विश्वनाथ त्रिपाठी
• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल • सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार
• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण
• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण
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आओ बंधु फिर से जियें क्रांति के वे दस दिन युग बुने जो पल रूस में श्रमिकों की विजय
आओ बंधु बंधु सोचो जरा आओ बंधु सन् 1978 के अक्टूबर मास में तिबलिसी (जियोर्जिया) में दस दिन के अपने निवास के दौरान (जिसमें से पांच दिन अस्पताल में बिताने पड़े) मुझे समाजवादी व्यवस्था और जीवन के अनेक ऐसे पहलुओं, ऐसे तथ्यों को व्यक्तिगत अनुभव द्वारा समीप से जानने और परखने का अवसर मिला जो चौंकाने वाले थे और पूर्व कल्पित, पूर्व निर्धारित धारणाओं और विश्वासों के एकदम प्रतिकूल थे। रूसी समाजवाद के मिथक और उसकी वास्तविकता के बीच की दरार बिना तिबलिसी गये समझ में नहीं आ सकती थी। मैं सोचता था सोवियत यूनियन में जो भी गणराज्य हैं वे संकीर्ण राष्ट्रवादी प्रवृत्ति और भावना से मुक्त हैं और समाजवादी व्यवस्था अनेकता में एकता और एकता में अनेकता का लक्ष्य हासिल करने में कामयाब हुई है। हमें युवाकाल से ही बताया गया था कि रूसी क्रांति के बाद समाजवाद कई राष्ट्रीय गणराज्यों का ऐसा संघ बनाने में सफल हुआ है जिसके भीतर कई राष्ट्र एक संघ में शामिल होकर पारस्परिक सहयोग और सहभागिता द्वारा एक दूसरे की उन्नति में भागीदार हुए हैं तथा राष्ट्रहित और संघ के सभी राज्यों का सामूहिक हित एक दूसरे के पूरक बन गये हैं। शायद सोवियत गणराज्य के प्रारम्भिक वर्षों में जब लेनिन के नेतृत्व ने रूस के अन्य राज्यों से रिश्ते को जारशाही के प्रभुत्व से मुक्त किया तो मैत्रीपूर्ण रिश्ते बनाने की दिशा में प्रगति हुई भी थी। लेकिन बाद में यह एक आदर्श या स्वप्न मात्र हो कर रह गया और राष्ट्रीय अस्मिता की भावना महा शक्तिशाली रूसी गणराज्य के - रूसी भाषा के, रूसी आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक वर्चस्व के - विरुद्ध अंदर ही अंदर सुलगती गयी और गम्भीर आंतरिक संकट की स्थिति और विस्फोट का कारण बनी जिसके फलस्वरूप अंत में सोवियत संघ का ही विघटन हो गया। सोवियत संघ के विखंडन के एक या डेढ़ दशक पहले जब हम तिबलिसी में थे तभी इसके संकेत स्पष्ट थे। सन् 1978 में भारतीय समाज वैज्ञानिकों का दल जिसमें अधिकतर भूगोल के विशेषज्ञ थे और शायद मैं अकेला अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री था, प्रादेशिक विकास की समस्याओं के तुलनात्मक अध्ययन के लिए तिबिलिसी पहुंचा था। क्या उस समय दल के सदस्यों ने महसूस किया था कि शताब्दि के अंत के पहले ही जियौर्जिया रूसी प्रभुत्व वाले सोवियत संघ से उसी प्रकार अलग हो जायगा जैसे वह कभी जारशाही के प्रभुत्व से मुक्त हो गया था? क्या हमें इस बात का पूर्वाभास था कि सम्बंध विच्छेद ही नहीं इक्कीसवीं सदी का आरम्भ होते होते रूस और जियौर्जिया के बीच टकराव इतना भयावह रूप ले लेगा जैसे दोनों राज्य एक दूसरे के शत्रु राज्य हों? इतना ही नहीं, जियौर्जिया अमरीका से अपने रिश्ते जोड़ने की दिशा में तेजी से सक्रिय होगा? एक साहित्यकार से जो एक प्रबुद्ध बुद्धिजीवी के रूप में भी जाना जाता है , यह उम्मीद की जाती है कि वह समकालीन साहित्यकारों और उनके साहित्य का गहरा विवेचन और मूल्यांकन नहीं, तो परिचयात्मक विवरण अवश्य तैयार करेंगे। ख्रुश्चेव के द्वारा स्तालिन की तानाशाही पर परदा हटाने के बाद शासक वर्ग और साहित्यकारों के रिश्ते में क्या परिवर्तन हुआ, उसके बाद अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं, कविताएं, उपन्यास लिखे गये जो बहुचर्चित हुए और जिन्होंने रूसी समाज और शासन की असलियत पर नयी रोशनी डाली - इन सब पर भीष्म जी प्रगतिशील लेखक के नाते कुछ रोशनी अवश्य डाल सकते थे। लेकिन भीष्म जी की इन सब पर चुप्पी आश्चर्य में डालने वाली थी। इस विषय पर उनसे उनके जीवन काल में सवाल भी पूछे गये जिसका जवाब देने से वे हमेशा दूर रहे और अगर बोले भी तो यथास्थिति के ही समर्थन में बोले। अपने अंतिम वर्षों में उन्होंने अवश्य अपनी आत्मकथा ÷ आज के अतीत' (2003) में अपने मास्को निवास पर कुछ विचार व्यक्त किये हैं। इन विचारों में जो रुख व्यक्त होता है वह मानसिक खुलेपन का नहीं है बौद्धिक गम्भीरता, साहस और वस्तुनिष्ठता का तो कदापि नहीं। सोवियत संघ के विघटन के एक दशक से अधिक गुजर जाने के बाद भी जब वह इस अभी तक निषिद्ध ( फोरबिडन) विषय पर कुछ कहने का साहस जुटाते हैं तब भी विषय के साथ न्याय नहीं कर पाते। ऐसा नहीं कि भीष्म जी अपनी असमर्थता के कारणों से वाकिफ न हों। वे स्वयं अपनी बुनियादी रूप से रूस के प्रति ÷ रूमानी आदर्शोन्मुख दृष्टि के' प्रति सचेत हैं जो ÷ आशावादी और प्रेरणाप्रद होती है पर उसके प्रभावाधीन नकारारात्मक पहलुओं को देखने की इच्छा ही मन में नही उठती!' भीष्म जी मानते हैं कि इस प्रवृत्ति के प्रभावाधीन उनके लिए ( सोवियत संघ) के अंतर्विरोधों के पीछे काम कर रहे कारक तत्वों को समझ पाना कठिन भी था। अपनी मानसिकता की जड़ों की ऐसी साफ समझ होते हुए क्यों भीष्म जी उस मानसिकता से जूझने और वास्तविकता का सही निरीक्षण और विवेचन करने से चूक जाते हैं, इसे समझना भी एक बौद्धिक चुनौती है। शायद भीष्म जी उस पीढ़ी के बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए रूसी क्रांति एक महान प्रेरणादायक युगांतरकारी घटना थी और उसके प्रति पश्चिम साम्राज्यवादी पूंजीवादी राष्ट्रों ने जिस प्रकार विद्वेष और शत्रुता का रुख अपनाया था और उसे उसके शैशव में ही खत्म कर देने के लिए जो साजिश रची थी, जो खुले सामरिक हस्तक्षेप किये थे उसकी प्रतिक्रिया में क्रांति के समर्थकों में प्रथम समाजवादी राज्य और समाज का सम्पूर्ण मन से, बिना कोई सवाल पूछे, बिना किसी शर्त के पूर्ण समर्थन की परम्परा बन गयी जो आखिर तक चलते चलते एक आदत बन गयी। भीष्म जी की पीढ़ी के लिए रूस के खिलाफ कुछ भी बोलना और लिखना तो दूर - कुछ सुनना भी जैसे एक अपराध हो, ÷ पाप' हो। ÷ जो हमारे साथ नहीं हमारे खिलाफ है' - यह सिद्धांत इसी दौर की उपज है जब हर dissident एकदम renegrade करार दिया जाता था। जब एक विचारधारा (ideology) जो आरम्भ में विवेक आधारित हो कालांतर में विवेक से कट कर विश्वास (faith) या मतांधता (dogma) में बदल जाती है तो उसका सम्बंध वास्तविकता से कट जाता है। भीष्म जी जैसा ईमानदार और विवेकी व्यक्ति यह सब जानते हुए भी इससे मुक्त नहीं हो पाया। यह अकेले उनकी अक्षमता नहीं एक पूरी पीढ़ी, एक पूरी परम्परा, एक पूरे बौद्धिक समुदाय की अक्षमता है। भीष्म जी के कथनों को पढ़ कर मुझे एरिक हाब्स बाम की आत्मकथा Interesting Times: A Twenteenth Centrury Life की निम्न पंक्तियां स्मरण हो आयीं जो उल्लेखनीय हैं और जो भीष्म जी की ही नहीं अधिकतर भारतीय कम्यूनिस्टों की मानसिक स्थिति की प्रामाणिक तस्वीर प्रस्तुत करती हैं - ÷÷ सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में स्तालिन के जघन्य अपराधों का खुलासा करने वाली ुिश्चेव रिपोर्ट के बाद किसी भी विचारशील कम्यूनिस्ट के लिए कम्यूनिज्म के बारे में कुछ बुनियादी सवाल स्वयं से पूछने से कतराना मुश्किल हो गया। यह कम्यूनिस्ट विश्वास का ऐसा संकट है कि एक ओर इसे खोने की पीड़ा है तो दूसरी ओर उससे चिपके रहने की पीड़ा। सच तो यह है कि अक्टूबर क्रांति ने जिस कम्यूनिस्ट विश्वास को जन्म दिया था ख्रुश्चैव रिपोर्ट ने उसकी बुनियाद ही हिला दी।'' विश्व भर में पुरानी पीढ़ी के कम्यूनिस्टों के विश्वास पर खु्रश्चैव की रिपोर्ट ने कितना जबर्दस्त आघात किया था और उनके लिए कितना गहरा मानसिक संकट पैदा किया इसकी पुष्टि करते हुए एरिक हाब्स बाम ब्रिटेन के कम्यूनिस्टों का हवाला देते हैं। एरिक हाब्स बाम के अनुसार 1956 ब्रिटेन की राजनीति में एक नाटकीय मोड़ का वर्ष था लेकिन ब्रिटेन के कम्यूनिस्टों के लिए खु्रश्चैव रिपोर्ट के मुकाबले स्वेज कैनाल का संकट आदि सब कुछ गौण हो गया। ÷ इसमें कोई भी अतिशयोक्ति नहीं कि साल भर से ऊपर ब्रिटेन के कम्यूनिस्ट ऐसी मानसिक स्थिति में रहे जिसे राजनैतिक स्तर पर सामूहिक रूप से nerous break down की स्थिति कहा जा सकता है। कई दशकों के विश्वास पर आघात से पैदा हुआ यह संकट इतना गहरा था कि उसने अनगिनत बुद्धिजीवियों को टूटे विश्वास और बढ़ते संशय के द्वंद्व में फंसा दिया जिससे कम्यूनिस्ट आंदोलन आज तक मुक्त नहीं हो सका है। ' भीष्म जी की आत्मकथा में भी खु्रश्चैव रिपोर्ट के बाद एक कम्यूनिस्ट के द्वंद्व और दुविधाग्रस्त विभाजित मन की स्पष्ट झलक मिलती है। एक ओर ऐसा मानसिक दबाब है कि रूस की कम्यूनिस्ट व्यवस्था की आलोचना समाजवाद पर अटूट विश्वास में दरार न पैदा करे। दूसरी ओर उनकी बुनियादी ईमानदारी कम्यूनिस्ट व्यवस्था की कमजोरियों की भी अनदेखी नहीं कर सकती। विश्वास अगर एक दिशा में खींचता है तो समाजवादी व्यवस्था के बारे में पैदा हुआ संशय विपरीत दिशा में। अंत में दुविधाग्रस्त मन बार बार विश्वास की ओर ही लौटना चाहता है , संशय को एक विचारात्मक प्रक्रिया में बदलने का साहस और मनोबल नहीं जुटा पाता। यह ऐसी ही स्थिति है - ÷ जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे' चाहे टूटा हुआ जहाज सहारा देने की स्थिति में हो या न हो। मास्को में सात साल रहने के बाद क्यों भीष्म जी इस स्थिति में नहीं हैं कि वे सोवियत व्यवस्था की असलियत के बारे में कुछ निश्चित राय बना सकें या व्यक्त कर सकें , यह सवाल कोई भी पूछ सकता है। मुझे याद पड़ता है कि इंस्टीट्यूट आफ एडवांस्ड स्टडीज शिमला में जब वे विजिटिंग फेलो थे एक गोष्ठी में उनसे यह सवाल पूछा भी गया था। लेकिन उन्होंने उस गोष्ठी में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से परहेज ही किया था और कहा था कि यह बड़ा पेचीदा प्रश्न है जिस पर इतिहास ही अपना निर्णय देगा। जीवन के अंतिम वर्षों में लिखी अपनी आत्मकथा में जैसे वे स्वयं अपने से सवाल जवाब कर रहे हों और स्वयं को जवाब देने की कोशिश कर रहे हों। आरम्भ में जैसे स्वयं को बता रहे हों कि क्यों वे चुप्पी की स्थिति में थे। उनका प्रारम्भिक कथन एक तरह अपने से ही जूझने की कोशिश है - ÷÷ हम लोग सात साल तक मास्को में रहे। मास्को निवास के सात वर्षों में क्या खोया क्या पाया, इसके बारे में सोचो तो व्यक्तिगत स्तर पर तो पछतावे ही ज्यादा मन में उठते हैं। न तो अच्छी तरह से रूसी भाषा सीखी न उसका साहित्य ही जम कर पढ़ा, न तो जन जीवन की ज्यादा जानकारी ही हासिल कर पाया, न ही उनकी आर्थिक सामाजिक व्यवस्था को किसी गहराई से जान समझ पाया। अनुवाद कार्य के बोझ के नीचे ही दबा रहा।'' यह एक प्रकार अपनी स्थिति का rationlisation है। असली कारण कुछ और है जिसका अनुमान उनके आगे के कथनों से लगाया जा सकता है। इस सिलसिले में एक और नामी बुद्धिजीवी आएजा बर्लिन का खयाल आता है जिन्हें ब्रिटिश एम्बेसी के एक अस्थायी अधिकारी के रूप में पहले 1945 और फिर 1956 में कुछ मास बिताने का अवसर मिला था जिसका उन्होंने अनेक बाधाओं से जूझते हुए और अनेक जोखिम उठा कर उपयोग किया और दो प्रतिष्ठित और राज्य के कोपभाजन रूसी लेखकों से साक्षात्कार के रूप में अपना प्रसिद्ध लेख ÷ रूसी लेखकों से भेट' 1945 और 1956 लिखा जो इन लेखकों से उनकी बातचीत की बहुमूल्य जानकारी देने वाला है। तथा लेखकों की रूस में भूमिका का विचारोत्तेजक विवरण प्रस्तुत करता है। कोई मानसिक अवरोध न हो और इच्छा हो तो कुछ जानने और कहने के लिए कुछ महीने भी काफी होते हैं। अगर मानसिक अवरोध और दुविधा हो तो सात साल भी काफी नहीं होते हैं। वह मानसिक अवरोध क्या था? एक समाजवाद में अटूट विश्वास रखने वाले कम्यूनिस्ट के धर्मसंकट की भीष्म जी एक उत्कृष्ट मिसाल प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले भीष्म जी का धर्मसंकट नहीं था, यह हम सब कम्यूनिस्ट विचारधारा के लोगों का धर्मसंकट था जिन्होंने समाजवाद के प्रति निष्ठा को विश्व की प्रथम समाजवादी व्यवस्था के प्रति निष्ठा का पर्याय बना दिया था। उसके बारे में कोई संशय वास्तव में समाजवाद के विरोध का पर्याय समझ लिया जाता था। इस प्रवृत्ति से पैदा होने वाली बुद्धिजीवियों की चुप्पी की समाजवादी आंदोलन को भारी कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि इसके कारण समाजवाद की नयी दिशा की खोज पर ही जैसे एक ÷ आंतरिक' सेंसरशिप लागू हो गयी और समाजवादी बुद्धिजीवी सृजनशील होने की बजाय रूसी समाजवाद की विकृतियों की सफाई देने में ही उलझ गया। इस आंतरिक अवरोध का परिणाम यह हुआ कि समाजवादी चिन्तन और व्यवहार में एक भयावह जड़ता और गतिरोध पैदा हो गया। इसके पूर्व कि मैं अपनी तिबलिसी की सात आठ दिन की यात्रा से प्राप्त कुछ तथ्य , अनुभव, अपनी राय पेश करूं भीष्म जी के सात साल के रूस निवास पर आधारित कुछ तथ्य, अनुमान, नतीजे प्रस्तुत करना कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवियों की दुविधाग्रस्त मनःस्थिति की जटिलता को समझने के लिए जरूरी है। मास्को में अपने अनुभवों को याद करते हुए भीष्म जी का निम्नांकित कथन उस दुविधाग्रस्त मनःस्थिति की एक अच्छी मिसाल है जिसका मैंने जिक्र किया। भीष्म जी के ही शब्दों में - ÷÷ पर कभी चौंकाने वाले अनुभव भी होते, एक दिन शाम के वक्त जब अंधेरा उतर रहा था और मैं एक तंग गली से गुजर रहा था तो मेरी नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी जो गली के एक नाके पर रखे हुए बड़े से कूड़ेदान में हाथ डाले कुछ ढूंढ रहा था। मुझे अचम्भा हुआ। यह ऐसा क्यों कर रहा है? क्या इसका कुछ खो गया है या अपना पेट भरने के लिए कुछ ढूंढ रहा है। मन को निश्चय ही धक्का सा लगा। फिर मैं स्वयं ही इसकी सफाई भी देने लगा। कोई सनकी होगा, कोई पागल ही कूड़े के ढेर में हाथ डालेगा। वरना सोवियत देशों में कोई ऐसा क्यों कर करेगा।'' जो बात सहज बुद्धि से साफ समझ में आती है कि एक गरीब बूढ़ा अपना पेट भरने के लिए कूड़ेदान में कुछ ढूंढ रहा है वही बात उस व्यक्ति के लिए स्वीकार करना मुश्किल है जो सदा यह विश्वास करता आया है कि सोवियत व्यवस्था में गरीबों की सम्पूर्ण सुरक्षा है। स्वयं मार्क्स ने स्पष्ट कहा था कि सामाजिक सुरक्षा वास्तव में आर्थिक स्थितियों पर निर्भर करेगी क्रांतिकारियों या समाज सुधारकों के नेक इरादों पर नहीं। आर्थिक अभावग्रस्त सोवियत व्यवस्था इस नियम का अपवाद नहीं हो सकती। इसी सिलसिले में भीष्म जी का निम्नलिखित कथन भी गौरतलब है - ÷÷ जब भी मुझे आस पास के जीवन में त्रुटियां नजर आतीं तो मैं स्वयं ही उनकी सफाई भी ढूंढ लिया करता। यदि लोग शराब बहुत पीते है और सड़कों पर गिरे मिलते हैं तो मैं उसके लिए भी सफाई ढूंढ लेता। ÷ जिन लोगों ने दूसरी जंग में इतना कुछ झेला हो, हिटलर की सेनाओं से जूझे हों, उस कड़े संघर्ष में ही उन्हें पीने की आदत पड़ गयी होगी।' और यदि देहात में खाने पीने की चीजें उपलब्ध न हों तो भी मैं कहता - ÷ अभी जंग को खत्म हुए कितने साल बीत पाये हैं। जंग के जख्म भरते ही भरेंगे। आदि आदि।' इन युक्तियों में सच्चाई तो थी पर वास्तविकता से आंख चुराने की प्रवृत्ति भी थी। और मेरे लिए अंतर्विरोधों के पीछे काम करने वाले कारक तत्वों को समझ पाना कठिन था।'' इस अक्षमता के दोषी केवल भीष्म जी ही नहीं हैं। यह प्रवृत्ति एक माने में अधिसंख्य कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवियों और सोवियत समर्थकों में पायी जाती थी। मुझे सन् 1985 की अपनी रूस यात्रा के दौरान हुई घटना याद आती है जब भारतीय समाज वैज्ञानिकों और साहित्यकारों का एक दल ÷ साहित्य और समाज : भारत और सोवियत संघ का एक तुलनात्मक' अध्ययन विषय पर केन्द्रित सेमिनार के लिए लेनिनग्राड गया था। मैं दल का नेतृत्व कर रहा था। लेनिनग्राड के एक मशहूर भवन में हमारे रहने का प्रबंध था। द्वितीय महायुद्ध के समय रूस पर विजय प्राप्त कर हिटलर इसी भवन में रहने का आकांक्षी था जिसे बहादुर सोवियत फौजों ने विफल कर दिया। भारतीय दल में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक नेमिचंद जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय से टैगोर प्रोफेसर ऑफ कम्पेरेटिव लिटरेचर डा. शिशिर दास, मशहूर तामिल कवि जयकांतन, कलकत्ता के प्रगतिशील लेखक और आलोचक देवेश राय और नामी बुजुर्ग तथा अंग्रेजी में लिखने वाले प्रसिद्ध उपन्यासकार और कला आलोचक मुल्क राज आनंद आदि थे। सेमिनार के दूसरे दिन रात को नेमि जी को एक महिला ने उनके कमरे में फोन किया। कमरे का नम्बर बोल कर वह जानना चाहती थी उस कमरे में क्या उसकी लड़की है, यदि है तो उसे फोन दे दीजिए। नेमि जी के मना करने पर उसने उनका परिचय जानना चाहा। बताने पर कि वह एक भारतीय लेखक हैं महिला ने मनोरंजन के लिए उन्हें अपने घर पर आमंत्रित किया और उन्हें बताया कि यदि वह भवन के बाहर आ जाएं तो वह अपनी गाड़ी में ले जायेगी और वापस छोड़ भी देगी। नेमि जी के यह कहने पर कि वह स्वयं भवन में क्यों नहीं आ जाती, उत्तर मिला कि अंदर आने की मनाही है। नेमि जी के यह कहने पर कि वह एक अजनबी महिला के घर नहीं जाना चाहेंगे, उसने अगले दिन फिर फोन करने का वादा किया। दूसरे दिन सबेरे नाश्ते पर जब नेमि जी ने इस घटना का दल के अन्य सदस्यों से जिक्र किया , तो सबको यह घटना अजीब सी लगी। सोवियत रूस में ऐसी घटना घटेगी किसी ने यह सोचा भी न था। प्रश्न उठा क्या पर्यटकों के मनोरंजन के लिए ÷ कौल गर्ल' सोवियत रूस में भी मौजूद हैं? ÷ कौल गर्ल' का जिक्र होते ही दल के कम्यूनिस्ट सदस्य भड़क उठे। बोले - ÷÷ यह लेनिन का देश है जिसने वेश्यावृत्ति चाहे खुली हो या प्रच्छन्न उसे जड़ से मिटा दिया था। यहां ऐसी बात हो ही नहीं सकती।'' एक सदस्य जो रूस कई बार आ चुके थे बोले - ÷÷ रूसी सरहद के पार फिनलैण्ड से युवतियां अवश्य लुका छिपी आकर ऐसा धंधा करती हैं। यह पहले भी सुना गया है।'' नेमि जी के यह कहने पर कि उस महिला ने अपने को रूसी बताया वह बोले कि ऐसी युवतियां अपने को रूसी बता कर यह धंधा चलाती हैं। ÷ मनोरंजन उद्योग' के नाम पर वेश्यावृत्ति की खुली छूट - यह सब पूंजीवादी समाज और उसकी विलासिता पोषक मनोवृत्ति की उपज है। समाजवाद द्वारा स्थापित आदर्श समाज और जागरूक सोवियत इंसान के बीच इन सबका होना सम्भव ही नहीं। ऐसी ( अंध) विश्वासी मानसिकता के सामने सभी तर्क और प्रमाण बेकार। कई निष्पक्ष किन्तु सोवियत समाज के हितैषियों ने इस बात की पुष्टि की कि सोवियत रूस के बड़े शहरों में ऐसे धंधे तेजी से बढ़े हैं। अपने अंतिम वर्षों में नेमि जी की ÷ डायरी के कुछ पन्ने' एक हिन्दी पत्रिका समास - 4 ( पृष्ठ 191-200) में प्रकाशित हुए थे। इस प्रकाशित सामग्री में कुछ पन्ने लेनिनग्राड में घटे प्रसंग की पूरी जानकारी देते हैं। नेमि जी ने लेनिनग्राड 6 और 7 अक्टूबर 1984 ( रात बारह बजे के बाद) शीर्षक से रूसी स्त्री से फोन पर जो भी बात हुई थी उसका खुलासा किया है। 6 अक्टूबर की डायरी से एक अंश है - ÷÷ बड़ा अटपटा अनुभव है। वह स्त्री अंग्रेजी किसी विदेशी, शायद रूसी, की तरह ही बोल रही थी। पर आवाज सचमुच बड़ी मीठी, ÷ सिडक्टिव' थी। शुरू में अपनी बेटी की बात शायद बहाना ही थी। सुना था कि रूस में मास्को में, लड़कियां, औरतें विदेशियों को होटलों में, रेस्तरां में ÷ एकास्ट' करती हैं। पहले बात चलाती हैं और साथ चलने या अपने घर ले जाने को तैयार हो जाती हैं - डालर या अच्छे होटल में खानपान के बदले में। वह भी शायद ऐसा ही प्रयास हो। विदेशियों से इस होटल के ऐसे ही किसी कमरे में फोन करना और फिर मिलने का स्थान तै करना। असम्भव नहीं कि वह लड़की इस होटल में ही हो और रात में संग साथ के इच्छुक लोगों का इसी तरह पता लगाती हो।'' इसके बाद प्रस्तुत है 7 अक्टूबर की लम्बी बातचीत को ब्योरा और अंत में नेमि जी की निम्नोद्धृत टिप्पणी जो हमारे दल के सदस्यों की इस घटना पर प्रतिक्रिया को व्यक्त करती है - ÷÷ आज सबेरे सात बजे चाय पर पी.सी. जोशी और शिशिर दास को मैंने कल की कहानी सुनायी तो दोनों बड़े ÷ शाक्ड' हुए थे। है भी बड़ी ÷ डिस्टरबिंग' बात। यह कोई कालगर्ल रैकेट है या कोई लड़की अपने आप ही कुछ धन कमाने के लिए यह सब करती है। दस बजे तक खबर प्रतिनिधि मंडल के सब लोगों में फैल गयी। नाश्ते के समय कुछ लोग रस लेकर और कुछ मजाक उड़ाते हुए जिक्र छेड़ते रहे। पता चला देवेश राय का पक्का विश्वास है बल्कि उन्होंने पता लगा लिया है कि यह होटल में किसी ने मजाक किया है। ऐसे मजाक किये जाते रहते हैं। यह आदमी ( यानी श्री देवेश राय) तमाम कट्टर कम्यूनिस्टों की तरह शुतुरमुर्गीय मानसिकता से ग्रस्त है। ÷÷ आज शाम के दोबारा मजाक होने की सम्भावना और भी बहुत कम हो गयी। उस स्त्री का स्वर और सारी बातचीत का लहजा और अंदाज इस शक की गुंजायश नहीं छोड़ता। यह एक ऐसी सामाजिक स्थिति का सूचक है जो सोवियत रूस में धीरे धीरे पनप रही है और खतरे की घंटी है।'' नेमि जी की डायरी के पन्ने जो सन् 1985 के अपने लेनिनग्राद के अनुभव को ईमानदारी से व्यक्त करते हैं उस ÷ सामाजिक स्थिति' का भी संकेत देते हैं जो एक गुप्त व्याधि की तरह सोवियत समाज के भीतर ही भीतर पनप रही थी और लगता था कालांतर में अत्यंत उग्र और विकट रूप धारण कर लेगी। नेमि जी की डायरी का इस लेख में जिक्र करते समय डाक में एक नूतन हिन्दी पत्रिका ÷ समकाल' का 15 जून 2007 का अंक मेरे हाथ में आया जिसमें एक लेख - ÷ रूसियों को चाहिए इंग्लिश बालाएं' शीर्षक से छपा है। सन् 1985 में जिस ÷ सामाजिक स्थिति' को नेमि जी ने रूसी समाजवाद के अंतिम दौर में पनपते देखा था और जिसे ÷ खतरे की घंटी' के रूप में रेखांकित किया था वह दैत्याकार बन कर किस प्रकार इक्कीसवी सदी के आरम्भ में नवउदारवादी रूस के नवधनाढ्य वर्ग की जीवन शैली का अभिन्न अंग बन चुकी है, यह ÷ समकाल' के प्रकाशित लेख में अत्यंत अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिस सामाजिक व्याधि के अस्तित्व को भी स्वीकार करने में रूसी समाजवादी सभ्यता के समर्थक उस समय मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थे, आज का नव उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग उसे आर्थिक उन्नति की एक अनिवार्य शर्त या कीमत मानने में जरा भी संकोच या क्लेश महसूस नहीं करता। रूस को जिस नेमि जी ने प्यूरिटन कम्यूनिस्टों की ÷ शुतुरमुर्गी मानसिकता' कह कर परिभाषित किया था उसकी कालांतर में परिणति उत्तर आधुनिक युग के नग्न और उग्र उपभोक्तावादी और मुक्त विलासितावादी जीवन शैली से सिद्धांतहीन समझौते में ही होनी थी। इस स्थिति में भीष्म जी की पीढ़ी ने आनेवाली युवा पीढ़ी को अपनी वास्तविकता से कतराने वाली मनोवृत्ति द्वारा एकदम सुरक्षाहीन और बे-तैयार छोड़ दिया था। ऐसा नहीं कि भीष्म जी अपने इस रुख के परिणामों से एकदम अनभिज्ञ या उसके प्रति असंवेदी हों। आदर्शोन्मुख , विश्वासी रुख के यथार्थ से मुंह मोड़ने से उत्पन्न वाले परिणामों को भीष्म जी स्वयं स्वीकार करते हैं - ÷÷ मतवाला बना घूमने में अपना रस है, इंसान धरती पर चलने के बजाय उड़ता अधिक है, पर वास्तविकता पर उसकी पकड़ कमजोर ही बनी रहती है। अपने आसपास के यथार्थ को समझने के लिए वस्तुपरक, संतुलित दृष्टि ही सहायक होती है। बेशक रूमानी आदर्शोन्मुख दृष्टि आशावादी, प्रेरणाप्रद होती है पर उसके प्रभावाधीन नकारात्मक पहलुओं को देखने की तीव्र इच्छा ही मन में नहीं उठती। वस्तुपरक दृष्टि हो तो संतुलन बना रहता है।'' सिद्धांत स्तर पर सही दृष्टि होने के बावजूद इस दृष्टि को अमल में लाना और जांच पड़ताल की हिम्मत जुटा पाना कितना कठिन है यह भीष्म जी के ही कथन से स्पष्ट है - ÷÷ इस तरह मुख्यतः सुनी सुनाई बातों के आधार पर मैं अपने निष्कर्ष निकालता रहा। पर सोवियत संघ की एकबद्धता पर, मजबूती पर और अपनी त्राुटियों को दूर कर पाने की उसकी क्षमता पर मुझे तनिक भी संदेह नहीं था। मैं यह नहीं भूल पाता था कि क्रांति के कुछ ही समय बाद साम्राज्यवादी गुट के चौदह देशों ने इस नवजात समाजवादी देश को कुचलने की भरसक कोशिक की थी, दल बल के साथ इस पर टूट पड़े थे। फिर दूसरे विश्वयुद्ध के दिनों में भी प्रकटतः इसका साथ देते हुए भी उनकी यही कोशिश रही कि हिटलर सोवियत संघ को रौंद डाले। और उसके बाद भी ये देश अपने प्रचार माध्यमों तथा अपने कुचक्रों द्वारा सारा वक्त इसे नुकसान पहुंचाने, इसे कमजोर करने की कारवाइयां करते रहे थे। और निश्चय ही इन शक्तियों ने सोवियत यूनियन की कमजोरियों का पूरा पूरा लाभ उठाते हुए, अपनी पूरी शक्ति और षडयंत्रों द्वारा सोवियत सत्ता को धराशायी किया है। ÷÷ मेरी इस धारणा के सामने सोवियत व्यवस्था के सभी गुनाह माफ थे।'' स्पष्ट है कि भीष्म जी की समझ में सोवियत संघ के विघटन और विलोप के पीछे पश्चिमी राष्ट्रों का षडयंत्र और उनका शत्राुपूर्ण व्यवहार ही मुख्य कारक तत्व हैं। रूस की गम्भीर आंतरिक कमजोरियों और व्यवस्था के समाधानातीत अंतर्विरोधों की समाजवादी व्यवस्था के विघटन और विनाश में जैसे कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी। सिद्धांत रूप में वस्तुपरक दृष्टि के महत्व को स्वीकार करते हुए भी अमल में भीष्म जी इतने अवास्तविक और आत्मपरक क्यों हो गये , इस पर हम बाद में विचार करेंगे। भीष्म जी द्वारा व्यवस्था का महिमा मंडन किस प्रकार एक विचारशील व्यक्ति का नहीं एकदम मुग्ध और भावुक व्यक्ति का कथन बन जाता है, यह कथन इसका अच्छा उदाहरण है - ÷÷ इसके कुछ समय बाद संसार के पहले अंतरिक्ष नाविक, यूरी गैगरिन ने अंतरिक्ष में अपनी उड़ाने भरीं। दुनिया एक नये युग में प्रवेश कर रही थी और इसका श्रेय सोवियत विशेषज्ञों को था। ÷÷ सोवियत संघ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक गर्व और उत्साह की लहर क्यों कर नहीं दौड़ जाती। ÷÷ ऐसी उपलब्धियों के सामने सोवियत व्यवस्था की त्राुटियां गौण पड़ जाती थीं।'' प्रश्न उठता है क्या सोवियत नागरिकों की नजर में व्यवस्था की त्रुटियां सचमुच गौण पड़ गयीं। या यह भीष्म जी की समझ और दृष्टि का चमत्कार है ? अंतरिक्ष में स्पूतनिक छोड़ने की चमत्कारिक उपलब्धि पर के.पी.एस. मेनन की टिप्पणी अधिक ÷ वस्तुपरक' है। मेनन साहब इस बात के प्रति सचेत हैं कि सोवियत व्यवस्था में किस प्रकार सामान्य सुविधाओं का भी अभाव है। जैसे रूस में घरों में ही नहीं, अस्पतालों में भी शौचालयों के ÷ फ्लश' काम नहीं करते थे, उनसे पानी बाहर निकलता रहता था। इस पर देखिये मेनन साहब की टिप्पणी - ÷÷ यह एक अजूबा है कि जो राज्य स्पूतनिक के आविष्कार में अग्रणी रहा वही शौचालय में सही काम करने वाले फ्लश नहीं बना सका है। सचमुच रूस में भारी उद्योगों और जरूरत की चीजों के उत्पादन के उद्योगों में बड़ा असंतुलन है जिसके कारण आम लोगों को सदा जरूरत की चीजों का अभाव महसूस होता है।'' आम जनता की इसी अभावग्रस्त जिन्दगी पर अधिक रोशनी डालते हुए मेनन लिखते हैं - ÷÷ जो सुख सुविधाएं हमें सोची के आरोग्य निकेतन ( सेनेटोरियम) में उपलब्ध थीं उसकी तुलना में साधारण नागरिकों की जिन्दगी जरूरी चीजों के अभाव और तंगी से ही ग्रस्त थी। डबल रोटी अवश्य सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी लेकिन अन्य जरूरी चीजें नहीं। दूध और फल की दूकानों के आगे लम्बी कतारें रहती थीं और फल तो दूकान में आते ही कुछ ही मिनटों में गायब हो जाता था। ÷÷ दवाएं अच्छी और सस्ती थीं लेकिन कागज के पैकेज में ऐसे लपेटी रहती थीं कि भारत के गांव वाले को भी उसे लेने में लज्जा महसूस होगी। थर्मामीटर का यह हाल था कि उसे कांख में दस मिनट तक रख कर ही बुखार मापा जा सकता था। अस्पताल के कर्मचारी यह जान कर अचम्भे में थे कि मेरा थर्मामीटर तीस सेकेण्ड में बुखार माप लेता है। सोची में और अन्य जगह जरूरत की चीजें एकदम दुर्लभ थीं। हमारा थर्मोसफ्लास्क टूटने पर हम नया खरीदना चाहते हैं लेकिन सारे शहर में खोजने पर भी नहीं मिला। अगर सोची जैसी पर्यटकों के लिए दर्शनीय जगह में आम जरूरत की चीजों की यह स्थिति थी तो आम शहरों और खास कर गांव की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।'' स्पूतनिक जैसे चमत्कार से आम रूसी गर्वित हो सकता है लेकिन रोजमर्रा का जीवन अभावग्रस्त ही था। बढ़ता हुआ असंतोष जिसकी कोई सुनवाई न हो व्यवस्था के लिए विस्फोटक भी बन सकता है। भीष्म जी ने भी दैनिक अभावजन्य जन साधारण के असंतोष का जिक्र किया था लेकिन न वे उसके असली कारणों को छू सके न उसके परिणामों का उन्हें अहसास था। ऐसा क्यों ? प्रश्न यह भी है कि व्यवस्था इस अभाव को दूर करने की ओर क्यों सक्रिय, सफल न हो सकी? इस प्रश्न पर हम इस लेख श्रृंखला की अगली कड़ी में विचार करेंगे। वस्तुस्थिति के प्रति भीष्म जी जितने असंवेदी दिखते हैं मेनन साहब उतने ही वस्तुस्थिति के प्रति संवेदी। जहां वे अभाव की स्थिति पर टिप्पणी करते हैं वहां उनका निम्नांकित कथन अभाव से प्रचुरता की ओर बढ़ने के रास्ते में जो कठिनाइयां हैं उनका भी संकेत देता है - ÷÷ आम जरूरत की चीजों के अभाव को दूर करने और उनको सभी के लिए प्रचुर मात्रा में सुलभ बनाने के लिए अब राज्य की ओर से बड़े प्रयास हो रहे हैं और सरकार ने इस उद्देश्य के लिए आदेश दिये हैं। लेकिन सोवियत संघ की समस्त जनता को पर्याप्त मात्रा में सुलभ कराने के लिए भागीरथ प्रयास जरूरी है। और इस बात पर जरा भी ताज्जुब नहीं होना चाहिए यदि कुछ वर्षों तक आज की कारवाई का नतीजा यह हो सकता है कि जो लोग भोग विलास की चीजें खरीद सकते हैं और उनके और उस अधिकतर जनता के बीच जो यह चीजें नहीं खरीद सकते हैं विषमता में वृद्धि हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो सोवियत संघ में एक ऐसा सुख सुविधा सम्पन्न बुर्जुआ वर्ग जन्म लेगा - एक ऐसी प्रक्रिया जिसके घटित होने पर कम्यूनिस्ट विरोधी दुनिया एक विद्वेषपूर्ण खुशी महसूस करेगी।'' यह बात मेनन साहब ने सन् 1953 में कही थी जो एक माने में भविष्य सूचक (prophetic) साबित हुई। क्या बिना वर्ग विषमता तीव्र किये विकास प्रक्रिया में तेजी लाना सम्भव है , यह शासक वर्ग और आर्थिक नीति निर्धारिकों के लिए तब भी एक समस्या थी और आज भी वह बरकरार है, चाहे वह रूस का विकास हो, या चीन और भारत का। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि यदि चिन्तन और जांच पड़तालें पूर्वाग्रहों से मुक्त हों तो वास्तविकता अधिक पकड़ में आती है। भीष्म जी और मेनन साहब की सोच और दृष्टि में यही अंतर है जो महत्वपूर्ण है। इस प्रश्न पर गहरे विचार के लिए आर्थिक विकास के पूंजीवादी बनाम समाजवादी माडलों का सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर तुलनात्मक विवेचन अपेक्षित है। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के विश्व के इतिहास को याद करें तो जो तथ्य सबसे महत्वपूर्ण बन कर हमारे समक्ष उभरता है वह है इतिहास की सबसे बड़ी और गम्भीर चिन्ताजनक मंदी के कारण पैदा हुई पूंजीवाद की गम्भीर आर्थिक संकटापन्न अवस्था जिसके आतंक से जनसाधारण भुखमरी, बेरोजगारी, असुरक्षा, अभाव के कष्टों से कराह रहे थे। पूंजीवाद के हमदर्द बुद्धिजीवी इस संकट का हल खोजने के लिए पूंजीवाद की स्थापित वैचारिक अवधारणाओं के मातहत संकट का कोई हल न देख कर उसको हल करने के लिए राज्य की सक्रिय भूमिका और हस्तक्षेप की सम्भावनाओं को तलाश रहे थे। उस समय का परिदृश्य एक चौंकाने वाला वैषम्य या अंतर्विरोध प्रस्तुत करता था - एक ओर गम्भीर संकटग्रस्त पूंजीवाद और उससे जनसाधारण और प्रबुद्ध समुदाय दोनों का बड़े पैमाने पर मोहभंग और उससे अलग नये भविष्य की तलाश। दूसरी तरफ पूंजीवाद का विकल्प प्रस्तुत करने वाली समाजवादी विचारधारा का उदय और तेजी से बढ़ता हुआ प्रभाव। रूसी क्रांति के उपरांत इस विचारधारा पर विश्वास करने वाले और उस पर आधारित कार्यक्रम को कार्यान्वित करने वाले के लिए प्रतिबद्ध राज्य संचालित आर्थिक नियोजन द्वारा संकटमुक्त, नियोजित विकास की नयी सम्भावना - विश्व भर में समाजवादी प्रयोग के प्रति व्यापक सद्भावना - उत्साह और सकारात्मक रुख - यह वह दौर था जब पूंजीवाद का भविष्य अंधकारमय दिखता था और समाजवाद का भविष्य प्रकाशमान। सच तो यह था कि उस समय प्रबुद्ध समुदाय को समाजवाद की दिशा में ही पूंजीवाद के संकट से ग्रस्त और आतंकित मानवता को अपना उज्ज्वल और सुरक्षित भविष्य नजर आने लगा था। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ की आज की एकदम विपरीत स्थिति की उस जमाने की स्थिति से तुलना करें तो कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं जिनका सामना किये बिना छुटकारा नहीं। सबसे अहम प्रश्न है क्यों उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध का गम्भीरतम संकटग्रस्त पूंजीवाद जिसकी व्याधि असाध्य लगती थी , उस संकटापन्न स्थिति से काफी हद तक निकल आया और सम्पूर्ण रूप से संकटमुक्त न होकर भी वह उस स्थिति से निकल आया जहां पूंजीवादी देशों के लोग उससे एकदम निराश होकर गम्भीरता से उसका विकल्प खोजने की दिशा में सक्रिय होने लगे थे। इसी से जुड़ा प्रश्न है क्यों समाजवादी विचारधारा और उस पर आधारित समाजवादी व्यवस्था जो मानव के नये भविष्य का पर्याय बनती नजर आ रही थी, कुछ दशकों के अंतराल के बाद विघटन की स्थिति में पहुंच गयी और वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था के स्वप्नदर्शी और वास्तविक समाजवादी प्रयोग के प्रवर्तक निर्माता लेनिन के उत्तराधिकारियों जिसमें गोर्बाचोव और फिर यल्तसिन अग्रणी थे ने बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में समाजवाद के चिन्तन और निर्देशन केन्द्र क्रेमलिन से घोषित कर दिया कि समाजवादी प्रयोग विफल हो गया। उन्होंने डंके की चोट पर यह भी घोषित किया कि जिन देशों ने समाजवाद से अपनी नियति को जोड़ा था उन्हें समाजवाद के बाहर अपना भविष्य खोजना होगा। पुराने मुहावरे में आज के जमाने की बात कहें तो यह ऐसा ही था जैसे मेहनतकशों के काबा से ही कुफ्र का संदेश। यह ऐसी स्थिति थी जिससे समाजवाद के विरोधी खेमे में तो खुशी की लहर फैल गयी किन्तु विश्व के बहुसंख्यक मेहनतकश और उत्पीड़ित श्रमिक जनसाधारण जो समाजवाद के माध्यम से नये भविष्य के लिए आशावान थे, भ्रमित, निराश और निरुत्साहित महसूस करने लगे। प्रश्न उठा क्या रूसी समाजवाद का विघटन और विलोप समाजवाद के स्वप्न और विचार का ही अंत है या एक नये युग की शुरुआत है - नयी समस्याओं और सम्भावनाओं के अनुकूल एक नये समाजवादी प्रयोग, एक नये समाजवादी विकल्प की तलाश या नये प्रयोग की चुनौती? प्रश्न था क्या बीसवीं सदी का अंत और इक्कीसवीं सदी का आरम्भ पूंजीवाद को फिर से पुनर्जीवित करने और उसके नवोत्कर्ष के उत्सव का दौर है या समाजवाद अभी भी आत्म परीक्षण और आंतरिक मंथन द्वारा पूंजीवाद के विकल्प के रूप में एक नयी दिशा , एक नये प्रयोग को प्रस्तुत करने में समर्थ होगा? असली प्रश्न है रूसी क्रांति द्वारा प्रेरित समाजवादी प्रयोग की विफलता का हम क्या अर्थ निकालते हैं और इस विफल प्रयोग से हमने क्या सबक सीखे हैं? विचारणीय है कि क्यों समाजवादी प्रयोग के गढ़ रूस में और सोवियत संघ के अन्य देशों में समाजवादी व्यवस्था ध्वस्त हो गयी और वहां नये प्रयोग के जनक लेनिन के आदर्शों और विचारों को ही नहीं बल्कि लेनिन की मूर्तियों को भी एक के बाद एक ध्वस्त कर दिया गया और इस प्रकार लेनिनवादी समाजवाद से सम्बंध विच्छेद को सम्पूर्ण वैधता दे दी गयी ? लेकिन इस जबर्दस्त प्रतिक्रांति सूचक परिवर्तनों के प्रति रूस के बाहर भारत जैसे देश के रेडिकल बुद्धिजीवियों पर क्या असर पड़ा विशेषकर पुरानी पीढ़ी के उन बुद्धिजीवियों पर जिन्होंने अपने युवाकाल में रूस की क्रांति के माध्यम से ही अपने देश में भी नये समाज , नयी व्यवस्था का सपना संजोया था। इस स्वप्न को साकार करने के लिए अपने देश की परिस्थितियों और आग्रहों के अनुकूल अपना देसी माडल खोजने और उसे कार्यान्वित करने की प्रेरणा पायी थी। क्या रूसी समाजवाद के प्रयोग रूसी माडल, की विफलता के फलस्वरूप उनका समाजवाद के मूल विचार से ही मोहभंग हो गया या उस महान प्रयोग की विफलता एक नये समाजवादी प्रयोग की दिशा में नये चिन्तन, नये मंथन, नये सृजनात्मक आवेगों की उत्प्रेरक बनने में समर्थ हुई। इस दृष्टि से भीष्म साहनी का ÷ उद्भावना' के कैफी आजमी विशेषांक के लिये लिखा गया ÷ कैफी आजमी की याद में' लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रश्न उठता है भीष्म जी सोवियत क्रांति से पैदा हुई सोवियत व्यवस्था के विघटन और विलोप की स्थिति से किस प्रकार वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर जूझने की कोशिश करते हैं। क्या समाजवाद के मूल स्वप्न, लक्ष्य और विचार से ही उनका उसी प्रकार मोहभंग हो गया जैसे उनके घनिष्ठ मित्र और किसी जमाने के कम्यूनिस्ट साथी निर्मल वर्मा का हो गया था? स्मरण रहे सोवियत व्यवस्था के विघटन से पहले ही पूर्वी योरोप प्रवास के दौरान इस व्यवस्था की कुछ गम्भीर विकृतियों के अनुभव ने निर्मल वर्मा को इस रूसी प्रयोग और व्यवस्था की भयावह विकृतियों का आलोचक ही नहीं बनाया, समाजवाद के मूल स्वप्न और विचार का ही विरोधी बना दिया था। पूंजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद की सार्थकता और प्रासंगिकता में उनके विश्वास को एकदम ध्वस्त कर दिया था। वे कम्यूनिज्म की विकृतियों और ज्यादतियों के महज आलोचक ही नहीं बने, योरोप के उन बुद्धिजीवियों की तरह जो ÷ सोवियत कम्यूनिज्म - द गाड दैट फेल्ड' की एकदम कम्यूनिस्ट विरोधी विचारधारा के अग्रणी प्रवर्तक और प्रतिरोधी बने। निर्मल वर्मा भारतीय लेखकों में इस कम्यूनिस्ट विरोधी अभियान के अग्रिम प्रतिनिधियों में गिने जाने लगे। वैचारिक द्वंद्व और मतभेद के फलस्वरूप भीष्म जी की निर्मल से जैसे बरसों की घनिष्ठता ही खंडित हो गयी। किन्तु विश्व इतिहास में सोवियत क्रांति की युगांतरकारी सामाजिक भूमिका और विशेषकर एशियाई, अफ्रीकी देशों के लिए नये समाज के स्वप्न को साकार करने के प्रयासों और प्रयोगों के लिए सोवियत प्रयोग की विफलता के बावजूद उसकी सार्थकता में भीष्म जी का विश्वास अखंडित और अपरिवर्तित रहा। ÷ कैफी की याद में' लिखा गया उनका लेख इसका ज्वलंत प्रमाण है। यह एक माने में अपने अंतिम वर्षों में अनुभव से पके हुए , तपे हुए मनीषी द्वारा अपने मूल विश्वासों और मूल्यों का पुनः स्पष्टीकरण ही नहीं, पुनः पुष्टीकरण है। निर्मल जी के विपरीत यह वक्तव्य विश्वासों, आस्थाओं और मूल्यों के स्तर पर पुरानी रेडिकल सोच से सम्बंध विच्छेद नहीं बल्कि उसकी निरंतरता और आज के बदले संदर्भ में भी उसकी सार्थकता और प्रासंगिकता को पुरजोर तरीके से अभिव्यक्त करता है। एक मायने में वह अतीत के बुनियादी समाजवादी ÷ विजन' की भविष्य के लिए भी प्रासंगिकता और सार्थकता को फिर से रेखांकित करते हुए उनकी आत्मकथा के शीर्षक ÷ आज के अतीत' को ही जैसे नया अर्थ प्रदान करता है। मैं भीष्म जी और निर्मल वर्मा के विपरीत अन्य रुझान पर रोशनी डाल कर नयी बदली परिस्थिति में बुद्धिजीवियों की मानसिक दुविधाओं पर प्रकाश डालना चाहता हूं। मेरा कहने का मतलब है भीष्म जी के पुराने मित्र, निर्मल वर्मा तो सोवियत कम्यूनिज्म को आधुनिक युग की आत्मछलना बता कर उसके नकारात्मक पक्ष को जोरदार तरीके से सामने लाते हैं। वे सोवियत प्रयोग के भयावह कृत्यों, अत्याचारों और यातनाओं के आधार पर योरोपीय नवजागरण की सम्पूर्ण विरासत को नकारते हुए मानवता के हित के लिए एकदम नये दर्शन और दृष्टि की खोज का प्रश्न उठाते हैं। वास्तव में वे सदियों पुराने शाश्वत धार्मिक और संस्कृतिक नैतिक मूल्यों, विश्वासों और आस्थाओं की परम्पराओं में यानी मानव कल्याण के चिर परिचित मुक्ति की खोज के रास्ते में लौट आने की बात करते हैं। इसके एकदम विपरीत भीष्म साहनी रूसी समाजवादी क्रांति और उससे प्रेरित नयी व्यवस्था के निर्माण के प्रयोग के फेल होने की स्थिति को समाजवाद के मूल स्वप्न और अवधारणा की ही पराजय मानने को तैयार नहीं। भीष्म जी जैसे अनेक प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों की राय में निर्मल वर्मा जैसे क्रांति के आलोचकों या निन्दकों ने अंग्रेजी मुहावरे के अनुसार रूसी क्रांति से पैदा हुए महत जन जागरण के शिशु और क्रांति की अपेक्षाओं के विपरीत पैदा हुई भीषण गंदगी में भेद नहीं किया और गंदे बाथ वाटर के साथ साथ बाथटब से क्रांति के शिशु को भी कचरा समझ कर बाहर फेंक दिया। जबकि भीष्म जी क्रांति के शिुश से तो अंतिम दिनों तक सम्मोहित रहे पर वे उस भयावह गंदगी या त्रासदी को एक माने में नजरंदाज करते रहे जिस पर से उस व्यवस्था के संरक्षकों ने ही बाद में परदा उठाया। भीष्म जी जैसे क्रांति समर्थकों और निर्मल जी जैसे क्रांति के आलोचनों या निन्दकों के इस बुनियादी अंतर का क्या अर्थ है! भीष्म जी जैसे क्रांति समर्थक क्रांतिकारी प्रयोग की असफलता के लिए मार्क्सवादी समाजवादी दर्शन और उसके नये समाज के स्वप्न को जिम्मेदार मानने के लिए तैयार नहीं। प्रयोग की असफलता के लिए उस प्रयोग को परिभाषित और कार्यान्वित करने वाले मानवीय कारक ( ह्यूमन एजेण्ट्स) की कमजोरियां जिम्मेदार हो सकती हैं लेकिन मूल सिद्धांत और स्वप्न नहीं। भीष्म जी अकेले मार्क्सवादी बुद्धिजीवी नहीं हैं जिनका यह स्पष्ट मत है बल्कि सोवियत यूनियन और विश्वव्यापी समाजवादी आंदोलन के विघटन के बाद पुरानी पीढ़ी के रेडिकल बुद्धिजीवियों की मानसिक रुझान का मुखर स्वर यही है। प्रश्न उठता है कि यह रुझान नयी परिस्थिति में किस हद तक एक सकारात्मक सर्जनात्मक रुझान है जो नयी चुनौतियों से जूझने में सहायक है और किस हद तक एक नयी वास्तविकता का सामना करने से कतराने वाली पलायनवादी मानसिकता को व्यक्त करता है। इस प्रश्न पर विचार करने के पहले हम भीष्म जी के वक्तव्य के कुछ महत्वपूर्ण अंश नीचे दे रहे हैं ताकि पाठक उन्हीं के शब्दों में समाजवादी स्वप्न को साकार करने वाली सोवियत व्यवस्था के ध्वस्त होने के फलस्वरूप पैदा हुई उनकी मनःस्थिति से परिचित हो सकें। भीष्म जी ने ÷ कैफी की याद में' शीर्षक लेख में कैफी को और अन्य साथी जो गुजर चुके हैं उनको याद करने के बहाने सोवियत व्यवस्था के विघटन के बाद की बदली परिस्थिति और उसके प्रति अपने रुख पर रोशनी डाली है - ÷÷ मेरे मित्रों और परिचितों में अनेक ऐसे लेखक रहे हैं जो कम्यूनिस्ट विचारधारा तथा समाजवादी व्यवस्था में गहरा विश्वास रखते थे। विश्वास ही नहीं रखते थे - मनसा, वाचा कर्मणा उससे जुड़ते भी थे। उन मित्रों और लेखकों में कैफी आजमी भी थे। ÷÷ अब वे हमारे बीच नहीं रहे। इन मित्रों में से कुछ का देहावसान तो सोवियत सत्ता के विघटन से पहले ही हो चुका था। ÷÷ जब सोवियत सत्ता का विघटन हुआ तो विश्वव्यापी स्तर पर बुद्धिजीवियों को गहरा धक्का लगा था। वह विघटन बिल्कुल अप्रत्याशित रहा हो ऐसा भी नहीं था। बहुत दिनों से सोवियत संघ के अंदर पाये जाने वाले अंतर्विरोधों की चर्चा होती रही थी। पाश्चात्य तंत्र तो हाथ धोकर पहले दिन से उसके पीछे पड़ा हुआ था। और पाश्चात्य ताकतें इसके विनाश के मनसूबे पहले दिन से बनाती आ रही थीं। ÷÷ अपने उन साथी लेखकों के बारे में सोचते हुए जो इस विघटन के पहले ही चले गये, मन में सवाल उठता है कि उन्हें तो इस विघटन की उम्मीद भी नहीं थी, वे तो ये माने हुए थे कि सोवियत सत्ता बनी रहेगी। और जिस सुनहरे विश्वव्यापी भविष्य की कल्पना उस व्यवस्था के साथ जुड़ती थी वह एक दिन साकार होगी। ÷÷ पर उन लेखकों की कैसी मनःस्थिति और प्रतिक्रिया होती यदि उनके जीवनकाल में सोवियत सत्ता का विघटन हो गया होता? क्या उन्हें इस बात का पछतावा होने लगता कि हम ऐसे निजाम के गुण गाते रहे जो अंदर से खोखला होकर गिर रहा था और जिसे गिराने की दुश्मनों द्वारा भरसक चेष्टा की जा रही थी। क्या उन्हें इस बात का खेद होता कि जिस न्याय संगत व्यवस्था के वे सपने देखते रहे वह यूटोपिया बन कर रह गया? क्या वे यह सोच कर खिन्न महसूस करते कि जिस व्यवस्था के वे गुण गाते रहे वह दुनिया के तख्ते पर ही नहीं रहेगी?'' अपने साथियों की तरफ से उठाये गये ये सवाल भीष्म जी के दिल और दिमाग को उद्वेलित करने वाले खुद अपने सवाल भी हैं। यहीं नहीं ये उस व्यापक बौद्धिक समुदाय के भी सवाल हैं जो रूसी क्रांति और नयी समतामूलक और शोषण मुक्त व्यवस्था के निर्माण के सोवियत प्रयोग से प्रेरणा पाते रहे और अपने देशों में अपनी परिस्थिति के अनुकूल इसी प्रकार के प्रयोगों के लिए आजीवन समर्पित और सचेष्ट रहे। क्या सोवियत यूनियन के विघटन के बाद वे इस क्रांति और इस महत् प्रयोग से अपने जुड़ाव पर ही प्रश्नचिद्द लगाते और अपने जिस स्वप्न को मन में संजोये हुए सारा जीवन जिये उसे एक मरीचिका समझ कर अपने जीवन को व्यर्थ मानने के लिए विवश होते। भीष्म जी का स्पष्ट उत्तर है - ÷ कदापि नहीं।' उन्हीं के शब्दों में - ÷÷ ऐसा नहीं होता। कदापि नहीं होता। वे जुड़ते थे तो उस व्यवस्था की अवधारणा के साथ जो एक न्यायसंगत, समानता पर आधारित शोषण मुक्त व्यवस्था की सम्भावना का आश्वासन देती थी। सोवियत व्यवस्था उस अवधारणा के चरितार्थ करने का प्रयास था। उसके विघटन से न्यायसंगत समाज की अवधारणा का विघटन नहीं हुआ। भले ही उसे सपना कह लो, अथवा एक प्रारूप जो अपने अंतर्विरोधों और दुश्मनों के षड़यंत्रों से पनप नहीं पाया, फेल कर गया, पर वह न्यायसंगत समाज की अवधारणा तो आज भी समाज से जुड़ने वाले, समाज में न्याय की प्रतिष्ठा चाहने वालों की नजर में संगत है, प्रेरणापद्र है। ÷÷ सोवियत संघ के विघटन के बाद कहा जाने लगा कि मार्क्सवाद झूठा साबित हुआ। यह टिप्पणी उतनी ही अनर्गल थी जितना यह कहना कि सोवियत संघ के विघटन से समाजवाद फेल कर गया। ÷÷ यदि ये लेखक सोवियत संघ से जुड़ते थे तो इस आशा के साथ कि वह उस मूल अवधारणा को चरितार्थ करने का प्रयास कर रहा था। और उसकी आशाएं, आकांक्षाए उसके उज्ज्वल भविष्य से जुड़ती थीं। यदि वह फेल कर गया तो न तो मार्क्सवाद फेल कर गया और न ही न्याय संगत समाज की स्थापना की सम्भावना और न ही उन हजारों लाखों नर नारी का बलिदान जिन्होंने इस अवधारणा को साकार करने में अपने जीवन की आहुति दी थी।'' रूसी क्रांति और उस पर आधारित न्यायसंगत समाज की स्थापना के महत प्रयोग की - इस प्रयोग के फेल होने के बाद भी शोषितों और मेहनतकशों के लिए प्रासंगिता बताते हुए भीष्म जी गुजरे हुए प्रतिबद्ध लेखकों की ओर से जैसे अपनी बात फिर दोहराते हैं - ÷÷ इन लेखकों की वाणी में सोवियत संघ नहीं बोलता शोषण मुक्त समाज की चाह बोलती है, उनकी कविताओं में यदि वे सोवियत संघ की प्रशंसा करते हैं तो इसलिए कि एक शोषण मुक्त, समानता पर आधारित, न्याय संगत समाज को स्थापित करने का प्रयास किया गया था। वह उस देश के प्रति न होकर उस व्यवस्था के प्रति श्रद्धांजलि थी, उस प्रयास के प्रति श्रद्धांजलि थी जो उस स्वप्न को साकार करने की दिशा में किया जा रहा था। ÷÷ इसलिए सोवियत संघ का समर्थन करते हुए हम वास्तव में इन मान्यताओं का समर्थन करते थे। ÷÷ इसमें संदेह नहीं कि इस कम्यूनिस्ट विचारधारा से प्रेरित नये समाज के प्रति दुनिया भर के लोग, मेहनतकश किसान मजदूर बुद्धिजीवी कलाकार आदि आकृष्ट हुए थे।'' भीष्म जी के वक्तव्य के महत्वपूर्ण अंश विस्तार से हमने उद्धृत किये हैं ताकि सोवियत व्यवस्था के विघटन के बाद बदली हुई परिस्थिति की उनकी समझ और सोच अपनी समग्रता में पाठकों को सुलभ हो सके। हमने भीष्म जी के वक्तव्य को इसलिए भी इतना महत्व दिया है कि उनकी सोच और समझ एक बहुत बड़े प्रगतिशील और प्रबुद्ध बौद्धिक समुदाय की मानसिक रुझान को व्यक्त करती थी जिसने सोवियत प्रयोग के फेल होने के बाद भी ÷ एण्टी कम्यूनिज्म' और ÷ एण्टी सोविटिज्म' का रास्ता नहीं अपनाया। भीष्म जी उस बौद्धिक समुदाय और उसकी जहनियत के प्रतिनिधि थे जिसका रूसी क्रांति और उस पर आधारित सोवियत व्यवस्था से या उसकी सकारात्मक विशेषताओं से पुराना सम्मोहन तो नहीं पर भावनात्मक लगाव उस व्यवस्था के ध्वस्त होने के बाद भी बना रहा। साथ ही उनका यह विश्वास भी बना रहा कि न्याय संगत समाज को रचने के जो भी प्रयोग भिन्न भिन्न देशों में बदली हुई नयी परिस्थितियों में किये जाएंगे वे सोवियत प्रयोग का सम्पूर्ण नकार नहीं एक प्रकार से उसी परम्परा और उसके मूल सरोकारों और प्रेरणाओं का ही विस्तार और परिष्कार होंगे। उनका विश्वास बना रहा कि सोवियत प्रयोग की सफलताएं और विफलताएं, उपलब्धियां और गलतियां नये प्रयोगों का प्रेरणास्रोत बनेंगी। उनका मार्गदर्शन करेंगी। जरूरी नहीं कि उन नये प्रयोगों के उत्प्रेरक के रूप में रूसी समाजवाद का नाम लिया जाय, लेकिन वह नये समाज के लिए लम्बी यात्रा के मार्ग में मील का पत्थर अवश्य बनेगा। यह एक पहेली है कि क्यों योरोपीय देशों में ख्रुश्चेव द्वारा स्तालिन युग की विकृतियों के उद्घाटन , पूर्वी योरोप में सोवियत सेना के आक्रामक हस्तक्षेप तथा इन देशों की स्वायत्तता पर प्रहार और बाद में बर्लिन की दीवार के टूटने के बाद रूस से बड़े पैमाने पर मोहभंग और अलगाव ने एक एण्टी सोवियत और एण्टी कम्यूनिस्ट लहर का रूप ले लिया। इन सब के बावजूद भारत जैसे देश में रूस से मैत्रीभाव बना रहा। रूसी क्रांति और रूसी समाजवादी प्रयोग की विकृतियों और स्तालिन युग की तानाशाही के प्रति आलोचनात्मक रुख तो पैदा हुआ लेकिन एकदम परित्याग और प्रतिरोध की लहर का रूप इसने नहीं लिया। विशेषकर पुरानी पीढ़ियां कुछ अपवादों को छोड़ कर एण्टी सोवियत और एण्टी कम्यूनिस्ट रास्ते पर नहीं चल पड़ीं। मुझे याद है जब 1978 में मुझे मास्को होते हुए तिबलिसी जियौर्जिया में समाज वैज्ञानिकों के दल के सदस्य के रूप में दस दिन बिताने का पहला मौका मिला तो समाजवाद के स्वप्न और सोवियत व्यवस्था के बीच की खाइर्ं का कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष अनुभव होने के बाद मेरा और मेरे दल के सदस्यों का रुख अधिक सतर्क और कई मानो में आलोचनात्मक अवश्य हो गया लेकिन एक गहरी सहानुभूति की भावना सोवियत संघ के सदस्य राष्ट्रों और खासतौर पर इन राष्ट्रों के लोगों के प्रति बनी रही। विशेषकर भारतीय दल के सदस्य सोवियत संघ के सभी राष्ट्रों के लोगों की भारतीयों के प्रति सद्भावना और मैत्री भाव से अत्यंत प्रभावित और अभिभूत हुए बिना न रह सके। बाद की सोवियत यूनियन की अन्य यात्राओं के उपरांत सोवियत व्यवस्था की गहराती समस्याओं का अहसास और बोध मन में गहरा संशय पैदा करता था कि यह व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों से मुक्त होने और संकटग्रस्त होने की तरफ जाने से बचने में क्या समर्थ हो पायेगी। दूसरी ओर संशय से जूझता हुआ अंतर्मन का एक विश्वास भी बना रहा जो तर्क और बुद्धि से परे था, लेकिन मन में आशा जगाये हुए था कि समाजवाद निश्चय ही अपनी समस्याओं से जूझने में उसी प्रकार सफल होगा जैसे बीते दौर के संकटों पर विजयी हुआ है। असल में सवाल यह नहीं था और आज भी नहीं है कि सोवियत संघ के देश अपने आंतरिक संकट पर विजय पाने में सफल होंगे कि नहीं। बल्कि असली सवाल यह है कि विश्व भर के विभिन्न देशों में कम्यूनिस्ट/समाजवादी आंदोलन सोवियत प्रयोग की विफलता और सोवियत व्यवस्था के विघटन के बाद अपनी सार्थकता और प्रासंगिकता , अपनी ऊर्जा और उत्साह, अपनी निष्ठा और कर्मण्यता बनाये रख सकेगा? अपने अपने संदर्भ में नये नये प्रयोगों की ओर सचेष्ट होगा? या कम्यूनिस्ट/समाजवादी आंदोलन के केन्द्र रूस पर सभी देशों के जो बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता जरूरत से ज्यादा दिमागी और भावनात्मक रूप से निर्भर हो गये थे उसके विघटन से वे अब इस मानसिक पराधीनता की स्थिति से मुक्त होकर स्वावलम्बी होकर और नयी ऊर्जा प्राप्त कर अपना रास्ता स्वयं तलाशने की ओर उन्मुख हो सकेंगे? समाजवाद की स्तालिनवाद द्वारा दी गयी अमानवीय छवि के स्थान पर एक मानवीय चेहरे वाले समाजवाद की ओर सचेष्ट होने में क्या रूसी व्यवस्था का विघटन एक महत् उत्प्रेरक साबित होगा? यानि दीर्घकालीन दृष्टि से एक अभिशाप या अवरोध नहीं वरन एक वरदान सिद्ध होगा? यही प्रश्न नयी पीढ़ी के सामने है। भीष्म जी और उनके अन्य प्रतिबद्ध साथियों के अंतिम वर्षों के वक्तव्य का मूल सरोकार यही है : विश्वास का पुनः पुष्टीकरण और अपनी मानसिक स्वायत्तता को पुनः प्राप्त करने और स्थापित करने की सशक्त तीव्र भावना और अंतःप्रेरणा। इसी माने में भीष्म जी की प्रतिक्रिया अपने पूर्व घनिष्ठ भिन्न निर्मल वर्मा की बुनियादी रूप से ध्वंसात्मक प्रतिक्रिया की तुलना में अधिक सकारात्मक और सर्जनात्मक बनने की सम्भावना प्रस्तुत करती है। इस सम्भावना को एक निश्चयात्मकता में बदलने का मार्ग अनेक कठिनाइयों और अवरोधों से भरा हुआ है। इस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है पुरानी पीढ़ी के प्रतिबद्ध मार्क्सवादी लेनिनवादी क्रांतिकारियों में, सभी स्तरों के नेतृत्व से लेकर कार्यकर्ताओं तक में, व्याप्त हर मौके पर, विशेषकर प्रत्येक सैद्धांतिक या व्यावहारिक जटिलता के समाधान के लिए मास्को से मार्गदर्शन और निर्देश की आशा और अपेक्षा की लम्बी परम्परा। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के इतिहास पर यदि गौर करें तो सभी निर्णायक मौकों पर अपने अनुभव और विवेक से उतना नहीं जितना मास्को के निर्देश से समस्या का हल खोजा गया। यदि रूस से मोहभंग हुआ तो पार्टी का एक भाग रूस दूसरा चीन की ओर रोशनी के लिए, मार्गदर्शन के लिए, मुखातिब हुआ। रूस और चीन के अनुभवों से लाभ उठा कर किन्तु बुनियादी रूप से अपने देश की परम्परा, परिस्थिति और सम्भावनाओं के अनुकूल अपना रास्ता स्वयं खोजने और अपना कार्यक्रम स्वयं निर्धारित करने के पक्ष वाले लोग अल्पमत में ही थे। अपनी रूस और चीन की यात्राओं के दौरान वहां की परिस्थितियों , उपलब्धियों और उनकी गम्भीर अपूर्णताओं और विकृतियों से अवगत होने के बाद मुझे बार बार यह खयाल आता रहा है कि जिस भारत ने बुद्ध, कबीर और मीरा जैसे समता और मानवता के अग्रणी क्रांतिकारियों को पैदा किया हो, जिसने आधुनिक युग में गांधी और नेहरू के नेतृत्व में साम्राज्यवाद से मुक्ति संघर्ष और भारत के नव निर्माण का अपना रास्ता खोजने में पहल की है, जिसके हर क्षेत्र और प्रदेश में शोषित निम्न वर्गों और उत्पीड़ित नारी समुदाय के प्रतिनिधियों ने दासता और शोषण से मुक्ति की आकांक्षाओं को दिशा देने और व्यक्त करने के बहुमुखी प्रयास किये हैं, उस भारत में समाजवाद को एक मानवीय चेहरे वाला विकल्प तलाशने और प्रस्तुत करने की पूरी सामर्थ्य और सम्भावना मौजूद है। क्रांतिकारी दर्शन और व्यवहार में पहल के भी सभी आत्मपरक और वस्तुपरक तत्व या कारक मौजूद हैं। ऐसे देश के आधुनिक सुधारक और विचारक पश्चिमी देशों और उन्हीं की देखादेखी क्रांतिकारी मनोवृत्ति के लोग क्रांतिकारी विचार और व्यवहार के लिए रूस और चीन के पिछलग्गू बन जाएं तो इसे पराधीनता के युग में देश की मौलिक चिन्तन और सृजन की परम्पराओं से कट जाने और औपनिवेशिक शासन द्वारा देश पर लादी गयी शिक्षा पद्धति की विकृतियों से पैदा हुए बौद्धिक समुदाय में मानसिक आत्मविश्वास के ह्रास से जोड़ कर देखना चाहिए। लिबरल रुझान के व्यक्तियों का पश्चिम से और रेडिकल रुझान के व्यक्तियों का मास्को और चीन से मार्गदर्शन प्राप्त करना औपनिवेशिक दासता से पैदा हुई औपनिवेशिक मानसिकता का ही परिणाम रहा है। भारत में औपनिवेशिक राज के अंत के बाद जो नयी चुनौतियां और सम्भावनाएं पैदा हुइर्ं वे एकदम नयी थीं और उन्हें समझने के लिए किसी के पास भी रेडीमेड फारमूला नहीं था। भारत पश्चिम का पूंजीवादी रास्ता अपनाये या रूस और रूसी खेमे के अन्य देशों का समाजवादी रास्ता या साम्राज्यवादी चंगुल से मुक्त देश अपना एक तीसरा ही रास्ता खोजें ? ये सभी प्रश्न भारत के सामने एकदम नये थे और एक नयी बौद्धिक और व्यावहारिक पहल की सम्भावना प्रस्तुत करते थे। आज एक और विज्ञान और टैक्नालौजी की अभूतपूर्व प्रगति से आर्थिक विकास की सम्भावनाएं वृहत से वृहत्तर हुईं हैं और विकास में भागीदारी की आकांक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है , दूसरी ओर न्याय और समता तथा अन्याय, शोषण और विषमता से मुक्ति की आकांक्षा का भी जबर्दस्त विस्फोट हुआ है। इसलिए विकास और समता में साम्य और सामंजस्य का प्रश्न महत्त प्रश्न बन कर उभरा है जो नये विजन नयी दृष्टि नयी अवधारणाओं और नये कार्यक्रम की मांग करता है। पुरानी पीढ़ी और पुराने प्रतिष्ठान इस नये दौर से अपने को जोड़ नहीं पाये और उनकी सोच नेति नेति बन कर रह गयी। वे हर जगह बाधाएं, अवरोध ही देखने लगे, सम्भावनाएं नहीं। आज की बदली स्थिति में विश्व स्तर पर पारम्परिक पूंजीवाद और पारम्परिक समाजवाद से मोहभंग की स्थिति पैदा हुई है और दोनों खेमों के प्रबुद्ध समुदाय में एक ऐसे विकल्प की तलाश पर सहमति बनती नजर आती है जो एक ओर तेजी से विकास में सहायक हो तो साथ ही जिसकी अमानवीय प्रवृत्तियों और प्रक्रियाओं पर राज्य और नागरिक समाज दोनों के द्वारा अंकुश लगे। विकास के फल सभी को , विशेषकर वंचित समुदायों, को उपलब्ध हों और कमजोर वर्गों और समुदायों को शिक्षा, स्वास्थ्य, जन कल्याण आदि के द्वारा विकास में भागीदार बनाया जाय। जन साधारण का सक्षमीकरण इस नये विकास के माडल की तलाश और कार्यान्वयन में सहायक हो सकता है। पारम्परिक पूंजीवाद का सम्बंध शोषण और विषमता से और पारम्परिक समाजवाद का सम्बंध नागरिक अधिकारों और वैचारिक स्वतंत्रता के दमन से इतना गहरा और अभिन्न रहा है कि इन दोनों से मुक्ति की खोज आज के युग को विशिष्टता प्रदान करती है। किन्तु इन नये आवेगों को व्यक्त करने वाले तत्व अभी बिखरे हुए हैं। संगठित और सामूहिक रूप से सक्रिय नहीं हैं। लेकिन एक बात तय है कि पुराने बौद्धिक और शक्ति प्रतिष्ठान इन नये आवेगों से कटे हुए हैं। कभी कभी ऐसा लगता है कि पुरानी पीढ़ी के प्रगतिशील और प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी पुराने चश्मों ( अवधारणाओं) के इतने दास हो चले हैं कि नयी और बदली हुई स्थिति की विशिष्टताओं एवं सम्भावनाओं को समझने और उससे लाभ उठाने में अक्षम से हो गये हैं। लेकिन पूरा परिदृश्य अंधकारमय नहीं है। मुझे लगता है कि आज की नयी परिस्थिति में व्यापक बौद्धिक समुदायों और श्रमजीवी जनसाधारण में ऐसे नये तत्व अवश्य उभर रहे और सक्रिय हो रहे हैं जो स्थिति को नयी दृष्टि से देखने के लिए आतुर हैं, जिन्हें आज किसी मसीहा की जरूरत नहीं और जिनका आवेग और अंतःप्ररेणा फैज अहमद फैज की इन पंक्तियों की तरह जैसे पुराने रहबरों से दूर मुक्ति का रास्ता खोज रही हो - अब अपना अख्तियार है चाहे जिधर चलें रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम। TOP (Back to अनुक्रम) |