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शताब्दी लेख इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह लम्बी कहानी कहानिया मीमांसा कविताएं विशेष वृत्तान्त पत्र उपन्यास |
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सभी... के मन में हमेशा बनी रहती है आशा विशेष रूप से तब जब पूरे के पूरे माहौल में हो निराशा
उस वक्त यह सम्भव नहीं कि वह खुद को धोखे में न रखें चूकि आत्मवंचना से ही उन्हें मिलता है सुकून और वह है उनका सबसे बड़ा दुख येवोनी येव्तुशेंको , धूप खिली थी और रिमझिम वर्षा, रूपान्तरकार अनिल जनविजय, मेघा बुक्स दिल्ली, 2003
सड़कों पर लोगों का ऊचे स्वर में बात करना भी लक्षण है थोड़ी बहुत स्वतंत्रता का बहुत ज्यादा स्वतंत्रता नहीं है पर फिर भी यह बेहतर है गुलामी की विराट महानता से उसके पिरेमिडों और मीनारों से पर ऊंची आवाज में यह बातचीत पहले से तय हो यदि नगर परिषद के कार्यालय से तय हो सड़कों पर गिटार बजाना या स्मारक के सामने फूल अर्पित करना तो यह बस कुछ पर्यटकों के लिए है इसे स्वतंत्रता तो नहीं कहा जा सकता बोरीस रूतत्सकी (1919-1986), ÷ बीसवीं सदी की रूसी कविताएं' संग्रह से, अनुवाद : वरयाम सिंह
÷÷ हम इस सीधी सी बात को स्वीकार करने से कितना दूर हैं कि हमारी समस्या की जड़ हमारे बाहर नहीं हम खुद इस समस्या की जड़ हैं। इस सवाल के उत्तर में कि दोष किसका है हमें साफ साफ, असंदिध रूप से मानना चाहिए कि दोष हमारा है, मेरा है। ÷÷ रूसी साहित्य ने हमें सिखाया था कि दूसरों को उपदेश देना और स्वयं अपने दोष न छिपाना, स्वीकारना साथ साथ चलते हैं। हमने उस महान साहित्य की कसम खायी थी, उसका महिमा मण्डन किया था लेकिन किसी बिन्दु पर ये दो कृत्य जो आरम्भ में अविभाज्य थे अलगथलग पड़ गये। उनके बीच जो शुरू में मामूली दरार थी वह कालान्तर में एक दर्रा - एक गहरी खाइर्ं, एक आसमान, पाताल की दूरी बन गयी। हमारी कला का क्षेत्र कितने चतुर उपदेशकों के प्रभाव में आ गया था जो सभी कुछ कहते थे लेकिन एकमात्र वह नहीं जो उनकी अपनी सोच हो - वह नहीं जो उनकी आत्मा की पीड़ा को अभिव्यक्त करताहो। ÷÷ यही वजह थी कि ऐसी रचनाएं ऐसे व्यक्ति जो अन्दर के सच को व्यक्त करने और अपने विवेक से प्रेरणा लेने की कला की पुरानी परम्परा को आगे बढ़ाते थे वे हमारे यहां राजनैतिक गतिरोध और पतन के दौर में महासमुद्र में टापू की तरह थे कितने कम, कितने अकेले।'' एलेक्सी सिमिनोभ , ÷ यह समय दूसरों को उपदेश देने का नहीं, अपने अन्दर झांकने का है', रूसी कवि व्यावेस्लाव कुप्रियानोव की अनुमानतः सन् 1984 के आसपास लिखी गयी कविता जिसका शीर्षक है ÷ चुप्पी' एक युगान्तर का संकेत देने वाली कविता है। यह संवादहीनता या अवरुद्ध संवाद के युग से खुले और मुक्त संवाद के युग में प्रवेश की सूचना देने वाली या खुले संवाद का आह्वान करने वाली कविता है। यह रूसियों को उस ÷ चुप्पी' को तोड़ने के लिए आमंत्रित करती है जो स्टालिनवादी व्यवस्था के आन्तरिक ÷ सेंसरशिप' के अघोषित और घोषित दोनों प्रकार के आतंकों ने पैदा की थी। इस ÷ चुप्पी' या संवादहीनता से मेरा प्रत्यक्ष परिचय तब हुआ जब मैं भूगोल और समाज विज्ञान के विद्वानों के एक भारतीय दल के सदस्य के रूप में अविभाजित सोवियत गणराज्य के विभिन्न राज्यों में आयोजित अध्ययन गोष्ठियों में हिस्सा लेने के लिए अक्टूबर के महीने में सन् 1978 में सर्वप्रथम जियोर्जिया राज्य की राजधानी तिबिलिसी के लिए रवाना हुआ था। ÷ चुप्पी' को तोड़ने की दिशा में पहला निर्णायक कदम सन् 1956 में जनरल सेक्रेटरी निकिता क्रुश्चेव ने उठाया था और उस साहसी पहल ने जिस आंतरिक विस्फोट की शुरुआत की उसका नतीजा यह हुआ कि स्तालिनवादियों ने क्रुश्चेव को नेतृत्व से ही हटा कर यथास्थितवादी ब्रेजनेव को नेतृत्व सौंप दिया जिन्होंने परिवर्तन प्रक्रिया को बाधित कर यथास्थिति को फिर से कायम कर दिया था। इसका नतीजा था ÷ चुप्पी' ( संवादहीनता) की वापसी। यथास्थिति की इस वापसी ने संवेदनशील बुद्धिजीवियों में जिस हताशा और पराजय की मानसिक स्थिति को जन्म दिया था उसी को युवा कवि येव्तुशेंको की निम्न पंक्तियां प्रखर रूप से व्यक्त करती हैं : मैं तुमसे क्या कहूं ऐ रूस मैं क्या चुप रह जाऊं ऐ रूस
बहुत ज्यादा सलीबें हैं तेरे कब्रिस्तानों में और ऐसी भी कबं्रे बहुत जिन पर नहीं सलीब मैं कैसे मदद करूं तेरी ऐ रूस
वहां कवि क्या मदद करेगा जहां सत्ता प्रायः कवियों को देशनिकाला दे देती है। ÷ स्तालिन के वारिस' नाम की कविता में तो कवि अधिक स्पष्ट और तीखे स्वरों में वस्तुस्थिति की जीवन्त तस्वीर प्रस्तुत करता हैः चला गया वह ( स्तालिन) छोड़ गया वह इस धरती पर ढेरों अपने वारिस फैल गये कामरेड बनके सारे ÷ तवारिश' मुझे लगे वह कि ताबूत में उसके फोन लगा है आदेश दे रहा जिस पर वह स्तालिन पुनः जगा है कहां कहां पहुंच रहे हैं इस फोन के तार नहीं, स्तालिन मरा नहीं है अभी वह मानता है गलती मौत की वह लेगा सुधार
मातृभूमि ने मेरी मुझे दिया है यह आदेश छोड़ गुस्सा अपना शान्ति से आऊं पेश पर मैं कैसे भूल जाऊं, ऐ मेरे प्रिय देश जब तक जीवित हैं इस धरती पर स्तालिन के वारिस तब तक अपनी उस समाधि में स्तालिन भी है शेष ÷ जैसे जैसे' कविता में कवि अपनी पीढ़ी की हताशा और अवसाद को और भी सशक्त ढंग से व्यक्त करता हैः जैसे जैसे दिन बीतेंगे सम्भव है मैं अकेता होता जाऊंगा यह हो न ऐसा कि दिन बीतें जैसे जैसे मेरे जीवन में शर्म बढ़े वैसे वैसे पर हो न ऐसा कि वर्ष गुजरें जैसे जैसे पर हो न ऐसा कि शताब्दियां बदलें जैसे जैसे और अन्त में , अक्तूबर क्रान्ति ने जिस कम्यूनिज्म के स्वप्न का सृजन किया था उसके ध्वस्त होने की त्रासदी का गहन विषाद ये पंक्तियां व्यक्त करती हैः मैं अन्तिम कवि हूं उस कम्यूनिज्म का जो कभी आया नहीं इस धरती पर और शायद आ भी नहीं सकता। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए जो कम्यूनिज्म से सम्पूर्ण मोहभंग की घोषणा करती हैं मुझे वे कवि याद आये जिन्होंने रूसी क्रन्ति के समय कम्यूनिज्म को धरती पर नये समाज का सबसे अनमोल , अमर स्वप्न घोषित किया। मुझे याद आयीं मायाकोवस्की की निम्नलिखित स्वप्नदर्शी पंक्तियां: कम्यून वह स्थान जहां से गायब हो जाएंगे सभी अधिकारी और जहां सुनेंगे स्वर अनेक गीतों के कविताओं के मुझे याद आये रूसी क्रान्ति का जीवन्त विवरण विश्व भर में अपनी पुस्तक ÷ टेन डेज दैट शुक द वर्ल्ड' के अमर लेखक जान रीड जिन्होंने रूसी समाजवाद का अभिनन्दन करते हुए कहा थाः ÷÷ रूसी जन धरती पर ऐसी व्यवस्था की रचना करेंगे जो होगी अतुलनीय, स्वर्ग भी जिसका मुकाबला न कर सकेगा, जिसकी रचना में अपनी जान देना होगा सबसे बड़ा गौरव, सबसे बड़ी खुशी।'' रूस के बाहर भी कवियों ने इस नये प्रयोग का अभिनन्दन किया था। मुझे फ्रांसिसी कवि लुई एरेगों की पंक्तियां याद आती हैं: ÷ कम्यूनिज्म संगीतमय कल की तैयारी है' ( Communism prepares for singing tomorrow ) । मानव स्थिति और नियति के चिन्तकों के लिए स्वप्नदर्शी क्रान्तिकारियों के प्रारम्भ के भव्य स्वप्न और कई दशकों के बाद के कभी कटु और कभी घिनौने यथार्थ के बीच विराट दरार और तीव्र अंतर्विरोध मानव इतिहास की सबसे जटिल पहेली प्रस्तुत करते हैं। विशेषकर मार्क्सवादी विचारों के लिए स्वप्न की यह आशाओं के विपरीत परिणति ऐसे प्रश्न प्रस्तुत करती है जिसका उत्तर खोजना तो दूर उसका सामना करने से भी कम्यूनिस्ट विचारक कतराते रहे हैं। वही कम्यूनिस्ट विचारक जो पूंजीवादी व्यवस्था के आंतरिक संकट से जुड़े जटिल से जटिल और गहन से गहन प्रश्नों और पहेलियों को पहचानने तथा उनसे बौद्धिक और व्यावहारिक स्तरों पर जूझने में असाधारण रूप से कामयाब हुए और जिन्होंने इसके विकल्प के रूप में समाजवादी व्यवस्था की प्रारम्भिक रूपरेखा प्रस्तुत करने की भी बौद्धिक क्षमता , नैतिक मनोबल का प्रदर्शन किया क्या कारण है कि बाद की पीढ़ी के उनके उत्तराधिकारी समाजवादी विचारक स्थापित और वास्तविक कम्यूनिज्म के आंतरिक संकट को आदि से अंत तक पहचानने स्वीकारने में अक्षम सबित हुए। न उनकी जांच पड़ताल का साहस जुटा पाने में ही समर्थ साबित हुए। पूंजीवाद के आंतरिक संकट की जांच पड़ताल में असीम बौद्धिक साहस और क्षमता का परिचय देने वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवी समाजवाद के गम्भीर आंतरिक संकट के प्रति नैतिक दृष्टि से इतने भीरु और संवेदनशून्य, बौद्धिक दृष्टि से इतने असंवेदीय और अक्षम क्यों सावित हुए यह आज भी एक जटिल पहेली बनी हुई है। लेकिन इस प्रश्न से जूझे बिना समाजवादी विचार और व्यवहार को उसकी आज की मृतप्राय स्थिति से उबार कर उसके नवनिर्माण का प्रारम्भिक कदम उठाने, उसके नवोदय की आशा जगाने की कोई सम्भावना नजर नहीं आती। समाजवादी आन्दोलन की आज की यह स्थिति है कि जो इस आन्दोलन से व्यवहार के स्तर पर अब भी जुडे+ हैं वह किसी प्रवुद्ध वैचारिकता, किसी दृढ़ विश्वास, किसी प्रखर चेतना और किसी जीवन्त चिन्तन, विवेचन, निरीक्षण और अन्वेषण पर आधारित आज के लिए प्रासंगिक बौद्धिक आधार के बिना पुरानी लकीर के फकीर बने हुए हैं। बुनियादी रूप से बदले हुए वर्तमान से वे किसी नयी पहल नयी दिशा के अभाव में पुराना ही ढोल पीटते चले जाते हैं। दूसरी ओर व्यवहार से कटे हुए समाजवादी बुद्धिजीवी उस सम्पूर्ण रूप से बदले हुए , बदलते हुए इक्कीसवी सदी के वास्तविक जगत के वैश्विक, राष्ट्रीय, स्थानिक परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य से पूरी तरह अनजान नजर आते हैं, वे वैचारिक, सैद्धान्तिक जगत में नयी वैज्ञानिक खोजों, तकनीकी क्रान्तियों और सामाजिक चेतना और मानसिक प्रक्रियाओं के नये उद्वेलनों और विस्फोटों से भी अनजान नजर आते हैं। वे उन्नीसवीं सदी के उत्तर्राद्ध से बीसवीं के आरम्भ तक मार्क्स और मार्क्सवादियत के चिन्तन तथा बीसवीं सदी के आरम्भ से रूसी क्रांति और प्रारम्भिक समाजवादी नवनिर्माण तक लेनिन द्वारा प्रस्तुत किये गये चिन्तन अवधारणाओं, उसके बाद स्तालिनवादी स्थापनाओं तथा स्तालिन के उत्तराधिकारियों द्वारा स्तालिनवाद की सतही आलोचना और समीक्षा के दायरे से निकल कर कोई नयी पहल करने में नितांत असमर्थ रहे हैं। नतीजा यह है कि विश्व भर में बिखरे हुए समाजवादी बुद्धिजीवियों को जोड़ने और नयी सक्रियता प्रदान करने वाले किसी नये समग्र, ÷ यूनिफांइग' दर्शन, चिन्तन और चेतना के अभाव में विश्वव्यापी समाजवादी बुद्धिजीवी समुदाय नाम की उस शक्ति का ही जैसे विलोप हो गया है जो नवउदारवादी वैचारिक अभियान को चुनौती दे सके और उसका सार्थक विकल्प प्रस्तुत कर सके। सबसे दयनीय स्थिति समाजवादी चिन्तन और चेतना के गढ़ और पूंजीवाद की वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था की प्रयोगशाला रूस की है जिसका आज समाजवाद के प्रेरणास्रोत के रूप में विलोप हो गया है और वहां एक ऐसे सैद्धान्तिक शून्यवाद और वैचारिक संशयवाद का प्रसार हुआ है जिसके कारण रूस को आज समाजवादी देश कहा जा सकता है न उन्नतिशील पूंजीवाद की नयी प्रयोगशाला। वह सशक्त पूंजीवादी व्यवस्था के ही वर्चस्व के मातहत उनके ही प्रभाव क्षेत्र में शामिल होने और न होने की स्थिति से जूझता नजर आता है। रूसी गणराज्य संघ को नवनिर्माण की नयी दिशा और नयी ऊर्जा आज समाजवाद के नवोदय और नवनिर्माण के विचार, लक्ष्य और कार्यक्रम से नहीं, नव उदारवादी पूंजीवाद की ओर उन्मुख राष्ट्रवाद के विचार, लक्ष्य और कार्यक्रम की प्रक्रिया द्वारा ही प्राप्त होती नजर आती है। यह प्रक्रिया समाजवाद की पूर्व प्रयोगशाला और समाजवादी शक्ति के गढ़ क्रांतिकारी लेनिन के रूस पर ही लागू नहीं होती जहां समाजवाद का नाम भी शासक वर्ग अब नहीं लेता। यही गति और नियति क्रांतिकारी माओ के देश चीन की भी नजर आती है जो नाम तो अब भी समाजवाद का लेता है लेकिन जहां तेजी से हो रहे विकास की प्रक्रिया - राज्य की नये संदर्भ की सकारात्मक भूमिका - चारों ओर राज्य द्वारा नियंत्रित बाजार के सम्मिश्रण से संगठित पूंजीवाद के चीनी संस्करण के रूप में ही उभर रहीहै। दूसरे शब्दों में इस विकास प्रक्रिया का स्वभाव और प्रकृति इक्कीसवीं सदी के पूंजीवाद के राष्ट्रवाद के ही अधिक निकट है। इसमें वर्चस्व औद्योगिक पूंजी के विकास और विस्तार के लिए कटिबद्ध एक साहसी और उद्यमी वर्ग का है जो श्रमिक समुदाय के दीर्घकालीन और तात्कालिक हितों को प्राथमिकता कदापि नहीं देता। रूस और रूस से जुड़े राज्यों के अलावा जो सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी राज्यसंघ के हिस्से बने हैं अन्य अनेक राज्य जो सोवियत यूनियन में शामिल थे की विकास प्रक्रिया पर वर्चस्व आधुनिक रेडिकल पूंजीवादी राष्ट्रवाद का नहीं है। समाजवादी विचार , लक्ष्य और कार्यक्रम से कट जाने के बाद इन देशों में धार्मिक उन्माद ( इस्लामी कट्टरता का उभार) या संकीर्ण जातीयता ( एथनिसिटी) पर आधारित अस्मिता के पुनर्निमाण की भावना का विस्फोट हुआ है। आज इन कई राज्यों के रूस से भयंकर अंतर्विरोध, तनाव और हिंसात्मक टकराव को देखते हुए जो कभी कभी युद्ध की स्थिति तक पहुंच जाता है, यह कल्पना करना भी कठिन है कि करीब सात दशकों तक ये राज्य महान सोवियत समाजवादी गणराज्य संगठन के अभिन्न अंग थे। टकराव तक ले जाने वाले ये अंतर्विरोध यकायक तो नहीं उपजे होंगे। वर्षों तक अंदर ही अंदर लावा जमा हो रहा होगा जो एक बिन्दु पर ज्वालामुखी के रूप में भड़क उठा। प्रश्न उठता है क्या कारण है कि रूस समेत इन समाजवादी देशों का बुद्धिजीवी समुदाय और शासक वर्ग इन उग्र रूप धारण करते हुए अंतर्विरोधों से अनजान बना रहा या जानबूझ कर इनकी तरफ आंखें मूंदे रहा। मुझे याद है कि जब 1978 में भारतीय समाज वैज्ञानिकों का एक दल ÷ आर्थिक नियोजन और प्रादेशिक विकास की समस्याएं' विषय पर आयोजित सेमिनारों की श्रृंखला के लिए पूर्व सोवियत यूनियन के कुछ गणराज्यों की यात्रा पर निकला तो भारतीय दल ने रूस तथा अन्य राज्यों के बुद्धिजीवियों से स्पष्ट रूप से यह प्रश्न किया कि क्या सोवियत यूनियन के राज्यों में विकास प्रक्रिया की विषमता और असंतुलन है जैसा अन्य देशों में है जिनमें भारत भी शामिल है? यह भी कि क्या यह विषमता और असंतुलन असंतोष को जन्म देते हैं? उन सबका चाहे वे रूस के समाज वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री हों या अन्य राज्यों के, यही उत्तर था कि समाजवादी व्यवस्था की तो प्रकृति ही समतामूलक, समताप्रेरक और समता पोषक है, उसमें न विषमता की गुंजायश है न किसी प्रकार के तनाव और असंतोष की। भारतीय दल को यह उत्तर चौंकाने वाला लगा जिस पर सहज बुद्धि के आधार पर विश्वास करना कठिन था। सबसे अधिक चौंकाने वाला यह लगा कि भारतीय दल के करीब 15 सदस्य कभी भी एकमत नहीं थे और खुले तौर पर अपने भिन्न भिन्न विचार और मत व्यक्त कर रहे थे जबकि हर मौके पर सोवियत यूनियन के दल के करीब पचास प्रतिनिधि सेमिनार के मंच से सदा एक ही मत व्यक्त करते थे। हालांकि जब उनसे अलग अलग निजी तौर पर बात होती थी तब वे सार्वजनिक रूप से व्यक्त किये गये मत के बिल्कुल विपरीत राय व्यक्त करते थे। इस परिदृश्य को देख कर भारतीय दल की विचित्र प्रतिक्रिया हुई। तिबिलिसी , जार्जिया में हुए सेमिनारों की श्रृंखला के पहले सेमिनार में शुरू के दो दिन भारतीय दल ने विकासजन्य प्रादेशिक असंतुलन और विषमताओं पर खुल कर रोशनी डाली और एक माने में विकास प्रक्रिया के सकारात्मक पक्ष को कम नकारात्मक पक्ष को ही अधिक उजागर किया था। लेकिन सोवियत यूनियन के प्रतिनिधियों द्वारा समाजवादी व्यवस्था को संतुलित प्रादेशिक विकास के लक्ष्य की पूर्ति की दृष्टि से एकदम अंधभक्ति के आधार पर महिमा मण्डित करते देख कर भारतीयों ने भी अपने जरूरत से ज्यादा खुलेपन पर रोक लगा दी और भारतीय नियोजन के विकास परिणामों के सकारात्मक पक्ष पर - प्रादेशिक अंसतुलन दूर करने वाले कार्यक्रम पर - अधिक बल दिया तथा नकारात्मक पक्ष और नकारात्मक तथ्यों को अपने वक्तव्य में कम महत्व दिया। लेकिन समाजवादी देशों के कम्यूनिस्ट, मार्क्सवादी लेनिनवादी बुद्धिजीवियों और समाज वैज्ञानिक समुदाय की सत्य से यानी वास्तविक सामाजिक स्थिति से आंखें मूंदने और उसको स्वीकार करने से कतराने की इस प्रवृति ने मुझे इस प्रवृति के विभिन्न पहलुओं और उसकी जड़ों को समझने के लिए विवश किया। मुझे यह प्रवृति बुद्धिजीवियों के उस आदर्श और उस मूल प्रेरणा के बिल्कुल विपरीत लगी जो मार्क्स ने एक बुद्धिजीवी के रूप में बौद्धिक जीवन के प्रारम्भ में ही अपने सामने रखी थी। मार्क्स से यह पूछने पर कि उनकी राय में सच्चे बुद्धिजीवी की परिभाषा क्या है, मार्क्स ने कहाथाः ÷÷ सच्चा बुद्धिजीवी वही है जिसका मन मुक्त और निर्भीक होता है।'' इसी विचार को अधिक प्रखर रूप से स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने कहा थाः ÷÷ बुद्धिजीवी से अपेक्षित है आलोचना, निर्मम आलोचना जो न अपने निष्कर्ष से कतराती है और न शासक वर्ग के साथ टकराव से भागती है।'' स्मरण रहे , मार्क्स ने अपने बारे में अपनी बेटी द्वारा पूछे गये कई प्रश्नों के उत्तर दिये थे जो मार्क्स की आत्मस्वीकृतियों के नाम से विख्यात हैं। बेटी के एक प्रश्न कि उनका सबसे प्रिय वाक्य क्या है के उत्तर में मार्क्स ने जवाब दिया - ÷ हर बात पर सन्देह करो' । पूंजीवादी समाज के भीतर उसके द्वारा पैदा की गयी बाधाओं और उसके द्वारा किये जा रहे क्रान्तिकारियों के दमन और उत्पीड़न का मुकाबला करते हुए लेकिन साथ ही साथ उसके अंदर जन्म ले रही लोकतांत्रिक व्यवस्था की सम्भावनाओं और अवसरों का लाभ उठाते हुए मार्क्स और उनके अनुयायियों ने बुद्धिजीवियों के लिए स्वयं निर्धारित इस धर्म और नियम का अक्षरशः पालन किया। मार्क्स के बाद रूसी क्रान्ति के पूर्व और उसके बाद के प्रारम्भिक वर्षों में लेनिन एवं उनके अनुयायियों ने भी कुछ अपवादों को छोड़ कर कमोबेश इस आदर्श को निभाया जिसके कारण समाजवादी आन्दोलन का इतिहास गम्भीर विचार विमर्श, विचारोजक वाद विवाद, वैचारिक द्वन्द्व और मंथन का इतिहास बन गया। फिर क्या कारण है कि जैसे जैसे समाजवादी व्यवस्था की जडं+े मजबूत होती गयीं वैसे वैसे गम्भीर विचार विमर्श, गहन वैचारिक मंथन, सारगर्भित वाद विवाद, तथा भिन्न भिन्न एवं परस्पर प्रतिरोधी मतों की निर्भीक अभिव्यक्ति कालान्तर में घटती गयी और कम होकर प्रायः समाप्त होती गयी। यही नहीं बुद्धिजीवी वर्ग का एक स्वतन्त्र समुदाय के रूप में अस्तित्व ही जैसे खत्म हो गया, वह शासक वर्ग का मानो टीकाकार, व्याख्याता या प्रचारक बन कर रह गया। समाजवादी व्यवस्था में बुद्धिजीवी वर्ग की इसी स्थिति और नियति पर पोलैण्ड के प्रसिद्ध समाजशास्त्री स्टानिस्लौ औसोवस्की द्वारा की गयी निम्नलिखलित तीखी टिप्पणी न सिर्फ पोलैण्ड के बुद्धिजीवी समुदाय पर लागू होती है बल्कि एक माने में सभी समाजवादी राज्यों के शायद विश्व भर के उन बुद्धिजीवियों पर लागू होती है जिन्होंने अपनी स्वायत्त अस्मिता को शासक वर्ग का अन्ध और अविवेकी समर्थक बन कर समाप्त कर दिया। औसोवस्की ने मार्क्सवादी बुद्धिजीवी समुदाय और शासक वर्ग के अशोभनीय रिश्ते को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त कियाः ÷÷ कैसी विडम्बना है कि कम्यूनिस्ट शासक बुद्धिजीवी से वही चाहते हैं जो एक शराबी बत्ती के खम्भे से चाहता है - दोनों को सहारे की जरूरत है रोशनी की नहीं।'' इसी बात को अपने प्रसिद्ध उपन्यास ( Childern of the Arbat ) में उपन्यास के लेखक अनातोली रिबाकोव ने स्तालिन के ही श्रीमुख से निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया थाः ÷÷ बुद्धिजीवी समुदाय के सबसे प्रमुख शक्ति स्रोत के रूप में लेखकों ने जन साधारण का नैतिक और भावनात्मक नेतृत्व अर्जित किया था। इसका मतलब था कि अगर जन को अपने वश में रखना है तो उन को प्रभावित करने वाले उनके बुद्धिजीवी समुदाय को या तो अपने प्रभावाधीन किया जाय या उन्हें एक शक्ति के रूप में नष्ट कर दिया जाय। सबसे अच्छी रणनीति होगी कि उसके असहमति पर दृढ़ हिस्से का विनाश और सहमति के लिए राजी हिस्से को वश में लाकर समस्त बुद्धिजीवी समुदाय पर विजय।'' जिन जिन बुद्धिजीवियों ने समाजवादी देशों की राजनैतिक या आर्थिक व्यवस्था की आलोचना कर शासकों से असहमति व्यक्त करने का साहस किया उन्हें देश के शत्रुओं के एजेण्ट या व्यवस्था के शत्रु घोषित कर दिया गया। उन्हें या तो देश छोड़ कर जाना पड़ा। उन्होंने यदि देश में बने रहने की हिम्मत की तो सभी नागरिक अधिकारों से वंचित होकर अपने ही देश में निर्वासित ( इंटरनल इग्जाइल) की तरह रहने को विवश होना पड़ा। वे श्रमशिविरों, नजरबन्दी, यातना शिविरों में बन्द घोर मानसिक और शारीरिक यातना के शिकार हुए। स्तालिनवादी तानाशाही के प्रतिरोध में निर्भीक असहमति के प्रतीक के रूप में कवि औसिप मेण्डेलस्टाम स्तालिन पर अपनी कविता के कारण स्तालिन के कठोर कोप, भयानक मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के शिकार हुए जिसकी परिणति उनकी मौत में हुई। उनकी पत्नी की अपने पति और अपने अनुभवों की गाथा और उनका विचारोत्तेजक वक्तव्य केवल एक विद्रोही कवि और उत्पीड़न के शिकार दम्पति की कहानी ही नहीं है, वह विश्व की प्रथम समाजवादी व्यवस्था के सम्बन्ध में कुछ गम्भीर प्रश्न भी प्रस्तुत करती है जो समाजवादी विचारकों और बुद्धिजीवियों द्वारा विचारणीय हैं लेकिन उन पर विचार नहीं हुआ है। यह मानना पडे+गा कि मिखाइल गोर्वाचोव के सोवियत संघ के नये नेता के रूप में उभरने के साथ साथ पेरिस्ट्रौइका और ग्लासनास्त की नयी आवधारणाओं के पीछे स्तालिनवादी अवधारणाओं और व्यवस्थाओं से सम्पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद की भावना थी। इसी के फलस्वरूप प्रबुद्ध बुद्धिजीवी समुदाय में एक नयी बौद्धिक और भावनात्मक ऊर्जा का उभार हुआ, और बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा आत्मपरीक्षण और आत्मालोचना की पुनः शुरुआत हुई। उस दौर - सन् 1988 - में अनेक बुद्धिजीवियों की जिनमें वैज्ञानिक, सामाजिक विचारक, कलाकार तथा साहित्यकार शामिल थे एकदम नये प्रकार की आत्मालोचनाओं और वैचारिक विवेचनाओं का एक संकलन ÷ कल्चर एण्ड पेरिस्ट्रौइका के नाम से प्रकाशित हुआ। इस संकलन को पढ़ना किसी भी पाठक के लिए स्वयं अपने में उत्तेजित कर देने वाला अनुभव है। त्वारद्वास्की की निम्नांकित पंक्तियां स्तालिनवादी दौर की पूरी घुटन और दमन के विरुद्ध दबी हुई भावनाओं को जैसे व्यक्त करती हैं : जो सब कुछ रह गया था अनकहा फर्ज कहता है कि हम आज वह सब कहें इसके साथ ही एलेक्सी सीमोनोव का यह कथन कि संसार के मूल में है हमारी मानसिक दासता ( इनर सर्विलेरी) जिसे महसूस किये और जिससे जूझे बिना हमारी मुक्ति नहीं इस समस्त संकलन का बीजवाक्य है। ये आत्मालोचनाएं भी उन दो जटिल प्रश्नों से ही जूझती हैं जिनका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं पहला |