा से ऊंचा सुनती थी। अपने ही घर द्वार और देश का विभाजन झेल कर आये लोग सिन्धी , पंजाबी और अन्य उत्तर भारतीय सफलता की संकल्पबद्धता के साथ लाये थे पुनर्प्रतिष्ठा की प्रतिज्ञा और व्यवसाय की वाक् विदग्धता। उन्होंने दिल्ली का समस्त व्यापार विवेक हिला दिया। जहां गुजाइश मिली, चीड़ के फट्टे जोड़ कर दुकान जमायी और शुरू हो गये। कोई खूबानी बेच रहा है तो कोई खरबूजे, कोई बड़ियां पापड़ की हट्टी खोल कर बैठा है तो कोई चीनी बेच रहा है। इस विस्थापित जमात ने अपने को स्थापित करने में अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी। जिस दाम सूजी मैदा और चीनी खरीदी, उसी दाम बेंच दी और कहा, ÷ चलो बोरा तो बचा न, वही पांच रुपये कमायेगा।' शक्तिनगर में थोड़ी सी पुरानी दिल्ली और थोड़ी सी बदलती दिल्ली तो दिखायी दे जाती , नयी दिल्ली का संस्पर्श यहां बिल्कुल न था। यहां के घिचपिच मकानों, छोटे जंगलों और नीची छत वाले कमरों में लोग एक बंधा घुटा जीवन जीते और तमाम हो जाते। सुरंग जैसी भिंची रसोई में महिलाएं दिन का बड़ा हिस्सा गुजार कर खुद भी वैसी ही हो जातीं, आत्मकेन्द्रित, सीमित और संकुचित। लौट कर मुझे ऐसे घरों और ऐसे जीवन से दहशत होती। मुझे लगता ये तंग मकान बड़ा प्रतीकार्थ लिये हुए हैं। इनसे दिल्ली के दिलों का अन्दाजा लगता है। इन्हें बनाने वालों के दिल संकरे, इनमें बसने वालों के दिल और भी संकरे। अपने एकल जीवन का देना पावना निपटा लेने के सिवा और काई सरोकार नहीं। समकालीन साहित्य और नये विचारों के सम्पर्क में आकर जाने अनजाने मैं शिक्षित हो रही थी और दीक्षित भी। पुरानी दिल्ली से रोज नयी दिल्ली के सफर में हर रोज मैं थोड़ी नयी हो रही थी। मेरे अन्दर नये सवाल और कौतूहल जन्म ले रहे थे। जीवन के प्रति नया विस्मय और आहृलाद मेरी रगों में दौड़ने लगा था। माता पिता इन परिवर्तनों से अनभिज्ञ थे या रहना चाहते थे , यह स्पष्ट नहीं था। विशेषकर मांओं को लीक पर चलने वाली लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं। वे उनसे किसी बदले नजरिये की मांग नहीं करतीं। वे उनकी बतायी दुकानों से कपड़े खरीदतीं, उनके ढूंढे दर्जी से कपड़े सिलवातीं और उनकी तरह से अचार डालती हैं। परम्परा के प्रतिपादन का सुख ऐसी ही सन्तानों से प्राप्त होता है। इस लिहाज से ममी इन दिनों मुझसे खुश नहीं थीं। पापा मौलिकता की कद्र करते थे। मुझ पर विश्वास भी करते। लेकिन रोज रोज की क्रान्तिकारिता उन्हें ग्राह्य नहीं थी। उन्हें यह भी यकीन नहीं था कि हमारी दोस्ती दाम्पत्य की दहलीज तक पहुंचेगी। हमारे मन में कोई संशय नहीं था। रवि कहते , ÷÷ वैसे पापा एक नोबेल आत्मा हैं लेकिन वे समाज भीरु हैं। अगर उनमें साहस न हो और तुम्हें रोकें तो तुम पहनना अपनी स्लिपर्स और चली आना सीधे 5055 ।'' रवि के कहने के साथ ही मैं गयी गयी हो जाती। रवि ने अपनी दुनिया में मुझे सगर्व प्रविष्ट करवाया। उसने दुनिया से कहा, ÷÷ देखो ये ममता है, मेरी पसन्द।'' मानो दुनिया को पता है ममता क्या है, कौन है। कभी किसी को यह कहने का मौका न दिया कि यह भी क्या पसन्द है तुम्हारी। इसी दिल्ली में एक से एक धूप धुली लड़कियां उसे दिल देने को तैयार बैठी थीं। पंजाब में रवि की माता जी ने उसके कद की टक्कर की साढ़े पांच और पौने छह फुट लम्बी लड़कियां ढूंढ रखी थीं। पर रवि कहता मुझे कोई नहीं देखनी। उनकी तस्वीर भी मत दिखाओ। मां कहतीं , ÷÷ कैसी है तेरी ममता?'' रवि कहता , ÷÷ आप सवेरे सवेरे जो गाती हैं, ममता तू न गयी मेरे मन से, बस वैसी।'' मां समझ गयीं उनके बेटे को लगन की अगन लग गयी है। उन्होंने कहा , ÷÷ मुझे दिखायेगा?'' मां दिल्ली आयीं। मुझे बिड़ला मन्दिर में बुलवाया। मेरी ममी ने चिढ़ा कर कहा , ÷÷ हर लड़की बिड़ला मन्दिर में ही दिखायी जाती है। पड़ गयी न तू बहन जी बाले ढर्रे में। जा तो रही है, अगर वे कुछ दें तो ले मत लेना। हमारी नाक कटेगी, कैसी नदीदी है। उनके सामने, बेवकूफों की तरह पूरा मुंह फाड़ कर हंसना मत। अभी हमारी तैयारी नहीं है। जब होगी तब उन्हें बाकायदा घर बुलायेंगे।'' वह तैयारी हमारे घर कभी भी न हुई। क्यों न हुई यह पता नहीं चला। पापा तो दफ्तर के बाद किताबों की दुनिया में खोये हुए इन्सान थे पर ममी तो बुद्धिजीवी नहीं थीं। शायद आगामी जिम्मेदारियों से नकार का नजरिया रहा हो उनका। एक एक कर सभी सम्बन्ध ममी पापा ने ऐसे ही कतर दिये , कभी हमारी पढ़ाई, तो कभी अपने दफ्तर की व्यस्तता के बहाने। वसन्त के दिन बहुत जल्द बीत गये। मौसम बदलने के साथ ही रवि को धर्मयुग में उप सम्पादक के पद पर बुला लिया गया। यह एक बिल्कुल नयी परिस्थिति थी। वापस अपने एकान्त मे लौटना हम दोनों की मजबूरी थी। जिस दिन रवि की रेलगाड़ी दिल्ली स्टेशन से रवाना हुई मेरी आंखों में आंसू नहीं थे पर गहरी उदासी और असुरक्षाबोध तो था ही जिसे मैं उनके दोस्तों की नजरों से चश्मे के पीछे छिपा गयी। हाथ में अब सिर्फ प्लेटफॉर्म की टिकट शेष थी। यह शहर से महज एक दोस्त का जाना नहीं था , जीवन के स्फूर्ति। स्पर्श का छिन जाना था। अब मेरे पास था बेमजा कामों का अन्तहीन सिलसिला। शहर की लम्बाई चौड़ाई रातोंरात घट गयी। शहर में मौजूद पंछियों की 450 किस्मों में से 449 उड़ गये, बस कौवे रह गये कांव कांव करते। कांव कांव तो कॉलेज में भी थी। इससे पहले उस पर ध्यान ही नहीं दिया था। विभाग में दीपाली चन्द्रा और मिसेज आनन्द के बीच युद्ध छिड़ा रहता। मिसेज नेटार की गर्दन गुरूर में और ज्यादा तनी रहती। लक्ष्मी मेनन अपनी सगाई टूटने के बाद से डिप्रेशन में रहती और हमारे बाद नियुक्त हुई लड़कियां हमें बुजुर्ग मान कर अपना अलग ग्रुप बनातीं। कॉलेज के मैनेजर के जातिवाद के चलते प्राचार्य मिस कौसुकुट्टी परेशान थीं। उनका दोष सिर्फ यह था कि वे ईसाई धर्म अपना चुकी थीं। उन दिनों दिल्ली में बहुत धूल उड़ी एकदम पीली और मैली। सुबह उड़नी शुरू होती और शाम तक उड़ती रहती। लोग घरों के खिड़की, दरवाजे बन्द कर लेते फिर भी सन्दों से धूल घरों में घुस जाती और हर चीज को किसकिसा बना जाती। मन कहीं नहीं लगता न कॉलेज में न घर में। जीवन के घेरे में मॉरिसनगर, बंगलोरोड, कमलानगर, रूपनगर और शक्तिनगर के बस स्टॉप रह गये, शेष भारत मेरे लिए एक बड़ा सा लैटर बॉक्स बन कया। मैं दिन में कई कई बार फाटक तक जाकर लौट आती। घर का लैटर बॉक्स खाली पड़ा रहता। नये शहर में रवि नयी चुनौतियों में घिरे थे। उन्हें मेरे खतों का इन्तजार रहता पर खुद खत तभी लिखते जब अरब सागर में ज्वार आता। हम सब नये रचनाकार नयी कहानी से हट कर कहानी लिख रहे थे। हमारी भिन्नता के बिन्दु थे - कथा वस्तु, शिल्प, भाषा शैली और समस्त विन्यास। नयी कहानी के पुरोधाओं को हमारे प्रयोग रास नहीं आ रहे थे। हमारे मन में उनके प्रति कोई वैमनस्य नहीं था, केवल हमें नयी कहानी, पुरानी लगने लगी थी। कहानी क्योंकि संक्षिप्त विधा है, परिवर्तन इसका प्राण है। मेरी नजर अब कविता की बजाय कहानी में प्रयोगधर्मिता और प्रमाणिकता ढूंढती। युवा पीढ़ी का एक बहुत एड़ा हिस्सा कहानी के माध्यम से यथार्य के पुनर्अन्वेषण में लगा हुआ था - दूधनाथ सिंह, गिरिराज किशोर, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, विमल, अवधनारायण सिंह, प्रबोधकुमार, महेन्द्र भल्ला, काशीनाथ सिंह, अशोक सेकसरिया, राजकमल चौधरी, परेश, रवीन्द्र वर्मा, जितेन्द्र, भाटिया, सुधा अरोड़ा और अन्य अनेक। कथा जगत के परिदृश्य पर हलचल मची हुई थी। दृष्टि और संवेदना के धरातल पर कहानीकार अपने परिवेश, परिवार और समाज को ज्यादा निहंग और निस्संग होकर देख रहा था। इससे पहले कभी किसी ने मां, बाप, मित्र, शत्रु अधिकारी, सहकर्मी, आशिक, रकीब को बदले हुए फोकस में नहीं देखा था। इस कहानी में यथार्थ के स्तर पर जीवन की पकड़ थी, बदले समय की सामाजिकता थी और नयी कथा भाषा थी। छठे दशक की कहानी अपने ओढ़े हुए दायित्व के बोझ तले खुद ही दब गयी और नुस्खों की शिकार हो गयी। हर कहानीकार ने उपने ढंग को ढर्रा बना लिया और उसे छांटता तराशता रहा। दरअसल जिनके हाथों कहानी को देश की स्वाधीनता के बाद जिन्दगी मिली थी, उन्हीं के हाथों में उसका दम घुटने |