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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में
एक सैद्धान्तिक बहस

संजय सिंह

आजादी के बाद भारत में अधिकांश समय तक राज्य एवं सामाजिक सत्ता पर ऐसे लोग काबिज रहे जो खुले तौर पर अपने को सेकुलर कहते थे , किन्तु यह विडम्बना ही है कि आधी सदी से भी ज्यादा समय तक काबिज रहने के बावजूद लगता है कि सेकुलरवाद पर एक नये संवाद और बहस की जरूरत है। धर्म, राज्य तथा समाज के अन्तर्क्रियात्मक सम्बन्धों की जांच करते हुए अभय कुमार दुबे द्वारा सम्पादित पुस्तक बीच बहस में सेकुलरवाद ज्ञान के क्षेत्र में एक सैद्धान्तिक बहस को जन्म देती है।

अनुवाद की सीमाओं को समझते हुए सम्पादक ने सेकुलरिज्म को सेकुलरवाद मानते हुए अपने आपको एक साथ कई दुविधाग्रस्त परिस्थितियों से दूर रखा है तथा एक स्वस्थ बहस को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यह भी विडम्बनापूर्ण ही है कि सेकुलरवाद की बहस प्रमुखतः अंग्रेजी जानने समझने वाले तबके में ही केन्द्रित होकर रह गयी है। प्रस्तुत पुस्तक अनुवाद एवं पुनर्लेखन का सहारा लेकर इस विमर्श को एक बड़े तबके तक पहुचाने की सार्थक कोशिश करती है।

समाजशास्त्र , इतिहास, राजनीति विज्ञान, हिन्दी साहित्य के क्षेत्रों के अधिकारी विद्वानों के लेखों के इस संग्रह का महत्व इस कारण भी है कि यह विषयगत सीमाओं से बाहर आते हुए सेकुलरवाद के विविध आयामों को भारतीय सन्दर्भ में व्यक्त करता है।

पुस्तक को चार भागों में विभक्त किया गया है। पहला भाग ÷ सेकुलरवाद के आलोचक' है। जिसमें आशीष नन्दी, टी. एन. मदन, और पार्थ चटर्जी के आलेख संकलित हैं। ये लोग बहस को एक आधार प्रदान करते हैं तथा सेकुलरवाद के भारतीय सन्दर्भ में इसकी सार्थकता पर कुछ सवाल खड़ा करते हैं। द्वितीय भाग ÷ आलोचकों की आलोचना' के अन्तर्गत जावेद आलम तथा राजीव भार्गव के लेख हैं, जो इस आधार का परीक्षण करते हैं और तकोर्ं द्वारा बहस को और रोचक तथा विचारप्रद बनाते हैं। तीसरा भाग ÷ नयी सेकुलर कल्पनाशीलता' है, जिसमें सेकुलरवाद के नये आयामों पर विचार विमर्श को आगे बढ़ाते हुए शाहबानो तथा गुजरात के सन्दभोर्ं में मधु किश्वर तथा धीरूभाई सेठ नये उपागम तथा अन्तर्दृष्टि प्रदान की कोशिश करते हैं। रजनी कोठारी अपनी तार्किकता तथा विश्लेषण द्वारा सेकुलरवाद के खतरे बताते हैं तथा समाधान खोजने की कोशिश करते हैं। चतुर्थ भाग में ÷ हिन्दी के आईने में सेकुलरवाद' के अन्तर्गत रवि एस. वासुदेवन सेकुलरवाद पर एक नयी दृष्टि प्रदान करते हैं। पुस्तक के सम्पादक अभय कुमार दुबे हिन्दी जगत की सेकुलर चिन्तन प्रवृत्तियों के बारे एक विवरण प्रस्तुत करते हैं। दुबे ने ÷ सेकुलरवाद की अजीब दास्तान' में पुस्तक का पूरा परिचय तथा सेकुलरवाद का सन्दर्भ स्पष्ट कर दिया है।

सेकुलरवाद पर बहस को आधार प्रदान करते हुए नन्दी ने भारतीय एवं पश्चिमी सेकुलरवाद की चर्चा की है। उनके अनुसार पश्चिमी सेकुलरवाद का मुख्य लक्ष्य जनता की निगाह में धर्म का महत्व कम करना है तथा राजनीति एवं धर्म को एक दूसरे से अलग रखना है , जबकि भारतीय सेकुलरवाद समान आदर या समान निरादर के सिद्धान्त पर काम करता है। नन्दी यहां गांधी जी का यह कहते हुए उल्लेख करते हैं कि उन्होंने ( गांधी ने) पश्चिमी सेकुलरवाद को न अपनाते हुए सही किस्म की राजनीति एवं सही किस्म के धर्म को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी परन्तु उसके बाद भी सेकुलरवाद आज हाशिए पर है।

नन्दी के अनुसार बहुत ही कम लोग होंगे जो व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन में अधार्मिक हों अन्यथा व्यक्ति या तो व्यक्तिगत जीवन या सार्वजनिक जीवन में धार्मिक है ही। गांधी , जिन्ना, सावरकर, पटेल तथा नेहरू के सन्दर्भ में यह वर्गीकरण बताता है कि ये सभी लोग या तो व्यक्तिगत जीवन या सार्वजनिक जीवन में धार्मिक थे। इस प्रकार ऐसा लगता है कि धर्म सभी को कहीं न कहीं प्रभावित करता है। नन्दी ने मध्यमवर्ग की लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया में भागीदारी के सन्दर्भ में सेकुलरवाद को समझाने की कोशिश की है। उनके अनुसार चुनाव ने राजनीति में उन लोगों को प्रवेश दिया जो सेकुलर मूल्यों में विश्वास नहीं करते अर्थात लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया ने सेकुलरवाद की सीमा तय कर दी है। नन्दी के अनुसार यह वर्ग राजनीति के धार्मिक इस्तेमाल करने के बजाय धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल करता है।

टी. एन. मदन के अनुसार सेकुलरवाद थोड़े से लोगों का सपना है , जो समाज के अधिकांश हिस्से को अपनी छवि के ढांचे में ढालना चाहते हैं। मदन का मानना है कि दक्षिण एशिया के लोगों को धर्म के जरिये समाज में उनकी हैसियत मिलती है। मदन के अनुसार सेकुलरवाद का तथ्यात्मक वजूद तो है पर उसकी जड़ का कोई पता नहीं है। भारतीय सेकुलरवाद को ज्यादा से ज्यादा ÷ सर्वधर्मसमभाव' सरीखे रवैये की संज्ञा दी जा सकती है। विचारधारा के रूप में सेकुलरवाद धर्म के साधारण खण्डन और बुद्धिवाद के उभार की देन न होकर आधुनिक विज्ञान एवं प्रोटेस्टेण्ट मत के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों की देन है। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि मदन ने दक्षिण एशिया में सेकुलरवाद को पूरी तरह नकारा नहीं है अपितु उनके अनुसार सेकुलरवाद धमोर्ं के बीच समझदारी के रूप में ही स्थापित हो सकता है परन्तु यह तभी सम्भव है जब सेकुलरवाद और वैज्ञानिक मानस बनाने जैसे अस्पष्ट विचारों की दावेदारियों को सन्देह की निगाह से देख कर इस पर भारतीय सन्दर्भ में फिर से विचार किया जाए।

हिन्दूवादी आन्दोलनों पर विचार करते हुए चटर्जी ने भारत में सेकुलरवाद पर चर्चा की है। उनके मुताबिक हिन्दूवादी आधुनिकीकरण के पक्षधर एक ऐसा राज्य चाहते हैं जो कानून की किताब से या सार्वजनिक जीवन में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों की विशेष हैसियत खत्म करने की खातिर हस्तक्षेप के लिए तैयार हो। हिन्दू दक्षिणपन्थी खुद को इस्लामी और सिख कट्टरपन्थ के आधुनिकतावादी आलोचक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए वे धार्मिक कट्टरता और पिछड़ेपन को बर्दाश्त करने की सीख देने वालों पर ÷ छद्म सेकुलरवादी' होने का आरोप लगाते हैं। चटर्जी के अनुसार सेकुलर राज्य मुख्यतः स्वतन्त्रता, समता तथा तटस्थता को महत्व देता है। मदन की तरह चटर्जी का भी मानना है कि भारतीय सेकुलरवाद का अर्थ पश्चिमी सेकुलरवाद से अलग है। भारत में पैदा हुए सेकुलर राज्य के तजुर्बे से उत्पन्न समस्याओं को समझने के लिए एक नयी किस्म की अवधारणात्मक जमीन तलाशनी होगी।

जावेद आलम तथा राजीव भार्गव ने सेकुलरवाद के बारे में अपने आलेख में नन्दी , मदन एवं चटर्जी के नकारात्मक रवैये का विरोध किया है।

जावेद आलम का लेख मुख्यतः मदन के लेख की आलोचना के रूप में देखा जा सकता है। इनका विचार है कि सेकुलरवादी दलील में एक पद्धतिमूलक अस्पष्टता है। आलम , मदन के उस तर्क का विरोध करते हैं जिसमें मदन यह दावा करते हैं कि दक्षिण एशिया में धार्मिकता की अभिव्यक्तियां सेकुलरवाद को पनपने से रोकती हैं। आलम का तर्क है कि सेकुलरवाद कोई सांस्कृतिक रूप से तय सिद्धान्त नहीं है। आलम का यह भी तर्क है कि सेकुलरवाद को सिर्फ यूरोपीय ज्ञानोदय के बाद पैदा हुए सिद्धान्त के रूप में देखना जरूरी नहीं है। उनका मत है कि मध्य युग तथा पुनर्जागरण के शुरुआती दौर में ही धर्म और राज्य को अलग करने के प्रयास किये जाने लगे थे।

राजीव भार्गव सेकुलरवाद के आलोचकों की न केवल आलोचना करते हैं , बल्कि भारतीय सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य देने की कोशिश भी करते हैं। भार्गव राजनीतिक सेकुलरवाद तथा नीतिपरक सेकुलरवाद की चर्चा करते हैं। नीतिपरक सेकुलरवाद को वे पूर्णतावादी सेकुलरवाद मानते हैं क्योंकि यह धर्म एवं राजनीति को अलग करने का आग्रह इसलिए करता है कि एक परम आदर्श प्राप्त हो सके। राजनीतिक सेकुलरवाद को वे गैरपूर्णतावादी कहते हैं क्योंकि वह व्यापक परम आदर्श की रचना के बजाय अधिक व्यवहारिक किस्म के राज्यतंत्र की रचना करने के उद्देश्य से प्रेरित होता है।

शाहबानो के बहाने मधुकिश्वर भारत में औरतों की स्थिति तथा सेकुलरवाद पर विमर्श करती हैं। वे इस केस के माध्यम से फैलायी गयी गलतफहमियों को भी बड़े तार्किक ढंग से उभारती हैं। उनके अनुसार हिन्दू और मुस्लिम औरतों की स्थिति में बहुत अन्तर नहीं है। समान नागरिक संहिता की वकालत करने के बावजूद उनका मानना है कि उससे भारतीय स्त्रियों की जिन्दगी में बहुत अन्तर नहीं आयेगा। मधु इस बात से भी चिन्तित हैं कि समान आचार संहिता की वजह से बहुसंख्यक समुदाय अपने रीतिरिवाजों और आस्थाओं को एक आदर्श के रूप में रख सकता है।

गांधी का गुजरात मोदी के गुजरात में कैसे बदलता है , गुजरात के सन्दर्भ में धीरूभाई सेठ सेकुलरवाद के तत्वों का परीक्षण करते हैं। लोकतंत्र की बहुदलीय प्रणाली के बाद भी गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों का ताण्डव इस स्तर पर क्यों हुआ, गुजरात ही हिन्दू राष्ट्र का परीक्षण केन्द्र क्यों बना तथा क्या गुजराती हिन्दुत्व को अधिक महत्व देते हैं - सेठ ने इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की है।

रजनी कोठारी भारतीय सेकुलरवाद के सन्दर्भ में चार तरह की बाधाओं की बात करते हैं। पहली बाधा तकनीकशाही प्रबन्धकीय राज्य है जिसका आरम्भ इन्दिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए किया था। तकनीकशाही प्रबन्धकीय राज्य कार्पोरेट क्षेत्र तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के वर्चस्व को कायम करने का प्रयास करता है तथा इसका मुख्य उपकरण बाजार बनता है। कोठारी के मुताबिक चाहे प्रौद्योगिकीय आर्थिक किस्म के मुद्दे हों या साम्प्रदायिक मुद्दे , व्यवस्था का संचालन ऐसे अभिजन वर्ग के हाथ में आ गया है, जिसकी आस्था विविधता पर आधारित लोकतंत्र में है ही नहीं। चुनाव आधारित लोकतंत्र की विकृत समझ सेकुलरवाद के मार्ग में दूसरी बाधा है। चुनावी लोकतंत्र के भीतर घोर प्रतिक्रियावादी तत्व भी जीवित रह सकते हैं। चुनावी राजनीति का इस्तेमाल जनाधार विस्तार के लिए नहीं होता अपितु जनाधार का इस्तेमाल चुनावी राजनीति के लिए होता है। कठोर राज्य की अवधारणा तीसरी बाधा है। हिन्दूवाद को आधुनिक बनाने के चक्कर में लगे लोग हिन्दूवाद को इस्लाम तथा ईसाइयत की तर्ज पर संगठित करना चाहते हैं। यह एक ऐसी सोच है जहां पर बहुलतावाद का कोई महत्व नहीं है, बल्कि निरंकुशतावादी, सैन्यवादी तथा कट्टरपन्थी विचारधारा ही इसमें पलती बढ़ती है। राज्य का खुला साम्प्रदायिकीरण सेकुलरवाद के रास्ते की चौथी बाधा है। गुजरात दंगे, सिख विरोधी दंगे, राज्य के साम्प्रदायिकीकरण के सन्दर्भ में एक खतरनाक संकेतहै।

रवि. एस. वासुदेवन ने फिल्म बाम्बे के सन्दर्भ में सेकुलरवाद , धार्मिक आस्थाओं तथा उनके प्रकटीकरण को समझने का प्रयास किया है। वासुदेवन ने न केवल फिल्म के संरचनात्मक पहलू को महत्व दिया है अपितु उन मूल स्रोतों को भी ढूंढने की कोशिश की है जो फिल्म की अन्तर्पाठात्मकता को एक सजीव रूप प्रदान करते हैं। वासुदेवन के अनुसार फिल्म का कथांकन एक केन्द्रीय प्रश्न उठाता है कि क्या भारतीय समाज के नानाविध विभाजनों को लांघ कर किसी परिवार की संरचना की जा सकती है। फिल्म दिखाती है कि भारतीय समाज के ये विभाजन एक साथ परिवारों और समुदायों के बीच भी हैं। वासुदेवन का मानना है कि फिल्म प्राधिकार के एक रूप ( पितृसत्तामक रूप) का दूसरे रूप में रूपान्तरण दिखाती है परन्तु यह दूसरा रूप स्वयं को प्राधिकार मानने से ही इंकार करता है।

हिन्दी जगत के सेकुलर चिन्तन की प्रवृत्तियों के बारे में एक संक्षिप्त विवरण अभय कुमार दुबे ने अपने लेख में दिया है। दुबे का मानना है कि ये चिन्तक निस्सन्देह समाजविज्ञान की किसी विधा में प्रशिक्षित नहीं हैं परन्तु इनका चिन्तन किसी भी समाजविज्ञानी उपागम से एकदम अलग नहीं नजर आता। दुबे के अनुसार इन लोकप्रिय लेखकों ने समाजविज्ञान में सेकुलर बहस को समझा तथा जाना है । परन्तु जिन लेखकों को इस बहस में शामिल किया गया है वे सभी हिन्दू हैं। इस कारण से इस बहस तथा चर्चा में मुसलमान समाज से निकलने वाले उस नजरिये का अभाव दिखायी पड़ता है जो सेकुलरवाद की बहस के सन्दर्भ में प्रासंगिक है। हिन्दी जगत में सबसे पहले बहस सेकुलर शब्द के हिन्दी रूपान्तरण को लेकर हुई। इसके उपरान्त बहस धर्मनिरपेक्ष तथा पन्थनिरपेक्ष के सन्दर्भ में सामने आयी। बहस के एक दायरे में उर्दू में सेकुलरवाद पर भी चर्चा हुई। हिन्दी जगत में सेकुलरवाद की बहस को एक आधार राजेन्द्र यादव ने प्रदान किया। यादव ने 1984 में अल्पसंख्यक नाम की राजनीतिक श्रेणी को खत्म करने की वकालत की थी। एक तरफ जहां रजनी कोठारी अल्पसंख्यकों को लोकतन्त्र की शक्ति मानते हैं वहीं यादव को लगता है कि अल्पसंख्यक राजनीति, प्रतिक्रियास्वरूप बहुसंख्यकवाद के मुहावरे को जन्म देती है। यादव विविधता के विपरीत पश्चिम के समरूपीकरण को ज्यादा महत्व देते हैं। ऐसा लगता है कि यादव अपने आधुनिक चिन्तन के फलस्वरूप एक ऐसे समाज की रचना करना चाहते हैं जिसकी संरचना एकल संस्कृतिक, सार्वभौम तथा समूहात्मक होती है।

प्रभाष जोशी हिन्दी जगत में सेकुलरवादी चिन्तन के एक महत्वपूर्ण व्यक्त्वि हैं। सेकुलरवाद की समाजविज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए जोशी हिन्दुत्व तथा हिन्दू धर्म में फर्क करते हैं। हिन्दुत्व को वे एक राजनीतिक अवधारणा मानते हैं। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है कि अपने चिन्तन में धर्म और राष्ट्रवाद को स्पष्ट रूप से जोड़ने के बाद भी वे राजनीतिक हिन्दुत्व को नकारते हैं। भारतीय सेकुलरवाद की समस्या को किशन पटनायक आर्थिक राष्ट्रवाद और धार्मिक राष्ट्रीयता के बीच द्वन्द्व के रूप में देखते हैं। इनकी निगाह में आर्थिक राष्ट्रवाद की पहली किस्म के पीछे कम्युनिस्ट , समाजवादी और उदारतावादी हैं। धार्मिक राष्ट्रीयता जिसे भारतीय जनता पार्टी सांस्कृतिक राष्ट्रीयता कहती है, उसके पीछे संघ परिवार के नेता हैं। पटनायक विकल्प के तौर पर अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं। पटनायक के विचारों के विपरीत सच्चिदानन्द सिन्हा एक बहुधार्मिक समाज में धमोर्ं की निरपेक्षता की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

पुस्तक में ÷ शब्द तात्पर्य और धारणाएं' नामक पाठ एक अच्छे शब्दकोश का निर्माण करता है जो कि कई प्रत्ययों को समझने में सहायक है। पश्चिमी, एशियायी तथा हिन्दी क्षेत्र के सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची भी आगे के अध्ययन के सन्दर्भ में पाठकों के लिये उपयोगी है।

लोकचिन्तन ग्रन्थमाला अनुवाद के माध्यम से भारतीय समाजशास्त्र की खोज करना चाहती है , यह एक कठिन कार्य है, सम्पादक इसको कैसे पूर्ण करेंगे यह वह ही जाने। सम्पादक अंग्रेजी लेखों के पुनर्लेखन को बढ़ावा देना चाहते हैं, जो सराहनीय है परन्तु वे हिन्दी में ही लेखकों से मूल लेख लिखने का अनुरोध भी कर सकते हैं। सार रूप में यह कहा जा सकता है कि यह पुस्तक सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस को समाहित करने में सफल रही है।

बीच बहस में सेकुलरवाद : सम्पादक-अभय कुमार दुबे, प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : 225 रूपये


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