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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/18 सम्‍पादकीय


इतिहास
गांधी का सर्वोत्तम उपवास और अहिंसा की असहायता, सुधीर चंन्द्र

शताब्दी
मोहब्बत के अवामी सरोकार शकील सिद्दीकी

लेख
औपनिवेशिक उत्तर भारत में घरेलू क्षेत्रा, हिन्दू पहचान और स्त्री   यौनिकता चारु गुप्ता
लैंगिक राजनीति तथा महाभारत में मातृदेवियां शालिनी शाह

कहानियां
चकरघिन्नी गीतांजलि श्री  
खाना योगेंद्र आहूजा
इतवार नहीं कुणाल सिंह
सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय

विशेष
जिसे तुम सपना कहते हो उसे मैं विकल्प कहता हूं' नामवर सिंह   और राजेन्द्र यादव के बीच बातचीत  

लम्बी कविता
आईना द्रोह राजेन्द्र कुमार

कविताएं
चार कविताए बद्री नारायण
तीन कविताएं अनामिका
पांच कविताएं सविता सिंह
पांच कविताएं कुमार अनुपम
दो कविताएं जाकिर खान

बहस
सहयात्री की टिप्पणी  सुरेन्द्र मोहन
तौलिए उपयोगिता के तराजू पर राधे दुबे
यादों से रची यात्रा' के साथ सहयात्रा रामशरण जोशी

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
किस्से उपर किस्सा राजेश जोशी  

लम्बी कहानी
ऐसा ही...कुछ भी नीलाक्षी सिंह

समीक्षाएं
जीवन के नैरंतर्य का साक्षात्कार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
शब्दों के बीच एक सूखा अश्रु ए. अरविन्दाक्षन
संकटग्रस्त समय का प्रतिरोध अजय वर्मा
स्मृति, इतिहास और आख्यान परमानंद श्रीवास्तव


अंक/18 जुलाई /08
सम्‍पादक : अखि‍लेश


अंक 15
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
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संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
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अंक/18 जुलाई /08

इतवार नहीं
कुणाल सिंह

दफ्तर के लिए सुबह आठ बजे घर से निकलो और लौटते लौटते भी रात के आठ बज ही जाते हैं। मतलब आठ घंटे की नौकरी बजाने के लिए इधर दो और उधर दो घंटे आने जाने में। लेकिन रोज रोज के इस चार घंटे का कोई हिसाब नहीं, गिनती नहीं। ये चार घंटे मेरे खुद के हिस्से से फालतू गये : मेरी जिन्दगी के प्रोविडेण्ट फंड से रोज रोज खुदरा निकल कर खर्च हो जाने वाले, बिना मतलब, यों ही। मुझे सिर्फ आठ घंटे की तनख्वाह मिलनी है। मतलब मैं तब तक नौकरी में उपस्थित नहीं जब तक सुबह के दस बजे अटेन्डेन्स कार्ड पंच न कर दूं और मेरी नौकरी वहीं खत्म हो जाती है जब शाम को छह बजे मैं दुबारे कार्ड पंच करके बाहर आ जाता हूं। दस से छह के बीच नौकरी करने के लिए मैं आठ से आठ तक घर के दृश्य से गायब रहता हूं। दस से छह के बीच अगर मुझे हार्ट अटैक हो जाय, मैं मर जाऊं तो कम्पेनशेसन ग्राउंड पर मेरी पत्नी को नौकरी लग सकती है। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूं कि मेरी मृत्यु इसी बीच हो, न कि आते या लौटते समय लोकल ट्रेन में या सड़क दुर्घटना में आदि। अगर रात आठ के बाद और सुबह आठ से पहले मैं दम तोड़ता हूं तो यह मौत मेरे खुद के भरोसे होगी कि मैंने इतना कमा के रख दिया है कि मेरे बाद मेरी पत्नी को दूसरों का झाड़ू बरतन करने की नौबत न आये या कल्पना कीजिए मेरी एक बेटी हो तो उसकी पढ़ाई लिखाई बदस्तूर चलती रहे बस इतना।
मारे गुस्से के कभी कभी कल्पना करता हूं कि सोमवार से लगा कर शनिवार तक, हफ्ते के छह दिन एक जैसे होते हैं। सुबह साढ़े छह का अलार्म बजना, निबटानादि के बाद नाश्ता, लंच बॉक्स, घर से जल्दी जल्दी निकलना, आठ बत्तीस की कल्याणी फास्ट : कहां तक गिनाऊं! यह सब रोज रोज इतना एक सा है कि अलग से याद नहीं आता। नशे की हालत में रहता हूं। दफ्तर से लौटते हुए खूब इच्छा हो कि कुछ खाना है खाना है लेकिन सुझायी ही नहीं पड़ता कि क्या। तभी लोकल की भीड़ चीरता हुआ बगल से एक मूंगफली वाला गुजरता है तो याद आता है कि मूंगफली ही तो खाने की इच्छा हो रही थी तब से। खरीद कर एक दाना मुंह में डालता हूं तब अहसास होता है कि कितना गलत था। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। चुपचाप एक एक दाना अनिच्छापूर्वक टूंगे जाता हूं। यह भी याद नहीं आता कि अगर अच्छी न लगे तो मूंगफली फेंकी जा सकती है।
लेकिन जिन्दगी मूंगफली का दाना नहीं। आदमी को हर हाल में जीने का ढब बनाये रखना चाहिए। लेकिन कभी कभी तो गुस्सा आ ही जाता है। किस पर, पता नहीं। लौटते समय कभी कभी मन करता है कि चलती ट्रेन से। ऐसा नहीं है कि इतना दुखी हूं कि खुदकशी जैसा कुछ। बस यों ही। पहले ऐसा नहीं सोचता था, लेकिन साल भर पहले दफ्तर के कैशियर देवाशीष बाबू ने खुदकशी कर ली, तब से, पता नहीं, लगता है कि एक रास्ता इधर को भी जाता है जैसा कुछ।
कल्याणी फास्ट कभी रास्ता नहीं बदलती। आठ बत्तीस में उसका कल्याणी और नौ पैतीस चालीस तक सियालदह में होना तय है। बीच के छोटे स्टेशनों, हाल्टों पर वह नहीं रुकती। उन हाल्टों के आधेक कि.मी. इधर उधर उसकी स्पीड कम हो जाय भले, लेकिन ऐन हाल्ट को वह इतनी रफ्तार से रौंदती हुई बढ़ जाती है कि क्या बताऊं मन खुश हो जाता है। ऑफिस टाइम में उन छोटे स्टेशनों, हाल्टों पर भी भीड़ होती है लेकिन उसके लिए हर स्टेशन पर रुक रुक कर बढ़ने वाली तमाम लोकलें हैं। मसलन मैं एक सीनियर प्रूफरीडर हूं, दफ्तर में और भी कई प्रूफरीडर हैं जिनका पे स्केल मुझसे कम है। मैं अकसर गेट बार से लटकता हुआ उन स्टेशनों पर खड़े लोगों के भागते अक्स को देखता हूं और मेरे मुंह से बेसाख्ता कुछ अफसोसिया शब्द निकल जाते हैं : ओह, बिचारे, ये छोटे स्टेशन वाले! ऐसे में हम कल्याणी फास्ट वाले खुद को ज्यादा रुतबे वाले, आम स्टेशन के लोगों से थोड़ा ऊपर का समझते हैं और खुश होते हैं। मसलन वही सीनियर प्रूफरीडर, ज्यादा पे स्केल आदि।
इतवार को दफ्तर की छुट्टी रहती है। इतवार को लेकर मेरी एक फैण्टेसी है। मुझे लगता है, इतवार की देह एकमुश्त होती है, ऊपर से लगा कर नीचे तक एक इकट्ठी; जबकि हफ्ते के दूसरे दिन टुकड़ों में बंटे होते हैं और जब आप एक टुकड़े पर होते हैं, दूसरा टुकड़ा आंखों से ओझल रहता है। मसलन ÷ऑफिस के लिए निकलने से पहले मैं नहा रहा हूं' वाले टुकड़े पर खड़े होकर देखो तो ÷कल्याणी फास्ट के इंतजार में स्टेशन पर टहल रहा हूं' वाला टुकड़ा दृश्य से कतई नहीं दिखता। हर टुकड़ा दूसरे से लगा बझा आपके आगे सरकता जाता है और आप बगैर एक जरा कुनमुनाये हर टुकड़े को स्वीकार (मूल पांडुलिपि में ÷अंगीकार' जैसा प्राचीन शब्द था। इसे ÷स्वीकार' कर दिया। सम्पादक जी कृपया ध्यान दें। सीनियर प्रूफरीडर, ज्यादा पे स्केल) करते जाते हैं। आप नहा चुकने के बाद जैसे ही खाली होते हैं कि एक अदृश्य हाथ आपको एक पर्ची थमा देता है जिस पर लिखा होता है, ÷नाश्ता'। इसी तरह नाश्ते के बाद ÷जल्दी निकलो' वाली पर्ची। आठ बत्तीस पर कल्याणी फास्ट, पौने दस पर सीटीसी बस, दस बजे कार्ड पंच की तमाम पर्चियों से निबटते निबटते जब आप ऑफिस में अपनी कुर्सी पर बैठते हैं तो वही अदृश्य हाथ मेज पर एक साथ कई सारी फाइलें पटक जाता है। शाम तक निबटा दीजियेगा। कल ही प्रेस के लिए छोड़नी है इन्हें। वैसे तो दो रीडिंग हो चुकी है फिर भी मूल पांडुलिपियों से मिलान कर देखिएगा, कहीं सी-कॉपी न छूटी हो। जरा सावधानी से, क्या है कि पिछली कॉपियों में कुछ भूलें चली गयी थीं। और हां, फोलियो पर भी नजर मारते जाइएगा जरा। आदि।
लेकिन इतवार को ऐसा नहीं। अकसर ऐसा होता है कि इतवार की सुबह बिस्तरे से निकलूं और एकबारगी समझ में ही न आये कि आज दिन भर करना क्या है! मतलब इतवार की सुबह सुबह ही आप उस इतवार की शाम तक की देह को देख सकते हैं, एकमुश्त, एक सांस में। मैं अकसर बिस्तरे में तब तक पड़ा रहता हूं जब तक गौरी चाय लेकर न आ जाय। चाय पीकर मैं तरोताजा हो जाता। इतवार इतवार, जब मैं खाली होता हूं प्यार से गौरी को देखता हूं। इतवार इतवार, गौरी के बारे में सोच कर मन कैसा कैसा हो उठता है। मैं हर इतवार सोचता हूं कि बेचारी गौरी के लिए सब दिन एक समान होते हैं। रोज वही काम। कोई छुट्टी नहीं। नो आराम। आदि। मैं हर इतवार सोचता हूं कि कम से कम झाड़ू पोंछा बरतन बासन के लिए किसी को रख लूं। गौरी को थोड़ी राहत हो जाएगी। लेकिन यह भी मेरी एक फैण्टेसी है।

एक इतवार को अचानक किसी तेज आवाज से मेरी आंखें खुल गयीं। देखा, गौरी का चेहरा ठीक मेरे चेहरे के ऊपर छाया हुआ। मेरी समझ में नहीं आया कि क्या हुआ। गौरी हंसी, उठी, चली, रुकी, मुड़ी, हंसी और मुझे पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। मैंने झपटना चाहा लेकिन वह मांगुर मछली की तरह फिसलते हुए भाग गयी। मैंने घड़ी देखी, पौने पांच। पागल हो गयी है क्या! इतनी सुबह तो मैं हफ्ते के दूसरे दिनों भी नहीं जागता। मारे गुस्से के मेरे दिमाग के सारे तंतु झनझना रहे थे। नींद पूरी तरह गायब हो चुकी थी। दुबारे सोने की कोशिश बेकार थी। मैंने औरतों को दी जाने वाली दो लोकप्रिय गालियां गौरी को दीं और बिस्तरे से निकल आया। अभी चारों ओर अलाली ही थी। मुझे एकाएक यह ख्याल आया कि अंधेरे का फायदा उठा कर गौरी कहीं जा छुपी है। मैंने उसे ललकारा। हिम्मत है तो सामने आओ। कायर। भगोड़ी। दुश्मन। कहीं से उसकी हंसी सुनाई दी। हंसी पर अंधेरे का पर्दा था। सूर्योदय तक मैं उसे खोजता रहा। इधर से उधर। सूरज की पहली किरण में वह ऐन मेरे सामने दिखायी दी। अपने आपको मेरे हवाले कर दिया : लो, दो चार मुक्के मार लो। हिसाब खत्म करो। जाती हूं। ढेर सारे काम निबटाने हैं। बाप रे।
अमोल प्रकाशन समूह के एक साहित्यिक पाक्षिक में मैं सीनियर प्रूफरीडर हूं। सीनियर कम्पोजीटर सुभाष दा के टाइप किये हुए मैटर सीधे मेरी डेस्क पर आते हैं। इतने वर्षों में सुभाष दा और मेरी ट्यूनिंग इतनी अच्छी हो गयी है कि मैं धड़ल्ले से शब्द दर शब्द, पंक्ति दर पंक्ति फलांगता जाता हूं और ऐन वहीं जाकर मेरी कलम रुकती है जहां सुभाष दा से गलती की अपेक्षा होती और मजे की बात, सुभाष दा ने कभी मुझे निराश नहीं किया। मसलन हमेशा उन्होंने ÷आशीर्वाद' को ÷आर्शीवाद' ही टाइप किया और ÷संवेदना' को ÷संवदेना'। कल्याणी फास्ट की स्पीड से गुजरो तो ये गलत टाइप हुए शब्द पहले से दिमाग के हार्डडिस्क में फीड सही शब्दों की झलक देकर फिसल जाते हैं। सुभाष दा हंसते हैं, खांसते हैं। (करबी दी, ''ऐ सुभाष, क्यों इतना बीड़ी पीता है रे! मर जायगा, कह देती हूं।'') उनकी उंगलियां खटाखट ÷की बोर्ड' पर फिसलती जाती हैं। किसी शब्द के लिए सही ÷की' पर उंगली जाने जाने को होती है कि बीच में मेरी झलकी दिख जाती होगी और हंसते हुए खांसते हुए वे जान बूझ कर उंगली का रुख बदल देते होंगे। इस तरह सही पर जाकर थम जाने वाले इस खेल को थोड़ा और जी लेने की मोहलत मिल जाती है। उसकी उम्र एक और प्रूफरीडिंग तक बढ़ जाती है। अकसर मेरा और सुभाष दा का यह गुप्त खेल मैटर प्रेस में छोड़ने की डेडलाइन तक चलता रहता है। उस नीमअंधेरे में गौरी कई बार मेरे हाथ आते आते बची। अंधेरे का फायदा उठा कर मैं उसे अपने हाथों से फिसला देता रहा। अंत में सूर्योदय की डेडलाइन ने लुकाछिपी का यह खेल खत्म कर दिया। गौरी को ढेर सारे काम निबटाने थे। (ऊपर के पैरे की अंतिम पंक्तियां यहां शिफ्ट करेंᄉ सीनियर प्रूफरीडर।) वह रसोई में चली गयी। मैं ओसारे में लगी चौकी पर बैठ गया।
बचपन से ही इतवार के दिन सुबह सुबह कोई खुशी की बात हो गयी हो जैसे, ऐसा लगता आया है। रसोई में स्टोव बहुत शोर करता था। मैंने गौरी से पूछा, ''क्या बना रही हो!'' जैसे ही मैंने पूछा, कुकर ने जोर से सीटी बजा दी। कुकर की सीटी में गौरी तक मेरा प्रश्न नहीं पहुंच पाया। वह बेखबर अपना काम करती रही। मुझे बुरा लगा कि उसने मुझे नहीं सुना। थोड़ी देर मैं चुपचाप बैठा रहा कि क्या पता वह अचानक कुछ बोल बैठे। मसलन क्या हुआ, चुप क्यों बैठे हो, गुस्सा हो क्या आदि। लेकिन वह अपना काम करती रही। उसे काम में बझा देख मैं गुस्सा गया। (दरअसल ÷चुप क्यों बैठे हो गुस्सा हो क्या' वाला वाक्य जब जेहन में कौंधा, उसी के साथ ÷गुस्सा' वाली फीलिंग भी आ गयी और गुस्से में चुप होकर बैठ जाना मुझे अच्छा लगा। इसके बाद स्क्रिप्ट में होना यह था कि गौरी आकर मुझे मनाये। ÷चुप क्यों... गुस्सा हो क्या' के बाद ÷मान जाओ न, प्लीज!' जैसा कोई वाक्य अपने टेक्स्ट को सुंदर और सरस बनाता है। लेकिन गौरी काम करती रही, काम करती रही।) खाली काम करती रहती है। बहुत बिजी बनती है। मैंने तेज आवाज में कहा, ''तुम अपने आपको बहुत लगाती हो न?'' गौरी ने गरदन तिरछी कर मुझे देखा। गौरी मुस्करायी। गौरी ने मुझे आंख मारी। मेरा पारा गरम हो गया। मैंने कहा, ''कुटनी।'' गौरी ने एक बार और आंख मारी। मैंने मुंह घुमा लिया।

दो कमरों का घर था। फिर बिना छत वाला लम्बा ओसारा और दो सीढ़ी उतर कर खुला आंगन। आंगन में पीपल का एक पेड़ था। पुराना और विकराल। उसका तना मोटा और गांठदार था। एक तरफ जरा सा झुका हुआ। उसका हाव भाव कुछ ऐसा था मानो वह बड़ी नजाकत के साथ झुक कर आदाब बजा रहा हो। पेड़ आंगन के बीचोंबीच था। पेड़ के चारों ओर गोलाई में कच्चे फर्श को छोड़ कर शेष आंगन में काले पत्थरों की ईंटें बिछी थीं। सुबह सुबह गौरी आंगन में बिखरे सूखे पत्तों को बुहार कर गोलाई की मिट्टी में डाल देती थी। आंगन पार कर नहानघर और पाखाना था। दोनों सटे सटे थे। दोनों के ऊपर खप्परों की एक ही छाजन थी। दोनों की दीवारें बिना पलस्तर की थीं। नहानघर के बाहर आंगन में थोड़ा बायें एक हैण्डपम्प गड़ा था। वहां कपड़ों को सुखाने के लिए लोहे का एक तार टंगा था। तार का एक सिरा पेड़ में ठुके कील से लगा था और दूसरा नहानघर के सामने से होता हुआ अहाते तक चला जाता था। हैण्डपम्प के पास से जल की समुचित निकासी के लिए एक मोरी अहाते में छेद करती हुई बिला जाती थी।
रसोईघर ओसारे में ही था : एक तरफ खप्परों की छाजन तले। शेष ओसारा ऊपर और सामने से खुला था। घर में डायनिंग टेबल नहीं था। खाना पीना आदि ओसारे में लगी चौकी पर ही हो जाता था जिस पर अभी बैठा बैठा मैं झपकियां लेने लगा था। अचानक कान में सुरसुरी हुई तो अकबका कर जगा। लगा कोई चींटी घुस पड़ रही है। इतने में पीछे से हंसने की आवाज आयी। इस औरत ने मेरी नाक में दम कर रखा है। मैंने एक झटके में उसे पकड़ना चाहा। वह रसोई में भाग गयी। मैं चौकी से उतर कर उसका पीछा करने में अलसा गया। मुझे फिर से नींद आ रही थी। गौरी ने मुझे नहाने के लिए कहा। मैं चुप रहा। गौरी ने एक बार और कहा कि जाकर नहा लूं। मैंने मन ही मन फैसला किया कि उसके तीन बार कहने पर ही नहाने जाऊंगा। मेरे पास एक साबुत दिन था और बमुश्किल अभी आठ बजे थे। गर्मी की सुबह थी। लमछर और गजब की फुर्तीली। मक्खन निकाल लिए गये दूध की तरह छरहरी। ओसारे से उतरने वाली सीढ़ियों तक धूप आ चुकी थी। थोड़ी देर में पूरा ओसारा उसकी गिरफ्त में आ जाएगा।
मेरे नहाने की बात भूल कर गौरी चाय लिए आयी। उसके चहरे पर अब भी शरारतों की खुरचनें जमा थीं। वह मुस्करा रही थी। मैं उसे मुस्कराते हुए नहीं देखना चाहता था। मैंने मुंह फेर लिया। चौकी पर चाय का ग्लास रखते हुए वह मेरा खून जलाने के लिए वहीं बैठ गयी। मैं अपने मुंह फेरने को लेकर अड़ा रहा। लगातार दूसरी तरफ देखता रहा। मुझे लगा, मेरी आंखों को जल्द ही अपने देखने के लिए किसी ठोस चीज की तलाश कर लेनी चाहिए। कुछ नहीं मिला तो मैंने कल्पना की कि एक बिल्ली है जिसे मुझे देखना है। मैं पूरी संजीदगी से गौरी पर जाहिर करना चाहता था कि मैं अहाते पर दबे पांव चल रही एक बिल्ली देख रहा हूं। गौरी काल्पनिक बिल्ली वाली बात समझ गयी। हद की यह एक बात हुई कि गौरी ने आंगन में उतर कर एक झूठमूठ का ढेला उठा बिल्ली को दे मारा। झूठमूठ की बिल्ली अहाते पर से झूठमूठ कूद कर गायब हो गयी। अब मेरे देखने का कोई प्रत्यक्ष बहाना नहीं रह गया। गौरी चली गयी। मैं इत्मीनान की सांस लेकर चाय पीने लगा।
चाय पीने के बाद भी मैं बैठा रहा। इस बीच गौरी किसी काम से बाहर आयी तो मैंने सोचा मुझसे नहा लेने को कहेगी। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह मेरे नहाने की बात एकदम से भूल गयी लगती थी, जबकि मैं सोचता था कि जल्द अज जल्द उसका तीन बार नहाने के लिए कहना पूरा हो और मैं नहा लूं। दो बार वह पहले ही कह चुकी थी, मैं चाहता था कि वह मेरे सामने आकर या चाहे तो पीछे से छुप कर एक बार और कह दे। मसलन दो रीडिंग हो गयी हो और फाइनल रीडिंग बाकी है तो मैटर प्रेस के लिए कैसे रीलीज किया जाय, देरी हो रही है, डेडलाइन, ओह आदि। मुझे शक है कि वह भांप चुकी है, मैं इस तरह की कोई प्रतिज्ञा किये बैठा हूं, इसलिए वह मुझे छका रही है।
धूप अब लम्बे कदमों से ओसारे की सीढ़ियां फलांग रही थी। उसकी आंच से ठंडा ओसारा भरता जा रहा था। गौरी रसोई के काम निबटाने को होगी। थोड़ी देर में कड़ाही कुकर तसली आदि बरतनों को धोने के लिए हैण्डपम्प पर रख आयेगी। उनमें पानी डाल देगी ताकि धूप में बरतन कड़े न हो जाएं। मुझे पसीना आ रहा था। मैंने बनियान निकाल दी थी। दीवार से टेक लगा ली थी। बार बार उबासी ले रहा था। बार बार उबासी लेने की वजह से मेरी आंखों में पानी भर आया था। पानी के गर्म झिलमिल में सामने का खुला आंगन धूप में चमचमा रहा था।
सहसा मुझे लगा कि दुनिया में मैं एक बेकार आदमी हूं। (सुभाष दा की उंगलियां की बोर्ड पर खटाखट फिसलीं : ÷मैं एक बेकार आदमी हूं।' ब्जतस+ैत्रैंअम सब अपना अपना काम कर रहे हैं और मैं फालतू बैठा हूं। इतना सोचते ही मैंने नींद की बची खुची खुमारी से एक झटके में खुद को बरी किया। एक महान जाग से फट पड़ने की हद तक मैं भर गया। उबल गया। फौरन चौकी से उतर कर खड़ा हो गया। तन गया। रसोई की तरफ देखते हुए चिल्ला कर कहा, ÷÷तुम तीन बार कहो या न कहो मुझे परवा नहीं। मेरे मन में जो नहाने की बात एक बार घर कर गयी तो समझो कर गयी! ैंअम''
गौरी तुरंत आंचल से हाथ पोंछती हुई रसोई से बाहर निकल आयी। आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी। वह मुस्कराते हुए आयी थी, मुस्कराते हुए खड़ी रही। इस बार मैं बजिद उसे मुस्कराता हुआ देखता रहा। गहरे अड़ियलपने से मेरा चेहरा तमतमा रहा था, आंखें छोटी हो आयी थीं, दृष्टि जल रही थी। मेरे इस तरह देखने से वह लजा गयी। (उसके लजाने का एकमात्रा कारण दिन के चौचक उजाले में ÷पति' द्वारा घूर घूर कर देखा जाना ही था, देखने के पीछे के दृढ़ संकल्प की उसे कोई भनक भी न थी, हद है!) वह वहां से हट गयी। मेरे लिए अंगोछा और साबुन की बट्टी लेती आयी। किसी विजेता की तरह पैरों को बहुत गहरे अकड़ाते ओसारे से उतर कर मैं आंगन में आ गया। नहानघर तक आया। नहानघर का दरवाजा खोला और अंदर हो लिया। अंदर ठंडा अंधेरा था। सुबह से नहानघर का उपयोग नहीं हुआ था। चहबच्चे का पानी स्थिर था। फर्श एकदम सूखा। मुझे याद आया अगर मैं नहाऊंगा तो फर्श गीला हो जाएगा। मैं चुक्केमुक्के बैठ गया। उंगली से फर्श को छुआ। उंगली ने सूखे फर्श पर पसीने की एक छोटी सी दुबली रेखा खींच दी। फर्श के रोयें खड़े हो गये। फर्श की आंखें मुंदने लगीं। पसीने की रेखा के इर्दगिर्द फर्श की कुंवारी देह से खून की बिन्दियां रिसने लगीं। फर्श को संभल जाने की मोहलत देते हुए मैं उठ कर बाहर चला आया। पीछे मुड़ कर देखा, फर्श ने कृतज्ञता में आंखें झुका ली थीं। मुझसे बुदबुदा कर कहा, थैंक यू!
धूप में आंगन तपता था। मैं नंगे पांव था। ज्यादा देर खड़ा रहना मुश्किल। अंगोछे को तार पर टांग दिया। हैण्डपम्प चला कर पानी भरने लगा। आधी बाल्टी भर कर यों ही पैरों पर गिरा लिया। पैरों को हैण्डपम्प के शुरुआती पानी की गुनगुनी ठंडक भली लगी। बाल्टी दुबारा भर कर वहीं बैठ नहाने लगा। इस बीच गौरी बरतन रखने आयी। बरतन रख कर बाल्टी से पानी छलका कर हाथ धोने लगी। वह मुस्करा रही थी। मैंने सिर पीट लिया कि इसका क्या करूं। वह साबुन लेकर ऐन मेरे पीछे बैठ गयी। मेरी पीठ में साबुन लगाने लगी। मैंने एक लोटा पानी अपने सिर पर इस ढंग से फेंका कि गौरी भीग जाए। तिस पर भी वह गुस्साने की बजाय हंसने लगी। मैंने चीख कर कहा, ''भागो यहां से।'' वह गिलहरी की तरह छिटक गयी। जाते हुए पेड़ के पास रुकी। मैंने देखा कि अब क्या है! वह जीभ बिरा रही थी। मुझे रोना आ रहा था।
नहाते नहाते मेरी जेहन में एक वाक्य कौंधा कि अब नहीं नहाना चाहिए। (खटाखट : ÷अब नहीं नहाना चाहिए।' ैंअम) देह पोंछने के लिए मैंने तार से अंगोछा खींचा। तार झनझना उठा। उस पर बैठी एक गौरैया उड़ गयी। अंगोछा धूप में गरम और जरा कड़ा हो गया था। मैंने उसे पानी से लबालब भरी अपनी देह से सटाया तो वह जरा सिकुड़ गया, जैसे शरमा रहा हो : अयहय! कपड़े अलग करने के बाद मैंने अंगोछे को लपेट लिया। साबुन की बट्टी लेकर मैं ओसारे की तरफ आने लगा। धूप में तपे आंगन के फर्श पर मेरे पीछे पानी के पांव बनने लगे। ओसारे में आकर मैं मुड़ा। पानी के पांवों को देखा। दूर के पांव गायब हो गये थे। ओसारे में भी चौकी तक धूप आ गयी थी। मैं कमरे में आ गया। कमरा ठंडा और बाहर की अपेक्षा अंधेरा था। गौरी खिड़की पर खड़ी थी। मुझे देखते ही जल्दी से बनियान और लुंगी लेती आयी।
नहा लेने से मैं तरोताजा महसूस कर रहा था। ठीक से नहीं पोंछे जाने से देह थोड़ी सी गीली थी मानो अभी फर्स्ट रीडिंग ही हुई हो। पहनी हुई बनियान पर जगह जगह पानी के धब्बे थे। गौरी अंगोछा और साबुन की बट्टी लेकर नहाने चली गयी। मैं कमरे में अकेला छूट गया। (ैमम बवचल : यहां एक पैरा कम्पोज होने से रह गया है। वैसे कहानी की मूल थीम से यह हट कर है तो सम्पादक जी से सलाह कर और लेखक से अनुमति लेकर इसे कमसमजम किया जा सकता है। पैरा : मुझे पता था कि मेरे नहाने के बाद गौरी भी साबुन की बट्टी लेकर नहाने जाएगी, फिर भी नहा कर आते समय साबुन की बट्टी अपने साथ कमरे में लेते आना मेरी आदत में शुमार था। मेरे नहा कर आने और गौरी के नहाने जाने के बीच के चार पांच मिनट के अंतराल में साबुन का पति पत्नी में से किसी के भी संरक्षण में न होना साबुन की फिजूलखर्ची है।)
यह इत्तेफाक की बात थी कि गौरी जब नहा कर आयी तो मैं भी खिड़की पर खड़ा था। खिड़की के सामने एक मैदान था। मैदान और खिड़की के बीच की जमीन थोड़ी ढलुई थी। ढलुई जमीन घर की छाया में ठंडी थी। इस पालतू जमीन में नाना वनस्पतियां उग आयी थीं। फिर जमीन घुटना भर ऊंचा उठ गयी थी और उसके बाद वह मैदान : पीला और खुला। खुले मैदान पर धूप का करिश्मा था। आदमी की नजरें धोखा खा जाती थीं। मेरी आंखें दूर दृश्य के सुलझेपन में गुम थीं। धूप का आकाश, मैदान, पेड़, मरीचिका, उदासी, चुप्पी और हवा। और इतवार की दोपहर। मैं कुछ भी अलग अलग नहीं देख रहा था। मैं सब कुछ एक साथ देख रहा था। कि तभी गौरी आयी।
मैंने पूछा, नहा लिया! हालांकि यह साक्षात दिख रहा था। वह न जाने क्या था जिसने मुझसे यह कहलवा लिया था। गौरी ने मुझे खिड़की पर खड़ा देख लिया था। ऐन थोड़ी देर पहले वह जो देख रही थी, उसे देखते हुए। उसके देखे की जासूसी करते हुए। उसके रहस्य को उससे छुप कर खोलने की कोशिश करते हुए। धूप में कुछ भी नहीं छुपता। वह हमारी सारी गहराइयां उतार फेंकती है, जिन्हें पानी के आवरण में हम छुपाने की कोशिश करते हैं। गौरी हंसी। मैं सिटपिटा गया। मैं उसे छूना चाहता था। अपने स्पर्श का भुलावा देना चाहता था। वह छिटक कर निकल गयी। मैं बिस्तरे पर निढाल पड़ गया।
मुझे बार बार लग रहा था कि मैं गौरी की निगाह में गिर गया हूं। मैं बहुत ओछा किस्म का इनसान हूं। मुझे याद आया, शादी के कुछ ही दिनों बाद किसी छोटी सी बात पर नाराज होकर मैंने गौरी को एक चांटा मार दिया था। (मण्हण् चांटा रसीद कर दिया था।) इसके अलावा भी बहुत-सी बातें। इस वक्त यह सारी बातें मेरे दिमाग में नाचने लगीं। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मैं एक नालायक पति हूं। मसलन मैंने शादी के बाद से गौरी को अपनी कमाई से एक अदद साड़ी तक लाकर नहीं दी। माना कि इस घर में मैं इकलौता कमाऊ आदमी हूं और जो कुछ भी होता है मेरी ही कमाई से, फिर भी एक पत्नी को इस बात की बड़ी चाह होती है कि उसका पति उसे शादी की वर्षगांठ पर एक साड़ी लाकर दे। तिस पर भी गौरी ने कभी तिरछी निगाह से नहीं देखा। वह दुख में सुख में सदैव हंसती रहती है। आदि। निश्चित तौर पर मैं एक नालायक पति हूं। नालायक नालायक। मैं बार बार इस शब्द को दुहराता रहा। मेरे दिमाग में इस शब्द की बनावट और लिखावट साफ साफ अंकित हो गयी। (सुभाष दा की उंगलियां, खटाखट : ना-ला-य-क।) बार बार दुहराते रहने से थोड़ी देर में ÷नालायक' मुझे एक मसखरा शब्द प्रतीत होने लगा। मुझे हंसी आने लगी। (सुभाष दा खांसने लगे।)
फिर मैंने नये सिरे से कोशिश की, कि इस शब्द को परे ठेल कर गौरी के प्रति अपनी तमाम क्रूरताओं का विश्लेषण करूं। हां तो उदाहरण के लिए आज सुबह झकझोर कर उसने मुझे जगा दिया... नालायक... महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि उसने जगा दिया... नालायक... महत्त्वपूर्ण यह है कि वह हंस रही थी... नालायक... गौर कीजिये यह कोई ऐसी वैसी बात नहीं... जैसा कि रिवाज है वह अपना घर बार... आत्मीय स्वजन... बंधु-बांधव सबको छोड़ कर यहां रहने आयी... नालायक... किसके भरोसे?... मैं पूछता हूं किसके भरोसे?... तो गौर करना चाहिए... नालायक... उंह, गौर करना चाहिए कि... अच्छा आप ही बताएं कि क्या एक पत्नी अपने पति के साथ एक अदना सा मजाक भी नहीं कर सकती?... नालायक... इसमें गुस्साने की... उस पर चीखने चिल्लाने की क्या बात है?... मैं पूछता हूं क्या बात है?... नालायक...।
÷नालायक' शब्द से मेरा पीछा नहीं छूट रहा था। इस पिद्दी शब्द पर आकर मैं हैंग हो गया था। ठीक से विचार विमर्श नहीं कर पा रहा था। मैंने जोर से अपना सिर झटक लिया। एक झटके के साथ अचानक कल्याणी फास्ट रुक जाती है तो भीड़ से ÷क्या हुआ क्या हुआ' का शोर उठने लगता है। मैं ही नहीं, गेट पर लटके पांचों लोग झांक कर देखते हैं : रेड सिग्नल।
''क्या हुआ?'' मेरे पीछे खड़े मधुकर दा पूछते हैं।
''सिस्टम हैंग कर गया लगता है।'' मैं हंसता हूं। मधुकर दा नहीं हंसते।
इतने में रेड सिग्नल होने के बावजूद प्लेटफॉर्म सिग्नल मिल जाता है और कल्याणी फास्ट सामने आधे कि.मी. की दूरी पर नजर आते हाल्ट तक के लिए रेंगने लगती है। प्लेटफॉर्म सिग्नल तभी मिलता है जब लाइन में कोई गड़बड़ी हो और कम से कम आधे घंटे तक उसके ठीकठाक होने की कोई उम्मीद नहीं। मधुकर दा नाटे कद के होने के कारण प्लेटफॉर्म सिग्नल नहीं देख सके। गाड़ी को रेंगते देख पूछे, ''क्या हुआ?''
÷÷प्लेटफॉर्म सिग्नल। मतलब एकाएक लोडशेडिंग हो जाय तो दस पांच मिनटों के लिए जैसे कम्प्यूटर यूपीएस पर चलता है न!... या फिर समझिए सिस्टम सेफ मोड में चल रहा है।'' मैं फिर से हंसता हूं। मधुकर दा फिर से नहीं हंसते। कल्याणी में ही रहते हैं, चांदनी चौक में एक दैनिक में काम करते हैं। उनकी नौकरी अलग अलग शिफ्टों में होती है। जब दस बजे वाली शिफ्ट हो, हम साथ ही जाते हैं। हाल ही में उनके यहां इतवार की छुट्टी खत्म कर दी गयी थी। तब से मधुकर दा नहीं हंसते। हफ्ते में सातों दिन काम पर जाते हैं। बिना हंसे।
''कुछ पता चला?'' मधुकर दा पूछते हैं।
''पता नहीं, शायद लाइन क्लियर नहीं इसलिए।'' मैं कहता हूं।
''नहीं नहीं, मैं तुम्हारे दफ्तर की बात कर रहा हूं। सुनो, अखबार में काम करता हूं इसलिए पता है। खबर पक्की है। आज नहीं तो कल तुम्हारे यहां भी। देख लेना।'' मेरे ठीक पीछे खड़े मधुकर दा अपनी गरदन उचका कर मेरे कान में लगभग फुसफुसाते हुए कहते हैं। गाड़ी अब तक प्लेटफॉर्म पर पहुंच चुकी है। कुछ लोग उतर कर खड़े हो जाते हैं। थोड़ी जगह मिल जाती है तो हम भीतर हो लेते हैं। एल.आई.सी. में काम करने वाले एक इटैलिक आदमी (दरअसल उसके हाथ पांव की हड्डियां कुपोषण से टेढ़ी पड़ गयी थीं, इस वजह से आपसी बातचीत में हम उसे ÷इटैलिक' कहते) ने बैग से अपना लंच बॉक्स निकाला और उस पर उंगलियों में पहने ÷गुस्सा कंट्रोल छल्ले' से तबला जैसा बजाने लगा। थोड़ी देर बाद उसके पीछे खड़े नाटे कद के एक आदमी ने बायां हाथ दायीं कांख में दबा दबा कर एक अजीबोगरीब आवाज निकालनी शुरू कर दी। खिड़की के पास बोल्ड आदमी (गहरे वर्ण का होने की वजह से बोल्ड) को और कुछ नहीं सूझा तो ट्रेन की इस्पाती दीवार ही पीट पीट कर ताल मिलाने लगा। धीरे धीरे पूरे डब्बे में बात फैल गयी। सभी एक सुरताल में नाचने गाने लगे। कोई चुटकी बजा रहा है, कोई ताली, कोई सीटी। कोई फुटबोर्ड पर पैर पटक रहा है तो कोई ऊपर लगे हैंगरों को एक दूसरे से टकरा रहा है। सुन भाई, सुन बंदे! लगवा दिया लगवा दिया, कल्याणी फास्ट ने आज लेटकमिंग लगवा दिया। ऐ मुच्छड़ मेरे दोस्त, ऐ साथी मेरे गंजे : संडे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे। खुद से लेट होने की हिम्मत नहीं पड़ती, टाइम पे पहुंच जाते हैं गरमी हो या सर्दी। आज यह सपना भी पूरा हुआ। ऐ साफ सुथरे भाई, ऐ भाई मेरे गंदे : संडे हो मंडे...।

मेरा घर कल्याणी में है और दफ्तर कोलकाता में। आस पड़ोस के जितने भी नौकरीपेशा लोग, सबका दफ्तर कोलकाता में। कोई पूछता है कि कहां जा रहे हो तो दफ्तर वाली बात के विस्तार में न जाकर कहता हूं, कोलकाता जा रहा हूं। पूछने वाला कोलकाता मतलब दफ्तर समझ जाता है। प्रेस कॉपी में द