लड़की गहरी सांवली थी। एक दिन अपने सांवलेपन से आजिज आकर वह तीन हफ्ते में गोरेपन का दावा करने वाली एक फेयरनेस क्रीम बाजार से ले आयी। हालांकि वह तीस हफ्ते तक इंतजार कर सकने के धैर्य से उसे लेकर आयी थी, पर हुआ ये कि पहले हफ्ते के आखिर में ही उसकी त्वचा कुछ निखर गयी। बात यहीं से शुरू होती है। उसे लगने लगा कि जिन्दगी को अब वह उसके पूरे चटक के साथ जी सकती है। उसकी झूठ की रफ्तार में दुगुनी उछाल आ गयी। पहले जहां उसकी दस में से चार बातें झूठ हुआ करती थीं, अब मात्रा एक या दो सही हुआ करतीं। मसलन अगले दिन फिजिक्स का एक्जाम होता तो वह इजा को और अपने ऊंचे कंधे वाले ट्यूटर को बताती कि परीक्षा अंग्रेजी की है। वह पढ़ कर भी अंग्रेजी ही जाती अपने ट्यूटर से और हिसाब चुकता करने के लिए अंग्रेजी वाले दिन फिजिक्स पढ़ लेती। नम्बर जाहिर है राम भरोसे आते और वह ट्यूटर और इजा के सामने अगली दफे खूब मेहनत करने के अनकहे वादे वाला गम्भीर चेहरा बनाती, जिसका कि असर एक उसके सिवा बाकी सब पर होता।
इवा कार्णिक की त्वचा तैलीय थी। सब जगह। खाली होंठों के ऊपर और नीचे के हिस्से को छोड़ कर। गैर तैलीय हिस्सा हवा के जरा सा ससरने भर से अकड़ जाता था। तो ऐसे में इवा कार्णिक को दौड़ दौड़ कर आईना देखना पड़ता इस शुबहा से भर कर कि मूंछें तो नहीं उग आयीं। एक बार फिर। मूंछें अलग से उगती तो नहीं थीं पर होंठ के ऊपर के नीले नीले बाल, जो अमूमन अपनी महीनता में अदृश्य रहते, उन दिनों अपने को अकड़ा कर और एक दूसरे से चिपक कर एक पतली नीली लकीर खींच देते होंठों के ठीक ऊपर। और आगे ये कि होंठ हिलाना, बोलना, मुस्कुराना, ठहाके मारना सब छनछनाहट भरा। चिपचिपा घरेलू लेप प्रलेप ताबड़तोड़ लगा कर उस जगह को वापस से मुलायम बनाने में दो तीन दिन का वक्त लग जाता और इवा कार्णिक फिर से लड़की बन जाती।
इसी लड़की छाप दिनों की खाली शाम कही जा सकने वाली शाम। इवा कार्णिक, कक्षा दस, जिसकी कि दायीं चोटी थोड़ी ज्यादा नीचे तक झूलती रहती थी, जल्दी जल्दी पेन्सिल की नोंक को महीन करने में जुटी थी, जबकि ऊंचे कंधे वाला आदमी कमरे में घुसा। इवा कार्णिक को रटे रटाये स्वर में उठ कर खड़े हो जाना था और फिर दूसरे पल बिना किसी की इजाजत लिए वापस बैठ भी जाना था।
वह उसका ट्यूटर था। मास्टर वगैरह शब्द प्रचलन में नहीं तो सीधे सर, जो प्रतिमाह दो हजार रुपये, लिफाफे में डाले हुए, पाया करता था, बतौर पारिश्रमिक। और इवा कार्णिक इस लिफाफा सुपुर्दगी के सम्भावित वक्त अपने को कमरे से अनुपस्थित कर लिया करती थी। वह एक सख्त ट्यूटर था। कुछ चीजें उसे हद तक नापसंद थीं, जो इवा कार्णिक को मुंहजबानी याद थीं। उन दो घंटों में उसे अकड़ी हुई गरदन को उठा कर अकड़ भगाने तक की सहूलियत नहीं मिलती। जिन सवालों के जवाब उसे पक्का मालूम होते, उन्हें वह फुसफुसा कर बोलती। जिन जगहों का ठिकाना पक्का पता होता उन पर बस पेन्सिल टिका कर काम चला लेती। यानी कि गैर तैलीय त्वचा पर अगर हल्की मूंछों का मौसम हो तो, एक बार भी छनछनाहट नहीं होती। क्योंकि न हिलाना न बोलना न मुस्कुराना ठहाके मारने का तो सवाल ही क्या!
आखिर के पंद्रह मिनट संरक्षित थे उसके हिस्से के। उसके सवाल पूछने का वक्त। उस दिन के पढ़ाये पाठ से। इवा कार्णिक के लिए यह दिन के सबसे मुश्किल पंद्रह मिनट होते। उसकी हालत एक ऐसे आदमी की हो जाती, जिसके कि हाथों में स्टेज की कठपुतलियों की सारी डोरियां थमा दी गयी हों अचानक से कुछ देर के लिए और उतनी ही देर में उसे अपनी योग्यता साबित भी करनी हो, जबकि अंदर की बात कि कौन सी डोर के खिंच जाने से कौन सी चीज कितनी लचक जाएगी, उसे ये तक न पता हो। दिमाग का पिछला हिस्सा इसी समय चमत्कार कर जाता और उसे तीन चार दिन पहले का पढ़ाया कुछ याद आ जाता। यही वजह कि भूगोल पढ़ा चुकने के बाद के मुकर्रर वक्त में वह अक्सर रसायन का कोई उलझा सा सवाल पूछती। यह उलझी चीज एक बात तो एकदम साफ कर देती कि पढ़+ाये जाने वक्त भले उसे ऐसा लगता हो कि वह कुछ भी नहीं सुन पा रही, पर वह सुन सब लेती थी। वरना क्या सम्भव कि तीन चार दिन देर से ही सही बिना सुन रखा कुछ इतनी शिद्दत के साथ उपस्थित हो जाए प्रश्नवाचक चिह्न को अपने पीछे टांगे टांगे! सब कुछ ऐसा रटा रटाया सा कि बिना हैरत भाव, भूगोल की कक्षा के बाद उसे रसायन का खोया हुआ जवाब बदले में मिल भी जाता था बगल वाले से।
जवाब को सुनते हुए वह अपने पूछे गये सवाल को समझने की कोशिश करती होती कि एक सुखद समाचार की तरह घड़ी की सबसे पतली सूई हांफती हुई उसे अपने पंद्रह चक्कर लगा चुकने की सूचना दे देती और वह उठ खड़ी होती। यह वक्त होता जब उसके बगल का सख्त आदमी ड्राइंगरूम में ही पार्टिशन के उस पार सोफे वाले इलाके की ओर चला जाता और वह पलट कर भीतर सुरंग की तरफ चली आती।
इजा कहलाने वाली स्त्राी सफेद रंग के शिकंजे में पूरी तरह से कैद कही जा सकती थी। उसकी उम्र, उसके बाल, उसके कपड़े, उसकी हरकतें। वह बगैर इस्तरी और कलफ की साड़ियों को हाथ तक नहीं लगाती थी। उसका ज्यादा वक्त सोफा कवर को पीछे की तरफ खींचने, टीवी कवर की चेन बंद करने, फूलदान की पीली पत्तियों को कतरने और किसी हड़बड़िया पांव के धक्के से मुड़ गयी कालीन को वापस फैलाने में बीतता था। उसके घर की बाइयों में टिकाउ+पने का अभाव रहता। हफ्ता दो दिन के आगे कोई भी चल नहीं पाती। फर्श के कोने कोने से धब्बों को बीन बीन कर रगड़वाना, लोहे के बरतनों को अपनी निगरानी में चमकवाना, इसके मूल में था। खैर फिक्र क्या! एक बाई के विदा लेने और दूसरे के आने के बीच के दिनों में भी घर को कमी महसूस नहीं होने पाती कुछ भी, क्योंकि हर प्रकार के काम की मुस्तैद कमान वह अपने हाथ में संभाल लेती।
हालांकि उसने दुनिया देखने की शुरुआत अपने पति की देखरेख में एक ग्लोब पर भारत के नक्शे के ऊपर ऊंगली टिका देने से की थी, पर अब वह इस दुनियादेखी में इतना आगे निकल चुकी थी कि सामने वाले, बगल वाले और पीछे वाले शामिलद्ध को चुटकी भर में परख कर दूध से पानी को अलगा देती।
पांच रुपये के पत्तर वाली काली हेयर पिन और चार रुपये के गुच्छे वाला सेफ्टीपिन उसके सबसे खास औजार थे। नहाने धुलने के बाद से साड़ी का पल्लू तहा कर जो सेफ्टीपिन के तार खांचे में फिट होते, फिर अगले दिन नहाने के पहले ही अलग हो पाते। यही स्वामिभक्ति हेयरपिन की भी। यहां तक कि रात को उसके सो चुकने पर भी वे दोनों अपनी ड्यूटी निभाते जाते।
उसकी आंखों का रंग भूरा था और उसी से मेल खाता गार्नियर के चार नम्बर का ब्राउन शेड अपने बालों पर लगा कर वह सफेदी के ऊपर सुनहरे भूरे रंग का जिल्द चढ़ाये रखती थी। उसकी चौकसी को देख कर कहा जा सकता था कि उसे किसी महत्वपूर्ण चीज के होने का इंतजार था और उसे अहसास था कि किसी भी पल उसके अपने दरवाजे पर दस्तक हो सकती थी। पर चूंकि उसने नियति की दस्तक सुनी नहीं थी, वह केवल कल्पना कर सकती थी उसके वैसा होने की, जैसी कि वह सच में होती। आंखें मूंद कर आरामकुर्सी पर बैठे रहने पर भी बाकी की दस्तक को सुन कर वह पहचान कर सकती थी कि किस बार दरवाजा खोलने पर सामने कौन दिखेगा! कौन सी थाप दूधवाले की, कौन अखबारवाले की, कौन नाई की, कौन इवा कार्णिक की, कौन ऊंचे कंधे वाले आदमी की। और यह, सच कहें तो उसका दिलचस्प मनबहलाब भी था। हर बार हाथ की थाप पर पहचान करना और दरवाजा खोल कर अपने को सही साबित होते देखना और फिर से दूसरी थाप का इंतजार करना। वजह यही कि आज तक उसके घर के दरवाजे के बायें या दायें कहीं भी कॉलबेल को जगह नहीं मिल पायी थी।
ऊंचे कंधे वाले आदमी का दुनियावी नाम विक्रम आहूजा था। उस घर में आते जाते उसका माथा घर के दरवाजे के ऊपरी हिस्से से छू जाता था। एक, दरवाजों की ऊंचाई कम थी और दूसरे हर दरवाजे के नीचे टखनों की ऊंचाई के चौखट बने थे। और इन सबसे ऊपर उसका आसमानी कद। वह हमेशा दौड़ने के वक्त पहने जाने वाले सफेद जूते पहनता। उसके चलने, बोलने ओर सांस लेने में एक खास किस्म की जिद थी।
उसके अतीत पर दो प्रेमिकाओं की छाप थी। पहला प्रेम शुरुआती गुनगुनाहट जितना था। गौरी करमाकर। एक कॉलेज, एक क्लास, एक विषय, एक रास्ता घर काᄉ वाले किस्म का। उसमें एक दूसरे प्रायद्वीप पर उतरने का रोमांच था। वह मटर की फलियों को विलगाने जैसा थाᄉ बहुत मीठे श्रम की अपेक्षा वाला। वाक्या पंखुड़ी के खिलने जैसा था, जिसका खिलना कोई देख न पाये। ठीक वैसे ही उसका मुरझाना भी फूल के मुरझाने जैसा, जिसके मुरझाने का कोई हवाला नहीं दिया जा सके, बस एकबारगी दुनिया को खबर मिले कि फूल मुरझा चुका, या कि खबर न भी मिले।
दूसरा कुछ बरस की करवटों के बाद। एक दिन गहरे शाम के वक्त, जब दफ्तर लगभग खाली हो चुका था, एक बेतरह उजली चमड़ी की लड़की लाल लाल सी हुई उसके पास आयी। उसके कम्प्यूटर की सारी सूचनाएं करप्ट हो चुकी थीं और बैकअप भी मौजूद नहीं था। दफ्तर में किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में दो लड़कियां आयी थीं। एक की चमड़ी देशी थी, दूसरी येᄉ विदेशी मूल वाली। विक्रम आहूजा के साथ किस्मत थी उस शाम। पच्चीस मिनट तक की अंधाधुंध माथापच्ची के बाद उसने वह कर दिखाया जिसकी उम्मीद उसे भी नहीं थी। लड़की की चमड़ी वापस खूब उजली हो चुकी और लाल रंग छंट गया था।
उस शाम के बाद से उनकी पहली दो मुलाकातें विशुद्धतः लड़की की पहल पर हुइर्ं। एक उसके ठीक अगले दिन जब वह इत्मीनान से उसका शुक्रिया अदा करने आयी और दूसरी काम पूरा करके लौटने की पूर्व संध्या पर जब वह अपना काम दिखाने और औपचारिक इजाजत लेने आयी। उसके बाद की मुलाकातों में कुछ राज खुले। लड़की आयरिश थी और होंठों को घुमा घुमा कर हिन्दी बोलती थी। जब वह बेलौस बोलती तो शब्द छितरा कर निकलते और जब सचेत होकर बोलती तो शब्द एक दूसरे के ऊपर चढ़ने लगते। उसे अपने समाज की जर्जर रहस्यमयी लोककथाएं याद थीं। हालांकि उसके वाक्दोष पर ध्यान दिया जाये तो कथाओं में रहस्य की जगह हास्य झांकता मिलता पर उसकी हल्के रंग की पलकों वाली आंखों की गोलाई को ही दुनिया का आखिरी सच मान कर चले कोई तो रहस्य और रोमांस बस। बाकी सब झूठ।
चर्च में जलती कैण्डिल को आधार पर टिकाते हुए वह अपनी भाषा में सरपट बुदबुदाती कुछ, बाद में जिसका मतलब पूछे जाने पर वह गालों में गड्ढ़े धंसा कर मुस्कुरा देती बस। जिन्दगी को बिना छुए हुए ही वह हलचल मचाने का ढब जानती थी। उछल कर मंदिर की घंटिया बजाते हुए, पानीपूरी के तीखेपन के बीच लाल गाल से सिसकारियां लेते हुए, बरसात में सड़क किनारे जमा हुए पानी में जान बूझ कर सैण्डिल छपकाते हुए तरंग पैदा करने की उसकी क्षमता को महसूसा जा सकता था। वह सुनते हुए कभी उ+बती नहीं थी। उसे दूसरों को माफ करने का भयानक चस्का था। वह हर काम मुस्कुरा कर करती थी चाहे वह पहली शाम मदद मांगने की बात हो या कि आखिरी शाम अपना प्रोजेक्ट पूरी तरह खत्म हो चुकने पर अपने देश वापस लौटने की बात हो। जवाब में विक्रम आहूजा भी मुस्कुराया। उसे लगा कि बादल के एक गुच्छे को कुछ समय के लिए ही सही, उसने छू लिया था।
इवा कार्णिक को अपने बालों से बड़ी शिकायत थी। कंधे तक सीधे चल कर वे नीचे छल्लों में उलझ गये थे। शायद इसकी वजह ये कि स्कूल में उसे गूंथ गूंथ कर दो चोटियां बनानी होतीं जो स्कूल जाने की हड़बड़ी में अक्सर टेढ़ी मेढ़ी बनतीं। घर लौटते ही सबसे पहले वह उन्हें खोल देती और आजाद बालों के साथ शाम के वक्त पढ़ने जाती। पर होता यह कि जैसे ही वह किताब पर आगे की तरफ झुक कर समझने का खेल शुरू करती, बाल धड़धड़ा कर आगे झूल जाते। वह उन्हें समेट समेट कर कान पर टिकाती पर उसके हाथ अभी वापसी के रास्ते में ही होते कि बाल ढुलक जाते दुबारा से। बालों की सबसे लम्बी लट लड़खड़ाते हुए किताब के उस छोर दूर वाले दूसरे पन्ने पर लहराने लगती। ऊंचे कंधे वाला आदमी अपनी गरदन उठाता उसकी तरफ और इवा कार्णिक का इधर उधर डोलता दिल उछल कर अपनी जगह पर आ जाता, एक पुरजोर डांट की आशंका में। विक्रम आहूजा होंठ अलगाने के तुरंत बाद अपना निर्णय बदल लेता और लड़की को बिना डांट खाये रह जाना पड़ता।
ट्यूटर समझता था कि उसके बगल की लड़की खाली ढोंग करती है समझने का और जबकि उसे उसके इस ढोंग से भयानक विरक्ति होती थी, वह समझ नहीं पाता कि वह क्यों नहीं डांट पाता उसे। वह अगर बीच से कोई सवाल कर देता तो लडकी भौंहें तिरछी करके अं अं करके कुछ याद करने की कोशिश करने लगती। वह पढ़ाते वक्त रोज तय करता कि आज पार्टिशन के उस तरफ जाने के बाद वह वसुंधरा कार्णिक से लड़की की शिकायत कर देगा और अगले दिन से न आ पाने की माफी मांग लेगा। वह भूमिका भी डालता इस बात की पर चुस्त दुरुस्त वसुंधरा कार्णिक बतौर दादी इतनी असुरक्षित थी कि शिकायत तो वह शायद कर भी देता पर आगे न आने की बात नहीं कह पाता। और जब न आने की बात ही नहीं हो पाती तो शिकायत का फायदा क्या!
उसे शक था कि लड़की उसके इस द्वंद्व को समझती थी। इसी वजह उसने अपने आप को भरपूर इतराने की छूट दे रखी थी। पढ़ाते पढ़ाते अचानक से ऊंचे कंधे वाले आदमी का ध्यान बगल वाली की तरफ जाता तो वह उस वक्त उसे ध्यान से सुन रही दिखती पर लड़की के हाथों पर नजर जाते ही भ्रम की झिल्ली गिर जाती और उसका एक छोटे कागज को चिन्दी चिन्दी फाड़ने में ध्यानरत होना प्रकाश में आ जाता। ट्यूटर की नजर पड़ते ही वह फाड़ रहे अपने हाथों को जहां का तहां रोक देती।
आधे फटे हुए पूरे फटे हुए कागज के छोटे छोटे टुकड़े सोफे पर अपनी बगल में रखे जाते समान भाव से। उसका मन तेज तेज दौड़ रहा होता पर बाकी के अपने पूरे शरीर पर उसका कड़ा नियंत्राण था और वे मन के विपरीत अपने को स्थिर रख पाते थे। चूंकि दाहिना तलवा इस ÷पूरे शरीर' की सीमा में नहीं आता था, इसीलिए पूरा शरीर अपने को किताब के पन्ने पर केन्द्रित कर देता और दाहिना तलवा मन की गति से हिलता जाता था थरथराने की लय में। बीच बीच में अर्धविराम की हैसियत से सोफे पर इवा कार्णिक के बगल की एक चिन्दी उड़ने लगती हवा के झोंके में और तब अपने पूरे शरीर से लड़की का नियंत्राण हट जाता और वह चिन्दी के उड़ियाने से लेकर एक कोने में जा दुबकने का पूरा खेल पलकें फड़फड़ा कर देख लेती। विक्रम आहूजा सोचता था कि अगर वह लड़की दो तीन
साल और छोटी होती तो वह उसे पांच भरपूर उंगलियों वाला एक तमाचा मार सकता था, इस फ्रस्टेशन के बाद।
स्कूल में प्रीबोर्ड के नतीजों के बाद की गार्जियन मीट। लड़की का अभिभावक बन कर उसे उपस्थित होना था, ये बात एक शाम पहले उद्घाटित की गयी थी। वसुंधरा कार्णिक ने एक प्रस्ताव रखा था, जो उत्तरार्ध में याचना की तरलता से फैल गया। वह हां या ना कुछ भी करने में अपने को असमर्थ पा रहा था। उसके पास एक ही घिसी पिटी दलील थीᄉ अभिभावकों के समूह में उसकी क्या जगह! वसुंधरा कार्णिक जैसी कि एक चुस्तदुरुस्त महिला थी, विद्यालय से पहले ही अपनी अस्वस्थता के कारण अपनी जगह उसे भेजने की इजाजत ले चुकी थी। उससे अब और बैठा नहीं गया।
वह अनुमति लेकर घर के दरवाजे पर झुका जूते पहन रहा था कि धरती पर गिरे बूंद की तेजी से इवा कार्णिक हाजिर हो गयी। हांफने के अंदाज में। अगले दिन उसे पहुंचने के समय की सूचना देती हुई। उसने जूते के फीते बांधते हुए सिर झुकाये सुना। उठते ही उसकी आंखों के ठीक सामने उसकी आंखों के आकार की एक जोड़ी आंखें आ गयीं। इवा कार्णिक ने फुसफुसा कर कहाᄉ ÷ब्लू शर्ट और ब्लैक जींस पहन कर आइयेगा'ᄉ बगैर पलक झपकाये। ऊंचे कंधे वाले आदमी की पलकें झपकी थीं। लड़की जा चुकी थी।
स्कूल के फाटक के भीतर घुसना पहली नजर में अपने अतीत में दाखिल होने सरीखा था। कतार में लगी साइकिलें, एक कंधे पर बेपरवाही से टंगे बैग्स, चेक के ग्रे स्कर्ट्स और ग्रे फुलपैण्टों में बंटी दुनिया। हर हरकत का घंटियों का मुहताज होकर रह जाना, वही परीक्षाओं की तलवार, वही पनिश्मेण्ट्स की बहार। एक पीढ़ी बदल गयी और स्कूल के फाटक के भीतर कलकल बहते जीवन के बीच भी वक्त वहीं रुका रह गया कहीं। उसका मन हुआ कि वह एक हाथ बढ़ा कर छू ले किसी बस्ते का कोर ही या किसी ग्रे फुलपैण्ट की दाहिनी जेब में उंगलियां ही सरका दे। पर एक गुनगुनाहट भर दूरी थी।
उनकी हंसी की खनखनाहट में एक कोड वर्ड छिपा था। उनकी बोली के हिज्जे में किसी को अपने घेरे के भीतर न घुसने देने की जिद छिपी थी। उनकी उंगली नचा नचा कर बोलने की अदा दरअसल एक निशान खींच दे रही थी, अपने को दूसरों से अलगाने के लिए। विक्रम आहूजा को बहुत तेज अहसास हुआ कि वक्त रुका भले रह गया हो पर उसकी शक्ल बदल चुकी थी।
अंदर तीन टुकड़ों में बंटी कुर्सियां थीं। सामने की सबसे विरल, अध्यापकों के लिए थीं। सामने का दो घेरा। एक में बच्चे। एक पेरेण्ट्स का कुनबा, जो सबसे घना था। कमरे में उजाले का बंटवारा ऐसा था कि एक खास जगह के हिस्से में तेज रोशनी का घेरा आया था, जिसके कि दायरे में एक एक कर हर बच्चे को अपनी बारी आने पर खड़ा होना था। सामने का विरल घेरा उसके हासिल किये गये अंकों और पढ़ायी लिखायी के उसके प्रदर्शन पर टिप्पणी आरम्भ कर देता और घने कुनबे के तीन चार सदस्यों से, जो बच्चे के माता पिता या भाई बहन कुछ भी हो सकते थे, मुखातिब हो जाता।
इवा कार्णिक अपनी बारी आने पर कुर्सी से उठी और अलसाये चूहे की रफ्तार से घेरे तक पहुंची। घेरे के बीचोंबीच पहुंच कर पहली हरकत जो उसके मन में हुई, वह दरअसल शुबहा थी। अंदेशा। बल्कि उसे ऐसा पक्का लगा कि उसका दाहिना मोजा सरक चुका था नीचे की तरफ। जूते के बिल्कुल पास सिमटा हुआ। यह एक निहायत ही ट्रैजिक कल्पना थी। रोशनी से चुंधियाने वाले की न सिर्फ दोनों चोटियां टेढ़ी मेढ़ी थीं, बल्कि एक मोजा भी एकदम नीचे तक सरका हुआ था। उसकी पनियाई सी मुट्ठी खुली। कमरा बहुत ठंडा था। इतना कि जिस घुटने का मोजा नीचे सरक चुका था, उसके मोजे के भीतर से तुरंत तुरंत उघड़े दायें पैर के रोयें खड़े हो गये। उसकी आंखों के आगे से उजाला धुल गया। उसकी पुतलियों ने एक बार सारी ताकत बटोर कर नीले रंग को तलाशने की चेष्टा की पर उजाले की अनुपस्थिति में नीला रंग काले रंग में घुल कर दम तोड़ चुका था।
गोरेपन की क्रीम लगाते हुए ये तीसरा हफ्ता चढ़ा था। या कि उसका या घेरे का
कमाल लड़की बहुत सफेद दिख रही थी। हालांकि उसमें भय की मात्राा नहीं थी। उसने जो हासिल किया था, उसका अंकों में अनुवाद किया जाय तो अर्जित बहुत कम बचता था। अलग अलग विषयों के अंक उछल कर एक दूसरे के खाने में चले गये थे। गणित का अंक समाजशास्त्रा में, केमेस्ट्री के नम्बर इकॉनामिक्स में। पर सबका जमा ये कि एक दूसरे के खाने में पड़े भले, पर अंक सारे कमजोर थे। टीचरों की सुनें तो उन्हें पूरा यकीन था कि थोड़ी सी तत्परता अगर वह दिखाये तो वह अच्छा कर सकती है।
यह एक ऐसा अटूट विश्वास था जोकि पिछले कई वर्षों से टीचर्स उस पर दिखाती आयी थीं एकतरफा और जिसमें कि खुद लड़की की कोई भागीदारी नहीं थी। उसके शरीर में कोई हरकत नहीं हुई सिवाय सांसों की दो एक लम्बी आवाजों के, जो चार उंगली की दूरी पर फिट किये हुए माइक से, जिससे कि बच्चों को मैं पूरी कोशिश करूंगी/करूंगा कि अपने टीचरों की उम्मीद पर खड़ा उतर सकूं या कि मैं अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करूंगा/करूंगी बोलना था, रिस कर आयी थीं। उसने बेआवाज गरदन में हल्की सी तरंग पैदा कर अपनी पारी के बोले जाने की रस्म निभा दी।
अब बोलने की बारी ऊंचे कंधे वाले आदमी की थी, जिसे रीति के मुताबिक बोलने की आड़ में सिर्फ देना थाᄉ सफाई विश्वास आदि। पर उसने रीति को तोड़ कर बात को एक विराम दिया। उसके पास बोलने के लिए था ही क्या! क्योंकि चोटियों में कस कर जकड़ी इस लड़की से उसकी पहचान ही क्या! वह उस जंगली उड़ान भरते बालों वाली लड़की की अंटशंट आदतों के खिलाफ या कि उसकी बड़ी बड़ी कमियों के पक्ष में बोल सकता था, पर सामने जो लड़की खड़ी थी, उसकी सफेदी के बारे में कोई बयान कैसे दिया जा सकता था! उसने दो घड़ी पहले अपनी पूरी क्षमता से नाच कर शांत पड़ चुकी पुतलियों के सम्मान में बात को विराम दिया।
उस विराम का इवा कार्णिक पर ऐसा असर हुआ कि अपनी बारी के इस तरह खत्म हो चुकने के बाद भी वह उस जगह से हिली नहीं। जब दूसरे का नाम पुकारा गया और जब नाम पुकारा जाने वाला आ चुका तब भी वह सूत बराबर तक नहीं टसकी। उस दूसरे बच्चे को उसे छूकर संज्ञान की अवस्था तक पहुंचाना पड़ा, जहां से उसके वापस जाने का रास्ता शुरू होता था। लौटने के लिए मुड़ते वक्त ही उसे मैरून शर्ट दिख गयी, जिसकी शक्ल कुछ कुछ नीले रंग से मिलती जुलती थी। और शाम उसके घर के कमरे की रोशनी में वह यकीनन नीला ही दिखता।
इवा कार्णिक ने स्कूल से लौटने के बाद की दुपहरिया में आईने में अपना चेहरा देखा और उसे लगा कि उसे जितने गोरेपन की जरूरत थी, उसे वह पा चुकी है और अब क्रीम की जरूरत उसके चेहरे को नहीं रह गयी थी। उसने अपने हाथ और गरदन पर क्रीम को लपेस लिया और जाकर इजा के बगल में लेट गयी। उसने इजा को बतलाया कि उसे इस बार बहुत कम नम्बर मिले। वसुंधरा कार्णिक, जोकि पालने से उसके झूठ बोलने के अंदाज से वाकिफ थी, हर वक्त खाली मजाक करती है लड़की वाली अदा से हंस दी।
ऐसे वक्त ही इवा कार्णिक की आस्था झूठ बोलने में और पुख्ता हो जाती और उसकी यह मान्यता एक बार फिर सही साबित होती कि झूठ और सच केवल बातें होती हैं और ये कि बोलने वाले की काबिलियत और सुनने वाले की परख किसी बात को सच या झूठ का जामा पहनाते हैं। उसने, उफ ऐसा सच जैसा दिखने वाला झूठ बोला फिर भी इजा ने पकड़ लियाᄉ वाली लज्जा से कहाᄉ ''इतिहास की टीचर बड़ी तारीफ कर रही थीं।'' वसुंधरा कार्णिक गदगद हो गयी। उसने अपने तलवे से उसके पांव को सहलाते हुए पूछाᄉ ''अरे तेरे अपने ट्यूटर ने क्या कहा!''
''ओ ये! अब कहते क्या विनम्रता से पलकें झुकाये रहे।'' दोनों अपने अपने कौशल से सच और झूठ को उनका जामा पहना कर खामोश पड़ गयीं।
शाम के एक खास वक्त, जबकि वसुंधरा कार्णिक को एक अलग थाप पर यह पहचानते हुए उठ कर दरवाजा खोल देना था कि ऊंचे कंधे वाला आदमी आ चुका है, दरवाजे पर दस्तक पड़ी। वह अपने बंधे बंधाये विश्वास के साथ दरवाजा खोल कर वापस मुड़ गयी, पर उसे हलका सा आभास हुआ कि दरवाजे पर कोई नहीं था। उसने पलट कर परखा। वाकई कोई नहीं। उसे वापस आकर बैठे दो मिनट भी नहीं गुजरा था कि फिर से वही दस्तक। बैठ चुकने के बाद तुरंत उठने में उसे तकलीफ होती थी। घुटने। दरवाजा फिर खाली था एक बार। इस बार अपनी कुर्सी तक वापस लौट कर वह तत्काल नहीं बैठी। खड़ी रह गयी। तिबारे की थाप की आस में। बाद में हालांकि उसे बैठना पड़ा इस सोच के साथ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके कान निश्चित समय पर एक खास दस्तक सुन लेते हों रोज जबकि दस्तक कोई दरअसल होती नहीं हो और जब वह दरवाजा खोलती हो तो ऊंचे कंधे वाले आदमी की वहां उपस्थिति एक संयोग हो और आज ऐसा होने पर दरवाजे पर उसकी अनुपस्थिति ही सचाई की सबसे करीबी चीज हो!
शाम तेजी से गहरा रही थी और इवा कार्णिक बालों को खोल कर लगातार दरवाजा तकते तकते उ+ब चुकी थी। किसी का न आना तय था ये जानते हुए भी। वह दरवाजे के बीचोंबीच कुर्सी लगा कर आगे पीछे हिलते हुए इंतजार कर सकती थी।
यह तीसरा दिन था। और लगभग उसी वक्त जब शाम की पाली की दस्तक हुआ करती थी, फोन पुरानी धुन में खड़खड़ाया। इस तरफ से वसुंधरा कार्णिक थी, उस पार ऊंचे कंधे वाला आदमी। इस पार से उसके दो दिन से न आने और कोई खबर तक न देने और आगे कब आने की बातें थीं, उस पार से पहले एक चुप्पी, फिर दूसरी चुप्पी, फिर तीसरी चुप्पी के पहलेᄉ आगे से न आ पाने की सूचना थी। आगे इस तरफ से तीसरी खामोशी को चीरती बदहवासी थी। क्यों, क्या मतलब क्यों नहीं आ पाआगे जैसी। उस तरफ से ÷बस मैं' ये दो शब्द थे अलग अलग हटे हुए। फिर इस तरफ से ÷ऐसे कैसे'। बदले में उधर से ÷मैं अच्छा पढ़ा नहीं सका!' इस तरफ से फिर ÷ऐसा कैसे'। उस तरफ से पहले मौन फिर रिसीवर के रखे जाने की शांति।
उस घर तक पहुंचने के लिए पैंसठ मुड़ी मुड़ी सीढ़ियां चढ़नी होती थीं। फिर दो पल सुस्ताने के बाद कॉलबेल बजाना होता था। कुछ पल दरवाजे के और बंद रहने पर दुबारे से बेल बजाना होता था। फिर भी न खुलने पर झुंझला कर एक बार दस्तक देनी होती थी। फिर झांकतांक कर दरवाजे पर किसी सुराख की तलाश करनी होती थी, जिससे कि उस पार से देर होने की वजह की शिनाख्त की जा सके। फिर एक बार दरवाजा पीट कर हाथ को वापस अपनी जगह आने के क्रम में ही एक ताले से टकराना होता था, जोकि उस दरवाजे पर लगा हो। फिर चौंक कर ये समझना होता था कि घर अभी बंद था बाहर से, भले वह खुला हुआ हो भीतर से। फिर ताले को छूकर वापस पैंसठ सीढ़ियां उतरनी होती थीं।
वह तीसरे दिन के बाद का दूसरा दिन था। अभी साढ़े पांच बजे थे। जिसका मतलब कि उसे अगले दिन इजा से एक और एक्स्ट्रा क्लास का बहाना बना कर वापस से पैंसठ सीढ़ियां चढ़नी थीं ये मनाते हुए कि छह बजे के पहले तक घर के ताले में चाभी घुसा कर उसे उल्टी दिशा में उमेठ कर सांकल खोल दी गयी हो! एक ही बार में झटके से सब हो गया होता तो बात आयी गयी हो चुकी होती पर एक असफल साढ़े पांच बजने के बाद से दूसरे छह बजने तक की प्रतीक्षा भारी थी। इस प्रतीक्षा में असमंजस का भी घालमेल था। कहीं उसके जाने से किसी के लौट कर आने की रही सही सम्भावना भी चली गयी तो! आज के साढ़े पांच बजे के असफल होने के पीछे कहीं ऊपर वाले का यही इशारा तो नहीं! पर जैसा कि जीभ के एक बार जल चुकने के बाद भी गरम चीजों को मुंह लगाना छोड़ देने की बात लड़की बचपन से सीख नहीं पायी थी, वह अगली शाम भी टपाटप सीढ़ियां चढ़ गयी।
दरवाजा दो फांक खुला हुआ था। कॉलबेल बजा कर दरवाजे के खुलने का इंतजार करने के बीच के वक्त में अपने आप को संतुलित कर लेने की जो सहूलियत होती है, उसका यहां अभाव था। उजास हल्की जो बाहर से जा रही थी, उतनी भर। घर के पास अपनी कोई रोशनी नहीं थी। किसी खुले हुए दरवाजे को फिर से खुलवाने के लिए क्या करना चाहिए, लड़की में उस शऊर की कमी थी। वह ठिठक ठिठक कर भीतर उस रेखा तक पहुंच गयी जहां बाहर के उजाले की आखिरी सरहद खिंची थी। वहां तक पहुंच कर उसे कुछ पुकारना था, जिसके लिए कंठ तैयार नहीं था क्योंकि उसे पता था कि ÷सर' जैसी कोई आवाज वहां से बहुत भद्दी और बेसुरी निकलती। उसे यह भी लगा कि पता नहीं जिस घर में वह घुस चुकी है, वह सही घर है भी या नहीं! हालांकि ये उसे बहुत थोड़ा थोड़ा लगा था। ज्यादा ज्यादा क्या कह कर पुकारा जाये यह असमंजस ही था, जो उसे वापस घर के दरवाजे तक लौटा लाया। वहां पहुंच कर उसने कॉलबेल टीप दिया।
घुटने तक लम्बे शॉट्स और टी शर्ट पहने अंदर से जो आदमी तौलिये में हाथ पोंछता बाहर तक आ गया, वह दरवाजे के मेहमान को देख कर उसे वहीं से फुटा देने को कृतसंकल्प हो गया।
÷÷कहां?''
मेहमान ने जवाब में भौंहे उचका कर वही सवाल दोहरा दिया।
÷÷यहां कहां?''
÷÷आपके यहां।''
मेजबान की एक धारणा फिर से पुख्ता हो गयी कि लड़की गजब की मूर्ख थी। वह उसके पीछे कौन है कोई है यह झांकने लगा। वह भी गरदन मोड़ कर अपने पीछे क्या कोई है! ऐसा झांकने लगी। फिर वह मुड़ी और उसने कहाᄉ ÷÷इजा नहीं है।''
÷÷इतनी देर तक स्कूल में क्या कर रही थी?'' उसने ऊपर से नीचे लड़की के स्कूलिया मेकअप को परखा।
÷÷इधर उधर थी। कल साढ़े पांच बजे आप नहीं मिले तो छह बजा रही थी।''
'÷भीतर आओ।''
÷÷एक बार आयी थी।''
÷÷ओफ! क्या था?''
÷÷अंधेरा था।''
÷÷काम क्या था?''
÷÷घर के अंदर रोशनी नहीं किया!''
÷÷नहीं। काम क्या था?''
÷÷इजा ने कहा है आने को। उनका मन नहीं लगता।''
÷÷मन लगाने जाना है?''
÷÷पढ़ाने के लिए।''
÷÷किसे!'' वह चौंका, ऐसा लड़की को लगा।
÷÷मुझे।''
÷÷ओ! तुम्हें! पर तुम्हें तो सब आता है।''
÷÷मैं बहुत मन लगा कर पढ़ूंगी।''
÷÷अभी तक क्यों नहीं पढ़ रही थी मन लगा कर?''
÷÷आप रोज आ रहे थे इसीलिए।''
÷÷अच्छा! तो मेरा रोज रोज आना छुड़वाने के लिए तुमने मन लगा कर पढ़ना छोड़ दिया!''
÷÷छोड़ा कहां?''
÷÷ओ हां हां छोड़ा कहां! मतलब शुरू से ही नहीं पढ़ा न!''
÷÷हां।''
÷÷इजा से कहना दूसरा ट्यूटर खोजें।''
वह अभी अभी तो अच्छा भला था, अचानक से कठोर हो गया, ऐसा लड़की को लगा।
÷÷मैं दूसरे ट्यूटर से कैसे पढ़ पाऊंगी!''
÷÷मतलब?''
÷÷इजा ने नहीं मैंने कहा है आने को। मतलब इजा ने भी कहा है। कहा नहीं है पर कहती। मैं बहुत मन लगा कर...'' आगे आवाज दरक गयी।
÷÷घर में भी झूठ बोल कर आयी होगी। घर जाओ।''
÷÷आप कल आयेंगे न!''
÷÷तुम जाओ।''
÷÷आप झूठ नहीं बोलते। आइयेगा न। अभी ही चलिए न। मुझे बहुत सारा होमवर्क भी मिला है।''
ऊंचे कंधे वाले आदमी के सारे शब्द पुराने पड़ गये।
÷÷आप अपने घर में रोशनी जला कर और अच्छे कपड़े पहन कर आइये थोड़ी देर में।''
उसने जाने के लिए सामान उठाना शुरू किया तब ऊंचे कंधे वाला आदमी देख सका कि स्कूल बैग, लंच, पानी की बॉटल सब फर्श पर टिका कर वह खड़ी थी तभी से।
विक्रम आहूजा ने उसे आवाज देकर पीछे पलटा दिया।
÷÷इजा से कहना तुम्हारे लिए नये मोजे खरीदे।''
इवा कार्णिक ने बस्ता, पानी, लंच सबको वापस जमीन पर रख कर बायें मोजे को दायें मोजे जितना खींचा, ऊपर और फिर पलट कर चली गयीं।
किताब भौतिकी की थी। उसकी बाइंडिग ढीली हो गयी थी और हवा की हल्की ससर पन्ने पलट दे रही थी। कमरे में एकदम शांति थी। इवा कार्णिक को एक न्यूमेरिकल हल करने को मिला था। दोनों जानते थे कि उससे नहीं हो पायेगा पर दिखावे में कोई इसे मानने के लिए तैयार नहीं था। दरअसल इवा कार्णिक जिन्दगी में पहली बार इतनी गम्भीरता से प्रयासरत थी। सच की गम्भीरता से। ऊंचे कंधे वाले आदमी के दिमाग में उसकी इस गम्भीरता के बरअक्स एक हल्का खयाल जागा। तय रहा कि वह आम इमली, जो भी बना कर दिखलायेगी, विक्रम आहूजा उसके सही होने की घोषणा कर देगा।
इवा कार्णिक ने जो आगे बढ़ाया, वह तीन लाइन के बाद फार्मूले से विचलित हो गया था। उस तीसरे लाइन के आगे ही विक्रम आहूजा ने पेंसिल से निशान लगा दिया, सही का। लड़की के चेहरे से सिकुड़न चली गयी और उसका हर एक अंग अपने अधिकतम फैलाव में खुल गया। उसने उसके हाथों से कॉपी छीन ली और जल्दी जल्दी पन्ना देख कर कहाᄉ÷÷सही है!''
÷÷बनाया गलत था क्या!''
उसने सिर को तेज दायें बायें डुला कर कॉपी को वापस अपने ट्यूटर की ओर बढ़ा दिया।
÷÷दुबारे से देखूंगा तो हो सके ये गलत निकल जाय!''
लड़की ने बहुत गति से अपने हाथ वापस खींचे और कॉपी को कलेजे में घुसेड़ लिया। उसकी हंसी की तुतलाहट में ऊंचे कंधे वाले आदमी के आलिंद और निलय में खून ले जाने ले आने वाली शिराएं और धमनियां अचानक से अपना काम भूल गयीं। उसका चेहरा जर्द हो गया और उसे अपने धोखे से डर लगा।
इवा कार्णिक को ऐसा लगा कि उसकी कॉपी को छुपा लेने की हरकत ने सामने वाले के चेहरे पर ठीक उस काम के विपरीत कोई असर किया है, जो उसके खुद के चेहरे पर फेयरनेस क्रीम ने किया था। उसने अपने हाथ बढ़ा दिये। कॉपी सहित। विक्रम आहूजा को इतना लग गया कि अब आगे वह उससे आंखें नहीं मिला सकेगा। इस खयाल ने उसके भीतर इतनी बेचैनी ठूंस दी आधे पल में कि उसने आखिरी झलक कैद कर लेने के होश में पलकें उठायीं, वहां, जहां अपने सही साबित हो चुकने की पुलक में तैरती पुतलियां थीं। विक्रम आहूजा वहां से अपने लिए नमक भर सुकून चुरा कर भाग सकता था, पर उसके लौटने के सारे रास्ते किसी ने बंद कर दिये थे। लिहाजा उसे वहीं रुक कर लड़की की आंखों में देखना पड़ा, जहां कॉपी पर तीसरी पंक्ति के बाद फिसल गया फार्मूला दुबका था, जो पहेली को उसकी मंजिल तक पहुंचाने का दमखम रखता था।
लड़की सब कुछ उसी रोज पढ़ लेने के उत्साह में थी। उसने तीन सवाल पूछ डाले, जिन सबका ताल्लुक भौतिकी से ही था, कहीं न कहीं और सबके सब जवाब की पात्राता भी रखते थे। विक्रम आहूजा के माथे पर पसीना छलक आया जवाब की जगह घेर कर। उसने आवाज पर पूरा नियंत्राण साध कर जवाब देना शुरू किया पर आवाज धागा निकल चुकी सूई की तरह टुकुड़ टुकुड़ ताकती रही। उस दिन के कोटे की पढ़ाई के खत्म हो चुकने पर विक्रम आहूजा उठ कर खड़ा हो गया और अगले ही पल वह बैठ भी गया। उसने मेज पर उस दिन के खाते का अपना रोल निभा कर औंधें मुंह पड़ी नोटबुक को उठाया। बिना किसी पूर्व सूचना या पूर्व अभ्यास के हुई इस कार्यवाही के प्रतिउत्तर में नोटबुक हड़बड़ा कर उठी और इस क्रम में उसके पन्ने अपने आप को तेजी से पलटने लगे और वो पन्ना तक खुल गया, जिसे वाकई में ऊंचे कंधे वाला आदमी खोलना चाह रहा था।
विक्रम आहूजा ने बगैर लड़की के अचकचायेपन को देखे, उस न्यूमेरिकल के आगे क्रॉस का निशान लगा दिया और तीसरे लाइन के आगे से बहक गये फॉर्मूले को जहां का तहां पकड़ कर मंजिल तक पहुंचा दिया। इवा कार्णिक के गलत जवाब के समानांतर एक सही हल लिखा जा चुका था। इवा कार्णिक को जिन्दगी में पहली बार गम्भीर दुख हुआ और उसकी आंखों की कोर में एक बिना दांत वाला आंसू आकर ठिठक गया था।
आईने के आगे बात मलिन थी। क्रीम का इस्तेमाल स्थगित करते ही त्वचा का सांवला स्वभाव उग्र हो गया था। इवा कार्णिक के आंसू अब चूंकि एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बहने लगे थे, इसलिए आईने में दिखलाई पड़ती हुई सांवली तस्वीर को देख कर इवा कार्णिक चाहे तो कल्पना कर सकती थी कि वह शाम के धुंधलके में नदी में अपनी हिलती डुलती परछांई देख रही है। उसके आंसू क्यों थे! उसके जवाब का सही प्रमाणित होकर भी गलत साबित हो जाना इसकी वजह क्या! या कि कारण कोई दूसरा, जो आईने के सामने और गहरा गया था!
यह अपने पिछड़ जाने का अहसास था। कितनी मुश्किल बात थी कि एक ऐसी दौड़ जिसमें अकेली वही दौड़ रही थी, और वही पिछड़ भी रही थी। इस आईने वाली अतिरिक्त समस्या के लिए, जो आग में घी की हैसियत से मौजूद हो गयी थी, उसके पास एक बढ़िया विकल्प यह भी था कि वह इजा की रसोई में आलू का छिल्का उतारने वाला औजार ले आये और उसकी सहायता से चेहरे की ऊपरी परत हटा दे। पर चूंकि मारे हताशा के उसका एक कदम भी चलने का मन नहीं हो रहा था, उसने वहीं खड़े खड़े कर सकने वाले काम को चुना और अधपिचकी ट्यूब से तीन दिन के कोटे की क्रीम निकाल कर चेहरे पर लपेस लिया।
ऊंचे कंधे वाला आदमी अपने फ्लैट की घुमावदार सीढ़ियां न चढ़ कर नीचे के चबूतरे पर बैठ गया, जिस पर गर्मी की शाम और जाड़े की दोपहर में फ्लैट भर की औरतें बैठा करती थीं। उसने अपनी मुट्ठी खोली, जो भीतर से गीली थी और जिसके भीतरी गीलेपन में वह किसी के आंसू चुरा लाया था। उसने चुराने का मन बना ही लिया था तो वह इवा कार्णिक की उस हंसी को चुरा सकता था, जो उसके खेल के बाद लड़की के चेहरे पर उभरी थी, क्योंकि थी तो वह भी विरल ही। पर उसने अपने साथ लाने के लिए उस आखिरी आंसू को चुना जो अब तक के उसके अनुभव से इवा कार्णिक जैसी लड़की की आंखों के लिए नहीं बना था। उसे लग गया था कि पिछली हंसी को लड़की भले संभाल ले, पर इस आंसू को
संभालना उसके बूते का नहीं था, इसीलिए उसकी पसीजी हथेली गीली चीज को अपने साथ ले आयी।
वह दिन में चार की औसत से उन सीढ़ियों पर से चढ़ता उतरता था, पर पहली बार उसके भीतर उन्हें गिनने की इच्छा जगी। उसे ठीक ठीक मालूम था कि चाभी के गुच्छे में से कौन सी चाभी उसके घर का ताला खोला करती थी, पर उसे बारी बारी से हर चाभी को घुसा कर ताला खोलने की असफल कोशिश करने का मन हुआ। अंधेरे घर के अंदर प्रवेश करने के बाद बत्ती जलायी जाती है, इस विकल्प का आविष्कार हुआ ही न हो जैसे, ऐसा। उसने सोफे पर बैठ कर अपना जूता अलगाया और मोजे को बजाय नीचे की तरफ खींचने के उसके हाथों ने उसे घुटने की ओर कस कर खींचा।
उसे लगा जैसे भीतर के कमरे से किसी के लगातार कुछ रटने की आवाजें आ रही हों! उसके हाथों से पैर फिसल गया। दोनों के अपने अपने विस्मय थे। वजह कि किसी ने भी इवा कार्णिक को किसी भी चीज को कभी मुंह से रटते नहीं सुना था। वह आंखों से ही रटती आयी थी आज तक। वह उठ कर खड़ा हो गया। कानों का धोखा या कानों को ही धोखा हुआ था। घर शांत था। पर चीजें घर की लगातार कुछ रटे जा रही थीं। सिंक का नल खोलने पर पानी की रटी रटायी धार। स्विच ऑन करने पर पंखे के डैनों का वही रटा रटाया घेरा। उसने गौर किया कि हर रटने रटाने में शोर था। सिवाय आंखों से रटते जाने के।
वसुंधरा कार्णिक दरवाजे के पीछे से अंधेरे में अपने आप को घुलाती हुई घंटों झांकते रहने का अभ्यास साध रही थी। वह संदेह को फूंक फूंक कर उड़ा रही थी दूर दूर। वह जानती थी कि पंद्रहवां सोलहवां सत्राहवां साल निकल जाय चैन से तो फिर पहरेदारी की जरूरत नहीं होती उम्र भर। उसके अपने मां बाप ने उसकी उमर के खतरे के निशान को छूने के पहले ही उसे अगले ठौर के हवाले कर दिया था। लक्ष्मणरेखा सिन्दूर की थी तो क्या, सातों महासागरों के पानी को मिला कर पीने का नशा इन्हीं तीन सीढ़ियों पर तो चखा था उसने।
सत्राहवें साल की आखिरी हिचकी तक वह मां बन गयी थी। उसके आगे की स्क्रिप्ट में जो कुछ भी लिखा था, जैसा भी लिखा था, उसे बिना सवाल किये वही दृश्य वही संवाद अपनाने पड़े। पहले एक बच्चा बिछड़ा, फिर पति, फिर दूसरा बच्चा। अब जबकि उसके चेहरे से मंच के बीचोंबीच की रोशनी का गोला सरक चुका था, उसने नेपथ्य से डोरियों को खींचने, ढील देने का काम संभाल लिया था मुस्तैदी से और यह भांप चुकने पर कि इवा कार्णिक फिसलने के जुनून में है, उसकी डोर को खींचे रखना उसका सबसे खास दायित्व।
इस पूरे प्रकरण में ऊंचे कंधे वाले आदमी पर अविश्वास की कोई सूरत नहीं बनती थी। बस संदेह का पत्ता वहीं खड़खड़ाता था, जहां एक बार ट्यूशन छोड़ चुकने का फैसला ले लेने के बाद ट्यूटर दुबारा चला आने लगा था पहले की तरह। अगर कि इवा कार्णिक सच में उसे मनाने गयी थी तो भी पढ़ने लिखने में तीन कौड़ी की एक लड़की की बात को मान ही लेने की उसकी क्या मजबूरी थी! इस बेहद अफसोसजनक वाकये की नींव पर ही उसने तांकझांक की पूरी बुनियाद खड़ी की थी। ये बात और कि उन दोनों को एकांत में मिला पाने का व्यूह भी अक्सर उसके ही हाथों रचा जाता। कह सकते हैं कि वह जाल बिछा कर और उस तक इवा कार्णिक को ले जाकर यह परखना चाहती थी कि वह फंस पाती है कि नहीं!
उसका चश्मा ढीला था और नाक के रास्ते फिसलने लगता था। इस फिसलन के आगे बाधा साबित होते हुए वसुंधरा कार्णिक को लगातार नजर रखनी थी उनके हावभाव पर। और अगर कि वे हावभाव वाकई किसी लफड़े के अंश थे तो वसुंधरा कार्णिक यह स्वीकार करने में मिनट भर भी नहीं खरचती कि उसका जाल पुरानी किस्म का था जरूर पर दम था उसमें। खम भी। यह सब तांकाझांकी तब तक चलती जब तक घड़ी की सूइयां साढ़े आठ की मुद्रा में आकर बैठ न जातीं और ऊंचे कंधे वाला आदमी उठ न खड़ा होता सरपट। और यहीं उस दिन के कोटे के खत्म होने का परदा वसुंधरा कार्णिक को खींचना होता।
परदा सटते ही वह डोर को फेंक फांक कर उसमें उलझते अपने पैरों की परवाह छोड़ गिरते पड़ते ड्राइंग रूम के पार्टिशन के उस तरफ पहुंचना चाहती, जहां उसे रास्ता छेंक कर खड़े हो जाना था दरवाजे के बीचोंबीच ताकि विक्रम आहूजा बाहर कदम न धर सके। वह रुक जाता। वसुंधरा कार्णिक बात को जिधर भी मोड़ती, वह बिल्कुल छोटा सा जवाब देता। उसकी उपस्थिति पूरे वार्तालाप में उतनी ही थी, जितनी लम्बे लम्बे वाक्यों में ÷है' या ÷था' की हुआ करती है। छह रोज पहले सुना चुके एक वाकये को दुहराते दुहराते आंख की कोर से उसे पार्टिशन के पास एक जिन्दा सी परछांई डोलती सी दिखती। तो क्या इवा कार्णिक परदे के उस तरफ थी! वह तुरंत तेज लगाम खींच कर कह उठतीᄉ ÷÷मैंने तुम्हें आज भी बड़ी देर करा दी न! बातों की सुध में मुझे वक्त का ख्याल ही न रहा। अच्छा?''
÷अच्छा' शब्द के खत्म होते होते वह उठ खड़ा होता और हाथ जोड़ कर बाहर निकल जाता। उनकी दुनिया से।
वसुंधरा कार्णिक पलट कर घर के भीतर की ओर बढ़ने लगती। वह चौखट दर चौखट फांदती जाती पर कोई दिखता नहीं। इवा कार्णिक अपने बिस्तर पर इतनी सारी किताबों से दबी मिलती कि कोई नहीं मानेगा कि वह इतनी सारी किताबों के बीच से अपने को निकाल कर परदे की ओट तक गयी और वापस वहां से लौट कर अपने को उन्हीं किताबों से दबा लिया ऐसी सफाई और फुर्ती से। तो क्या वाकई पार्टिशन के पीछे वह नहीं थी!
वसुंधरा कार्णिक का माथा गरम था। उसकी पलकें झुरमुट झुरमुट खुलती थीं। फिर बंद हो जाती थीं। इवा कार्णिक ने कढ़ाई में तेल के कड़क चुकने पर मुट्ठी मुट्ठी दो मुट्ठी भिण्डियां कटी कटी डाल दीं उसमें। तेल कुछ तेज ही कड़क गया था। वजह यही कि भिण्डी का एक बीज उछल कर उसकी नाक के सबसे नुकीले सिरे से टकराया। भिण्डी को ढंक कर भूनना था कि खुली कढ़ाही में! तेज आंच पर कि सिम चूल्हे पर! और सबसे बड़ा सवाल था कि थोड़ी भुन चुकी भिण्डी में वापस फोरन कैसे डाला जाय! मिर्च का। जम चुकी दही में वापस जोरन कैसे डाला जाय! ओहो हो!
ऊंचे कंधे वाले आदमी के आया होने पर दरवाजा खोलने वह छुलनी हाथ में लिए गयी, जिसके सिरे पर हल्दी से गली भिण्डी चिपकी थी।
÷÷इजा को बुखार है। कल आइएगा पढ़ाने।'' उसने आधा दरवाजा छेंक कर कहा।
÷÷आज देखने तो आ सकता हूं!''
÷÷ज्यादा बीमार नहीं हैं।''
उसने एक पल अपने ट्यूटर की आंखों में देखा और हट कर रास्ता दे दिया। पूरा।
वसुंधरा कार्णिक ने चंचल बीमार की भूमिका में आते हुए अपने बीमार धड़ को उठा कर पूछाᄉ ÷÷कैसे हो?''
ऊंचे कंधे वाले आदमी नेᄉ ÷आप लेटी रहें' की तरह हाथ बढ़ा कर कहाᄉ ÷÷अच्छा हूं।''
वसुंधरा कार्णिक ने अभिनयाधिक्य से कहाᄉ÷÷चाय पीओगे?''
÷÷कौन बनायेगा?''
÷÷तुम।''
÷÷आप पीयेंगी?''
÷÷नहीं तो।''
इवा कार्णिक मेजपोश ठीक करने के बहाने उनकी बातचीत में सेंध मारने आयी थी। पर उनके बीच के टॉपिक को आधा अधूरा सूंघ कर वह पिछले पांव खिसक गयी। वह कुछ भी कर सकती थी पर चाय बनाने का विकल्प उसे खौलाता था आतंक से। उसने सतर्क नजरों से कड़ाही में भिण्डियों को फैला दिया और चुटकी से एक एक के ऊपर नमक छींट कर दम साध कर भिण्डियों को उलटने पुलटने लगी। उसकी सतर्क नजरों के घेरे में एक ऊंचा आदमी आ गया। वह हड़बड़ा कर पलटी और उसने कहाᄉ ÷÷मुझे चाय बनाना नहीं आता।''
÷÷सामने जो है वह भी जल रहा है।''
उसने गैस का नॉब बंद करके पूछाᄉ÷÷चाय सचमुच बनानी होगी क्या!''
÷÷तुम्हारी इजा बता रही थी तुम्हें रोटियां बनानी नहीं आतीं। आज का तुम्हारा ट्यूशन यही।''
÷÷मैं बेल सकती हूं सेंक भी सकती हूं।''
÷÷तो फिर क्या नहीं कर सकती?''
÷÷उसे खा नहीं सकती।''
विक्रम आहूजा पहली बार सिर्फ उसके लिए मुस्कुराया। हालांकि वह जान नहीं सकी क्यों मुस्कुराया, पर लड़की को इस बात का अहसास हुआ कि दरवाजे से ही उसे लौटा देकर वह कितनी बड़ी भूल करते करते रह गयी थी। उसने पलट कर आटे के डिब्बे का ढक्कन खोल दिया और दूसरे पल दरवाजे से जरा सी बची रह गयी जगह से अपनी देह को निकालते हुए इजा के कमरे तक भाग आकर उनके पैर दबाने लगी। उसकी तलहथी में तेज पसीना था, ये बात इजा के पैर को छूकर ही पता चली।
इजा ने अपने पैर ऊपर सरका लिएᄉ÷÷किचन में जा!''
किचन में जाने का रास्ता बहुत आसान था। नाक की सीध में सोलह सत्राह कदम चल कर दाहिने मुड़ कर सात कदम बस। पर उसने अपने मार्ग में विचलन लाते हुए अपने को विपरीत दिशा में मोड़ लिया। भाग भाग कर वह अपने कमरे तक गयी, आईने में देख देख कर चेहरे पर क्रीम लपेसा और किचन के दरवाजे पर खड़े खड़े भीतर देखने लगी। ऊंचे कंधे वाले आदमी ने आटे के बीच एक गड्ढा बनाया और उसे पानी से भर दिया। फिर उस पानी को अगल बगल के आटे से भर दिया। उसने बायें हाथ से पानी डाल डाल कर आटा गूंथ लिया और लोइयां बनानी शुरू कर दीं। उसने बगैर पलटे, पीछे खड़ी परछांई से पूछाᄉ÷÷कितनी रोटियां खाओगी तुम?''
लड़की सकपका गयी। उसने शब्दों को आधे आधे हिस्सों में बांट कर कहाᄉ÷÷दो।''
÷÷और इजा?''
÷÷दो।''
÷÷और मैं?''
÷÷आपके हिस्से की भिण्डी तो मैंने नहीं बनायी।''
वह बेलन समेत पलटा।
÷÷आपको कैसे पता चला कि मैं पीछे खड़ी हूं?''
÷÷पाउडर या क्रीम की खुशबू कमरे में फैली उससे...÷÷तुमने कैसे जाना कि मुझे भिण्डी नहीं पसंद!''
इवा कार्णिक के होंठ अलग गये। हलकी सी रोशनी में वह आगे बढ़ा। इवा कार्णिक पीछे बढ़+ सकती थी, पर वह हिली नहीं बिन्दु भर भी। अधिक से अधिक वह जितने करीब आ सकता था, उतने करीब वह आ चुका था। सीने पर हाथ रख कर जिस जगह पर वह ठीक ठीक दिल के होने की पड़ताल कर सकती थी, उसके ठीक नीचे से एक बवंडर उठा जो, उसकी मानें तो उसके शरीर को ढक्कन की मानिन्द उड़ा सकता था फक्क की आवाज के साथ।
उसे लगा कि उसके कानों से कुछ रिसने लगा था एकदम तरल और शर्तिया गीला। नहाते वक्त दाहिने कान में घुस गया पानी शायद, जिसे उसने स्कूल में भी दाहिनी बगल झुकते हुए कूद कूद कर निकालने की कोशिश की थी। पर जो निकला था नहीं खाली ढब ढब बजा भर था भीतर। और जो अब रिस रहा था सुसुम सुसुम। वह स्कूल में नजर मिलाने वाले खेल में हमेशा सबसे जल्दी आउट होने वालों में थी, पर यहां सामने वाले के आगे अकड़ेपन की स्थिति में भी उसकी एक पलक तक विद्रोह नहीं कर रही थी पल भर झपकने के लिए। ऊंचे कंधे वाले आदमी का चेहरा उसके ठीक ऊपर झुक गया था और इवा कार्णिक को भान हो चुका था कि अगली सांस जो वह छोड़ेगी, वह सामने वाले से टकरा कर ही आगे बढ़ेगी। इस आशंका से कि सांसों का टकराना कमरे की खामोशी को चिनगा न जाये उसने अपनी सांसें अंदर ही रोक लीं। ऊंचे कंधे वाले आदमी की आंखें जरा सिकुड़ीं और उसने कहाᄉ÷÷तुमने जो लगाया है सफेद सफेद, वह माथे पर ठीक से पसरा नहीं है।''
वह बेलन समेत पलटा। इवा कार्णिक भी बिना वक्त गवांये पलटी। उसने अपने ललाट पर तीन बार रगड़ रगड़ कर हाथ ससराया और किवाड़ की आड़ में छिप कर खड़ी हो गयी। आईना रोशनी समेत उसकी तलाश में घर भर में पैदल पैदल घूम रहा था और उसे किसी भी कीमत पर अपने आप को उसकी नजरों से बचा ही लेना था।
गरम माथे वाली स्त्राी के पलंग से अब तक के शुबहा के यकीन में बदल जाने के बाद की भारी सांसों वाली हुंकारी निकली। पलंग जोर मोर से चड़मड़ाया और उसने लेटे लेटे ही अपने जाल को खींच कर समेट लेने की कोशिश की क्योंकि शिकार बगैर जाल की मदद के भी, फंस जाने को अपने आप उत्सुक दिखता था या ऐसा ही कुछ भी।
लंच ब्रेक में अब इवा कार्णिक अपने दोस्तों के साथ नहीं दिखती थी। वह प्ले ग्राउंड को घुटने तक घेरने वाली बाउंडरी वॉल पर एक किसी पेड़ के नीचे उसकी गिरती पत्तियों को गिनती हुई बैठी रहती। वह सन्नाटे को छूने के लिए शरारत से दूर भागने लगी। वह टीचर के लेक्चर को घूंट घूंट सुन लेने के इरादे से हर क्लास की शुरुआत करती ताकि शाम में किसी को अपने किताबी ज्ञान से चौंकाया जा सके, पर होता ये कि बात जैसे ही तीन चौथाई आगे बढ़ती उसका शरीर झपकने लगता। वह जांघ की चमड़ी को स्कर्ट समेत चुटकियों में दबा कर अपने शरीर को जगाने का जुगाड़ करने लगती और इसी खींचातानी में ÷सुन लेने का इरादा' पीछे ढकेला जाता।
उसे तीखी धूप से अब डर नहीं लगता न सामने वाले के उजले रंग से, जिनकी उपस्थिति उसके रंग को और गहराने का खतरा उत्पन्न करती थी। वह खिड़कियों से देख कर शाम के होने का और दरवाजे की झ