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शताब्दी लेख इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह लम्बी कहानी कहानिया मीमांसा कविताएं विशेष वृत्तान्त पत्र उपन्यास |
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दिल्ली जैसे दिलजले और दागदार शहर में , जिन्दगी की भागदौड़ और भड़भड़, नौकरियों की नकचढ़ी कुड़कुड़ के बीच दिल दिमाग के दरवाजे मुहब्बत के इन्तजार में खुले हुए थे, यह हमें अब पता चला। हमने अब तक किताबों में पढ़ा हुआ प्रेम जाना था। यह सोलहवीं शताब्दी का , यह उन्नीसवीं शताब्दी का, यह 1940 का, यह 1950 का, यह नौकुछियाताल का, यह भोपाल का, वह प्राग का, वह प्रयाग का प्रेम है। इन सब में कुछ खाली जगहें थीं जो हमें अपनी तरह से भरनी थीं। यह एहसास हो रहा था कि अकहानी ने कहानी की स्पेस खत्म नहीं की है और अकविता ने कविता को बेदखल नहीं किया है। एक ही दिन के परिचय ने मेरे अन्दर इतनी ऊर्जा , ऊष्मा और उमंग भर दी कि मैं एड़ी से चोटी तक हरी हो गयी। दिल्ली के खरदिमाग ऑटोचालकों के प्रति मन कृतज्ञ हो आया। अगर वे सीधे से मुझे शक्तिनगर पहुंचा आये होते तो कहां आता जीवन में प्रेम। पड़ी रहती किसी मनहूस महिला कॉलेज में, लड़कियों की कॉपियां जांचती। उम्र चौबीस से चौतीस से चौवालीस होती जाती, रेगिस्तान रोज नजदीक आता। कॉलेज में ऐसी सहकर्मियों की कमी नहीं थी जो लाल मिर्च की तरह तेज, पतली और रूखी दिखायी देतीं। वे अकेली मिकाडो में बैठी चाउमीन खातीं, ओडियन में फिल्म देख लेतीं और गर्मी की छुट्टियों में अकेली मसूरी घूमने चली जातीं। मेंहदी उनके हाथों की जगह बालों में लगती जाती और अपनी लाल केशराशि से वे अलग पहचान में आतीं। कॉमेडी पढ़ाते हुए भी उनकी मुखमुद्रा ट्रेजिक बनी रहती। इनके विपरीत विवाहित प्राध्यापिकाएं ज्यादा सुगम्य और सन्तुलित थीं। किंचित मृदुल, किंचित पृथुल, ये एक आन्तरिक लय से अपना काम सम्पादित करतीं। इन्हें क्लास में जाने की कोई जल्दी न होती। अल्बत्ता घर पहुंचने की बेकली जरूर दिखायी देती। कॉलेज में ये दोनों प्रजातियां प्रतिपक्षी सैन्यदलों की तरह रहतीं। अन्तस्थ क्षेत्र में हम जैसी नव नियुक्त लेक्चरर थीं जिनके पास अभी सम्भावनाओं का समूचा आसमान था। प्रिंसिपल हम पर काम का बोझ लाद देती फिर भी हम हंसने का, कोैण्टीन में बैठने का, कनॉट प्लेस घूमने का समय निकाल लेतीं। हमें खबर लगती हैण्डलूम हाउस में साड़ियों का नया स्टॉक आया है, हम कॉलेज से ही ग्रुप बना कर निकल पड़तीं। कभी हम पर गॉगल्स खरीदने की धुन सवार हो जाती। कभी हम शंकर मार्केट में नया दर्जी तलाश करने में घण्टों बिता देतीं। जनपथ के मुकाबले शंकर मार्केट ज्यादा टिकाऊ किस्म का बाजार था जिसके नुक्कड़ का चाटवाला हमारी मनपसन्द आलू टिक्की बनाता। अंग्रेजी विभाग की लक्ष्मी मेनन और मैं कनॉट प्लेस के सभी रेस्तरां में जा चुकी थीं सिवाय टी हाउस के। टी हाउस की संस्कृति में लड़कियों के प्रवेश का निषेध नहीं पर स्वागत भी नहीं था। वहां महिलाएं पुरुषों के संग तो कभी कभी दिख जातीं, अलग से अकेले टी हाउस जाने का रिवाज नहीं था। लक्ष्मी को हिन्दी साहित्य की सीमित जानकारी तक नही थीं इसलिए टी हाउस का उसके लिए कोई उपयोग नहीं था। मैं अपने को इतना लेखक नहीं समझती थी कि टी हाउस में जाना अनिवार्य लगे। रवि का मामला अलग था। वे न सिर्फ लेखन को गम्भीरता से लेते थे , उनकी संगत भी लेखकीय थी। वे दफ्तर खत्म कर सीधे टी हाउस आ जाते। उनमें अड्डेबाजी के बहुत से गुण थे। यारों के यार तो वे थे ही, अपने वरिष्ट रचनाकारों के साथ भी वे मित्र भाव रखते थे। इसलिए उनकी टोली हमेशा बड़ी ही रही। इन सबका दरबार टी हाउस था। यह मित्र भाव लेखिकाओं के बीच न तब था न अब है। उन वर्षों में युवा रचनाकारों की खासी अच्छी संख्या दिल्ली में थी - मन्नू भण्डारी, इन्दु जैन, स्नेहमयी चौधरी, कीर्ति चौधरी, निर्मला जैन जैसे प्रसिद्ध हस्ताक्षरों के साथ साथ अनीता औलक, कान्ता भारती, मणिका मोहिनी, मोना गुलाटी, मीरा महादेवन और प्रभा दीक्षित जैसे नये चेहरे भी थे। सभी की कोई न कोई रचना लोगों का ध्यान खींच चुकी थी। लेकिन इनमें से कुछ अपने दाम्पत्य के दायित्व में तो कुछ प्रेम प्रसंगों के लालित्य में फंसी हुई लेखिकाएं थीं। इनमें से किसी के भी लिए लेखन पूर्णकालिक काम नहीं था। सातवें दशक में स्त्री वर्ग के लिए लेखन कोई प्रदर्शनीय कला नहीं थी। कहानी कविताएं लिख कर आलमारी में साड़ियों की तहों में छुपा कर कर रख ली जातीं और कभी धीरे से किसी पत्रिका में सम्पादक के नाम बुक पोस्ट कर दी जातीं। इससे अधिक लोकोन्मुखता अपचर्चा का बायस बनती। सम्पादक के नाम न कोई पत्र न फोन। लेकिन यह एक यथास्थिति थी जिसे उलांकने की तड़प मेरे मन में रही होगी। तभी रवि की दोस्ती ने मेरे जगत के न सिर्फ ताले तोड़े बल्कि आत्मविश्वास का आकाश भी दिया। उसने मुझे प्यार करना सिखाया। सिर्फ उसको नहीं, मुझे अपने आप से प्यार करना सिखाया। जब उसकी निगाह से मैंने अपने आप को देखा मैं एक नयी लड़की बन गयी। कितनी सहजता से उसने अपने जीवन में मुझे मिला लिया। उसने मेरी जिन्दगी का तापमान कई डिग्री बढ़ा दिया। वह मेरे लिए सुबह का अखबार बन गया। वह मेरा हर दिन का त्यौहार बन गयाा। वह मेरा प्रतिपल पुरस्कार बन गया। अब मैं पहले वाली वह लड़की न रही, सूखा बदन, रूखी त्वचा और चुभने वाली हड्डियों से भरी काया। मेरी देह में लावण्य उतरने लगा। आंखों में सजलता के साथ सलज्जता आती गयी। मैं जो अपना गांधी आश्रम छाप हुलिया बना कर घूमने में अपनी सादगी को अपनी विशिष्टता समझती थी, अब चुपके चुपके जनपथ की दुकानों से गुलाबी रंग की लिपस्टिक तलाशने लगी। साड़ी पहनने के बाद दो बार देखती, पीछे से किनारा पलट तो नहीं रहा है। ब्लाउज के नये नमूने आजमाने की इच्छा जागने लगी। मुझे अपनी समस्त अविवाहित दोस्त मनहूस दिखाई देने लगीं॥ वे ममी पापा जिनके साथ मेरा शाश्वत तिगड्डा बनता था अब मुझे बोर लगने लगे। अपने पते 25/39 शक्तिनगर की जगह 5055 सन्तनगर मेरी चेतना में समा गया। वहां रवि रहता था। कॉलेज से लौटते हुए कहीं रुक कर, भरी दोपहर मैं राजकमल प्रकााशन को फोन घुमा देती, यह सोच कर कि रवि वहां शायद हों। राजकमल प्रकाशन से ÷ नयी कहानियां' मासिक पत्र निकलता। रवि का दफ्तर भी दरियागंज में ही था। कभी कभी वहां दोपहर में अड्डा लगता। कभी कमलेश्वर तो कभी जवाहर चौधरी मेरी आवाज सुन कर, हंसते हुए जवाब देते, ÷÷ नहीं कालिया यहां नहीं आया।'' मैं संकोच से गड़ जाती। कॉलेज से पैदल वापस चल पड़ती। मन में स्मृतियों का अलबम खुला होता। हर आवाज जलतरंग जैसी मधुर सुनायी देती। कई बार एकदम पास से , लगभग छूते हुए बस या ऑटो रिक्शा गुजर जाता। मन में गुलेरी जी की कहानी ÷ उसने कहा था' की चेतावनी सुनायी देने लगती ÷ हट जा जीणे जोगिये, हट जा करमावालियो' मैं हर तस्वीर में अपनी कल्पना मिला कर उसे और सजीव बना डालती। घर पहुंचने की कोई जल्दी भी न होती। घर की आवाजें मेरा रवि-इन्द्र-जाल तोड़ने लगतीं। उन वर्षों में दिल्ली में किसी को फोन करना इतना आसान नहीं था। आज की तरह न जगह जगह पी सी ओ थे न मोबाइल। दिल्ली के सरकारी अफसरों को भी फोन लम्बी प्रतीक्षा सूची में इन्तजार करने के बाद मिलता। तब तक , कई बार फिर तबादले का फरमान आ जाता। जिनके घर फोन होता वे फोन बैडरूम में नजर से बचा कर रखते। ज्यादा समझदार लोग उसके ऊपर एक कफन भी डाल देते। ÷ कैसे हो? क्या कर रहे हो' जैसी कैजुअल बातों के लिए फोन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। प्रायः फोन करने के लिए एक्सचेंज जाना पड़ता। वहां एक सरकारी आदमी सरकारी आवाज में आपसे नम्बर पूछता और सरकारी गति से नम्बर मिला कर फोन का काला, भद्दा भौंडा चोगा आपकी तरफ बढ़ा देता। आपकी आधी तरलता, सरलता और स्निग्धता पर इस माहौल में राख पड़ जाती। आपकी संवेदना आधी पीली आधी हरी हो जाती। तब तथ्य के सिवा और कुछ भी न फूटता जुबान से। 1965 की शुरुआत में ऐसे ही होता था प्रेम। भौतिक सुविधाओं की कमी को दिल दिमाग के अहसास, ख्याल और ख्वाब से पूरा कर लिया जाता। बल्कि ये उपकरण प्यार के स्वप्न को कुछ ऐसे पूरा करते कि कल्पना और यथार्थ के बीच जोड़ नजर ही न आता। कभी मैं कॉलेज से निकलती तो देखती रवि फाटक पर खड़े हैं इन्तजार में। मैं पूछती , ÷÷ आज तुम्हारी छुट्टी थी क्या?'' रवि हंस देते , ÷÷ हां थी, कोर्टशिप लीव।'' हम घूमने निकल जाते। पैदल चलते हुए मुझे लगता रात भर में मेरा कद एक दो इंच घट गया है। एक बार मैंने , लम्बी लगने के लिए ऊंची एड़ी की चप्पलें पहन लीं। रवि ने बालूजा से मुझे चपटी चप्पलें दिलायीं और कहा, ÷÷ जैसी हो, वैसी ही रहो, अच्छा लगता है।'' शहर उसी का होता है जो घूमता है ; शहर की सड़कें और सड़कों के मोड़ पहचानता है। हमें सिर्फ चलना होता, पहुंचना नहीं होता था। दिल्ली की कई सड़कें कितनी खूबसूरत थीं - मनुष्य के रचे शब्दों से परे, यहां पेड़ों के पत्ते बोलते, छायाएं गले मिलतीं और टहनियों में से अंधेरे उजाले की आइसपाइस चलती। रिज रोड के अलावा बाबर लेन, महरौली और ओखला की सड़कें उतरती शामों को भेदभरी हो जातीं, रहस्यमयी। धीरे धीरे सभी पेड़ों का अन्तर मिट जाता, केवल ताड़ अलग से अपनी उपस्थिति बतलाता रहता। मुझे वापस जाने की हड़बड़ी हो जाती। रवि नाराज होते, उदास होते। फिर घड़ी के आगे लाचार, टैक्सी ढूंढने लगते। घड़ी हम दोनों की दुश्मन थी लेकिन अलग ढंग से। मुझे शक्तिनगर छोड़ कर रवि अगले दिन की प्रतीक्षा आरम्भ कर देते। मैं अपनी घड़ी घण्टा भर पीछे कर घर में ऐण्ट्री लेती कि ममी का तना हुआ चेहरा और चुभती टिप्पणियां मेरा मन छलनी कर डालतीं। मन होता वापस रवि के पास चली जाऊं। मैं कपड़े बदलती, हाथ मुंह धोती, डाक देखती; ममी की भुन भुन मच्छर की तरह मेरा पीछा न छोड़ती - ÷÷ कहां गयी थी। इत्ती देर कैसे हो गयी। तेरे में और बड़ी वाली में फर्क क्या रह गया। ऐसे ही वह करती थी। आने दे आज तेरे पापा को। अभी बात पक्की है न कच्ची लेकिन घूमना जरूरी है।'' मेरे अच्छे दोस्त पापा भी गलत रपट के चलते थानेदार की भूमिका में आ जाते। वे कहते , ÷÷ नो नो मुन्नी दिस इज नॉट टु बी टॉलरेटेड। दीज हिन्दीवालाज आर वेरी रैकलैस। यू शुड बी बैक बाय सिक्स।'' ( नहीं नहीं मुन्नी , यह तो बर्दाश्त बाहर है। ये हिन्दी वाले बड़े लापरवाह होते हैं। तुम्हें छह बजे तक वापस आना ही आना है।) मेरा मुंह बन जाता। रवि का दफ्तर पांच बजे तक का था। अगर हम कनॉट प्लेस तक भी जाते तो हमारे पास बात करने को सिर्फ बीस मिनिट बचते। जिस तरह पापा आकाशवाणी में प्रोग्रामों के चन्क ( टुकड़े) मिनिट के हिसाब से तय करते, ऐसे हमारा जीवन भी तय करने का जिम्मा लेते। यह हक हम दोनों में से कोई किसी और को नहीं देना जानता था। भले हों पापा। फिर जिस शब्द से मेरे अन्दर उनके लिए खिलाफत आन्दोलन भड़क उठता वह था हिन्दीवाले। जाहिर है पापा अपने आप को अंग्रेजी वाला समझ कर फतवे जारी कर रहे थे। जब कि मैं इतने ही दिनों में सिर से पैर तक हिन्दीवाली हो गयी थी। इंग्लिश मेरे लिए सिर्फ नौकरी की भाषा रह गयी। मैं ढूंढ ढूंढ कर हिन्दी की पुस्तकें पढ़ती। रवि ने मुझे सर्वेश्वर की एक कविता सुनायी - ÷ इधर आओ चांदनी का स्कार्फ तुम्हारे चेहरे पर बांध दूं।' बावली होकर मैं सर्वेश्वर का समस्त साहित्य पढ़ गयी। रवि को मोहन राकेश के नाटक ÷ आषाढ का एक दिन' की कई पंक्तियां कंठस्थ थीं जिन्हें वे अक्सर दुहराया करते - ÷ लगता है तुमने अपनी आंखों से इन कोरे पृष्ठों पर बहुत कुछ लिखा है। ये पृष्ठ अब कोरे कहां हैं मल्लिका? इन पर एक महाकाव्य की रचना ही चुकी है। अनन्त सर्गों के एक महाकाव्य की!' मैं राकेश साहित्य का पारायण कर डालती। रवि सिर्फ हिन्दी तक सीमित नहीं थे। हेमिंग्वे उनके प्रिय लेखक थे। मैंने भी हेमिंग्वे पढ़ रखा था। हम किसी कहानी की शामिल याद कर सिहर उठते या हंस पड़ते : नाइदर निक नॉर निक्स बिग हैन्ड लिसिन्ड टु हर ( उसका कहना न निक न उसके विशाल हाथ ने माना ) हम ÷ ला बोहीम' में जा बैठते। वहां मुख्य हॉल के साथ एक और छोटा हॉल था ÷ गुफा' । गुफा अपने नाम की सार्थकता में इतनी अंधेरी जगह थी कि वहां बिल दिखाने के लिये वेटर को टॉर्च जलानी पड़ती। दिल्ली के बेताब जोड़े वहीं मिलते। इससे पहले मैं कभी ला बोहीम नहीं गयी थी। इससे पहले मैंने अंधेरा नहीं देखा था, इससे पहले मैंने नहीं जाना था विल्ज फिल्टर का धुआं इतना मनमोहक होता है। वहां हम तरह तरह की कॉफी पीते। लेकिन कैदियों की तरह हमारी मिल्लत का वक्त बहुत जल्द पूरा हो जाता । मैं सिर्फ एक लफ्ज बोलती ÷ पापा' और उठ देती। समूची सिम्फनी उखड़ जाती। रवि कहते, ÷÷ हाय यह प्रतिदिन पराजय दिन ढले के बाद।'' टी हाउस में रवि की गैरहाजिरी बराबर खटक रही थी। कहां तो वह वहां साल में तीन सौ पैंसठ दिन बैठा दिखता था। कहां वह जा ही नहीं रहा था। मैं कहती , ÷÷ मुझे छोड़ने के बाद टी हाउस चले जाया करो।'' रवि नहीं मानता। वह अपने आप को ज्यादा जानता था। कभी कभी टी हाउस की दुनिया के मित्र कनॉट प्लेस में टकरा जाते। एक दिन नामवर जी दिखे। रवि को उनसे जरूरी बातें करनी थी रवि ने साग्रह कहा , ÷÷ नामवर जी आप सात बजे लाबोहीम आ जाइएगा।'' उस शाम हम सात की जगह साढ़े सात तक इन्तजार करते रहे , नामवर जी नहीं आये। बाहर निकल कर हम टी हाउस की तरफ मुड़े। संयोग से वहीं नामवर जी दिख गये। रवि ने कहा , ÷÷ नामवर जी आप आये नहीं?'' नामवर जी ने कहा , ÷÷ मैं तो आया था, तुम दिखे ही नहीें।'' ÷÷ हम वहीं थे, अन्दर गुफा में।'' नामवर जी हंस दिये , ÷÷ भई मैं। जनरल वार्ड में घूम कर लौट गया।'' कभी कभी हम कनॉट प्लेस के पिछवाड़े घूमते। पीछे की गलियों को देख कर कोई सोच नहीं सकता था कि आगे के गोलार्द्ध में इतनी भीड़ और शोर होगा जिसे आम भाषा में रौनक कहते हैं। ये ज्यादातर पार्किंग लेन थीं। जहां तहां रेस्तराओं के पिछले दरवाजे यहां दिखते। यहां अण्डे , डबलरोटी और तरकारियों की डिलिवरी वैन से सामान उतारते सेवक दिखायी देते। यहां कमोबेश एकान्त होता पर उमंग न होती। पीछे से कनॉट प्लेस बेडौल नजर आता। कनॉट प्लेस से उसकी गोलाई छीन ली जाय और खम्भे हटा दिये जाएं तो कनॉट प्लेस और इमली बाजार में कोई फर्क न रह जाय, हमें ऐसा लगता। मेरे जेहन में अब तक दिल्ली का अजब भूगोल बसा था। एक तरफ मेरे लड़कपन का शहर था - कूचा पातीराम, सीताराम बाजार, चावड़ी बाजार। वहां चांदनी चौक का भीड़भड़क्का था, लाजपतराय मार्केट की रंगीनी थी, विज रेस्तरां में चम्मचों की छन्न पटक थी, गली परांठे वाली के किसिम किसिम के परांठे थे, खारी बावली में उड़ती मिर्च मसालों की गन्ध थी, फतहपुरी में अखबारवाले फूफा जी की घुमन्तू दुकान थी। एम. ए. पास करने तक पुरानी दिल्ली बदल गयी थी। चांदनी चौक में भीड़भड़क्का तो बढ़ गया था , बाकी हर चीज घट गयी थी। गली परांठावाली में परांठों का साइज घट गया था, संग परोसी सब्जियों की गिनती बढ़ गयी थी, उनकी लज्जत घट गयी थी। दरीबा कलां की चमक बढ़ गयी थी उसमें मौजूद घर्मकांटे की इज्जत घट गयी थी। खारी बावली के मसालों में मिलावट की शिकायत मिलने लगी थी। और फतहपुरी से अखबार वाले फूफा जी गायब हो गये थे। लाजपतराय मार्केट अपनी नूतन चकाचौंध से चांदनी चौक का खांटीपन खत्म कर रहा था। वहां कदीमी दुकानों के खानदानी सेल्समैन ऊंघते बैठे रहते और लाजपतराय मार्केट के चुस्त पंजाबी युवक नये कट और निराली काट के कपड़े फटाफट बेच डालते। व्यापार वहीं पनपता है जहां भीड़ जाय। भीड़ लाजपतराय जाती। इस मार्केट ने क्रय विक्रय के समस्त सिद्धान्त ध्वस्त कर डाले। उसी तरह जैसे जनपथ की गुमटियों ने कनॉट प्लेस की विशाल दुकानों को निद्रालयों में बदल दिया। इस लिहाज से सातवें दशक में बाजारवाद ने दिल्ली में दस्तक देनी शुरू कर दी थी पर दिल्ली हमेशा से ऊंचा सुनती थी। अपने ही घर द्वार और देश का विभाजन झेल कर आये लोग सिन्धी , पंजाबी और अन्य उत्तर भारतीय सफलता की संकल्पबद्धता के साथ लाये थे पुनर्प्रतिष्ठा की प्रतिज्ञा और व्यवसाय की वाक् विदग्धता। उन्होंने दिल्ली का समस्त व्यापार विवेक हिला दिया। जहां गुजाइश मिली, चीड़ के फट्टे जोड़ कर दुकान जमायी और शुरू हो गये। कोई खूबानी बेच रहा है तो कोई खरबूजे, कोई बड़ियां पापड़ की हट्टी खोल कर बैठा है तो कोई चीनी बेच रहा है। इस विस्थापित जमात ने अपने को स्थापित करने में अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी। जिस दाम सूजी मैदा और चीनी खरीदी, उसी दाम बेंच दी और कहा, ÷ चलो बोरा तो बचा न, वही पांच रुपये कमायेगा।' शक्तिनगर में थोड़ी सी पुरानी दिल्ली और थोड़ी सी बदलती दिल्ली तो दिखायी दे जाती , नयी दिल्ली का संस्पर्श यहां बिल्कुल न था। यहां के घिचपिच मकानों, छोटे जंगलों और नीची छत वाले कमरों में लोग एक बंधा घुटा जीवन जीते और तमाम हो जाते। सुरंग जैसी भिंची रसोई में महिलाएं दिन का बड़ा हिस्सा गुजार कर खुद भी वैसी ही हो जातीं, आत्मकेन्द्रित, सीमित और संकुचित। लौट कर मुझे ऐसे घरों और ऐसे जीवन से दहशत होती। मुझे लगता ये तंग मकान बड़ा प्रतीकार्थ लिये हुए हैं। इनसे दिल्ली के दिलों का अन्दाजा लगता है। इन्हें बनाने वालों के दिल संकरे, इनमें बसने वालों के दिल और भी संकरे। अपने एकल जीवन का देना पावना निपटा लेने के सिवा और काई सरोकार नहीं। समकालीन साहित्य और नये विचारों के सम्पर्क में आकर जाने अनजाने मैं शिक्षित हो रही थी और दीक्षित भी। पुरानी दिल्ली से रोज नयी दिल्ली के सफर में हर रोज मैं थोड़ी नयी हो रही थी। मेरे अन्दर नये सवाल और कौतूहल जन्म ले रहे थे। जीवन के प्रति नया विस्मय और आहृलाद मेरी रगों में दौड़ने लगा था। माता पिता इन परिवर्तनों से अनभिज्ञ थे या रहना चाहते थे , यह स्पष्ट नहीं था। विशेषकर मांओं को लीक पर चलने वाली लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं। वे उनसे किसी बदले नजरिये की मांग नहीं करतीं। वे उनकी बतायी दुकानों से कपड़े खरीदतीं, उनके ढूंढे दर्जी से कपड़े सिलवातीं और उनकी तरह से अचार डालती हैं। परम्परा के प्रतिपादन का सुख ऐसी ही सन्तानों से प्राप्त होता है। इस लिहाज से ममी इन दिनों मुझसे खुश नहीं थीं। पापा मौलिकता की कद्र करते थे। मुझ पर विश्वास भी करते। लेकिन रोज रोज की क्रान्तिकारिता उन्हें ग्राह्य नहीं थी। उन्हें यह भी यकीन नहीं था कि हमारी दोस्ती दाम्पत्य की दहलीज तक पहुंचेगी। हमारे मन में कोई संशय नहीं था। रवि कहते , ÷÷ वैसे पापा एक नोबेल आत्मा हैं लेकिन वे समाज भीरु हैं। अगर उनमें साहस न हो और तुम्हें रोकें तो तुम पहनना अपनी स्लिपर्स और चली आना सीधे 5055 ।'' रवि के कहने के साथ ही मैं गयी गयी हो जाती। रवि ने अपनी दुनिया में मुझे सगर्व प्रविष्ट करवाया। उसने दुनिया से कहा, ÷÷ देखो ये ममता है, मेरी पसन्द।'' मानो दुनिया को पता है ममता क्या है, कौन है। कभी किसी को यह कहने का मौका न दिया कि यह भी क्या पसन्द है तुम्हारी। इसी दिल्ली में एक से एक धूप धुली लड़कियां उसे दिल देने को तैयार बैठी थीं। पंजाब में रवि की माता जी ने उसके कद की टक्कर की साढ़े पांच और पौने छह फुट लम्बी लड़कियां ढूंढ रखी थीं। पर रवि कहता मुझे कोई नहीं देखनी। उनकी तस्वीर भी मत दिखाओ। मां कहतीं , ÷÷ कैसी है तेरी ममता?'' रवि कहता , ÷÷ आप सवेरे सवेरे जो गाती हैं, ममता तू न गयी मेरे मन से, बस वैसी।'' मां समझ गयीं उनके बेटे को लगन की अगन लग गयी है। उन्होंने कहा , ÷÷ मुझे दिखायेगा?'' मां दिल्ली आयीं। मुझे बिड़ला मन्दिर में बुलवाया। मेरी ममी ने चिढ़ा कर कहा , ÷÷ हर लड़की बिड़ला मन्दिर में ही दिखायी जाती है। पड़ गयी न तू बहन जी बाले ढर्रे में। जा तो रही है, अगर वे कुछ दें तो ले मत लेना। हमारी नाक कटेगी, कैसी नदीदी है। उनके सामने, बेवकूफों की तरह पूरा मुंह फाड़ कर हंसना मत। अभी हमारी तैयारी नहीं है। जब होगी तब उन्हें बाकायदा घर बुलायेंगे।'' वह तैयारी हमारे घर कभी भी न हुई। क्यों न हुई यह पता नहीं चला। पापा तो दफ्तर के बाद किताबों की दुनिया में खोये हुए इन्सान थे पर ममी तो बुद्धिजीवी नहीं थीं। शायद आगामी जिम्मेदारियों से नकार का नजरिया रहा हो उनका। एक एक कर सभी सम्बन्ध ममी पापा ने ऐसे ही कतर दिये , कभी हमारी पढ़ाई, तो कभी अपने दफ्तर की व्यस्तता के बहाने। वसन्त के दिन बहुत जल्द बीत गये। मौसम बदलने के साथ ही रवि को धर्मयुग में उप सम्पादक के पद पर बुला लिया गया। यह एक बिल्कुल नयी परिस्थिति थी। वापस अपने एकान्त मे लौटना हम दोनों की मजबूरी थी। जिस दिन रवि की रेलगाड़ी दिल्ली स्टेशन से रवाना हुई मेरी आंखों में आंसू नहीं थे पर गहरी उदासी और असुरक्षाबोध तो था ही जिसे मैं उनके दोस्तों की नजरों से चश्मे के पीछे छिपा गयी। हाथ में अब सिर्फ प्लेटफॉर्म की टिकट शेष थी। यह शहर से महज एक दोस्त का जाना नहीं था , जीवन के स्फूर्ति। स्पर्श का छिन जाना था। अब मेरे पास था बेमजा कामों का अन्तहीन सिलसिला। शहर की लम्बाई चौड़ाई रातोंरात घट गयी। शहर में मौजूद पंछियों की 450 किस्मों में से 449 उड़ गये, बस कौवे रह गये कांव कांव करते। कांव कांव तो कॉलेज में भी थी। इससे पहले उस पर ध्यान ही नहीं दिया था। विभाग में दीपाली चन्द्रा और मिसेज आनन्द के बीच युद्ध छिड़ा रहता। मिसेज नेटार की गर्दन गुरूर में और ज्यादा तनी रहती। लक्ष्मी मेनन अपनी सगाई टूटने के बाद से डिप्रेशन में रहती और हमारे बाद नियुक्त हुई लड़कियां हमें बुजुर्ग मान कर अपना अलग ग्रुप बनातीं। कॉलेज के मैनेजर के जातिवाद के चलते प्राचार्य मिस कौसुकुट्टी परेशान थीं। उनका दोष सिर्फ यह था कि वे ईसाई धर्म अपना चुकी थीं। उन दिनों दिल्ली में बहुत धूल उड़ी एकदम पीली और मैली। सुबह उड़नी शुरू होती और शाम तक उड़ती रहती। लोग घरों के खिड़की, दरवाजे बन्द कर लेते फिर भी सन्दों से धूल घरों में घुस जाती और हर चीज को किसकिसा बना जाती। मन कहीं नहीं लगता न कॉलेज में न घर में। जीवन के घेरे में मॉरिसनगर, बंगलोरोड, कमलानगर, रूपनगर और शक्तिनगर के बस स्टॉप रह गये, शेष भारत मेरे लिए एक बड़ा सा लैटर बॉक्स बन कया। मैं दिन में कई कई बार फाटक तक जाकर लौट आती। घर का लैटर बॉक्स खाली पड़ा रहता। नये शहर में रवि नयी चुनौतियों में घिरे थे। उन्हें मेरे खतों का इन्तजार रहता पर खुद खत तभी लिखते जब अरब सागर में ज्वार आता। हम सब नये रचनाकार नयी कहानी से हट कर कहानी लिख रहे थे। हमारी भिन्नता के बिन्दु थे - कथा वस्तु, शिल्प, भाषा शैली और समस्त विन्यास। नयी कहानी के पुरोधाओं को हमारे प्रयोग रास नहीं आ रहे थे। हमारे मन में उनके प्रति कोई वैमनस्य नहीं था, केवल हमें नयी कहानी, पुरानी लगने लगी थी। कहानी क्योंकि संक्षिप्त विधा है, परिवर्तन इसका प्राण है। मेरी नजर अब कविता की बजाय कहानी में प्रयोगधर्मिता और प्रमाणिकता ढूंढती। युवा पीढ़ी का एक बहुत एड़ा हिस्सा कहानी के माध्यम से यथार्य के पुनर्अन्वेषण में लगा हुआ था - दूधनाथ सिंह, गिरिराज किशोर, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, विमल, अवधनारायण सिंह, प्रबोधकुमार, महेन्द्र भल्ला, काशीनाथ सिंह, अशोक सेकसरिया, राजकमल चौधरी, परेश, रवीन्द्र वर्मा, जितेन्द्र, भाटिया, सुधा अरोड़ा और अन्य अनेक। कथा जगत के परिदृश्य पर हलचल मची हुई थी। दृष्टि और संवेदना के धरातल पर कहानीकार अपने परिवेश, परिवार और समाज को ज्यादा निहंग और निस्संग होकर देख रहा था। इससे पहले कभी किसी ने मां, बाप, मित्र, शत्रु अधिकारी, सहकर्मी, आशिक, रकीब को बदले हुए फोकस में नहीं देखा था। इस कहानी में यथार्थ के स्तर पर जीवन की पकड़ थी, बदले समय की सामाजिकता थी और नयी कथा भाषा थी। छठे दशक की कहानी अपने ओढ़े हुए दायित्व के बोझ तले खुद ही दब गयी और नुस्खों की शिकार हो गयी। हर कहानीकार ने उपने ढंग को ढर्रा बना लिया और उसे छांटता तराशता रहा। दरअसल जिनके हाथों कहानी को देश की स्वाधीनता के बाद जिन्दगी मिली थी, उन्हीं के हाथों में उसका दम घुटने लगा। नये कहानीकार अपने को दोहराने में लगे थे या फिर परस्पर पूजापरक संस्मरण लिखने में। उनके हाथ में हिन्दी की पत्रिकाएं भी थीं। उस माहौल में कहीं किसी लघु पत्रिका में भी यदि भिन्न किस्म की कहानी स्थान और ध्यान पा जाती तो नयी कहानी के कोटले में तूफान बरपा हो जाता। पहले टी हाउस में चौकोर मेज बैठक होती, फिर मोर्चेबन्दी होती और अन्त में रणनीति बनती। दो पीढ़ियों के बीच इतना तीखा विभाजन इससे पूर्व अनुभव नहीं किया गया था। साहित्य के शोधार्थी के लिए यह बात भले ही काम की हो, कहानी विधा के लिए यह त्रसदी से कम नहीं था कि एक कथा दशक दूसरे कथा दशक से दंगल शुरू कर दे, यद्यपि दोनों अपनी तरह से यथार्थ की पहचान कर रहे हों। नयी कहानी में गढ़ाव का मोह, चटपटी घटनाओं की भरमार और सनसनीखेज क्लाइमेक्स की जिद के साथ नाटकीय भूमिका लेखन, आत्म वक्तव्य और आत्मस्वीकृति का तामझाम न होता तो साठोत्तरी पीढ़ी के लिए कहानी विधा का सततीकरण ज्यादा ग्राह्य और स्वीकार्य होता। दोनों ही पीढ़ी में कुछ रचनाकार केवल शिल्पकार बन कर रह गये और उनके हाथों में कहानी कला केवल हस्तकला हो गयी। नामवर सिंह ने इस खतरे को पहचान कर लिखा, ÷÷ इसे समझने के लिए पूरे दो युगों की सम्पूर्ण संयोजित चेतना का उपयोग करना पड़ेगा।'' धनंजय वर्मा ने नये कहानीकारों को आगाह किया कि ÷÷ कहानी कहीं ÷ हवा' होकर न रह जाय जैसा कि कुछ शिल्पवादियों के साथ हुआ भी।'' हालांकि मैं तो तब एकदम नवोदित लेखिका थी और मुश्किल से मेरी सात आठ कहानियां छपी थीं , अक्सर मेरे पास भी परिचर्चा में भाग लेने के लिए प्रश्नावली आती जिसमें इस किस्म के प्रश्न अवश्य होते - ÷ कथावस्तु व शिल्प का बहिष्कार कर आप कहानी के नाम पर पाठकों को क्या देना चाहते हैं?' दरअसल लोगों का विरोध बदली हुई कहानी से न होकर कहानी पढ़ने की अपनी आदत से था। सातवें दशक की कहानी को वे रूढ़ियां स्वीकार्य नहीं थीं जो कहानी को कहानी कम और किस्सा ज्यादा बनाती थीं। सातवें दशक के कथा संघर्ष से इतना लाभ जरूर हुआ कि इसने कहानी विधा को साहित्य के केन्द्र में ला दिया। यह गौरव अब तक कविता को मिला हुआ था। कवियों को सबसे अच्छी प्रेमिकाएं और नौकरियां मिलतीं। उनकी पुस्तकें विशेष सजधज के साथ निकलतीं। कवियों को समाज में नायक समझा जाता। यह पहली बार हुआ कि कहानीकारों का महत्व पहचान कर उन्हें प्रमुख पत्रिकाओं ने सम्पादन के लिए आमंत्रित किया। चूंकि छठे दशक के कहानीकारों ने बड़ी सावधानी से अपना छवि प्रबन्धन किया, उत्कृष्ट निमन्त्रण भी उन्हें ही मिले। मोहन राकेश ÷ सारिका' के सम्पादक हो गये और ÷ नयी कहानियां' कमलेश्वर को मिली। राजेन्द्र यादव को नौकरी करना कभी ज्यादा दिन गवारा नहीं हुआ। कितनी ही बार उन्होंने अपने आप नौकरी छोड़ दी और दिल्ली आने के बाद पूर्णकालिक लेखन को समर्पित हो गये। कवि कथाकार धर्मवीर भारती पहले से ही ÷ धर्मयुग' की कमान संभाले हुए थे। दिल्ली से बम्बई तक माहौल कहानी के पक्ष में था। उधर दिल्ली आकाशवाणी में कान्ता भारती को नौकरी मिल गयी थी। उजड़े दाम्पत्य की ठोकर से वे अभी संभली न थीं। आकाशवाणी का स्टाफ उनके क्षण क्षण परिवर्तित मूड झेलता और चुप लगा जाता। हिस्टीरिया को छूते उनके आचरण का हमें पता चलता रहता - कभी वे धर्मयुग की प्रति कलेजे से लगा कर आंसू बहातीं; कभी वे सब सहकर्मियों के कमरों में जाकर अपनी बेटी की सालगिरह का बुलावा देतीं कि शाम पांच बजे उन्होंने पार्टी रखी है। अपनी बेटी वे भारती जी के पास छोड़ आयी थीं। लेकिन कुछ वर्षों तक वे उसकी सालगिरह मनाती रहीं। बेपनाह खूबसूरती और अपनी मोहक अदाओं के कारण वे वर्षों आकाशवाणी की ट्रेजेडी क्वीन समझी जाती रहीं। उन दिनों रेडियो की नौकरी में ग्लैमर बहुत था। अच्छे घरों की महिलाएं इस कोशिश में रहतीं कि उनका एक प्रोग्राम रेडियो में हो जाय या वे आकाशवाणी में कोई काम पा जाएं। उन दिनों कैजुअल उद्घोषक को एक महीने के अनुबन्ध पर रखा जाता। अगर उसका काम अच्छा होता तो उसे तीन माह के लिए रख लेते। नगर के सांस्कृतिक परिवेश में दिल्ली आकाशवाणी का रंगारंग योगदान था। बड़े से बड़े साहित्यकार की आवाज रेडियो से सुनने को मिल जाती। नाटकों के राष्ट्रीय प्रसारण में विष्णु प्रभाकर , रेवती सरन शर्मा, जगदीशचन्द्र माथुर आदि के नाटक सुनने को मिल जाते। कलाकारों की आवाज में इतनी जान होती कि पूरा नाटक हमारी आंखों के आगे घटित होता लगता। उन्हीं दिनों आकाशवाणी के कार्य निष्पादन में मंत्रालय का हस्तक्षेप आरम्भ होने लगा। इसका पता चला इस तरह कि उद्घोषक के पद पर कुछ ऐसी सुन्दरियों की नियुक्ति हुई जिनकी आवाज परीक्षण के पहले ही दौर में खारिज की जा चुकी थी। लेकिन सुन्दरियों के पास ऊंची सिफारिश थी। उनके उच्चारण में खामी थी , आवाज में जुकाम था पर उन्हें ए प्लस का दर्जा दिया गया। पापा व्यथित हो गये। पापा ने कहा, ÷÷ यह मास मीडिया अब क्लास मीडिया बनता जा रहा है।'' बहुत जल्द पापा का तबादला फिर से बम्बई हो गया। पापा खुश ही हुए। बम्बई आकाशवाणी उनकी देखीभाली थी। बम्बई में रवि का आवास हमारे नये मकान के इतना करीब होगा यह किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन उसकी जीवनशैली अजबगजब थी। रवि शिवाजी पार्क के एक बड़े अपार्टमेण्ट के सागरमुखी फ्लैट में एस. एस. ओबेरॉय का पेइंग गेस्ट था। ओबेरॉय अपनी विज्ञापन एजेन्सी आर्ट कमर्शिया का मालिक था। उसका कार्यलय लेमिंग्टन रोड पर था। दिन भर वह औद्योगिक कम्पनियों में विज्ञापन अनुबन्ध पाने के लिये दांवपेच खेलता लेकिन शाम को एरिस्टोक्रेट की बोतल खोलने के साथ खुद छोटे मोटे उद्योगपति की तरह व्यवहार करने लगता। वह बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं था। उसकी पढ़ाई का क्षेत्र बम्बई का हवा पानी और मिजाज रहा था। उसकी प्रेमिका सुनन्दा उसे प्यार से ओबी कहती। अगर घर लौटने में उसे बहुत ज्यादा देर हो जाती तो वह वहीं ओबी के बिस्तर पर सो जाती। उसी बड़े से हॉलनुमा कमरे में एक बिस्तर पर रवि सोया होता। किसी हाईस्कूल फेल लड़के की तरह , रवि ओबी की नकली चकाचौंध, उथली आधुनिकता और ऋण लो घी पियो सिद्धान्त की चपेट में फंसता जा रहा था। दिल्ली का सर्वहारा फक्क्ड़पन उसे भूल गया था। उसकी हर शाम ओबी के अजीबोगरीब साथियों के संग गुजरती। जीवन की वास्तविकताओं को ताक पर रख ओबी शाम के चार घण्टे गुजारता। सब एक से बढ़ कर एक गप्प हांकते, शेखचिल्ली सपने देखते, एक दूसरे की हौसलाअफजाई करते और अन्त में लुढ़कते पुढ़कते अपने घर को रवाना हो जाते। कभी कभी ओबी मुझे भी पार्टी में शरीक करता। मेरी सूरत पर चिपका एतराज उसकी पैनी नजरों से छुपा न रहता। नतीजा यह था कि हम दोनों एक दूसरे को ÷ फ्रॉड' पुकारने लगे। उसकी प्रेमिका उससे असहमत होने का कतई जोखिम मोल नहीं लेती जबकि मैं अपनी असहमति बार बार जताती, इतनी कि रवि नाराज हो जाता। उन्हीं दिनों ओबी की विज्ञापन फिल्म में काम करने के लिए लीना चन्दावरकर और उसके पिता आकर ओबी के फ्लैट में रहने लगे। लीना के पास सौन्दर्य था पर हिन्दी का ज्ञान नहीं था। वह मराठी लहजे में टूटीफूटी हिन्दी बोल लेती थी। जमीन पर बिस्तर बिछा कर , वह लेटी हुई सारी दोपहर रवि की कहनियां पढ़ती रहती ताकि उसकी भाषा सुधरे। शाम को दफ्तर से लौट कर रवि सुनन्दा और लीना दोनों को हिन्दी का उच्चारण सिखाता ÷ बोलो, मुझे।' दोनों मराठी भाषी लड़कियां कहती ÷ मुजे।' जब तक ओबी रसोई में चिकन भूनता, हिन्दी कक्षा चलती रहती। रवि के रिहायशी माहौल को देख कर मैं इतनी फिक्रमन्द हो गयी कि बीमार पड़ गयी। अस्पताल में दाखिल होना पड़ा। उस संकटकाल में मां बाप से ज्यादा रवि ने देखभाल की। भूल गयी उसे शामों की रंगरेलियां, हिन्दी कक्षाएं और पार्टियां। जब तक मैं स्वस्थ होकर दिल्ली वापस जाने लायक नहीं हुई, रवि ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। वह ठीक पांच बजे ऑफिस से सेण्ट ज्यॉर्ज हॉस्पिटल आ जाता और तभी घर जाता जब आखिरी बस जाने को होती। अक्टूबर , नवम्बर बहुत नागवार गुजरे। मेरे पास नौकरी थी पर घर ठिकाना कोई नहीं था। मैं भारत जी के यहां जंगपुरे में रहती जहां तीन बच्चों के परिवार में चौथे बच्चे की हैसियत से मुझे भी एक कोना दरकार था। पापा की तरह भारत जी बेहद अनुशासनप्रिय थे लेकिन मेरी चाची बिन्दु जी बेहद निर्मल, निश्छल स्वभाव की थीं। जंगपुरे से मॉरिसनगर जाना आसान नहीं था। सुबह साढ़े आठ बजे की ÷ युनिव स्पेशल' न पकड़ो तो दस बजे के लेक्चर के लिए देर से पहुंचो। यह स्पेशल बस खचाखच भरी होती। अक्सर खड़े खड़े बस का सफर तय करने के बाद मैं इतनी थक जाती कि पहले पीरियड के बाद ही मुझे कंपकंपी छूटने लगती। बीमारी के बाद मेरा वजन सैंतीस किलो रह गया था। दिल्ली की दौड़भाग, भोजन का अनियमित समय और एण्टीबायटिक दवाओं के असर से देह एकदम जर्जर हो रही थी। दीपावली की छुट्टी में जब मैं बम्बई पहुंची रवि ने तुरन्त तय किया कि अब मुझे नौकरी पर वापस नहीं जाना है। अपनी स्थायी नौकरी छोड़ने के सुझाव से मुझे जरा भी अफसोस नहीं हुआ। उल्टे खुशी हुई कि अब जॉन बनयान का ÷ पिलग्रिम्स प्रोग्रेस' पढ़ाने से छुट्टी मिलेगी। माता पिता नहीं चाहते थे कि दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थायी नौकरी सिर्फ स्वास्थ्य के कारण छोड़ दी जाय। हमारे परिवार में स्वास्थ्य कभी विचारणीय विषय नहीं रहा जबकि रवि के परिवार में स्वास्थ्य का स्थान सर्वोपरि था। उनके परिवार में सुदूर कनाडा तक से उनके बड़े भाई का विचार था कि मुझे दिल्ली जाकर नौकरी करने की गलती नहीं करनी चाहिए। बम्बई के परिदृश्य पर साहित्य के साथ कला और संस्कृति भी गहरे प्रभाव डाल रही थी। रवि के जिम्मे धर्मयुग के कला साहित्य और संस्कृति के पृष्ठ थे जिसके कारण इन गतिविधियों की सूचना मिल जाती। काला घोड़ा पर जहांगीर आर्ट गैलरी में प्रदर्शनी होती रहती , कभी एकल तो कभी बहुल। पण्डोले आर्ट गैलरी में भी कलाकृतियां देखने को मिलतीं। इन्हीं जगहों में जे. स्वामीनाथन, मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रजा, जी. मनसाराम रामकमुार, हेब्बार, तैयब मेहता अैर गायतोण्डे आदि के न केवल अद्भुत चित्र देखने को मिले, इन कलाकारों को साक्षात् भी देखा। कभी कभी इनसे संवाद भी हुआ। जहांगीर आर्ट गैलरी के अन्दर एक कैफेटेरिया था ÷ समोवार' । दरअसल वह एक लम्बा सा बरामदा था जिसमें बेंत का फर्नीचर कलात्मक ढंग से लम्बाई में लगा होता। चित्र वीथी के समानान्तर यह चाय वीथी हमारे बैठने की प्रिय जगह थी। कई बार ऐसा हुआ कि हम वहां हैं और हुसैन साहब आ रहे हैं तीन चार युवा कला मित्रों के साथ। बड़ी शान से नंगे पांव चलते हुए वे हमसे अगली मेज पर जा बैठे। रवि को पहचान कर वे अपना हाथ ऊपर लहरा कर मुस्कुरा देते। उनका हाथ भी उनकी रंग रेखाओं की तरह विलक्षण था लम्बा, नुकीला और बेचैन। उससे भी विलक्षण थी उनकी फियेट कार। बम्बई में जहां कहीं वह कार खड़ी दिखती, फौरन पहचान में आ जाता कि हुसैन यहीं कहीं आये हुए हैं। बात यह थी कि हुसैन ने अपनी कार पर पेण्टिंग कर रखी थी। एक तरफ अपने प्रिय घोड़े बना रखे थे। एक घोड़ा बोनट पर भी बना हुआ था। दरवाजों पर कृष्ण और गोपियां चित्रित थीं। हम देर तक उनकी कार को देखते रहते। कृष्ण और गोपियों से अधिक उनके घोड़े सजीव जान पड़ते जैसे अभी वे कार से उतर कर कोलाबा में दौड़ पड़ेंगे। उनके हर स्ट्रोक में घोड़े की ऊर्जा और फड़कन दर्ज होती। तभी मुझे पता चला कि किसी भी चित्रकार के लिए घोड़ा पेण्ट करना चुनौती भरा कार्य है। उसकी एक एक मांसपेशी, हरकत, हौसला, रफ्तार और बेचैनी को रंगों में पकड़ना आसान नहीं होता। कभी हम तेजपाल ऑडिटोरियम की तरफ निकल जाते। सार्त्र का नाटक ÷ नो एग्जिट' ÷ बन्द दरवाजे' शीर्षक से सत्यदेव दुबे द्वारा वहीं सबसे पहले मंचित हुआ। उसमें सत्यदेव दुबे और सुलभा देशपाण्डे का बड़ा सधा हुआ अभिनय देखने को मिला। मेरा खयाल है पहलेपहल अमरीशपुरी को भी उसी नाटक में दखा था। उनकी वह फटकारती हुई आवाज काफी देर तक उस छोटे से सभागार में गूंज उठती। वैसे अमरीशपुरी का सबसे यादगार अभिनय मोहन राकेश के नाटक ÷ आधे अधूरे' में था। यह प्रस्तुति भी तेजपाल में हुई थी। नाटक के शो में उस दिन धर्मवीर भारती भी आये थे। रवि ने मेरा परिचय करवाया तो भारती जी ने हंस कर कहा, ÷÷ एन एडिशन टु बॉम्बे।'' बड़ा अच्छा लगा। देर तक अच्छा लगता रहा। भारती जी में ÷ गुनाहों का देवता' के नायक चन्दर की झलक मिली। इन सभी कार्यक्रमों में घर लौटने में देर हो जाती। ममी पापा मुंह बना लेते। इसलिए दिसम्बर आने पर उन्होंने चैन की सांस ली। शादी दिल्ली से होनी थी। भारत सरकार पापा के हरदम काम आयी, कुछ इस तरह कि दिसम्बर में ही पापा को एक माह के विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए दिल्ली भेजा जाना तय हुआ। इससे दिल्ली में मकान लेना और सुविधाएं जुटाना उनके लिए आसान हुआ। अब तक की हमारी दोस्ती में बराबरी थी और बेफिक्री। कभी आने वाले दिनों की मैं चिन्ता करती तो रवि उसे खारिज कर देते कि मुझे तो कुछ नहीं चाहिए सिवाय ममता के। शायद रवि की इच्छाओं का सम्मान करते हुए ही ममी पापा ने कभी उन्हें कोई उपहार देने का प्रयत्न नहीं किया। हमारे बीच माता पिता के दो सैट थे लेकिन हमारे जीवन में उनकी कोई भूमिका नहीं थीं न हम उन्हें कोई जिम्मेदारी दे रहे थे न वे कोई जिम्मेदारी ले रहे थे। बल्कि मेरे एक हितैषी हमारी शादी के आयोजन में मेहमानों को मेरी एक कविता पढ़वा रहे थे जो उसी दिन उन्हें क ख ग पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपी हुई दिख गयी थी - ÷ प्यार शब्द घिसते घिसते चपटा हो गया है।' साथ ही उनकी भविष्यवाणी थी कि यह शादी नहीं कॉन्ट्रेक्ट है साल छह महीने में अपने आप समाप्त हो जाएगा। रवि के एक हितैषी ने उनसे कहा, ÷÷ इससे तो अच्छा था तू इसकी मां से शादी कर लेता।'' ऐसे हर आशीर्वचन से हमारी दोस्ती और पक्की होती गयी, संकल्प दृढ़ होता गया। सिर्फ एक जमात ऐसी थी जो हमारी खुशी में खुश थी और बिना किसी टीका टिप्पणी के शादी में शरीक हुई, हमारे साहित्यिक मित्र व रचना अग्रज। कहानी अकहानी का समस्त द्वन्द्व ताक पर रख दिल्ली के समस्त निवासी व प्रवासी रचनाकार उस शाम मॉडल टाउन पहुंचे। उन्होंने अपनी जिन्दादिली से, ठहाकों और छेड़खानियों से, मजाक और जुमलेबाजी से उस सर्द शाम का तापमान कई डिग्री चढ़ा दिया। जैनेन्द्र कुमार, मोहन राकेश, कमलेश्वर राजेन्द्र यादव, भीष्म साहनी, नामवर सिंह, देवी शंकर अवस्थी, अजित कुमार, दूधनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, तारा तिक्कू, गंगा प्रसाद विमल, स्नेहमयी चौधरी, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, प्रभाकर माचवे, और जाने कितने प्रसिद्ध चेहरे जिन्हें मैं संकोचवश देख भी नहीं पायी क्योंकि दुल्हन की नजरें झुकी हुई थीं, इन सबने इतनी प्रसन्नता से उत्सव में हिस्सा लिया कि कुछ देर पहले हुई अपने अपने रिश्तेदारों की मिर्ची छाप तल्खियां हमें एकदम भूल गयीं। साहित्य की दुनिया का यह बड़प्पन, यह दरियादिली आज भी अभिभूत करती है कि नये से नये लिखने वाले का भी यहां गर्मजोशी से स्वागत किया जाता है। यह खासियत दुनिया के हर कोने के साहित्यकार में होती होगी पर अपने हिन्दी जगत में यह अद्भुत औदार्य है। इस उत्सव की अगली सुबह घर के साथ साथ नगर का भी स्थानान्तरण होना था। सम्भावित परिर्वतन से मन बेचैन रहा। एक बार लगा रवि का कहना मान कर कचहरी में शादी कर ली होती तो बेहतर था। उस सम्बन्ध में कम जकड़न होती और हम अपनी अनिवार्यताएं खुद तय करते। परिवार और परम्परा के बन्धनों में मैंने खुद अपनी गर्दन फंसायी थी। न जाने कैसे मेरे मन में कचहरी का मतलब तलाक दर्ज था। मैंने यह कल्पना नहीं की थी कि पारम्परिक और प्रेम विवाह को एक सी गलियों से होकर गुजरना पड़ता है। प्रेम और विवाह के पहले मेरे पास आजादी थी , कर्तव्यमुक्त दिनचर्या थी, निर्भय आत्मनिर्भरता थी। किन्तु वह नायकविहीन जीवन था। प्रेम और विवाह ने जीवन को नायक और नवरंग दिया लेकिन नागवार चौखटे भी दिये। हमारा विवाह महज दो कलाकारों का सम्बनध नहीं दो संस्कृतियों का भी संक्रान्ति बिन्दु था। जब नये रिश्तेदारों से घिरी मैं जालन्धर पहुंची तब रवि के प्यार के सिवा मेरे हाथ के सारे पत्ते कच्चे थे। न पंजाबी बोलनी आती थी न समझनी। खाना बनाना , कपड़े धोना मेरे लिए अपरिचित काम थे। और तो और ठीक से चरण स्पर्श करना भी नहीं आता था। मैंने गौर किया कि स्टेशन पर शहर का नाम साफ लिखा था जालन्धर लेकिन बोलचाल में शहर को सब कह रहे थे जलन्धर। रेल गोधूलि बेला में जालन्धर पहुंची जब स्टेशन की शहतीरों से झुण्ड के झुण्ड पंछी उड़ कर अपने घोंसलों को जा रहे थे। हमारा रिक्शा भी कोट लखपत जा रहा था। रिक्शे की गति बेहद तेज थी, सड़क संकरी और और उखड़ी हुई। रवि रह रह कर बताते ÷÷ यह रास्ता मांई हीरागेट को जाता है वहां किताबों की दुकानें हैं। वह उधर पार्वती जैन स्कूल है। इधर साईंदास स्कूल है यहां से मैंने हाईस्कूल किया था।'' बड़ा सा चौराहा पटेल चौक आया जिससे जरा आगे मोड़ की गली थी कोट लखपत। बहुत बड़े प्लॉट पर विस्तृत बना था यह मकान जहां पहुंचते ही सबकी कार्यकुशलता से परिचय होता गया। मां ने मिनटों में अंगीठी बाल कर आलू गोभी बना ली और आटा गूंथ कर हमें आवाज दी कि चौके में आकर खाना खा लें। बहन ने हर कमरे में बिस्तर लगा दिये। पापा जी ने पानी भर दिया। ऊपर छत पर दो बड़े कमरे थे। एक में आलू, प्याज और गेहूं की भरी बोरियां रखी थीं। दूसरा कमरा रवि का था। सारे घर से अलग, इस कमरे का परिवेश भी अलग था। कमरे में किताबें ही किताबें थीं, पत्रिकाओं के ढेर, मेज पर रवि के लड़कपन की फोटो जिसमें उनके हाथ में प्रेमचन्द की बड़ी सी तस्वीर दिख रही थी। लगता था बाकी घर के शासनतंत्र का इस कमरे में कोई स्पर्श नहीं है। छत पर एक तरफ छत विहीन शौचालय बना हुआ था। जालन्धर शहर के लोगों की नागरिक चेतना मुहल्लों और उप मुहल्लों के आधार पर विकसित हुई भावना थी। लोग अपने मकान के साथ साथ गली को भी स्वच्छ रखना अपनी हाईजीन का हिस्सा समझते। गली की नालियों तक में पोचा लगाया जाता। पंजाब की घनघोर ठण्ड को धता बताते हुए , सूर्योदय में विलम्ब की परवाह न करते हुए घरों की स्त्रियां सुबह के दो घण्टे झाडू झाड़न पोचे से फारिग होकर थपाथप कपड़े धोने का अभियान चलातीं। नींद हैण्डपम्प की आवाज से खुलती। बाहर झांकने पर छत की हर रस्सी और मुंडेर पर धुले कपड़ों की कतार नजर आती। स्नान के बाद चाय बनती जो चाय कम पौष्टिक आहार ज्यादा होती। गाढ़े मलाईदार दूध में चाय की पत्तियां उबाल ली जातीं। विशाल मग में मिली यह चाय पीने पर तीन चार घण्टे कुछ खाने की जरूरत न रहती घर के दरबार में मां की चौधराहट चलती। पापा जी बहुत वरिष्ठ प्रिन्सिपल थे पर घर में उन्हें कनिष्ठता मंजूर थी। रौब मां का ऐसा था कि स्कूल के चपरासी आकर उन्हें प्रणाम करते , दाइयां उनका बदन दबातीं और मुहल्ले के समस्त बच्चे बड़े सवेरे उनके चरण स्पर्श से अपना दिनारम्भ करते। सफेद रंग की समस्त गरिमा और वैभव मां के परिधान में साकार होता जब वे बेड़े ( आंगन) के तख्तपोश पर बैठ परिवार की गतिविधियों का संचालन करतीं। सुबह की ठण्ड में मन होता रजाई ओढ़ कर फिर सो जाएं लेकिन घर सुबह की ध्वनियों से गूंज उठता, पापा जी टेप रिकॉर्डर पर विष्णुसहस्रनाम लगा देते। ऊपर के कमरे का लोकतंत्र छोड़ कर मुझे नीचे के राजतंत्र में शामिल होना ही पड़ता। रवि मेरी मुश्किलें पहचान रहे थे परन्तु पारिवारिक स्वीकृति के सन्ताप से गुजराना जरूरी भी था। हम दोनों के लिए प्रेम पलायनवादी फार्मूला नहीं था। इस पारिवारिकता में आनन्द भी था व नव्यता भी। शाम को हम कॉफी हाउस चले जाते। सिविल लाइन्स में पहली मंजिल पर इस बड़े से कॉफी हाउस में कई लेखकों कलाकारों का जमावड़ा होता। रवि के पहुंचने से रौनक आ जाती। कपिल मल्होत्रा गमगीन रहने वाले कहानीकार थे लेकिन रवि के साथ चहकने लगते। वहां सुरेश सेठ होते , हमदम और सुदर्शन फाकिर। जगजीत सिंह सिर्फ एक बार दिखे क्योंकि वे भी जालन्धर छोड़ कर बम्बई में संघर्ष कर रहे थे। वे कभी कभी अपने शहर आते। कपिल के साथ हम सिविल लाइन्स की सड़कें नापते। उसे पता चला मुझे गोलगप्पे पसन्द हैं। वह रोज गोलगप्पे की दुकान पर ले चलता। कभी कभी रवि से वह अपनी परेशानियों की बात करता। सौतेली मां और संवेदनहीन पिता के बीच पिसता यह खूबसूरत नौजवान लेखक नींद की गोलियों का शिकार हो जीवन से हाथ धो बैठा , हम सबको ताउम्र इस अफसोस में डाल कर कि हम चाहते तो इसे बचा सकते थे। जालन्धर के घरेलू हालात से हटा कर इसे कहीं भी ले जाते तो यह जी जाता। परिवार ने उसका मनोविज्ञान नष्ट कर डाला। सुदर्शन फाकिर भी जटिल मानसिकता का था। अपना कमरा छोड़ कर ज्यादा देर बाहर रहना उसे पसन्द नहीं था। एक दिन उसने हमें अपने घर बुलाया। उसके कमरे में एक बड़ी सी दरी बिछी थी, दरी पर फाकिर था और बस । कमरे में कोई एशट्रे नहीं थी। उसके सब दोस्त और वह खुद लगातार सिगरेट पीते और कमरे को एशट्रे समझते। दरी कई जगह से जली हुई थी। उसने रवि से पूछा, ÷÷ तुमने अपने पुराने प्रेम प्रसंगों के बारे में ममता को बता दिया?'' उसकी स्मार्टनेस पहचान कर मैंने कहा, ÷÷ मैंने भी अभी अपने पुराने प्रेमपत्र जलाये नहीं हैं, जलाने हैं।'' हिसाब बराबर हो गया। दोस्ती कायम रही। कुछ देर वहां बैठ कर फाकिर हमें अपनी बहन के घर ले गया जो कहीं पास ही रहती थी। जैसा विरोधाभास फिल्मों में दिखाया जाता है , भाई बहन की जीवन शैली में वैसा अन्तर था। बहन के घर में कीमती तामझाम, एसॅप्रेसो मशीन, बार, वर्दीधारी नौकर और समृद्धि की सक्रियता थी। फाकिर इस समस्त वैभव के बीच कमल पत्र पर पड़ी ओस की बूंद समान बैठा था, असम्पृक्त, असंग। रवि के सभी दोस्तों में यह शानदार फकीरी देखने को मिली। साथ ही अड़ियलपन। हमें जाना था कथा समारोह में कलकत्ते। परिवार अभी इसी बात से समझौता नहीं कर पाया था कि हम दिल्ली छोड़ कर बम्बई में डेरा डालें। कलकत्ते के नाम से उन्हें और भी ज्यादा परदेसीपन लगा। जितनी बार हम सब इकट्ठे बैठते , हमें समझाया जाता, अच्छे और आज्ञाकारी बच्चे बनने की शिक्षा दी जाती पर हम पर कहानी का भूत सवार था और हम नये देश देशान्तर देखना चाहते थे। राजेन्द्र यादव जी के पास हमारी टिकटें थीं जिनमें राजेन्द्र जी की बेटी टिंकू की टिकट पर मैंने रेल यात्रा की। कलकत्ते में दोहरा उत्सव था। नहीं तिहरा। एक तो नया शहर। फिर मेरी दीदी और नरेन्द्र भैया ने वहीं घर बसा रखा था। उन्होंने तीन चार दिन हमें खूब सैर करायी। उस वक्त हसरत जयपुरी कलकत्ते आये हुए थे। हमारे कॉमन दोस्त रेवतीलाल शाह ने उनसे मुलाकात करवायी। शिक्षायतन कॉलेज के सभागार में , कहानी में पीढ़ियों का संघर्ष अपनी जगह जोरों से चलता रहा किन्तु रोज नये साथियों से मिलना, छात्रों के बीच समय बिताना और क्रिसमस की रौनक से रोशन शहर देखना इस संघर्ष का कटखनापन कम करता रहा। वहीं पहली बार फूलछड़ी सी सुधा अरोड़ा और उसकी छोटी बहन इन्दु अरोड़ा मिलीं। उन दिनों ज्ञानोदय पत्रिका कलकत्ते से निकलती थी। कलकत्ते के कितने ही आत्मीय बन्धुओं ने हमें प्यार दिया, कृष्णाचार्य, मनमोहन ठाकौर, श्यामानन्द जालान, प्रतिभा अग्रवाल। मजा यह कि ये सब अग्रज नयी कहानी के महात्रिकोण के भी अभिन्न सखा थे।
लड़कपन में देखा शहर युवाकाल में बस इतना सहारा देता है कि हम वहां रास्ता नहीं भूलते अन्यथा उसके ब्यौरे तो धूमिल होकर सपनों का संजाल रचते हैं। चौथे दिन हम कलकत्ते से चल दिये बम्बई के लिए वहां पहुंचते ही रवि को कथा समारोह की विस्तृत रपट ÷ धर्मयुग' के लिए लिखनी थी और मुझे गाड़ी से उतरते ही एस. एन. डी. टी. युनिवार्सिटी जाकर लेक्चररशिप के इण्टरव्यू का सामना करना था। टे्रन में ही तैयार होने के क्रम में मैंने अपने बाल शैम्पू किये कि साबुन भरी उंगली से मेरी नयी अंगूठी वॉशबेसिन के छेद से फिसल कर नीचे जा गिरी। मैं गीले बालों से कूपे में आकर रवि को बताने लगी कि फिल्मी अन्दाज में गाड़ी तभी रुक गयी। रवि गाड़ी से उतरे और अगले ही मिनट सुपरमैन अन्दाज में मेरी अंगूठी लाकर दे दी। मुझे बड़ी खुशी हुई क्योंकि मन में एक घिसीपिटी आशंका पटपटा रही थी कि सोना खोना अशुभ होता है जबकि मुझे नौकरी का इन्टरव्यू देना था। तभी गाड़ी चल पड़ी। रवि ने कहा, ÷÷ पहियों के बीच हाथ डाल कर जब मैंने पटरी से अंगूठी उठायी, मैं सोच रहा था कि अगर गाड़ी चल पड़े तो कहीं अंगुठी के साथ साथ मेरा हाथ भी वहीं न रह जाए।'' बड़ा डर लगा, अपने पर गुस्सा आया और ताज्जुब भी हुआ कि मुझे यह खतरा क्यों नहीं महसूस हुआ। किसी भी सवाल में उलझने का समय नहीं था। गाड़ी बम्बई प्लेटफॉर्म में दाखिल हो रही थी जहां माहिम उपनगर में एक नहीं एक बटे दो कमरे का फ्लैट हमारा इन्तजार कर रहा था। शीतला देवी मन्दिर रोड पर एक बदरंग इमारत की तीसरी मंजिल पर हमें ग्यारह महीने के अनुबन्ध पर यह घर मिला था। कमरे में साज सज्जा के नाम पर एक जम्बो पलंग पड़ा था, वह भी इसलिए क्योंकि मकान मालकिन के पास उसे रखने के लिए जगह नहीं थी। कमरे से सटा एक संकरा दरवाजा गुसलखाने में खुलता था। रसोई नहीं थी। पता चला पिछला किरायेदार खाना नहीं पकाता था, वह सर रतनजी टाटा इंस्टीट्यूट से अपना डब्बा मंगवाता था। मकान मालकिन ने बताया कि उसके और हमारे कमरे के बीच चालू पैसेज में खाना बन सकता है। पुकारने की गरज से मैंने उसका नाम पूछा तो उसने पापड़ की प्लेट मेरे आगे रख कर कहा, ÷÷ वरी मीरां की मां बोलो नी, मीरां मेरी लड़की का नाम होता।'' शहर , नौकरी, घर और प्रेम में मौलिकता का अतिरेक प्रतिक्षण हमारी परीक्षा ले रहा था। सुबह और शाम में अभी काई समन्वय नहीं था। सुबह हम अपना समय टुकड़ा टुकड़ा करना सीख रहे थे, कटपीस समय जिसमें किसी भी सूरत में रवि को 9.11 की और मुझे 9.40 की लोकल टे्रन पकड़नी ही होती अन्यथा हमें काम पर देर हो जाती। रवि को भेजने के बाद काम समेट कर तैयार होकर निकलने में कई बार मेरी 9.40 छूट जाती जिसके बाद धीमी गाड़ी में बैठना पड़ता। चर्चगेट स्टेशन से भागमभाग सड़क क्रॉस कर मरीन लाइन्स स्थित अपनी युनिवर्सिटी पहुंचने में पांच मिनट और लग जाते। प्रोबेशन पीरियड अभी चल रहा था। एक ऐसे ही दिन जब समय दस से ऊपर हो गया था, मैं लिफ्ट में छठे माले की ओर जा रही थी। लिफ्ट में हमारे अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मनियार भी थे। उन्होंने लिफ्टमैन की परवाह न करते हुए मुझसे कह दिया, ÷÷ यू आर वेरी किसेबिल। हाउ मैनी टाइम्स यौर हजबैण्ड मेक्स लव टु यू इन ए डे?'' ÷ नो सर, डोण्ट टॉक लाइक दैट' कहती हुई मैं अपनी मंजिल पर बाहर निकल क्लास में चली गयी लेकिन मेरा दिल दिमाग थर्राता रहा। लगा जैसे उनके शब्द मेरे जिस्म से पिलच गये हैं। अगले पीरियड में भी मैंने पाया पार्टिशन के पीछे से उनकी भूरी आंखें मेरा पीछा कर रही है। मैं बेहद घबरा गयी। मैंने पेरिन दारूवाला और नीता रमैया , अपनी सहकर्मियों को समस्या बताने की कोशिश की। मिसेज दारूवाला ने सरसरी तौर पर कहा, ÷÷ खाली मुंह से बोला ना, इसका क्या वरी करने का।'' नीता रमैया बोली, ÷÷ उनकी पुरानी आदत है, नयी टीचर्स को ऐसे ही छेड़ते हैं।'' मुझे कोई राहत नहीं मिली। वापसी के सफर में , घर पहुंच कर भी मुझे लगता रहा जैसे डॉ. मनियार के शब्द मुझे प्रदूषित कर रहे हैं। मैंने रगड़ रगड़ कर मुंह धोया। रवि के दफ्तर से लौटते ही वारदात बयान की। उसने सिर्फ एक बात कही, ÷÷ अगर तुम समय से काम पर पहुंचतीं तो यह वारदात न हुई होती।'' उपदेश और भी नागवार लगा। रवि को क्या नहीं मालूम कितने बेढब कामों के बीच मैं नौकरी के लिए निकलती हूं। बहुत देर तक हम सुस्त , चिन्तित पड़े रहे। उसके बाद निकला रवि का ऐलान, ÷÷ तुम प्रिंसिपल से शिकायत करो। वह कुछ न करे तो वाइस चांसलर के पास जाओ।'' हिम्मत आ गयी। मोर्चा खुल गया। प्रिंसिपल फाटक ने हमदर्दी जतायी लेकिन बोले , ÷÷ मौखिक शब्दों पर मैं क्या कार्यवाही करूं। इनका काई साक्ष्य भी नहीं है। डॉ. मनियार युनिवर्सिटी के बहुत वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।'' कोई समाधान नहीं निकला। डॉ. मनियार की ताकाझांकी चलती रही। महिला सहकर्मी मुझे समझाती रहीं , ÷÷ इतना तुनकमिजाज होने से सर्विस कैसे चलेंगा। याद रखो तुम अभी प्रोबेशनर हो!'' कहीं से कोई हल न निकलते देख मैं वाइस चांसलर लेडी ठाकरसी के पास चली गयी। उन्होंने रजिस्ट्रार के साथ मिल कर मेरी समस्या सुनी और मेरा तबादला उसी परिसर में अपने गृह विज्ञान कॉलेज में कर दिया। लगभग विजय भाव से मैंने नये कॉलेज में काम शुरू किया। यहां साहित्य पढ़ाने का सुख नहीं था। बी.एससी. छात्राओं को केवल सामान्य अंग्रेजी पढ़ानी थी। लेकिन इस अधेड़ लोलुपता से सुरक्षा तोथी। शायद मैं गलत थी। एक ही विश्वद्यिालय के कॉलेजों में सिर्फ मंजिलों का फर्क था। मैं चौथी मंजिल से उतर कर पहली मंजिल पर पंहुच गयी और अपने को महफूज मानने लगी। मेरे तबादले से डॉ. मनियार के ऊपर कुछ न कुछ संकट आया तो होगा ही तभी उन्होंने विभाग की सभी महिला कर्मियों से इस आशय का संयुक्त बयान हासिल किया कि उन्हें डॉ. मनियार के आचरण से कोई शिकायत न रही न है। लेकिन घायल शेर ने मेरे नये कॉलेज की नयी प्रिंसिपल के साथ मिल कर जो पलटवार किया उसमें नौकरी तो मेरी ही गयी। कितनी अजीब बात है। बम्बई में कुछ लोग समुद्र से कोई बड़प्पन नहीं सीखते। इस महानगर की तुलना विदेश के नगरों से की जाती लेकिन यहां कभी भी कुन्दजहनी नजर आने लगती। अचानक मराठी और दक्षिण भारतीय लोगों में भिड़न्त शुरू हो जाती। रातोंरात सिन्धी मकान मालिक अपने यूपी के किरायेदारों पर मुकदमा ठोक देता - जाओ बाबा अपने देस जाओ। खाली पीली बम्बई में काय का वास्ते आता तुम लोग। एक तरफ यहां आदमी आदमी के बीच ऐसी उदासीनता थी कि कोई किसी का हाल न पूछे। दूसरी तरफ आक्रोश की ऐसी लपटें कि आधी आबादी को तड़ीपार करवा दें। इन लपटों की आंच हम तक नहीं पहुंची थी , कुछ इसलिए कि कालिया नाम वहां जातिसूचक कम और कृत्यसूचक अधिक समझा जाता। कालिया फिल्म बनने के बहुत पहले ये शब्द जाडिया, मोटिया की तर्ज पर एक शक्तिशाली जगत का परिचायक था। कालिया शब्द का सही अर्थ बम्बई आज तक नहीं खोज पायी जबकि पंजाब व हिमाचल प्रदेश में यह जानकारी सबको है कि काली के भक्त ही कालान्तर में कालिया कहलाये। हमें इन बातों से क्या लेना देना था। नौकरी से परे हमारी दुनिया में समुद्र सड़कें और प्रेम प्रकोष्ठ था। तीनों जगहों का हम दोनों को चाव था। हम सैलानी निकल पड़ते कहीं भी , कभी भी। जानी अनजानी राहों पर, बसों की ऊपरी मंजिल पर, चाय और नारियल पानी के अड्डों पर कभी रात बारह बजे चल देते गोरेगांव, अपने दोस्तों की नींद खराब करने। कभी ईरानी रेस्तरां पर्क्स में जाकर उसल पाव खाते। इसी निशाचरी में हमने पाया कि लोकल रेल की पटरियों के किनारे किनारे एक समानान्तर दुनिया चलती है जहां बेहिसाब बेचारगी और बेमिसाल क्रूरता है। हमें समुद्र के किनारे और स्टेशनों के आसपास घूमना पसन्द था। दोनों ही जगहें महानगर का बोध करातीं। लेकिन हमने पाया रात गहराने पर न समुद्र निरापद है न सड़क। ऐसी निशाचरी में एक दो बार अजीब स्थिति में पड़े। घर में घर जैसी कोई सुरक्षा नहीं थी। यह कमरे में पार्टिशन डाल कर निकाला गया कमरा था जिसमें छह फुट ऊंची प्लायवुड की दीवार थी , प्लायवुड का ही दरवाजा। स्टूल रख कर इस दीवार को आसानी से फलांगा जा सकता था क्योंकि ऊपर से चार फुट खुली जगह थी। मैंने कहा, ÷÷ यहां तो कभी भी चोरी हो सकती है।'' रवि हंसे, ÷÷ यहां से चोर क्या ले जाएगा? तुम्हारी सूती धोतियां या मेरी मद्रास ब्लीडिंग की कमीजें या किताबें? हमारे पास है ही क्या जो चोर अपना समय खराब करेगा?'' फिर भी मैं चोर को चकमा देने के लिए जो भी माल मता था उसे फ्रिज के अन्दर रख देती। मक्खन वाले खाने में मेरे दो एक हल्के गहने और तीन चार सौ रुपये पड़े रहते। रवि शहर के सांस्कृतिक जगत से जुड़े हुए थे। युवा चित्रकारों , अभिनेताओं, लेखकों और पत्रकारों से उनका जीवन्त संवाद था। घर की स्थितियां ठीक इससे विराधी थीं। घनघोर परिश्रम से कभी मेरी चाल लड़खड़ाने लगती, कभी बाल बिखर जाते। रवि कहते, ÷÷ घर में तुम सिर पर किताब रख कर चलने का अभ्यास किया करो, उससे चाल कलात्मक हो जाती है।'' मुझे गुस्सा आ जाता , ÷÷ बहुत बड़ा घर है न और बड़ी कलात्मक जिन्दगी! सुबह सुबह भागते हुए 9.40 की लोकल पकड़ने में सारी कलात्मकता का कचूमर निकल जाता है।'' TOP (Back to अनुक्रम) |