( सशक्तीकरण और मुक्ति के बीच हमारे युग की नायिकाएं)
कर्त्ता की मौत और आत्मकथा की दस्तक
क्या कोई जीवन कभी शब्दों में अनूदित हो सकेगा ? ... क्या एक जीवन, जिसका अभी अंत नहीं हुआ है, ... कभी खुद को पूरी तरह समझ सकेगा?... क्या हम किसी आत्मकथा के भीतर हकीकत और फसाने का फर्क करने में कामयाब हो पायेंगे?... क्या स्मृति और कल्पना में बहनापा नहीं होता, क्या नॉस्टेल्जिया या आत्मछलना से यादों की नातेदारी नहीं होती? ... इसीलिए, क्या आत्मकथा किसी तलाश का रिकॉर्ड होने के बजाय खुद में एक तलाश नहीं होती? क्या वह खुद को व्यक्त करने या खुद को जानने से कहीं ज्यादा खुद की रचना का अध्यवसाय नहीं होती?... और क्या यह तलाश, खुद को रचने के लिये की गयी यह मेहनत जीवन मरण के चक्र में फंसे असली कर्ता पर अपना असर नहीं डालती?
ये सवाल अमेरिका में रह कर अंगे्रजी लेखन करने वाले मिस्री लेखक इहाब हसन ने अपनी बहुचर्चित आत्मकथा२ प्रकाशित होने के सात आठ साल बाद उठाये थे। शायद उन्हें लग रहा था कि आत्मकथा के आईने में उन्होंने खुद को नयी आंखों से देख लिया था। आत्मकथा लिखने के बाद उन्हें स्वयं की नयी प्रतीति हुई होगी। इसीलिए निबंधों के जिस संकलन में उन्होंने अपने उत्तर आत्मकथा जीवन पर खोजपूर्ण नजर डाली , उसका शीर्षक भी ÷ र्यूमर्स आवॅ चेंज' यानी ÷ बदलाव की अफवाहें' था। आत्मकथा के बैरोमीटर से अपने ही बदलाव की डिग्री का पता लगाते हुए इहाब हसन का मकसद जो भी रहा हो, उनका यह कथन हमें आत्मकथा की विधा में झांकने की एक उपयोगी निगाह तो दे ही देता है।
यह रवैया हकीकतनिगारी की उस शैली से अलग है जिसके तहत आत्मकथा की समीक्षा करते हुए उसके एक एक शब्द , प्रत्येक घटना और विवरण को सच या झूठ की कसौटी पर कसने में ही पूरी ताकत खर्च कर दी जाती है। यह रवैया आत्मकथा लिखने वाले के इस ÷ स्पष्टीकरण' को भी अहमियत नहीं देता कि÷ अपनी कहानी लिखते समय सबसे पहले मुझे अपनी कल्पना के पर कतर एक ओर सरका देने पड़े' ।३ ÷ प्रामाणिकता' के दावे की जांच परख में भी इसकी दिलचस्पी नहीं होती, भले ही आत्मकथा का ÷ मैं' यह कहता फिरे कि वह ÷ प्रामाणिक रूप से अपनी यात्राा कर रहा है' ।४
वैसे भी रचने की प्रक्रिया लाजमी तौर पर किसी स्पष्टता या प्रामाणिकता की हमजोली नहीं होती। तथ्य बिना कथ्य बने रचे ही नहीं जा सकते, और कथ्य बनते ही आत्मकथाएं उपन्यास हो जाती हैं। बस, फर्क इतना है कि रचनाकार उसे उपन्यास कहने के लिए स्वतंत्रा नहीं होता, क्योंकि वह कथ्य के साथ चलने वाले ÷ मैं के साथ नत्थी रहने के लिए मजबूर है। इसकी मैं की अ-प्रमाणिक ÷ प्रामाणिकता' और उसका अस्पष्ट ÷ स्पष्टीकरण' आत्मकथा को स्वतंत्रा विधा का दर्जा दिला देता है। यानी, आत्मकथा का मजा यह है कि वह उपन्यास कहे जाने के लिये स्वतंत्रा न होकर भी अंततः एक उपन्यास ही है जिसके पृष्ठों पर रचनाकार के पात्राों की नहीं बल्कि उसकी अपनी इयत्ता ( सेल्फ) का आविष्कार घटित होता है। कथानक बुनने की परिचित परम्पराओं और तकनीकों से बनती हुई यह रचना हेनरी मिलर के उस कथन को ही सार्थक नहीं करती कि ÷ सभी तरह का लेखन आत्मकथात्मक होता है' बल्कि आगे बढ़ कर कहती हैः
आत्मकथा का ताल्लुक सहज रूप से ÷ जीवन जो जिया गया' से न तो होता है, न ही हो सकता है।...जब ऐसी कोई चीज होती ही नहीं जिसे ÷ जीवन जो जिया गया' कहा जा सके तो उसका हवाला कैसे दिया जा सकता है। दरअसल आत्मकथा लिखने की क्रिया जीवन रचने की क्रिया है।५
सही भी है , कोई अपना जीवन एक साथ, एक पल और एक प्रवाह में तो जीता नहीं। न जाने कितने अलग अलग क्षणों में, भीड़ में रह कर भी निर्जन लगने वाले द्रीपों पर , कितनी लहरों में, न जाने कितने तिलिस्मों में और बारिश की बूंदों की तरह रुकते होते दोहराव में जीवन जिया जाता है। आत्मकथा अपनी जरूरत के मुताबिक इन प्रसंगों में से कुछ उठाती है, कुछ छोड़ती है, उसे एक सिलसिला देती है, एक तर्क देती है, और जो कहानी है उसे भी कहानी बनाती है।
जिस तरह हर आत्मकथा किसी भी जीवन की आंशिक कहानी कहने के लिए अभिशप्त है , उसी तरह आत्मकथा को ही पूरा जीवन मान कर उसके भीतर यथार्थ और अस्मिता के आदर्शीकृत पैटर्न देखने में जुट जाने वाली समीक्षा भी मुंह के बल गिरने के लिए अभिशप्त है। यह समीक्षा शब्दों और वाक्यों में एक जासूस की तरह घुसती है और हास्यास्पद तरीके से पता लगाना चाहती है कि कौन कौन सा काम निःस्वार्थ भाव से किया गया, कहां कहां त्याग किया, कहां छल किया, कितना कबूला, कितनी बोल्डनेस दिखायी, कहां चुप्पी साधी और स्वघोषित विचारधारात्मक जमीन पर आत्मकथा कितनी खरी उतरी। पिछले चार पांच साल में प्रकाशित हुई स्त्राी लेखकों की आत्मकथाओं के साथ समीक्षकों ने तकरीबन यही सलूक किया है। इसका ताजा उदाहरण देखना हो तो अप्रैल और मई, २००७ के ÷ हंस' के पृष्ठों पर देखा जा सकता है जहां पहले प्रभा खेतान की आत्मकथा ÷ अन्या से अनन्या' और फिर मन्नू भंडारी की अत्मकथा ÷ एक कहानी यह भी' को जम कर आटे की तरह गूंथा गया है। प्रभा खेतान नारीवाद के साथ अपनी बौद्धिक प्रतिबद्धता के लिए जानी जाती हैं, इसलिए समीक्षक के दिल से हाय निकलती है कि अरे नारीवादी होकर भी वे यह या वह काम नहीं कर पायीं, अमुक परिस्थिति का सामना नहीं कर पायीं!६ ÷ मानों जिन्दगी विचारधारा के सांचे से ढल कर निकलने के लिए मजबूर हो। दूसरी तरफ, मन्नू भंडारी नारीवाद की स्वघोषित विरोधी हैं, इसलिए समीक्षक को सुविधा मिल जाती है कि उन पर ÷ बड़बोलेपन' का लेबल चस्पा करके घोषित कर दिया जाए कि वे चारों खाने चित्त हो गयी हैं।७ मन्नू भंडारी का आत्मकथा प्रकरण तो इतना नाजुक हो गया है कि उनके परिजन भी कलम उठा कर मैदान में आ गये हैं।८ ऊपर से ये सभी फतवे हिन्दी जगत में चल रही उस चिरंतन बहस की छाया में दिये गये हैं जिसके तहत मान लिया गया है कि हिन्दी में स्त्राी लेखन तो खूब है, पर स्त्राीवादी लेखन कुछ कम ही है।९
आत्मकथाएं पहले भी लिखी जाती थीं , पर ये समीक्षक भूल जाते हैं कि स्वतंत्रा विधा के तौर पर आत्मकथा ने रचनात्मकता के दरवाजे पर अपनी दस्तक उस जमाने में दी जब रोलां बार्थ और मिशेल फूको जैसे उत्तर आधुनिक चिन्तकों ने ÷ लेखक की मृत्यु' का उद्घोष कर दिया। इसके जरिए ये विचारक यूरोपीय ज्ञानोदय द्वारा सार्वभौमिकता के क्षितिज पर काबिज उस कर्त्ता के नाकारा हो जाने की घोषणा कर रहे थे जिसने बीसवीं सदी के दो तिहाई बरसों पर सांस्कृतिक हुकूमत की थी। यह कर्त्ता इंसानी मुक्ति का दावा लेकर आया था। उसका रंग रुतबा इतना जबरदस्त था कि उसके मुक्तिकामी महावृत्तांतों के बोझ तले छोटी पहचानों की आवाज दब गयी थी। ऐसे कर्त्ता के वर्चस्व में आत्मकथा एक विधा के तौर पर अपनी स्वायत्तता प्राप्त नहीं कर सकती थी। ÷ लेखक की मृत्यु' जैसे युग प्रवर्तक ऐलान ने जैसे ही महावृत्तांतों की ÷ निर्भूलता' को मंच से धकियाया, वैसे ही वहां स्पेस बन गया जिसे भरने के लिए नयी सांस्कृतिक निर्मितियों का अवतरण होने लगा । खालीपन भरने के लिए न केवल अवॉगार्द और पहले से जमे हुए उपन्यासकारों ने अपने आत्मकथ्य पेश किये, बल्कि एकाधिक हाशियों पर अपनी बेचैनियों में खदबदा रहे तरह तरह के सामाजिक किरदार लिंग, नस्ल, जातीयता और जाति के आधार पर अपने वंचित होने की कथा कहने लगे। समाज जितना बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी और बहुधार्मिक था, उतने ही ज्यादा आत्मकथ्य सामने आये। बहुसांस्कृतिकता चूंकि अमेरिकी समाज का विधेयक तत्त्व था, इसलिए सबसे ज्यादा आत्मकथाएं वहीं लिखी गयीं। ये ÷ ऑटोबायोग्राफी ऑव बेंजामिन फ्रेंकलिन' की तरह नायकत्व की आभा से दमकते शासकवर्गीय ब्योरे नहीं थे। इनका मुख्य तत्त्व था हाशियाकरण का विरोध और उत्पीड़ित की निगाह से समकालीन संस्कृति की समीक्षा। ऐसी आत्मकथाओं का जमाना जब आया, तो उसने अमेरिकी इयत्ता में नये नये पहलुओं का समावेश किया। आत्मकथा लिखना इतना लोकप्रिय हुआ कि बीसवीं सदी के अमेरिका में ५५, ००० आत्मकथाएं लिखी गयीं। आत्मकथाओं का आगमन एक शिल्पगत बहस लेकर भी आया। पूछा गया कि अगर यह एक स्वतंत्रा विधा है तो इसमें अन्य विधाओं से अलग खास बात क्या है? क्या यह रचनाकार की आंतरिक इच्छा का उत्पाद है या बाहरी दबावों का? आत्मकथाओं की बढ़ती हुई संख्या ने लोगों को यह पूछने पर मजबूर कर दिया है कि एक विधा के रूप में स्थापित होने के बाद कहीं आत्मकथा लिखना अपने आप में एक सांस्कृतिक रिवाज तो नहीं बनता जा रहा है? १०
भारतीय जमीन पर , खासकर हिन्दी के खित्ते में ÷ लेखक की मृत्यु' की चर्चा कुछ देर से ही सही, पर ÷ न लिख पाने के संकट' या ÷ विचार के संकट' के रूप में हुई। सदी का जब अंत हुआ तो कुछ दृष्टिसम्पन्न पे्रक्षकों ने समझा कि ÷ अधिकांश हिन्दी लेखन या तो जीवनविहीन है या भयानक रक्ताल्पता का शिकार। अपनी इस कमजोरी को वह बौद्धिक घटाटोप से पूरा करता है' ।११ इस रक्ताल्पता में जो सुर्ख चमक थी, वह स्त्राी दलित और मुसलमान लेखन से निकली। मुसलमानों का लेखन अगर अतीत मोह से छूटने की छटपटाहट और पहचान की खोज था, तो स्त्राी और दलित लेखन की भावभूमि विशेष तौर से आत्मकथात्मक थी। यह विशुद्ध हाशियाकृत लोगों का लेखन था। इसकी पेचीदगियां केवल उन विचारधारात्मक औेजारों से नहीं समझी जा सकती थीं जो प्रचलित सिद्धांत शास्त्रा की देन थे। खास कर स्त्राी और दलित लेखन तो समझ के नये तौर तरीकों की भी मांग कर रहा था। वह विचारों के जरिए रचनाकार के व्यक्तित्व अंतरण से संतुष्ट होने के लिए तैयार नहीं था। अपने व्यक्तित्व, अपने अनुभव और अपनी स्थानिकता में रमे होने के कारण इस रचनाकार का मुकाम सार्वभौम नहीं हो सकता था। इसलिए, उसने अपने मुकाम पर खडे+ होकर कभी कहानी उपन्यास लिख कर संस्कृति समीक्षा की, कभी आत्मकथा लिख कर।
आत्मकथाओं की यह दुनिया हिन्दी में अभी नयी ही है। लेकिन , सिलसिला चल निकला है। दलित और स्त्राी लेखक दो दो और तीन तीन, खंडों में आत्मकथाएं लिख रहे हैं। भारत अमेरिका से कम बहुसांस्कृतिक नहीं है। समाज विज्ञान के एक सिद्धांत के अनुसार आध्ुनिक भारत की रचना ही अल्पसंख्यक अस्मिताओं से मिलजुल कर हुई हैं। यहां कोई बहुसंख्यक नहीं है।१२ यहां तो जो व्यक्ति किनारे पर खड़ा है, उसका हाशियाकरण अगर किसी मार्जिनलाइजेशन थियरी के बंधे बंधाये कायदे से समझने की कोशिश की जाएगी तो उसकी हकीकत का एक हिस्सा भी शायद ठीक से समझा न जा सके। वैसे तो हर आत्मकथा परिवार और समुदाय के आसपास बुनी जाती है। लेकिन, उसकी बुनावट तय करने में उन कारणों का बहुत हाथ होता है जो लिखने वाले के हाशियाकरण और उसकी किस्मों की पैदाइश होते हैं। मसलन, चाहे मराठी के हों या हिन्दी के, आम तौर पर दलित लेखकों या लेखिकाओं की आत्मकथाओं में परिवार का दायरा एक समस्याग्रस्त निर्मिति के रूप में उभरता है। सामंती, जातिगत और वर्णगत उत्पीड़न ने दलित परिवार पर ऐसे ऐसे कहर ढाये हैं कि वह व्यक्ति को किसी भी क्षण सुरक्षित जमीन देने में असमर्थ है। उसके भीतर निरंतर अशांति है, निरंतर विस्फोट है, पितृत्व और मातृत्व की संरचनाओं में प्रामाणिकता की समस्या है। जरूरी नहीं कि दलित परिवार का यह यथार्थ दलित रचनाकार को अपनी कहानियों और उपन्यासों में परिवार की संस्था को आड़े हाथों लेने की तरफ ले जाये। अक्सर दलित कहानीकार आत्मकथाओं में दिखाये गये अशांत परिवार के बरक्स अपनी कल्पनाशीलता का सहारा लेकर एक आदर्श परिवार गढ़ते नजर आते हैं। ऐसी बहुत सी दलित कहानियां मिल जाएंगी जिनमें स्त्राी पुरुष सम्बंध एकदम तनाव रहित हैं, यहां तक कि ऊंच नीच की लैंगिक संरचनाओं के मातहत भी नहीं हैं। ऐसा लगता है कि दलितों को एक आदर्श परिवार चाहिए, इसलिए वे अपने बीच से पैदा हुए धर्मवीर जैसे आदर्श परिवार के सिद्धांतकार से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी उन्हें सराहना भाव से देखते हैं।१३
आत्मकथाएं हों या कथाएं , स्त्राी रचनाकार परिवार की संस्था और स्त्राी पुरुष सम्बंधों से अलग तरह का सुलूक करती हैं। कारण यह कि उनका हाशियाकरण और उसकी किस्में अलग तरह की हैं। कभी यह सुलूक नारीवाद के साथ बौद्धिक प्रतिबद्धता के तहत अंजाम दिया जाता है, तो कभी उत्पीड़ित की सहज स्वाभाविक विद्रोही चेतना के आधार पर। कभी ये दोनों पहलू एक साथ काम करते नजर आते हैं। कभी ऐसा भी लगता है कि स्त्राी रचनाकार के मानस में आदर्श परिवार और स्त्राी पुरुष सम्बंधों की आदर्श स्थिति की कामना पूरी तरह नहीं मरी है। उसके चिन्तन में इन फैण्टेसियों की बार बार वापसी होती है। बार बार हकीकत की कठोर जमीन पर सिर पटक कर स्वेैरकल्पनाएं लहूलुहान होती हैं। फिर घोषित या अघोषित, प्रतिबद्ध या अप्रतिबद्ध बगावतों में लौट जाती हैं। यह एक पेचीदा स्थिति है। इस लिहाज से नारीवाद के प्रचलित खानों में रख कर न तो प्रभा खेतान की आत्मकथा पढ़ी जा सकती है, न ही नारी की नैसर्गिक आत्मचेतना और रचनाशीलता के नाम पर मन्नू भंडारी की कहानी। अभी तक दोनों आत्मकथाएं समीक्षकों द्वारा सुविधापूर्वक अलग अलग पढ़ी गयी हैं, जिसके नतीजे बेहद असंतोषजनक निकले हैं। मैेंने इस लेख में उनका साथ साथ पाठ करने की कोशिश की है। इस क्रिया में कुछ जोखिम हो सकता है, इसलिए यहां स्पष्टीकरण जरूरी है।
पहली बात तो यह है कि शुरू में मेरी कोशिश प्रभा खेतान और मन्नू भंडारी के साथ साथ मैत्रोयी पुष्पा और रमणिका गुप्ता की आत्मकथाओं का पाठ पेश करने की थी। लेकिन , चारों आत्मकथाएं पढ़ने के बाद मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ा कि मैत्रोयी पुष्पा की आत्मकथा का सद्यः प्रकाशित दूसरा खंड आने के बाद ही उसे विश्लेषित करना चाहिए। पहला खंड ÷ कस्तूरी कुंडल बसै' अपनी तमाम कलात्मक ताकत के बावजूद अंततः बेटी ( मैत्रोयी) के नजरिये ये कही गयी कस्तूरी ( मां) की कथा है। इसमें लेखिका के पास खुद ही यह प्रश्न उठाने की सुविधा है कि वे इसे उपन्यास कहें या आपबीती। उन्हें यह मान लेने में कोई दिक्कत नहीं है कि इसे रचने में ÷ उन्हें कल्पनाओं और अनुमानों से सूत्रा जोड़ने पडे+।१४ दूसरे खंड में उन्हें ऐसी कोई दुविधा नहीं होगी। वे प्रामाणिकता के दावे के साथ सामने आयेंगी, और उन्हें ऐसा कोई संदेह नहीं होगा कि वे उपन्यास लिख रही हैं या आत्मकथा। जहां तक रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ÷ हादसे' का सवाल है, यह एक महिला राजनीतिक कार्यकर्ता की कथा है, जिसे एक अन्य नजरिए से बेशकीमती माना जा सकता है।१५ इसका पाठ सार्वजनिक जीवन में लैंगिक प्रश्न की अभिव्यक्ति का संधान करने के लिए जरूरी है। इसे तेलंगाना के सशस्त्रा संग्राम और नक्सली आंदोलन में स्त्रिायों की भूमिका में पुरुषों के कंधे से कंधे मिला कर लड़ने वाली स्त्रिायों के वाचिक इतिहास के साथ पढ़ने की योजना बनायी जा सकती है जो अब तक प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुका है।१६ सुना है कि रमणिका जी ने भी अपने जीवन के अंतरंग प्रसंगों के इर्दगिर्द कुछ बुना है जिसके छपने की प्रतीक्षा एक करने योग्य काम है।
दूसरा स्पष्टीकरण शायद सबसे ज्यादा जरूरी है। मन्नू भंडारी और प्रभा खेतान का साथ साथ पाठ करने का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि दोनों के जीवन किसी भी तरीके से गुंथे हुए हैं , या उनमें कोई परस्पर कटान बिन्दु है। दोनों रचनाओं में एक दूसरे का जिक्र शायद संयोगवश ही एक एक दफा आया है। उनकी आत्मकथाओं से नहीं लगता कि अच्छे खासे आपसी परिचय के बावजूद दोनों लेखिकाओं ने किन्हीं उल्लेखनीय अर्थों में एक दूसरे को प्रभावित किया है। प्रभा खेतान बताती हैं कि वे मन्नू भंडारी की छात्राा रही हैं और एक प्रसंग में मन्नू भंडारी मानती हैं कि छात्रा जीवन में ही उत्साही और कर्मठ शख्सियत की झलक उनमें दिखने लगी थी। प्रभा खेतान की आत्मकथा में केवल एक प्रसंग ऐसा है जो दोनों को कहीं जोड़ता लगता है। मां जैसी शिक्षिका एक बार साहित्यकार पति की बेवफाई पर अपनी प्रिय छात्राा के सामने अपना मन खोलती है, और क्षोभ में आकर किशोर प्रभा राजेन्द्र यादव से जवाबतलबी की मुद्रा में बहस करते हुए नजर आती हैं।१७ ÷ अन्या से अनन्या' में यही एक जगह है जब छात्रा अपनी शिक्षिका के जीवनानुभव से कुछ संदेश ग्रहण करती है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्त्राी पुरुष सम्बंध, पति पत्नी द्वित्व और परिवार सम्बंधी अंतर्विरोधों की शुरुआती छाप युवा होते हुए किशोर मन पर जरूर पड़ी होगी। इस प्रकरण के अलावा भी दोनों आत्मकथाओं में बहुत कुछ संरचनागत साम्य है, पर उसका ताल्लुक किसी व्यक्तिगत प्रसंग से ही जोड़ा जा सकता। इन समानताओं का ताल्लुक शायद उस समय से है जिसके साथ साक्षात्कार करते करते दोनों का मानस बना होगा। इसके अलावा इन समानताओं का सम्बंध दो अलग अलग प्रेम त्रिाकोणों की सेक्शुअल राजनीति से भी है जिनमें आत्मकथाओं की नायिकाएं आजीवन गिरफ्तार रहीं। आलेख में चर्चा पहले ÷ अन्या से अनन्या' की है, बाद में ÷ एक कहानी यह भी' का नम्बर आया है। कहीं कोई इसे वरिष्ठता क्रम समझने की गलती न कर दे, इसलिए यह कहना जरूरी है कि ऐसा केवल विश्लेषणात्मक सुविधा के लिए किया गया है।
तीसरी बात यह है कि इस बौद्धिक कवायद के पीछे मेरा मकसद दोनों में किसी भी आत्मकथा की साहित्यिक समीक्षा का नहीं है। न ही मेरी दिलचस्पी किसी किस्म की साहित्यिक उखाड़ पछाड़ में है। मेरा आत्मकथा लेखकों के जीवन में बने निजी समीकरणों से भी कोई वास्ता नहीं है। मेरे पास इन स्त्रिायों के अंतरंग जीवन के बारे में जानने का न तो कोई स्रोत है , और न ही मैं किसी और स्रोत का इस्तेमाल करना चाहता हूं। जिस तरह दोनों आत्मकथाएं यथार्थ को कथानक में बदलने की तकनीक से निकली हैं, उसी तरह मेरा लेख भी सैद्धांतिक विश्लेषण और कथ्य के बीच छिपे हुए अर्थों को पढ़ने की समाज वैज्ञानिक तकनीकों का नतीजा है। मैं तो सिर्फ इन आत्मकथाओं के पृष्ठों पर जो कुछ लिखा है, उसी को आधार बना कर और कुछ अन्य लेखिकाओं की रचनाओं का सहारा लेते हुए भारतीय नारीवाद की हिन्दी कथा पेश करूंगा।
वैसे तो बौद्धिक दुनिया में नारीवाद की बहुत सी बारीक और पेचीदा व्याख्याएं मौजूद हैं , पर इस लेख में नारीवाद को सशक्तीकरण ( इम्पावरमेण्ट) के उस सिलसिले की तरह लिया गया है जिससे उम्मीद की जाती है कि वह अंततः मुक्ति ( इमेंसिपेशन) की मंजिल पर ले जाएगा। इसके अलावा नारीवाद को दो चरणों में देखा गया है। पहला, चरण वह है जब नारी का लक्ष्य पुरुष की बराबरी करना है और इस कोशिश में वह पुरुष जैसी बन कर दिखाती है। दूसरा चरण वह है जब वह पुरुष से अलग अपनी भिन्न शख्सियत बनाना चाहती है। इस दूसरे चरण को ÷ डिफरेंस फेमिनिज्म' कहते हैं। ÷ अन्या से अनन्या' और ÷ एक कहानी यह भी' को मैंने स्त्राी द्वारा स्वयं के सशक्तीकरण की सफल परियोजनाओं के रूप में पढ़ा है। इसीलिए मैं इन दोनों स्त्रिायों को हमारे समय की ऐसी नायिकाओं के रूप में देखता हूं जिन्होंने तरह तरह के हाशियाकरण से संघर्ष करते हुए अपना विशिष्ट संसार रच कर दिखाया। सशक्तीकरण के लिए की गयी आजीवन जद्दोजहद रेखांकित करने के बाद यह लेख उन प्रश्नों से दो चार होने की कोशिश करता है जो आधुनिक स्त्राी के अपनी देह से और पुरुष से सम्बंधों के चलते पैदा होते हैं। प्रेम और सेक्शुअलिटी के इन मुद्दों पर चर्चा किये बिना यह आख्यान पूरा नहीं हो सकता। आखिरकार हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जो समाज और व्यक्ति को अंतरंगता की भीतरी दुनिया में भी बदल रहा है।
इन आत्मकथाओं को पढ़ने से पहले भी मुझे लगता रहा है कि नारीवाद के प्रचलित मानकों के साथ हिन्दी की दुनिया कुछ अलग तरह से पेश आ रही है। हिन्दी का नारीवाद , जो अनिर्वायतः भारतीय नारीवाद का ही एक प्रमुख पहलू होने के अलावा कुछ नहीं हो सकता, वैसा नहीं है जो नारीवाद की रूढ़ छवियों में झलकता है। हमारे यहां सशक्तीकरण स्त्राी का विवाह, परिवार, प्रजनन और पुरुष पर निर्भरता से मुक्ति की तरफ जाने वाला सीधा मार्ग प्रशस्त नहीं करता। इसलिए, हिन्दी की नारीवादी इयत्ता ( फेमिनिस्ट सेल्फ) की बुनावट भिन्न है। हिन्दी का नारीवाद सैद्धांतिक डिस्कोर्स के जरिए कम उभरा है, बल्कि इसकी शक्ल सूरत साहित्यिक रचनाशीलता के गर्भ में ज्यादा बनी है। इसका ज्यादातर हिस्सा विचारधारात्मक नहीं है। वैसे भी, विचारधाराएं केवल घोषित प्रतिबद्धताओं के दम पर स्वयं को सार्वभौम साबित नहीं कर पातीं। वे मनुष्य की चेतना में तभी जगह बना पाती हैं जब उनका विरोध करने की कोशिश करने वाले मानस भी अंततः उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए दिखाई दें। इसीलिए, अगर कोई नारीवाद के प्रति बौद्धिक रूप से प्रतिबद्ध है, तो इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि उसकी रचनाओं या जीवन में इस विचारधारा की किताबी संरचनाएं मिलनी ही चाहिए। इसी तरह अगर कोई लेखिका नारीवाद से किसी तरह का ताल्लुक होने से इनकार करती है, तो केवल इस दावे को ही उसके संसार में नारीवाद की अनुपस्थिति का पर्याय नहीं माना जा सकता।
II
प्रभा खेतान : हाशियों का जीवन, सशक्तीकरण की सीमाएं और नारीवादी होने की दिक्कतें
नारीवाद एक मुश्किल विचारधारा है। दुनिया के किसी समाज में औरत के लिए नारीवादी बनना आसान नहीं है। अपने बौद्धिक पाठ की जटिलता के कारण नहीं , हजारों साल से बन रहे स्त्राी के निजी जीवन को बदलने के दुर्निवार आग्रह के कारण। इस लिहाज से अन्य विचारधाराएं खासी आसान हैं। उनका जोर सार्वजनिक जीवन बदलने पर ज्यादा रहता है। उनके तहत निजी जीवन में प्रतिगामी रह कर घर के बाहर प्रगतिशील आचरण करते रहने की सुविधा रहती है। पर, नारीवाद की कसौटियां ऐसी गुंजाइश नहीं छोड़तीं।
प्रभा खेतान की आत्मकथा बताती है कि भारतीय समाज में तो नारीवादी होना विशेष रूप से कठिन है। ÷ अन्या से अनन्या' पढ़ते हुए एक बार यह भी लग सकता है कि शायद भारत में नारीवादी होना असम्भव ही है। फिर भी यह नारीवाद की बौद्धिक शक्ति का सबूत है कि प्रभा खेतान जैसी बहुत सी स्त्रिायां भारतीय जमीन पर यही असम्भव बनाने में जुटी हुई हैं, भले ही उन्हें निजी तौर पर कितनी भी कीमत चुकानी पड़े। हिन्दी में स्त्राी लेखन के प्रबल हस्तक्षेप पर नजर दौड़ने से पता लगता है कि नारीवाद अपनाने को लेकर हिन्दी की स्त्राी किस तरह से शंकालु है :
कुछ लोग समझ रहें है अब / नारी मुक्ति के कुछ फायदे
देखिए किस तरह ढो रही हैं औरतें / पहले से आठगुना भार
पैदा कर रही हैं पाल रही हैं बच्चे अकेले
चला रही हैं देश और समाज / कमा रही हैं खा रही हैं अपना
... ... ...
वैसे भी कब चाहिए थीं औरतें प्रेम के लिए किसी को
जिनके साथ करना पड़ता था साझा तन से ज्यादा धन का
अच्छा है मुक्ति हो रही हैं मिल सकेंगी स्वच्छंद अब / सम्भोग के लिए
एक समय जैसे मुक्त हुए थे श्रमिक पूंजी के लिए
आज भी प्रेम के बहाने उन्हें ले जाया जा सकता है / अंधेरों में१८
इस कविता की आखिरी पंक्तियों और मन्नू भंडारी द्वारा नारीवाद के खिलाफ व्यक्त किये गये आक्रोश का फर्क समझना जरूरी है। उनकी तरह यह कविता नारीवाद को अविवाहित रह कर सेक्स फ्रीडम की मांग से नहीं जोड़ती। मन्नू जी ने पिछले दिनों ÷ संडे पोस्ट' को दिये गये एक लम्बे साक्षात्कार में नारीवाद को यौन स्वच्छंदता का पर्याय बताया है, और बिना किसी लाग लपेट के दावा किया है कि स्त्रिायों के विकास में नारीवाद का कोई योगदान नहीं है।१९ सविता सिंह की कविता तो यहां अधिक परिष्कृत ढंग से नारीवाद, प्रेम और सेक्शुअलिटी का त्रिाकोण सामने लाती है। उनकी पंक्तियां नारीवाद के व्याख्याताओं पर जिम्मेदारी डालती हैं कि वे भारतीय जमीन पर स्त्राी जीवन के संदर्भ में प्रेम के रूपों में हो रहे परिवर्तनों पर नये सिरे से गौर करें।
हिन्दी की एक अन्य प्रतिष्ठित कवि अपने एक साक्षात्कार में कह चुकी हैं कि स्त्राी तो पके हुए फल की तरह है जो उसे सहलाने वाले की गोद में गिर जाता है। ÷ अन्या से अनन्या' का केन्द्रीय प्रकरण वह है जब आत्मकथा की नायिका प्रौढ़, चरित्रागत रूप से संदिग्ध लेकिन सुदर्शन पुरुष प्रेमी से मुलाकात करती है। नायिका की आंखों की गहराई और खूबसूरती की तारीफ से पका हुआ फल पुरुष की गोद में गिर पड़ता है। लेकिन, गोद में गिरने की पृष्ठभूमि में हाशिये पर गुजारे गये उत्पीड़न का अंतहीन सा प्रतीत होने वाला सिलसिला है। मसला सिर्फ प्रेमी चुनने का ही नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्रा में किये गये फैसलों में इस पृष्ठभूमि की भूमिका देखी जा सकती है।
÷ अन्या से अनन्या' की एक बहुत बड़ी उपलब्धि प्रभा खेतान नामक व्यक्ति के हाशियाकरण की बेचैन करने वाली दास्तान है। इस हाशियाकरण को अलग अलग भी देखा जा सकता है, पर यहां से उसे उत्पीड़न की कई परतों के रूप में देखना उचित होगा। यह एक ऐसी स्त्राी का हाशियाकरण है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से किसी वंचित वर्ग में पैदा नहीं हुई है। वह समाज के सबसे ज्यादा सम्पन्न और शक्तिशाली कहे जाने वाले तबके की सदस्य है। जाति के लिहाज से उसकी गिनती द्विजों में होती है। फिर भी उसे एक नहीं, न जाने कितने हाशियों पर जीवन गुजारना पड़ता है। मसलन, बचपन में परिवार के हाशिये पर वह अपनी मां के कमरे के बाहर उस ममत्व भरे निमंत्राण का कभी न खत्म होने वाला इंतजार कर रही है जिसके बिना किसी बच्चे का मानस परिपूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। यह ममता न मिलने और भाई बहिनों द्वारा खेल खेल में दी गयी प्रताड़ना के पीछे सांवले और काले रंग को हीन या असुंदर मानने का वह भारतीय रंगभेद है जिसकी संरचनाओं की चर्चा करने में हम भारतीयों को हमेशा ही बौद्धिक संकोच रहा है। किसी भी शब्दकोश में देख लीजिए, ÷ श्वेता' शब्द का मतलब ÷ सुंदर स्त्राी' मिल जाएगा, लेकिन ÷ श्यामा' का अर्थ सुंदर स्त्राी नहीं होगा। यहां ईश्वर के अवतार और देवता तो सांवले या नीले हो सकते हैं, पर देवियां नहीं। देवी अगर गोरी नहीं है, तो काली की तरह भयंकर और संहारक है। वह किसी स्त्राी के लिए सौन्दर्य का मानक नहीं बन सकती। गोरे रंग से भारतीय मोह की इस परम्परा का ठीकरा अंग्रेजों के मत्थे नहीं फोड़ा जा सकता। अंग्रेजों का रंग भारतवासियों को कभी पसंद नहीं आया। उन्हें तो फिरंगी या बदरंगी की तरह देखा जाता था। भारतीयों का पसंदीदा रंग तो कुछ और ही शै है, जिसे ÷ अन्या से अनन्या' की नायिका सारे जीवन सुंदरता के मानक की तरह तलाशती रही। चाहे डॉक्टर साहब का गोरा चेहरा हो, या विदेशी स्त्रिायों के गोरे पैर हों। सौन्दर्य की यह भारतीय दृष्टि रंग और रूप का अलग अलग अस्तित्व नहीं मानती। इसी भारतीय रंगभेद के कारण आत्मकथा की नायिका ने पूरे बचपन और कैशोर्य में स्वयं को हाशिए पर पाया, और हाशियाग्रस्त लोग ( नौकर चाकर दाई) ही उसके लिए स्नेह के स्रोत बन पाये। पहली बार किसी ने अगर सांवले रंग के कारण अ-प्रकट सौन्दर्य की प्रशंसा की तो वे डॉक्टर श्रॉफ ही थे। प्रत्युत्तर में वह आजीवन उनकी ÷ अन्या' या ÷ चीज' बनने के लिए तैयार हो गयी। खुद की बागडोर तक उनके हाथों में सौंप दी। बार बार होने वाला भीषण अपमान भी सौन्दर्य सराहना के उस प्रारम्भिक सम्मोहन को तोड़ नहीं सका। स्त्राी की सौन्दर्य गं्रथि किस तरह उसे लगातार एक खास तरह के हाशिये पर बनाये रखती है, प्रभा खेतान के जीवन प्रसंग इसके गवाह हैं। क्या इसी पहलू से जोड़ कर उनके जीवन का वह निर्णय नहीं देखा जा सकता जब वे आत्मकथा के पृष्ठों पर एक अति आधुनिक ब्यूटी पार्लर खोल कर भारत में सौन्दर्य उद्योग के शुरुआती वाहकों में से एक की भूमिका निभाती पायी जाती हैं।
दूसरा हाशियाकरण वैसा था जैसा अल्पसंख्यक अक्सर झेलते हैं। हिन्दू समाज में पैदा होने के बावजूद प्रभा खेतान को यह हाशिया बंगाली समाज में मारवाड़ियों की अल्पसंख्यक उपस्थित के कारण मिला। सार्वजनिक जीवन में , खास कर कॉलेज में उन्हें बंगाली दोस्तों द्वारा अपने शोषक और लुटेरू होने की अनुभूति करायी गयी जिससे वे भौचक्की रह गयीं। ÷ अन्या से अनन्या' में शुरू से आखिर तक अल्पसंख्यक होने का यह एहसास मौजूद है। अल्पसंख्यक मनोवृत्ति की विशेषता होती है कि वह अपने आप को वक्त के साथ बदलती तो है, पर बहुसंख्यकों द्वारा निर्धारित कसौटी के मुताबिक नहीं। प्रभा खेतान ने बताया भी है कि शाकाहारी मारवाड़ी अपने सार्वदेशिकीकरण की प्रक्रिया में एग रोल या मटन कटलेट खाने के लिए तो तैयार हो सकते हैं, पर मच्छी फ्राई किसी कीमत पर नहीं खायेंगे। वे मांसाहारी भी बंगाली शैली में नहीं होंगे। यह अल्पसंख्यकीकरण बंगाल के मारवाड़ियों को अपने समुदाय की सीमाओं में उत्तरोत्तर कैद रखने की तरफ भी ले गया होगा। प्रभा खेतान के जीवन के जो हिस्से उनकी आत्मकथा के जरिए सामने आये हैं, उनमें सार्वदेशिकता के कई सुराग मिलते हैं, पर वे अपनी निजी दुनिया का कोई अंश मारवाड़ी घेटो के बाहर प्राप्त करने की कोशिश करते हुए नहीं दिखतीं। इसके और भी कारण रहे होंगे, क्योंकि भारतीय समाज में समुदायगत वफादारियां कई देखे अनदेखे स्तरों पर काम करती हैं। पर, कलकत्ता के मारवाड़ियों के खास मामले में अल्पसंख्यकीकरण और परिणामस्वरूप घेटोकरण की भूमिका की शिनाख्त जरूरी है।
इसके बाद नम्बर आता है लैंगिक ऊंच नीच के उन हाशियों का जो स्त्राी होने के नाते प्रभा खेतान के हिस्से में आते हैं। इनमें सबसे ज्यादा त्राासकारी है इंसेस्ट यानी कौटुम्बिक व्यभिचार। रिश्तेदारों या रक्त सम्बंधियों के हाथों बचपन में इस कुकृत्य का शिकार होने के बाद स्त्राी जीवन में एक गोपनीय सेक्शुअल अंधेरा छा जाता है जिसका डरावना तिलिस्म वह शायद ही कभी तोड़ पाती हो। खुशकिस्मत स्त्रिायां किसी संवेदनशील पति या रोमानी प्रेम के किसी प्रसंग के जरिए अपनी देह और मानस पर हुए इस अत्याचार को पृष्ठभूमि में धकेलने में अस्थायी रूप से कामयाब जरूर हो जाती हैं , पर ÷ अन्या से अनन्या' बताती है कि यह डरावनी याद सदैव के लिए कभी तिरोहित नहीं होती।
प्रभा खेतान के हाशिए आम स्त्राी के हाशियों से कुछ अलग तरह के हैं , क्योंकि वे अपने सशक्तीकरण की सचेत कोशिश में लगी हुई दिखती हैं। सशक्त होना यूं तो आधुनिक क्रिया है और पैसा कमा कर सशक्त होने की प्रक्रिया का एक आधुनिक पाठ भी होता है, पर प्रभा खेतान के जीवन में यह सिलसिला मारवाड़ियों के जातीय मंत्रा के रूप में आता है। परिवार और समुदाय का माहौल तो है ही ऐसा, और मां भी बचपन से बेटी को इसी मंत्रा में दीक्षित करती है। बाद में पैसा कमा लेने के बाद वे समाज के साथ कई तरह के समतामूलक सम्बंध विकसित करने की कोशिश में वह रिश्ता बना बैठती हैं जिसे क्रिस्टोफर कॉडवेल ने ÷ कैश रिलेशन' कहा था। वे खुद को जानबूझ कर ठगवाती हैं, खुले हाथ से पैसा देती हैं। इससे उन्हें कुछ कुछ उछाल जैसा एहसास होता है।
स्त्राी होने के नाते धनी बनने के इस परम्परागत मंत्रा का इस्तेमाल वे तब तक नहीं कर सकती थीं , जब तक नारीवाद के कुछ आयामों का अपनी जिन्दगी में समावेश न करें। परम्परा उन्हें अपने पति के नाम पर ही धन का स्वामी बना सकती थी। यहां अविवाहित और अकेले रहने की नारीवादी शर्त उनके काम आयी। आत्मनिर्भर होने की जिद और अहर्निश अध्यवसाय से उन्हें पत्नी के रूप में किसी सेठ के मातहत जिन्दगी गुजारने के बजाय एक स्वतंत्राचेता व्यवसायी और अंत में व्यवसाइयों का नेता बनने का मौका दिया। यह अलग बात है कि यह सब कुछ अल्पसंख्यकीकरण के तहत समुदाय के भीतर ही घटित हो रहा था इसलिए दायरे से बाहर की सार्वदेशिकता का फायदा उन्हें नहीं मिला। मारवाड़ी मंत्रा के जरिए होने वाला सशक्तीकरण प्रभा खेतान के जीवन में सर्वप्रमुख है। लेखन और रचनात्मकता के जरिए शनैः शनैः स्वाभाविक रूप से होने वाला सशक्तीकरण उनकी आत्मकथा में एक सचेत निर्मिति के रूप में अनुपस्थित ही है। हकीकत जो भी हो, पर आत्मकथा में उन्होंने सशक्तीकरण का श्रेय अपनी व्यवसाय बुद्धि और धनोपार्जन की क्षमता को ही दिया है। ध्यान रहे कि यहां प्रश्न ÷ यह या वह' वाला नहीं है। यह तो आत्मछवि का प्रश्न है। धनोपार्जन की क्षमता और पुरुषों का भी नेतृत्व कर सकने लायक गुणों के दम पर वे अपने जीवन के अकेलेपन को रचनामय एकांत में बदल पायीं। उन्होंने पैसे कमाने के साथ साथ एक रचनाकार होने का यश और कलात्मक संयम भी कमाया है। यही कारण है कि व्यक्तिगत सम्बंधों के जिस त्रिाकोण में वे फंसी रहीं, उसमें केवल वे ही आत्मकथा लिख पायीं, वरना ÷ अन्या से अनन्या' में प्रभा खेतान की कलम से किया गया श्रीमती श्रॉफ की व्यवहार शैली और मानस का बेहतरीन आकलन एकबारगी यह इच्छा तो पैदा कर ही देता है कि काश पति की निगाह में ÷ फूहड़ और गंवार' यह औरत भी अपनी आत्मकथा लिख पाती।
बकौल सविता सिंह प्रभा खेतान ने आठ गुना भार भी ढोया , बच्चे पैदा न करने के बावजूद दूसरे के पैदा किये गये बच्चों का करियर बनाया, व्यवसाय जगत के नेता के रूप में देश और समाज भी चलाया, और प्रेम में भरमा कर उस अंधेरे में भी ले जाई गयीं जहां उन्हें एक ÷ झूठे चांद' को सच्चा मानना पड़ा। परत दर परत हाशिये की शिकार एक स्त्राी की निजता नारीवादी होने के कोशिश में अपने जीवन का सार इस तरह पेश करती है :
... मेरी यह आवाज एक भिन्न आवाज है, और इस आवाज का खतरा यही था कि यह आवाज अनसुनी रह जाती, क्योंकि न मैं पूरी तरह उदारवादी थी और न ही मार्क्सवादी, न परम्परा से चिपकी रही और न ही आधुनिकता को भली भांति ओढ़ पायी। बस दिक् काल के निश्चित दायरे में अपने स्वभावगत तमाम विरोधाभासों को लिए जीती रही। मेरे लिए एक ओर मुक्ति की नयी नयी उड़ानें थीं, तो दूसरी ओर पुनः लौट कर उसी दायरे में बंधे रहने की विवशता भी थी।२०
तो क्या हम मान लें कि उनका नारीवाद जीवन के अंतर्विरोधों और विरोधाभासों में गर्क हो गया , या फिर महज पुस्तकीय किस्म की बौद्धिक प्रतिबद्धता रह गया? क्या यह आत्मस्वीकृति उनकी आत्मकथा पूर्व छवि में अंतिम संशोधन की तरह ग्रहण की जानी चाहिए? क्या इन शब्दों को लिखने के बाद वे पति परिवार की परम्परा को ठेंगा दिखाने वाली विद्रोहिणी, स्वयंवरा और स्वतंत्राचेता नहीं रहीं?
मेरा विचार है कि उनकी आत्मकथा का यह बीज वक्तव्य आधुनिकीकरण के जरिए मुक्त होने के संघर्ष में डूबी हुई भारतीय स्त्राी की निर्माणाधीन आजादी के घोषणापत्रा की तरह पढ़ा जा सकता है। इस इयत्ता को अगर कोई नारीवादी होने की सनद न देना चाहे तो यह उसका किताबीपन ही होगा। बाकायदा नारीवादी न हो पाना प्रभा खेतान के लिए आत्मालोचना की वजह जरूर बन सकता है , पर निजी धरातल पर सशक्तीकरण हो जाने के बावजूद मनचाही मुक्ति न मिलने के पीछे भारतीय और पश्चिमी इयत्ता के अंतर की समस्या मौजूद है। जैसा कि हम जानते हैं कि भारतीय आधुनिकता की अपनी अलग किस्म है। यहां व्यक्ति की चेतना विशुद्ध वैयक्तीयन ( इनडिविडुएशन) के माध्यम से संसाधित नहीं होती। सामुदायिक जीवन के साथ गर्भ नाल के रिश्ते पूरी तरह कभी खत्म नहीं होते। शायद इसीलिए प्रभा खेतान की दुनिया में हम राजनीतिक रूप से सचेत स्त्राी बनते हुए देखते हैं, भारतीय किस्म के रंगभेद और इंसेस्ट के बावजूद सेक्शुअल और रोमानी चेतना से लैस स्त्राी का उदय होते देखते हैं, अपने अधिकारों की दावेदारी करती हुई स्त्राी भी वहां है, लेकिन वैयक्तीयन के आदर्श रूप उपस्थित नहीं हैं। ऐसी बात नहीं कि प्रभा खेतान के पास सशक्तीकरण के इस आयाम की प्राप्ति का मौका न रहा हो। अगर वे एक रचनाकार के तौर पर अपने सशक्तीकरण की स्वाभाविक प्रक्रिया को धनोपार्जन के साथ साथ सचेत अहमियत देतीं, तो उनका वैयक्तीयन अलग तरह का होता। सशक्तीकरण का यह रूप हमें मन्नू भंडारी की दुनिया में मिलता है।
III
मन्नू भंडारीः अकेलेपन का द्वीप , सशक्तीकरण के अन्य पहलू और अघोषित नारीवाद का दस्तावेज
अगर हम चाहें तो प्रभा खेतान के जीवन की तरह सविता सिंह की कविता के आईने में ही मन्नू भंडारी के जीवन का अक्स एक हद तक तो देख ही सकते हैं। मन्नू भंडारी को भी आठ गुना काम करना पड़ा , संतान भी अकेले ही पालनी पड़ी, अपना खाया और यहां तक कि पति को न केवल अपना कमाया खिलाना पड़ा, बल्कि अपने एक उपन्यास की थीम भी उसके खाते में लिख देनी पड़ी। बहरहाल, समानताएं यहां के बाद खत्म हो जाती हैं, और इसकी दो वजहें हैं। पहली मन्नू भंडारी का विकट अकेलापन जो परिवार बसाने से कम होने के बजाय और उभर आया, और दूसरी है सशक्तीकरण के भिन्न रास्ते का चुनाव, हालांकि उनक पास प्रभा खेतान जैसा धनोपार्जन का विकल्प नहीं था। प्रभा खेतान और मन्नू भंडारी का यह फर्क हमारे सामने एक दूसरी कविता की दरकार पेश करता हैः
सोने से पहले / जांच कर बंद करती हैं / खिड़की दरवाजे
अकेली औरतें फिर / दोबारा जांचती हैं
अकेली औरतों के घर / बहुत साफ होते हैं
वे मकड़ियों को जाले नहीं बुनने देतीं
किसी किसी दिन / भर उठते हैं पकी मक्का जैसी धूप से
अकेली औरतों के उदास घर / वे गुनगुनाती हैं / वे अधबिसरी धुनें
जो लोग नहीं जानते / कि उन्हें याद हैं / अब भी
अकेली औरतें पकाती हैं / ऐसे व्यंजन
जिनकी पाकविधियां सिर्फ वही जानती हैं
वे अपनी इच्छा से पढ़ती हैं अखबार
खबरों के बीच टीवी बंद कर लेती हैं
अकेली औरतों के घर द्वीप होते हैं! २१
यह किसी एकांतप्रिय स्त्राी का घर वैसा नहीं है जिसके बारे में राजेद्र यादव ने लिखा थाः ÷ बेहद करीने से रखा हुआ घर, चलने फिरने से लेकर चाय पानी देने में वही परफैक्शनिस्ट सलीका, लेकिन अंदाज ऐसा लापरवाह और ÷ कैजुअल' जैसे यह सब तो यूं ही है।'' २२ कृष्णा सोबती के घर की यह झलक एक ग्रहण किये गये संस्कार की तरह उभरती है, पर मधु बी. जोशी की यह कविता हमें दक्षिण दिल्ली में बने मन्नू भंडारी के घर और फिर उनके उस मानस में ले जाती है जो अकेलेपन का द्वीप है। यह अकेलापन उन्होंने स्वेच्छा से ग्रहण नहीं किया है। वे तो इससे निजात पाना चाहती थीं पर उनकी जिन्दगी में इसका प्रसार बढ़ता ही गया। कृष्णा सोबती का घर उन्हें अकेलेपन के बजाय एकांत देता है, जिसमें वे मनचाहा लिख पढ़ सकती हैं। पर मन्नू भंडारी को बार बार लेखन के लिए अकेलापन छोड़ कर एकांत में जाना पड़ता है। यहां तक कि वह लेखन के लिए होस्टल का कमरा बुक कराती हैं, और अपनी बेटी को छोड़ कर उस खरीदे हुए एकांत में ÷ आपका बंटी' लिखती हैं। प्रभा खेतान भी अकेलेपन की शिकार रहीं, पर हम देख चुके हैं कि वे अपनी अन्य क्षमताओं के बल पर उसे एकांत में बदल पायीं। पर मन्नू भंडारी नहीं। ऐसे ही रचनामय एकांत के लिए उन्होंने राजेन्द्र यादव को अपना पति चुना था। बदले में उन्हें अकेलापन मिला।
प्रभा खेतान की तरह मन्नू भंडारी नाम की स्त्राी भी सौन्दर्य ग्रंथि की शिकार है। उसे भी भारतीय किस्म के रंगभेद ने बचपन से ही सताया है। नारी सुंदरता को लेकर भारतीय सौन्दर्य दृष्टि की यह समस्या कितनी गहरी है और मन्नू भंडारी द्वारा जीवन साथी के चुनाव के पीछे इस मनोगं्रथि की भूमिका क्या रही होगी , इसका केवल अंदाजा लगाया जा सकता हैः
मैं काली हूं , बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिता जी की कमजोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी, खूब गोरी, स्वस्थ और हंसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और फिर उसकी प्रशंसा ने ही क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीनभाव की गं्रथि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पायी? आज भी परिचय करवाते समय जब कोई तरह तरह के विशेषण लगा कर मेरी लेखकीय उपलब्धिों का जिक्र करने लगता है तो मैं संकोच से सिमट ही नहीं जाती बल्कि गड़ने गड़ने को हो आती हूं। शायद अचेतन की किसी परत के नीचे दबी इसी हीनभावना के चलते ही मैं अपनी किसी भी उपलब्धि पर भरोसा नहीं कर पाती ... सब कुछ मुझे तुक्का ही लगता है२३
÷ एक कहानी यह भी' के पूरे पाठ में जहां मौका मिलता है, मन्नू भंडारी वहीं नारीवादियों को चिकोटी काटने से नहीं चूकतीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि इन पृष्ठों पर सशक्तीकरण की खोज के ब्योरे नहीं हैं। दरअसल, उनका पूरा आत्माख्यान लेखन और रचनाकर्म के जरिए अपने सशक्तीकरण की कोशिश ही है। उनके पास एक नैसर्गिक किस्म की सार्वदेशिकता है जिसके लिए न विदेश यात्रााओं की आवश्यकता होती है, न ही समता मूलक और अति आधुनिक मुहावरे में सोचने की। बचपन में घर के भीतर पाये गये माहौल(राजनीतिक बहसों, समाज सुधार और पिता की बौद्धिकता) ने सम्भवतः उनके व्यक्तित्व में यह खूबी पैदा की होगी। कारण और भी रहे होंगे, पर कुल मिला कर उनकी आत्मकथा साफ तौर से बताती है कि वे जिस समाज में पैदा हुइर्ं उसकी सामुदायिक विरासत पकड़ने या छोड़ने की दुविधा से उन्हें नहीं गुजरना पड़ा। अपने निजी जीवन के फैसलों को लेकर अपने समुदाय के बाहर जाना उनके लिए इतना सहज रहा होगा कि वे इस सार्वदेशिकता को विशेष तौर से चिह्नित नहीं करतीं। अपने पिता की वे चाहे कितनी आलोचना करें, पर इतना तय है कि अगर कोई पिता भारत जैसे समाज में अपनी संतान को समुदाय की कैद से मुक्ति का उपहार दे सकता है, तो वह तमाम पुरुषगत और मानवगत खमियों के बावजूद सौ में से साठ नम्बर पाने का हकदार तो हो ही जाता है।२४ यानी, नारीवाद की घोषित विरोधी मन्नू भंडारी के रास्ते से बचपन में ही सामुदायिक वफादारी या घेटोकरण का वह शिकंजा हट गया था, जिसका फंसाव प्रभा खेतान को सारे जीवन एक निश्चित संदर्भ में गतिहीन किये रहा। अब मन्नू अघोषित नारीवादी होने के लिए एक हद तक आजाद थीं। सशक्तीकरण प्राप्त करने की उन्होंने जो विधि अपनायी उससे भी लगता है कि विचारधारा के साथ बौद्धिक प्रतिबद्धता न होते हुए भी उन्होंने अंततः वही सब कुछ किया जो अपनी सीमाओं में एक अचेत नारीवादी कर सकती थी।
प्रभा खेतान के मामले में हम देख चुके हैं कि भारतीय समाज में नारीवादी होना कितना कठिन है। मन्नू भंडारी की जिन्दगी में सशक्तीकरण का क्षण वह केन्द्रीय निर्णय था जब उन्होंने बिरादरी से बाहर एक साहित्यकार से विवाह करने का फैसला किया। यह कोई रोमानी प्रेम की स्टेंडर्ड घटना नहीं थी। आत्मकथा पढ़ने पर यह एक सुचिन्तित आकलन का परिणाम लगता है। एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में इस फैसले के पीछे प्रेम भी रहा होगा।२५ पर मन्नू भंडारी का आत्मकथ्य प्रेम व्यापार के क्षणों को दस पंद्रह पंक्तियों में ही निबटा देता है। दरअसल , प्रेम से कहीं अधिक इस निर्णय के पीछे एक संकल्प था, जो तमाम चेतावनियों के बावजूद मजबूत होता चला जा रहा थाः
घंटे डेढ़ घंटे तक राकेश जी जाने क्या क्या समझाते रहे , पर उनकी हर बात का तोड़ एक ही जगह होताः ÷ मन्नू तुमको लेखक से शादी करने की बात दिमाग से निकाल देनी चाहिए।... निहायत अनिश्चित, अस्थिर जिन्दगी के साथ बंध कर तुम कभी सुखी नहीं रह सकोगी।' पर मुझे तो इस तरह की सारी बातें अपने लिए चुनौती लगतीं जो मेरे संकल्प पर एक परत और चढ़ा देतीं। राकेश जी से मैंने यही कहा कि रोमांटिक दुनिया में रहने वाली सोलह साल की उम्र मैं बहुत पीछे छोड़ चुकी हूं। ठेठ यथार्थ की भूमि पर खड़े होकर ही मैेंने यह निर्णय लिया है क्योंकि अब मुझे जिन्दगी से जो चाहिए, वह एक लेखक के साथ ही मिल सकता है।२६
जाहिर है कि यहां प्रेम की स्थिति महज कारक की है जिसे कोई काम वाजिब ठहराने के लिए जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल कर लिया जाता है। वे तो लेखक होने , साहित्यकार की तरह विकसित होने, और अंततः अपने जीवन की कमियां लेखन के जरिए पूरी करने का मौका चाहती थीं। लेखनजीवी पति के रूप में एक यशस्वी और बौद्धिकता सम्पन्न साहित्यकार का चयन सशक्तीकरण की इस योजना के केन्द्रीय माध्यम की तरह उभरता है। कहीं कोई यह न मान ले कि मैं मन्नू जी के इस निर्णय को एक अंतरंग साजिश की तरह चित्रिात कर रहा हूं , इसलिए यह कहना जरूरी है कि जिन्दगी के फैसले साजिशों की तरह केवल फिल्मों में ही दिखाये जाते हैं। हकीकत में तो वे कुछ संयोगों का प्रतिफल ही होते हैं। सम्बंध किसी तरह आगे चला, उस सम्बंध से किस तरह की अपेक्षा थी, और जब सम्बंध टूटा तो मुख्य शिकायत क्या रही, इसी आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि सम्बंध बनाते समय मन की चालक शक्ति क्या रही होगी।
साहित्यकार पति के जरिए लेखन का भरपूर स्पेस प्राप्त करने में मन्नू जी को भले ही आंशिक कामयाबी मिली हो , पर सशक्तीकरण का यह रास्ता कुल मिला कर नाकाम नहीं रहा। लोग चाहें तो ÷ एक कहानी यह भी' को एक विफल दाम्पत्य की कथा कह सकते हैं और कह भीे रहे हैं, पर मेरे लिए दाम्पत्य की यह विफलता उस तरह से मानीखेज नहीं है जिस तरह से दाम्पत्य से इतर क्षेत्राों में लेखक होने के माध्यम से मन्नू भंडारी के सशक्तीकरण की सफलता। लेखन के भरोसे रहने के कारण ही वे अपने भीतर से निकल पायीं। उनका लेखन केवल आत्मकथात्मक नहीं रहा। वे बुद्धिजीवी औरतों के चिन्तन के तयशुदा दायरे लांघ कर ऐसी विषयवस्तुओं के साथ संवाद कर पायीं जो अक्सर पुरुष के ही लायक मानी जाती हैं। उन्होंने ÷ महाभोज' जैसा राजनीतिक उपन्यास लिखा और कीर्ति के शिखर पर विराजमान हुईं। वे विभिन्न विधाओं में गयीं। नाटक लिखे, पटकथाएं लिखीं, टी.वी. सीरियल लिखे और क्लासिक कहानियों का पुनर्लेखन करने का अनूठा काम किया। एक रचनाकार को और क्या चाहिए! इसके अलावा भी पति से सम्बंध विच्छेद की दुर्घटना छोड़ कर अगर मन्नू भंडारी के जीवन पर निगाह डालें तो उनकी आत्मकथा कहती है कि शायद एक लेखक के रूप में उनकी निरंतर उन्नत हो रही संवेदनशीलताओं के कारण उन्हें सारे भारत में फैला हुआ स्नेही जनों का एक ऐसा संसार मिला, जो कम लोगों को ही मिल पाता है। लेखन के जरिए वे आज एक ऐसी स्त्राी के रूप में उभर कर सामने आयी हैं जिसे अपनी उम्मीदों पर खरे न उतर पाने वाले पुरुष से मुक्ति पाने के लिए उसकी मृत्यु का इंतजार करना मंजूर नहीं हुआ। उनकी ये बातें अघोषित नारीवाद के दस्तावेज की तरह हैं:
एक दिन देखा कि बिना मौसम और प्रत्यक्ष कारण के एक गमले की ढेर सारी पत्तियां झड़ गयीं और दो तीन दिन में ही वह पौधा चंद पत्तियों के साथ टहनियों का एक झुंड भर रह गया - मात्रा ठूंठ, कुछ कुछ मेरी ही तरह । माली ने देखा तो बड़ी बेरहमी से ही बची खुची पत्तियों को भी नोचा फेंका। मेरे मुंह से निकले ,÷ अरे अरे' को सुन कर बड़ी सहजता से उसने अपनी भाषा में कहा, ÷ इ पत्तियों को तो अब झड़ना ही होगा, इनसे मोह रख कर अब काम नहीं चलेगा, क्योंकि ये जान नहीं देने वालीं इस पौधे को...अब तो जड़ को देखना होगा।' और, उसने गमले की मिट्टी उलट दी। गमले की निचली गहराई से निकला जड़ों का गुच्छा ... मिट्टी में लिथड़े, एक दूसरे से उलझे अनेक रेशे। जो सड़े गले रेशे थे और जिन्होंने पौधे की जीवन शक्ति को कुंद कर दिया था, उन्हें बड़ी निर्ममता से उसने तोड़ फेंका। जो स्वस्थ थे, उन्हें साफ करके सहेजा संवारा। इन्हीं से अब नया पौधा रस ग्रहण करेगा, फल देगा फलेगा - वह पूरी तरह आश्वस्त था। तो क्या अपने को पुनर्जीवित करने के लिए मैं भी अपनी जड़ों की ओर लौटूं। ... कौन जाने इन ठूंठ जैसी टहनियों में भी कुछ अंकुरित होने की प्रक्रिया शुरू हो जाए।२७
÷ एक कहानी यह भी' का यह बीज वक्तव्य है। साफ तौर पर यह आत्मकथा के जरिए अपने आप से नया परिचय करने और अपने पुनः आविष्कार की भी भाषा है। यह भाषा सिर्फ एक ही ओर ले जा सकती है, उसी ओर जहां भारतीय नारी के जीवट की प्रतीक कात्यायनी रचित ये पंक्तियां ले जाती हैं:
सात भाइयों के बीच चम्पा सयानी हुई।
बांस की टहनी सी लचक वाली ,
बाप की छाती पर सांप सी लोटती/सपनों में काली छाया सी डोलती
सात भाइयों के बीच चम्पा सयानी हुई।
ओखल में धान के साथ कूट दी गयी
भूसी के साथ कूड़े पर फेंक दी गयी।
वहां अमरबेल बन कर उगी।
झरबेरी के साथ कंटीले झाड़ों के बीच
चम्पा अमरबेल बन कर सयानी हुई।
फिर से घर आ धमकी।
सात भाइयों के बीच सयानी चम्पा/एक दिन घर की छत से लटकती पायी गयी।
तालाब में जलकुम्भी के जालों के बीच दबा दी गयी।
वहां एक नीलकमल उग आया।
जलकुम्भी के जालों से उठ कर चम्पा फिर घर आ गयी/देवता पर चढ़ाई गयी।
मुरझाने पर मसल कर फेक दी गयी/जलाई गयी।
उसकी राख बिखेर दी गयी पूरे गांव में।
रात को बारिश हुई झमड़ कर।
अगले ही दिन हर दरवाजे के बाहर
नागफनी के बीहड़ घेरों के बीच
निर्भय निस्संग चम्पा मुस्कुराती पायी गयी। २८
IV
पे्रम त्रिाकोण की सेक्शुअल राजनीति
मन्नू भंडारी उम्र में प्रभा खेतान से वरिष्ठ हैं। लेकिन , नौ दस साल का यह फर्क उस युग के लिहाज से कुछ नहीं है जिसमें दोनों ने अपनी जिन्दगियां गुजारीं। दोनों ही आत्मकथाओं में जिस राजनीतिक सामाजिक समय का वर्णन हुआ है, वह एक सा है। बीसवीं सदी में साठ का वह उत्पाती दशक जिसे सेलिग हैरिसन ने ÷ दि डेंजरस डिकेड' की संज्ञा देकर भारतीय लोकतंत्रा के अवसान की भविष्यवाणी कर दी थी, एक अहम प्रसंग के तौर पर दोनों कृतियों में उभरता है। लोकतंत्रा तो नष्ट नहीं हुआ, लेकिन पहले चीन के हमले ने, फिर कांग्रेस ÷ प्रणाली' के वर्चस्व भंग ने और फिर नक्सलवाद ने उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से निकली आश्वस्ति को भंग कर दिया। राष्ट्रनिर्माण के एकात्मक मॉडल पर प्रश्नचिह्न लग गया। लोकतंत्रा की यह अस्थिरता जयप्रकाश आंदोलन, आपातकाल, आरक्षण, हिन्दुत्व और फिर गठजोड़ राजनीति की उखाड़ पछाड़ तक किसी न किसी रूप में आज तक जारी है। यह हमारी राजनीति का ऐसा बनता बिड़ता रूप है जो किसी को भी संकटग्रस्त लग सकता है। प्रभा खेतान और मन्नू भंडारी के राजनीतिक मानस का द्वेैध इसी घटनाक्रम की देन है। दोनों की साहित्यिक कृतियों में राजनीति सम्बंधी प्रसंग उल्लेखनीय मात्राा में मिलते हैं, और मन्नू भंडारी को तो एक मशहूर राजनीतिक उपन्यास लिखने का श्रेय भी जाता है। पर, आत्मकथाओं में राजनीति का जो विवरण है, उससे पता चलता है कि हमारे युग की दोनों नायिकाएं सार्वजनिक जीवन को आदर्शीकृत और किताबी आंख से ही देखती हैं। जैसे ही व्यावहारिक पार्टी पॉलिटिक्स और हितों की टकराहट के कारण यह आदर्शीकृत छवि टूटती है, उन्हें राजनीति के प्रति संशय होने लगता है। वे सामान्य जीवन की नैतिकता और राजनीतिक नैतिकता को अलग अलग नहीं देख पातीं। इसलिए उन्हें पार्टी पॉलिटिक्स और उसके कारण पैदा होने वाला हितों का टकराव देख कर लगता है कि करनी कथनी को मुुंह चिढ़ा रही है। उन्हें राजनीति से अरुचि सी होने लगती है और इसी अरुचि के प्रभाव में उन्हें रोजमर्रा की राजनीति और राजनीतिकरण की सतत चलती परिवर्तनकारी प्रक्रिया में अंतर नहीं दिखाई देता। वे राजनीतिकरण और सेकुलरीकरण के दो निरंतर कार्यरत हाथों से गढ़े जा रहे नये भारतीय मानस को नहीं देख पातीं। अंततः आधुनिकीकरण का वह भारतीय चरण उनकी दिलचस्पी के दायरे से निकल जाता है, जिसकी नवीनता स्त्राी जीवन के विशिष्ट संदर्भ में अंतरंगता के बदलते हुए रूपों से जुड़ी हुई है। यहीं सवाल उठता है कि क्या स्त्राी लेखन का उत्तर आधुनिक स्वभाव ( यानी जो महावृत्तांतों के चक्कर में ही फंसता और जिसकी दिलचस्पी के केन्द्र में छो