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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

रेहन पर रग्घू
काशीनाथ सिंह

काशीनाथ सिंह - ऐसे रचनाशिल्पी जिनसे खराब क्या, औसत भी, कभी लिखा नहीं जाता। पिछले कई दशक का साहित्यिक समय इस बात का साक्ष्य है कि उनकी अधिसंख्य रचनाएं औसतपन के विरुद्ध विशिष्टता का प्रतिवाद हैं। ÷ रेहन पर रग्घू' उनकी रचना यात्राा का न केवल नवीनतम बल्कि बेजोड़ पड़ाव है। इस उपन्यास के बारे में स्वयं काशीनाथ सिंह का कहना है - ÷÷ काशी का अस्सी मेरा नगर था मगर ÷ रेहन पर रग्घू' मेरा घर है।'' गांव शहर, युवा वृद्ध, जीवन मृत्यु जैसे अनेक विपर्ययों के तनावों से निर्मित इस उपन्यास में पिछले दो दशक के भारतीय यथार्थ के कोहराम से सामना है। पाठकों के लिए इस उपन्यास को हम सगर्व प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!

शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर! थोड़ी देर पहले धूप थी। उन्होंने खाना खाया था और खाकर अभी अपने कमरे में लेटे ही थे कि सहसा अंधड़। घर के सारे खुले खिड़की दरवाजे भड़ भड़ करते हुए अपने आप बंद होने लगे खुलने लगे। सिटकनी छिटक कर कहीं गिरी , ब्यौंड़े कहीं गिरे जैसे धरती हिल उठी हो, दीवारें कांपने लगी हों। आसमान काला पड़ गया और चारों ओर घुप्प अंधेरा।

वे उठ बैठे!

आंगन और लान बड़े बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गये और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी - धड़ाम! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूंदें नहीं थीं - जैसे पानी की रस्सियां हों जिन्हें पकड़ कर कोई चाहे तो वहां तक चला जाय जहां से ये छोड़ी या गिरायी जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे - दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नहीं, खिड़कियों से अंदर आंखों में।

इकहत्तर साल के बूढे+ रघुनाथ भौंचक! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है?

उन्होंने चेहरे से बंदरटोपी हटायी , बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गये!

खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।

घर के बाहर ही कदम्ब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था - अंधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था!

ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया - साठ बासठ साल पहले! वे स्कूल जाने लगे थे - गांव से दो मील दूर! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुंचे ही थे कि अंधड़ और बारिश और अंधेरा! सबने आम के पेड़ों के तने की आड़ लेनी चाही लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खंधों में ले जाकर पटका! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं! बारिश की बूंदें उनके बदन पर गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने के बाद - जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गांव से लोग लालटेन और चोरबत्ती लेकर निकले थे ढूंढ़ने!

यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी क्या ?

और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।

 

कितने दिन हो गये बारिश में भींगे ?

कितने दिन हो गये लू के थपेड़े खाये ?

कितने दिन हो गये जेठ के घाम में झुलसे ?

कितने दिन हो गये अंजोरिया रात में मटरग़श्ती किये ?

कितने दिन हो गये ठंड में ठिठुर कर दांत किटकिटाये ?

क्या ये इसीलिए होते हैं कि हम इनसे बच के रहें ? बच बचा के चलें? या इसलिए कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएं, इनसे दोस्ती करें, बतियाएं, सिर माथे पर बिठायें?

हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्राु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा ?

 

इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएंगी! वे चले जायेंगे और इस धरती का वैभव , इसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार, जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आंखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जायं, आंखें रह जाएंगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुंचाती रहेंगी!

उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो , जब उनके लिये सूरज ही न उगे। उगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे - वे नहीं! क्या यह सम्भव नहीं कि वे सूरज को बांध के अपने साथ ही लिए जायं - न वह रहे, न उगे, न कोई और देखे! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस किस चीज को बांधेंगे और किस किस को देखने से रोकेंगे?

उनकी बाहें इतनी लम्बी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जियें तो सबके साथ!

लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था - कल तक कहां था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चांद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहां थी यह तड़प? फुर्सत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पांव कमरे में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है?

सच सच बताओ रघुनाथ , तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे से गांव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक बिहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?

लेकिन रघुनाथ यह सब नहीं सुन रहे थे। यह आवाज बाहर की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर में दब गयी थी। वे अपने वश में नहीं थे। उनकी नजर गयी कोने में खड़ी छड़ी और छाता पर! जाड़े की ठंड यों भी भयानक थी और ऊपर से ये ओले और बारिश। हिम्मत जवाब दे रही थी फिर भी उन्होंने दरवाजा खोला। खोला या वे वहां खड़े हुए और अपने आप खुल गया! भींगी हवा का सनसनाता रेला अंदर घुसा और वे डर कर पीछे हट गये! फिर साहस बटोरा और बाहर निकलने की तैयारी शुरू की! पूरी बांह का थर्मोकोट पहना , उस पर सूती शर्ट, फिर उस पर स्वेटर, ऊपर से कोट। ऊनी पैण्ट पहले ही पहन चुके थे। यही सुबह जाड़े में पहन कर टहलने की उनकी पोशाक थी! था तो मफलर भी लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था - गमछा! बारिश को देखते हुए! जैसे जैसे कपड़े भींगते जाएंगे, वे एक एक कर उतारते और फेंकते चले जाएंगे और अंत में साथ रह जाएगा यही गमछा!

वे अपनी साज सज्जा से अब पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन नंगे बिना बालों के सिर को लेकर दुविधा में थे - कनटोप ठीक रहेगा या गमछा बांध लें।

ओले जो गिरने थे , शुरू में ही गिर चुके थे, अब उनका कोई अंदेशा नहीं!

उन्होंने गमछे को गले के चारों ओर लपेटा और नंगे सिर बाहर आये!

अब न कोई रोकने वाला , न टोकने वाला। उन्होंने कहा - ÷÷ हे मन! चलो, लौट कर आये तो वाह वाह! न आये तो वाह वाह!''

बर्फीली बारिश की अंधेरी सुरंग में उतरने से पहले उन्होंने यह नहीं सोचा था कि भींगे कपड़ों के वजन के साथ एक कदम भी आगे बढ़ना उनके लिये मुश्किल होगा।

वे अपने कमरे से तो निकल आये लेकिन गेट से बाहर नहीं जा सके!

छाता खुलने से पहले जो पहली बूंद उनकी नंगी , खल्वाट खोपड़ी पर गिरी, उसने इतना वक्त ही नहीं दिया कि वे समझ सकें कि यह बिजली तड़की है या लोहे की कील है जो सिर में छेद करती हुई अंदर ही अंदर तलवे तक ठुंक गयी है! उनका पूरा बदन झनझना उठा। वे बौछारों के डर से बैठ गये लेकिन भींगने से नहीं बच सके। जब तक छाता खुले, तब तक वे पूरी तरह भींग चुके थे!

अब वे फंस चुके थे - बर्फीली हवाओं और बौछारों के बीच। हवा तिनके की तरह उन्हें ऊपर उड़ा रही थी और बौछारें जमीन पर पटक रही थीं! भींगे कपड़ों का वजन उड़ने नहीं दे रहा था और हवा घसीटे जा रही थी! उन्हें इतना ही याद है कि लोहे के गेट पर वे कई बार भहरा कर गिरे और यह सिलसिला सहसा तब खत्म हुआ जब छाता की कमानियां टूट गयीं और वह उड़ता हुआ गेट के बाहर गायब हो गया। अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे हवा जगह जगह से नोच रही हो और पानी दाग रहा हो - जलते हुए सूजे से!

अचेत होकर गिरने से पहले उनके दिमाग में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा - उनका मित्रा! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश कीं - पहली बार लोहता स्टेशन के पास रेल की पटरी पर नगर से दूर निर्जन जहां किसी का आना जाना नहीं था! समय उसने सामान्य पैसेंजर या मालगाड़ी का नहीं, एक्सप्रेस या मेल का चुना था कि जो होना हो, ÷ खट' से हो, पलक झपकते, ताकि तकलीफ न हो। वह पटरी पर लेटा ही था कि मेल आता दिखा! जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्‌।

यह मरने से ज्यादा बुरा हुआ! बैसाखियों का सहारा और घर वालों की गालियां और दुत्कार! एक बार फिर आत्महत्या का जुनून सवार हुआ उस पर! अबकी उसने सिवान का कुआं चुना! उसने बैसाखी फेंक छलांग लगायी और पानी में छपाक्‌ कि बरोह पकड़ में आ गयी! तीन दिन बिना खाये पिये भूखा चिल्लाता रहा कुएं में - और निकला तो दूसरे टूटे पैर के साथ!

आज वही ज्ञानदत्त - बिना पैरों का ज्ञानदत्त - चौराहे पर पड़ा भीख मांगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा! मगर यह कम्बख्त+ ज्ञानदत्त उनके दिमाग में आया ही क्यों? वे मरने के लिये तो निकले नहीं थे? निकले थे बूंदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।

 

( २)

पहाड़पुर में रघुनाथ एक ही थे।

वैसे कहने को तो रामनाथ , शोभनाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ वगैरह वगैरह भी थे लेकिन वे रघुनाथ नहीं थे।

और रघुनाथ का यह था कि वे जब कभी जहां कहीं नजर आ जाते , गांव घर के लोग जल भुन कर एक ठंडी आह भरते - वाह! क्या किस्मत पायी है पट्ठे ने!

रघुनाथ पहाड़पुर गांव के अकेले लिखे पढ़े आदमी। डिग्री कालेज में अध्यापक। दुबले पतले लम्बे छरहरे बदन के मालिक। शुरू के दस वर्षों तक साइकिल से आते जाते थे , बाद में स्कूटर से। पिछली सीट पर कभी बेटी बैठती थी, बाद के दिनों में बेटे। कभी एक, कभी दोनों। आखिर पांच छः मील का मामला था।

हर सुखी और सफल आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने , आगे बढ़ने और ऊंचाइयां छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिये थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किये थे, उनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गये थे और उन्हें अपने नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था। वे पतले और लम्बे थे इसलिए थोड़ा झुक कर चलते थे। कहीं आते जाते समय, किसी से मिलते जुलते बोलते बतियाते समय थोड़ा झुके रहते थे। पहली बार उन्होंने अपने संदर्भ में किसी दूसरे से बात करते समय पिं्रसिपल साहब के मुंह से ÷ विनम्रता' शब्द सुना। ऐसा उनकी प्रशंसा में कहा गया था। जिस झुके रहने पर वे शर्म महसूस करते थे, वही उनकी खूबी है - यह नया बोध हुआ। इसमें उन्होंने आगे चल कर दो खूबियां और जोड़ दीं - मुसकान और सहमति। कोई कुछ कहे, वे मुसकराते रहते थे और समर्थन में सिर हिलाते रहते थे। यह तभी सम्भव है जब आप अपनी तरफ से कम से कम बोलें।

इस तरह रघुनाथ ने विनम्रता , मितभाषिता और मुसकान के साथ जीवन की यात्राा शुरू की थी।

और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे ÷ किस्मत' कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!

हुआ यह कि एक बार वे कालेज से साइकिल से घर लौटने को हुए तो पाया - चेन टूट गयी है। उन्होंने साइकिल कालेज में ही छोड़ दी और पैदल चल पड़े। गर्मी का मौसम, धूप तेज, हवा का नाम नहीं, बदन पसीने से तर ब तर। रास्ते में कहीं पेड़ पालो नहीं। आकाश में बादल थे लेकिन दूर। उनके मन ने कहा - काश! वे बादल उनके सिर के ऊपर होते छाता की तरह। और देखिए, एक फर्लांग ही आये होंगे कि बादल सचमुच उनके सिर के ऊपर। और यही नहीं, वे उनके साथ साथ छाया किये हुए गांव तक आये!

अगले दिन ने यह साबित कर दिया कि वह मात्रा भ्रम नहीं था। वे क्लास लेने के लिए रजिस्टर लेकर जैसे ही चले , वैसे ही ध्यान गया कि कलम नहीं है। या तो घर छूट गयी या रास्ते में गिर गयी। वे अभी क्लास में पहुंचे भी नहीं थे कि सामने घास में गिरी एक कलम दिखी - धूप में चमकती हुई।

ऐसी बातें औरों के साथ भी होती होंगी लेकिन जाने क्यों , उन्हें लगने लगा कि दीनदयालु परमपिता की उन पर विशेष कृपा है। वह उनकी हर सुविधा असुविधा का ध्यान रखते हैं। इसीलिए वे जो चाहते हैं, वह देर सबेर होकर रहता है।

और देखिए कि उन्होंने जब जब चाहा , जो जो चाहा सब होता गया।

उन्हें कुछ करना नहीं पड़ा , अपने आप होता गया।

पढ़ाई खत्म करने के बाद रघुनाथ रिसर्च कर रहे थे और उनका मन नहीं लग रहा था। आख़िर कब तक करते रहेंगे रिसर्च ? कहीं नौकरी मिल जाती तो जान बचती!

और बहुत दिन नहीं बीते कि नौकरी मिल गयी।

इसका श्रेय उन्होंने हाल में जन्मी अपनी बेटी को दिया। बेटी लक्ष्मी होती है। वही अपने साथ और अपने लिए उनकी नौकरी लेकर आयी थी। लेकिन अब इसके बाद एक बेटा चाहिए। यह उन्होंने नहीं , उनके दिल ने कहा।

और देखिए , चार साल बाद बेटा भी आ गया। उसके बाद एक और बेटा - बस!

इस तरह एक बेटी , दो बेटे, शीला और रघुनाथ - सब मिला कर पांच जनों का परिवार। छोटा परिवार, सुखी परिवार! परिवार सुखी रहा हो या न रहा हो - रघुनाथ सुखी नहीं थे। जिन्दगी उनके लिए पहाड़पुर की धूल धक्कड़ और हंसी खेल नहीं थी। पैदा ही होना था तो स्वयं कीड़े मकोड़े की योनि में क्यों नहीं पैदा हुए? वे वहां भी पैदा हो सकते थे लेकिन नहीं, ईश्वर ने यदि उन्हें ऋषियों मुनियों के लिए दुर्लभ योनि में पैदा किया है तो इसके पीछे उसका कोई मकसद रहा होगा - कि जाओ, साठ सत्तर साल का मौका देते हैं तुम्हें; जाओ, धरती को सुंदर और सुखी बनाओ। धरती सुंदर और सुखी तभी होगी जब तुम्हारे बच्चे सुखी, सुंदर और सम्पन्न होंगे। तुम्हें जो बनना था, वह तो बन चुके; अब बच्चे हैं जिनके आगे सारी जिन्दगी और दुनिया पड़ी है। वही तुम्हारे भी भविष्य हैं। जियो तो उन्हीं की जिन्दगी, मरो तो उन्हीं की जिन्दगी।

और रघुनाथ ने यही किया। उनकी सारी शक्ति और सारी बुद्धि और सारी पूंजी उन्हें ही संवारने में लगी रही!

उन्होंने चाहा - सरला पढ़ लिख कर नौकरी करे।

सरला पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी।

उन्होंने चाहा - संजय साफ्टवेयर इंजीनियर बने।

संजय साफ्टवेयर इंजीनियर ही नहीं बना , अमेरिका पहुंच गया!

उन्होंने चाहा - मैनेजर समधी बनें!

संजय ने यह नहीं चाहा! उसने वह किया जो उसने चाहा!

रघुनाथ का चाहा रह गया। दयानिधान कोई मदद नहीं कर सके उनकी! उन्हें अफसोस इस बात का था कि मैनेजर ने इसे बाप बेटे की मिलीभगत समझा था! वे काफी मानसिक तनाव में चल रहे थे लेकिन कालेज के उनके सहयोगियों ने उन्हें बधाइयां देकर राहत पहुंचायी - कि अच्छा हुआ, एक अंधी खाईं में गिरने से बच गये! इसमें प्रिंसिपल का रोल और अच्छा था। उसने लगभग तीस साल पहले रघुनाथ के साथ ही ज्वाइन किया था कालेज! दोनों का याराना सा था! जब भी मिलते, हंसी मजाक और हाहा हूहू करते! उसने एक दिन धीरे से कहा - ÷÷ रघुनाथ, मुझे आश्चर्य है कि इतनी सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आयी? वह तुम्हारी ही बेटी के बदले तुम्हारे बेटे को खरीद रहा था!''

इस तरह रघुनाथ सहज हो ही रहे थे कि एक दिन घर पर उन्हें प्रिंसिपल के हस्ताक्षर से नोटिस मिली। आरोप दो थे - ÷ नेग्लिजेंस आफ ड्यूटी' और ÷ इनसबार्डिनेशन'! ऐसा कोई संकेत अपनी बातों में नहीं दिया था उसने। पहले कभी!

ये दोनों आरोप निराधार! इसे रघुनाथ ही नहीं , सहयोगी भी जानते थे और प्रिंसिपल भी। सबकी सहानुभूति उनके साथ थी, लेकिन साथ देने को कोई तैयार नहीं था! उन्होंने उत्तर दे दिया था मगर जानते थे कि इससे कोई लाभ नहीं। वे बदहवास से यहां से वहां दौड़ते रहे। आजिज आकर प्रिंसिपल से मिले और उससे सलाह मांगी। उसने कहा - ÷ देखो रघुनाथ, चाहे तुम जितनी दौड़ धूप करो, निलम्बन का मन बना चुका है मैनेजर! उसकी शक्ति और पहुंच को जानते हो तुम! इसके बाद तुम कचहरी जाओगे, मुकदमा लड़ोगे, वह कब तक चलेगा कोई नहीं जानता। हो सकता है, फैसला होने के पहले ही तुम मर जाओ! हां, जब तक मुकदमा चलेगा, तब तक पेन्शन रुकी रहेगी। यह सब देख कर मेरी तो सलाह है कि तुम वी.आर.एस. ( वालंटरी रिटायरमेण्ट स्कीम) ले लो!

रघुनाथ बहुत देर तक चुप रहे! उनसे कुछ बोला नहीं गया!

÷÷ ठीक है लेकिन मेरी एक मदद करें आप!''

÷÷ बोलो, क्या कर सकता हूं मैं?''

÷÷ निलम्बन आप तब तक लटकाये रखें जब तक बेटी की शादी न हो जाय! फिर तो वही करूंगा जो आपने कहा है!''

मनुष्यता का तकाजा था ऐसा करना! प्रिंसिपल ने चिंतित होकर कहा - ÷÷ जाओ, कोशिश करूंगा लेकिन कहीं कहना मत!''

आखिरकार प्रिंसिपल कब तक इंतजार करता?

 

( ३)

ऐसी मुसीबत में रघुनाथ को किसी और ने नहीं , उन्हीं के बेटों ने डाला था!

बेटों में भी संजय ने! खासतौर से संजय ने!

और यह लम्बी कहानी है - रांची से कैलिफोर्निया तक फैली।

संजय ने प्यार किया था सोनल को! यह प्यार किसी सड़कछाप टुच्चे युवक का दिलफेंक प्यार नहीं था , इसमें गुणा भाग भी था और जोड़ घटाना भी! जितना गहरा था, उतना ही व्यापक! सोनल संजय के प्रोफेसर सक्सेना की इकलौती बेटी थी! थू्र आउट फर्स्ट क्लास, नेट और दर्शन से पीएचडी। नौकरी तो पक्की थी बनारस के विश्वविद्यालय में जहां उसके मामा कुलपति थे- लेकिन उसमें अभी देर थी; तब तक शादी का इंतजार था!

शादी के आडे+ आ रहे थे उसके ओठों से बाहर आ गये दांत और चिपटी नाक जिनकी क्षतिपूर्ति वह अपने सर्टिफिकेट से करती थी! रही सही कसर पूरी कर रही थी सक्सेना की फैलायी हुई यह अफवाह - कि उन्हें एक ऐसे जहीन साफ्टवेयर इंजीनियर युवक की जरूरत है जो एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के तीन साल के कंट्रैक्ट पर कैलिफोर्निया जा सके। इस जरूरत का मतलब पूरा इंस्टीट्यूट समझता था।

संजय फाइनल की परीक्षा दे चुका था , रिजल्ट की घोषणा बाकी थी!

इधर कई बार मां बाप का संदेश आया था कि आओ , लड़की देख जाओ!

लड़की क्या देखना , वह देखी भाली थी! रघुनाथ जिस कालेज में पढ़ाते थे, उसी के मैनेजर और पूर्व विधायक की बेटी थी! गोरी, लम्बी, सुंदर, आकर्षक। एम.ए.। अच्छी हाउस वाइफ! मैनेजर पुराने जमाने के जमींदार, अथाह सम्पत्ति के स्वामी! रघुनाथ की कोई हैसियत नहीं थी उनके आगे। न कायदे के घर दुआर, न जमीन जायदाद। आठ बीघे खेत और एक हल की खेती! बचपन और जवानी तंगहाली में गुजारी थी। बच्चों को पढ़ाया भी तो खेत रेहन रख कर और कालेज से लोन लेकर। जाहिर है, मैनेजर ने ÷ साफ्टवेयर इंजीनियर' देखा था, अपने कालेज के मास्टर रघुनाथ को नहीं।

यह सम्बंध सपने से भी आगे की चीज था रघुनाथ के लिए। फायदे ही फायदे थे इससे! जनपद में पहचान और प्रतिष्ठा जो मिलती , सो अलग! वे क्या से क्या होने जा रहे थे!

तो , गांव आने से पहले सक्सेना सर से विदा लेने गया था संजय!

इसे यों भी कह सकते हैं कि उसे डिनर पर बुलाया था सक्सेना सर ने!

 

गर्मी की शाम! अपने लान में सक्सेना बेंत की कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे। माली गमलों में पानी दे रहा था। बंगले के अंदर की बत्तियां जल रही थीं। किसी कमरे से संगीत की धुन आ रही थी! रिटायरमेण्ट के करीब , दिल के मरीज प्रो. सक्सेना संजय की मौजूदगी से बेखबर चुपचाप बैठे थे और सामने देख रहे थे। काफी देर बाद उन्होंने पूछा - ÷÷ कौन सा इंस्ट्रईमेण्ट है?''

संजय ने नासमझी में सिर हिलाया!

÷÷ और राग? कौन सा राग है?''

संजय निरुत्तर , फिर सिर हिलाया!

वे मुसकराये और ऊंची आवाज में पुकारा - ÷÷ सोनू!''

जीन्स के पैण्ट और टीशर्ट में उछलती हुई सोनल आयी - ÷ हां पापा!'

संजय खड़ा हो गया। सक्सेना मुसकराये , पहले संजय को देखा, फिर सोनल को! सोनल भी मुसकरायी। संजय सोनल से मिला तो कई बार था, लेकिन देखा पहली बार। उसे लगा कि किसी लड़की को टुकड़ों में नहीं, ÷ टोटैलिटी' में देखना चाहिए! कितना फर्क पड़ जाता है? साथ ही लड़की और पत्नी को एक ही तरह से नहीं देखना चाहिए। रूप रंग, हाव भाव, नाज नखरे लड़की में देखे जाते हैं, पत्नी में नहीं! ये सब पुराने कंसेप्शन हुए - हमारे पापा मम्मी के जमाने के, हमारे नहीं!

सक्सेना ने चुप्पी तोड़ी - ÷÷ यह है सोनल! जिसमें मेरे प्राण बसते हैं। सितार, सरोद, संतूर - माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस इसे पसंद नहीं। फिल्मी गानों को संगीत नहीं मानती! शायद इसलिए कि खुद कथक की डांसर रही है! खैर, तो क्या खिला रही हो हम लोगों को भाई?''

÷÷ वह तो तभी पता चलेगा जब खाएंगे!'' सोनल शर्मा कर भाग गयी!

÷÷ बैठो संजू!'' कहते हुए सक्सेना भी बैठ गये - सिर झुकाये। कुछ सोचते! भर्राये स्वर में बोले - ÷÷ कैसे रहूंगा इसके बगैर? रहूंगा कैसे, समझ में नहीं आता। चौदह साल की थी जब मां गुजरी थी इसकी!''

इसके बाद उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे - ÷÷ तीन चार साल से लगातार आते रहे हैं लड़के। एक से एक। तुम्हारे सीनियर भी, क्लासफेलो भी! लेकिन बेटा, भारी संकट में हूं। तुम्हीं उबार सकते हो इससे! पिछले साल ही कहा था इसने कि शादी करूंगी तो संजय से। नहीं तो जरूरी नहीं है शादी। अपने अंदर छिपाए रहा इस बात को। आज कह रहा हूं वह भी इसलिए कि फैसले की घड़ी आ गयी है! तीन ही चार महीने का समय है कैलिफोर्निया जाने का। इसी बीच शादी है, एयर टिकट है, पासपोर्ट है, बीजा है, सारी तैयारियां हैं। सोनल अमेरिका और हनीमून को लेकर उत्साहित है।''

उन्होंने आंखें पोंछी और संजय को देखा - ÷÷ हर बाप के सपने होते हैं। मेरे भी हैं। न होते तो सैन्ट्रो कार क्यों लेता? अपने लिए फिएट तो थी ही! नयी घर गृहस्थी के सामान क्यों जुटाता? तुम्हारे ही नगर में एक कालोनी है - ÷ अशोक विहार' । उसमें एक छोटा सा बंगला बनवाया है! सब कुछ कम्प्लीट है, बस फिनिशिंग बाकी है। सोचा था कि यहां से रिटायर करूंगा तो ÷ काशी वास' करूंगा! हर आदमी यह चाहता है। तुम्हारे पापा मम्मी भी चाहते होंगे। लेकिन सोचता हूं कल सोनल विश्वविद्यालय में ज्वाइन करेगी, तो कहां रहेगी? मेरा तो सारा जीवन रांची में बीता, सारे दोस्त मित्रा, रिश्ते नाते यहीं हैं, वहां जाकर क्या करेंगे? सो, बंगला उसी के नाम ट्रांसफर कर दे रहा हूं।''

संजय चिन्तित। उसकी आंखों में पापा मम्मी के चेहरे घूम रहे थे। उसे लगने लगा था कि उसने उन्हें ÷ हां' करने में जल्दी कर दी थी! बोला - ÷÷ बहुत देर कर दी सर, सोनल का मन बताने में!''

÷÷ देर सबेर कुछ नहीं होता संजू, हर चीज का समय होता है! अब यही देखो, मेरे साले प्रो. अस्थाना को बनारस में ऐसे ही वक्त पर कुलपति क्यों होना था जब सोनल थीसिस जमा कर रही थी!'' उन्होंने सिगरेट सुलगायी - ÷÷ ऐसे तो सिगरेट मना है लेकिन कभी कभी एक दो कश ले लेता हूं!..... तो तुम्हारे पापा, उनकी परेशानियां समझ सकता हूं। बताते रहे हो उनके बारे में। अभी तक बहन अविवाहित है, परेशान हैं उसकी शादी को लेकर। छोटा भाई है तुम्हारा, पिछले तीन चार साल से ÷ कैट' ÷ मैट' दे रहा है, लोकसेवा आयोग के टेस्ट दे रहा है और किसी में नहीं आ रहा है - उसकी परेशानी! बाई द वे, मेरी तो सलाह है कि वह फ्रस्ट्रेटेड होकर कुछ कर बैठे इससे पहले किसी मैनेजमेण्ट इंस्टीट्यूट में एडमीशन करा दो। ऐसे नहीं, तो डोनेशन देकर! अरे, कितना लगेगा - डेढ़ लाख? दो लाख और क्या? तुमने बताया था कि तुम्हारी पढ़ायी के लिए लोन भी लेते रहे हैं, रेहन भी रखे हैं खेत - इन सारी परेशानियों से निपटने के लिए कितने की जरूरत होगी उन्हें? उनसे बतिया कर तो देखो। क्या चाहते हैं वे? कितना चाहते हैं? देखो, बारात, धूम धाम, बाजा गाजा - ये सब फालतू की चीजें हैं। कोई जरूरत नहीं इस दिखावे और तमाशे की। शादी के लिए कोर्ट है और दोस्त मित्राों के लिए रिसेप्शन। यह मैं कर ही दूंगा, फिर? .... ऐसे एक बात बता दूं, जिस कम्पनी में और जिस कंट्रैक्ट पर अमरीका जाना है, उससे तीन साल में कोई भी इतना कमा लेगा कि अगर उसका बाप चाहे तो गांव का गांव खरीद ले। समझे?''

÷÷ सवाल यह नहीं है सर, पिता जी लोक लाज, जांत पांत में विश्वास करने वाले जरा पुराने खयालों के आदमी हैं!''

सक्सेना गम्भीर हो गये। कुछ देर तक चुप रहे। इसी बीच सोनल साड़ी में आयी - खाने पर बुलाने - ÷ देखो संजू! ÷ ला आफ ग्रेविटेशन' का नियम केवल पेड़ों और फलों पर ही नहीं लागू होता, मनुष्यों और सम्बंधों पर भी लागू होता है। हर बेटे बेटी के मां बाप पृथ्वी हैं। बेटा ऊपर जाना चाहता है - और ऊपर, थोड़ा सा और ऊपर, मां बाप अपने आकर्षण से उसे नीचे खींचते हैं। आकर्षण संस्कार का भी हो सकता है और प्यार का भी, माया मोह का भी! मंशा गिराने की नहीं होती, मगर गिरा देते हैं! अगर मैंने अपने पिता की सुनी होती तो हेतमपुर में पटवारी रह गया होता! तो यह है! मुझे जो कहना था, कह चुका। तुम्हें जो ठीक लगे, करो! हां, जाने से पहले सोनल से भी बात कर लेना!

 

( ४)

जुलाई में शादी हो गयी चिरंजीवी संजय और आयुष्मती सोनल की - कोर्ट में।

न बारात , न बाजा गाजा!

प्रीतिभोज के लिए न्यौता आया था रघुनाथ के नाम भी , पर वे नहीं गये!

ऐसी चोट लगी थी रघुनाथ और शीला को जिसे न वे किसी को दिखा सकते थे , न किसी से छिपा सकते थे। ऐसी जगहों पर जाना उन्होंने बंद कर दिया था जहां दो चार लोग बैठे हों। उन्होंने मान लिया था कि दो बेटों में से एक बेटा मर गया। जब मां बाप की प्रतिष्ठा की चिन्ता नहीं तो मरा ही समझिए!

सितम्बर में वे अमेरिका जायं चाहे जहन्नुम - इससे कोई मतलब नहीं।

इसी दिन के लिए उन्होंने पाल पोस कर बड़ा किया था , पढ़ाया लिखाया था, पेट काटे थे, कर्जे लिए थे, खेत रेहन रखे थे और दुनिया भर की तवालतें सही थीं!

इनके लाख मना करने के बावजूद राजू गया था। राजू यानि संजय का भाई धनंजय! लौटा तो हाथ में एक ब्रीफकेस था रघुनाथ के लिए जिसे सक्सेना ने भिजवाया था।

रघुनाथ कालेज की तैयारी कर रहे थे। बेमन से ब्रीफकेस को देखा और कहा - ÷÷ रख दो!''

÷÷ अरे? ऐसे कैसे रख दूं? अपने संदूक में रखिए!''

बाबा आदम के जमाने की संदूक जिसमें जाने क्या क्या रखते थे रघुनाथ और उसकी ताली किसी को नहीं देते थे। बिना कुछ बोले उन्होंने उसकी ओर ताली फेंक दी!

राजू ने ब्रीफकेस संदूक में रखा और ताली उन्हें पकड़ाते हुए कहा - ÷÷ और कुछ नहीं पूछिएगा?

शीला उदास मन दरवाजे पर खड़ी थी , अंदर चली गयी!

÷÷ आप लोग तो ऐसा सन्न मारे हुए हैं जैसे गमी हो गयी हो!'' राजू हंसते हुए मां के पीछे पीछे अंदर चला - ÷÷ बहू ऐसी कि लाखों में एक। मां, चिन्ता न करो। सब करेगी वो जो संजू बोलता था! हाथ पांव दबाएगी वो, मूंड़ दबाएगी वो, बरतन मांजेगी वो, झाडू लगाएगी वो, खाना पकाएगी वो - जो जो चाहिए, सब करेगी! जरा अमेरिका से लौट तो आने दो। अभी तो हनीमून पर जा रही है दार्जिलिंग, वहां से दमदम एयरपोर्ट, फिर वहां से अमेरिका। बच गयी तुम, अगर आयी होती तो मुंहदिखायी देनी पड़ती। यल्लो। तुम्हारे लिए फोटो भिजवाया है रिसेप्शन का!...''

राजू और भी न जाने क्या क्या बोलता रहा , वह सुनती भी रही, नहीं भी सुनती रही!

फोटो जोड़े का वहीं पड़ा था जहां वह बैठी थी। एक मन कह रहा था - ÷÷ देखो।'' दूसरा कह रहा था - ÷÷ छोड़ो, जाने दो!''

सारी साधें धरी रह गयी थीं।

 

रात ढल चुकी थी।

गांव में सोता पड़ चुका था!

एक दिन पहले जम कर पानी बरसा था! सिवान गुलजार हो गया था। झींगुरों की झनकार से पूरा गांव झनझना रहा था। बादल उसके बाद भी छाये रहे। दूर आकाश में बिजली भी चमकती रही। उधर कहीं बारिश हुई हो तो हुई हो , इधर नहीं हुई।

रघुनाथ का घर दुआर गांव के बाहरी हिस्से में था! घर का अगला हिस्सा दुआर , पिछला घर। दुआर का मतलब दालान और बरामदा! इसी बरामदे में सोते थे रघुनाथ और राजू! राजू के सो जाने के बाद चुपके से आधी रात को रघुनाथ अंदर आये, ढिबरी जलायी और संदूक खोल कर ब्रीफकेस निकाला!

जब वे ढिबरी और ब्रीफकेस लेकर शीला के बगल वाली कोठरी में गये तो याद आया कि राजू ने इसकी चाबी नहीं दी है। उन्होंने धीरे से राजू को जगाया। राजू ने बताया कि वह ताली से नहीं , नम्बर से खुलेगा - इन नम्बरों से! और बड़बड़ाते हुए सो गया!

रघुनाथ ने ब्रीफकेस खोला तो भाव विभोर! बेटे संजय के प्रति सारी नाराजगी जाती रही! रुपयों की इतनी गड्डियां एक साथ एक ब्रीफकेस में अपनी आंखों के सामने पहली बार देख रहे थे और यह कोई फिल्म नहीं , वास्तविकता थी।

रघुनाथ की छवि गांव वालों की नजर में झंगड़ा झंझट से दूर रहने वाले जितने शरीफ आदमी की थी उतनी ही सोंठ आदमी की - एक रुपैया में आठ अठन्नी भुनाने वाले आदमी की। लोग यह भी कहने लग गये थे कि बहुत लोभ न किया होता तो यह दिन उन्हें न देखना पड़ता।

रघुनाथ ने मेज को पास खींचा - पहले सौ सौ के नोटों की गड्डियां गिननी शुरू कीं! वे एक एक बंडल की संख्या नोट करते जाते। फिर पांच पांच सौ की गड्डियां उठायीं और अलग नोट करना शुरू किया। गिनते गिनते आधी रात हो गयी और टोटल किया तो चार लाख साठ हजार!

उनका दिल धड़का! चिन्ता हुई। अगर गिनने में गलती भी हुई हो तो इतनी कैसे ? वे उठ कर गये और दुबारा संदूक में झांक आये। आते समय रसोई से कटोरी में पानी ले रहे थे तो शीला जाग गयी। उन्होंने नये सिरे से उंगली भिंगो भिंगो कर फिर गिनना शुरू किया। अबकी फिर टोटल किया तो वही - चार और साठ!

उन्होंने सिर को हाथों में थाम लिया।

÷÷ क्या बात है?'' शीला ने पूछा!

÷÷ पांच लाख में कम हैं चालीस हजार!'' किसी ने संदूक तो नहीं खोला था?

÷÷ ताली तो तुम्हारे पास थी, खोलेगा कौन?''

÷÷ कोई और तो नहीं आया था घर में?''

÷÷ तुम्हीं और राजू आये गये, और तो कोई नहीं।''

थोड़ी देर बाद जाने क्या सोच कर वे उठे और राजू को जगा कर ले आये! राजू आंखें मलते हुए आया!

÷÷ ब्रीफकेस किसने दिया था तुम्हें?'' संजू ने कि सक्सेना ने?

÷÷ क्यों, क्या बात है?''

÷÷ बताओ तो! कम हैं पांच लाख में?''

राजू हंसा - ÷÷ मंगनी की बछिया के दांत नहीं गिनते! संतोष कीजिए, जितना मिल गया मुफ्त का समझिए!''

वे एकटक राजू को देखते रहे - ÷÷ तुमने तो कुछ इधर उधर नहीं किया!''

÷÷ मैं जानता था यही शक करेंगे आप! स्वभाव से ही शक्की हैं।''

÷÷ चुप्प!'' शीला ने झिड़का ÷÷ यही तमीज है बाप से बात करने की!''

÷÷ समझ गया। इसी ने चुराया है, बताया नहीं!''

÷÷ पहले ही समझ जाना चाहिए था। चोर कभी बताता है कि चोरी उसी ने की है?'' राजू बोला।

रघुनाथ ने आश्चर्य से देखा उसकी ओर - ÷÷ क्या हो गया है इस लौंडे को? इसका भाई कम्प्यूटर इंजीनियर! उसने कभी इस तरह से बातें नहीं की अपने बाप से?''

÷÷ बातें नहीं कीं, इसीलिए तो चुपके से शादी कर ली और बाप को खबर तक नहीं दी।''

झनझना उठे क्रोध से रघुनाथ। मन हुआ - उसे घर से निकल जाने को कहें लेकिन जाने क्या सोच कर खुद ही उठे और आंगन में आ गये। कोने में बंसखट पड़ी थी, उसी पर बैठ गये। उन्होंने ईश्वर के लिए सिर उठाया आसमान की तरफ।

आसमान धुला धुला और उजला उजला लग रहा था - जैसे भोर होने को हो!

÷÷ देखो मां! मैं साल डेढ़ साल से कहता रहा हूं इनसे कि मोटरबाइक ले दो। घराने के सभी लड़कों के पास है, एक मेरे ही पास नहीं है। इनका कहना था कि हाथ पांव तोड़ना है क्या? सिर फोड़ना है क्या? चोरी चकारी और लफंगई करनी है क्या? डाके डालना है क्या? किसका हाथ पैर टूटा है बोलो तो? तो संजू ने मुझसे पूछा - तुम्हें भी कुछ चाहिए? जब हम वहां से आने लगे तब! मैंने कहा - ÷÷ हां, मोटरबाइक! उसने मुझे रुपये थमा दिये। उसने ब्रीफकेस में से दिया या कहां से दिया मुझे नहीं पता!''

÷÷ सरासर झूठ! यह जानता है कि संजय अब नहीं आने वाला। हम नहीं पूछ पायेंगे उससे।'' रघुनाथ को यह झूठ बर्दाश्त न हुआ!

शीला खड़ी खड़ी ढिबरी की मद्धिम रोशनी में सुबक रही थी। वह अपने बेटे के इस रूप से अनजान थी!

÷÷ और बतायें! हमारे बापजान के दो बेटे - संजू और मैं! इन्होंने एक आंख से हमें देखा ही नहीं। सारी मेहनत और सारा पैसा इन्होंने उस पर खर्च किया। पढ़ाया, लिखाया, कम्प्यूटर इंजीनियर बनाया और मेरे लिए? कामर्स पढ़ो। जिसे पढ़ने में न यह मेरी मदद कर सकते थे, न मेरा मन लगता था! किसी तरह बीकाम किया तो कोचिंग करो, ये टेस्ट दो, वह टेस्ट दो! मैं थक गया हूं टेस्ट देते देते! इनसे कहो, ये रुपये कहीं इधर उधर खर्च न करें, डोनेशन के लिए रखें। बिना डोनेशन के कहीं एडमीशन नहीं होने वाला! साफ साफ बता दे रहा हूं।''

÷÷ अगर डोनेशन के पैसे न दूं तो?''

÷÷ तो कभी मत पूछिएगा कि यह क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो?''

÷÷ क्या करोगे? डाका डालोगे? तस्करी करोगे? गांजा हेरोइन बेचोगे? कत्ल करोगे?''

÷÷ क्या बक बक कर रहे हैं आप? फालतू?'' झल्ला कर शीला बोली - ÷÷ और तू चुप रह? अनाप शनाप बोल रहा है बाप से।''

राजू ने कमरे से बाहर निकलते हुए पिता को देखा - ÷÷ बस कह दिया।''

÷÷ सुनो सुनो! भागो मत! अपने ही बारे में सोचते हो या कभी अपनी बहन के भी बारे में सोचा? जब होता है तभी जाते हो हजार पांच सौ मार लाते हो उससे? उसकी शादी के बारे में भी सोचते हो कभी?''

÷÷ देख रही हो इनका?'' वह मां की ओर मुड़ा - ÷÷ जिससे कहना था, उससे नहीं कहा; कह मुझसे रहे हैं जो अभी पढ़ायी कर रहा है। डोनेशन की बात आयी तो दीदी याद आ रही है। पहले तो इनसे कहो कि ये कंजूसी और दरिद्रता छोड़ें अब! हंसी उड़ाते हैं लोग। यह ढिबरी और लालटेन छोड़ें और दूसरों की तरह तार खिंचवा के - कम से कम आंगन और दरवाजे पर लट्टू लगवा लें। रोशनी हो घर में! इसके साथ फोन भी लगवा रहे हैं लोग। घर में फोन होगा तो संजू भी जब चाहेगा, बात कर लेगा। तुम भी सरला दीदी से बातें कर लिया करोगी! दीदी से ही क्यों, भाभी से भी!''

माथा पीटते हुए फिर बैठ गये रघुनाथ - ÷÷ हाय रे किस्मत। जिनके लिए कंजूसी की, उन्हीं के मुंह से यह सुनना बदा था।''

÷÷ और एक बात कह दें तुमसे भी और इनसे भी। फिर ऐसी बेवकूफी न करें जैसी संजू के समय की थी। दीदी से साफ साफ बात कर लें कि वह इनकी तय की हुई शादी करेंगी भी या नहीं। यह तो भाग दौड़ करके कहीं तय कर आयें और वह कह दें कि मुझे नहीं करनी। फिर भद पिटे इनकी!''

÷÷ यह तुम कैसे कह रहे हो?''

÷÷ इसलिए कि मैंने एक आदमी को अक्सर उनके साथ देखा है! कौन है वह, नही जानता!''

÷÷ देखा? इसे शरम नहीं अपनी बहन के बारे में इस तरह बात करते हुए?'' रघुनाथ ने दांत पीसते हुए वहीं से कहा!

 

( ५)

सरला दुविधा में थी - ब्याह करे या न करे?

पक्का सिर्फ इतना था कि उसे वह शादी नहीं करनी है जो पापा तय करेंगे!

कई लोचे थे उसकी दुविधा में!

अब से कोई सात आठ साल पहले। उसने अपने अंदर कुछ अजब सा बदलाव महसूस किया था - मन उखड़ा उखड़ा सा रहता था, कुछ खोया खोया सा था, बेबात पर हंसी आती थी, किताब कापी कहीं रखती थी, ढूंढती कहीं थी, हरदम गुनगुनाये जाने को जी चाहता था, बाहर आने पर सहेलियां हंसने लगी थीं - देखो, देखो। पैरों की चप्पलें - दो डिजाइनों की! क्लास कहानी का, किताब कविता की हाथ में! यही वे दिन थे जब नगर में आने वाली कोई फिल्म उससे नहीं छूटती थी!

ऐसे ही में जाने कैसे कौशिक सर चुपके से आये और उसके दिल में आ बैठे!

कौशिक सर कविता के अध्यापक। बहुत गम्भीर और चुप्पे और सिद्धांतवादी। पतले , लम्बे, आकर्षक! अधेड़ और तीन बच्चों - बल्कि युवाओं के पिता! अद्भुत ÷ सेन्स आफ ह्यूमर' के मालिक! उन्हें प्यार करने में कोई खतरा नहीं था! न खतरा, न किसी तरह का संदेह। उसने बहुत समझदारी और विवेक से काम लिया था अपना ÷ ब्वायफ्रेण्ड' चुनने में। लड़के लड़कियों में ÷ गासिप' की भी आशंका नहीं।

कौशिक सर कृतज्ञ और अभिभूत! अस्तप्राय जीवन का अंतिम प्यार वह भी सरला जैसी सुंदर लड़की का! पचास पचपन की उमर में तो कोई सोच भी नहीं सकता था ऐसे भाग्य के बारे में!

सरला का मन बेचैन , देह बेचैन! महज प्यार भरी बातें और तड़प! और कुछ नहीं। यही तो सहेलियों के साथ भी हो रहा है। कुछ तो अलग हो - कौशिक सर विद्यार्थी थोड़े हैं! ऐसी ही इच्छा कौशिक सर की भी थी लेकिन नगर में ऐसी कोई जगह नहीं, जहां कोई उन्हें जानता न हो!

निश्चित हुआ कि कौशिक सर एक दिन टैक्सी से ÷ अमुक जगह' पहुंचेंगे, वहीं से सरला को ÷ पिकअप' करेंगे और दो चार घंटे के लिए सारनाथ! फिर वहीं सोचा जाएगा ÷ एकांत' और ÷ निर्जन' के बारे में!

प्यार बंद और सुरक्षित कमरे की चीज नहीं। खतरों से खेलने का नाम है प्यार। लोगों की भीड़ से बचते बचाते , उन्हें धता बताते, उनकी नजरों को चकमा देते जो किया जाता है - वह है प्यार! शादी से पहले यही चाहती थी सरला। शादी के बाद तो यह विश्वासघात होगा, व्यभिचार होगा, अनैतिक होगा। जो करना है, पहले कर लो। अनुभव कर लो एक बार। मर्द का स्वाद! एक ऐडवेंचर! जस्ट फार फन!

सरला रोमांचित थी। नर्वस थी और उत्तेजित भी!

जिस दिन जाना था उससे पहले की रात। वह सो नहीं सकी ठीक से। नींद ही नहीं आ रही थी! कई तरह की बातें , कई तरह के खयाल, कई तरह की गुदगुदियां! अपने आप लजाती, अपने आप हंसती। उसने सोच लिया था कि अवसर मिलने पर भी इतना आगे नहीं बढ़ने देना है कौशिक सर को कि वे उसे गलत समझ बैठें! यह तो शुरुआत है...

अभी जाने कितनी मुलाकातें बाकी हैं! नहीं , अब कहां मुलाकातें? ÷ फेयरवेल' हो चुका है। दो चार दिन और चल सकते हैं क्लासेज+ उसके बाद तो इम्तहान! फिर कहां सम्भव हैं भेंट? कौन सा बहाना रहेगा मिलने का?

कौशिक सर लोकप्रिय आदमी! विश्वविद्यालय के ही नहीं , नगर के भी! जानने वाले बहुत से। तरह तरह के लोग! इस बात का गर्व भी था सरला को कि वह जिसे प्यार करती है, वह कोई सीटी बजाने वाला, लाइन मारने वाला सड़कछाप विद्यार्थी नहीं, विद्वान है!

कौशिक सर ने बड़ी सावधानी बरती थी - छुट्टी का दिन न हो, स्कूल कालेज खुले हों, ताकि छात्रा छात्रााएं पढ़ने में और अध्यापक पढ़ाने में व्यस्त हों, पिकनिक या भ्रमण का कार्यक्रम न बनायें, सारनाथ का मेला भी न हो उस रोज!

इसी सावधानी के साथ कौशिक सर सरला के साथ टैक्सी से पहुंचे चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़क के किनारे पहाड़ीनुमा ढूह के ऊपर खंडहर जैसा टूटा फूटा स्तूप! खड़े हो जाओ तो पूरा सारनाथ ही नहीं , दूर दूर तक के गांव गिरावं और बाग बगीचे नजर आयें! खाली पड़ा था स्तूप! नीचे चौकीदार, सिपाही, माली अपने अपने काम में लगे थे! एकदम निर्जन अकेला खड़ा था स्तूप! ÷ हिमगिरि के उत्तुंग शिखर' की तरह। कोई दर्शनार्थी नहीं!

मनु ने श्रद्धा को देखा!

श्रद्धा ने मनु को देखा!

दोनों ने टैक्सी सड़क के एक किनारे खड़ी की और चल पड़े। घुमावदार रास्ते से चक्कर काटते हुए! आगे पीछे नहीं , अगल बगल। साथ साथ। हाथ में हाथ लिये! सरला अकेले में कौशिक सर को ÷ मीतू' बोलती थी। उस दिन वे सचमुच मीतू हो गये थे। सरला - जो हमेशा समीज सलवार और दुपट्टे में रहती थी - वही सरला हरे चौड़े बार्डर की बासन्ती साड़ी में गजब ढा रही थी! बार्डर के रंग का साड़ी से मैच करता बलाउज और माथे पर छोटी सी लाल बिन्दी! हवा उड़ाये ले जा रही थी आंचल को जिसे वह बार बार सम्भाल रही थी!

वे चढ़ायी खत्म करके स्तूप के पास पहुंचे और चारों तरफ नजर दौड़ायी - दोनों के मुंह से एक साथ निकला - ÷÷ जैसे अछोर, अनंत, असीम हरियाली का समुद्र! और उसमें पीले फूले हुए सरसों के जहां तहां खेत - ऐसे लग रहे हैं जैसे पाल वाली हिलती डुलती डोंगियां!'' ÷÷ और हम?'' सरला ने पूछा! कौशिक सर मुसकराये! बोले - ÷÷ मस्तूल वाले बड़े जहाज के डेक पर!''

स्तूप के इस तरफ छाया थी और उस तरफ कुनकुनी धूप! छाया लम्बी होती हुयी वहां तक चली गयी थी जहां माली काम कर रहे थे। वे उस तरफ गये धूप में , जिधर समुद्र था और हिलती डुलती पीली डोंगियां।

वे स्तूप से सटी साफ सुथरी जगह पर बैठ गये - चुपचाप! वे चुप थे लेकिन उनके दिल बोल रहे थे - अपने आप से भी, और एक दूसरे से भी! उनके पास तो रह ही क्या गया था कहने सुनने को? साल डेढ़ साल से यही तो हो रहा था - बातें, बातें, सिर्फ बातें। बातों से वे थक भी चुके थे ओर ऊब भी! सरला बगल में बैठी लगातार कौशिक सर को देखे जा रही थी और वे उसके देखने को देखते हुए दूब नोच रहे थे! फिर सहसा दिलीप कुमार स्टाइल में मुसकरा कर बोले - ÷÷ ऊं? क्या कहा?'' हंसते हुए सरला ने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया - ÷÷ बहुत कुछ? सुनो तब तो!''

वे दिल जो अब तक खंडहर के पीछे गुटर गूं कर रहे थे , कुकडू कूं करने लगे थे भरी दुपहरिया में! कौशिक सर ने सरला की पीठ के पीछे से हाथ बढ़ा कर उसकी सुडौल गोलायी मसल दी! सरला के पूरे बदन में एक झुरझुरी हुयी और वह शरमाती हुयी उनकी गोद में ढह गयी!

अबकी कौशिक सर ने जरा जोर से मसला।

चिहुंक कर सीत्कार कर उठी सरला और आंखें बंद कर लीं - ÷÷ जंगली कहीं के!''

कौशिक सर ने सिर झुका कर उसकी आंखों को चूम लिया!

÷÷ यह क्या हो रहा है चाचा?'' अचानक यह कड़कती आवाज और सामने खड़ा ऐतिहासिक धरोहर का पहरेदार या सिपाही खाकी वर्दी में!

दोनों के चेहरे फक्क्‌। काटो तो खून नहीं। कौशिक सर ने झटपट आंचल के नीचे से हाथ खींचा और सरला उठ बैठी - बदहवास। उनकी समझ में नहीं आया कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया? जरा सी भी आहट मिली होती तो यह नौबत न आती!

घबड़ाये हुए कौशिक सर उस पहरेदार को ताकते रहे!

÷÷ देख क्या रहे हो, उठो; यह रंडीबाजी का अड्डा नहीं है! आओ!'' वह मुड़ गया।

सरला आंचल में मुंह ढांप कर रो रही थी! कौशिक सर ने किसी तरह उसे खड़ा किया और अपने पीछे आने का इशारा किया।

÷÷ अरे उधर नहीं, इधर! थाने पर!''

÷÷ थाने पर क्यों, ऐसा क्या किया है हमने?'' हिम्मत जुटायी - कौशिक सर ने!

÷÷ वहीं पता चलेगा चाचा कि क्या किया है तुमने? कहां से फांसा है इस लौंडिया को?''

अब तक ÷ चाचा' और ÷ रंडीबाजी' - ये अपमानजनक शब्द थे जो कौशिक सर के कानों में गूंज रहे थे लेकिन अब यह ÷ थाना' - ÷ थाना' माने बहुत कुछ! जलालत। हवालात। अखबारों की सुर्खियां। युनिवर्सिटी में चर्चे। समाज का कोढ़। नौकरी से सस्पेन्शन। किस मुंह से परिवार में जाएंगे? और यह सरला? इसका क्या होगा? किस मुसीबत में आ फंसे उसके चक्कर में?

सरला सुबकना बंद करके एक किनारे खड़ी थी और पहरेदार हाते के गेट के पास! थाना ले चलने की मुद्रा में। चौकीदार और माली भी उसके पास आ गये थे और रोक रहे थे - अरे, छोड़ो भई। जाने दो! उमर देखो चाचा की। काहे पानी उतार रहे हो एक बुर्जुग का! कह भी रहे थे और मजा भी ले रहे थे।

कौशिक सर घबड़ाये हुए सरला के पास आये - ÷÷ परेशान न हो! अभी देखते हैं। सब ठीक हो जाएगा।'' सरला गुस्से में। उसकी नजरें पहरेदार और मालियों पर टिकी थीं।

कौशिक सर गेट पर खड़े पहरेदार को अलग ले गये और फुस फुस बातें करने लगे। बीच बीच में वह उखड़ जाता और हाथ छुड़ा कर भागने लगता! कौशिक सर ने उसे सौ सौ के दो नोट पकड़ाये जिन्हें उसने फेंक दिया और मालियों की ओर इशारा करते हुए पांच उगलियां दिखायी - ÷÷ नहीं चाचा, नहीं होगा इससे। थाने चलिए?''

÷÷ बस्स! बहुत हो चुका यह नाटक!'' सरला लगभग दौड़ती हुई उन दोनों के पास पहुंची - ÷÷ कैसे ये रुपये? तुम हमसे बात करो अब?''

उसने अचकचा कर कौशिक सर को देखा - ÷÷ इनका सुनो चाचा।''

÷÷ चाचा होंगे तुम्हारे, मेरे दोस्त हैं, प्रेमी हैं। हमने प्रेम किया, चूमा अपनी मर्जी से। किसी ने किसी के साथ बलात्कार नहीं किया, किसलिए थाने?''

÷÷ चलो तो वहीं बताते हैं।'' वह चल पड़ा।

आगे खड़ी हो गयी सरला रास्ता रोक कर - ÷÷ कोई नहीं जाएगा थाने वाने! न तुम, न हम। एस.पी. कलक्टर, आई.जी. - जिसे बुलाना हो यहीं बुलाओ! समझ क्या रखा है तुमने?''

वह हक्का बक्का। ताकता रहा कभी कौशिक सर को , कभी सरला को। माली और चौकीदार भी आ गये इस बीच।

÷÷ किसने देखा इश्क लड़ाते हुए? यह चौराहा है? बाजार है यह जहां रेप हो रहा था? फंसाना चाहते हो रुपयों के लिए? तुम हमें क्या ले जाओगे, हम ले चलेंगे तुम्हें!''

मामले की इस नयी पेंच को देखते हुए माली बीच बचाव में आये और उन्होंने निष्कर्ष दिया कि गलतियां इंसान से ही होती हैं इसलिए छोड़िए , हटाइए और अपना अपना काम देखिए!

कौशिक सर जब तक गिरे हुए रुपये उठाते रहे तब तक सरला टैक्सी में बैठ चुकी थी! कौशिक सर उसके बगल में बैठते हुए बोले - ÷÷ मैं नहीं जानता था कि इतनी बहादुर हो तुम?''

÷÷ मैं भी नहीं जानती थी कि इतने डरपोक और कायर हैं आप!''

टैक्सी वापस लौटी। दोनों एक दूसरे से रास्ते भर नहीं बोले।

यह एक डरावना दुःस्वप्न था - जिसने एक लम्बे समय तक पीछा नहीं छोड़ा सरला का।

दुःस्वप्न में पहरेदार का चेहरा ही नहीं था केवल , हथेलियों की छुअन और मसलन भी थी।

 

( ६)

सरला के इस दुःस्वप्न को और भी बदरंग बना दिया था उसकी पड़ोसिनों ने!

वह जिस बहुमंजिली इमारत के प्रथम तल के किराये के फ्लैट में रहती थी , उसके अगल बगल भी दो दो छोटे कमरों के फ्लैट थे। उनमें उसी के स्कूल की अध्यापिकाएं रहती थीं - बायीं तरफ मीनू तिवारी और दायीं तरफ बेला पटेल। मीनू स्कूल की वाइस प्रिंसिपल थी और वह उसका अपना फ्लैट था - खरीदा हुआ! उसी ने सरला को अपने बगल में दिलवाया था किराये पर!

मीनू बलकट्टी थी - कंधों तक छोटे छोटे बाल! एकदम लाल मेंहदी से रंगे! उम्र चालीस से ऊपर। स्वभाव से सीरियस और रिजर्व्ड। एक हद तक असामाजिक! किसी के शादी ब्याह में तो नहीं ही जाती थी, आयोजनों में भी शामिल होने से बचती थी। घर से स्कूल स्कूल से घर बस यही आना जाना था। मजबूरी में ही हंसती थी। सहेली भी नहीं थी कोई जिसके साथ उठना बैठना हो! उम्र के बावजूद उसका गोरा सुडौल बदन आकर्षक था।

वह कुमारी थी। अकेली रहती थी। उसके दो पामेरियन कुत्ते थे - एक काला, दूसरा सफेद! बेटे या बेटियां कहिए - ये ही थे। इन्हें लेकर वह दिन में दो बार बाहर निकलती थी, टहलाने या नित्य कर्म कराने। पिंजरे में एक तोता भी था जो किसी के घर में घुसने और जाने के समय बोलता था। उसके इस टें टें को वह ÷ सुस्वागतम' और ÷ टा टा' बताती थी। उसकी सारी चिन्ताएं इन्हीं को लेकर थीं। ÷ क्या बतायें, आज पम्मी दिन भर से गुमसुम है!' ÷ आज टूटू की नाक बह रही है।' ÷ पम्मी का पेट खराब है।' ÷ दोनों में बातचीत बंद है।' ÷ टूटू पम्मी से किस बात पर नाराज है, बता नहीं रहा है!' ÷ दोनों मेरे पास सोने के पहले झगड़ा करते हैं, पता नहीं क्यों?' इसी तरह की चिन्ताएं। कातिक के पहले से ही वह उनके लिए परेशान होना शुरू हो जाती थी और तब तक रहती थी जब तक पिल्ले नहीं हो जाते थे और जब हो जाते थे तो कई रोज सोहर के कैसेट बजाती थी और फिर नयी परेशानियां ......

मीनू के घर बाहर से आने वाले सिर्फ दो मर्द थे - एक उसका भाई। वह मीनू से बड़ा था और वकालत करता था! वकालत चलती थी या नहीं - ठीक ठीक नहीं मालूम! वह हर महीने के पहले सप्ताह में आता था और जब आता था तो देर तक भाई बहन में चख चख होती थी। उसके जाने के दो तीन दिनों बाद तक मीनू का मूड खराब रहता था!

दूसरे थे पशुओं के डाक्टर। वे मीनू की ही उमर के या उससे थोड़े बड़े थे। काफी टिप टाप से रहते थे , बाल डाई करते थे और सफारी सूट पहनते थे! वे गर्मी की छुट्टियों में दोपहर में आते थे जब प्रायः लोग बाहर निकलने से बचते हैं। वे आते और शाम पांच बजे से पहले चले जाते! जाड़े के मौसम में कभी कभी मीनू के घर रात के भोजन पर आते। जब वे जाने लगते तो मीनू बालकनी पर खड़ी होकर देर तक हाथ हिलाती रहती!

इसी बालकनी के बगल में सरला की बालकनी थी जहां कभी कभी खड़ी होकर दोनों पार्क का नजारा लेती थीं। मीनू की इच्छा के अनुसार सरला उसे स्कूल में मैडम कहती थी और घर पर दीदी! दीदी उसे सल्लो बोलती थी!

वे बालकनी में खड़ी होकर जो देख रही थीं , वह हफ्ते भर से देख रही थीं!

हर शाम छः बजे के करीब सोलह सत्राह साल का एक लड़का पार्क में आता था - गुलदाउदी का बड़ा सा खिला हुआ फूल लेकर और बैठ कर उसकी पंखुड़ियों पर कुछ लिखता था और इंतजार करता था बी ब्लाक की बालकनी में एक लड़की के आने का! वह शायद दक्षिण भारतीय लड़की थी! वह ब्लाउज और स्कर्ट में आकर खड़ी हो जाती - लहरदार बालों में एकदम फ्रेश जैसे नहा कर निकली हो! लड़का घूमता, पीठ उसकी तरफ करता और उछल कर पैर से ऐसी किक मारता कि फूल उसकी बालकनी में गिरता! लड़की लाल पोलीथिन में लिपटा फूल उठाती और अपनी गोलाइयों के बीच ब्लाउज के अंदर रख लेती!

घास पर चित्त गिरा लड़का उठता और उसकी ओर ÷ किस' उछालता!

जवाब में लड़की मुसकराती , लजाती और होठों से चुम्बन लहरा देती!

÷÷ सल्लो! बहुत दिन हो गये तुम्हें काफी पिलाये! आओ न!'' एक दिन मीनू ने सरला से कहा! यह वह दिन था जब लड़की ने चुम्बन के उत्तर से ही संतोष नहीं किया, गुनगुना कर भी जवाब दिया किन्हीं वक्तों के गाने से - ÷ छोटी सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल।'

सरला जब पहुंची तो मीनू किचेन में थी। वह थोड़ी देर बाद काफी के दो मग के साथ ड्राइंग रूम में आयी - चुप और संजीदा! गयी और एक शीशी भी ले आयी ब्रांडी की जिसे डाक्टर छोड़ गये थे उसके लिए। उसने एक चम्मच इसमें और एक चम्मच उसमें ब्रांडी डाली और उसका लाभ बताया। इसी समय टूटू आयी और मीनू की गोद में बैठ गयी। मीनू उसे देर तक सहलाती और प्यार करती रही - ÷÷ देखना, एक न एक दिन मार दिया जाएगा यह लड़का! इतना प्यारा लड़का!''

÷÷ यह कैसे कह सकती हैं आप?''

मीनू चुप रही फिर सुबकने लगी - ÷÷ नहीं, सल्लो, यही होता है - यही होगा!''

÷÷ यह भी तो हो सकता है कि लड़की किसी दूसरे के घर चली जाय या लड़का किसी और को घर बिठा ले! और यह भी तो हो सकता है कि दोनों शादी कर लें।''

÷÷ यह तो और बुरा होगा!''

÷÷ क्यों?''

÷÷ अपने ही बगल में बेला को देख लो! उसने प्रेम विवाह ही किया था न उस पटेल से? पी.सी.ओ. चलाता था और रहता ऐसे था जैसे लाट साहब का नाती! उस पर पागल हो गयी थी बेला! ऐसा भी सुना है कि शादी के लिए जहर खाया था उसने! शादी हुयी और देखो - रोज रोज किच किच, गाली गलौज, मार पीट, रोना पीटना। किसी मर्द से कहीं हंस कर बोल बतिया ले तो जीना मुश्किल! स्कूल भी देखे, तीनों बच्चों की जिम्मेदारी भी उठाये और पटेल को भी खुश रखे! देखा होता पांच सात साल पहले उसे, क्या फिगर थी और क्या निखार था!''

'' सिर्फ एक बेला के आधार पर तो यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता दीदी!''

÷÷ एक बात गांठ बांध लो सल्लो, तुम दोनों एक साथ कर ही नहीं सकतीं। यह समाज ही ऐसा है। प्रेम करो या विवाह करो। और जिससे प्रेम करो उससे ब्याह तो हरगिज मत करो! ब्याह की रात से ही वह प्रेमी से मर्द होना शुरू कर देता है। अगर मुझसे पूछो तो मैं हर पत्नी को एक सलाह दे सकती हूं। वह अपने पति को अपने से बाहर - घर से बाहर - अगर वह पति का प्यार पाना चाहती है तो - घर से बाहर प्रेम करने की छूट दे; उकसाये उसके लिए! क्योंकि वह कहीं और किसी को प्यार करेगा, तो उसके अन्दर का कड़वापन रूखापन भरता रहेगा और इसका लाभ उसकी बीवी को भी मिलेगा! बीवी ही नहीं, बच्चों को भी मिलेगा! समझा?''

÷÷ और पत्नी भी ऐसा ही करे तो?''

÷÷ तो जीवन भर नर्क भोगने के लिए तैयार रहे! पति तो पति, बच्चे तक माफ नहीं करेंगे इसके लिए!''

सरला कहीं न कहीं इन बातों के आईने में अपने भविष्य का रास्ता ढूंढ़ रही थी , मीनू को नहीं मालूम!

÷÷ रुको जरा एक मिनट।'' मीनू उठी, ÷÷ मिट्ठू देर से टांय टांय कर रहा है। उसके डिनर का समय हो गया है!'' उसने कटोरी से भिंगोये चने, हरी मिर्च, रोटी का टुकड़ा लिये और पिंजड़े में डाल दिये। तोता मारे खुशी के उछलता और शोर मचाता रहा इस बीच। पम्मी और टूटू ने सिर उठा कर एक बार देखा और फिर अपनी अपनी कुर्सी पर सो गए!

÷÷ बैठो, जा कहां रही हो?'' सरला को खड़ी देख कर मीनू बोली!

÷÷ बैठ कर क्या करूंगी, आप बताएंगी तो है नहीं!''

÷÷ क्या?''

÷÷ यही कि आपने शादी क्यों नहीं की? इस उमर में भी जब आप ऐसी हैं तो पन्द्रह साल पहले? सिर्फ सुनती हूं लोगों से - तरह तरह की बातें....''

÷÷ छोड़ो, जाने दो। कुछ नहीं रह गया है बताने को।'' मीनू सिर झुकाये बुदबुदायी। गले से एक लम्बी सांस निकली, और आंखों के सहारे छत के पंखों पर जा टिकी। वह हल्के से मुसकरायी और सूनी आंखों सरला को घूरती रही - ÷÷ प्यार कोई क्यों करेगा? क्या करेगा? जब तक जाति और धर्म है तब तक कोई क्या करेगा प्यार? इसी, नासमझी का नतीजा भोगा मैंने। लेकिन अपने को रोकना अपने वश में था क्या? हम छः लड़कियां थीं और एक साथ किराए पर कमरे लेकर रहती थीं। एक कमरे में दो दो। वहीं से जाती थी कालेज पैदल! बीच में पड़ता था एक मिशनरी हास्पिटल! उसी के गेट के पास खड़ा रहता था माइकेल कर्मा। लम्बा पतला। ताम्बई रंग। नीग्रो जैसे उभरे कूल्हे और चीते जैसी कमर। टी शर्ट और जीन्स में। ठोढी पर थोड़ी सी दाढ़ी और सिर पर खड़े बाल! नगर में सबसे अलग।''

उसने फिर उसांस छोड़ी और अपने पैरों की - फर्श की तरफ देखने लगी - चुप! उसकी आंखें भर आयीं - '' मर्द की देह का भी अपना संगीत होता है। राग होता है! उसके खड़े होने में, मुड़ने में, चलने में, देखने में। बोले - न बोले, सुनो तो सुनायी पड़ता है! उस राग को तुम्हारा मन ही नहीं सुनता, तुम्हारे ओंठ भी सुनते हैं, बाहें भी सुनती हैं, कमर भी, जांघें भी, नितम्ब भी - यहां तक कि छातियां भी। ÷ निपुल्स' कभी कभी ऐसे क्यों अपने आप तन जाते हैं जैसे कान लगा कर सुन रहे हों - बिना उसकी देह को छुए? वह तीन महीने तक वहीं खड़ा रहा मेरे आते जाते समय! और जैसे सुबह सुबह अचानक पत्ते पर ओस की बूंद थरथराती और चमकती दिखायी पड़ती है, वैसे ही मैं थी पत्ते की तरह! कब इतनी ओस गिरी कि मैं भींग कर तरबतर हुई - मुझे पता नहीं! सिर्फ इतना पता है कि मैं तो सिर्फ भींगी थी, माइकेल तो डूब चुका था!''

एक दिन सहसा मैंने खुद को उसकी मोटरबाइक के पीछे बैठा पाया। पूछा - ÷÷ कहां जा रहे हो?'' उसने कहा - ÷÷ मालूम नहीं!'' मैं बैठी नहीं थी, उड़ रही थी उसके डैनों के सहारे! वह आदिवासी - जंगल का पत्ता पत्ता उसे जानता था, हर पगडंडी उसे पहचानती थी। उसने एक बाजरे के खेत में बाइक खड़ी कर दी - ÷÷ उतरो, मैं तुम्हें देखना चाहता हूं।'' मैं कुछ कहूं, रोकूं टोकूं इसके पहले ही उसने मेरी साड़ी खोल दी। बोला - ÷÷ ब्लाउज खोल दो, नहीं तो बटन टूट जाएंगे।'' ब्रा उसी ने खोले - ÷÷ हठ करके! ÷÷ बस हिलो मत!'' दो कदम पीछे हट गया उलटे पांव और ऊपर से नीचे तक देखा। मैं अपने हाथों से खुद को ढंकने की कोशिश किये जा रही थी लेकिन बेकार! ÷÷ कहो तो छू भी लूं जरा सा।'' हालत ऐसी थी कि कौन कहे और कौन सुने? थोड़ा सा झुक कर उसने अपने ओठों से छातियों की खड़ी घुंडियों को बारी बारी से दबाया, चूमा और सहलाया जीभ से और कहा - ÷÷ चलो, पहनो अब?''

÷÷ अब कहां?'' उसने उत्तर दिया - ÷÷ विंढम फाल! कोई नहीं होगा इस वक्त! वहीं नहाएंगे!''

÷÷ कपड़े कहां लाये हैं?''

÷÷ नहाने के लिए कपड़ों की क्या जरूरत?''

मीनू बोलती भी रही , लजाती भी रही। कभी चेहरा लाल होता, कभी स्याह पड़ता। कभी आंखें झुकतीं, कभी खुलतीं, कभी बंद होतीं! वह आगे बताने से पहले हिचकिचायी थोड़ी - ÷÷ बाइक कहां छोड़ी, झरने के मुहाने पर कैसे पहुंचे - एक रहस्यलोक था मेरे लिए और वहां एक दिन एक रात रुक कर क्या क्या किया, क्या क्या हुआ यह न पूछो। वह सब जैसे पिछले जन्म की बातें हों। माइकेल के साथ ही हम आदिवासी नहीं, आदिमानव हो गये थे। आदमजात नंगधड़ंग। जंगलों में, नदियों के किनारे। पेड़ों के गिर्द गिलहरियों की तरह दौड़ते भागते रहे। खरगोशों की तरह उछलते कूदते रहे। झरने में मछलियों की तरह तैरते नाचते रहे। धारा के बीच पत्थरों पर मगर घड़ियाल के बच्चों की तरह धूप सेंकते रहे! क्या क्या नहीं किया हमने? कहते हुए शर्म आ रही है मुझे कि दूसरे दिन दोपहर से पहले ही उसी के शब्दों में कहूं तो मेरा सोता रिसने लगा लेकिन उस हालत में भी नहीं छोड़ा उसने। इसे ऐसे समझो कि जब मैंने ही नहीं छोड़ा तो माइकल क्यों छोड़ता? ..... तो वह एक दिन एक रात! बस वही मेरी जिन्दगी है।''

सरला सिर झुकाये सुनती रही। मीनू के चुप हो जाने के बाद पूछा - ÷÷ फिर?''

÷÷ फिर क्या?'' गये तो दो बार और, लेकिन पिकनिक के सीजन में - भीड़भाड़ में और वही गलती हुई। जाने कैसे खबर लग गयी पिता जी को। एक दिन वे आये और कहा - ÷ अब बहुत कर लिया बीएड., घर चलो!' रो धोकर किसी तरह इम्तहान दिया और यही भाई था मेरा बाडीगार्ड, जो हर महीने रंगदारी टैक्स ले जाता है!''

÷÷ लेकिन शादी क्यों नहीं की उससे?''

÷÷ शादी जब पिता जी ने करनी चाही, तो मैंने नहीं की और जब मैंने करनी चाही तो काफी देर हो चुकी थी! और यह भाई! अगर कर लेती तो इसके आय के स्रोत का क्या होता? नहीं होने दी इसने किसी न किसी बहाने।''

÷÷ नहीं, मैं यह पूछ रही हूं कि माइकेल से क्यों नहीं की?''

÷÷ माइकेल!'' वह उदास हो गयी, ÷÷ सोचा था कि अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद करूंगी। और खड़ी भी हो गयी पैरों पर! उसकी मानसिक हालत मुझसे भी बुरी थी और जल्दी मचा रहा था। हमने योजना बना ली, तारीख तय कर दी - पहले मंदिर, फिर चर्च, कि सुना - विंढम में उसने काफी ऊपर से छलांग लगा ली! लोग छलांग लगाते हैं स्विमिंग पूल में, नदी में, तालाब में - नुकीले चुखीले पत्थरों से पटे झरने में छलांग लगाते कभी किसी को नहीं सुना! वह इतना मूर्ख भी नहीं था। यह रहस्य छोड़ गया वह जाते जाते कि वह छलांग ही थी या कुछ और?''

÷÷ मान लीजिए अगर वह जीवित रहता और उससे शादी कर लेतीं तो?''

÷÷ तो?''

÷÷ तो संतुष्ट रहतीं, सुखी रहतीं?''

÷÷ देखो सल्लो, सवाल तो बेवकूफाना है। यह कौन बता सकता है कि ऐसा होता तो कैसा होता? जो हुआ ही नहीं, उसके बारे में क्या कहना? हां, यही सवाल पहले कभी किया होता तो उत्तर शायद दूसरा होता। समय के साथ सोच भी बदलती जाती है। आज मैं यही कह सकती हूं कि प्यार को प्यार ही रहने दो। उसे ब्याह तक न ले जाओ या ब्याह का विकल्प मत बनाओ। अपने ही बगल में बेला पटेल से पूछो। उसने जिसे प्यार किया उसी से शादी की। अब पांच साल बाद फिर प्यार के लिए क्यों बेचैन है?''

÷÷ सुनो, प्यार एक अनवरत खोज है। खोज किसी और की नहीं, खुद की! हम स्वयं को दूसरे में ढूंढ़ते हैं, एक बिछड़ जाता है या छूट जाता है तो लगता है जिन्दगी खत्म। जीने का कोई अर्थ नहीं रह जाता! आंखों के आगे शून्य और अंधेरा! हर चीज बेमानी हो जाती है। लेकिन कुछ समय बाद कोई दूसरा मिल जाता है और नये सिर से अंखुआ फूट निकलता है! यह दूसरी बात है कि दूसरा भी स्वयं को ढूंढ़ते हुए टकराता है! सच कहो तो प्यार की खूबसूरती हर बार उसके अधूरेपन में ही है! उसकी यानी प्यार की उम्र जितनी ही छोटी हो उतनी ही चमक और कौंध! अगर लम्बी हुई तो सड़ांध आने लगती है! यह जरूर है कि इसे छोटी या लम्बी करना हमारे वश में नहीं होता।''

सरला का दिमाग चकराने लगा। बहुत देर से बैठे बैठे या सुनते सुनते जबकि शुरू इसी ने किया था। मीनू ने भांपा और पूछा - ÷÷ क्या बात है? क्या सोच रही हो?''

सरला दयनीय हंसी के साथ बोली - ÷÷ कुछ नहीं! आपने बढ़ा दी मेरी उलझन!''


( ७)

जिस दिन मैनेजर कालेज आये उस दिन रघुनाथ गाजीपुर गये थे - सरला के लिए लड़का देखने!

बीसेक रोज बाद फिर मैनेजर कालेज आये , अबकी फिर रघुनाथ बाहर। आजमगढ़ गये थे लड़का देखने।

यह पांचवां या छठां साल था! शादी हाथ में आते आते फिसल जाती थी! छः साल हो रहे थे लड़का ढूंढ़ते ढूंढ़ते! जैसे जैसे सरला की उमर बढ़ती जा रही थी , वैसे वैसे उनकी परेशानी बेचैनी और दौड़ धूप भी बढ़ती जा रही थी! शुरू किया था आई.ए.एस. और पी.सी.एस. से लेकिन उनके रेट इतने हाई कि जल्दी ही ठंढे पड़ गये! पच्चीस लाख से लेकर एक करोड़ तक - यह रकम उन्होंने सपने में भी नहीं देखी थी। भरोसा था तो अपनी बेटी के रूप गुण और योग्यता का जिसे न कोई पूछ रहा था, न देख रहा था!

इसी दौड़ धूप में उन्हें तो सिर्फ छः साल लगे थे लेकिन बेटी तीस से ऊपर चली गयी थी! नौबत यहां तक आ पहुंची थी कि अब जो लड़के मिल रहे थे , उनकी उमर बेटी से कम।

बेटी उस इलाके की पहली एम.ए.बी.एड.। सर्विस में आ गयी थी और जब से आयी थी आत्मविश्वास से भरपूर थी! पापा मम्मी की परेशानी देख कर कभी कभी मां से मजाक में कहती - ÷÷ पापा मेरे लिए लड़का ऐसे ढूंढ़ रहे हैं जैसे कोई गाय के लिए सांड़ ढूंढ़ता है।'' एक बार तो उसने मां बाप को मुंह लटकाये देख कर सीधे रघुनाथ से ही कहा - ÷÷ आप तो बाजार के नियम के विरुद्ध काम कर रहे हैं। जब कोई अपनी जिन्स बेचता है तो बदले में खरीदार से उसकी कीमत वसूलता है। और आप हैं कि अपनी जिन्स भी बेच रहे हैं और उसकी कीमत भी अदा कर रहे हैं।'' जब रघुनाथ ने उसे डांटा तो उसने कहा - ÷÷ पापा, आप खामखाह परेशान हैं, मुझे शादी ही नहीं करनी।''

हर लड़की ऐसा ही बोलती है - कभी मां बाप की चिन्ता देख कर, कभी शालीनता और संकोच में, कभी खिझलाहट में, कभी विवाह में देर होते देख कर - इससे रघुनाथ की परेशानी कम होने के बजाए बढ़ ही जाती थी!

ऐसे ही वक्त पर मैनेजर का प्रस्ताव आया था अपनी बेटी के लिए! जब वे निराश हो चले थे आजमगढ़ वाली शादी को लेकर! लड़का सेल्स टैक्स अफसर लेकिन खर्च लगभग दस ग्यारह लाख! उनके अपने इस्टीमेट से दुगुना। लेकिन मैनेजर की भलमनसाहत और बड़प्पन - कि मेरे रहते चिन्ता किस बात की? अपने बड़े बेटे के बरच्छा के नाम पर मुझसे दस लाख लेकर पहले बेटी की शादी कर लो, बेटे की बाद में कर लेना। ऐसे भी यह अच्छा नहीं लगता कि जवान बेटी घर में हो और बेटा शादी कर ले!

इसे कहते हैं बड़प्पन और इसी को कहते हैं भाग्य! कहां मैनेजर और कहां उन्हीं के कालेज के मास्टर रघुनाथ!

पूरे जनपद में फैल गयी थी यह खबर और हर आदमी इस मुहूर्त का इंतजार कर रहा था - कि संजय ने सारा कुछ मटियामेट कर दिया!

अब रघुनाथ कौन सा मुंह लेकर जाएं मैनेजर के पास ?

उसी बेटे ने - जिस बेटे पर उन्हें भरोसा और गुमान था - उसी बेटे ने उनकी जुबान काट कर उस सक्सेना को दे दी जिससे उनकी न जान थी, न पहचान थी!

 

किसी तरह से साहस जुटा कर रघुनाथ गये मैनेजर के घर।

बंगले के सामने बने अपने नये कॉटेज में बिस्तर पर अधलेटे मैनेजर किसी से फोन पर बातें कर रहे थे! उन्होंने रघुनाथ की ओर कोई ध्यान नहीं दिया! मैनेजर आधे घंटे तक कभी इससे कभी उससे बातें करते रहे फिर नहाने चले गये!

नहा धो और पूजा पाठ करके दो घंटे बाद आये तो रघुनाथ को बैठे हुए देखा।

÷÷ आये कैसे?''

÷÷ अपने स्कूटर से!''

÷÷ क्यों? कार कहां गयी?''

÷÷ कार कहां है?''

÷÷ क्यों? उसे अमेरिका ले गया क्या बेटा?'' हंसते हुए मैनेजर सोफा पर बैठ गये और टांगें मेज पर फैला दीं - ÷÷ मास्टर, शादी तुम्हारे बेटे ने की, बधाइयां मुझे मिल रही हैं। सभी बोल रहे हैं कि कितना अच्छा हुआ कि घटिया आदमी का समधी होने से आप बाल बाल बचे।''

रघुनाथ गुनहगार की तरह सिर झुकाये चुपचाप सुनते रहे।

÷÷ मास्टर, जो भी होता है, अच्छा होता है! शुरू से ही मेरे मन में हिचक थी! जो भी सुनता था, अचरज करता था और आपके भाग्य को सराहता था! कहते थे लोग कि क्या देख कर शादी की सोची है आपने? कोई तो मेल हो? कहीं तो मेल हो? सभी रिश्तेदार, दोस्त मित्रा नाखुश! मैंने कहा - नहीं, संकट में है रघुनाथ! चाहे जैसा हो, है तो मेरे ही कालेज का? ऐसे वक्त पर मैं मदद नहीं करूंगा तो कौन करेगा? तो मैंने वह करना चाहा जो मेरे जमीर ने कहा। लेकिन तुम्हारी किस्मत ही खोटी थी तो मैं क्या करता?'' वे रुक कर बाहर देखने लगे!

बाहर दरवाजे के सामने ही बोलेरो खड़ी थी और घुर्र घुर्र कर रही थी! शायद कहीं जाना था मैनेजर को! उन्होंने ड्राइवर को डांट कर गाड़ी चुप करायी।

बंगले और कॉटेज के बीच टिन का लम्बा शेड था जिसके नीचे कार , टै्रक्टर, ट्राली और मोटरबाइक साइकिलें खड़ी थीं। बोलेरो वहीं से लायी गयी थी।

÷÷ रघुनाथ, गलती तुम्हारे बेटे ने की लेकिन मुझे क्रोध उस पर नहीं, तुम पर है! इसलिए कि तुमने मुझसे छिपाया। तुम जानते हो मैं कभी किसी का अहित नहीं करता! जहां तक बन पड़ता है मदद ही करता हूं। बराबर ध्यान रखता हूं कि अपनों को कोई तकलीफ न हो। लेकिन तुमने छिपाया और उसी का दुःख है और क्रोध भी है! तुम्हें बता देना चाहिए था कि तुम्हारा बेटा तुम्हारे कहने में नहीं है। यही नहीं, यह भी कह देने में कोई हर्ज नहीं था कि वह चरित्राहीन और भ्रष्ट है! यह घर की बात थी, मुझे बताने में किस बात का डर और संकोच? मैं तुम्हें खा तो नहीं जाता?''

रघुनाथ नीचे देखते हुए चुप रहे। उनमें यह साहस नहीं था कि कह दें - ये दोनों इल्जाम सरासर गलत हैं! लेकिन यह कहने पर अनर्थ हो जाता। मैनेजर का क्रोध क्या रूप लेता, कहना कठिन था! उन्होंने जलील होने में ही अपनी भलाई समझी और मैनेजर उसी रौ में सुनाते रहे।

÷÷ अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है कि तुम्हारे बेटे ने तुम्हारे साथ क्या किया है? अपनी नासमझी में तुम्हें कितनी मुसीबत में डाल दिया है। तुम्हारी बेटी अभी कुंवारी है। ईश्वर न करे कि कुंवारी ही रह जाय! ऐसा अकारण नहीं कह रहा हूं! तुम्हें तब पता चलेगा जब बेटी के लिए वर देखने निकलोगे! जहां जाओगे, और बातों से पहले लोग यही पूछेंगे कि आपके रिश्ते कहां कहां हैं? बताना तो पड़ेगा ही कि बेटे ने कायथ लड़की से शादी की है, समधी लाला है! बताओगे या छिपा जाओगे? ऐसी बातें छिपती तो हैं नहीं! तुम छिपाओगे तो वे दूसरे से पता कर लेंगे! जानते ही हो, जो भी रिश्ता करता है, ठोंक बजा के करता है!''

रघुनाथ उठ खड़े हुए और हाथ जोड़ दिये - ÷÷ ठीक है, चलता हूं।''

÷÷ अरे बैठो। ऐसी क्या जल्दी?''

÷÷ नहीं, जरूरी काम है, अब देर हो रही है!''

÷÷ अच्छा, जाओ।'' मैनेजर भी साथ में उठ खड़े हुए - ÷÷ अच्छा यह बताओ, तुम्हारा रिटायरमेण्ट कब है?''

रघुनाथ चौंके और उन्हें देखने लगे!

÷÷ इसलिए पूछा कि प्रिंसिपल साहब ने बताया - तुम्हारा मन नहीं लग रहा है पढ़ाने में। अक्सर क्लास छोड़ रहे हो और बाहर ही रहते हो!''

÷÷ ऐसा तो नहीं है! जरूरत पड़ने पर एक्स्ट्रा क्लासेज लेता हूं और कोर्स पूरा करता हूं! रिजल्ट कभी खराब नहीं आता मेरे लड़कों का!''

÷÷ ठीक है! मगर मैं दो बार गया इस बीच और दोनों बार पाया गैरहाजिर! खैर, यह आप और पिं्रसिपल साहब के बीच की बातें हैं, हमसे क्या मतलब?'' कहते हुए मैनेजर बोलेरो में बैठ गये!

रघुनाथ कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रहे!

गाड़ी के स्टार्ट होने के पहले मैनेजर ने नौकर को आवाज दी - ÷÷ भोलू! मास्टर साहब खाना चाहें तो खिला देना, हमें देर हो सकती है!''

रघुनाथ लौट पड़े। उन्हें बार बार लग रहा था कि आकर उन्होंने गलती की - कि नहीं आना चाहिए था!

 

( ८)

सरला घर आयी - छुट्टी के दिन। रविवार को।

पहले वह अक्सर आती थी। शनिवार की शाम को आती थी , रविवार को रहती थी और सोमवार को तड़के चली जाती थी! मिर्जापुर से घर की दूरी है ही कितनी? बीच में बनारस में एक बस बदलनी पड़ती थी - बस! लेकिन साल दो साल से आना उसने एकदम से कम कर दिया था! इसलिए कि सरला को लगता था कि उसके आने पर मां बाप खुश होने के बजाय चिन्तित और परेशान हो उठते हैं, जैसे बेटी नहीं, समस्या आ गयी हो; जैसे कह रही हो - लो, देख लो! बुढ़िया तो हो गयी, अब भी नहीं तो कब करोगे शादी?

रघुनाथ गाजीपुर आजमगढ़ होते हुए सुबह ही लौटे थे!

वे अपनी ओर से मन बना कर आये थे - दोनों में से एक; जिसे शीला और सरला ÷ हां' कर दें। वे दोनों के बारे में शीला से बात कर चुके थे। खर्च के मामले में दोनों महज बीस उन्नीस की शादियां थीं! आठ से दस लाख के बीच। वे साल भर से लगे हुए थे इनके पीछे और अब ÷ फाइनल' करने का समय आ गया था।

आजमगढ़ का लड़का ÷ सेल्स टैक्स अफसर' । फिलहाल इलाहाबाद में कार्यरत। खानदानी कुलीन स्वतंत्राता सेनानी वीर कुंवर सिंह का रिश्तेदार। पिता काशी ग्रामीण बैंक में खजांची। ÷ ईमानदारी' और ÷ मददगार' की छवि बनाये रखने के साथ पांच साल के अंदर आजमगढ़ शहर में दुमंजिली कोठी! लड़के के दो छोटे भाई और दो छोटी बहनें। मां जीवित। लड़का कुछ नहीं तो कम से कम एडीशनल कमिश्नर होकर रिटायर करेगा। उसने अनौपचारिक रूप से लड़की देख ली थी और पसंद की थी।

लड़के की तरफ से मामला फंसा हुआ था लड़की की नौकरी को लेकर - कि दोनों में से नौकरी कोई एक ही करेगा। लड़की अगर नौकरी करना भी चाहे तो तब करे जब बच्चे स्कूल जाने लायक हो जायं! यह शर्त ऐसी थी जिसे सरला मानेगी - इसमें संदेह था रघुनाथ को।

कुछ बातों को लेकर शीला भी असमंजस में थी - लड़का सबसे बड़ा बेटा। दो देवर होंगे और दो ननदें। देवरों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ सकती है भाभी को! ननदें स्वभाव से ही किचकिची होती हैं - जलने वाली और एक न एक बखेड़ा खड़ी करने वाली! झंझटिया! बड़ी होने के कारण उनके शादी ब्याह में कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा! सास भी अभी मरी नहीं है - झगड़ालू और हर बात में मीन मेख निकालने वाली हुई तो भारी मुसीबत! हो सकता है, बुढ़ौती बड़ी पतोह के साथ काटने की सोचे! सरला अलग नौकरी करती रहे तब भी ये झंझटें कम नहीं होने वाली। उसने तय किया था कि बेटी से समझ बूझ कर ही फैसला करना ठीक होगा!

दूसरी शादी गाजीपुर की। इससे उलट। लड़का इलाहाबाद में पांच साल से कोचिंग करते हुए लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं दे रहा था! आई.ए.एस. की भी और पी.सी.एस. की भी! पिछली बार इंटरव्यू तक जाकर छंटा था! गोरा , लम्बा, खूबसूरत। देर सबेर कहीं न कहीं चयन निश्चित था। रघुनाथ दुबारा वह गलती नहीं दुहराना चाहते थे जो एक बार कर चुके थे। दो साल पहले! जब लड़का कम्पटीशन दे रहा था तो शादी मुफ्त थी, बेरोजगार समझ कर नहीं की इन्होंने लेकिन जब तीन महीने बाद ही ÷ सेलेक्ट' हो गया तो कीमत पचास लाख! हाथ से निकल गयी शादी।... तो इसे कुछ न कुछ बनना ही है देर सबेर! पिता जीवन बीमा निगम में उपप्रबंधक! बेटा इकलौता - न भाई, न बहन! पिता के एक बड़े भाई - वह भी नावल्द! उनकी भी सम्पत्ति इसी को मिलनी है!

शीला का झुकाव इसी शादी की ओर था! इससे भी छोटा परिवार क्या मिल सकता है किसी को ? न ननद की झंझट है, न देवर की। जहां चाहो, वहां रहो। जैसे चाहो, वैसे रहो! जो चाहो, वह करो। न कोई देखने वाला, न रोकने वाला। नर्सिंग होम और अस्पताल की जरूरत हुई तो सास हाजिर! बुढ़ऊ को छोड़ कर सास न जा पाये, तो मां है ही! जितनी ससुराल, उतना ही मायका - दोनों तुम्हारे।

रघुनाथ का नजरिया कुछ और था! उन्हें आजमगढ़ वाले की पक्की नौकरी और भरा पूरा परिवार ज्यादा आकृष्ट कर रहा था! लेकिन उन्होंने निर्णय सरला पर छोड़ रखा था!

सरला ने पिता को देखा - इन्हीं चंद दिनों में कितने बदल गये पिता? गंजे हो गये हैं। सिर से बाल उड़ गये हैं - कनपटियों को छोड़ कर। सामने के दो दांत जाने कब उखड़ गये! ठोकर बैठ गया है! थोड़ा और झुक गये हैं और बूढ़े की तरह चलने लगे हैं।

पिता ने भी बेटी को देखा - वह भी बदली बदली सी लग रही जाने क्यों? अबकी उन्हें वह कोई लड़की नहीं, युवती दिखायी पड़ी। उसे समीज सलवार में देखने की आदत पड़ गयी थी उन्हें - शायद! लेकिन उसका जो चेहरा इतना उदास और सूखा रहता था, वह इतना हरा भरा और प्रसन्न क्यों? यही नहीं, दुबले पतले शरीर में भी भराव और आकर्षण आ गया था। ऊबड़ खाबड़ समतल सीने पर गोलाइयां उभार के साथ पुष्ट नजर आ रही थीं! रघुनाथ का अनुभव बता रहा था कि ऐसा किसी मर्द के संसर्ग और हथेलियों के स्पर्श के बगैर सम्भव नहीं लेकिन मन कह रहा था कि ऐसा खाने पीने की सुविधाओं और निश्चिन्तताओं के कारण है! उन्होंने साड़ी ब्लाउज में खड़ी अपनी बेटी को आजमगढ़ वाले की नजर से देखने की कोशिश की।

सरला उन दोनों शादियों के बारे में गम्भीरता से सुनती रही! देर तक।

÷÷ हां बोलो, इनमें से कौन पसंद है तुम्हें?'' रघुनाथ ने अंत में पूछा।

÷÷ कोई नहीं! उनसे कहिए वे जहां चाहे, वहां करें मुझे नहीं करनी!''

÷÷ क्या?'' रघुनाथ अवाक्‌! उनकी आंखें फटी रह गयीं। वे एकटक देखते रहे - ÷÷ सात सालों से यही सुनने के लिए दौड़ता रहा?''

रघुनाथ निखहरी खटिया पर बैठे थे और शीला सरला बगल में पड़ी प्लास्टिक की कुर्सियों पर। संध्या की छाया आंगन में उतर आयी थी। सरला मां बाप की सबसे प्यारी दुलारी बेटी थी और मुंहलगी भी! रघुनाथ ने बेटों से दूरी बनाये रखी थी, लेकिन बेटी से नहीं! जो बातें किसी से नहीं कर पाते थे, वे भी बेटी से कर लेते थे। बेटी बाप का लिहाज तो करती थी लेकिन कुछ कहने सुनने में संकोच नहीं करती थीं!

÷÷ मैंने तो कभी नहीं कहा कि आप दौड़ें! फालतू में दौड़ा करें तो इसके लिए मैं क्या करूं? पूछिए मां से, कई बार कहा है कि मुझे नहीं करनी शादी!''

÷÷ नहीं करनी है तो क्या अकेले रहना है - इसी तरह?''

÷÷ मैंने यह कब कहा है? मैंने सिर्फ यह कहा है कि मुझे ऐसी शादी नहीं करनी है जिसमें लेन देन और मोल भाव होता हो?''

÷÷ कौन सी शादी है जिसमें यह सब नहीं होता? क्या संजय में नहीं हुआ?''

÷÷ उसकी बात छोड़िए, वह तो शादी नहीं, सौदा था!''

÷÷ तुम कहना क्या चाहती हो आखिर?'' रघुनाथ ने आंखें तरेर कर उससे पूछा और चुप देख कर खटिया पर पसर गये ! थोड़ी देर शांत रह कर उन्होंने कहा - ÷÷ शीला, समझाओ इस लड़की को! शहर में रह कर इसका दिमाग खराब हो गया है!''

शीला सिर झुकाये शुरू से ही लोर बहा रही थी। अपना नाम सुनने के बाद तो हिचकियां लेने लगी - ÷÷ तुम्हीं ने सिर चढ़ाया है, तुम्हीं भुगतो! जब इसने बी.ए. किया था तभी मैंने कहा था कि कर दो इसकी शादी! तो नहीं, अभी पढ़ेगी। एम.ए. किया तो फिर कहा कि बहुत हो गया, अब कर दो! तो नहीं, अपने पैरों पर खड़ी होगी हमारी बेटी! नौकरी करेगी। अब देखो इसका रंग ढंग? मैंने कहा था तुमसे कि दुनिया का चक्कर लगाने से पहले पूछ लो अपनी लाडली से एक बार। नहीं पूछा, अब भोगो!''

÷÷ पापा, नाराज न हों तो मैं कुछ कहूं।'' सरला सहज थी। परेशान मां बाप थे, सरला नहीं - ÷÷ आप और मां मेरी आंखें हैं जिनसे मैंने दुनिया देखनी शुरू की थी। उन्हीं से मैंने देखा कि मर्द एक बैल है जिसे मुश्तकिल खूंटा चाहिए - अपने विश्राम के लिए! वह खूंटा आपके लिए मां थी और सच सच बोलिए, क्या मां आपके लिए विवशता नहीं थी?''

÷÷ बंद करो यह बकवास?''

÷÷ पापा, मैंने आपकी वह जिन्दगी भी देखी है जो सबने देखी है लेकिन मैंने थोड़ी बहुत वह जिन्दगी भी देखी है जो आपने चोरी से जी है। शायद हर आदमी इस तरह की दो जिन्दगियां जीता हो - एक वह जिसे दुनिया देखती है, दूसरी वह जिसे सिर्फ वह देखता है। चोरी की जिन्दगी - जिसे केवल वही देखता और जानता है! मुझे लगता है कि आदमी की असल जिन्दगी वही होती है जिसे वह चोरी से जीता है, दिखावे वाली नहीं। ..... आज इतने दिनों बाद मैं समझ सकी हूं कि जब मैं हाईस्कूल में थी तो मिसेज रेखा मैडम क्यों मुझे इतना प्यार करती थीं और आपके लिए चिन्तित रहती थीं।'' यह अंतिम वाक्य अंग्रेजी में और धीमे से बोली थी सरला जिसे शीला ने तो नहीं समझा या सुना लेकिन रघुनाथ गुस्से में उठ बैठे - ÷÷ बकवास बंद करो, साफ साफ बताओ तुम्हें शादी करनी है या नहीं?''

÷÷ जब करनी होगी तो कर लूंगी, आप क्यों परेशान है?''

÷÷ इसलिए कि हम जिन्दा हैं, मर नहीं गये !''

÷÷ आप नहीं कर पायेंगे पापा! हम जानते हैं आपको, इसलिए छोड़िए!''

÷÷ जब संजय को बर्दाश्त कर लिया तो तुम्हें भी कर लेंगे, बोलो तो!''

सरला थोड़ी देर चुप रही और रघुनाथ को देखती रही - ÷÷ किसी सुदेश भारती की याद है आपको?''

÷÷ एक तो वही है तुम्हारे मिर्जापुर का एस.डी.एम.!''

÷÷ कोई दूसरा भी है?''

रघुनाथ ने दिमाग पर जोर डाल कर कहा - ÷÷ एक कोई भारती भारती करके था जो तुम्हारे साथ एम.ए. में पढ़ता था।''

÷÷ और उसकी तारीफ करते थे आप! वही आपको लेकर बाजार जाता था!''

÷÷ हां, अच्छा लड़का था। मगर चमार था!''

÷÷ मिर्जापुर वाला वही भारती है! जिसे आप अच्छा कहते थे।''

÷÷ तो?'' रघुनाथ विस्मय से उसे घूरते रहे!

÷÷ तो क्या? उसके साथ मेरी शादी करेंगे आप?''

रघुनाथ खटिया पर फिर पसरें , इसके पहले ही शीला फफक कर रोने लगी! रघुनाथ ने आकाश की ओर दोनों हाथ उठाये - ÷÷ हे भगवान! यह क्या कर रहे हो मेरे साथ! लाला तक गनीमत थी लेकिन अब? मैं क्या करूं? किसे मुंह दिखाऊं? .... वे पागल की तरह अनाप शनाप बक झक करने लगे!

÷÷ इससे तो अच्छा है कि कुंवारी ही रह!'' शीला ने रोते हुए कहा!

÷÷ मां, ये तो सात साल से लोगों के दरवज्जे दरवज्जे घिघियाते फिर रहे हैं और इतने ही सालों से वह मेरी आरजू मिन्नत कर रहा है - पूरे सम्मान और इज्जत के साथ! कोटे में ही सही, लेकिन पी.सी.एस. है। देखने सुनने में भी किसी से कम नहीं। मेरी नौकरी से भी उसे एतराज नहीं! कभी कोई बदतमीजी भी नहीं की मेरे साथ! कोई ऐसा वैसा ऐब भी नहीं उसमें! मैंने अब तक ÷ हां' नहीं की है लेकिन सोच लिया है कि करूंगी तो उसी के साथ!''

÷÷ उसके बाद लौट कर कभी पहाड़पुर मत आना! अपना थोबड़ा मत दिखाना। यह याद रखो!'' रघुनाथ खड़े हो गये - ÷÷ अब जाओ यहां से! कोई जरूरत नहीं तुम्हारी! मर गये मां बाप!''

÷÷ रात हो रही है। इस वक्त कहां जाएगी?'' शीला बोली!

÷÷ चाहे जहां जाओ, जाओ!''

सरला मुसकराती बैठी रही - ÷÷ अभी कहां की है? अभी तो रह सकती हूं।''

 

( ९)

सरला चली तो गयी , लेकिन रघुनाथ का सुकून और चैन लिये गयी।

रघुनाथ कई रातों तक सो नहीं सके! उन्हें नींद ही नहीं आ रही थी! जाने किन जन्मों का पाप था जो इस जन्म में भोग रहे थे। बच्चों को ऐसे संस्कार कहां से मिले - यह उनकी समझ से बाहर था। संजय को कोई नहीं मिली - न ठाकुर, न बामन, न भूमिहार; मिली तो लाला की लड़की! फिर भी वे इस लायक थे कि मुंह दिखा सकें! लेकिन यह सरला? वे किसे मुंह दिखायेंगे! कहां मुंह दिखायेंगे?

लड़की के अपने तर्क थे जिन्हें वह जाते जाते सुना गयी थी! जो भी गलत काम करता है , उसके पक्ष में तर्क गढ़ लेता है! उसने भी गढ़े थे - आप दूसरों की शर्तों पर शादी कर रहे थे, यहां मैं करूंगी लेकिन अपनी शर्तों पर; आप मेरी ÷ स्वाधीनता' दूसरे के हाथ बेच रहे थे, यहां मेरी ÷ स्वाधीनता' सुरक्षित है; आप ÷ अतीत' और ÷ वर्तमान' से आगे नहीं देख रहे थे, हां मैं ÷ भविष्य' देख रही हूं जहां ÷ स्पेस' ही स्पेस है।

स्पेस ही स्पेस , हुहं! स्पेस माने क्या? ÷ आरक्षण' और ÷ कोटा' के सिवा भी, इसका कोई मतलब है? यही न कि न होता आरक्षण तो यही भारती किसी न किसी का हल जोत रहा होता या पढ़ने लिखने के बावजूद नगर में रिक्शा खींच रहा होता! तुम्हीं कहती थीं कि एकदम गधा है, कुछ नहीं समझता। आज पी.सी.एस. हो गया तो उस जैसा कोई नहीं?

वे अपने मन की भड़ांस निकालने के बाद हल्का महसूस कर ही रहे होते कि पीछे से किसी की आवाज सुनायी पड़ती - ÷÷ अरे मास्साब! दामाद जी का क्या हाल है?'' और धीरे धीरे उन्हें लगता कि यह आवाज सिर्फ पीछे से नहीं, आगे से भी - बायें दायें से भी, ऊपर नीचे से भी आ रही है! चारों ओर से! गांव घराना, पास पड़ोस, जान पहचान का हर आदमी उनके दामाद के लिए चिन्तित है और उनसे मसखरी कर रहा है! इसी बीच जाने किघर से किसी बच्चे की किलकारी सुनायी पड़ती और वह चहकता हुआ उनकी ओर अपनी नन्हीं नन्हीं बाहें फैला देता - ÷÷ नाना! यह देखो, क्या है?'' वे उसके हाथ से एक कागज लेते जो उनकी गैरहाजिरी में चमटोल से झूरी दे गया था। यह निमन्त्राण पत्रा था झूरी की पोती की शादी का! .... तो अब यही उनकी बिरादरी और भवद्दी है! न्यौता हंकारी और खान पान अब उन्हीं के साथ होना है, गया अपना कुनबा।

निश्चय किया रघुनाथ ने कि अब वे ÷ वालण्टरी रिटायरमेण्ट' ले लेंगे! उन्होंने शीला से अपनी यह इच्छा जाहिर की कि अब इसकी - नौकरी की जरूरत नहीं! यह नहीं बताया कि उन्हें ÷ वी.आर.एस.' और ÷ सस्पेन्शन' में से एक चुनना है और इनमें से यही ठीक है जो वे करने की सोच रहे हैं।

चांदनी रात थी अगहन की।

आकाश साफ था। आधा आंगन चांदनी में था , आधा उसकी छाया में। चांद सीधे रघुनाथ के चेहरे को देख देख कर मुसकरा रहा था। वे उसके जल्दी खिसक जाने की उम्मीद कर रहे थे लेकिन वह अपनी जगह से हटने का नाम नहीं ले रहा था। वे उसे एकटक देखते रहे और उन्हें लगने लगा - जैसे चांद दर्पण हो और उसमें दिखायी पड़ने वाले धब्बे उन्हीं के चेहरे की झाइयां!

गांव के छौरे के पार से ही शुरू हो जाते थे ईख और अरहर के खेत जहां से सियारों ने एकसाथ हुआं हुआं शुरू किया।

गांव से कुत्तों ने भी उसी भाव से जवाब दिया और बता दिया कि वे भी सोये नहीं हैं।

शीला की खटिया रघुनाथ के बगल में ही थी और वह सो रही थी!

पिछले कई दिनों से - कहिए रातों से यही हो रहा था। रघुनाथ रतजगा करते थे और शीला बातें करते करते सो जाती थी।

रघुनाथ उठ कर बैठ गये। अंजोरिया में उसके चेहरे को देखा! भरा भरा गोल गोरा चेहरा और नाक की कील पर चमकती हुई चांद की किरन। इससे पहले उन्होंने उसे हमेशा लेटते हुए देखा था , सोते हुए नहीं। वे एकटक निहारते रहे उसे। वह करवट लेटी थी और उसका चेहरा उन्हीं की ओर था! उनसे सात साल छोटी, मगर उम्र ने उसे भी नहीं छोड़ा था। उनके भीतर प्यार उमड़ आया - हां, अब भी खूबसूरत थी उनकी पत्नी! उन्हें लगा, उन्होंने कभी ठीक से प्यार नहीं किया उसे। जब भी जरूरत हुई, उसके साथ लेटे जरूर लेकिन प्यार नहीं किया कभी! उन्होंने हाथ बढ़ा कर उसके ब्लाउज का एक बटन खोला - चुपके से, फिर दूसरा, फिर तीसरा। सोयी हुयी छातियां जैसे नींद से जाग गयीं, कुनमुनायीं और उन्हें घूरने लगीं! बिस्तरे पर झुकीं झुकीं! उनमें जान बाकी थी।

वे उठे और उसके बगल में लेट गये! शीला ने जगह बनायी उनके लिए और आंखें बंद किये किये खुद को उनके हवाले कर दिया! आंखें खोलने की जरूरत ही नहीं थी , उनकी उंगलियां देह के हर कोने अंतरे से परिचित थीं। वे बहुत देर तक एक दूसरे की देह के अंदर उस ÷ चीज' को ढूंढते रहे जो जाने कब अपना बसेरा छोड़ कर चली गयी थी! रघुनाथ को लग रहा था कि नहीं, कहीं नहीं गयी है - कहीं न कहीं इस या उस देह में है जरूर - मगर अगर वह सचमुच होती तो और कहां जाती? परेशान होकर, थक कर उन्होंने अपना मुंह शीला की छातियों के बीच धंसा दिया और शांत पड़ गये।

÷÷ मन न कर रहा हो तो छोड़ो।'' शीला फुसफुसायी!

थोड़ी देर तक रघुनाथ कुछ नहीं बोले फिर एक हिचकी ली!

शीला को महसूस हुआ कि उसकी बायीं छाती से सरकती हुयी जो गरम चीज बिस्तर पर टपक रही है , वह आंसू है। रघुनाथ के आंसू! उसने उनकी नंगी पीठ सहलायी - आहिस्ता!

÷÷ मन तो कर रहा है, शरीर ही साथ नहीं दे रहा है!'' टूटी सांसों के साथ रघुनाथ ने कहा!

÷÷ तो इसमें दुःखी होने की कौन सी बात है? होता है ऐसा कभी कभी!''

÷÷ नहीं, यह कभी कभी जैसी बात नहीं लग रही है शीला!''

÷÷ बहुत तनाव में रहे हो इस बीच! इसलिए ऐसा है!''

÷÷ नहीं! नहीं, झूठी तसल्ली मत दो! मैं उस पगडंडी को पहचान गया हूं जिससे चल कर वह देह में घुसता है?''

÷÷ कौन वह?''

÷÷ बुढ़ापा।'' रघुनाथ बोले और फूट फूट कर रोने लगे!

शीला ने उन्हें पकड़ कर बिठाया और सांत्वना में कहा - ÷ ऐसा कुछ नहीं है दिमागी फितूर के सिवा। बेमतलब सोचते रहते हो रात दिन! मैंने कोई शिकायत की है कभी? और क्या चाहते हो? हमेशा जवान ही रहोगे? ऐसे, यह सब बेटी बेटों के लिए छोड़ो। हमारी तुम्हारी उमर थोड़े ही है यह सब करने की?...

 

अगले चौथे या पांचवें दिन शाम जब रघुनाथ कालेज से लौटे तो शीला ने खबर दी कि टेस्ट देकर धनंजय आ गया है! ऐसे , अगर वह खबर न देती, तब भी बरामदे में खड़ी बाइक देख कर वे समझ गये थे! कपड़े बदल कर जब वह बाहर आये तो धनंजय को देखा! पूछा - ÷÷ अब की कैसे हुए पर्चे?''

÷÷ बहुत अच्छा। निकाल लूंगा इस बार!''

÷÷ पांच साल से यही सुन रहा हूं! हर बार निकाल लेते हो!''

÷÷ एस.सी., एस.टी.कोटा और घटी सीटों पर तो मेरा बस नहीं। उसके लिए मैं क्या करूं!''

रघुनाथ ने उसका कोई जवाब नहीं दिया। इसी बीच शीला बाप बेटे के लिए चाय लेकर आयी। चुपचाप चाय पीते रहे! चुप्पी तोड़ी राजू ने ही - ÷÷ सुना है, आप समय से पहले ही ÷ रिटायरमेण्ट' लेने वाले हैं?''

÷÷ लेने वाले नहीं, ले लिया। आज ही चिट्ठी दे दी!''

÷÷ ऐसा क्यों किया आपने?''

÷÷ यह मुझसे नहीं, अपने भाई संजय से पूछो! शीला की ओर देखते हुए रघुनाथ बोले!''

÷÷ संजय तो है नहीं, हूं मैं - कोई फैसला लेने से पहले आपको हमसे बताना तो चाहिए था?;

÷÷ बताते तो क्या करते तुम?'' उनका चेहरा थोड़ी देर के लिए तन गया - ÷÷ एक की ÷ हां' देख ली, दूसरे की ÷ ना' नहीं सुनना चाहता! और अभी वह दिन नहीं आया है कि मैं तुम्हारी सलाह पर चलूं!''

धनंजय उन्हें देखता रहा! फिर मां की ओर देखा। शीला सिर झुकाये बैठी रही , कुछ नहीं बोली! ÷÷ आपको निर्णय लेते समय मेरे बारे में सोचना चाहिए था। अभी अधर में लटका है मेरा भविष्य!'' ÷÷ यही सोचते सोचते मैं बूढ़ा हो गया। तुम बालिग हो अब, अपना खुद देखो!'' रघुनाथ ने बहुत बेरुखी से कहा।

इस उत्तर से धनंजय कसमसा कर रह गया! उसने इस उम्मीद में मां की ओर देखा कि शायद वह कुछ कहें।

÷÷ आपको यह बुद्धि दीदी और संजय के समय क्यों नहीं आयी थी, मेरे ही समय क्यों आ रही है?'' शीला को बुरा लगा। उसने टोका - ÷÷ चुप रह राजू, कब क्या बोलना चाहिए, समझते नहीं क्या?''

÷÷ सब समझता हूं मां, इतना नासमझ नहीं हूं! पता नहीं क्यों, मुझसे ही चिढ़े रहते हैं ये! तुम जानती हो कि टेस्ट का कोई भरोसा नहीं, यही सोच कर मैंने नोएडा के एक ÷ मैनेजमेण्ट इंस्टीट्यूट' का पता किया। इंस्टीट्यूट तो और भी कई हैं लेकिन उनके रेट बहुत हाई हैं। यही है जो अच्छा भी है और अपनी सीमा का भी! दूसरों से डोनेशन तीन लाख लेकिन मुझसे ढाई ही ले रहा है! सब मिला कर एक साल का खर्च छः लाख पड़ रहा है! और अब? जब मेरा मामला आया है तो ये रिटायर होकर घर बैठ रहे हैं! अपने को मेरी स्थिति में रख कर सोचो ना?''

रघुनाथ सुनते हुए चुपचाप बैठे रहे!

शीला ने उन्हें देखा और उन्होंने शीला को। कोई किसी से नहीं बोला।

रघुनाथ उठ कर अंदर गये और थोड़ी देर बाद नोटों की गड्डियों के साथ बाहर आये।

÷÷ ये लो साढे+ चार लाख! बाकी के छः महीने में ले जाना!'' उन्होंने गड्डियां उसके आगे फेंक दीं और वहां से हट गये!

 

II

काफी समय लग गया रघुनाथ को घर पर रहने की आदत डालने में। वे रहे तो गांव में ही , लेकिन गांव के नहीं रहे।

गांव ही वह नहीं रहा तो वह गांव के क्या रहते ? पहाड़पुर जाना जाता था अपने बगीचों, बंसवार और पोखर के कारण - जहां चिड़ियों की चहचहाहट और गायों भैंसों के रंभाने और बैलों की घण्टियों की टनटनाहट से बस्तियां गूंजती रहती थीं लेकिन अब पेड़ कट गये थे, बंसवार साफ हो गयी थी और पोखर धान के खंधों में बंट गयी थी! बगीचे के बीच से एक नहर गयी थी जिसके किनारे प्राइमरी स्कूल खुल गया था। उसी के बगल में दवाखाना के लिए जमीन भी घेर ली गयी थी।

आम्बेडकर गांव हो जाने के बाद पहाड़पुर तेजी से बदल रहा था! गांव में बिजली आ गयी थी , केबुल की लाइनें बिछ गयी थीं, अखबार लेकर हाकर आने लगे थे। कुछ घरों में टी.वी., पंखें और फोन भी लग गये थे! छौरे पर खड़ंजा बिछा दिया गया था। खपरैलों के कुछ ही मकान रह गये थे, बाकी सब पक्के थे। जो पक्के नहीं थे, उनके आगे इर्ंटें गिरी नजर आती थीं।

रघुनाथ खुद को टी.वी. और अखबार में व्यस्त रखते थे। शौक तो उपन्यास पढ़ने का था लेकिन उपन्यास कालेज के पुस्तकालय में थे जहां जाना उन्होंने बंद कर दिया था! हां , वे ही उपन्यास दुबारा पढ़ रहे थे, जिन्हें कभी पढ़ चुके थे! महीने में एकाध बार नगर में पेंशन आफिस का चक्कर जरूर लगा लेते थे।

गांव में वे न किसी के यहां जाते थे , न उनके यहां कोई आता था। वे लड़कों बच्चों की लिखाई पढ़ाई के ही काम के आदमी समझे जाते थे, बाकी मामलों में फालतू। मगर सम्मान सब करते थे - छोटे बड़े सभी। बल्कि अगड़ों से ज्यादा पिछडे+ और दलित! इसलिए कि रघुनाथ उनके किताब कापी से लेकर दाखिले और फीस माफी तक जो भी कर सकते थे, अब भी करते थे! वे गांव घर के प्रपंचों और लफड़ों से निर्लिप्त बड़े सीधे, सरल और सज्जन आदमी के रूप में सबके प्रिय थे!

लेकिन वे सबके प्रिय नहीं थे। ठकुरान के - जिसे वे अपना घराना बोलते थे उसके, लड़के उन्हें नापसंद करते थे और इसके कारण थे -

एक तो , जब ÷ मंडल आयोग' लागू किया गया था तो उसका स्वागत करने वालों में कालेज में अकेले अगड़े अध्यापक रघुनाथ थे!

दूसरे , जब जब चमटोल के हलवाहे हड़ताल की धमकी देते थे, वे मानते थे कि यह वाजिब है और उनका हक है!

÷÷ उपाय क्या है, यह बताओ!''

÷÷ उपाय है! या तो उनकी मांगों पर सहानुभूति के साथ विचार करें या फिर एक टै्रक्टर खरीदें! और चूंकि हममें से कोई एक इस हैसियत में नहीं है कि अकेले खरीद सके इसलिए हल पीछे दाम बांध दें। सब लोग मिल कर खरीदें!''

ये बातें हुई थीं बब्बन कक्का के दरवाजे पर जब घराने के सभी बड़े छोटे जुटे थे!

÷÷ चलाएगा कौन? ड्राइवर के साथ हेल्पर चाहिए, खलासी चाहिए......''

÷÷ अपने ये लड़के जो पिछले सात आठ साल से कम्पटीशन के नाम पर गांव से नगर और नगर से गांव मोटरसाइकिल पर मटरगश्ती कर रहे हैं! जब नौकरी का कोई ठिकाना नहीं तो यही करें।'' रघुनाथ बोल तो गये लेकिन उन्हें तुरन्त अहसास हुआ कि गलती हो गयी!

लड़कों के चेहरे तमतमा उठे! आंखें लाल हो गयीं! लेकिन सामने बुजुर्ग थे वे कसमसा उठे! उनमें से कुछ रिसर्च कर रहे थे , कुछ कोचिंग कर रहे थे, कुछ के अंतिम चांस थे कम्पटीशन के, कुछ कम्पटीशन के इंटरव्यू की तैयारी कर रहे थे - वे बीच में किसी तरह की कोई बाधा नहीं चाहते थे! इस तरह का प्रस्ताव ही अपमानजनक था उनके लिए! यह तो कोई नहीं जानता कि किसके भाग्य में क्या लिखा है? और क्या कहेंगे लोग कि यही टै्रक्टर चलाने के लिए किया था एम.ए. और एमएससी. और पीएचडी.? इन्हें जो कहेंगे सो तो कहेंगे- आप को क्या कहेंगे? आप तो बाप हैं! सब लाज शरम घोल कर पी गये हैं क्या?

लेकिन उनमें से कोई बोले , उसके पहले ही आहत स्वर में बब्बन कक्का ने कहा - ÷÷ रग्घू! जाने दो, क्या कहें तुमसे? तुम्हारे बेटे इनकी हालत में होते तो आज ऐसा न बोलते!''

रघुनाथ उठे और घर चले आये - चुपचाप!

उन्हें दुःख यह था कि उन्होंने वहां वही बात की थी जो उन लड़कों के बाप खुद उनसे या आपस में या अपने बेटों से ही झल्ला कर कहते थे - निठल्ले! कामचोर! यह भी किसी से छिपा नहीं था कि ÷ कोचिंग' ÷ फार्म' ÷ टेस्ट' उनमें से कइयों के लिए नगर के दोस्तों से मिलने जुलने के बहाने थे! इसे रघुनाथ ही नहीं, उनके गार्जियन भी समझते थे कि ÷ कोटा' या ÷ आरक्षण' एक ऐसा कवच मिल गया है उन्हें, जिसका इस्तेमाल वे अपनी असफलताएं छिपाने के लिए करते हैं! लेकिन इन्हीं मुश्किलों का हल उन्होंने सुझाया तो बेटे ही नहीं बाप भी बुरा मान गये!

इसके बाद से न तो कभी किसी ने रघुनाथ को बुलाया , न उनसे पूछा और न उन्होंने सलाह दी! हां, उनके यहां एकमात्रा आने वाले रह गये थे छब्बू पहलवान। वे क्यों आते थे और वह भी शुरू से - इसका उत्तर न छब्बू के पास था, न रघुनाथ के पास! किसी के पूछने पर बस इतना कहते थे - ÷ अच्छा लगता है', ÷ शांति मिलती है' । वे जब भी आते थे - आते थे गांजा, भीगी साफी, चिलम, रस्सी के टुकड़े और माचिस के साथ! अकेले इतमीनान से दम लगाते और खटिया पर लेट रहते! इधर कुछ सधुआ गये थे। जब तब बोल उठते - ÷÷ मास्टर कक्का, पता नहीं काहें अब जीने का मन नहीं करता!'' एक बार उन्हें चुप और उदास देख कर रघुनाथ ने पूछा - ÷÷ क्या बात है छब्बू! इस तरह क्यों लेटे हो?'' छब्बू ने आंखें बंद किये हुए ही कहा - ÷÷ कक्का, आज भोरहरी में सपने में बजरंगबली आये थे। बोले, छब्बू! तुम जो पाप कर रहे हो, उसका प्रायश्चित भी तुम्हीं को करना होगा, दूसरे को नहीं।''

÷÷ जब तुम जानते हो कि पाप है तो क्यों करते हो?''

÷÷ मैं देखते ही बेबस हो जाता हूं मास्टर कक्का, क्या बताऊं आपसे?''

रघुनाथ दिसा फरागत के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे , बोले - ÷÷ लेकिन छब्बू, मैं एक बात तुमसे कह रहा हूं, याद रखना। जब तक उनकी हड़ताल चल रही है तब तक भूल कर भी चमटोल में कदम मत रखना! कोई भरोसा नहीं है किसी का!''

÷÷ बात तो सही कह रहे हैं कक्का, लेकिन एक बात मेरी भी सुन लीजिए! अगर ढोला बुलायेगी तो पत्थर पड़े चाहे बज्जर गिरे, मैं न सुनूंगा, न देखूंगा - चल दूंगा!

÷÷ जब तुम्हें किसी की मानना ही नहीं, तो जो इच्छा हो, करो!'' रघुनाथ बड़बड़ाते हुए सिवान की तरफ चले गए जिधर बब्बन सिंह का पपिंग सेट था!

यह हड़ताल का सातवां दिन था!

असाढ़ शुरू हो गया था और अबकी पानी जम कर बरसा था।

हलवाहों ने हड़ताल की थी ऐसे ही वक्त पर - खेत के जोत, बन्नी और केड़ा को लेकर। हड़ौरी ( हल जोतने की मजूरी) और खलिहानी को लेकर। बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे रेट पर काम करने से इनकार कर दिया था हलवाहों ने। बीच बीच में भी हड़तालें की थीं उन्होंने, लेकिन ठाकुरों ने थोड़ा बहुत बढ़ा कर और उन्हें समझा बुझा कर ठीक कर लिया था लेकिन अबकी आर पार की लड़ायी थी! इसमें गोबर पाथने वाली उनकी औरतें और लड़कियां भी शामिल थीं। नतीजा यह कि खेतों से लेव का पानी सूखने लगा था, चरनी पर बंधे मवेशी गोबर मूत में ही उठ बैठ रहे थे और पूरा ठकुरान गन्दगी से बजबजा रहा था!

इस बार की हड़ताल को समझने में ठाकुर गच्चा खा गये थे! हलवाहे न थक हार कर आये , न गिड़गिड़ाये, न उनके चूल्हे बुझे। जरूरत भी पड़ी तो अहिरान गये, इधर नहीं आये! पूरे इलाके की चमटोलों का भविष्य पहाड़पुर की हड़ताल पर टिका था - इसे वे समझ गये थे!

ठाकुर रात भर बब्बन सिंह के दरवाजे पर पंचाइत कर रहे थे और मुंसफ , जज, मजिस्ट्रेट, कलक्टर, एस.पी., इंजीनियर, डाक्टर न हो सकने वाले उनके बेटे उन्हीं के पम्पिग सेट पर बैठक! वे रोज शाम को सात आठ बजे वहीं जुटते, कभी गांजे का दम लगाते, कभी दारू की बोतलें खोलते और चमटोल को हमेशा हमेशा के लिए ठीक कर देने की योजना बनाते। कैसे ठीक किया जाय, कब ठीक किया जाय, ठीक करने का तरीका क्या हो - ये सारी समस्याएं थीं जिनके बारे में वे गम्भीरता से विचार करना शुरू करते और तीसरी गिलास तक पहुंचते ही कोरस गाने लगते - ÷÷ गाये चला जा, गाये चला जा एकदिन तेरा भी जमाना आयेगा!'' जैसे ही यह खत्म होता वैसे ही ÷ इण्टरनेशनल' शुरू हो जाता - ÷÷ मन में है विश्वास! हो हो मन में है विश्वास! हम होंगे कामयाब एक दिन!''

इस दौरान राम भरोसे दुबे - जो पड़ोसी गांव के थे और भंग के लती थे और उसे छोड़ कर इस मण्डली के नियमित सदस्य बने थे - पंचांग खोल कर मुहूर्त देखते रहते कि ठीक करने की तिथि कौन सी हो? उन्होंने समय तो बता दिया था - कृष्णपक्ष की अमावस्या की रात; लेकिन किस महीने की अमावस्या हो, इस बारे में वे आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे!

इधर हड़ताल खिंचती हुई चली जा रही थी और खरीफ के फसल की उम्मीदें खत्म हो रही थीं।

 

कि इसी दरम्यान एक दिन नहर के रास्ते एक टै्रक्टर धड़ धड़ करता हुआ आया और अहिरान में दशरथ राउत के दरवाजे पर खड़ा हो गया!

उसे लेकर आने वाला और कोई नहीं , जसवंत था - दशरथ का बेटा!

दशरथ के चार बेटे थे - दो गांव पर और दो मध्यप्रदेश के कोरबा में। गांव वाले दूध और खोवा का व्यवसाय करते थे और कोरबा वालों में बलवंत कोलियरी में ठेके पर लेबर सप्लाई करता था और जसवंत देसी दारू की भट्ठी चलाता था!

जसवंत जब तक गांव पर था लुच्चा , लफंगा और लतखोर माना जाता था। भागा भी था तो बाप से मारपीट करके। शुरू शुरू में मध्य प्रदेश से पुलिस भी आयी थी एक दो बार उसे ढूंढते हुए लेकिन बाद में सुधर गया था धीरे धीरे। इधर जब भी गांव आता था, ÷ भैया', ÷ बाबू', ÷ कक्का' से नीचे किसी को बोलता नहीं था। कहा करता था कि परदेश में सब कुछ है, इज्जत नहीं है! चाहे जितना कमा लो, रहोगे दो नम्बर के ही आदमी। दो नम्बर माने दो कौड़ी। अब वह सारा कुछ छोड़ छाड़ कर गांव जबार की सेवा करना चाहता था। संयोग ही ऐसा था कि वह पिछले एक दो बार से जब जब आया, गांव हड़ताल की ही चपेट में रहा। वह न इधर था, न उधर! उसका उठना बैठना दोनों के बीच था - ठाकुरों के भी, हलवाहों के भी। उसने अपनी ओर से दोनों के बीच सुलह समझौते की पूरी कोशिश की, लेकिन नजदीक आने के बजाय दोनों एक दूसरे के खिलाफ और दूर होते चले गये!

जसवंत ने उन दोनों को जवाब दिया टै्रक्टर लाकर , जो चिढ़ाते रहते थे कि अहीरों की बुद्धि उनके घुटनों में होती है ( शायद इसलिए कि वे घुटनों के बीच बाल्टी दबा कर गाय या भैंस दुहते हैं)।

टै्रक्टर खलिहान में खड़ा था - ट्राली, कल्टिवेटर, हार्वेस्टर और थ्रेशर के साथ! गेंदे की मालाएं पहने। उसके बगल में खटिया पर डंडे के साथ दशरथ बैठे थे। गांव के बच्चे उसे घेरे थे - कुछ छू कर देखना चाहते थे, कुछ ट्राली पर चढ़ना चाहते थे। दशरथ खीझ रहे थे और डंडा पटक पटक कर उन्हें भगा रहे थे!

जब तक कथा और हवन नहीं हो जाता तब तक लोगों की नजर से बचाए रखना था इसे!

भगवंत उर्फ भग्गू के जिम्मे दूसरा काम था। वे कापी और कलम के साथ इधर से उधर भाग दौड़ कर रहे थे। किसानों के लिए सबसे मुश्किल और परेशानी के थे ये महीने! अगहनी के खेत तैयार थे , खेती पिछड़ रही थी, जल्दी से जल्दी जुताई और बुवाई करनी थी, इसके बाद तो रबी का नम्बर लगना था। बड़े मौके से आया था टै्रक्टर। तारीखों की लूट मची थी, भाड़ा चाहे जो लो - बीघे के हिसाब से! और भाड़ा भी क्या लेना था - वही जो रेट बांध दिया था दो कोस दूर इकबालपुर के काशी सिंह ने अपने टै्रक्टर का!

कथा के अभी तीन दिन बाकी थे कि अगले तीन महीने के लिए सारी तारीखें बुक!

दशरथ जिन्हें कभी कोई पूछता तक नहीं था , उनकी ÷ बल्ले बल्ले' थी! उन्हें पूछने वाले वे थे जो नये घर और दुआर बनवा रहे थे - माटी और खपरैल के मकान गिरा कर! जब बिजली आ गयी थी तो उसके स्टैण्डर का घर चाहिए - दीया बाती और लालटेन वाला नहीं। ऐसे लोगों में सिर्फ पहाड़पुर के ही नहीं, पास पड़ोस के भी थे। किसी को ईंटें चाहिए, किसी को सीमेण्ट, किसी को बालू, किसी को गिट्टी, किसी को लोहा लक्कड़। गन्ने भी तैयार हो रहे थे सुगर मिल के लिए। जब ट्राली थी तो सौ काम थे!

दशरथ सबकी सुनते और सब्र रखने के लिए कहते - सब होगा! धीरे धीरे होगा! लेकिन सबका काम होगा!

ठाकुर भौंचक! सदमे में थे! वे हमेशा उन्हें अपने से नीचा समझते थे लेकिन अब उनकी चिरौरी के दिन आ गये थे! उन्हें अफसोस हो रहा था कि यही बात जब रघुनाथ ने कहीं थी तो उन्होंने क्यों नहीं सुनी तब ?

 

( २)

रात घिर आयी थी। गांव में सन्नाटा पसरा था। हल्की हल्की झीसियां पड़ रही थीं! सिवान मेढ़कों की टर्र टर्र और झींगुरों के झन्न्‌ झन्न्‌ से गूंज रहा था।

टै्रक्टर के काम शुरू कर देने के बावजूद ठाकुर हारा हुआ महसूस कर रहे थे क्योंकि चमटोल में किसी तरह की कोई बेचैनी नहीं थी! फर्क आया था तो यह कि हलवाहे अब गांव में और गांव के रास्ते आने जाने लगे थे - सिर झुकाये, आराम से, बिना बोले और दुआ सलाम के! ठाकुरों को लगता कि वे छाती उतान करके उन पर हंसते हुए आ जा रहे हैं।

रघुनाथ सोने के पहले बत्ती गुल करने ही जा रहे थे कि सर पर बोरा रखे पानी में भींगता गनपत बरामदे में आया! गनपत उनका हलवाहा था , हलवाही के सिवा घर दुआर के काम भी देखता था! रघुनाथ ने उसके बेटे को अपने कालेज से बी.ए. कराया था, उसके बाद उससे एक फार्म भरवाया था जिसके कारण वह ÷ बाट माप इंस्पेक्टर' बना था! इस एहसान को गनपत कभी नहीं भूलता! इस समय उसका वह बेटा एम.राम मिर्जापुर में पोस्टेड था!

÷÷ अरे गनपत तुम? किसी ने देखा तो नहीं?''

÷÷ नहीं' मास्टर साहेब!'' उसने बोरा खम्भे के पास रखा और मचिया खींचा - ÷÷ एक बात बता दें। मैं आपको छोडूंगा नहीं, भले आप छोड़ दें! हां, यह समय थोड़ा खराब है!''

÷÷ जानता हूं, आये कैसे, यह बोलो!''

÷÷ गया था मगरू के यहां मिर्जापुर! सोमारू भी तो वहीं है न! मगरू उसे आटाचक्की पर वहीं काम दिला दिया है और वह पक्का हो गया है इस काम में!''

÷÷ तो?''

÷÷ तो मगरू कहा कि जांता ओखरा, मूसर, ढेंकी, चक्की तो कोई चलाता नहीं आज और आटा पिसाने के लिए जाना पड़ता है लोगों को एक डेढ़ कोस दूर - डेढ़गावां या कमालपुर; ऐसे में अगर गांव पर आटाचक्की बिठायी जाय तो कैसा रहेगा? सोमारू काफी है सम्भालने के लिए!''

÷÷ बिठाओगे कहां?''

÷÷ सरकार चमटोल और गांव के बीच में जो ऊसर जमीन दिया है न, उसी पर! और किसी काम की तो है नहीं वह!''

रघुनाथ कुछ देर सोचते रहे।

÷÷ पूछना यह भी था कि ठाकुरों के लिए छूत तो रोटी और भात में ही है, आटा और चावल में तो है नहीं?''

रघुनाथ हंसने लगे - ÷÷ यह सब मत सोचो! शुरू में भले बिदकें, देर सबेर सब जाएंगे और पिसायेंगे! यही नहीं, आस पास के गांवों से भी आयेंगे लोग। जब चक्की गांव में ही रहेगी तो उतनी दूर कौन जाएगा? बस देर मत करो! .... और बताओ, कै दिन रहे मिर्जापुर?

÷÷ रहे दस दिन! एक दिन तो पूछते पाछते गुड़िया बेटी के इस्कूूल चले गये थे। बड़ी खुस हुईं! घर ले गयीं। अपने हाथ से खाना पकाया, खिलाया, आपका और मालकिन का हाल चाल पूछती रहीं, चलने लगा तो बीस ठो रुपैया भी जबरदस्ती पकड़ाय दिहिन! बिल्कुल नहीं बदली हैं।''

÷÷ बहुत दिन रह गये मगरू के पास?''

÷÷ नहीं मास्टर साहेब, सब दिन वहीं नहीं रहे! तीन दिन तो फूआ के हियां रहे! फूआ का जो सबसे छोट बेटवा है, वह उहां का डिपटी मजिस्टरेट है - यस.डी.यम.! बहुत बड़ी कोठी है, उसके सामने बगीचा भी बहुत बड़ा है। जीप है, पुलिस है, ड्राइवर है, नौकर चाकर हैं। ऊ साधारण आदमी थोड़े हैं? इजलास लगाता है। सब कोई नहीं मिल सकता! फूआ से ही कई कई दिन भेंट नहीं होती! हम तो देखे ही नहीं थे उत्ता बड़ आदमी? वहीं रह गये तीन दिन! फूआ रोक लीं!''

रघुनाथ थोड़े गम्भीर हो गए - ÷' नाम क्या है उनका?''

÷÷ हम लोग तो सुद्धू सुद्धू बोलते हैं लेकिन नाम सुदेस भारती है! राम नहीं लिखते।''

रघुनाथ को काटो तो खून नहीं। यही वह सुदेश भारती था जिसका जिक्र सरला ने किया था! इसी से उसने शादी करने की बात की थी! अगर वह सचमुच कर ले तो गनपत जो उनका हल जोतता है और उनके आगे खड़ा रहता है या मचिया पर बैठता है , उनका रिश्तेदार होगा! खरपत जो गनपत का बाप है, उनका समधी होगा और गले मिलेगा! उनके साथ खटिया पर बैठेगा और दामाद के बाप की हैसियत से ऊंचा होगा उनसे! उनका मन हुआ कि शीला को आवाज देकर बुलायें और कहें कि सुनो, गनपत क्या कह रहा है?

÷÷ बाकी सबके अपने अपने दुःख हैं मास्टर साहेब! उसका बियाह छुटपन में ही हो गया था! वह अपनी मेहर को छोड़ दिया है। उसका लफड़ा चल रहा है आजकल किसी मास्टरनी से! वह ऊंची जात की है। कभी कहती है कि बियाह करेंगे तो तुम्हीं से, कभी कहती है - नहीं करेंगे। मां बाप नहीं चाहते। इसी में उसे लटकाये चल रही है! फूआ बड़ा दुःखी रहती है।

÷÷ तुम जाओ, देर हो रही है!''

÷÷ ऊ मास्टरनी के साथ इहां उहां जाता है, होटल भी जाता है, दूसरे सहर में भी घूमता है, खूब ऐयासी करता है बाकी फूआ से नहीं मिलाता। फूआ बोलीं भी कि हमको दिखा दो एक बार, हम बतियायेंगे उससे कि काहे नहीं कर रही बियाह? लेकिन मिलाये तब न?''

÷÷ कहा न जाओ, नींद आ रही है! और वह बत्ती बुझा दो!''

÷÷ अच्छा साहेब!'' गनपत उठ खड़ा हुआ, ÷÷ लेकिन साहेब, एक बार समझा देते उसे कि मेहर को छोड़ के काहें ऐसा कर रहा है? मेहरिया तो कहीं चली जाएगी या किसी न किसी को रख ही लेगी, लेकिन बदनामी किसकी होगी? उसी की न?''

÷÷ तुम जाओगे कि नहीं, दिमाग मत चाटो!''

÷÷ आप नहीं जाना चाहें तो कहिए किसी बहाने हमी उसे ले आयें!''

रघुनाथ क्रोध से कांपने लगे। उन्होंने उठ कर झटके से बत्ती बुझा दी और उसे ठेल कर बाहर कर दिया! गनपत ने सिर पर बोरा रखते हुए कहा -÷÷ साहेब, जो कहने आया था, वह तो भूल ही गया।'' सहसा उसकी आवाज फुसफुसाहट में बदल गयी, ÷÷ देखिये रहे हैं कि हवा खराब है। नहीं, एक बात कह रहे हैं। ऐसी कोई बात नहीं है लेकिन पहलवान को समझा दें कि जब तक हवा खराब है चमटोल की ओर न देखें। और देखना क्या, जाएं ही नहीं उधर।...''

रघुनाथ का ध्यान ही नहीं था उसकी फुसफुसाहट की ओर! उनकी चिन्ता और बेचैनी का कारण दूसरा था - कि कहीं इसे सरला और भारती के सम्बंधों की जानकारी न हो? जब रिश्तेदार हैं तो कभी न कभी मगरू जरूर मिलता होगा भारती से, हो सकता है भारती ने चर्चा की हो? और न भी की हो तो मगरू ने दोनों को कभी साथ देखा हो? जब एक ही शहर है तो कैसे सम्भव है कि उसे पता ही न चला हो अब तक?

÷÷ शीला!'' आखिरकार उनसे रहा न गया और उन्होंने दूसरी हांक लगायी - गुस्से में।

 

( ३)

पहलवान माने छब्बू पहलवान।

पहाड़पुर के ही दक्खिनी हिस्से में घर था बजरंगी सिंह का। वे छब्बू पहलवान के नाम से जाने जाते थे इलाके में। गांव का नाम दूर दूर तक रोशन किया था उन्होंने! दंगलों में जहां जहां गये , पछाड़ कर ही लौटे इनाम के साथ। ÷ टंगड़ी' और ÷ धोबियापाट' उनके प्रिय दांव थे। लम्बाई ही नहीं, बला की ताकत और फुर्ती भी थी उनमें! किसी को पकड़ लें तो छुड़ाना मुश्किल, दाब दें तो उठना मुश्किल, पट पड़ के मिट्टी पकड़ लें तो चित करना मुश्किल। भैंस को केहुनी से मार दें तो पसर जाय और उठ न सके!

लेकिन उनके बड़े भाई - जिनके चलते वे पहलवानी कर रहे थे - जब असमय ही अचानक चल बसे तो उन्होंने लंगोट खूंटी पर टांग दिया और घर की जिम्मेदारी सम्भाल ली!

छब्बू की शादी नहीं हुई थी। जब उम्र थी तब की नहीं अखाड़े के जोश में और जब करनी चाही , तो उमर नहीं रही! कोई आया भी नहीं! इस तरह परिवार के नाम पर उनके दस साल का भतीजा था और बेवा भौजी! भौजी रात दिन पूजा पाठ और धरम करम में लगी रहतीं और भतीजा स्कूल आता जाता। खेती बारी छब्बू सम्भालते और सम्भालते क्या - हलवाहे झूरी के जिम्मे छोड़ कर निश्चिन्त रहते!

लेकिन यह निश्चिन्तता उनकी किस्मत में नहीं थी! एकदिन उनकी नजर पड़ गयी झूरी की औरत ढोला पर! दो बच्चों की मां लेकिन सिर्फ कहने को। वह कलेवा लेकर आयी थी अपने मरद के लिए! छब्बू ने उसे पहले भी देखा था - जाने कितनी बार! लेकिन अबकी नजर पड़ी नहीं, गड़ी! उन्होंने उसे आते हुए देखा, बैठते हुए देखा, चलते हुए देखा - क्या छरहरा बदन, क्या लोच, क्या गदराये कूल्हे। गड़ गयी आंखों में! कहां यह हड़ियल झूरी और कहां यह गांजे की कली! बस एक सुट्टा लग जाय तो उड़ जाओ आसमान में और फिर उड़ते ही रहो। जमीन पर लौटने की नौबत ही न आये!

और फिर इसके बाद ही शुरू हुई छब्बू पहलवान के सुट्टा मारने की कहानी!

लेकिन कहानी रफ्तार पकड़ती इसके पहले ही भौजी को अंदेशा हो गया। भतीजे मुन्ना ने मां से बताया कि उसने चच्चा और ढोला को दालान में छुपाछुपी खेलते हुए देखा था! भौजी रोने लगी। उसने छब्बू से कहा - ÷÷ छब्बू! मेरी एक बिनती है! भैया तो रोकने टोकने के लिए हैं नहीं, तुम करोगे अपने मन की ही। लेकिन चाहे जो करो, करो घर के बाहर! इसे साफ सुथरा रहने दो!'' इशारा समझ गये छब्बू! इसके बाद से ही छब्बू की चमटोल में आवाजाही बढ़ी!

हलवाही के लिए हो या रोपनी कटिया के लिए - बुलाने के लिए चमटोल में जाना ठाकुर अपनी बेइज्जती समझते थे! जरूरी ही हुआ तो वे बच्चों को भेजते थे! लेकिन छब्बू ऐसे मान अपमान से परे थे। अगर वे गांव में नहीं दिखाई पड़ते, बगीचे और नहर पर भी नहीं दिखाई पड़ते, खेत खलिहान में भी नहीं दिखाई पड़ते तो लोग मान लेते कि वे चमटोल में होंगे - ढोला के संग! यह चमटोल भी जानती थी और गांव भी! गुस्सैल इतने थे कि उनसे सीधे कुछ कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी!

सभी अगड़ों ने बारी बारी से मिल कर घराने के सबसे मानिन्द बब्बन कक्का पर दबाव बनाया कि वे अपने स्तर पर जो कुछ कर सकें , करें। समझायें या घौंस दें या जात बाहर करें। ऐसा कहने वालों में अगल बगल के गांवों के लोग भी थे! शिकायतों से तंग आकर कक्का ने छब्बू को बुलवाया। छब्बू ने उनकी बातें बहुत ध्यान से सुनीं और अंत में बोले - ÷÷ बात तो ठीक है कक्का मगर किसको किसको निकालिएगा जात बाहर? किसी किसी का ढंका तुपा है और किसी किसी का जगजाहिर! लेकिन बचा तो कोई नहीं है मेरी जानकारी में! अगर कोई है तो बताइए उसका नाम? फिर मैं बताऊं उसके बारे में! रही मेरी बात तो आप से छिपाऊंगा नहीं? मैं सब कुछ करता हूं लेकिन मुंह से मुंह नहीं सटाता! अपने धर्म और जात को नहीं भूलता!''

कक्का सिर झुकाये बैठे रहे , कुछ नहीं बोले!

छब्बू थोड़ी देर बाद उठ कर चले गये!

लोग मजाक में कहा करते थे कि सिवान में झूरी पहलवान का खेत जोतता है और पहलवान चमटोल में उसका खेत!

और झूरी का यह था कि जब वह खेत जोत कर लौटता तो छब्बू घर में ; बुवाई करके आता तो छब्बू घर में; बाजार से लौटता तो छब्बू घर में! वह उनके होने की आहट मिलते ही उलटे पांव वापस!

उसने एक बार हिम्मत की। हाथ जोड़ कर कहा - ÷÷ मालिक! मेरी नहीं तो कम से कम अपनी इज्जत का तो ख्याल कीजिए। लोग क्या क्या कहते हैं आपके बारे में?'' इसका नतीजा यह हुआ कि वह पखवारे भर हल्दी प्याज बदन पर पोत कर घर में पड़ा रहा!

बेबस ढोला। मुहाल हो गया जीना! नरक हो गयी थी उसकी जिन्दगी! रात भर झूरी की छाती से लग कर सुबकती रहती और गुस्से में फनफनाती रहती!

सबसे बड़ी बात यह कि ग्राम प्रधान चमटोल का , उसी की जाति का, पहलवान के साथ गांजे का सुट्टा लगाता था और जब कहो तो बोलता था - ÷÷ कलेजा कड़ा रखो, बस थोड़ा इंतजार करो!'' कब तक इंतजार करो!

 

सावन शुरू हो गया था! इसी महीने में पचैयां ( नागपंचमी) पड़ती थी! पहाड़पुर में पचैयां छब्बू पहलवान का पर्व था! उस दिन तीन बाल्टियों में भिगोये हुए चने लाये जाते, परात भर के मिठाइयां आतीं, बताशे आते, बजरंग बली की पूजा की जाती, छब्बू पहलवान लंगोट पहन कर अखाड़े की मेंड़ पर बैठते और अपने चेलों की कलाइयों में रक्षा बांधते! वे उस्ताद के आशीर्वाद के साथ अखाड़े में उतरते! उनकी कई जोड़ियां होतीं और दोपहर बाद तक पट्ठे अखाड़े में जोर आजमाइश करते रहते! सबसे आखिर में छब्बू उतरते - बड़ों के पांव छूकर और छोटों को हाथ जोड़ कर। यह प्रदर्शन कुश्ती होती। वे अपने दांव और करतब दिखाते - पहलवानी छोड़ देने के बावजूद!

इस अवसर पर चमटोल से डफले और नगाड़े वाले भी आते और झूम कर बजाते! अहिरान के बनेठी वाले भी होते और एक दूसरे से खेलते हुए पसीने पसीने हो जाते!

दूसरे गांवों में पचैयां मात्रा धार्मिक त्यौहार रह गयी थी लेकिन पहाड़पुर में अभी चल रही थी - रस्म के रूप में ही सही! लेकिन यह भी सब जानते थे कि यह तभी तक है जब तक छब्बू हैं! ऐसे भी ठाकुरों की नयी पीढ़ी के लिए देह बनाना, वर्जिश और रियाज करना, कुश्ती लड़ना फालतू चीज थी। एकदम मूर्खता! तमंचा के आगे मजबूत से मजबूत कद काठी का भी क्या मतलब? इसीलिए उनके चेलों में ज्यादातर अहिर, कहार, लुहार, गड़रिया थे, ठाकुर बामन नहीं।

लेकिन अबकी बुरा हाल था पचैयां का। पानी सुबह से ही बरस रहा था - कभी मद्धिम, कभी तेज! अखाड़ा एक दिन पहले ही गोड़ कर तैयार किया था खुद छब्बू ने। यह काम चेलों में से किसी को नहीं करने देते थे वे! लेकिन वह कीचड़ हो चुका था - धान के खंधे की तरह! मिठाइयां और बताशे आ चुके थे। चने फूल कर अंखुआ गये थे! इंतजार था बारिश थमने का! छब्बू बोल गये थे कि तुम लोग तैयारी रखना जैसे ही मौसम ठीक होगा, मैं आ जाऊंगा!

मगर न मौसम ठीक हुआ , न छब्बू लौटै!

बारिश तब थमी जब शाम ढली। आसमान साफ हुआ और जहां तहां छिटपुट तारे नजर आये! इसी वक्त पुलिस की जीप आयी गांव में और पता चला - छब्बू का कतल हो गया है! जनपद के सबसे दिलेर और बहादुर और ताकतवर आदमी का कतल!

यह खबर नहीं , बिजली थी जो बदरी छंटने के बाद तड़तड़ा कर ठाकुरों के टोले पर गिरी थी! वह चाहे जो था, जैसा था - ठाकुर था और उसके रहते किसी में इस टोले की तरफ आंखें उठा कर देखने की हिम्मत नहीं थी! और अब?

अब , चमटोल के बाहरी हिस्से में एक झोंपड़े के आगे कीचड़ में चारों खाने चित्त पड़ा था वह। मरा हुआ। खुले आसमान के नीचे। एक लालटेन उसके सिर के पास थी, दूसरी पैरों की ओर। दोनों ईटों की ऊंचाई पर - ताकि लाश पर नजर रखी जा सके। लाश खुद कीचड़ और माटी में लिथड़ी पड़ी थी। पैर इस तरह छितराये हुए पड़े थे जैसे बीच से चीर दिये गये हो! जननांग काट दिया गया था और उसकी जगह खून के थक्के थे जिन पर मक्खियां छपरी हुई थीं, उड़ और भिनभिना रही थीं। पुलिस परेशान थी उस जननांग के लिए - कटा तो गया कहां? वह लाश के आसपास कहीं नहीं था। वह लालटेन और टार्च की रोशनी में उसे ढूंढ़ रही थी! जमीन समतल नहीं थी - गड्ढा गुड्ढी बहुत थे और सबमें पानी भरा था! उसे जहां कहीं संदेह होता, लाठी से कुरेद कर देख लेती, भले वह माटी का ढेला हो। एक डर भी था कहीं भीतर कि ऐसा न हो कि कुत्ते आये हों और मांस का लोथड़ा समझ कर किसी दूसरी जगह ले गये हों या खा गये हों!

यह खोज देर रात तक चलती रही!

पुलिस अपनी तरफ से पूरी तैयारी के साथ आयी थी लेकिन जिस आशंका से आयी थी , वैसा कुछ नहीं हुआ - न कोई बलवा हुआ, न चमटोल फूंकी गयी, न बदले की कार्रवाई हुई!

झूरी के झोंपड़े के बाहर ताला लटक रहा था और चमटोल में सन्नाटा था। एक भी मर्द नहीं। सारे मर्द बस्ती छोड़ कर जाने कहां चले गये थे। पुलिस के आने के पहले से ही! सिर्फ औरतें और बच्चे थे जो अपने घरों में बंद थे।

हत्या एक ऐसे आदमी की हुई थी जिसके घर कोई एफ.आई.आर. दर्ज कराने वाला भी नहीं था। हत्या किसने की , कब की, कैसे की, क्यों की - इसका कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं था।

कयास जरूर लगाये जा रहे थे लेकिन वे कयास भर थे - कि छब्बू सुबह सुबह अपनी देह की आग बुझाने झूरी के घर पहुंचे! आहट लगते ही झूरी दूसरी कोठरी में छिप गया। ढोला चांचर खोल कर उन्हें अंदर ले गयी! बेसब्र छब्बू लुंगी खोल कर जैसे ही उसके साथ सोने को हुए कि वह उनका फोता पकड़ कर झूल गयी! वे उसे मारते पीटते चीखते चिल्लाते हुए बेहोश होकर गिर पड़े। उसी समय झूरी हंसुआ लेकर आया और उसने उनका जननांग काट कर फेंक दिया। दोनों बाहर आ गये कोठरी बंद करके और उनके तड़पने छटपटाने और मरने तक इंतजार करते रहे! बाद में घसीट कर बाहर कर दिया।

कि वे धान का बीज छीटने बीयढ़ में गये थे उन दोनों के साथ। मारा वहीं , लेकिन केस ( बलात्कार) बनाने के लिए दरवाजे के सामने ला पटका।

कि निहत्थे होने के बावजूद पहलवान दो चार को तो कच्चा चबा जाएं! दो चार के मान के नहीं थे वे। चमटोल को पता था कि वे किधर दिसा फरागत होने जाते हैं। पूरी चमटोल ने उधर ही घेर कर अरहर के खेत में मारा जैसे वे सुअर को चारों ओर से घेर कर मारते हैं और झूरी के घर के आगे लाकर फेंक दिया! सिवान में चीखे चिल्लायें भी तो किसे सुनाई दे बादलों की गड़गड़ाहट में ?

इस तरह के चर्चे। अलग अलग कयास , अलग अलग आदमी के! सच्चाई का किसी को पता नहीं। लाश के पास कोई फटका ही नहीं तो पता कैसे? पुलिस ने ही फटकने नहीं दिया!

लेकिन एक बात धीरे धीरे साफ हुई कि जो कुछ हुआ था , ÷ अचानक' और ÷ संयोगवश' नहीं हुआ था। इसके पीछे महीनों से चल रही तैयारी थी! इस तैयारी में अकेले पहाड़पुर की चमटोल नहीं, आस पास के बीच पच्चीस गांवों की चमटोलें शामिल थीं। कतल से पहले और बाद खर्चे ही खर्चे हैं - थाने के सी.ओ. को चाहिए, मुंशी को चाहिए, पोस्टमार्टम वाले डाक्टर को चाहिए, पैरवीकार को चाहिए, वकील को हर तारीख पर चाहिए, गवाहों को चाहिए - ढेर सारे खर्चे। यह कहां से करेगा झूरी? सो, सभी चमटोलों के हलवाहों ने चंदे जुटाये थे! दूसरे, उन्हें इंतजार था अपनी जाति के किसी पुलिस अधिकारी का जो धानापुर थाना सम्भाले और आ गये थे दो महीने पहले भगेलू यानी बी.राम। साथ ही अक्टूबर में चुनाव था विधानसभा का और कोई ऐसी पार्टी नहीं जिसे अनुसूचित जातियों के वोट की दरकार न हो! तीसरे, चमटोलें जानती थीं कि छब्बू के मसले पर ठाकुर बिरादरी बंट जाएगी, कभी एक न होगी!

और जल्दी ही यह साबित हो गया।

 

( ४)

छब्बू के मारे जाने का सदमा जिसे सबसे ज्यादा था , वह रघुनाथ थे!

जाने क्या था कि छब्बू जब कभी बगीचे की तरफ आते , नहर या अखाड़े पर आते या अपनी भैंस के साथ उत्तरी सिवान में आते - रघुनाथ के दुआर को जरूर देखते - मास्टर साहब हैं या नहीं? हैं तो खाली बैठे हैं या काम कर रहे हैं? अगर रघुनाथ खाली होते तो छब्बू आकर बैठ जाते! बोलते कुछ नहीं, बस बैठे रहते! पूछने पर बोलते कि कोई काम नहीं, बस आपके पास कुछ समय बिताना अच्छा लगता है मुझे! अच्छों की सोहबत मिलती ही कहां है?

वे जाते हर जगह , लेकिन बैठते यहीं।

वे रघुनाथ के कहे बगैर उनके हित अहित का अपने आप ही ध्यान रखते। यह उनकी भावना थी जिसके पीछे कोई कारण नहीं था! ऐसा रघुनाथ दूसरों से ही सुनते , छब्बू से नहीं! अभी साल भर पहले की बात है - रघुनाथ के पिछवाडे+ उनके चचेरे भाई का घर दुआर है जिसके आगे तीन बिस्से के करीब उनकी जमीन है! उनकी यानी रघुनाथ की! भाई तक तो गनीमत थी। वे बंटवारे का सम्मान करते थे लेकिन भतीजों की नीयत खराब होने लगी। उन्हीं के घर के सामने दूसरे की जमीन! वे चार भाई थे और सब बालिग! बड़े को रघुनाथ ने ही पढ़ाया था और बिजली विभाग में नौकरी भी दिलायी थी! वह समय समय पर कब्जा करने की तरकीबें और बहाने ढूंढ़ता रहता! उसने एक बार रात भर में रघुनाथ के पिछवाड़े एक ईंट की दीवार खड़ी कर दी और उनका रास्ता बंद कर दिया। रघुनाथ को सबेरे तब मालूम हुआ जब हल्ला गुल्ला सुनायी पड़ा! वे पहुंचे तो देखा कि छब्बू लाठी लिये हुए दीवार गिरा रहे हैं और गालियां बरसाते हुए नरेश को ललकार रहे हैं - ÷÷ घरघुस्से, बाहर निकल और हिम्मत हो तो खड़ी कर दीवार! हम भी देखें! मास्टर को अकेला समझा है क्या? खसरा खतौनी भी कोई चीज है कि नहीं?''

नरेश और उसके भाई घर में ही घुसे रहे , उनमें से किसी की हिम्मत नहीं हुई कि बाहर आये और छब्बू से लोहा ले!

सच्चाई यह है कि रघुनाथ को नौकरी जाने का जितना दुःख था उससे कम दुःख छब्बू के जाने का नहीं था! क्योंकि छब्बू थे तो रघुनाथ भी थे और उनके लिए पहाड़पुर भी! अब किसके बूते वे रहेंगे ?

छब्बू के मारे जाने के पहले गनपत ने रघुनाथ को इशारों में बता दिया था कि पहलवान कभी आप के यहां आयें तो समझा दीजिए - चमटोल से दूर ही रहें! यह हम दोनों के बीच की बात, किसी तीसरे को न पता चले! बस दूर रहें! ÷÷ रघुनाथ ने एक बहाने से कहा भी था कि छब्बू! अब बहुत हो गया, जाने दो!'' छब्बू ने कहा - ÷÷ मास्टर साहब! छोड़ तो दूं, लेकिन जाऊं कहां? गांव में तो सभी बेटियां हैं, बहुएं हैं! और कहां जाऊं?''

रघुनाथ ने उन्हें तरह तरह से समझाने की कोशिश की लेकिन बेकार!

उन्होंने भी सोचा था कि अधिक से अधिक क्या होगा - यही होगा कि छब्बू बेइज्जत किये जाएंगे और झूरी ढोला से सम्बंध हमेशा के लिए खतम! लेकिन यह तो छब्बू के दुश्मनों ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। वे यह कहते घूमते रहे कि यह एक ठाकुर की हत्या नहीं, पूरी बिरादरी की मर्दानगी को चुनौती है, उसे ललकारा गया है - लेकिन इस घटना को भुलाना और इसकी चर्चा न करना ही बेहतर समझा सबने!

 

थोड़ा वक्त लगा ठकुरान ( ठाकुर टोला) को बदले हुए समय को समझने और उसके हिसाब से अपने को ढालने में! कई दिनों तक दुआर कूड़ा और कचड़े का ढेर बना रहा, कई दिनों तक चरनी और नाद के आसपास की जगहें गोबर से बजबजाती रहीं, कई दिनों तक बैल खूंटे से बंधे उठते बैठते रहे, गायें भैंसें रंभाती और पगुराती रहीं! लेटे लेटे खटिया तोड़ने वाले ठाकुर कभी कोने में पड़ी कुदाल की ओर देखते, कभी फरसा की ओर, कभी फरुही, कूंचा और झाड़ई की ओर - और थक कर अंत में उस छौरे की ओर जिधर से हलवाहे आते थे!

लेकिन हलवाहे जो चमटोल से फरार हुए , वे नहीं लौटे!

एक हफ्ता बीता।

फिर दूसरा हफ्ता बीता।

फिर तीसरा हफ्ता बीता।

उनके जाने से ठाकुर जितने परेशान थे , दशरथ यादव उतने ही खुश! उनके बेटे जसवंत ने इस गाढ़े वक्त में ठाकुरों को सम्भाल लिया था। उसने उन्हें हलवाहों की कमी खलने नहीं दी। उसने सबके खेत जोते भाड़े पर। एक दिन भी उसका टै्रक्टर बैठा नहीं रहा। सबके हल जुआठ धरे रह गये! उसने सबको अहसास करा दिया कि बैल सिरदर्द और बोझ हैं, फालतू हैं, दुआर गंदा करते हैं, उन्हें हटाओ! उनके गोबर भी किस काम के? उनसे उपजाऊ तो यूरिया है!

कुछ बातें बाद में पता चलीं , उस समय नहीं। मसलन, जैसे उसने ठाकुरों को सम्भाला, वैसे ही उसने चमटोल को भी सम्भाल लिया! कुछ हलवाहे तो शहर चले गये - रिक्शा खींचने के इरादे से या दिहाड़ी पर काम करने के इरादे से लेकिन ज्यादा बड़ी संख्या कोरबा गयी - जसवंत के छोटे भाई बलवंत के पास जो दिहाड़ी मजूरों का ठेकेदार था। उसने सबको खदान में काम दिलाया। और यह भी कि गांव घर का होने के कारण वह दूसरों से जितना लेता था, उससे कम लिया इनसे!

यही नहीं , जसवंत ने उनकी भी मदद की जो चमटोल में रह गये थे - खासतौर से औरतें! राशन पानी के गरज से अनाज के लिए उन्होंने ठकुरान में जाना बंद कर दिया था और सूद पर जसवंत से या अहिरान से रुपये लेने लगीं! वे अब सीधे गज्जन साव की दुकान पर जातीं, नगद पैसे देतीं और सौदा सुलुफ लेतीं!

गांव धीरे धीरे पहले वाले ढर्रे पर लौटने लगा - नये बदलाव और नयी व्यवस्था के साथ। फर्क इतना ही आया कि जो हलवाहे बाहर नौकरी करते थे और गांव लौटते थे, वे ठकुरान में न जाकर अहिरान में जाना उठना बैठना पसंद करते थे! शायद उन्हें वहां बराबरी का अहसास होता था।

रिटायरमेण्ट के बाद लोगों की देखा देखी रघुनाथ ने भी अपनी खेती बारी की दूसरी व्यवस्था की! उन्होंने अपने खेत सनेही को अधिया पर दे दिये! सनेही उनके कालेज का चपरासी था और सात मील दूर अपने गांव से कालेज आता जाता था। जात का कोइरी! उसकी समस्या उसकी औरत और बाल बच्चे थे! रघुनाथ ने उसके परिवार के लिए बरामदे का एक हिस्सा और बाहर का झोंपड़ा दे दिया! इस तरह वे भी खेती के झंझटों से निश्चिन्त होकर कहीं आने जाने लायक हो गये! और कहीं आना जाना भी क्या , मैनेजर और प्रिंसिपल ने पेंशन लटका रखी थी और वे उसी में लगे हुए थे। वे उसी चक्कर में दो तीन दिन के लिए शहर गये हुये थे कि इधर उनके भतीजे नरेश ने घर के पिछवाड़े की जमीन दुबारा घेर ली - अबकी कंटीले तारों से।

इतना ही नहीं , नरेश ने पुरानी नाद उस जमीन पर गाड़ी और भैंस बांध दी! चारों तरफ गोबर और कंडे फिंकवा दिये, जहां तहां सनई और पुआल के पूले रखवा कर यह साबित करने की कोशिश की कि पिछले कई सालों से यह उसी के कब्जे में है।

गांव में घुसते ही छौरे से रघुनाथ ने देख लिया और सीधे वहीं पहुंचे जहां नरेश भैंस को सानी दे रहा था। उसने हाथ पोंछ पाछ कर चाचा के पैर छुए!

यह सब क्या है ?

नरेश ने आश्चर्य से उन्हें देखा - ÷÷ कुछ भी तो नहीं, है क्या?''

क्रोध से थरथरा उठे रघुनाथ - ÷÷ गुंडई करते हुए - और वह भी अपने चाचा से - जरा भी शर्म नहीं आई तुम्हें? हटाओ यह सब खूंटा सूंटा, तार फार!''

नरेश के तीनों भाई भी घर के अंदर से बाहर आ गये! पड़ोसियों में से कोई नहीं आया। सभी अपने दरवाजे पर बैठे देख सुन रहे थे!

÷÷ वह तो नहीं हटेगा चाचा। हमारे घर दुआर के आगे की जमीन हमारे मसरफ की है और फालतू में फंसाये हैं आप! जबकि आपकी है भी नहीं, गांव समाज की है!''

इतना सुनना था कि रघुनाथ के तन बदन में जैसे आग लग गयी। वे फनफना उठे और एक लात मारी नाद पर - ÷÷ ऐसी की तैसी तेरी और तेरे गांव समाज की!'' अभी मिट्टी कच्ची थी नाद की, वह एक तरफ लुढ़क गयी!

इसी बीच गुस्से में तमतमाया और गालियां देता हुआ नरेश का छोटा भाई देवेश दौड़ा और धक्का मार कर रघुनाथ को गिरा दिया। वे सम्भलें, इसके पहले ही उनकी छाती पर बैठ कर चीखा - ÷÷ साले बुड्ढे! टेंटुआ पकड़ कर अभी चांप दें तो टें बोल जाओगे! हम जितनी ही शराफत से बात कर रहे हैं, उतना ही शेर बन रहे हो! जा, जो करना है, कर ले!'' उठते हुए उसने उनकी कमर पर एंड़ जमायी - ÷÷ साला बुड्ढा हरामजादा!''

रघुनाथ ने उठने की कोशिश की मगर नहीं उठ सके!

नाद के बगल में पड़े पड़े उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ायी! घराना देख रहा था और अपने अपने दरवाजे पर बैठा हुआ था!

थोड़ी देर बाद नरेश ने उन्हें खड़ा किया और घर की ओर ठेल दिया!

÷÷ पीस कर लगाने के लिए हल्दी प्याज न हो तो कहना, भिंजवा देंगे!'' देवेश चिल्लाया!

क्या हो गया है गांव को ?

यहीं पैदा हुए , पले बढ़े, पढ़े पढ़ाया, सबकी मदद की - कभी किताब कापी से, कभी फीस माफी से, कभी रुपये पैसे से; कितने रिश्ते नाते हैं और रहेंगे - आज भी, कल भी, क्या हो गया गांव को?

क्या इसलिए कि वे घराने की इस या उस पार्टी में नहीं रहे ?

क्या इसलिए कि रिटायर कर गये और किसी काम के नहीं रहे ?

क्या इसलिए कि कभी किसी के झगड़ों और झमेलों में नहीं पड़े ?

क्या इसलिए कि बेटे ने जात बाहर शादी की ?

क्या इसलिए कि बेटा अमेरिका में डालर कमा रहा है ?

क्या इसलिए कि दूसरा बेटा भी नोएडा में एम.बी.ए. कर रहा है ?

क्या इसलिए कि बंटाई पर खेती सनेही को दी - बाहरी आदमी को, इन्हें नहीं?

क्या हो गया अपने ही घराने को ? रघुनाथ समझने में नाकाम रहे!

 

( ५)

रघुनाथ दालान में करवट लेटे थे!

÷ नहीं नहीं' करने के बावजूद शीला कमर की उभरी हुई हड्डी के आस पास हल्दी प्याज चूना का घोल छोप रही थी! और मुंह के अंदर ही अंदर कुछ बुदबुदाती भी जा रही थी नाक सुड़कते हुए।

दो दो मुस्टंड बेटे और दोनों परदेश!

एक भी यहां नहीं जो बाप के बगल में खड़ा होता!

रघुनाथ ने जिन अंडों को से कर बड़ा किया था , वे कोयल के नहीं कौवे के थे। वे खुद कौवा थे, वरना समझ गये होते।

वे अब तक जिस घर में रहते आये थे खपरैलों का था! मिट्टी की मोटी मोटी दीवारों का। पुश्तैनी घर! पीछे वाली जमीन जान बूझ कर बंटवारे में ली थी उन्होंने - कि जब पैसा और सौंहर होगा तो पक्का घर बनायेंगे - छोटा सा ही सही! यह जरूरी था - उनके लिए नहीं, बेटों के लिए। घर ही नहीं रहेगा तो वे आयेंगे क्यों? आयेंगे तो रहेंगे कहां? और जब आयेंगे ही नहीं, रहेंगे ही नहीं तो गांव घर को जानेंगे क्या? फिर बाप दादा की जमीन जायदाद का क्या होगा? कौन देखेगा ताकेगा? खपरैल का घर तो ढह रहा है! कब बैठ जाएगा, कोई नहीं जानता!

तो पिछले दिनों जब ÷ प्राविडेण्ट फंड' के पैसे मिले थे तभी नये घर में हाथ लगाने का फैसला कर लिया था उन्होंने! अब यह नयी मुसीबत!

उन्हें छब्बू की कमी खल रही थी - लगातार!

 

ये नयी नस्लें पैदा हुई थीं गांव में - तभी से जब से गांव में बिजली के खम्भे, केबुल, ट्यूबवेल, पम्पिंग सेट, दवाखाने आये थे, जातियों की पार्टियां आयी थीं, हर तीसरे घर से फौज में किसी न किसी की भर्ती हुई थी। सवर्णों में एक नस्ल रिसर्च और कोचिंग करने वाले लड़कों की थी जो शहर से या किसी फौजी के घर से बोतल हासिल करते और रात पम्पिंग सेट पर बिताते!

दूसरी नस्ल नरेश और उसके भाइयों की थी! नरेश बिजली मैकेनिक था! सरकारी कर्मचारी था! लेकिन खम्भे से तार खींच कर घरों में अवैध कनेक्शन देता था और अच्छी खासी कमाई करता था। उसके तीनों भाइयों की दिलचस्पी पालिटिक्स में थी! देवेश सपा का कार्यकर्ता था , रमेश बसपा का, और महेश भाजपा का। यही पार्टियां पिछले बीस सालों से सत्ता में आ जा रही थीं और क्षेत्रा में विधायक और सांसद भी इन्हीं पार्टियों के हो रहे थे! तीनों ने बड़ी समझदारी से किसी न किसी नेता को पकड़ रखा था! वे अपने अपने नेता के साथ रहते, घूमते, खाते पीते और जनता की सेवा करते - यानी ट्रांसफर करवाने या रुकवाने का काम करते! छोटी मोटी नौकरी से यह बड़ा और सम्मान का धंधा था! लोगों पर रौब भी रहता और दबदबा भी! इनके पास हर मंत्राी के साथ उठने बैठने और खाने पीने के किस्से होते!

वे जब कभी चार पांच दिन गायब रह कर गांव आते तो सीधे लखनऊ से या किसी महारैली से या ÷ हल्ला बोल' से ही आते!

इन भाइयों की पहुंच और पैसे की ताकत का बोध रघुनाथ को तब हुआ जब उन्हें दस बारह दिन दौड़ना पड़ा - कभी लेखपाल के पास, कभी थाने पर, कभी एस.डी.एम. के ऑफिस में। कुर्सी सबने दी, सम्मान सबने किया, ध्यान से सुनी उनकी बातें और अंत में कहा - ÷÷ मास्साब! आप विद्वान्‌ हैं, शरीफ हैं, आपकी सब बातें सही हैं लेकिन किस झमेले में अपने को डाल रहे हैं? वे सब अच्छे आदमी हैं क्या?' मुंह से बोल कर तो कुछ नहीं कहा, इशारों से जरूर समझा दिया कि कर तो सकते हैं कुछ न कुछ, लेकिन बातों से तो सिर्फ बातें ही कर सकते हैं न।

उसी दौरान उन्हें यह भी पता चला कि घराने के आठों परिवारों में से हर परिवार को चुप रहने के लिए नरेश ने दो दो हजार दिये थे!

रघुनाथ दौड़ लगाते लगाते थक गये थे! यह उमर भी ऐसे कार्यों के लिए नहीं रह गयी थी। अब पहले जैसा दमखम भी नहीं रह गया था। घुटनों में भी दर्द रहता था और गरदन में भी। शीला अलग मरीज थी दमा और गैस की! जब भी रघुनाथ के सामने आती , डकार लेती हुई ही आती। और पिछले दिनों की घटना और पति की परेशानी ने तो उसे और भी नर्वस और निराश कर दिया था।

रघुनाथ दोपहर के खाने के बाद नीम के नीचे लेटे थे और सोच रहे थे कि अब क्या करें ? एकमात्रा रास्ता उन्हें दिखाई पड़ रहा था - कचहरी! लेकिन वह रास्ता बहुत लम्बा था। वह जानते थे कि तारीख पर तारीख पड़ती जाएगी। इसी तरह एक दिन वे आते जाते मर जाएंगे और फैसला नहीं होगा!

इसी बीच शीला आयी। उसने कहा - ÷÷ अजीब आदमी हैं आप? अकेले चिन्ता में मरे जा रहे हैं, जिन्हें यह सारा कुछ सम्भालना है, उनसे सलाह क्यों नहीं ले रहे हैं? पूछिए तो उनसे?''

÷÷ किनसे - बेटों से?''

÷÷ हां, माना कि एक दूर है लेकिन दूसरा तो पास है!''

÷÷ बिल्कुल सही कह रही हो।'' उन्होंने राहत की सांस ली - ÷÷ बताओ भला! इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था!''

वे उठे और शीला के साथ फोन पर जुट गये। शीला उन्हें बार बार हिदायत देती रही कि धकियाने, पटकने, मारने पीटने की बात का जिक्र नहीं करना है वरना परेशान हो जाएगा और पढ़ायी छोड़ कर बीच में ही चल देगा! लाइन मिली रात को दस बजे के बाद! स्वर पर संयम रखते हुए, रघुनाथ ने विस्तार से सब कुछ बताते हुए उससे राय मांगी। यह भी कहा कि यहां से कैलिफोर्निया की लाइन नहीं मिलती, संजू से भी सलाह लेकर बताना!

राजू ने सुनते ही बीच में टोक कर कहा - ÷÷ क्यों मरे जा रहे हैं जमीन को लेकर? छोड़िए उसे और सुनिए, भाभी बनारस आ गयी हैं अशोक नगर में। ज्वाइन कर लिया है यूनिवर्सिटी में। आप मां को लेकर चले जाइए और वहीं रहिए और सुनिए .....''

सुनने से पहले ही फोन रख दिया रघुनाथ ने! वे माथा पकड़ कर वहीं बैठ गये!

÷÷ क्यों, क्या हुआ?'' शीला ने पूछा!

÷÷ हुआ क्या? अब सम्भालो उसे। उड़ कर आ रहा है हवाई जहाज से! आते ही गोली मार देगा नरेश को! वह सब बर्दाश्त कर लेगा, बाप की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं करेगा....''

÷÷ अरे रोको, रोको उसे!''

÷÷ उसे तो रोक देंगे, संजय को कैसे रोकेंगे? वह तो वहीं से मिसाइल मारेगा उसके घर पर?''

शीला को संदेह हुआ अपनी समझ पर और वह चुप होकर उन्हें देखने लगी!

÷÷ सालो!'' कहते कहते उन्होंने सिर उठा कर शीला को देखा - ÷÷ मुझे डर था इसीलिए मैं बात नहीं कर रहा था लेकिन तुम्हारे कहने पर की। मैं इतना बेवकूफ नहीं था कि मेरे दिमाग में न आया हो। लेकिन तुम्हारी जिद पर किया! जाने कहां से इतने नालायक और निकम्मे लड़के पैदा हो गये - साले! पिछले जनम के पाप! .... मैंने तीस पैंतीस साल नौकरी की, लाखों कमाये और आज हाथ में एक पैसा नहीं! इस हाथ आये, उस हाथ गये। पूछो कि कहां गये तो नहीं बता सकता। और यह जमीन? आज भी जहां की तहां है! रत्ती भर भी टस से मस नहीं हुई अपनी जगह से! इसने तुम्हारे आजा को खिलाया, दादा परदादा को खिलाया, बाप को खिलाया, तुम्हें खिलाया, यही नहीं, तुम्हारे बेटों और नाती पोतों को भी खिलायेगी! तुम करोड़ों कमाओगे लेकिन रुपैया और डालर नहीं खाओगे। भगवान न करे कि वह दिन आये जब बैंक चावल दाल के दाने बांटे।'' उन्होंने जांघ पर मुक्का मारा शीला की ओर ताकते हुए - ÷÷ साले, तुम लोग बड़े हुए हो अपनी मां का दूध पीकर। और तुम्हारी मां की महतारी है यह जमीन। चावल, दाल, गेहूं, तेल, पानी, नमक इसी जमीन के दूध हैं। और बोलते हो कि हटाइए उसे? छोड़िए उसे?''

गुस्से में रघुनाथ क्या क्या बोलते रहे , उन्हें खुद कुछ पता नहीं।

किसी तरह शीला ने उन्हें सम्भाला और पकड़ कर आंगन में ले गयी - ÷÷ जाओ, सो जाओ। सोचो मत।''

 

( ६)

इन्हीं दिनों रघुनाथ को एक इलहाम हुआ।

कि ÷ शरीफ' इंसान का मतलब है निरर्थक आदमी; भले आदमी का मतलब है ÷ कायर' आदमी। जब कोई आपको ÷ विद्वान' कहे तो उसका अर्थ ÷ मूर्ख' समझिए, और जब कोई ÷ सम्मानित' कहे तो ÷ दयनीय' समझिए।

उन्हें हर जगह यही कहा गया और उनका कोई काम नहीं किया गया! उन्हें हर जगह ÷ हट हट' और ÷ दुर दुर' किया गया। वे उस ÷ बकरी' या ÷ गाय' की तरह हैं जो सिर्फ ÷ में में' या ÷ बां बां' कर सकती है, मार नहीं सकती! यही उनकी छवि है सबके आगे - मिमियाने घिघियाने वाले मास्टर की। यह उनकी छवि नहीं है - यही हैं वे।

वे इस छवि को तोड़ने की सोच ही रहे थे कि बब्बन सिंह ने वह अवसर दे दिया!

उस समय रघुनाथ अपने खलिहान में थे। वे मचिया पर बैठे थे और सामने सनेही अपने और उनके हिस्से का गेहूं तौल रहा था। बगल से गुजरते हुए बब्बन खड़े हो गये! गांव के सबसे बुजुर्ग और मानिन्द। गांव ही नहीं , पास पड़ोस में भी कहीं विवाद होता तो एक पंच के रूप में किसी न किसी पार्टी की ओर से वह भी होते! यह अलग बात है कि वे मामला सुलझाने के बजाय और उलझा कर आते! यह उन्हें अच्छा नहीं लगा था कि रघुनाथ जाने कहां कहां दौड़े, उनके पास नहीं आये! रघुनाथ ने उन्हें देखा लेकिन कोई भाव नहीं दिया!

÷÷ मास्टर!'' उन्होंने आवाज दी!

रघुनाथ पास गये और प्रणाम किया!

÷÷ जमीन तुम्हारी है, गांव समाज या नरेश का उससे क्या लेना देना? दूसरा कोई कैसे कब्जा कर लेगा?''

÷÷ इतना तो मैं भी जानता हूं!''

÷÷ जानते हो तो विधायक जी से क्यों नहीं मिलते?''

÷÷ किस विधायक से?''

÷÷ अरे वही, अपने कालेज के मैनेजर?''

माथा ठनका रघुनाथ का। इसका मतलब इस पूरे मामले के तार वहां से भी जुड़े हैं। संजय की शादी से! उसे उन्हें रिटायर करने और पेन्शन रुकवाने से ही संतोष नहीं हुआ - और ये हैं घराने के सबसे बुजुर्ग और मानिन्द जो नरेश को न समझा कर मुझे समझा रहे हैं? और समझा नहीं रहे हैं उसमें ÷ रस' ले रहे हैं! इसी समय रघुनाथ के दिमाग़ में एक ÷ खल' विचार आया!

÷÷ कक्का!' वे बब्बन का हाथ पकड़ कर थोड़ी दूर ले गये - '' आप से एक सलाह लेना चाहता था कई दिनों से! जब आप मिल ही गये हैं तो कहिए यहीं पूछ लूं?''

÷÷ बोलो, बोलो!''

÷÷ मन तो नहीं बनाया है लेकिन कभी कभी सोचता हूं वह जमीन ही बेच दूं!''

बब्बन उन्हें आश्चर्य से देखते रहे - ÷÷ तुम्हें पता है कितनी कीमती है वह जमीन? आबादी के अंदर की? कितने काम की? उसे बेचना सोना बेचने जैसा है! और बेचोगे क्यों?''

÷÷ सिरदर्द रखने से क्या फायदा?''

÷÷ यही तो चाहता है नरेश।''

÷÷ लेकिन उसे नहीं बेचना है। उसने जो किया है मेरे साथ, उसे कैसे भूल सकता हूं?''

÷÷ तो फिर?''

÷÷ फिर क्या? अभी तो यही सोचा है कि उसे नहीं देना है, बाकी तो घर है, गांव है, आप चाहेंगे तो आप भी हैं। देखा जाएगा, कोई जल्दी थोड़े है?''

बब्बन थोड़े गम्भीर हुए - ÷÷ और उसके कब्जे का क्या करोगे?''

÷÷ कब्जे का क्या, खूंटा है। और कुछ नहीं तो जो उखाड़ कर फेंक देगा, उसे भी दे सकता हूं। मैनेजर साहब भी तो खोलना चाहते हैं बच्चों के लिये अंग्रेजी स्कूल? इसी इलाके में कहीं? यहीं खोलें?

÷÷ अरे, गांव घर के लोग मर गये हैं क्या कि बाहर के आदमी को दोगे?''

÷÷ नहीं, एक बात कह रहा हूं! अभी कुछ तय थोड़े है!'' रघुनाथ ने धीरे से कहा - ÷÷ मैं दान तो कर नहीं रहा हूं किसी को? जब वाजिब और सही मिलेगा तभी न?''

÷÷ तुम तो गांव में फौजदारी करा दोगे मास्टर!'' चिन्तित होते हुए बब्बन बोले!

÷÷ मैं क्या कराऊंगा? जब वे खुद ही करने पर उतारूं हों तो कोई क्या कर सकता है?'' रघुनाथ ने उनके कान के पास मुंह ले जाकर कहा- ÷÷ लेकिन ये बातें अपने तक रखने की हैं। दुनिया भर के लोग आते रहते हैं आपके पास! क्या फायदा कहने से? है न? तो चलें ...''

रघुनाथ खलिहान की ओर मुड़ गये। सनेही ने दूसरी बार पूछा था कि गेहूं के गल्ले को बखार में आज ही रख दें या कल के लिए छोड़े। शीला का कहना था कि अरहर और सरसों भी बंट जायं तो सभी बारी बारी से रख दिये जायं। रघुनाथ ने निर्णय शीला पर छोड़ा और बरामदे में जाकर बैठ गये! शीला भी पीछे पीछे आयी - ÷÷ क्यों लसरिया रहे थे उनसे? सारी खुराफात की जड़ तो वही हैं।''

÷÷ तुम चुप रह कर तमाशा देखो! मैंने काफी मसाला दे दिया है उन्हें। अब कल से यहां बैठकी लगाना शुरू कर देंगे लोग!'' रघुनाथ के चेहरे पर राहत और संतोष की चमक थी। शीला ने उखड़े मन से पूछा - ÷÷ तुम जमीन बेचने की बात कर रहे थे उनसे?'' रघुनाथ हंसे - ÷÷ बात ही कर रहा था, बेच नहीं रहा था। बेचना भी नहीं है मुझे! मेरी अपनी कमार्ई चीज है भी नहीं कि बेचूं! बाप दादा के पास और उनके पुरखों के पास भी कैसे आयी होगी, वही जानते होंगे! लेकिन ये लोग न खुद चैन से रहेंगे, न कोई रहना चाहेगा तो रहने देंगे! ... अब यही देखो, मेरा अपना कसूर कहां है? संजय ने शादी की। वहां की, जहां चाहा, जहां उसे अपना हित दिखा, भविष्य दिखा! मुझे भी अच्छा नहीं लगा लेकिन उसकी अपनी पसंद और अपनी जिन्दगी; हम क्या कर सकते थे? लेकिन उसकी सजा मैनेजर ने मुझे दी! फालतू में! मैंने भी कहा - ठीक है, गांव पर रहेंगे - सुख और शांति से। न ऊधो का लेना, न माधो का देना! एक समय था कि खेत खलिहान के सिवा कुछ नहीं था यहां - न अखबार था, न बिजली थी, न फोन था, न टी.वी. थी। आज सब है और पैदावार भी इतनी है कि हम दो के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना है। रही बाकी जरूरतें तो आज नहीं, कल पेंशन मिलेगी ही, देर भले हो! फिर किस बात का गम? क्यों?''

रघुनाथ ने मुसकराते हुए शीला को देखा - ÷÷ और हर सुख दुःख में हमेशा साथ देने वाली बीवी अभी जीवित है।'' उन्होंने उसे खींचा और अपने पास बिठा लिया! वह शरमाते हुए उनके पास बैठी रही और वे उसे एकटक देखते रहे - ÷÷ शीला, इन सब चीजों के सहारे जिन्दगी तो काटी जा सकती है, जी नहीं जा सकती!'' सहसा उनकी आवाज भारी और उदास हो गयी - ÷÷ शीला, हमारे तीन बच्चे हैं लेकिन पता नहीं क्यों, कभी कभी मेरे भीतर ऐसी हूक उठती है जैसे लगता है - मेरी औरत बांझ है और मैं निःसंतान पिता हूं! मां और पिता होने का सुख नहीं जाना हमने! हमने न बेटे की शादी देखी, न बेटी की! न बहू देखी, न होने वाला दामाद देखा। हम ऐसे अभागे मां बाप हैं जिसे उनका बेटा अपने विवाह की सूचना देता है और बेटी धौंस देती है कि इजाजत नहीं दोगे तो न्यौता नहीं दूंगी। और अब तुम्हारी नजर टिकी है राजू पर - कि सारी साधें वही पूरा करेगा। निहाल कर देगा तुम्हें। ऐसा कोई भ्रम हो तो निकाल दो अपने दिमाग से। मुझे पता है कि वह इनसे भी आगे जा रहा है! उसने एक ऐसी विधवा लड़की ढूंढ़ निकाली है जिसके दो साल का बच्चा है। यही नहीं, वह कोई अच्छी खासी सर्विस भी कर रही है। उसी के पैसे से दिल्ली में ऐश कर रहा है। मोटरबाइक ले ही गया है मस्ती के लिए। बच्चा पालना और ऐश करना - दो ही काम है उसके। गये थे डोनेशन की रकम लेकर, आज तक पता नहीं चल सका कि ऐडमिशन लिया भी या नहीं।''

÷÷ तुम इतना सब जानते थे, कभी बताया क्यों नहीं?''

÷÷ क्या कर लेतीं तुम? क्या करता बता कर? शीला, मैं जानता हूं उसे। पढ़ने में कभी दिलचस्पी नहीं रही उसकी! अपने बाप से किस तेवर में बातें करता है, इसे देखा है तुमने! वह ÷ शार्टकट' से बड़ा आदमी बनना चाहता है! उसके लिए बड़ा आदमी का मतलब है ÷ धनवान' आदमी। और वह भी बिना खून पसीना बहाये, बिना मेहनत के। वह महत्वाकांक्षी लड़का है लेकिन लालच को ही महत्वाकांक्षा समझता है! वह बहुत कुछ हासिल करना चाहता है - आनन फानन में लेकिन बिना पढ़े लिखे, बिना अच्छे नम्बर लाये, डिवीजन लाये, बिना प्रतियोगिताएं दिये, बिना खटे और नौकरी किये। मुझे नहीं पता, वह लड़की इसे कैसे मिली? कहां मिली? हो सकता है उसे भी किसी मर्द की तलाश रही हो। इतना पता जरूर है कि डेढ़ साल पहले किसी सड़क दुर्घटना में उसका पति मरा था! इस लड़की का अपना फ्लैट है, कार है, आफिस के काम से सिंगापुर, बैंकाक भी आती जाती रहती है और वह उसका बच्चा सम्भालता है और घर अगोरता है। जैसे हम नहीं जानते, वैसे ही वह नहीं जानती कि इसके मन में क्या है, इसके इरादे क्या हैं?''

÷÷ तुम्हें इतना सब कैसे मालूम?'

÷÷ यह न पूछो। नोएडा में मेरे भी अपने आदमी हैं जो आते जाते रहते हैं।''

शीला चिन्तित हो उठी - ÷÷ सारे दुख इसी बुढ़ापे में देखने बदे थे क्या? एक बेटा परदेस में, पता नहीं, कब आयेगा; दूसरा यहां लेकिन उसका भी वही हाल। बल्कि उससे भी खराब! और इधर बाप की अलग मुसीबत। गांव छोड़ें तो जान बचे, नहीं मारे जाएं। न कोई देखने वाला, न सुनने वाला! जाने किस मनहूस की नजर लग गयी है इस घर को?

रघुनाथ को वहीं अकेला छोड़ कर वह चुपचाप अंदर गयी और लेट गयी!

 

( ७)

घर में फोन अब जी का जंजाल हो गया था! जब रघुनाथ ने कनेक्शन लिया था तो राजू की जिद पर - कि संजू अमेरिका से जब बात करना चाहेगा तो कैसे करेगा? कोई संदेश ही देना हो तो? भाभी ही मम्मी से कुछ बोलना या पूछना चाहें तो? मुझे ही कोई सलाह लेनी हो तो? चिट्ठी पत्राी कौन लिखता है आज? किसके पास इतना फालतू समय है? और सरला दीदी भी तो हैं शहर में, उनसे नहीं बात करनी है क्या आप और मम्मी को?... तो हर हाल में जरूरी है यह। गांव में ही बेमतलब थोड़े लिये हैं लोगों ने?

फोन लगा तो राजू के लिए। जब भी घर में रहता था , जुटा रहता था उस पर - कभी इस दोस्त को, कभी उस दोस्त को। संजू की तो लाइन ही नहीं मिलती थी! हां, कभी कभी सरला जरूर मिल जाती थी! अब, जब राजू बाहर है तो फोन उसी तरह बेकार पड़ा था जैसे चरनी और खूंटा या हल और हेंगा!

इसीलिए रात में जब फोन की घंटी बजी तो रघुनाथ और शीला ने डर कर एक दूसरे को देखा! घंटी बज कर बंद हो गयी , उनमें से किसी ने उत्साह नहीं दिखाया! जब दूसरी बार बजी तब रघुनाथ उठे और रिसीवर उठाया - ÷÷ हलो!''

दूसरी तरफ से स्वर सोनल का था। पहचाना उन्होंने। देर तक सुनते रहे फिर शीला को रिसीवर पकड़ा दिया! और माथे पर हाथ रख कर चुपचाप बैठ गये!

थोड़ी देर बाद दोनों तरफ से सुबकने की आवाज सुनायी पड़ी उन्हें!

वे उठे और अपने बिस्तर पर आ गये!

रिसीवर रख कर शीला भी आयी और अपने बिस्तरे पर बैठ गयी!

÷÷ वह कल आ रही है हमें ले जाने के लिए!''

÷÷ तुम्हें जाना हो जाओ, मुझे नहीं जाना!''

÷÷ बहुत रो रही थी! पूछ रही थी कि हमारी कौन सी ऐसी गलती है कि देखने के लिए आना तो दूर, आप लोगों ने फोन तक नहीं किया?''

÷÷ उसने किया फोन? हम सपना देख रहे हैं कि महारानी लौट आयी हैं अपने देश? आकाशवाणी हुई थी उनके आगमन की?''

÷÷ यह तो न बोलो। राजू ने नहीं बताया था?''

÷÷ मैं किसी राजू फाजू को नहीं जानता! उसने क्यों नहीं किया? बाप को कर सकती थी, ससुर को नहीं कर सकती? बाप को बुलाया, ज्वाइन किया, अशोक विहार आयी, इतने दिन से रह रही है, बीच में पापा मम्मी नहीं याद आये, आज याद आ रहे हैं! ऐसे ही तो नहीं याद आये हैं कोई बात होगी जरूर!

÷÷ रो रो कर कह रही थी कि मैं पापा मम्मी के बिना नहीं रह सकती!''

÷÷ झूठ बोलती है! फुसला रही है तुम्हें हमें। जानती ही कितना है हमें? न कभी देखा है, न मिली है वह क्या जाने पापा मम्मी को? मैं तो जानता भी नहीं कि मेरे कोई बहू है!''

÷÷ बहू न सही, बेटा तो है! न जाएं तो वह क्या सोचेगा?''

÷÷ भाड़ में जाय बेटा बेटी बहू - दुनिया! सबकी चिन्ता करने के लिए हमीं हैं? ÷÷ रघुनाथ खासे तनाव में आ गये!''

÷÷ उसे तो चिन्ता है कि लोग क्या कहेंगे? सास ससुर गांव में पड़े हैं और बहू शहर में मजे कर रही है।''

÷÷ यह तुम कह रही हो - अपने मन से। समझा? कुछ कहलाओ मत मुझसे!'' रघुनाथ उठे और आंगन में टहलने लगे।

नींद गायब हो चुकी थी उनकी! वे कोई निर्णय नहीं कर पा रहे थे। वे गांव से आजिज भी आ गये थे लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहते थे! मन शहर और कालोनी की ओर बहक रहा था - जीवन के नयेपन की ओर, नयी जिन्दगी की ओर, साफ सुथरे पक्के मकानों और कोलतार पुती सड़कों की ओर, गंगा के घाटों की ओर, अनजाने नये सम्बंधों की ओर। ये आकर्षण थे मन के लेकिन उधर जाने में हिचक भी रहा था मन कि कहीं ऐसा न हो कि पिछवाड़े की जमीन हाथ से निकल जाय, बिना रख रखाव के मकान ढह जाय, सनेही चोरी और बेइमानी शुरू न कर दे, कहीं लोग हमेशा के लिए गांव से गया न मान लें। और ऐसा कहने वाले भी तो कम न होंगे कि देवेश ने एंड़ क्या लगायी कि गांव ही छोड़ कर भाग गये। इससे बड़ी जगहंसायी और क्या हो सकती है?

वे आंगन का चक्कर काटते हुए वहां खड़े हो गये जहां से खपरैलों से ऊपर उठता चांद नजर आ रहा था। वे उसे ऐसे देखने लगे जैसे गांव छोड़ने के बाद फिर नहीं दिखेगा - या उससे पूछ रहे हों कि तुम्हीं बोलो - क्या करना चाहिए?

यह चैत महीने की रात थी! दशरथ यादव ने अपने दरवाजे के सामने नया नया शिव मंदिर बनवाया था! पिछले दस घंटे से वहां अखंड हरिकीर्तन चल रहा था। कीर्तनियों ने मंदिर के बगल में खड़े नीम के पेड़ पर लाउडस्पीकर बांध रखा था और पूरा गांव ÷ हरे राम, जै जै राम' से गूंज रहा था! यह एकरस और उबाऊ गूंज उनके मन को बोझिल बना रही थी!

÷÷ तुम जाओ, मैं यहीं रहूंगा अपने घर! सुना?'' उन्होंने ऊंची आवाज में शीला से कहा!

÷÷ तुम्हें अकेला छोड़ कर? ना बाबा ना, पता नहीं क्या हो जाय यहां?'' शीला वहीं से बोली - ÷÷ और वह भी तो घर ही है। संजू क्या कहता था? हम चाहते हैं कि पापा मम्मी के अंतिम दिन काशी में बीतें। चैन से बीतें। जब समय आया है तो ना नुकुर कर रहे हो? सोनल परायी नहीं, बहू है हमारी!''

÷÷ तुम समझती क्यों नहीं? सोनल बहू है लेकिन घर बहू का है, हमारा नहीं! किस हैसियत से जाऊं मैं? मेहमान बन कर? किरायेदार बन कर? किस हैसियत से?''

इस ओर ध्यान नहीं गया था शीला का। वह थोड़ी देर के लिए तो अचकचायी फिर बोली - ÷÷ ठीक है, उसका घर है मगर संजू तो है न? वह तो हमारा बेटा है। देर सबेर तो आना ही है उसे! राजू से उसी ने कहा था न कि पापा मम्मी को भेज दो। और सोचो तो बहू का घर क्या हमारा घर नहीं है!''

रघुनाथ चुप रहे! कुछ नहीं बोले।

÷÷ देखो, हम चलें। ऐसा नहीं कि यह घर छोड़ कर जा रहे हैं। कभी भी लौट आयेंगे इसमें! जब परेशानी होगी तो आ जाएंगे! खेती का जिम्मा दे ही दिया है सनेही को! रह गया है घर तो दस बिस्सा खेत और दे दो गनपत को। कमरे सब बंद करके दरवाजे की ताली उसे दे दो। साफ सफायी और देखभाल करता रहेगा।''

शीला की बात में दम दिखायी पड़ा रघुनाथ को। उन्हें चार दिन बाद जाना भी था पेंशन के काम से। दिक्कत केवल यही थी कि गनपत मिर्जापुर गया था अपने बेटे के पास!

÷÷ तो ऐसा करो शीला, तुम तो सोनल के पास कल जाओ! मैं यहां की व्यवस्था करके पांचवें दिन पहुंचूंगा! पेंशन आफिस में अपना काम निपटा कर सीधे अशोक नगर आ जाऊंगा! कोई जरूरी बात हो तो फोन पर खबर कर देना! अरे हां, फोन का कनेक्शन भी तो कटवाना पड़ेगा! खैर, अपनी तैयारी करो तुम - गेहूं, चावल, दाल, घी अचार। थोड़ा बहुत जो ले जा सको, ले जाओ!''


( ८)

रघुनाथ ने कहा था पांच दिन लेकिन लग गये पचास दिन!

इसमें उनका कोई दोष नहीं था। सोचा था कि जब जाना ही है तो यहां की सारी समस्याएं निपटा कर जाएं , यह न हो कि रहें वहां और मन लगा रहे यहां!

बहुत सोच विचार कर उन्होंने फैसला किया कि रुकी हुई पेंशन हो या आबादी की जमीन जब इन दोनों की जड़ में मैनेजर ही हैं तो उनसे एक बार मिल लेने में हर्ज ही क्या है ? अगर इतने से ही उनका ÷ ईगो' तुष्ट होता हो तो यह कहने में क्या बुरा है कि आज हम जो कुछ हैं, आप के ही कारण हैं, नौकरी न दी होती तो जाने कहां होते? जब बनाया है तो बिगाड़िए मत।

अब स्थितियां भी बदल गयी थीं। मैनेजर की बेटी की शादी हो चुकी थी वनमंत्राी के ठेकेदार बेटे से। वे पड़ोस के जिले के थे। मैनेजर से ऊंचे स्टेटस के। अब रघुनाथ से शिकायत की कोई वजह भी नहीं रह गयी थी! वे मिठाइयों के पैकेट और सेब , संतरे और अंगूर के साथ जब पहुंचे तो मैनेजर - जिन्हें लोग ÷ सरकार' बोलते थे, अच्छे मूड में थे। रघुनाथ को देखते ही उन्होंने चुहल के अंदाज में कहा - ÷÷ मास्टर! तुम्हारी सेहत देख कर लगता है, तुम्हें शुरू से ही तनख्वाह न लेकर पेंशन ही लेनी चाहिए थी! जवानी तो अब आयी है तुम पर!''

÷÷ सरकार!'' रघुनाथ के मुंह से निकला और वे रो पड़े!

÷÷ क्यों? क्या हुआ? अब तक ÷ नोड्यूज' क्लियर नहीं किया क्या?'' मैनेजर ने चौंक कर पूछा और प्रिंसिपल को फोन किया - फिर कहा - ÷÷ जाइए, चिन्ता मत कीजिए, हो जाएगा? और कुछ?''

रघुनाथ ने नरेश और बब्बन सिंह का पूरा किस्सा बताया! वे चुपचाप सुनते रहे। थोड़ी देर बाद बोले - ÷÷ जब ये आपके घर के थे तो बंटाई पर इन्हें न देकर बाहर के आदमी को क्यों दिया? गलती तो आप की भी है!''

रघुनाथ कुछ नहीं बोले। उनसे यह बताना बहुत मुनासिब नहीं लगा कि बाहर के आदमी को तो कभी भी हटाया या भगाया जा सकता है लेकिन इन्हें मुश्किल होता! उन्होंने इतना भर कहा - ÷÷ हां, गलती तो हो गयी! अब कुछ किया भी तो नहीं जा सकता!''

÷÷ आप समस्याएं खड़ी करते रहिए और मैं निपटारा करता रहूं, यही न?'' मैनेजर ने एस.डी.एम. को फोन किया और इशारे से कुछ समझाया!

रघुनाथ इस दौरान सिर झुकाये बैठे रहे!

÷÷ अब किस सोच में हैं? जाइए और बब्बन सिंह को भेज दीजिएगा!'' वे उठे और बाथरूम में चले गये! जाते जाते कहा - ÷÷ हो सकता है, एस.डी.एम. आफिस दौड़ना पड़े कुछ एक बार! दौड़ाये और आपसे कुछ कहे तो उसके आगे बहुत सिद्धांतवादी बनने की जरूरत नहीं है! सबकी कुछ न कुछ मजबूरियां होती हैं। ठीक?''

बीस पच्चीस दिन के जद्दोजहद के बाद एक दिन एस.डी.एम. दो सिपाहियों और लेखपाल के साथ आया - जरीब और गांव का नक्शा लेकर और सबके सामने जमीन की पैमाइश की! अबकी जमीन का वह हिस्सा भी रघुनाथ के हक में निकला जिसमें नरेश का घर दुआर था! इसका मतलब था कि रघुनाथ चाहें तो नरेश का घर दुआर गिरा दें या रहने दें या उतनी जमीन की कीमत वसूल करें।

इसे रघुनाथ की भलमनसाहत पर छोड़ दिया गया!

यह उनकी बड़ी सफलता थी - निश्चिन्तता भी! पापड़ तो बहुत बेले लेकिन सम्मान लौट आया! अब वे बनारस जा सकते थे महीने दो महीने के लिए। अगर मन वहां लग गया तो संदेश और फोना फोनी से भी काम चल जाएगा!

उन्होंने जाने की तैयारियां शुरू कर दीं और तैयारियां क्या करनी थीं - राशन फिलहाल के लिए चला ही गया था। दो छोटी छोटी बोरियों में अलग अलग आलू और प्याज! चार बजे की बस के लिए इसी की तैयारी कर रहे थे कि बाहर डांट डपट की आवाज सुनायी पड़ी!

निकले तो देखा - जगनारायण यानी जग्गन। काफी उखड़े हुए और नाराज। उनके एक हाथ में कल्लू का कान है और दूसरे हाथ में दो अधपके आम! डरे हुए कल्लू को पकड़े हुए वे सनेही के झोपड़े के आगे खड़े हैं - ÷÷ सनेही? सनेहिया रे!''

अंदर से सनेही की औरत निकली - ÷÷ क्या है मालिक?''

÷÷ तुम औरत जात! तुमसे क्या बात करें? सनेही को भेजो!''

उसने झपट कर कल्लू को खींचा , दो लप्पड़ और मुक्के मारे और धकियाते हुए अंदर ठेल दिया। वह चीखता चिल्लाता अंदर चला गया!

मामला समझते देर नहीं लगी रघुनाथ को! घराने में सबके दरवाजों के आगे नीम के पेड़ हैं , अकेले वही हैं जिनके दरवाजे के सामने आम का पेड़ है। टिकोरे लगने से लेकर उसके पकने तक जिसकी नौबत शायद ही कभी आती हो - घराने के लड़के बच्चे हाथ में ढेले छिपाये उसके इर्द गिर्द मंडराते रहते हैं और जग्गन तब तक उसके नीचे खटिया डाले पड़े रहते हैं जब तक गर्मी बर्दाश्त के लायक रहती है! घराने भर की चटनी अचार का काम - उनके लाख एहतियात के बावजूद उसी से चलता है! इधर से ढेले चलते हैं, उधर से जग्गन पकड़ने की घात में रहते हैं। एक को पकड़ते हैं, तीन मौका पा जाते हैं। उनकी और बच्चों की यह व्यस्तताएं कभी कभी डेढ़ दो महीने तक चल जाती हैं।

÷÷ आओ आओ जग्गन! हमसे बताओ क्या बात है?''

÷÷ काकी हैं ही नहीं, आयें तो क्या आयें आपके यहां?''

÷÷ आओ तो, बैठो तो सही!'' उन्होंने जग्गन को सामने की खटिया पर बैठने का इशारा किया और आवाज दी झोपड़े के आगे खड़ी सनेही की औरत को - ÷÷ जग्गन को सतुए का घोल तो पिलाओ। सुराही के पानी में बनाना!''

जग्गन थोड़े सहज हुए और बैठ गये , फिर अपनी लुंगी के फेंटे से सुर्ती की डिबिया निकाली और मलने लगे। बोले - ÷÷ मास्टर कक्का, आपने यह भारी गलती की! कोइरी कहार को अपने बीच में बसा के आपने भारी गलती की!''

÷÷ इसमें गलती क्या है?''

÷÷ अरे? आपको दिखायी ही नहीं पड़ती है? इसी रास्ते हम दिन रात आते जाते हैं, ये बैठे हैं तो बैठे हैं; लेटे हैं तो लेटे हैं। बड़ों के बीच रहने का सहूर नहीं! और इनके बच्चे?...''

बीच में ही रघुनाथ ने टोक दिया - ÷÷ देखो जग्गन, फालतू हैं ये बातें। समय बहुत बदल गया है! आज मानसिक रूप से विकलांग ही ऐसी बातें करते हैं। किस बात के बड़े हैं हम तुम? पुरखों की जमीन और जाति के भरोसे? छब्बू की हत्या के बाद भी यह भ्रम पाले हो तो पाले रहो! पिछले दिनों तुमने ही अपने खेत बेचे। ठाकुरों में ही किसी ने क्यों नहीं खरीदा? चाहते तो यही थे तुम, लेकिन तुम्हें नगद चाहिए था बेटी की शादी के लिए; क्यों नहीं खरीदा? खरीदा तो आखिर जसवंत ही ने! आज भी हमारी तुम्हारी खेती उसके भरोसे होती है, टै्रक्टर उसके पास है, रुपये उसके पास हैं! विधायक उसके हैं, सांसद उसके हैं, सरकार उसकी है, वे आते भी उसी के पास हैं, किसी काम के लिए सिफारिश भी करवानी होती है तो आप उसी के पास जाते हैं फिर भी बड़े हैं आप? ऐसी गलतफहमी पालनी है तो पाले रहो! हां, यह जरूर है कि वह दूसरे गांव का है, पराया है, अधिया पर देना ही था तो उसके बजाय किसी अपने को देना चाहिए था। अब तुम्हीं बताओ, कौन अपना है जिसे देता?''

जग्गन पशोपेश में चुप रह गये। रघुनाथ का निकटतम पड़ोसी था नरेश - उन्हीं के भाई का बेटा जिसकी नजर बराबर पिछवाड़े की जमीन पर थी।

थोड़ी देर इंतजार के बाद रघुनाथ फिर बोले - ÷÷ देखो जग्गन, ÷ परायों' में अपने मिल जाते हैं लेकिन ÷ अपनों' में अपने नहीं मिलते। ऐसा नहीं कि अपने नहीं थे - थे लेकिन तब जब समाज था, परिवार थे, रिश्ते नाते थे, जब भावना थी! भावना यह थी कि यह भाई है, यह भतीजा है, भतीजी है, यह कक्का है, यह काकी है, यह बुआ है, भाभी है। भावना में कमी होती थी तो उसे पूरी कर देती थी लोक लाज कि यह या ऐसा नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेंगे? धुरी भावना थी, गणित नहीं, लेन देन नहीं!'' इसी बीच सत्तू का घोल दे गयी सनेही की औरत, रघुनाथ चुप हो गये। उसके जाने के बाद फिर शुरू किया - ÷÷ अब तुम्हीं बताओ, नरेश से अधिक कौन अपना था? सोचा था, उसको देकर निश्चिन्त हो जाऊंगा। हालांकि उसकी नीयत पर शक था - बहुत पहले से। और उसे न देकर अच्छा ही किया वरना वह दिन भी आता जब अपने खेत में क्या, गांव में ही मुझे घुसने न देता। और कहने की जरूरत नहीं कि उस वक्त तुम भी मेरा नहीं, उसका साथ देते! .... हां, सनेही को मैं जानता हूं। वह अपने काम से काम रखने वाला आदमी है। तुम्हें या किसी को कोई शिकायत हो तो बताना! मौका ही नहीं देगा, बताओगे क्या?''

 

III

वह घर जिसे रांची के प्रोफेसर राजीव सक्सेना ने रिटायर होने के बाद अपने रहने के लिए बनारस में बनवाया था और जिसे अपनी बेटी सोनल के नाम कर दिया था , वह ÷ अशोक विहार' में था।

बनारस में मुहल्ले थे , नगर, विहार और कालोनियां नहीं। इनका निर्माण शुरू हुआ १९८०-९० के आसपास जब पूर्वांचल और बिहार में भू माफियाओं और बाहुबलियों का उदय हुआ! उन्होंने नगर के दक्खिन, पच्छिम और उत्तर बसे गांव के गांव खरीदे और उनकी ÷ प्लाटिंग' करके बेचना शुरू किया! देखते देखते पंद्रह बीस वर्षों के अंदर गांव के वजूद खत्म हो गये और उनकी जगह नये नये नामों के साथ नगर, कालोनियां और विहार बस गये!

यह नया बनारस था - महानगरों की तर्ज का।

मुहल्लों में रहने वाले मुहल्लों और महालों में ही रहे - अपने पुश्तैनी काम धंधों, दुकानों, रोजगारों और घाटों के साथ लेकिन इन कालोनियों में बसने वाले ज्यादातर नये नागरिक थे!

ये बाहर से आये थे। आसपास के जनपदों से! जिलों से! सौ पचास किलोमीटर की दूरी से! इनके अपने गांव थे , थोड़ी बहुत जमीन थी, खेती बारी थी। उन्हें समय समय पर बनारस आना ही पड़ता था - कभी कोर्ट कचहरी के काम से, कभी अस्पताल के काम से, कभी तीरथ बरत के लिए, कभी शादी ब्याह की खरीददारी के लिए, कभी बच्चों के ऐडमीशन और पढ़ाई के लिए। बार बार आकर लौटने से बेहतर था कि यहां ठहरने और रुकने का एक स्थायी ठिकाना हो, एक डेरा हो।

लेकिन ऐसा सिर्फ उन्हीं के लिए सम्भव था जिनके पास अपनी कोई छोटी मोटी नौकरी हो ; और अगर वह नौकरी काफी न हो तो बेटों में से कम से कम एक बाहर कमा रहा हो जिसके बच्चे गांव में बोर होते हों और वहां नहीं रहना चाहते, शहर के आदी हो गये हों और अपना हित उधर ही देखना चाहते हों।

हालांकि गांव में वह सब पहुंच रहा था धीरे धीरे , जो शहर में था - बिजली भी, नल भी, फ्रिज भी, फोन भी, टी.वी. भी, अखबार भी लेकिन वह मजा नहीं था जो शहर में था। मजा था भी तो उनके लिए जिनके पास टै्रक्टर था, थ्रेशर था, पम्पिंग सेट था, बोलेरो या सफारी थी जो खेती पेट के लिए नहीं, व्यवसाय के लिए कर रहे थे, जो एक नहीं, एक ही साथ सभी राजनीतिक पार्टियों के हमदर्द और मददगार थे!

ऐसे लोगों की कालोनियां भी दूसरी दूसरी थीं - लम्बे चौड़े प्लाटों वाली!

 

लेकिन ÷ अशोक विहार' उनकी कालोनी थी जो अध्यापक थे, बाबू थे, दोयम दर्जे के सरकारी गैर सरकारी कर्मचारी थे और इससे भी खास बात यह कि जो या तो रिटायर हो चुके थे या निकट भविष्य में रिटायर होने वाले थे!

न तो अखबारों में कोई विज्ञापन था , न किसी नुक्कड़ पर इस आशय की होर्डिंग कि इस कालोनी के प्लाट उन्हीं को बेचे जाएंगे जो पचास पचपन से ऊपर के होंगे और जल्दी ही रिटायर होंगे लेकिन जाने यह कैसे हुआ कि जब कालोनी तैयार हुई तो पाया गया कि यह बूढ़ों की कालोनी है! ऐसे बूढ़े बूढ़ियों की जिनके बेटे बेटी अपनी बीवी और बच्चों के साथ परदेस में नौकरी कर रहे हैं - कोई कलकत्ता है, तो कोई दिल्ली, कोई मुम्बई तो कोई बंगलौर और कइयों के तो विदेश में।

इनका दुःख अपरम्पार था। इन्होंने बेटे बेटियों के लिए अपने गांव छोड़े थे - अपनी जन्मभूमि - कि यह हमारे लिए तो ठीक, चाहे जैसे रह लें लेकिन उनके लिए नहीं। न बिजली, न पानी, न लिखने पढ़ने, न आने जाने की सुविधा! घर हो तो ऐसी जगह जहां से खेती बारी पर भी नजर रखी जा सके और बेटों बेटियों को भी असुविधा न हो! वे अपनी जगह जमीन, रिश्ते नाते, संगी साथी, बाग बगीचे, ताल तलैया छोड़ कर जिन संतानों के लिए आये, वे ही बाहर। इतने तक तो गनीमत थी। लेकिन अब हालत यह है कि जो जहां सर्विस कर रहा है, वह उसी नगर में रम गया है और वहां से लौट कर यहां नहीं आना चाहता। अगर वह आना भी चाहता है तो उसके बच्चे नहीं आना चाहते!

लीजिए यह नयी मुसीबत!

जिनके लिए बेघर हुए उन्हीं के अपने अलग घर!

यह नयी मुसीबत न उन्हें जीने दे रही थी , न मरने दे रही थी। गांव पर पुश्तैनी जमीन जायदाद। बाप दादों की धरोहर। न देखो तो कब दूसरे कब्जा कर लें, कहना मुश्किल। पुरखों ने तो एक एक कौड़ी बचा कर, पेट काट कर, जोड़ जोड़ कर जैसे तैसे जमीनें बढ़ायीं ही, चार की पांच ही कीं - तीन नहीं होने दीं और यहां यह हाल! जरा सा गाफिल हुए कि मेड़ गायब! महीने दो महीने में कम से कम एक बार गांव का चक्कर लगाते रहो। देख लें लोग कि नहीं, हैं; ध्यान है। हाल चाल लेते रहो, कुशल मंगल पूछते रहो, खुशी गमी में जाते रहो, सबसे बनाये रखो। अधिया या बंटाई पर खेती करो तब भी। दिया बाती और घर दुआर की देख रेख के लिए कोई नौकर चाकर रखो तब भी!

उनके बेटों के बचपन गांव में बीते थे। नगर में पढ़ाई के दौरान भी वे आते जाते रहते थे गांव पर। उन्होंने खेती भले न की हो लेकिन उन्हें इतना पता था कि उनके खेत कहां कहां हैं , कौन कौन से हैं - धान के, गेहूं के, दलहन के? उन्हें थोड़ी बहुत जानकारी थी। खेल या कुतूहल में ही सही बाप चाचा के साथ लगे रह कर उन्होंने अगोर की थी, बुआई कटाई देखी थी। लोग भी जानते थे कि यह फलाने का बेटा या भतीजा है। गांव घर से माया मोह के लिए इतना कम नहीं था लेकिन उनके बच्चे? वे तो दादा दादी को छोड़ कर पहचानते ही किसको हैं? और दादा दादी को भी कितना पहचानते हैं? चिन्ता उसकी होती है जिससे मोह होता है, प्रेम होता है; जिससे प्रेम ही नहीं, परिचय और सम्बंध ही नहीं, उसकी क्या चिन्ता? खेत भी उसे पहचानते हैं जो उनके साथ जीता मरता है। वे खेतों को क्या पहचानेंगे, खेत ही उन्हें पहचानने से इनकार कर देंगे!

ये सारी बातें बेटों की नजर में ÷ बुढ़भस' थीं। आप माटी में ही पैदा हुए और एक दिन उसी माटी में मिल जाएंगे! कभी उससे छूटने या ऊपर उठने या आगे बढ़ने की बात ही आपके दिमाग में नहीं आयी - क्योंकि उसमें भी गोबर नहीं तो माटी ही थी। क्या कर लिया खेती करके आपने? कौन सा तीर मार लिया? खाद महंगी, बीज महंगा, नहर में पानी नहीं, मौसम का भरोसा नहीं, बैल रहे नहीं, भाड़े पर टै्रक्टर समय पर मिले, न मिले, हलवाहे और मजूरे रहे नहीं - किसके भरोसे खेती करो? और खेती भी तब करो जब हाथ में बाहर से चार पैसे आयें? क्या फायदा ऐसी खेती से?

असल चीज पैसा है! अगर हाथ में पैसा हो तो वे सारे जिन्स बिना कुछ किये बाजार में मिल जाते हैं जिनके लिए आप रात दिन खून पसीना एक करते हैं। बिना कुछ किये , बिना कहीं गये।

सारी जिच और सारा झगड़ा और सारा बवाल बेटों से उनका चल ही रहा था गांव को लेकर , कि अब एक नयी मुसीबत - ÷ अशोक विहार' के मकान का क्या होगा? वे जहां हैं, वहां से आना नहीं चाहते!

ये हैं कि इनसे न गांव छूट रहा है , न अशोक विहार - दुनिया भले छूट जाय!

 

( २)

इसी छोटे से अशोक विहार के लेन नं. ४ के डी-१ में अमेरिका से आयी सोनल सक्सेना रघुवंशी।

तीन साल बाद।

उसके डैडी आये थे सोनल की ÷ सैण्ट्रो' पहुंचाने और विश्वविद्यालय में ज्वाइन कराने। इतना ही नहीं किया उन्होंने, हफ्ते भर रह कर घर ठीक ठाक किया, उसे सजाया, संवारा, सुबह शाम बेटी को चाय पिलायी, उसकी दिनचर्या निर्धारित की और विदा होने से पहले उसे सलाह दी - ÷÷ संजू के पापा मम्मी को बुला लो, वे काम आयेंगे। घर भी देखेंगे और तुम्हारी भी मदद होगी!''

यही कहा था संजय ने भी अमेरिका से विदा करते समय - ÷÷ हम दोनों भाई बाहर हैं, पापा मम्मी गांव पर अकेले हैं। इस उमर में उन्हें सहारे की जरूरत है, उन्हें साथ रखना!''

यह पहली रात थी जब वह घर में अकेली थी। देर तक वह अपने बेडरूम में संगीत सुनती रही - एक कैसेट के बाद दूसरा कैसेट। शास्त्राीय से ऊबती तो अर्धशास्त्राीय, इससे भी ऊबती तो फिल्मी गाने! पढ़ती भी रहती, सुनती भी रहती! बिजली गुल करके सोने की आदत थी! बेडरूम को छोड़ कर बाकी कमरों की बत्तियां जली छोड़ दी और लेट गयी।

सन्नाटे की भी अपनी आवाज होती है और वह सुहानी कम , डरावनी ज्यादा होती है! यही नहीं, ये आवाजें सुनायी ही नहीं, दिखाई भी पड़ती हैं। उसके घर के सामने ही पार्क था - बड़ा सा। पूरे मुहल्ले या कह लो, कालोनी का। जब से आयी थी, तब से सुबह शाम देख रही थी! वह तीन साल से ऐसी दुनिया में रह कर आयी थी जहां अंधेरा नहीं होता था, जहां बूढ़े नहीं रहते थे, जहां हर चीज दौड़ती भागती उछलती कूदती नजर आती थी, जिसमें लपक चमक और कौंध थी, जहां जवान और जवानियां और तरह तरह के रंग थे, जहां कुछ भी अपनी जगह खड़ा और स्थिर नहीं दिखाई पड़ता था - और अब यह पार्क और यह कालोनी?

बूढों , अपंगों और विकलांगों का यह विहार!

फरवरी के इस महीने में खिड़कियों और दरवाजों पर थाप देती बसंती हवा और पार्क में घिसटते उड़ते सूखे , झड़े, बेजान पत्तों की मरमर चरमर!

मान लो , किसी के घर में कोई चोर घुस आये - किसी के क्या, मेरे ही घर में चोर घुस आये और वह भी अकेले, बिना किसी साथी के, औजार के; डाकू घुस आये बिना राइफल बंदूक के अकेले, रात बिरात तो छोड़ो, खड़ी दोपहर में; कोई बलात्कारी ही घुस आये दिन दहाड़े और मुझे उठा कर ले जाये पार्क में और मैं चिल्लाऊं कि बचाओ! बचाओ! तो कौन सुनेगा? ( ज्यादातर बूढ़े या तो बहरे हैं या ऊंचा सुनते हैं) कौन दौड़ेगा ( ज्यादातर घुटनों और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं) कौन देखेगा ( ज्यादातर मोतियाबिन्द का आपरेशन कराके आंख पर हरी पट्टी बांधे हैं), यह सब न कर सकें तो खड़ा होकर चिल्लायें तो सही ( ज्यादातर की कमर झुकी है और मुंह में दांत नहीं है, वे गुगुआ तो सकते हैं, चिल्ला नहीं सकते)।

इन ख्यालों से सोनल के रोंगटे खड़े हो गये! वह किसी अनजाने डर से सिहर सी उठी!

फिर सहसा ध्यान गया कुत्तों की ओर! कुत्ते बहुत थे कालोनी में - हर सड़क पर, प्रायः गेट के बाहर बैठे या घूमते दिखायी पड़ते थे लेकिन - यहां भी एक ÷ लेकिन' था। इतने दिनों में उसने किसी को भूंकते हुए नहीं सुना। उसी के मकान डी-१ के गेट पर ही एक भूरा बैठा रहता है लेकिन जब भी आओ, कहीं से आओ - गेट से चुपचाप हट जाता है और दूसरी जगह थोड़ी दूर पर बैठ जाता है!

कालोनी के बाशिन्दों के सिवा किरायेदार भी हैं - प्रायः हर घर में! नीचे मालिक, ऊपर किरायेदार! कुछ में देसी, कुछ में विदेशी - ज्यादातर जापानी, कोरियाई या थाई। विद्यार्थी या टूरिस्ट अपने काम से काम रखने वाले। इनके सिवा वे सरकारी कर्मचारी हैं जिनका किसी भी समय तबादला हो सकता है! यानी वे जिनके दिमाग में मकान कब्जा करने की बात न आये! ऐसे लोगों को मुहल्ले के लोगों से क्या लेना देना, उन्हें खुद से ही फुर्सत नहीं।

इस तरह तो उसी का घर क्यों , कालोनी का कोई भी घर - यहां तक कि कालोनी की कालोनी दिन दहाड़े लूट के कोई ले जाय, रोकने टोकने वाले नहीं मिलेंगे।

सोचते सोचते उसे लगा कि यह सिर्फ एक खयाल नहीं है - एक ÷ हॉरर' फिल्म है जो उसकी आंखें देख रही हैं! वह खुद पार्क में फटते चिथड़ा होते जा रहे साड़ी ब्लाउज में इधर से उधर भाग रही है - चीख चिल्ला रही है लेकिन कोई भी अपने घर से नहीं निकल रहा है! किसी को सुनायी ही नहीं दे रहा है तो निकलेगा कहां से?

उठ कर झटके से उसने बत्ती जलायी और फिल्म खत्म। राहत की सांस ली उसने और कैसेट लगाया। बदकिस्मती से कैसेट वह निकला जिसे न वह सुनना चाहती थी , न सुने बगैर रहना चाहती थी-

वक्त ने किया , क्या हसीं सितम

तुम रहे न तुम , हम रहे न हम!

यह कैसेट सोनल को समीर ने प्रजेण्ट किया था - तीन साल पहले। शादी के रिसेप्शन के दिन। तब उसने न इसे देखने की जरूरत महसूस की थी, न सुनने की! उसने हमेशा इसे अपने साथ रखा लेकिन कभी नहीं सुना। आज सुनते हुए उसे लगा कि कितना बदल गया है उसी गाने का मतलब आज? उसने संजय की कोई चर्चा नहीं की अपने डैडी से जान बूझ कर। वे दिल के मरीज, उन्हें ठेस लगती! अगर विश्वविद्यालय की सर्विस न मिली होती और वह अमेरिका में ही रह गयी होती तो क्या होता?

गलती कहां हुई और किससे हुई - वह समझ नहीं सकी!

आरती गुर्जर - उसके लैण्डलार्ड की बेटी। उसी काल सेण्टर में काम करती थी जिसमें संजय करता था! साथ आना जाना उसी की कार से होता था। दिन रात का साथ! आश्चर्य यह था कि आरती के मां बाप उन्हें एक दूसरे के करीब आते देख रहे थे फिर भी चुप थे! आश्चर्य यह भी था कि उसकी भी आंखों के सामने वे छेड़छाड़ करते थे - बेशर्मी की हद तक - और टोकने पर हंसने लगते थे। और इससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि आरती का पति जब कभी न्यूयार्क से आता था तो वह अपनी पत्नी से उसके ÷ ब्यायफ्रेण्ड' के बारे में बातें करता था और उन्हें डिनर पर ले जाता था! जाती तो साथ में वह भी थी - लेकिन उसे हमेशा लगता था कि न जाती तो ज्यादा अच्छा रहा होता!

वह एक ऐसे समाज में आ गयी थी जिसमें डालर को छोड़ कर किसी और चीज जैसे प्यार - के लिए ईर्ष्या करना पिछड़ापन और गंवरपन था!

वह जब भी संजय से उसकी हरकतों की शिकायत करती , वह खीझ उठता - ÷÷ तुम देश और काल के हिसाब से अपने को बदलना सीखो, चलना सीखो। न चल सको तो चुपचाप बैठो या लौट जाओ!''

÷÷ लौटूंगी तो अकेले क्यों? तुम्हें साथ लेकर!''

÷÷ मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देस बनाने की सोच रहा हूं!'' मुसकराते हुए उसने आंख मार कर कहा - ÷÷ तुम भी क्यों नहीं ढूंढ़ लेती एक ब्यायफ्रेण्ड?''

÷÷ अच्छा लगेगा तुम्हें?'' उसने सीधे संजय की आंखों में देखा!

÷÷ अच्छा की कहती हो? निश्चिन्त हो जाऊंगा हमेशा के लिए! हा हा हा...''

सोनल ने संजय की आंखों में गौर से देखा - वे आंखें ही थीं या दिल? यह बात उसने जबान से कही थी या दिल से? वह कहीं सोनल से सचमुच की मुक्ति तो नहीं चाह रहा है? वह देख रही थी कि अमेरिका आने के बाद से उसमें तेजी से बदलाव आया है - एक दो सालों के अंदर! यह उसकी तीसरी नौकरी है! वह एक शुरू करता है कि दूसरी की खोज में लग जाता है - पहले से उम्दा, पैसों के मामले में। उसमें सब्र नाम की चीज नहीं है। वह जल्दी से जल्दी ऊंची से ऊंची ऊंचाइयां छूना चाहता है! जैसे ही एक ऊंचाई पर पहुंचता है, थोड़े ही दिनों में वह नीची लगने लगती है! इसे वह महत्वाकांक्षा बोलता है! अगर यही महत्वाकांक्षा है तो फिर लालच क्या है?

लालच ? आरती गुर्जर के साथ संजय की दोस्ती के पीछे सिर्फ आरती गुर्जर है या उसके एन.आर.आई. मां बाप जिनका ÷ गुजराती हस्तशिल्प' का चमकदार व्यवसाय है जिसकी वह इकलौती संतान है? आरती से संजय का रिश्ता उसकी समझ से बाहर था!

यहां रहते हुए सोनल भी कमाई कर सकती थी! किसी विश्वविद्यालय में , कालेज में, लाइब्रेरी में, कहीं भी! कम्प्यूटर में भी अच्छी खासी गति थी! लेकिन संजय ने जब भी सोचा, खुद के बारे में सोचा, सोनल के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं थी! उसने सोनल को ÷ हाउस वाइफ' से ज्यादा नहीं होने दिया और वह भी तो बनारस के इंतजार में ÷ आज कल परसों' करती रह गयी थी।

सोनल की आंखें भर आयी थीं। उसी दम उसने निर्णय लिया था कि अब नहीं रुकना यहां! वह बहाने की खोज में ही थी कि रांची से पापा का ई-मेल तुरंत आ जाओ , १५ को तुम्हारा इंटरव्यू है! उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा! यह उसकी आत्मा की पुकार थी जो विश्वविद्यालय तक पहुंची थी!

आज भोर के उजाले में खिड़की से फिर पुकार रही थी सोनल की आत्मा - संजय को नहीं, समीर को - सुनो, और चले आओ!

 

( ३)

ज्यादा नहीं , हफ्ते दस दिन लगे सोनल को इस घर के एकांत और सन्नाटे के हिसाब से खुद को ढालने में! और जब ढल गयी तब मजा आने लगा! अपने ÷ अकेलेपन' को एंज्वाय करने लगी।

वह डेढ़ दो बिस्वे की रियासत की रानी थी - मालकिन! जब चाहे सोये, जब चाहे जागे, जहां चाहे उठे बैठे, जैसे चाहे वैसे रहे घर में, ब्रा और चड्ढी में, लुंगी में, गाउन में, नंगी नहाए, उछले कूदे - न कोई देखने वाला, न सुनने वाला! जब चाहे - जैसा चाहे खाना पकाये न पकाये, उपास करे, उसकी मर्जी! अगर साथ में यही सास ससुर हों - तो यह करो, वह करो, ऐसे करो, वैसे न करो! दुनिया भर के लफड़े, टोका टोकी और बंदिशें!

टेपरेकार्डर है , टी.वी. है, कम्प्यूटर है, मोबाइल है, फोन है - अगर खुद को व्यस्त ही रखना चाहो तो इनके सिवा भी किताबें हैं, क्लास की तैयारियां हैं, कार है! ज्यादा नहीं, शाम को फ्रेश होने के बाद सिर्फ आधे घंटे की ड्राइव पर निकल जाओ और लौट कर आओ तो बीयर या जिन का एक छोटा पेग और सिगरेट ( यह कैलिफोर्निया की आदत है जिसे देर सबेर छोड़नी पड़ेगी इस सड़े गले नगर में - इसे वह जानती है)।

÷÷ लेकिन समीर कहां है?'' उसने पापा को फोन किया - ÷÷ कुछ खास नहीं, बस ऐसे ही!''

जब वह रिसर्च कर रही थी इतिहास में , तभी समीर से परिचय हुआ था। एक तेज तर्रार आकर्षक युवक। अच्छे खाते पीते घर का। उससे दो साल सीनियर और राजनीति में पीएच.डी.! नौकरी मिल रही थी लेकिन उसने अपने हित को न देख कर किसानों मजदूरों के हित को देखा! उसमें देश और दुनिया और समाज के हर मुद्दे पर लम्बी बहस करने और विश्लेषण करने की दक्षता थी! उसने राजनीतिक ÷ ऐक्टिविस्ट' होना पसंद किया। उस समय बिहार में ऐसे कई गु्रप थे! वह उनमें से एक से जुड़ गया और सक्रिय हो गया! वह हफ्ते में एक बार पटना आता और पूरा दिन सोनल के साथ बिताता! उसका सपना था कि वे शादी करेंगे और अपना जीवन किसानों की खुशहाली के लिये समर्पित कर देंगे - साथ साथ! सोनल ने जब डैडी से बताया तो उन्होंने समझाते हुए कहा कि यह जुनूनी दिमाग का फितूर है! बीवी की कमाई और नौकरीपेशा लोगों के चंदे पर क्रांति करने वाले ऐसे लोगों की भरमार है बिहार में! वे जल्दी ही नाश्ते और चाय पानी के लिये दूसरों को ढूंढ़ते सड़क पर दिखाई पड़ने लगते हैं। ऐसे बहकावे में मत आओ। और उन्हीं के समझाने बुझाने पर उसने संजय से शादी तो कर ली लेकिन समीर को दिल से नहीं निकाल सकी! यहां तक कि अमेरिका में भी जब संजय ने उससे ÷ ब्वायफ्रेण्ड' की बात की तो वह डर गयी कि कहीं उसे समीर की दोस्ती की खबर तो नहीं है?

उसी समीर की याद आ रही थी उसे यहां आने के बाद से ही!

वह सुबह छत पर टहल रही थी कि डी-४ के सामने सड़क पर पुलिस वैन दिखाई पड़ी!

उसकी नजर जाने के पहले से खड़ी थी वह वैन!

कुछ लोग थे जो भीतर बाहर आ जा रहे थे! लेन के एक नुक्कड़ पर उसका डी-१ और दूसरे नुक्कड़ पर डी-४। उसके दो ही मकान बाद! बरतन मांजने और झाडू पोंछा करने वाली दाई उसी कालोनी की थी। जैसे ही वह आयी , उसने पूछा!

दाई गीता ने जो कुछ बताया , वह भयानक था! यह उस कालोनी की तीसरी घटना थी! इसी साल की पहली!

डी-४ राय साहब का बंगला था! राय साहब बागबानी के बेहद शौकीन! उनके लान में मखमली घास क्या थी , हरे रंग का गलीचा था। उसमें जूते चप्पल पहन कर न वह जाते थे, न दूसरों को जाने देते थे। गलीचे के चारों तरफ फूलों और रंग बिरंगी पत्तियों वाले गमले थे! वे दिन भर कैंची चाकू लिये लान में ही नजर आते थे - काटते छांटते हुए। हरे रंग की दीवानगी ऐसी कि बंगले पर भी हरा डिस्टेम्पर। यही हरियाली उनके झुर्रियोंदार चेहरे पर भी रहती थी - हमेशा!

एक दिन एक फोन आया राय साहब के नाम - ÷÷ इतनी जल्दी क्या है मकान बेचने की, थोड़ा रुक जाते!''

राय साहब ÷ हलो, हलो' करते रह गये, लेकिन फोन कट गया था!

उस दिन उन्हें आश्चर्य हुआ लेकिन हंसी भी आयी!

फिर हर तीसरे चौथे रोज या तो कोई न कोई फोन आता या कोई न कोई मकान के बारे में जानकारी करने चला आता। फोन करने वाला कौन है , कहां से कर रहा है, मकान बिकने की बात उसे किसने बतायी - राय साहब को पता नहीं चल सका! आने वालों को वे डांट कर भगा देते, फाटक के अंदर घुसने ही न देते! वे कहते कहते थक गये कि खबर गलत है, उन्हें बेचना ही नहीं है फिर भी, ये सिलसिले खत्म नहीं हुए!

वे परेशान! लगा कि पागल हो जायेंगे! वे नींद के लिये तरस कर रह जाते और नींद नहीं आती! दोस्तों मित्राों की सलाह पर उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट की कि उनके पास कैसे कैसे फोन आते हैं , कैसे कैसे लफंगे आते हैं, और कैसी कैसी बातें कर जाते हैं?

चौथे दिन जो आदमी मकान की बाबत उनसे पूछने आया , उसकी बातों से राय साहब को लग गया कि पुलिस रिपोर्ट की उसे जानकारी है - लेकिन इसका न उसे डर है, न खौफ!

जिस मानसिक तनाव और बेचैनी में वे जी रहे थे , उससे उन्हें उस दिन मुक्ति मिली, जिस दिन अचानक उनके बचपन के मित्रा राजाराम पांडे उर्फ भुटेले गुरू आये। भुटेले गुरू अब तो नगर के जाने माने रईस थे लेकिन थे उनके पड़ोसी गांव के! हाईस्कूल तक उनके साथ गांव पर ही पढ़ चुके थे! कई मुहल्लों में कई मकान थे उनके! वे इधर से गुजर रहे थे कि उन्हें रायसाहब की याद आयी और पूछते पाछते डी-४ में चले आये!

÷÷ यार, बड़ा शानदार भवन है सुरेश!'' उन्होंने गेट के अंदर घुसते ही कहा!

राय साहब ने उत्साह से उन्हें घर दिखाया! वे पहली बार आये थे। उन्होंने घर आंगन की तारीफ करते हुए बताया कि इस दौरान भेंट भले न हुई हो , दोनों बेटियों की शादी और भाभी के आकस्मिक स्वर्गवास की खबर उन्हें मिली थी! ड्राइंग रूम में लौटते हुए उन्होंने पूछा - ÷÷ सुरेश! तुम्हारा वह बेटा कहां है आजकल, जिसका इलाज करा रहे थे?''

भुटेले जैसे ही सोफे पर बैठे , राय साहब उनके आगे बैठ कर - फूट फूट कर रोने लगे। भुटेले भी सोफे से नीचे आ गये और सुरेश राय को बांहों में भर कर सामने दीवान की ओर देखते रहे - दीवान पर गठरी की तरह एक युवक लेटा था। वह टुकुर टुकुर कुतूहल से उन्हें ताक रहा था। दाढ़ी मूंछ बेतरतीब बढ़ी हुई थी! सिर्फ चेहरा खुला था, शरीर ढंका था! एक सूखी बेजान बांह लकड़ी की तरह बिस्तर पर पड़ी थी! लगता ही नहीं था कि धड़ के नीचे कुछ है!

÷÷ यह बोलता तो उस वक्त भी नहीं था, लेकिन यह याद नहीं कि समझता भी था या नहीं!'' भुटेले ने पूछा!

राय साहब बगैर बोले हिचकी लेने लगे।

भुटेले ने सांत्वना देते हुए उन्हें उठाया और सोफे पर अपने बगल में बैठाया। थोड़ी देर बाद राय साहब उठे और अंदर चले गये। जब वे चाय के साथ लौटे तो सहज थे! चाय पीते हुये उन्होंने बताया कि कैसे पेट काट कर , गांव की जमीनें बेच कर, बैंक से कर्ज लेकर किसी तरह यह घर खड़ा किया और दो साल पहले - रिटायर होने के बाद - इसमें आया! मैंने कभी सोचा ही नहीं कि किसके लिये घर? बस यह था कि अपना एक घर हो! इसके खड़ा होते होते पत्नी भी चल बसीं। लेकिन लगा रहा मैं बिना सोचे कि घर हो तो किसके लिये?... देख रहे हो इस बेटे को? न चल फिर सकता है, न सुन सकता है, न बोल सकता है! क्या होगा इसका जब मैं नहीं रहूंगा! जाने किस जनम के पाप की सजा दे रहा है भगवान!

÷÷ मैं हूं न चिन्ता काहे करते हो?'' भुटेले ने उनके कंधे पर हाथ रखा!

÷÷ चिन्ता का तो ये है भुटेले कि छः सात महीनों से सोया नहीं। जाने कहां कहां से, कैसे कैसे लोगों के रात बिरात फोन आते रहते हैं - धमकी भरे! पता नहीं किसने उड़ा दिया है कि सुरेश राय अपना घर बेच रहे हैं! नतीजा यह कि गुंडे मवाली तक घर के अंदर घुसे चले आ रहे हैं और सलाह दे रहे हैं कि जितने में बेचोगे उतने में दो कमरों का फ्लैट भी ले सकते हो और बाकी के सूद से बीस पच्चीस साल चैन से काट भी लोगे! पूछो कि तुम हो कौन? तो कहते हैं - ÷ प्रापर्टी डीलर'! प्रापर्टी हमारी; डील तुम कर रहे हो! बिना यह पूछे कि तुम बेच भी रहे हो या नहीं? दलाल साले! हिम्मत तो देखो उनकी! अगर आज नरेश सही होता तो यह नौबत नहीं आती!''

भुटेले गम्भीरता से सब कुछ सुनते रहे और सोचने विचारने के बाद बोले - ÷÷ ऐसा है सुरेश! मैं दो तीन दिन के अंदर एक दरबान या आदमी भेज देता हूं। बड़े भरोसे का आदमी! वह तुम्हारी सारी समस्याएं दूर कर देगा! ठीक?''

तीसरे दिन सचमुच आदमी आया और राय साहब की चिन्ता खत्म हो गयी!

न कभी फोन आया और न गुंडे मवालियों का साहस हुआ कि आस पास कहीं दिखायी पड़ें!

लेकिन जो होनी थी , वह होकर रही। तीन महीने बाद! रात दिन पूरे घर की देखभाल करने वाला दरबान रात भर की छुट्टी लेकर भतीजी की शादी में अपने गांव गया था और इधर उसी रात यह हादसा हो गया! उसी पलंग पर लेटा राय साहब का बेटा टुकुर टुकुर ताकता रहा और उनका कतल हो गया!

भुटेले गुरु इस हादसे के दो दिन पहले से अस्पताल में थे - रूटीन चेकअप के लिये। दरबान ने ही उन्हें खबर की थी! वे अस्पताल से सीधे अपनी गाड़ी में आये! दरवाजे पर खड़ी भीड़ को वहां से हटाया बढ़ाया, डांटा डपटा और अंदर जाकर पुलिस से जानकारी ली! फिर उस कमरे में गये जहां बिस्तर पर राय साहब लेटे थे। वहीं बगल में एक तख्त पर उनका बेटा भी था जो निश्चल पड़ा था। मूक दर्शक। हादसे का चश्मदीद बेबस गवाह! वे पुलिस के साथ अंदर गये थे, उसी के साथ लौट भी आये!

बाहर अटकलों की कानाफूंसी चल रही थी - या तो मुंह और नाक पर तकिया दबा कर मारा गया है या गला दबा कर! शरीर पर कहीं चोट का निशान नहीं। हाथापाई का कोई चिह्न नहीं। बिस्तर पर कोई सिलवट नहीं! तकिया पर महज खून का छोटा सा धब्बा था जो नाक और मुंह से निकला था।

लाश जब पोस्टमार्टम के लिये जा रही थी , सोनल अपने गेट पर खड़ी उसे जाते हुए देख रही थी! कालोनी में मकान कब्जा करने की तीसरी घटना! घर में तो वह भी अकेली थी। विश्वविद्यालय आने जाने का समय अनिश्चित। किसी दिन दोपहर से पहले क्लासेज, किसी दिन दोपहर बाद। घर में कोई नहीं। दिन में तो चोरियां ही हो सकती हैं लेकिन रात में तो हत्या तक सम्भव है। इस कल्पना से ही उसे कंपकपी छूट आयी! आंखों में उतरने वाली सिहरन पूरे बदन में फैल गयी! वह इसी उधेड़बुन में पूरे दिन पड़ी रही! नौकर न मिल रहे थे, न रखना मुनासिब था! नौकरानी झाड़ई बुहारू पोंछा से आगे के लिये तैयार नहीं। बार बार उसका ध्यान जा रहा था ससुराल पर।

रात में उसने पहाड़पुर का कोड ढूंढा और फोन किया - ÷÷ पापा! मैं सोनल। आ रही हूं कल आप दोनों को लेने के लिये! तैयार रहिए। नहीं, कुछ नहीं सुनूंगी। मम्मी को फोन दीजिए!...''


( ४)

शीला को सोनल ने वह मान सम्मान दिया जो कोई बहू क्या देगी अपनी सास को ?

सुबह शाम ÷ मम्मी', दोपहर रात ÷ मम्मी', घर में ÷ मम्मी' बाहर ÷ मम्मी' - बस हर तरफ मम्मी की गूंज! जबकि शीला सोनल के साथ आयी थी लोकलाज के कारण, इस कारण से कि न जाएं तो बेटा उनके बारे में क्या सोचेगा? कि जिस बेटे के सहारे बुढ़ापा कटना है उसकी औरत की कैसे न सुनें? न सुनें तो वह उनकी क्यों सुनेगा? लोग अपने बच्चों का भविष्य क्यों संवारते हैं? इसलिए कि उनके भविष्य में उनका अपना भविष्य भी छिपा रहता है! कायदे से देखा जाय तो वे उनका नहीं, अपना ही भविष्य संवारते हैं! इसी संवरे हुए भविष्य में कदम रखा था शीला ने और खुश थी! जिस लड़की से कोई पूर्व परिचय नहीं, कोई रिश्ता नाता नहीं, यहां तक कि न अपनी जात की, न कुल की, न संस्कार की - वह शीला के पीछे मरी जा रही थी - ÷ मम्मी, चाय पी?' ÷ मम्मी, नाश्ता किया?' ÷ मम्मी नहा लिया?' ÷ मम्मी, खाना खाया?' ÷ मम्मी, कोई जरूरत?'

इतना ध्यान उनकी बेटी सरला ने भी नहीं दिया था उनका!

सोनल ने पहले उन्हें पूरा घर दिखाया - ड्राइंग रूम, उससे सटा अपना कमरा, आंगन, फिर वह कमरा जिसमें पापा मम्मी रहेंगे, फिर किचेन और स्टोर, फिर पिछवाड़े का हिस्सा जिसमें नौकर चाकर के लिये टिन के शेड का खुला कमरा। फिर ऊपर ले गयी छत पर और देर तक मम्मी को टहलाती रही कि लोग देख और जान लें कि वह अकेली नहीं है घर में! यह घर और इस घर में वह सब कुछ था जिसके बारे में शीला ने सोचा नहीं था।

उसे रात भर नींद नहीं आयी - कारण जो रहे हों! कारण नयी जगह भी हो सकता है, चौड़ा डबल बेड भी, गद्देदार बिस्तर भी! वह सुख भी जो अचानक उसके जीवन में आ गया था। वह घर में आयी नहीं थी, ÷ गृह प्रवेश' किया था। यही कहा था सोनल ने और अच्छी से अच्छी ÷ डिशेज' तैयार करके खिलाया था। शीला की खुशी बार बार उसकी आंखों में छलक आ रही थी! और इन आंसुओं में और कुछ नहीं, पहाड़पुर का खपरैलों वाला घर था, उसके बेटे बेटी थे और वह दुःख थे जो उसने जीवन भर सहे थे।

सहसा उसे याद आया कि संजय के बारे में न उसने कुछ पूछा , न सोनल ने अपने से कुछ बताया, दूसरी दूसरी ही बातें करती रही अब तक!

अगले दो तीन दिनों में शीला ने अपनी दिनचर्या निश्चित कर ली! खाना बनाने वाली महराजिन अब तक नहीं मिली थी और वह बैठे बैठे करती क्या दिन भर ? सुबह चाय और दोपहर रात का खाना उसने अपने जिम्मे ले लिया था! तकलीफ केवल इतनी थी कि बात करने के लिये अभी तक कोई नहीं मिला था। डी-४ की घटना ने हर कालोनीवासी को अपने अपने घर में रोक रखा था - वे सभी शायद डरे हुए थे कि कहीं ऐसा न हो कि वे मकान छोड़ें तो लौट कर घुसना मुश्किल हो जाय! इन्हीं वजहों से पार्क भी खाली पड़ा था - न कोई औरत, न कोई मर्द! तीन चार दिनों तक कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकला - सर्विस करने वालों को छोड़ कर।

शीला झाड़ई पोछा करने वाली महरी के पीछे पीछे घूमती रहती और बात करती रहती - कितने लड़के हैं? कितनी लड़कियां हैं? कितनों की शादी हुई है? दामाद क्या करते हैं? कितनी बहुएं हैं? कौन वाली साथ रहती है? स्वभाव कैसा है? सेवा करती है या नहीं? बेटे ध्यान देते हैं या नहीं? अभी कोई पोता पोती है कि नहीं?... कुछ सुनती, कुछ अपना सुनाती! इस दौरान सोनल अपना काम करती, पढ़ती, लिखती और नहीं तो कम्प्यूटर के माउस से ही खेलती या कुछ टाइप करती।

इस बीच शीला दो बार बहू से दुःखी हुई। वह जग जाती थी भोर में चार बजे और सोनल सोती रहती थी आठ बजे तक। उसने उसे जगाने का एक तरीका निकाला। उसने सुबह छः बजे चाय तैयार की और उसे जगाया। सोनल सोयी रही और उठने पर ठंडी चाय सिंक में उड़ेल दी। फिर अपने लिये अलग से नींबू की चाय बनायी।

शीला देखती रही।

दूसरे दिन उसने नींबू की चाय बनायी - थोड़ी देर से! यानी सात बजे! उस दिन भी यही हुआ। सोनल ने कहा - ÷÷ मम्मी, मेरी चाय रहने दिया करें आप! जब उठूंगी, तब बना लूंगी मैं!''

उसे अच्छा नहीं लगा! अपनी आदत के खिलाफ वह किसी तरह जब्त करके रह गयी। यहां तक तो गनीमत थी लेकिन एक दूसरे प्रसंग से तो जैसे उसका मन ही उचट गया! होता यह था कि शीला सुबह रात की बची रोटी या परांठे और सब्जी का नाश्ता करती थी! सोनल ने देखा तो बिगड़ी - ÷÷ नहीं मम्मी, यह नहीं चलेगा। आप वह खायेंगी जो मैं खाऊंगी! टोस्ट बटर, दलिया, दूध, फल! वह सब नहीं!'' ठीक! शीला के दिमाग में सवाल उठा कि रोज रोज जो बासी रोटियां या परांठे बच जाते हैं, उनका क्या हो? उसे महरी - गीता की याद आयी! वह भी आते ही शीला को ÷ माता जी माता जी' बोलती थी! काम धाम खतम करके गीता जब जाने लगती थी वह रोक कर उसे खिला देती थी। सब्जी न रहने पर कभी चाय दे देती थी, कभी अचार! सोनल को पता चला, पता क्या चला उसने गीता को एक कोने बैठ कर खाते हुए देख लिया।

÷÷ मम्मी।'' गीता के जाने के बाद सोनल बोली - ÷÷ आप क्यों आदत बिगाड़ रही हैं उसकी?''

शीला ने समझने की गरज से बहू की ओर देखा!

÷÷ उसकी शर्तों में चाय नाश्ता नहीं था! पांच सौ महीना और साल में दो बार साड़ियां - बस!''

÷÷ लेकिन मैं चाय नाश्ता कहां देती हूं? जो कुछ बचा खुचा रहता है, सधा देती हूं! फेंकने या कुत्ता बिल्ली को खिलाने से अच्छा है कि किसी के स्वारथ आ जाय!''

÷÷ यही तो! कुत्ते बिल्ली को भले खिला दें, उसे न दें - यही कहना है मेरा?''

÷÷ अरे? यह कैसी बात कर रही हो तुम?'' फटी आंखों बहू को ताकने लगी शीला!

÷÷ नहीं, बुरा मत मानिए। इसे ऐसे समझिए! मान लीजिए कल आप कहीं और चली जायं, यहां न रहें। वह हमसे भी यही उम्मीद करेगी और हम नहीं दे पायेंगे तो उसे बुरा लगेगा, ठीक से काम नहीं करेगी। है न?''

÷÷ सब ठीक! लेकिन यह बात मेरे गले नहीं उतर रही है कि कुत्ते बिल्ली को खिला दें लेकिन उसे न खिलायें!''

÷÷ मम्मी, वह आपकी परजा नहीं है, नौकरानी है - प्रोफेशनल। उसका पेट रोटी परांठें से नहीं, पैसे से भरेगा! यही नहीं, आप उससे बातें करेंगी और वह सिर चढ़ जाएगी! कल जब आप किसी बात के लिये उसे टोकेंगी, वह लड़ बैठेगी! उसे आप वही रहने दें जो है! आये, अपना काम करे और रास्ता नापे!'

शीला सिर झुकाये चुपचाप सुनती रही और उठ खड़ी हुई - ÷÷ लेकिन मैं अन्न का अपमान नहीं होने दूंगी! उसे नहीं खिलाऊंगी तो खुद खाऊंगी!''

÷÷ आप बुरा मान गयीं। नहीं समझा मेरी बात को!''

÷÷ समझ लिया, कोई अपढ़ नहीं हूं! मैं भी बी.ए. हूं अपने समय की!''

÷÷ ठीक है लेकिन मैं बासी तो न खाने दूंगी! कल ही आप कहेंगी कि मुझको बासी खिलाती थी!''

÷÷ तो मेरा भी सुन लो, मैं अन्न को ऐसे फेंकने न दूंगी!''

यह बहस तभी खत्म हो सकती थी जब उन दोनों में से कोई चुप हो जाय या वहां से हट जाय!

आखिर सोनल किसी काम के बहाने वहां से चली गयी!

शीला कुछ देर बैठी रही। उसे लगा कि बहू नकचढ़ी ही नहीं , सिरचढ़ी भी है! पैदा करती, तब उसे अनाज का मोल भी पता चलता। मां बाप की इकलौती औलाद, जात की लाला - खेत खलिहान से मतलब नहीं; उसे क्या मालूम अपनी फसल का सुख दुःख?

वह घर के पिछवाड़े गयी जहां रघुनाथ बाहर से घूम कर आये थे और नहाने जा रहे थे! उसने जैसे ही शुरू किया वैसे ही रघुनाथ ने टोका - ÷÷ सही कहा उसने! बहू को सुनने और उसके साथ रहने की आदत डालो!''

÷÷ क्या? तुम्हारा भी यही कहना है!''

÷÷ नहीं, मेरा यह नहीं कहना है। मेरा यह कहना है कि जिसके घर में रहती हो, जिसका खाती हो, पहनती हो, उसे अनसुना मत करो। वह करो जो वह चाहती है!''

÷÷ राशन मैं लायी हूं, चाय नाश्ता मैं बनाती हूं, खाना मैं पकाती हूं, जो कोई आता है, उसे उठाती बिठाती मैं हूं - और मेरी कोई वकत ही नहीं?''

÷÷ अच्छा जाओ तुम यहां से, जो करना है करो!'' झुंझला कर रघुनाथ बोले और बाथरूम में चले गये!

÷÷ मैं नहीं रहूंगी यहां! मुझे गांव पहुंचा दो और नहीं पहुंचाओगे तो खुद चली जाऊंगी।''

बाथरूम के अंदर से ही रघुनाथ ने हंसते हुए कहा - ÷÷ अरे, बहू से तो पूछ लो। अपने से नहीं आयी हो तुम, वही लायी है! ... कैसे है वह गाना।'' उन्होंने नल खोल दिया और गाना शुरू किया -

अभी न जाओ छोड़ कर , कि दिल अभी भरा नहीं।

अभी अभी तो आयी हो , बहार बन के छायी हो

अभी जरा बहक तो लूं , अभी जरा न नू न नू....

 

शाम को चार बजे के आसपास सरला का फोन आया - बहुत दिनों बाद! काफी दुःखी और शिकायती स्वर में! उठाया शीला ने ही। सोनल कालेज गयी थी, घर पर वही थी! इससे पहले उसने दो तीन बार गांव पर फोन किया था, उसकी बदकिस्मती से रिसीवर उठाया था रघुनाथ ने और उसका नाम सुनते ही बिना पूछे या बोले रख दिया था! इसका चर्चा भी नहीं किया था शीला से!

÷÷ मां, अब तो आ सकती हो मेरे यहां!''

÷÷ ऐसे क्यों बोल रही हो सरला?'' शीला रुआंसी हो उठी।

÷÷ मैंने शादी नहीं की मां, पापा से भी बोल देना! चाहें तो वे भी आ सकते हैं।''

÷÷ उनकी बात नहीं जानती लेकिन मैं तो तैयार बैठी हूं। जब कहो तब आ जाऊंगी!''

÷÷ ठीक है, अगले दस पंद्रह दिनों के भीतर कोई व्यवस्था करती हूं!''

÷÷ लेकिन तुमने शादी क्यों नहीं की? हम तो मान चुके थे कि हो गयी होगी!''

÷÷ मां, मैंने सोच लिया है! भगवान और ब्याह के बिना भी जिया जा सकता है, रहा जा सकता है! किसी बात की फिकर मत करना! ठीक?''

सरला ने रिसीवर रख दिया था। शीला जहां की तहां खड़ी! उसकी समझ में नहीं आया कि यह अच्छा हुआ या बुरा! उसने रघुनाथ को सूचना दी! रघुनाथ ने सिर्फ इतना कहा कि इससे तो अच्छा था कि वह शादी ही कर लेती!

 

( ५)

शीला सोनल के आग्रह पर तब तक रुकी रही जब तक खाना बनाने वाली नौकरानी की व्यवस्था नहीं हो गयी।

जिस दिन शीला गयी , उसी दिन सोनल ने गेट और घर की तालियों के ÷ डुप्लिकेट' बनवाये और उन्हें रघुनाथ को दे दिया। दोपहर को एक डेढ़ घंटा छोड़ कर - जब नौकरानी खाना पकाने आये - रघुनाथ पूरी तरह आजाद थे! वे जब चाहें तब, जहां चाहें वहां, आ जा सकते थे, घूम सकते थे, मिल मिला सकते थे; कोई पूछने ताछने वाला नहीं!

ऐसे भी रघुनाथ घर में रहते हुए एक तरह घर के बाहर ही थे। पिछवाड़े बाउंडरी वाल से लगी हुई एक ईंट की दो दीवारें थीं जिन पर अस्बस्टर पड़ा था! सोचा गया था कि अगर नौकर चाकर या ड्राइवर हुआ तो उसी में रहेगा! रघुनाथ की व्यवस्था शीला के साथ उसी के कमरे में थी लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं आया! घंटे दो घंटे के लिये तो ठीक , इससे ज्यादा कभी वे बीवी के साथ सोये ही नहीं! आने के दिन ही उन्हें यह जगह जंच गयी। इसी के बगल में नल भी था और शौचालय भी! और क्या चाहिए? नाश्ता खाना घर में, बाकी सब बाहर!

शीला के साथ रघुनाथ के रिश्ते दाम्पत्य के ही रहे , प्यार के नहीं हो सके! यह भी कह सकते हैं कि वे शीला के साथ सो तो लेते थे, प्यार नहीं करते थे। और मानते थे कि इसकी जिम्मेदार खुद शीला है। वह ऐसी औरत थी जिसे प्रतिदिन प्यार का प्रमाण चाहिए - यह नहीं कि एक बार या दो बार या तीन बार आपने उसे आश्वस्त कर दिया कि आप किसी और को नहीं, उसी को प्यार करते हैं तो वह मान जाय! वह अगले दिन फिर परीक्षा लेना चाहेगी कि वह कहीं आकस्मिक तो नहीं था? यही नहीं, वह अपने प्यार को केवल शिकायतों में ही व्यक्त कर सकती थी - इसके सिवा उसके पास और कोई दूसरी भाषा नहीं थी! इन स्थितियों ने रघुनाथ में सिर्फ चिड़चिड़ाहट ही नहीं पैदा की थी, उन्हें उसकी ओर से उदासीन भी कर दिया था! शीला ने कभी उनकी रुचि या पसंद के हिसाब से अपने को बदलने की भी कोशिश नहीं की! मसलन, वे चाहते थे कि घर में कोई अच्छी बात हो तो शीला खुश हो, उल्लसित हो, उसमें उत्साह और जोश नजर आये, हंसे गाये, कुछ भी करे! लेकिन उसका चेहरा ऐसा पथरीला था कि उस पर कोई भी कोमल भाव नहीं आ पाता था। यहां तक कि रघुनाथ जब खुशी के मारे उछलने कूदने और बेचैन होने लगते थे तो वह उनका उपहास करती सी निर्विकार खड़ी रहती थी।

खुशी उसके चेहरे पर उभरती भी थी तो अनचाहे धब्बे की तरह - फिर गायब हो जाती थी।

इसके सिवा उसमें खूबियां ही खूबियां थीं! वह अपने पति और पुत्राों के पद और प्रतिष्ठा से हमेशा खुद को अलग रखती थी। दूसरों के पास ऐसा बहुत कुछ होता था जो उसके पास नहीं था लेकिन उन्हें देख कर उसमें कभी ईर्ष्या नहीं होती थी! समभाव उसका स्वभाव था। वह तभी विचलित होता था जब वह किसी गरीब गुरबा को जरूरतमंद और कातर देखती थी! वह सब कुछ सह सकती थी मगर किसी की धौंस नहीं!

 

शीला के जाने के बाद रघुनाथ ने राहत की सांस ली थी! वह उनसे बहू के बारे में कुछ नहीं बोलती थी , इसके बावजूद वे तनाव में रहते थे। इस तनाव से अब वे मुक्त हो गये थे!

शुरू शुरू में रघुनाथ को ÷ अशोक विहार' पसंद नहीं आया। उन्होंने इतनी उजाड़ और उदास बस्ती देखी ही नहीं थी! देखना तो दूर, सोचा भी नहीं था। उनसे किसी ने बताया था कि यह पूरा इलाका कभी श्मशान हुआ करता था! हो सकता है, यही वजह हो कि उन्हें हर गली और हर मकान की हर खिड़की से आती हुई हवा में ÷ मृत्युगंध' घुली हुई लगती थी! यानी इधर से गुजरिए तो, उधर से गुजरिए तो नाक दबा कर या उस पर रुमाल रख कर!

आंखें बंद कर के देखिये तो पूरी बस्ती उस बंदरगाह की तरह थी जहां सभी यात्राी ÷ महाप्रयाण' पर निकलने या ÷ उस पार' जाने की तैयारी में लगे हुए हों!

लेकिन एक सुबह - ऐसी सुबह रोज आती थी और इन्हीं आंखों से रघुनाथ देखा करते थे - उस सुबह ध्यान गया पार्क की ओर आते एक बूढ़े की ओर - लकवे का मारा हुआ, मुंह टेढ़ा, गरदन बेकाबू, बायां बाजू झूलता हुआ असहाय, घिसटता हुआ बेबस पांव, दूसरी गली से निकलता एक दूसरा बूढ़ा जिसकी एक आंख खुली और दूसरी पर हरी पट्टी, उसके पीछे एक और बूढ़ा जिसके गले में कालर यानी, स्पांडिलाइटिस का पट्टा, तीसरी गली से भी एक बूढ़ा आ रहा है पार्क के गेट की तरफ - धीरे धीरे। उसके एक हाथ में बोतल है और ट्यूब लुंगी के अंदर!

सूर्य जैसे जैसे ऊपर उठता जाता है , वैसे वैसे हर कोने से खरामा खरामा आने वाले ऐसे ही बूढ़ों की तादाद बढ़ती जाती है!

रघुनाथ को लगा , ये बूढ़े नहीं हैं - यह जिन्दगी की भूख है, जीवन की प्यास है, स्वयं जीवन है - जो बूंद बूंद करके एक गड्ढे में जमा हो रहा है; वैसे ही जैसे किसी पहाड़ी की कई कई दरारों से पानी की एक लकीर चलती है और किसी सोते से मिल कर कभी न सूखने वाला - मीलों तक फुहियां उड़ाने वाला, शोर मचाने वाला धुंआधार ÷ फाल' बन जाती है!

जीवन का यह झरना हर सुबह रघुनाथ को अपनी ओर खींचता है - रग्घू, आओ! सुनो! भींगो! लेकिन रघुनाथ फुहियों में भींगने से बराबर बचते हैं।

क्यों बचते हैं रघुनाथ - इसे वे नहीं समझ पाते।

जब सभी बूढ़े अपनी मृत्यु के विरोध में बड़े मन और जतन से ÷ बाबा रामदेव' छेड़े रहते हैं, रघुनाथ सिर झुकाये चुपचाप पार्क के बाहर बाहर से निकल जाते हैं!

उनकी पसंदीदा जगह यह नहीं , नहर थी! अशोक विहार से डेढ़ किलोमीटर दूर। नहर के पार उससे सटी हुयी बगिया थी और बगिया के आगे ÷ संजय विहार' कालोनी। यह भी कोई गांव रहा होगा जिसकी यह बगिया थी - आंवला, बेल और अमरूद के पड़ों से भरी और घनी। रघुनाथ नहर के पुल पर तब तक बैठते थे जब तक धूप सहने लायक रहती थी, उसके बाद बगिया में!

इसी पुल पर उनकी मुलाकात हुई थी एल.एन. बापट से! बापट बनारस के महाराष्ट्रियन थे! यहीं पढ़े लिखे , यहीं से नौकरी शुरू की और जौनपुर से डिप्टी जेलर होकर रिटायर हुए थे! काफी मस्त आदमी थे - पुराने फिल्मी गानों के शौकीन। उनके दो ही शौक थे - पीना और गाना! गाते तभी थे जब पीने बैठते थे। उनके कोई संतान न थी - न बेटा, न बेटी। बीवी थी जिसे ÷ बुढ़िया' बोलते थे। उन्होंने संजय नगर में एक छोटा सा फ्लैट लिया था जिसमें कभी कभी जबरदस्ती रघुनाथ को ले जाया करते थे! और जब भी ले जाते थे, ÷ किताबखोर' और ÷ जांगरचोर' मास्टरों को गरियाते हुए जरा सा चखा दिया करते थे।

सूर्य उनका शत्राु था। वे नियम से पांच बजे शाम को ही पुलिया पर आ जाते थे और उसे गालियां देना शुरू कर देते थे - ÷÷ रघुनाथ, जरा देखो साले को! जान बूझ कर देर कर रहा है भोंसड़ी के डूबने में!'' वे शाम होते ही बेचैन होने लगते थे और घर की ओर ऐसे भागते थे जैसे पुलिस की गिरफ्त से छूटते ही चोर!

हफ्ते भर से ऊपर हो गया था जब बापट रघुनाथ से नहीं मिले - न पुल पर, न बगिया में। वे रोज जाते थे और लौट आते थे!

वे उस दिन जल्दी लौट आये क्योंकि ऊमस ज्यादा थी और पानी बरसने के आसार थे!

कालोनी के ही मुहाने पर मकान था मन्ना सरदार का। बगैर पलस्तर के ईंटों का। खुला हुआ बड़ा सा हाता जिसमें एक ओर लम्बी सी खटाल। बंधी हुई चार भैंसें , तीन गायें। यहीं सुबह शाम दूध के बर्तनों की क्यू लगाते थे बूढ़े। यह कारोबार मन्ना सरदार का पोता या नाती देखता है, उनसे कोई वास्ता नहीं।

कहते हैं , यह कालोनी उन्हीं की जमीन पर बसी है।

पचहत्तर अस्सी साल के मन्ना सरदार अपने जमाने के पहलवान। काले , मोटे, गठे हुए! पेट थोड़ा निकला हुआ। आज भी लाल लंगोट और छींट के गमछे में ही नंगे बदन रहते हैं और नियम से पच्छिम मुंह करके पचास डंड और पचास बैठक पेलते हैं। उन्हें बस एक ही शौक है और एक ही रोग! शौक अपने हाथों भांग घोंटना, गोला जमाना, ऊपर से एक पुरवा मलाई और रबड़ी खाना और रोग - गठिया! उनसे डाक्टर ने कहा था कि अगर चाहते हो गठिया ठीक हो, तो भंग छोड़ दो। इन्होंने जवाब दिया था - '' ए डाक्टर साहेब, आप कहोगे तो दुनिया छोड़ देंगे, बाकी भांग नहीं।''

वे जवानी तक शहर में पक्का महाल या पियरी पर कहीं रहे थे और जो कोई पकड़ में आ जाता था उसे उन दिनों के किस्से सुनाया करते थे।

रघुनाथ उनकी पकड़ में आ गये उस दिन! वे जैसे ही मुड़े , वैसे ही सरदार ने पूछा - ÷÷ जै राम जी की मास्टर साहब! किधर के रहने वाले हैं आप? क्या बताया था उस दिन?''

÷÷ धानापुर साइड के!''

÷÷ अरे, आपने बताया क्यों नहीं, उसी साइड के तो गू्र ( गुरु) थे।''

÷÷ ग्रू कौन?''

÷÷ छक्कन गू्र! आप कैसे नहीं जानते उन्हें? यह तो आश्चर्य की बात है! आइये, बैठिये तो सही! पानी नहीं बरसेगा, चिन्ता मत कीजिये, देखिये पुरुवैया शुरू हो गयी है! ... पीताम्बर और खड़ाऊं - बस यही धज था उनका, चाहे जहां रहें। क्या लम्बाई थी और क्या छरहरा बदन! कबूतर पाला था उन्होंने। बस एक कबूतर - वह भी सुनहरे रंग का। उसे अपने हाथों किसमिश, बादाम, छुहाड़ा खिलाते थे! एक बार वह गायब हुआ हफ्ते भर के लिये। गू्र चिन्तित! कम्बखत बिना बताये गया कहां? आठवें दिन लौटा तो चोंच एकदम लाल। हांफ रहा था! गू्र बोले - ÷ बे मन्ना, सूर्य देवता को चोंच मार कर आया है, जीभ और चोंच जल रही है उसकी, देखता नहीं? पहले पानी पिला!' तो ऐसा था गू्र! एक बार शाम को भांग घोंटी, उस पार गये, साफा पानी दिया, चंदन के तिलक पर रोली लगायी, कलाई में गजरा लपेटा और डाल की मंडई ( दालमंडी) में घुसे। मुन्नी बाई अपने बारजे से ही देख रही थी कि गू्र आ रहे हैं। जैसे ही गू्र उसके कोठे के पास पहुंचे कि वह अपने को सम्भाल नहीं सकी और टप्‌ से चू गयी। वाह रे गू्र! गू्र ने उसे अपने मुसुक ( मुश्क - कंधे और कुहनी के बीच की जगह) पर रोक लिया! देखिये यूं, इसी पर लोक लिया और वह मुसुक पर खड़ी हो गयी! गू्र बोले - ÷ मुन्नी, आज इसी पर मुजरा होगा लेकिन इस गली में नहीं, चौक में। अकेले मैं नहीं देखूंगा, सारा नगर देखेगा!' और गू्र उसे मुसुक पर खड़ी किये सचमुच ले आये चौक में। और फिर जो मुजरा हुआ उसे न पूछिये तो ही अच्छा! और आप को पता ही नहीं कि गू्र कौन है?''

जब वे उठे तो आसमान साफ हो चला था और जहां तहां छिटके तारे दिखायी पड़ रहे थे।

 

( ६)

रघुनाथ जब भी शाम को घूमते , टहलते या मिलने जुलने बाहर जाते थे, कोशिश करते थे कि नौ बजे तक लौट आयें! रात का खाना वे हमेशा सोनल के साथ खाते थे। यह सोनल की जिद थी! दोपहर को ऐसा तभी सम्भव हो पाता था जब उसकी छुट्टी हो। वरना नौकरानी खाना पका कर चली जाती थी और वह खुद ही निकाल कर खा लेते थे। नाश्ता इनका अलग था, सोनल का अलग। इन्हें अंखुवाये चने और दूध से मतलब था - बस!

शीला की गलतियों से इन्होंने बहुत कुछ सीखा था! ये अपने हिसाब से उसे नहीं चलाते थे , उसके हिसाब सें खुद चल रहे थे। इन्हें ÷ ससुर' के बजाय ÷ बाप' बन कर चलना ज्यादा सुविधाजनक लगा था। अव्वल तो तनाव का कोई मसला पैदा ही न होने दो और पैदा भी हो तो गम खा जाओ या टाल जाओ! दो जून खाने और सोने से मतलब - बाकी तुम जानो, तुम्हारा काम जाने! राशन गांव का, सब्जी पेंशन की। और पेंशन इतनी मिल ही जाती है कि अपनी ही नहीं, दूसरे की भी छोटी मोटी जरूरत पूरी हो जाय!

बेटे बहू के साथ जीने का यही सलीका होना चाहिए कि न आप उनके मामले में दखल दें , न वे आपके मामले में! सह जीवन के लिये यह समझदारी जरूरी है!

इसी समझदारी ने ससुर और बहू को एक दूसरे का दोस्त बना दिया था! हो सकता है , इसके पीछे कहीं न कहीं उनका अपना ÷ अकेलापन' भी हो और ÷ ऊब' भी!

ऐसे , सोनल ने अपने व्यवहार से उनके भीतर की आशंका खत्म कर दी थी कि अपने पति के सिवा उसकी किसी में रुचि नही है। वह अक्सर बातें करती थी - शीला से, सरला से। रघुनाथ को भी बीच बीच में बात करने के लिये याद दिलाती रहती थी। बनारस से मिर्जापुर की दूरी ही कितनी है - जब चाहे जाओ, जब चाहे आओ! चाहो तो कई चक्कर लगाओ एक ही दिन में। जब सोनल के आग्रह पर पहली बार सरला आयी थी ÷ अशोक विहार', तो वह सोनल के लिये दीदी के साथ ही ननद भी थी! विदा करते समय उसे सोने की चेन और अंगूठी के साथ दो साड़ियां उसके लिये और दो मम्मी के लिये दी थीं उसने! उसके बाद भी सरला कई बार आयी और हर बार सोनल जो कर सकती थी करती रही - यानी घर की जो चीज सरला को पसंद आ जाय, वह सरला की! यह कभी नहीं सोचा कि सरला बड़ी है - देने का फर्ज उसका है।

शीला को भी अपनी गलती का अहसास हो गया - कि उसने बहू को समझने में भूल की!

यही नहीं , सोनल ने अपनी तरफ से बाप और बेटे - रघुनाथ और धनंजय के बीच की दूरियां भी कम करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि वे दूरियां घटने के बजाय और बढ़ गयीं - लेकिन इसमें उसका दोष कहां था?

उसने धनंजय को फोन करके कहा कि भैया , तुम तो हद कर रहे हो! अमेरिका से पैसे मंगाना होता था तो क्या क्या नहीं बोलते थे? कितनी बातें करते थे कि यह जरूरत है, वह जरूरत है! और यहां इतने दिनों से हम आये हैं और एक बार भी देखने नहीं आये कि भाभी कैसी है? पापा को भी ठीक ठीक पता नहीं कि तुमने एम.बी.ए. किया कि नहीं किया और कर लिया तो अब क्या कर रहे हो? तुम्हारी शादी के लिये आ रहे हैं लोग। पापा मम्मी परेशान हैं! क्या चाहते हो, बताते तो सही! एक दो दिन के लिये ही सही, आ तो जाओ!

इसी फोन का नतीजा था कि वह आया मगर ठहरा घर में नहीं , डायमंड होटल में! इसलिये कि अकेला नहीं था, साथ में एक महिला थी अपनी बच्ची के साथ!

सोनल ने उन्हें रात को खाने पर आमंत्रिात किया।

जब रघुनाथ को यह खबर मिली तो वे उठे और चुपके से पहाड़पुर चले गये!

 

धनंजय को थोड़ी देर हो गयी थी। वह टैक्सी से आया था। साथ में आने वाली महिला महिला नहीं , लड़की थी - के. विजया। सोनल की ही उमर की या उससे थोड़ी बड़ी। नाक में हीरे की चमकती हुई कील, कानों में झूलती हुई रिंग, जूड़े में बेले के फूल। एकदम दक्षिण भारतीय लेकिन गोरी और सुंदर! बातों में पता चला कि वह दिल्ली में किसी कारपोरेट कम्पनी में नौकरी करती है! उसी कम्पनी में उसका पति भी काम करता था पहले से! उससे अच्छे पद और वेतन पर! वह अविवाहित था। इन्होंने शादी की और नोएडा में डूप्लेक्स फ्लैट लिया! बच्ची पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी! घर, गाड़ी, नौकरी, बच्ची सब कुछ लेकिन वह बेसहारा। भावनात्मक रूप से टूट चुकी थी वह! ऐसे ही में धनंजय से मुलाकात हुई थी।

बच्ची का नाम रत्ना डी. था। वह धनंजय को पापा बोल रही थी!

सोनल सुनते हुए असमंजस में पड़ी रही कुछ देर , फिर इतना कहा - ÷÷ तुम लोगों को सीधे घर आना चाहिए था।''

धनंजय ने सफाई दी कि विजय के पास समय नहीं था। उसे बाबा विश्वनाथ का दर्शन करना है , गंगा नहाना है, घाट देखना है, सारनाथ जाना है - समय कहां हैं?

जिस समय अमेरिका के दिनों के अलबम देखने दिखाने का कार्यक्रम चल रहा था , उसी समय डिनर की तैयारी के बहाने सोनल किचेन में आयी और हेल्प करने के लिये धनंजय को बुलाया!

÷÷ राजू, इतनी बड़ी बात! न तुमने पापा को बतायी, न मम्मी को, न हमें - यह क्या देख रही हूं?''

÷÷ कौन सी बात?''

÷÷ अरे यही कि तुमने शादी कर ली और किसी को खबर नहीं दी?''

÷÷ किसने कहा कि शादी कर ली?''

सोनल ने आश्चर्य से धनंजय को देखा - ÷÷ तुम दोनों एक ही छत के नीचे रह रहे हो जाने कब से और बच्ची पापा बोल रही है तुमको और शादी भी नहीं की - मामला क्या है?''

धनंजय मुसकराया - ÷÷ भाभी, मामला कुछ नहीं है! बात सिर्फ इतनी है कि उसे मेरी जरूरत है, और मुझे उसकी - जब तक जाब नहीं मिल जाती!''

÷÷ क्या उसे इस बात का आभास है कि तुम उसके साथ तभी तक हो जब तक जॉब नहीं मिल रही है?''

÷÷ यह मैं नहीं जानता!''

÷÷ तुम उसके साथ रह रहे हो, उसका खा रहे हो, पी रहे हो, पहन रहे हो, उसकी गाड़ी और पेट्रोल पर घूम रहे हो, उसकी बच्ची तुम्हें पापा मानती है, तुम्हारे भरोसे घर और बच्ची छोड़ कर नौकरी कर रही है, तुम उसके रिश्तेदार और नौकर भी नहीं हो - फिर कौन सा नाता है तुम्हारे उसके बीच?''

झुंझला कर धनंजय ने कहा - ÷÷ भाभी, छोड़िये यह सब! चलिये खाया जाय!''

÷÷ अरे, ऐसे कैसे छोड़िये! तुम उसे धोखा दे रहे हो और बेवकूफ बना रहे हो! या फिर हमसे झूठ बोल रहे हो और छिपा रहे हो!''

÷÷ दिल्ली की लड़कियों को नहीं जानतीं आप? हो सकता है, बच्ची कल से स्कूल जाने लगे तो कान पकड़ कर बाहर कर दे!''

÷÷ एकदम कर देना चाहिये तुम्हारी चाल को देखते हुए।'' सोनल ने उसकी टोह लेते हुए पूछा - ÷÷ एक बात बताओ, तुम्हारी नजर कहीं उसके धन दौलत और सुख सुविधा पर तो नहीं है?''

÷÷ अच्छा रहने दीजिये! अब आप हद कर रही हैं!''

÷÷ मैं इसलिये कह रही हूं कि अगर हो, तब भी तुम्हें कर लेनी चाहिये! सुंदर है, समझदार है, जॉब में है, तुम्हें जाब न मिले तब भी कोई हर्ज नहीं! मैं साथ हूं तुम्हारे। समझा? चलो अब!''

सोनल ने विजया को आवाज दी। सभी किचेन से दोंगे , प्लेटें और तश्तरियां डाइनिंग रूम में ले गये - एक एक करके! सोनल ने रत्ना डी. को गोद में बिठाया, खाया खिलाया और साढ़े दस ग्यारह बजे विदा किया!

विदा होने से पहले धनंजय भाभी को अलग ले गया - ÷÷ भाभी, क्या यह सच है कि भैया ने वहां कोई शादी की है?''

सोनल उसका मुंह देखने लगी!

÷÷ आरती नाम की कोई लड़की है क्या वहां?''

सोनल बगैर उन्हें विदा किये घर में भाग आयी!

 

( ७)

रघुनाथ गांव से लौटे लेकिन ÷ खुदगर्ज और कृतन' बेटे के जाने के बाद!

यह उनकी राय थी अपने छोटे बेटे धनंजय के बारे में। उसे पता था कि इसी नगर के ÷ अशोक विहार' में उसकी भाभी के साथ बाप भी रहता है लेकिन ठहरा होटल में। माना कि साथ औरत थी - ÷ काशी दर्शन' के लिये आयी होगी कि यह लड़के का गृहनगर है आसानी होगी। करना यह था कि उसे होटल में ठहरा के तुम अपने घर आ जाते, यहीं रुकते लेकिन नहीं। रघुनाथ नाराज हुए, उन्हें दुःख भी हुआ। ये बातें वे बहू से नहीं कह सकते थे! दूसरी बात थी बाप का ÷ ईगो'! देखना चाहते थे कि जो बेटा दिल्ली से बनारस आ सकता है, वह बाप से भेंट करने के लिये बनारस से डेढ़ दो घंटे दूर पहाड़पुर आ सकता है या नहीं!

शिकायतें तो उन्हें अपने बड़े बेटे संजय से भी थीं लेकिन परदेस की दूरी और उसके ÷ अकेले' पड़ जाने की कल्पना ने उनकी कठोरता को कम कर रखा था! वह ऐसे देश में था जहां मां नहीं, पिता नहीं, पत्नी नहीं। उसकी क्या हालत होती होगी, ऐसे में - जब इनके लिये हूक उठती होगी! वे भूले नहीं थे कि अपने मन से विवाह करने के बावजूद उसने पिता की जरूरतों को याद रखा था! यही नहीं, वह जो डी-१ अशोक विहार में इतने दिनों से चैन की बंशी बजा रहे हैं और खटिया तोड़ रहे हैं - उसी के चलते! उसे उनकी एक और एकमात्रा इच्छा की भी जानकारी है - एक तरह से पिता की अंतिम इच्छा कि वे आखिरी सांस पहाड़पुर में बने नये घर में छोड़ें! उन्होंने गांव के पी.सी.ओ. से शुरू में दो चार बार फोन करके याद भी दिलाया कि कुछ भेजो, जितना बन पड़े उतना ही सही, कम से कम ढांचा तो अपने रहते खड़ा कर दें। उसने भी आरम्भ में उत्साह दिखाया लेकिन आखिरी बार झल्ला कर कहा कि रुपये क्यों बरबाद करने पर तुले हुए हैं, उसके सदुपयोग के बारे में सोचिए! उसके बाद से ही रघुनाथ रूठ गये! न इन्होंने फिर फोन किया, न उसने बात की!

सोनल जरूर बातें करती है - कम्प्यूटर के आगे बैठ कर, कान में ईयर फोन लगा कर। महीने में कभी एक बार, कभी दो बार! रघुनाथ से भी कहती है कि पापा, आ जायं। आप भी बतिया लें! लेकिन जब संजय ही नहीं कहता तो सोनल के कहने और चाहने से क्या? इस तरह उनका रूठा रहना जारी है - वही बाप का ÷ ईगो'! इतना जरूर है कि जब कभी संजय का फोन आता है - जो कम ही आता है, वे बुलाये जाने का इंतजार करते हैं जिसकी नौबत कभी नहीं आयी!

संजय एक बार बोल गया था - झटके में। तब उसका भाई भी उसके साथ था। वह रांची में पढ़ रहा था उन दिनों! रघुनाथ मास्टर आदमी! किसी प्रसंग में ÷ कृतज्ञता' का मतलब समझा रहे थे उन्हें कि कोई तुम्हारे लिये जरा सा भी कुछ करता है तो उसे भूलो मत, याद रखो और अवसर मिले तो उसके लिये जो कुछ कर सकते हो, करो। इसी जन्म में उऋण हो जाओ। इससे बड़ा सुख दूसरा नहीं! जब रघुनाथ चुप हो गये तो संजय बोला था - ÷÷ पापा, इसका तो मतलब हुआ कि तुम जहां हो, वहीं खड़े रह जाओ! बार बार पलट कर देखोगे तो आगे कब बढ़ोगे? आप कृतज्ञ होने के लिये कह रहे हैं कि पैरों में बेड़ी पहनने के लिये!...'' यह बात आयी गयी हो गयी लेकिन रघुनाथ के दिमाग से गयी नहीं!

रघुनाथ भी चाहते थे कि बेटे आगे बढ़ें! वे खेत और मकान नहीं हैं कि अपनी जगह ही न छोड़ें! लेकिन यह भी चाहते थे कि ऐसा भी मौका आये जब सब एक साथ हों , एक जगह हों - आपस में हंसें गायें, लड़ें, झगड़ें, हा हा हू हू करें, खायें पियें, घर का सन्नाटा टूटे। मगर कई साल हो रहे हैं और कोई कहीं है, कोई कहीं। और बेटे आगे बढ़ते हुए इतने आगे चले गये हैं कि वहां से पीछे देखें भी तो न बाप नजर आयेगा, न मां!

कभी कभी उन्हें लगता कि वे बापट की तरह बेऔलाद होते तो कहीं ज्यादा अच्छा होता। वे भी उनकी तरह दारू छान कर गाते हुए मस्त रहते!

गांव से लौटने के बाद उन्होंने बहू से धनंजय के बारे में कुछ नहीं पूछा! बहू खुद ही उदास और बीमार लग रही थी! यह सोच कर कि ÷ औरतों को बहुत सी ऐसी बीमारियां होती हैं जिनके बारे में न पूछना ही ठीक।' चुप लगा गये!

उनके बीच बातें होती थीं रात को खाने की मेज पर। रघुनाथ गांव की स्मृतियों में जीते रहते थे , वे वहीं की बातें करते थे, बहू विश्वविद्यालय की, अपने विभाग की, लड़के लड़कियों की, प्रशासन की। उसको अन्यमनस्क देख कर रघुनाथ ने ही शुरू किया पहाड़पुर में होने वाले ÷ ग्रामसभा' चुनाव को लेकर - ÷÷ समझो, ऐसे वक्त पर गया था जब गहमागहमी थी चुनाव की। पहाड़पुर की ग्रामसभा है आरक्षित कोटे की! लड़ते हैं दलित जबकि निर्णायक होते हैं ठाकुर वोट जिनकी संख्या है साठ! ये साठ वोट जिसे चाहें उसे सभापति या प्रधान बना दें। खड़े हैं सोमारू राम और मगरू राम - मैं जिस दिन पहुंचा, उसी दिन शाम को ठाकुरों की बटोर थी बब्बन कक्का के यहां! तय हुआ कि यही मौका है जब वे पकड़ में आये हैं और यही मौका है बदला लेने का! जितना ऐंठना हो, ऐंठ लो वरना फिर हाथ नहीं आने वाले! विचार हुआ कि दुनिया और देश इक्कीसवीं सदी में चला गया है और पहाड़पुर में मंदिर ही नहीं, जल चढ़ाने के लिये बस महादेव की पिण्डी है! मंदिर बनवाने के लिये मतदान से पहले ही उनसे पैसे ले लिये जायं। कहा जाय कि जो एक लाख देगा, वोट उसी को दिये जाएंगे!

÷÷ अगर इसके लिये दोनों ही तैयार हों तब?'' किसी ने बीच में टोका!

इस पर दो मत सामने आये! एक गु्रप का कहना था कि ऐसी हालत में बोली बढ़ाते जाइये। एक का डेढ़ , डेढ़ का दो - ऐसे। जो अधिकतम दे, वोट उसे दिये जायं! दूसरे गु्रप का कहना था कि नहीं! यह मोल भाव है, नीलामी जैसी चीज है, अपनी जबान से पलटना है, हमारी प्रतिष्ठा और मर्यादा के अनुकूल नहीं है! दोनों से ही एक एक लाख ले लिया जाय और वोट आधे आधे बांट दें! तीस एक को, तीस दूसरे को! बताया दोनों को न जाय। वे मान कर चलें कि साठों हमीं को जा रहे हैं!

नयी पीढ़ी इन दोनों से असहमत थी! उसका कहना था कि आप लोग अपने मंदिर और महादेव को लेकर चाटिये , हमें हमारी दारू और मुर्गा चाहिये!

रघुनाथ को यह सब सुनाते हुए मजा आ रहा था लेकिन वे देख रहे थे कि सोनल न तो सुन रही है , न रस ले रही है। उसका मन कहीं और है। खाना खा चुकने के बाद जब वे हाथ धोकर आये तो देखा कि सोनल अपने बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ी है और सुबक रही है। रघुनाथ उसके कमरे में खड़े होकर कुछ देर समझने की कोशिश करते रहे - ÷÷ बेटा सोनल, क्या बात है?''

सोनल फफक पड़ी।

÷÷ बेटा, बोल तो सही, बात क्या है?'' रघुनाथ ने खुद को सम्भालते हुए पूछा!

÷÷ संजय ने दूसरी शादी कर ली पापा!'' सोनल ने हिचकियों के बीच कहा - ÷÷ मैंने कल फोन पर बात की, तब बोला। कम से कम मुझसे पूछ तो लिया होता!''

( ८)

भ्रम और भरोसा - ये ही हैं जिन्दगी के स्रोत! इन्हीं सोतों से फूटती है जिन्दगी और फिर बह निकलती है - कलकल छलछल!

कभी कभी लगता है कि ये अलग अलग दो सोते नहीं है। सोता एक ही है - उसे भ्रम कहिए या भरोसा। यह न हो तो जीना भी न हो!

यही सोता रघुनाथ का जीवन था! जब अमेरिका से लौटने के बाद सोनल ने उनसे कहा कि पापा , मुझे लग रहा है, संजय वहीं बस जाना चाहता है। इंडिया आयेगा तो जरूर लेकिन रहने के लिये नहीं, ÷ विजिट' के लिये। तो रघुनाथ उस पर व्यंग्य से मुस्कराये थे - कितना जानती हो संजय को? बाप यहां, मां यहां, भाई यहां, बहन यहां, और तो और बीवी यहां। कितना जानती हो संजय को? उन्होंने कहा कुछ नहीं, सिर्फ मुसकराये थे - कि उसने बाप की दीनता और दरिद्रता देखी है। उन्हें दुखी और परेशान देख कर कभी कभी बोलता था कि चिन्ता न करें, इतना कमाऊंगा - इतना कमाऊंगा कि घर में रखने की जगह नहीं रहेगी। लेकिन कमाने के इस रहस्य को न वे समझ पाये, न सक्सेना! आज उन्हें लग रहा था कि उसने सोनल से शादी सोनल के लिये नहीं, अमेरिका के लिये की थी!

रघुनाथ! जो जिन्दगी तुम्हें जीनी थी , वह जी चुके! अब अपनी फजीहत कराने के लिये जी रहे हो!

यह कोई कह नहीं रहा था लेकिन उनके कान सुन रहे थे और यह मूक स्वर उनके दिल तक पहुंच रहा था!

वे भोजन के बाद घर के पिछवाड़े अपने ढाबे में नहीं गये थे उस शाम , ÷ ड्राइंग रूम' में बैठे रह गये! सारी रात ऐसे ही काट दी - बैठे बैठे! नींद आयी ही नहीं! तरह तरह की आशंकाएं आ जा रही थीं जिनमें सबसे प्रबल यह कि कहीं यह लड़की आवेश में कुछ कर करा न ले!

यह कहने की जरूरत नहीं और इसमें भी दो राय नहीं कि इस समाचार से उन्हें एक तरह का ÷ खल सुख' मिला था - कि उससे विवाह करने के पहले तुमने मुझसे पूछा था? तुम्हारे बाप ने तो बात तक करने की जरूरत नहीं महसूस की थी? यहां तक कि निमंत्राण भी औपचारिकता के नाते दिया था। अब भुगतो! जो किया है, उसी का दंड मिला है यह। अब रो क्यों रही हो? मैं या दूसरा कोई क्या करेगा इसमें? ... लेकिन यह ÷ खल सुख' थोड़ी देर के लिये था। ऐसा सोचना उसके प्रति निष्ठुरता और अमानवीयता होती! उस हालत में तो और भी जब उसने अपने व्यवहार से उनका दिल जीत लिया था! ऐसा ख्याल ही अपने आप में नीचता था। ऐसे वक्त में उसे हमदर्दी और प्यार चाहिए।

बिजली ÷ ड्राइंग रूम' में भी जल रही थी और सोनल के कमरे में भी!

रघुनाथ को जरा सी आहट मिलती तो दबे पांव जाते और उसके कमरे में झांक आते कि सब ठीक ठाक तो है!

रात के डेढ़ दो के करीब सोनल हंसते हुए ड्राइंग रूम में आयी - ÷÷ पापा, आत्महत्या नहीं करूंगी, निश्चिन्त रहिए! जाइए, सो जाइए मम्मी के कमरे में या अपने ढाबे में!''

रघुनाथ शरमा गये - ÷÷ मैं इस डर से थोड़े बैठा हूं भाई! मुझे नींद ही नहीं आ रही है!''

सोनल का ध्यान ड्राइंग रूम में टंगे उस बड़े फोटो पर गया जो उसके विवाह का था। शायद ÷ रिसेप्शन' के समय का! संजय सोनल दो ऊंची मखमली - फूलों से सजी - कुर्सियों पर बैठे हैं और दोनों के सिर पर हाथ रखे सक्सेना साहब पीछे खड़े हैं!

÷÷ पापा, एक प्रार्थना है आपसे!''

÷÷ बोलो!''

÷÷ यह बात घर में ही रहे! आप, मम्मी और सरला दीदी के बीच! मेरे पापा को न मालूम हो!''

÷÷ क्यों?''

÷÷ वे बर्दाश्त न कर पायेंगे! दो बार अटैक हो चुका है उन्हें!''

रघुनाथ कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गये! वे सोनल को बोलने देना चाहते थे - चाहते थे कि उसके मन में जो कुछ है, उड़ेल कर हल्की हो जाय। यही अच्छा है कि वे सिर्फ सुनें!

÷÷ पापा, मैं चाहूं तो उसे कोर्ट में घसीट सकती हूं, जलील कर सकती हूं। मैं भाग कर नहीं आयी हूं, उसे छोड़ कर भी नहीं आयी हूं! आयी हूं उसकी रजामंदी से। मैं ही नहीं, वह भी चाहता था कि मैं ÷ हाउस वाइफ' न रहूं। नौकरी करूं और वह भी अपने देश में! और यहां आने के बाद भी तुम मीठी मीठी बातें करते रहे। एक बार भी नहीं बताया कि तुम्हारे मन में क्या है? ऐसा भी नहीं कि मुझे बुलाया हो और मैंने आने से इनकार किया हो।

÷÷ हद है!'' सोनल क्रोध से बिफर उठी - ÷÷ तुम समझते क्या हो अपने आपको? अरे, तुमने डाइवोर्स के लिये पूछा होता, ÷ हां' कर देती मैं। तुम नहीं देते, कहते तो - मैं दे देती! पूछा तक नहीं, इशारा तक नहीं किया! बगैर डाइवोर्स के शादी कर रहे हो? अपमानित करके मुझे? बिना किसी गलती के, कसूर के? और बेशर्मी यह कि पूछने पर मुसकराते हुए बताते हो कि हां, भई! कर ली! करनी पड़ी! मूर्ख समझते हो मुझे? जैसे मैं तुम्हें जानती ही न होऊं? जैसे तुम्हारी हरकतों से अनजान रही हूं? मैं तो बच्चू, तुम्हारी खटिया खड़ी कर देती लेकिन क्या बताऊं? लोग यही समझेंगे कि मैं यह सब गुजारा भत्ता के लिये कर रही हूं जबकि मैं थूंकती हूं तुम्हारी कमाई पर! ... क्या समय हो रहा है पापा? चार? साढ़े चार? रुकिये, आप को चाय पिला रही हूं!''

वह उठी और किचेन में चली गयी!

ठंड ज्यादा थी! रघुनाथ पांव समेटे रजाई में लिपटे सोफे पर पड़े थे! उन्हें यह तो अच्छा लग रहा था कि सोनल का मूड बदल गया है लेकिन यह अच्छा नहीं लग रहा था कि वह उनसे ऐसे बात करे जैसे वही संजय हों! गलती उनके बेटे ने की थी लेकिन अपराधबोध से ग्रस्त वे थे! वह भीतर से डरे और सहमे हुए भी थे!

वे कहते किसी से नहीं थे लेकिन गांव उनके लिये सुरक्षित नहीं रह गया था! बेटों को गांव गये कई साल हो गये थे। उनकी कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गयी थी गांव में! घराने के लोग सनेही को ठीक से काम नहीं करने दे रहे थे! तारीख पहले ÷ बुक' करने के बावजूद जसवंत उनके खेत तब जोतता जब सबके जुत जाते और यही हाल सिंचाई का था। सनेही के खड़े होने और रोकने के बावजूद उसकी नाली बंद कर पानी पहले अपने खेत में ले जाते थे लोग। उसकी खेती हर बार पिछड़ रही थी! बाहरी आदमी - लोगों से झगड़ा मोल लेकर एक दिन भी टिकना मुश्किल था! रघुनाथ खुद कहते थे हर बार - गम खा जाओ, सह लो, मगर झंझट न करना! दयादों की नजर उनके खेतों पर आ लगी थी - यह बात उनसे छिपी नहीं रही! गांव जाने पर उनका सम्मान सभी करते थे लेकिन यह ÷ सम्मान' उन्हें काफी रहस्यपूर्ण लगता था।

नरेश ने अपने घर के आगे उनकी जमीन में खूंटा गाड़ कर भैंस बांधना फिर शुरू कर दिया था। रघुनाथ देख कर भी अनदेखा करके चल देते थे! कौन रोज रोज किचकिच करे ?

इस बार तो सनेही ने जो सूचना दी , उससे वे और भी हदस गये! एक दिन - उनके गांव जाने के तीन दिन पहले की बात है यह - मोटरसाइकिल से दो लड़के आये थे उनके दरवाजे। पैण्ट शर्ट में। वे उतरे और बरामदे में पड़ी खटिया पर लेट गये! सनेही को बुलवाया, पूछा कि मास्टर रघुनाथ का यही घर है? फिर पूछा - वे कब कब आते हैं? कितने दिन रहते हैं? कब जाते हैं? शहर में कहां रहते हैं - तरह तरह के प्रश्न! जाते जाते यह भी कहा कि उनका दिमाग तो ठिकाने है? सनेही ने बताया कि वे अच्छे लड़के नहीं थे! इससे पहले उन्हें कभी देखा नहीं था! जो चुप था और लेटा था उसके शर्ट के नीचे पिस्तौल या रिवाल्वर जैसी चीज थी! सनेही की रिपोर्ट का असर यह हुआ कि उन्होंने झुटपुटा होते ही घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था! वे कारण समझने की कोशिश करते रहे थे लेकिन नहीं समझ सके!

शीला की तरह रघुनाथ का भी अजब हाल था! वे यहां रहते तो गांव के लिये चिन्तित रहते , वहीं की बातें करते और लौटने का बहाना ढूंढते रहते लेकिन अबकी जैसे संकेत मिले थे, उससे वहां के बारे में सोचने से भी डरने लगे थे! अबकी आते वक्त ही उन्होंने तय कर लिया था कि बहुत जरूरी हुआ तो बात दूसरी है, वरना अपने अशोक विहार का ढाबा ही बहुत है! वह बना रहे, उन्हें और कुछ नहीं चाहिए! मगर यहां? यहां संजय ने उनके लिये एक दूसरी ही समस्या खड़ी कर दी थी! अब वे पूरी तरह से सोनल की मर्जी पर थे। वह चाहे तो रहने दे, चाहे तो निकाल बाहर करे! भई, आप तभी तक मेरे ससुर थे जब तक आप का बेटा मेरा पति था! जब वह पति नहीं, तो आप ससुर कैसे? किस बात के? यह कोई सराय या धर्मशाला है कि पड़े पड़े रोटी तोड़ रहे हैं? मुफ्त की? चलिये यहां से, अपना रास्ता नापिये!

उन्हें भलमनसाहत यही लग रही थी कि वह कुछ कहे , इसके पहले वही कहें कि बेटी, बहुत हो गया, अब आज्ञा दो!

( यह वह समझते थे कि यह कहने का लाभ उन्हीं को मिलेगा। हो सकता है, वह पिघल जाय और मना कर दे)

सोनल चाय लेकर आ गयी - दो बड़े मग! एक मग उनके आगे रखते हुए बोली - ÷÷ पापा, आपने ऐसा बेटा क्यों पैदा किया जो वह नहीं देखता जो उसके पास है; हमेशा उधर ही देखता है जो दूसरे के पास है - लार टपकाते हुए! पता है, उसने आरती गुर्जर से क्यों की शादी?''

रघुनाथ ने चाय सुड़की! वे किसी और सोच में डूबे थे!

÷÷ इसलिए कि वह इकलौती संतान है करोड़पति एन.आर.आई. व्यवसायी की! एक्सपोर्ट इम्पोर्ट कम्पनी ÷ आरती इंटरप्राइजेज' के मालिक की!''

÷÷ बेटा, हम यह सब नहीं सुनना चाहते! हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि अपने पापा को बुला लो और अब मेरी छुट्टी करो।''

÷÷ क्या? क्या कहा आपने? जरा फिर तो सुनूं?'' सोनल की आवाज सहसा ऊंची हो गयी!

रघुनाथ बिना उसकी ओर देखे चाय सुड़कते रहे! सोनल ने उनके हाथ से मग छीन लिया - ÷÷ जी नहीं, कान पकड़िये और कहिये कि ऐसी बात फिर कभी नहीं करूंगा!''

रघुनाथ ने कातर और निरीह आंखों से उसे देखा!

वह रोती हुई रघुनाथ की गोद में लुढ़क गयी - ÷÷ पापा! संजय ने छोड़ दिया, कोई बात नहीं; आप तो मुझे न छोड़िये!''

 

( ९)

रघुनाथ अपने जीवन की लम्बाई नापते थे अपने पैरों से - उसकी चाल और ताकत से; फेफड़ों में आती जाती सांसों से। एक समय था जब वे पंद्रह सोलह मील चले जाते थे ननिहाल। धूप में! बिना थके, बिना कहीं बैठे - और तरोताजा रहते थे! फिर यह लम्बाई घटनी शुरू हुई - आठ मील, फिर छः मील, फिर चार मील, फिर एक मील और अब वह ढाबे में आकर सिमट गयी थी! अगर कहीं निकलना भी होता था तो अब दो पैर काफी नहीं होते थे, एक तीसरा पैर भी लगाना पड़ता था और वह तीसरा पैर था - छड़ी!

अब वह तिपहिया मनुष्य थे!

संतोष था तो यही कि उनकी तरह के तिपाये चौपाये मनुष्यों से कालोनी भरी पड़ी थी। जीने का सबब यही संतोष था कि वे अकेले नहीं हैं। उनके जैसे बहुत हैं! कई तो उनसे भी बदतर हैं। जिन्होंने जमीनी हिस्सा किराये पर दिया है और खुद रहने के लिये पहली मंजिल चुनी है , वे वहीं अंटके पड़े हैं। किसी तरह बालकनी में आते हैं और वहीं बैठे बैठे पूरे दिन लोगों को आते जाते देख कर अपने जीवित होने का अहसास करते हैं।

रघुनाथ किसी तरह पार्क और नहर तक तो हो आते थे , गांव नहीं जा पाते थे। यहां से थ्री व्हीलर या टेम्पो लेना, बसअड्डे जाना, बस में धक्कामुक्की के बीच चार घंटे बैठे रहना, नहर पर उतरना, फिर वहां से पैदल डेढ़ दो किलोमीटर गांव जाना मुश्किल हो गया था। जोड़ों में दर्द भी रहने लगा था अब। लेकिन जैसे जैसे गांव जाना कम होता गया था, वैसे वैसे वहां की जमीन जायदाद की चिन्ताएं बढ़ती ही गयी थीं!

सोनल ने उन्हें ढाबे से हटा कर घर के ÷ गेस्ट रूम' में रख दिया था! वे ठंड से तो बच गये थे लेकिन खिड़की के पास बैठकर रात भर अपने गांव और खेतों में घूमते रहते और सनेही को सलाह देते रहते! थक जाते तो बाकी समय यह सोचने में लगाते कि आखिर सोनल उनकी कौन है - न बहू, न बेटी - कि उसके घर में बैठे हुए हैं? जो उनके हैं, वे जाने कहां कहां हैं? उन्हें तो फिकर भी नहीं है इनकी! पूरा कुनबा - जिसकी एक एक ईंट उन्होंने जोड़ी थी - बिखर चुका है! शीला - यहां तक कि शीला को भी अपनी बेटी के घर बैठ कर झाड़ई लगाना और खाना बनाना मंजूर, लेकिन बहू के यहां मंजूर नहीं! और अब तो यह बहू भी कहां रह गयी है? शीला या जिसे भी पता चलेगा, दस बात उन्हीं को सुनायेगा उलटे कि किस हैसियत से वहां हैं आप?

यही बेचैनी एक सुबह उन्हें कालोनी के शर्मा पी.सी.ओ. ले गयी! उन्हें सर्दी जुकाम था! कई दिनों से बाहर नहीं निकल रहे थे! सोनल ही नहीं निकलने देती थी! लेकिन अपने दोनों बेटों से फाइनल बातें करने के इरादे से खिसक आये थे - चुपचाप!

सबसे पहले संजय को उन्होंने फोन किया - यही आठ साढ़े आठ का समय होता था जब सोनल कम्प्यूटर पर बैठती थी!

हलो , मैं बनारस से रघुनाथ!

( संजय)

अपने पास रखो यह चरण स्पर्श! शर्म आती है अपने को बाप कहते हुए मुझे! जो कमीनापन दिखाया तुमने , उसमें मुझे बात नहीं करनी चाहिए, लेकिन....

( संजय)

बकवास बंद करो! सुनो , मैं अशक्त हो गया हूं! जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं, कब क्या हो? अब खेती मुझसे नहीं होगी। या तो आकर सम्भालो या बताओ क्या करूं गांव की जमीन जायदाद का?

( संजय)

धनंजय से तो पूछूंगा ही , लेकिन बड़े हो तुम! मालिक हो! तुम क्या कहते हो?

( संजय)

नहीं , नहीं, हम वह सब करेंगे जो आप कहेंगे। कहिये तो। सुझाव दीजिये अपना!

( संजय)

हूं। तो सब बेच दें! उस पैसे से एक डेढ़ कमरे का बनारस में फ्लैट ले लें। बाकी जमा कर दें और उसके सूद से दोनों परानी जियें खायें!

( संजय)

हां हां , पेंशन तो रहेगी ही! लेकिन सुनिये, यह काम अपने मां बाप के लिये आप ही कीजिये! यह मुझसे न होगा!

( संजय)

इसलिये कि यह पाप मैं अपने हाथों नहीं करूंगा! इसलिये कि वह पुरखों की चीज है , उनकी धरोहर है। दूसरे की चीज बेचने का हक मुझे नहीं है!

( संजय)

नहीं , मैं बिल्कुल सेंटिमेण्टल नहीं हूं। लेकिन मेरे खेत जमीन नहीं है। इन्हें जिन्स या माल मानने के लिये तैयार नहीं हूं! और सुनो, अपनी सलाह अपने पास रखो! साले! नमकहराम!

उन्होंने फोन रख दिया!

कुछ देर सोचते रहे कि दूसरा फोन करें या नहीं! आखिरकार लगा ही दिया नम्बर!

हलो , धनंजय है क्या?

( महिला स्वर)

मैं रघुनाथ! उनका पिता!

( धनंजय)

हलो राजू , तुम बनारस आये लेकिन गांव पर नहीं आये। मैं इंतजार ही करता रह गया।

( धनंजय)

मौका नहीं मिला तो नहीं मिला जाने दो। ऐसा है बेटा कि मैं अब किसी लायक नहीं रहा। काम धाम होता नहीं। समस्या है खेतों की! उनका क्या करूं ?

( धनंजय)

नहीं , वह तो ठीक है लेकिन सनेही कब तक देखेगा? उसे लोग करने नहीं दे रहे हैं। उनकी आंखें लगी हैं हमारे खेतों पर!

( धनंजय)

लेकिन फायदा आज बेचने में नहीं है! अभी भाव चढ़ रहे हैं जमीन के! समझो पांच साल में ही दुगुने हो जायेंगे!

( धनंजय)

तो अभी रुक जायं ? मान लो, रुक जायं लेकिन उसके पहले ही मैं चल बसूं तो? संजय भी बाहर, तुम भी बाहर, फिर कौन...

( धनंजय)

ठीक है , बेच देता हूं लेकिन उतने पैसों का कुछ करना पड़ेगा न? क्या करूं उनका?

( धनंजय)

आधा आधा बांट दूं तुम दोनों भाइयों में ? फिर मेरा और तुम्हारी मां का क्या होगा? हम क्या खायेंगे? अच्छा सुनो, यह बताओ तुम क्या कर रहे हो इन दिनों?

( धनंजय)

अब तक नहीं मिली नौकरी ? कितने दिन लगेंगे अभी? तुम्हीं क्यों नहीं आ जाते? मैनेजमेण्ट के ज्ञान का उपयोग खेती के ही बिजनेस में नहीं हो सकता?

( धनंजय ने फोन काट दिया)

÷÷ हरामखोर!'' रघुनाथ पी.सी.ओ. के बाहर आ गये! साले, डोनेशन से पढ़ोगे तो पूछेगा कौन? न काबिलियत है न सिफारिश - चले हैं मैनेजर बनने!

वे घर न जाकर सीधे पार्क में गये और लकड़ी की बेंच पर बैठ गये!

पार्क के बगल वाली लेन में घर था पारसनाथ शर्मा का और तीन चार नौकरानियां उनसे उलझी हुई थीं! हफ्ते में एक दो बार कालोनी के किसी न किसी घर के सामने ऐसे सीन हो जाते थे! क्यों होते थे ऐसे सीन, इसे सब जानते थे इसलिये उसे महत्व भी नहीं देते थे!

था यह कि हर घर में बांगलादेशी नौकरानियां थीं - सोलह सत्राह की उमर से लेकर पैंतीस चालीस साल की! बूढ़ों में से किसी न किसी की ÷ बुढ़िया' अपने बेटे पतोह के पास बाहर चली जाती थी कुछ महीनों के लिये। रहती भी थी तो राग द्वेष से मुक्त हो चुकी होती थी या बुढ़ऊ को इतनी सी छूट दे रखती थी! बूढ़ों में शायद ही ऐसा कोई बूढ़ा था जिसे अपने जवान होने का भ्रम न हो और वो समय समय पर यह ÷ परीक्षण' न करना चाहता रहा हो कि उसमें अभी ÷ कुछ' बचा है कि नहीं? तृष्णा का मारा हर बूढ़ा प्यार, दुलार, पुचकार के नाम पर ऐसी छूट ले लेता था और नौकरानियां भी साबुन, तेल, नेलपॉलिश, लिपस्टिक या पंद्रह बीस रुपये बख्शीश पाकर संतोष कर लेती थीं। वे उनके यहां काम करते हुए अकुंठ भाव से सुरक्षित महसूस करती थीं। समस्या वहां खड़ी होती थी जहां बूढ़ा अपनी नौकरानी की सेवा के मुताबिक बख्शीश देने में आनाकानी करता था! यह प्रणय कलह जैसा मामला होता था जिसमें किसी तीसरे को दखल देने या बीच बचाव करने की जरूरत नहीं पड़ती थी! ( विस्तृत जानकारी के लिये पत्राकार सुशील त्रिापाठी की ÷ स्टोरी' पढ़िये - ÷ आखिर ÷ अशोक विहार' के ही प्रवेश द्वार पर ÷ मर्दाना कमजोरी एवं सिसनोत्थान की समस्या निवारण का जड़ी बूटियों वनौषधियों से शर्तिया इलाज' का पीला तम्बू साल भर क्यों तना रहता है?)

इस कलह कोलाहल से निरपेक्ष रघुनाथ बेंच पर धूप सेवन कर ही रहे थे कि उन्हें खोजते हुए पुराने मित्रा जीवनाथ वर्मा आ पहुंचे! उनके साथ ही रिटायर हुए थे और रसायनशास्त्रा के अध्यापक थे! नगर में बेटे बहू के साथ साकेत विहार में रहते थे!

कार्यकाल के दिनों में कुछ लोग उन्हें पागल समझते थे और कुछ जीनियस! चना चबेना पर जीवित रहने वाली भारत की अस्सी प्रतिशत जनता उनकी चिन्ता का विषय थी! वे भी शौकीन थे भूंजा ( भरसांय में भुने गये चने, मटर, लाई, चूड़ा, भुट्टे) के। भारी मुसीबत थी आम आदमी की! कड़ाही जुटाओ, बालू या नमक का बंदोबस्त करो, चूल्हा जलाओ, उसके गरम होने और धधकने का इंतजार करो तब कहीं भूंजा तैयार हो! ऐसा नहीं हो सकता कि यह सब झंझट न पालनी पड़े? वर्षों के चिन्तन मनन के बाद उन्होंने एक प्रयोग किया! चूंकि यह राष्ट्रीय स्तर की समस्या थी जिसका समाधान उन्होंने ढूंढा था इसलिये उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उद्घाटन वैज्ञानिक ए.पी.जे.अब्दुल कलाम करें। लेकिन अडं+गा लगाया रघुनाथ ने। उन्होंने कहा कि प्रयोग अभी प्रक्रिया में है इसलिये आयोजन स्थानीय स्तर पर हो!

काफी खर्च किया वर्मा ने! घर के आगे तम्बू लगाया , तीस अध्यापकों के लिये तीस कुर्सियां मंगवायीं, कैटरर से चालीस तश्तरियां मंगवायीं, माइक लगवाया! सभी अध्यापकों की तश्तरी में चार चार चने रखे, प्रिंसिपल जिन्हें उद्घाटन करना था, उनकी तश्तरी में पांच! तालियों की गड़गड़ाहट के बीच प्रिंसिपल ने मुंह में पांचों चने डाले और कूंचते ही थूंक दिया। माइक पर सिर्फ एक वाक्य बोले - ÷÷ ये चने लोहे के हैं और जहर हैं।''

सभी अध्यापकों ने चखे बगैर ही प्लेटें फेंक दीं और चले गये!

उनके अनुसार वर्मा ने उनका अपमान किया था और वर्मा के अनुसार उन्होंने वर्मा का!

प्रयोग यों तो गोपनीय था , उसके बारे में बताया भी नहीं जा सकता था लेकिन रघुनाथ को जो जानकारी थी, वह यह - वर्मा ने झाड़ पोंछ कर जमीन पर एक किलो चना फैलाया, उस पर स्पिरिट छिड़का, तीली जलायी, लपक उठी और चने भुन गये! ( छिलके जल गये, गूदे ज्यों के त्यों कच्चे रह गये)

यही भूंजा फेम वाले वर्मा कुछ देर दूर से उन्हें घूरते रहे और धीरे से बुदबुदाये - ÷÷ रघुनाथ!'' रघुनाथ ने जब सिर उठाया तो वे लपके - ÷÷ अरे! यह सचमुच तुम हो? यार, क्या हो गया तुम्हें? ठोकर बैठ गया है, गाल धंस गये हैं, दांत झड़ गये हैं, आंखें अंदर चली गयी हैं - ऐसा कैसे हो गया? पहचान में ही नहीं आ रहे तुम!''

रघुनाथ हंसे , खड़े हुए, उन्हें बाहों में लिया और अपने साथ बिठाते हुए बोले - ÷÷ कैसे इधर?''

÷÷ कुछ नहीं यार, गये थे कल पेंशन आफिस। जब लौटने लगे तो बड़े बाबू ने पूछा - ÷ रघुनाथ जिन्दा हैं कि गुजर गये?' मैंने पूछा - ÷ ऐसा कैसे बोल रहे हो?' उसने कहा - ÷ फाइल बंद पड़ी है उनकी! मई से पेंशन नहीं चढ़ी है' । ÷ क्यों?' उसने कहा कि उन्होंने ÷ लाइव सर्टिफिकेट' नहीं दिया है! तो मैं आज यही देखने आ गया कि मामला क्या है?

÷÷ बहुत अच्छा किया, इसी बहाने तुमसे भेंट हो गयी!''

'' लेकिन दिया क्यों नहीं तुमने? उसमें कुछ करना तो है नहीं! फारम भर कर रजिस्ट्रार को देना है। वह दस रुपये लेगा और प्रमाणित कर देगा। फिर साल भर की चिन्ता खतम!''

रघुनाथ ने बड़े बुझे मन से कहा - ÷÷ जीवनाथ! मुझे दस रुपये के जीवन में कोई रुचि नहीं है।''

वर्मा ने बड़ा मायूस होकर रघुनाथ को देखा - ÷÷ यार, क्या बात है? तुम ऐसे तो न थे!''

÷÷ चलो घर! जाना ही हो तो शाम को जाना!'' रघुनाथ के एक हाथ में छड़ी और दूसरे में वर्मा का कंधा - घर लौटे!

 

( १०)

जीवनाथ वर्मा जाते जाते एक नयी मुसीबत खड़ी कर गये थे यह कहते हुए कि अपनों के लिये बहुत जी चुके रग्घू , अब अपने लिये जियो!

यह वह बात थी जो कभी उनके अपने दिमाग में ही नहीं आयी! अपनों से अलग भी अपना कुछ होता है क्या ? क्या बेटे अपने नहीं थे? बेटी अपनी नहीं थी? बीवी अपनी नहीं थी? खेत खलिहान अपने नहीं थे? यह जरूर है कि इनमें से हर एक अपने लिये उनका जीवन चाहता था। किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि वे जी रहे हैं या मर रहे हैं? उसकी अपनी जरूरत सबसे ऊपर होती थी और नहीं चाहता था कि कोई उस पर सवाल उठाये! आप उसे अपने रास्ते जाने दें और जाने देने में मदद करें तो आप से अच्छा कोई नहीं!

लेकिन क्या उनकी जिन्दगी ही रघुनाथ की अपनी जिन्दगी थी ?

नहीं ; होनी चाहिए थी अपनी अलग से जो नहीं हुई! नहीं रही! और जीवनाथ वर्मा यह तब कह रहे हैं जब कान सुन नहीं सकते, आंखें देख नहीं सकतीं, जबड़े चबा नहीं सकते, कमर सीधी नहीं हो सकती! और यह सारा कुछ अपनों के प्रति पिता और पति के कर्तव्य की भेंट चढ़ गया! वे यह मानने के लिये हरगिज तैयार नहीं कि वे ÷ अपनों' के वेश में दूसरे थे! वे कहीं से टपके नहीं थे, अनचाहे भी नहीं थे। रघुनाथ स्वयं कृतज्ञ भाव से शीला को दूसरे के घर से लाये थे; यह उसका उन पर उपकार था कि उन्हें न जानते पहचानते हुए भी उनके साथ आयी थी और एक नयी दुनिया रचने में उनका साथ दिया था।

आखिर किस उम्मीद से रघुनाथ शीला ने मिल कर रची थी यह दुनिया ? वे इतने निःस्पृह और निःस्वार्थ तो नहीं थे और उनकी उम्मीद भी उनसे अलग नहीं थी जो गांव घर के थे। कि जब वे अशक्त हो जायेंगे तो ये बच्चे उनकी आंखें बनेंगे, उनके हाथ पांव बनेंगे। कि वे बीमार होंगे तो यही बच्चे उनकी सेवा करेंगे, दवा दारू करेंगे, अस्पताल में भर्ती करायेंगे। कि मरने लगेंगे तो मुंह में गंगा जल तुलसी दल डालेंगे, अर्थी सजायेंगे, श्मशान ले जायेंगे, क्रिया कर्म करेंगे!

लेकिन देखो तो इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है ? अरे, मरने के बाद सड़ो गलो, कौवे चील खायें या कुत्ते - क्या फर्क पड़ता है?

लेकिन यही दुनिया का और दुनिया के चलते रहने का कायदा रहा है - कि जीना तुम्हारा कर्तव्य है। किसी ने यह नहीं पूछा खुद से कि किसके लिये जीना है! वह पैदा होने के बाद से जब तक जी रहा है, जीता रहता है! मरने के दिन तक। मरने के दिन बाप बेटे के हाथ वह सारा कुछ सौंप जाता है जो उसके पास रहता है कि लो, सम्भालो अब। मैं चला!

रघुनाथ के पास गांव की जमीन के सिवा कुछ नहीं था और उस जमीन को वे अनमोल समझते थे। बेटे उसे ÷ कैश' में भुना कर देखते थे और कह रहे थे कि इससे ज्यादा तो मेरी एक महीने की इनकम है।

संजय की इस टिप्पणी ने रघुनाथ के भीतर का सारा जीवन रस चूस लिया था। वे अपने कमरे में खिड़की के पास बैठे हुए कदम्ब के पत्तों के पार वह आसमान देख रहे थे जो सूर्यास्त के बाद मटमैला पड़ा था। वहां उनकी आंखों के सामने एक मद्धिम तारा था जो हिलते पत्तों की ओट कभी छिप जाता , कभी झांकने लगता! यह तारा नहीं था उनके पिता थे जो उन पर मुसकराते थे और छिप जाते थे!

÷÷ अरे जीवनाथ सुनो, सुनो! अपने दिन तो नहीं बचे जीने के लिये लेकिन जिया है मैंने अपने लिये भी।'' वे सहसा चिल्लाये जैसे जीवनाथ अभी गेट के बाहर खड़े हों।

 

तारा का तुक लारा। तारा ने उन्हें लारा की याद दिला दी , उस लारा की जो उनकी नितांत अपनी जिन्दगी का गोपनीय हिस्सा थी।

जिन दिनों रघुनाथ अपने ÷ कैशोर्य' में दाखिल हो रहे थे उन्हीं दिनों उनसे टकरा गयी थी लारा चड्ढा। एक अल्हड़ और मासूम सी लड़की। अंडाकार चेहरे वाली सलोनी सांवली लड़की। सपनीली आंखें। नाक की नोंक पर शरारत। ओठों के कोनों पर मुसकान। लहरों की देह पर जैसे हवा में थर थर बुलबुले। कमी थी तो बस दो डैनों की जिनके सहारे वह जब चाहे तब उड़ सके।

रघुनाथ मामा के घर रह कर पढ़ाई कर रहे थे और वह सामने रहती थी बंगले में। बड़ी बहन हास्टल में थी और वह मां बाप के साथ! रघुनाथ से एक क्लास ऊपर थी! वह जब तब शाम को बल्ब की रोशनी में पापा के साथ बैडमिण्टन खेलती थी तो रघुनाथ अपने दरवाजे पर खड़े होकर देखा करते थे!

एक दिन जब लारा के मां बाप किसी समारोह में बाहर गये थे ; उसने इशारे से रघुनाथ को बुलाया। वह घर की डे्रस में थी - स्कर्ट और ब्लाउज में। वह रघुनाथ के साथ कैरम खेलने बैठ गयी और कुछ देर खेलती रही! कि अचानक उठी, दौड़ कर लान में गयी, पीले गुलाब के फूल के साथ लौटी और बालों में लगा कर खड़ी हो गयी - ÷÷ अब बोलो, कैसी लग रही हूं?'' भौंचक रघुनाथ देखते रहे और धीरे से बोले - ÷÷ अच्छी!'' ÷÷ अरे, सिर्फ अच्छी?'' लारा की आंखें फटी रह गयीं।

रघुनाथ की समझ में नहीं आया कि आगे क्या बोलें ?

लारा ने पैर से ठेल कर बोर्ड को एक किनारे किया और हाथ पकड़ कर खड़ा कर दिया रघुनाथ को! उसकी आंखें छलछला आयीं , बोली - ÷÷ गोबर कहीं के! चाहती हूं कि अच्छी सिर्फ तुम्हारी आंखें नहीं, तुम्हारे ओंठ, तुम्हारी उगलियां, तुम्हारी बाहें, तुम्हारी पूरी देह बोले!'' वह एक एक करके उनकी कमीज और पैण्ट के बटन खोलती गयी - ÷÷ अपना भी मैं ही खोलूं कि तुम भी कुछ करोगे?'' शरमाते हुए उनके कान में बुदबुदायी!

जैसे जैसे वस्त्रा उनकी देह से अलग होते गये , वैसे वैसे एक अजानी, अदेखी, अकल्पित दुनिया खुलती चली गयी उनके आगे - धीरे धीरे! लेकिन यह ÷ धीरे धीरे' असह्य हो गया रघुनाथ को! वे बेसब्र और बर्बर हो उठे! वे लारा के संयम पर चकित भी थे और मुग्ध भी! उसने उन्हें आहिस्ता बिछाया और उन्हीं पर बिछ गयी - फूलों से रची हुई गाछ की तरह। उन्हें अपने अंदर लेने से पहले उनके कान में फुसफुसायी - ÷÷ बुद्धूराम! कभी मिटाना मत!'' और उन्हें ढंके हुए जीभ की नोक से दायीं छाती पर लिखा - ÷ एल.ए.' जब बायीं छाती पर ÷ आर' लिख रही थी उसी समय ÷ कालबेल' बजी!

वह उछल कर खड़ी हो गयी , बोली - ÷÷ पहनो और भागो पीछे से!''

फिर तो महीने भर बाद ही चड्ढा साहब का तबादला हो गया और वह चली गयी!

इस बात को या तो रघुनाथ जानते हैं या लारा - तीसरा नहीं! ऐसी बहुत सी बातें हैं उनकी जिन्दगी की जिसे सिर्फ वही जानते हैं! क्या यह अपने लिये जीना नहीं था?

किसी को नहीं पता कि शुरू से ही रघुनाथ ने एक चोरी की जिन्दगी जी है जो उनकी नजर आने वाली जिन्दगी से कहीं ज्यादा असली और अपनी रही है! न मां बाप को पता , न बीवी को, न बेटे बेटियों को! इसी जिन्दगी के भीतर एक दूसरी जिन्दगी! जिसे लोग देखते और समझते रहे हैं, वह दूसरों के लिये और दूसरों के काम की भले रही हो - उनकी अपनी जिन्दगी नहीं थी! मजे और जोखम उस जिन्दगी में थे जो उनकी निजी थी और जो प्यार की खोज में गुजरी। जमाने से बच बचा के, लोगों की आंखों से चुरा के, अपनों की आंखों में धूल झोंक के, उन्हें धोखा दे के। जिसे उनके सिवा सिर्फ उसे पता है जो उसमें भागीदार रहा है। उसकी भनक भले मिली हो किसी को, मुकम्मल जानकारी किसी को नहीं। बेटी को अलबत्ता रही है लेकिन हल्की फुल्की।

मुकम्मल जानकारी तो तुम्हारे कमीनेपन की भी नहीं है किसी को रघुनाथ ? वह भी चोरी का ही जीवन था तुम्हारा! तुम हास्टल में थे उन दिनों! तुम्हारा जिगरी दोस्त श्रीराम तिवारी, भेंट करने आया था तुमसे! आया था तो अस्पताल अपनी मां को लेकर - उसकी हालत सीरियस थी। मां को अपने भाई के जिम्मे छोड़ कर तुमसे मुलाकात करने आ गया था! जब वह जाने लगा तो उसकी जेब से गिरे हुए धागे में बंधे नोट तुमने देखे और चुप रहे! बाद में गिने तो एक सौ तीन रुपये! मां को दिखा कर घंटे भर बाद फिर आया - चिन्तित, परेशान और घबड़ाया! आते ही वह - जहां बैठा था वहां, फिर चौकी के नीचे, मेज पर और उसके नीचे, कमरे में चारों ओर - देखता रहा! समझने के बावजूद तुमने उससे पूछा - ÷÷ क्या बात है?'' ÷÷ कुछ रुपये थे दवा के लिये, मिल नहीं रहे! और कहीं तो गया नहीं। तुमने तो नहीं देखे?'' और तुमने जवाब दिया था - ÷÷ अस्पताल की भीड़ भाड़ में सम्भल कर रहना चाहिए था! वहां जितने पेशेण्ट आते हैं उतने ही चोर और जेबकतरे भी! यह आम शिकायत है!'' ÷÷ नहीं यार, और कहीं गया ही नहीं। गिरा होगा तो यहीं और कहीं गिरने या जेब कटने का सवाल ही नहीं है!'' ÷÷ तो देखो न! कहां हैं यहां पर?''

तो रघुनाथ! यह भी तुम्हीं थे! वही तुम्हारी निजी जिन्दगी! अगर यह जिन्दगी लोगों को पता चल गयी होती तो तुम इतने ÷ आदरणीय' और ÷ गण्यमान' रह गये होते या नहीं, खुद सोचो!

रघुनाथ ने सोचा और वर्मा की ÷ अपने लिये जियो' की सलाह पर अविचलित रहे! कि इस दगाबाज ÷ आदर' और ÷ प्रतिष्ठा' के मुकाबले आत्मा का यह नंगापन और खुलापन कहीं ज्यादा अच्छा है। अपने लिये भी और समाज के लिये भी! यह सिर्फ आदमी का नहीं, समाज की विसंगतियों का चेहरा है जो ढंका तुपा है! समाज जाने कि अगर मैं कमीना हूं तो इस कमीनेपन का गुनहगार अकेला मैं नहीं हूं, वह भी है बल्कि कहिये कि उसी की वजह से मैं हूं।

 

÷÷ पापा!'' सोनल ने दरवाजे से आवाज दी - ÷÷ आप अभी तक अंधेरे में लेटे हैं?'' उसने स्विच ऑन किया और कमरा रोशन हो गया!

रघुनाथ की आंखें चौंधियायीं , फिर फैल गयीं - पहली बार सोनल के साथ एक नौजवान। लम्बा, खूबसूरत, आंखों पर नहीं, माथे पर चश्मा, कंधे पर झोला, खादी के कुर्ते और जीन्स की पतलून में। एक हाथ में लिपटा हुआ अखबार! रघुनाथ उठ कर बिस्तर पर आ गये!

÷÷ पापा, यह है समीर! दैनिक भारत का उप सम्पादक!''

रघुनाथ के पैर छुए समीर ने!

÷÷ मेरा कजिन है! मैंने बताया था आपको, भूल गये होंगे! जिन दिनों पटना में रिसर्च कर रही थी, उन दिनों यह भी वहीं था! आज अचानक सेमिनार में मिल गया। ले आयी अपने साथ!''

÷÷ कहां रहते हो बेटा?''

÷÷ यहीं पास में ही। संजय नगर में!''

÷÷ अरे, वहां तो मैं गया हूं। अपने दोस्त बापट के यहां!''

÷÷ मैं उन्हीं के फ्लैट के नीचे रहता हूं! अब तो उनके फ्लैट में उनका बेटा आ गया है बीवी बच्चे के साथ!''

चौंके रघुनाथ - ÷÷ उनका बेटा? बेटा कहां था उनके?''

समीर ने सोनल को देखा! सोनल ने बताया कि उन दिनों पापा गांव गये थे। उन्हें कुछ नहीं पता!

समीर ने कहा - ÷÷ पापा जी, क्या आप को खबर है कि बापट का मर्डर हो गया पिछले दिनों? नहर में उनकी लाश मिली थी? और आप आश्चर्य करेंगे कि एफ.आई.आर. इसी बेटे के नाम दर्ज हुई है। पेपर में आया था यह समाचार! इस बेटे को उन्होंने अनाथालय से एडाप्ट किया था जब वह बच्चा था! पढ़ाया लिखाया था, कोई नौकरी भी दिला दी इसको। चूंकि इसका चाल चलन अच्छा नहीं था इसलिये निकाल दिया था उन्होंने घर से! यह चाहता था कि अपने रहते फ्लैट उसके नाम लिख दें! शायद लिखवा भी लिया था इसने; इस शर्त पर कि वह इसमें तभी आयेगा जब वह नहीं रहेंगे! ... कहना मुश्किल है कि कैसे क्या हुआ?''

रघुनाथ काठ की तरह बैठे रहे - बिना हिले डुले! थोड़ी देर बाद चश्मा उतारा, गले में लिपटे मफलर से पोंछा, फिर लगा लिया! जैसे वे बापट को देखना चाहते हों। इस नगर में आने के बाद जो आदमी अकेला दोस्त हुआ था उनका वह बापट थे। उनके मुंह से आश्चर्य की तरह नहीं, एक ÷ आह' की तरह निकले ये वाक्य - ÷÷ यह क्या होता जा रहा है लोगों को! यह कैसी होती जा रही है दुनिया! हम बहुत अच्छे नहीं थे लेकिन इतने बुरे तो नहीं थे!''

÷÷ पापा, समीर से कह रही हूं कि इसी नगर में जब अपना घर है तो वहां क्यों है? ऊपर तो एक कमरा खाली ही पड़ा है!''

रघुनाथ ने कातर होकर हाथ जोड़े - ÷÷ जो करना हो करो, मुझे अकेला छोड़ दो! प्लीज!''

रघुनाथ ने बिना खाये पिये रात गुजारी। नींद ही नहीं आयी! वे कमरे की बत्ती बुझा कर सोते थे , लेकिन आज जलती हुई छोड़ दी। एक बजे रात तक उनकी आंखों के आगे बापट का चेहरा घूमता रहा और कानों में उनके गाने - ÷÷ हाये हाये ये जालिम जमाना!'' लेकिन इसके बाद - इसी के बाद उनके दिल ने कान में ÷ धक्‌ धक्‌' के बजाय ÷ कत्ल कत्ल' धड़कना शुरू कर दिया तो रोशनी का रंग पीला से लाल होने लगा। फिर तो वे जिधर नजरें घुमाते, उधर ही फावड़ा, कुल्हाड़ा, हंसिया, चाकू, कटार, ईंट, पत्थर, तमंचा, उछलते कूदते ललकारते दिखायी पड़ने लगे। थोड़ी ही देर में बल्ब से रोशनी नहीं जैसे खून के फव्वारे छूटने लगे और चारो दीवारें लाल हो गयीं! वे उठ कर बैठ गये और खुद से बुदबुदाये - ÷÷ इसी दुनिया में कभी हरा रंग भी होता था भाई, वह कहां गया?''

 

( ११)

जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!

शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर! थोड़ी देर पहले धूप थी। उन्होंने खाना खाया था और खाकर अभी अपने कमरे में लेटे ही थे कि सहसा अंधड़। घर के सारे खुले खिड़की दरवाजे भड़ भड़ करते हुए अपने आप बंद होने लगे - खुलने लगे। सिटकनी छिटक कर कहीं गिरी, ब्यौंड़े कहीं गिरे जैसे धरती हिल उठी हो, दीवारें कांपने लगी हों। आसमान काला पड़ गया और चारों ओर घुप्प अंधेरा।

वे उठ बैठे!

आंगन और लान बड़े बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गये और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी - धड़ाम! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूंदें नहीं थीं - जैसे पानी की रस्सियां हों जिन्हें पकड़ कर कोई चाहे तो वहां तक चला जाय जहां से ये छोड़ी या गिरायी जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे- दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नहीं, खिड़कियों से अंदर आंखों में।

इकहत्तर साल के बूढे+ रघुनाथ भौंचक! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है?

उन्होंने चेहरे से बंदरटोपी हटायी , बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गये!

खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।

घर के बाहर ही कदम्ब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था - अंधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था!

ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया - साठ बासठ साल पहले! वे स्कूल जाने लगे थे - गांव से दो मील दूर! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुंचे ही थे कि अंधड़ और बारिश और अंधेरा! सबने आम के पेड़ों के तने की आड़ लेनी चाही लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खंधों में ले जाकर पटका! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं! बारिश की बूंदें उनके बदन पर गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने के बाद - जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गांव से लोग लालटेन और चोरबत्ती लेकर निकले थे ढूंढ़ने!

यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी क्या ?

और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में है।

 

कितने दिन हो गये बारिश में भींगे ?

कितने दिन हो गये लू के थपेड़े खाये ?

कितने दिन हो गये जेठ के घाम में झुलसे ?

कितने दिन हो गये अंजोरिया रात में मटरगश्ती किये ?

कितने दिन हो गये ठंड में ठिठुर कर दांत किटकिटाये ?

क्या ये इसीलिये होते हैं कि हम इनसे बच के रहें ? बच बचा के चलें? या इसलिये कि इन्हें भोगें, इन्हें जियें, इनसे दोस्ती करें, बतियायें, सिर माथे पर बिठायें?

हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्राु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा ?

 

इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी! वे चले जाएंगे और इस धरती का वैभव , इसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार, जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आंखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जायं, आंखें रह जाएंगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुंचाती रहेगी!

उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो , जब उनके लिये सूरज ही न उगे। उगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे - वे नहीं! क्या यह सम्भव नहीं कि वे सूरज को बांध कर अपने साथ ही लिये जायं - न वह रहे, न उगे, न कोई और देखे! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस किस चीज को बांधेंगे और किस किस को देखने से रोकेंगे?

उनकी बाहें इतनी लम्बी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जियें तो सबके साथ!

लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था - कल तक कहां था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चांद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहां थी यह तड़प? फुर्सत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पांव कमरे में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुयी सुनाई पड़ रही है?

सच सच बताओ रघुनाथ , तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे से गांव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक विहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?

लेकिन रघुनाथ यह सब नहीं सुन रहे थे। यह आवाज बाहर की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर में दब गयी थी। वे अपने वश में नहीं थे। उनकी नजर गयी कोने में खड़ी छड़ी और छाता पर! जाड़े की ठंड यों भी भयानक थी और ऊपर से ये ओले और बारिश। हिम्मत जवाब दे रही थी फिर भी उन्होंने दरवाजा खोला। खोला या वे वहां खड़े हुए और अपने आप खुल गया! भींगी हवा का सनसनाता रेला अंदर घुसा और वे डर कर पीछे हट गये! फिर साहस बटोरा और बाहर निकलने की तैयारी शुरू की! पूरी बांह का थर्मोकाट पहना , उस पर सूती शर्ट, फिर उस पर स्वेटर, ऊपर से कोट। ऊनी पैण्ट पहले ही पहन चुके थे। यही सुबह जाड़े में पहन कर टहलने की उनकी पोशाक थी! था तो मफलर भी लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था - गमछा! बारिश को देखते हुए! जैसे जैसे कपड़े भींगते जाएंगे, वे एक एक कर उतारते और फेंकते चले जाएंगे और अंत में साथ रह जाएगा यही गमछा!

वे अपनी साज सज्जा से अब पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन नंगे बिना बालों के सिर को लेकर दुविधा में थे - कनटोप ठीक रहेगा या गमछा बांध लें।

ओले जो गिरने थे , शुरू में ही गिर चुके थे, अब उनका कोई अंदेशा नहीं!

उन्होंने गमछे को गले के चारों ओर लपेटा और नंगे सिर बाहर आये!

अब न कोई रोकने वाला , न टोकने वाला। उन्होंने कहा - ÷÷ हे मन! चलो, लौट कर आये तो वाह वाह! न आये तो वाह वाह!''

बर्फीली बारिश की अंधेरी सुरंग में उतरने से पहले उन्होंने यह नहीं सोचा था कि भींगे कपड़ों के वजन के साथ एक कदम भी आगे बढ़ना उनके लिये मुश्किल होगा।

वे अपने कमरे से तो निकल आये लेकिन गेट से बाहर नहीं जा सके!

छाता खुलने से पहले जो पहली बूंद उनकी नंगी , खल्वाट खोपड़ी पर गिरी, उसने इतना वक्त ही नहीं दिया कि वे समझ सकें कि यह बिजली तड़की है या लोहे की कील है जो सिर में छेद करती हुई अंदर ही अंदर तलवे तक ठुंक गयी है! उनका पूरा बदन झनझना उठा। वे बौछारों के डर से बैठ गये लेकिन भींगने से नहीं बच सके। जब तक छाता खुले, तब तक वे पूरी तरह भींग चुके थे!

अब वे फंस चुके थे - बर्फीली हवाओं और बौछारों के बीच। हवा तिनके की तरह उन्हें ऊपर उड़ा रही थी और बौछारें जमीन पर पटक रही थीं! भींगे कपड़ों का वजन उड़ने नहीं दे रहा था और हवा घसीटे जा रही थी! उन्हें इतना ही याद है कि लोहे के गेट पर वे कई बार भहरा कर गिरे और यह सिलसिला सहसा तब खत्म हुआ जब छाते की कमानियां टूट गयीं और वह उड़ता हुआ गेट के बाहर गायब हो गया। अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे हवा जगह जगह से नोच रही हो और पानी दाग रहा हो - जलते हुए सूजे से!

अचेत होकर गिरने से पहले उनके दिमाग में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा - उनका मित्रा! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिशें कीं - पहली बार लोहता स्टेशन के पास रेल की पटरी पर नगर से दूर निर्जन जहां किसी का आना जाना नहीं था! समय उसने सामान्य पैसेंजर या मालगाड़ी का नहीं, एक्सप्रेस या मेल का चुना था कि जो होना हो, ÷ खट्' से हो, पलक झपकते, ताकि तकलीफ न हो। वह पटरी पर लेटा ही था कि मेल आता दिखा! जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्‌।

यह मरने से ज्यादा बुरा हुआ! बैसाखियों का सहारा और घर वालों की गालियां और दुत्कार! एक बार फिर आत्महत्या का जुनून सवार हुआ उस पर! अबकी उसने सिवान का कुआं चुना! उसने बैसाखी फेंक छलांग लगायी और पानी में छपाक्‌ कि बरोह पकड़ में आ गयी! तीन दिन बिना खाये पिये भूखा चिल्लाता रहा कुएं में - और निकला तो दूसरे टूटे पैर के साथ!

आज वही ज्ञानदत्त - बिना पैरों का ज्ञानदत्त चौराहे पर पड़ा भीख मांगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा! मगर यह कम्बख्त ज्ञानदत्त उनके दिमाग में आया ही क्यों? वे मरने के लिये तो निकले नहीं थे? निकले थे बूंदों के लिये, ओले के लिये, हवा के लिये। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिये।

 

( १२)

 

रघुनाथ को कुछ पता नहीं कि वे अपने कमरे में कैसे पहुंचे ? कौन ले गया? कब ले गया? कैसे ले गया? कपड़े किसने उतारे? बदन किसने पोंछा और तीस साल पुराना खादी आश्रम वाला वह गाउन या ओवरकोट किसने पहनाया जिसके रोयें झड़ गये थे और जो टाट रह गया था? वे नीचे से नंगे थे और गर्भ में पड़े हुए बच्चे की तरह बुक्की मारे बिस्तर पर पड़े थे। उनके ऊपर कम्बल के साथ रजाई पड़ी थी जिसके नीचे वे दब से गये थे!

हीटर से कमरे को गर्म कर दिया गया था!

उनके पैर के एक तलवे में समीर तेल रगड़ रहा था और दूसरे तलवे में सोनल! गरम तेल से अजवाइन की गंध आ रही थी।

रघुनाथ के गले से निकलने वाली खर्राटे जैसी सांसें बता रही थीं कि चिन्ता की कोई बात नहीं है। वे जैसे बेहोशी में लग रहे थे - नींद में ज्यादा, जाग में कम। वस्तुस्थिति को समझने के लिये सोनल ने दो तीन बार उन्हें आवाज दी। शरीर में जरा सी हरकत जरूर हुई लेकिन उन्होंने आंखें नहीं खोलीं।

रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी!

÷÷ बत्ती बुझा दें?'' समीर ने पूछा।

सोनल ने कहा - ÷÷ बुझा दो!''

रघुनाथ का मन हुआ कि मना कर दें।

पैताने फिर तलवे के पास बैठते हुए समीर ने पूछा - ÷÷ कल कै बजे से है तुम्हारा क्लास?''

÷÷ कल नहीं, आज कहो! नौ बजे से! लेकिन छुट्टी लेनी पड़ सकती है।''

÷÷ अरे नहीं, चंगे हो जायेंगे सुबह तक! टनाटन। केवल ठंड लग गयी है। वह तो कहो कि मैं समय पर पहुंच गया। जैसे ही गेट के पास कुछ गिरने की आवाज आयी, मैं दौड़ा और देखा तो पापा!''

( देखो इस झुट्ठे का! कहीं नहीं दौड़ा! पोर्टिको से ही डंडे से कोंच कोंच कर देखा। खुद डरा हुआ था कि जाने क्या हो? कुत्ता, बिल्ली, जाने क्या?)

उन दोनों की आवाजें रतजगे की थीं - खस खस और फुस फुस! वे धीमे स्वर में फुसफुसा कर बातें कर रहे थे ताकि रघुनाथ की नींद में खलल न पड़े! उन्होंने अपने नीचे कम्बल बिछा रखे थे और शालें ओढ़ रखीं थीं!

÷÷ एक बात बताओ, पापा शुरू से ही ऐसे थे क्या? झक्की और जिद्दी। अपने मन के!'' समीर बोला।

÷÷ पहले यह हाथ हटाओ!''

÷÷ कैसा हाथ?''

÷÷ यार, सेंसेशन हो रहा है! गुदगुदी। समझते क्यों नहीं?''

÷÷ बगल में बैठती हो तो कभी सुनता है मेरी?''

( रघुनाथ को बत्ती गुल होने का रहस्य अब समझ में आया! वे रजाई के अंदर सिकुड़े सिमटे बंद आंखों से सारा कुछ देख सुन रहे थे और मारे शर्म के न करवट बदल पा रहे थे, न हिलडुल रहे थे!)

÷÷ सोचती हूं, मम्मी और दीदी को खबर दे दूं सुबह!''

÷÷ जैसा चाहो, वैसे जरूरत नहीं लग रही है इसकी!''

÷÷ सोचो, अगर तुम न होते तो क्या होता? अकेली क्या करती मैं?... एइयू...!'' सहसा चिहुंक उठी वह ÷÷ क्या करते हो यह? सब्र नहीं होता?''

÷÷ कैसे होगा? ठंड तो देखो?'' समीर ने उसके पास - और पास खिसकते हुए कान में कहा - ÷÷ रोकना है तो मौसम को रोको। सुन रही हो - फिर टिप्‌ टिप्‌। ये बूंदें कुछ कह रही हैं। क्या कह रही हैं?''

स्वर समीर के गले में कहीं फंस और टूट रहा था!

÷÷ सम्मी! प्लीज!'' सोनल ने बेचैनी में अपना सिर रघुनाथ के उस पैर पर रखा जिसका तलवा उसकी हथेली में था! उसकी गर्म सांसें उनकी उगलियों पर हवा कर रही थीं!

÷÷ यार, उठो तो! पापा सो गये हैं, उन्हें सोने दो!'' समीर जैसे गिड़गिड़ाते हुए बोला।

सोनल - घुटनों के बल बैठी और रघुनाथ के तलवे पर माथा टिकाये सोनल - बीच बीच में सिहर और हिल उठती थी। उसने भर्रायी सी आवाज में कहा - ÷÷ समझते क्यों नहीं तुम? इस हाल में कैसे छोड़ दूं इन्हें? कब क्या जरूरत पड़ जाय?''

लेकिन उसकी नहीं सुनी समीर ने। उसने बैठी सोनल को लगभग अपनी गोद में उठाया और लिये दिये कमरे से बाहर हो गया!

रघुनाथ को बुरा नहीं लगा! उनके तलवे पर पड़ा हुआ उसका सिर जैसे पहले ही क्षमा मांग चुका था! अभी उम्र ही क्या थी उसकी ? रघुनाथ ने मन बनाया कि अगर वह सचमुच समीर को प्यार करती हो और उसके साथ घर बसाना चाहती हो तो वे पापा की हैसियत से कन्यादान करने में पीछे नहीं हटेंगे।

रघुनाथ को पूरी तरह स्वस्थ होने में एक सप्ताह लग गया। वे रजाई बिछा कर लान में लेटे धूप सेंक रहे थे - दोपहर में। सोनल और समीर अपने अपने काम पर चले गये थे। कालोनी हमेशा की तरह निर्जन और उदास अपने घरों में सिमटी थी! ऐसे ही में उनके दरवाजे पर एक बोलेरो जीप खड़ी हुई और उसमें से दो नौजवान बाहर आये!

वे पांव छूकर उनके अगल बगल बैठ गये ! रघुनाथ ने ध्यान से देखा - वे विश्वविद्यालय के लड़कों जैसे जीन्स और स्वेटर में थे। एकदम टिप टाप। भले और सभ्य घर के। पूछने पर नाम नहीं बताया उन्होंने। वे चौकन्ने थे और हड़बड़ी में लग रहे थे। रघुनाथ ने चाय पानी के लिये पूछा लेकिन उन्हें इतनी फुर्सत नहीं थी।

÷÷ सर, इस पर सिग्नेचर कर दीजिये!'' एक ने एक कागज बढ़ाया जिस पर पहले से कुछ लिखा था।

रघुनाथ ने चश्मा लगा कर पढ़ना शुरू ही किया था कि दूसरे ने छीन लिया - ÷÷ हमसे पूछिये न! हम बता देंगे। पहले सिग्नेचर करो।''

रघुनाथ ने उसे घूर कर देखा।

उसने रिवाल्वर निकाल कर दरी पर उनके आगे रख दी!

÷÷ कितना दिया नरेश ने? अस्सी हजार? एक लाख? इससे ज्यादा कीमत तो नहीं है जमीन की?''

÷÷ सिग्नेचर करते हो कि नहीं?''

÷÷ वह तो कर देंगे लेकिन मैं दो लाख दिला दूं तो?''

÷÷ दो लाख? कहां से दिलाओगे?''

÷÷ इससे तुम्हें मतलब? दिला दूं तो?''

दोनों ने एक दूसरे को देखा - ÷÷ तो जो कहो, कर देंगे!''

÷÷ मार दोगे नरेश को?''

÷÷ वह भी कर देंगे!''

÷÷ लेकिन मैं उसे मारने के लिये नहीं कहूंगा! काम वह करो जिसमें खतरा न हो, रकम हो, लज्जत हो। जितनी मामूली रकम के लिये दौड़े हुए आये हो उतने की तो पेशाब करता है मेरा एक बेटा!''

÷÷ इसीलिये इतना बास मार रहे हो! उसी में नहाते हो क्या?'' लम्बा वाला लड़का व्यंग्य में हंसा।

÷÷ क्या बोले?'' रघुनाथ अपनी हथेली कान पर ले गये - ÷÷ जरा ऊंचा बोलो।''

÷÷ कुछ नहीं, बताओ क्या करना है?''

÷÷ पहले तमंचा जेब में रखो और वह कागज हमें दो या फाड़ दो!''

÷÷ हां बोलो!'' रिवाल्वर जेब में रख लिया दूसरे ने!

÷÷ मुझे ले चलो! अगवा करो मुझे और फिरौती मांगो दो लाख!''

÷÷ कौन देगा तुम्हारे जैसे सड़े गले बुड्ढे का दो लाख?''

÷÷ सिर्फ दो लाख इसलिये कि रकम नहीं अखरेगी देने में। मिल भी जायेगी और हत्या से भी बच जाओगे?''

÷÷ अरे देगा कौन इस सड़े गले का?''

÷÷ सड़ा गला तुम्हारे लिये हूं, बेटों के लिये तो नहीं, बेटी के लिये तो नहीं?''

÷÷ मान लो, इनमें से कोई फिरौती देने न आये तो?''

÷÷ यही तो देखना है कि कोई आता भी है या नहीं?''

÷÷ हम भी यही कह रहे हैं कि कोई न आये तब?''

रघुनाथ ने क्षण भर सोचा - ÷÷ तो भी चिन्ता नहीं। तुम्हारी ÷ पकड़' इतनी गयी गुजरी नहीं। इतना है मेरे पास कि खुद को छुड़ा लूं!''

÷÷ बैठे रहो, हिलना मत!'' दोनों उठे, थोड़ी दूर जाकर आपस में खुसुर फुसुर किया, फिर वहीं से आवाज दी - ÷÷ ठीक है, चलो!''

÷÷ तो आओ, समेटो रजाई!'' रघुनाथ घुटनों पर हाथ रख कर उठ खड़े हुए!

दोनों ने चकित होकर देखा उन्हें - ÷÷ रजाई क्या करोगे?''

÷÷ ओढ़ेंगे, बिछायेंगे, सिरहाना बनायेंगे - जरूरत पड़ेगी तो लुंगी मार लेंगे, और क्या?''

रिवाल्वर वाले लड़के ने रजाई समेटते हुए पूछा - ÷÷ कुछ खास है क्या इस रजाई में?''

÷÷ है न? बेटे ने भेजा है कैलिफोर्निया से।''

÷÷ लेकिन यह रजाई तो नहीं लगती।'' दूसरे ने संदेह जाहिर किया।

÷÷ लगे न लगे, मैं तो यही बोलता हूं।'' कहते हुए रघुनाथ चल पड़े।

÷÷ ऐ बुड्ढे, चलता कहां है? कम से कम पैसा तो रख ले दस दिन के फोन फान, राशन पानी, पेट्रोल वगैरह का? खायेगा क्या?''

÷÷ सब हमीं करेंगे तो तुम क्या करोगे? बैठ कर नोट गिनोगे?'' रघुनाथ की भवें तन गयीं। उनके अंदर का मास्टर फनफना उठा - ÷÷ और सुनो, तुम्हारे जैसे लौंडों को पढ़ाते हुए उमर गुजरी है मेरी, इसलिये तमीज से बात करो। मेरी जरूरत तुम्हें है, मुझे कोई जरूरत नहीं है तुम्हारी। समझा?''

रिवाल्वर वाला लड़का बुदबुदाया धीरे से - ÷÷ चल तो पहले! वहीं बताते हैं कि किसकी किसको जरूरत है?''

÷÷ कुछ कहा?'' रघुनाथ ठिठक गये!

÷÷ कुछ नहीं, चलो!''

 

रघुनाथ जब छड़ी के सहारे बाहर आये तब उनका चेहरा बंदरटोपी के अंदर था और रजाई लड़के के कंधे पर! वे आगे आगे , दोनों अपहर्ता लड़के पीछे पीछ१े - जैसे वे बेटों के साथ मगन मन तीरथ पर जा रहे हों।

 


 

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