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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/18 सम्‍पादकीय


इतिहास
गांधी का सर्वोत्तम उपवास और अहिंसा की असहायता, सुधीर चंन्द्र

शताब्दी
मोहब्बत के अवामी सरोकार शकील सिद्दीकी

लेख
औपनिवेशिक उत्तर भारत में घरेलू क्षेत्रा, हिन्दू पहचान और स्त्री   यौनिकता चारु गुप्ता
लैंगिक राजनीति तथा महाभारत में मातृदेवियां शालिनी शाह

कहानियां
चकरघिन्नी गीतांजलि श्री  
खाना योगेंद्र आहूजा
इतवार नहीं कुणाल सिंह
सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय

विशेष
जिसे तुम सपना कहते हो उसे मैं विकल्प कहता हूं' नामवर सिंह   और राजेन्द्र यादव के बीच बातचीत  

लम्बी कविता
आईना द्रोह राजेन्द्र कुमार

कविताएं
चार कविताए बद्री नारायण
तीन कविताएं अनामिका
पांच कविताएं सविता सिंह
पांच कविताएं कुमार अनुपम
दो कविताएं जाकिर खान

बहस
सहयात्री की टिप्पणी  सुरेन्द्र मोहन
तौलिए उपयोगिता के तराजू पर राधे दुबे
यादों से रची यात्रा' के साथ सहयात्रा रामशरण जोशी

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
किस्से उपर किस्सा राजेश जोशी  

लम्बी कहानी
ऐसा ही...कुछ भी नीलाक्षी सिंह

समीक्षाएं
जीवन के नैरंतर्य का साक्षात्कार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
शब्दों के बीच एक सूखा अश्रु ए. अरविन्दाक्षन
संकटग्रस्त समय का प्रतिरोध अजय वर्मा
स्मृति, इतिहास और आख्यान परमानंद श्रीवास्तव


अंक/18 जुलाई /08
सम्‍पादक : अखि‍लेश


अंक 15
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
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अंक/18 जुलाई /08

कबीर और आधुनिकता की भारतीय परिकल्पना
राजकुमार

कबीर पुरुषोत्तम अग्रवाल के शोध का विषय रहे हैं और कबीर पर उनके कुछ लेख भी प्रकाशित हुए थे। वस्तुतः कबीर पर उनकी एक पूरी किताब लिखने की योजना है। वह किताब तो अभी नहीं आयी लेकिन नेशनल बुक ट्रस्ट से कबीर : साखी और सबद में उन्होंने कबीर की कविताओं पर लगभग चालीस पृष्ठों की भूमिका लिखी है। यह भूमिका महत्वपूर्ण है और लगता है कि अंततः लेखक ने वह परिप्रेक्ष्य खोज लिया है, जहां से कबीर की कविताओं को पढ़ा जाना चाहिए। परिप्रेक्ष्य का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक/योरोप केन्द्रित ज्ञान मीमांसा के प्रभाव में हम इस कदर कैद हैं कि भारतीय साहित्य, समाज, संस्कृति, इतिहास का अध्ययन आज भी प्रायः योरोप के निकष पर करते हैं। संगठित धर्म पावनता और आश्वस्ति देने के बदले तर्क बुद्धि हर लेता था। पश्चिम में धर्म को लेकर इस कदर मारकाट हुई कि समाज चलाना मुश्किल हो गया। इस संकट से समाज को उबारने के क्रम में तर्क बुद्धि ने एक ऐसे राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की जिसमें धर्म की कोई भूमिका न रही। इस तरह सेकुलर स्टेट का जन्म हुआ और तर्क बुद्धि संगठित धर्म के चुंगल से मुक्त हो गयी। संगठित धर्म से मुक्त होने की झोंक में तर्क बुद्धि ने उस अध्यात्म की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया जिसे मार्क्स ने मनुष्य की प्रजातिसार का अंग माना था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि संगठित धर्म से मुक्त हुई तर्क बुद्धि बहुत जल्दी इंस्ट्रूमेन्टल हो गयी, घोषित आदर्श धरे के धरे रह गये। यह फंकशनल या परफार्मेटिव तर्क बुद्धि पश्चिमी मनुष्य के निहित स्वार्थ की पूर्ति का साधन बन कर रह गयी, जिसने अंततः समानता या बंधुत्व के बजाय वर्चस्व और प्रभुत्व की मानसिकता को जन्म दिया।
गांधी का सोचना था कि अध्यात्म या रागात्मक ट्रांसेन्डेन्स के बिना तर्क बुद्धि पतित होने के लिए अभिशप्त है। गांधी ने पहले तो तर्क बुद्धि की सीमाएं बतायीं। इस बात पर बराबर जोर दिया कि विज्ञान द्वारा आविष्कृत ज्ञान की भूमिका मनुष्य जीवन के एक सीमित दायरे तक सीमित है। भारतीय परम्परा के परिप्रेक्ष्य में गांधी ने सत्य की प्रकृति को रागात्मक और काव्यात्मक कहा होगा।
यदि सत्य की प्रकृति रागात्मक काव्यात्मक है तो कबीर, प्रारम्भिक आधुनिकता के दौर में, इस परम्परा के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं। कबीर के आधुनिक आलोचकों को यह रागात्मक काव्यात्मक पक्ष प्रायः रास नहीं आया लेकिन सामाजिक धार्मिक आलोचना वाले पक्ष को उन्होंने जरूर पसंद किया। यानी आधुनिकता के विमर्श में कबीर जहां तक फिट बैठते थे, वहीं तक काम के थे। इस सांचे से बाहर पड़ने वाले कबीर को कायदे से समझने की जहमत ही नहीं उठायी गयी। कबीर की धार्मिक सामाजिक आलोचना और सहज साधना को पूर्णतया पृथक और असम्बद्ध टुकड़ों में बांट दिया गया। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस तरह के आलोचकों की खबर लेते हुए लिखा है; ''ऐसे लोग अपना मतलब निकालने के लिए कबीर या किसी भी कवि की कविता काया को अपने अपने छोटे छोटे चीथड़ों के नाप से काटने में लग जाते हैं।'' इसके आगे उन्होंने लिखा है कि ''कबीर की कविता को समग्रता में देखे तो हमें एक जिज्ञासु, प्रखर करुणा भरे मनुष्य तथा एक संवेदनशील, विचारवान कवि का परिचय प्राप्त होता है।'' लेखक के चिन्तन का सबसे मूल्यावन बिन्दु वह है जहां वह कबीर की धर्म समीक्षा और उनके द्वारा सुझायी गयी वैकल्पिक विधि धर्मेतर अध्यात्म की चर्चा करता है। सम्भवतः यह कबीर विषयक चिन्तन और भारतीय परम्परा के अध्ययन में एक नया प्रस्थान है, जिसके सहारे हम आधुनिकता की भारतीय अवधारणा को चिन्हित कर सकते हैं। लेकिन इस बात को आगे बढ़ाने से पहले आइये देखें कि कबीर की धर्म विषयक समीक्षा की मूलभूत विशेषता क्या है।
सामान्य ज्ञान की तरह प्रचलित समझ यह है कि कबीर मूलतः समाज सुधारक थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस ÷समझ' को खारिज करते हुए लिखा है कि उनकी धर्म समीक्षा केवल कर्मकांड या रीति रिवाज की आलोचना मात्रा तक सीमित न होकर धर्म मात्रा की मूलगामी समीक्षा है। इस मूलगामी समीक्षा का सबसे मूल्यवान पक्ष यह है कि कबीर मनुष्य की मूलभूत आध्यात्मिक पिपासा और वेदना की उपेक्षा नहीं करते। उनकी कविता इस वेदना को संजोने के लिए वैकल्पिक विधि का संकेत देती है। वह पुराने धर्म के स्थान पर नये धर्म के सामने समर्पण कर देने की आसान लेकिन अंधी गली में फंसने के बजाय धर्मेतर अध्यात्म की उस दुहेली (कठिन) राह पर चलने की, धर्म मात्रा का विकल्प खोजने की, चुनौती स्वीकार करती है। पश्चिम की विशेष परिस्थितियों में उपजा सेकुलरिज्म नामक आजमाया हुआ विकल्प पहले से मौजूद था। इसी नुस्खे के आधार पर कबीर की धर्म समाज विषयक आलोचना को तो उपयोगी पाया गया था लेकिन चूंकि अध्यात्म इस चौखटे में फिट नहीं बैठता था, इसलिए उसकी उपेक्षा कर दी गयी थी। लेकिन पुरुषोत्तम अग्रवाल इस बात पर जोर देते हैं कि संगठित धर्म का विकल्प पश्चिमी आधुनिकता नहीं हो सकती। पश्चिम में भी आधुनिकता धर्म का विकल्प प्रस्तुत करने में असफल साबित हुई है, भारत में तो उसके सफल होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। लिखते हैं; संगठित धर्म ऐसा समग्र आख्यान है जिसका विकल्प सहज आध्यात्मिकता को स्वीकार किये बिना नहीं खोजा जा सकता। लेखक ने इस बात पर बल दिया है कि पावनता और विवेकशीलता मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा है। धर्म पावनता देता है लेकिन विवेकशीलता हर लेता है। आधुनिकता विवेकशीलता देती है लेकिन पावनता के महत्व को नजरंदाज कर देती है। आधुनिकता से प्रेरित ''धर्म के बहुत से आलोचक भी यही काम करते हैं। धर्म की आलोचना ऐसे ढंग से करते हैं जैसे आध्यात्मिक पिपासा, पावनता की लालसा कोई फालतू चीज हो। दूसरी ओर धर्म के समग्र आख्यान का जो विकल्प कबीर जैसे साधक सुझाते हैं, वह इसलिए मूलगामी है कि उसमें श्रम, प्रेम और अध्यात्म, मानवीय अस्तित्व के ये तीनों पहलू एक समग्रता के धागे में गुंथे हुए हैं।'' पश्चिम में, जैसे गेहूं के साथ घुन पिस जाता है संगठित धर्म और तर्क बुद्धि के बीच वैसे सीधे और निर्णायक संघर्ष की नौबत नहीं आयी। इसीलिए यहां संगठित धर्म की आलोचना अध्यात्म की भूमि से करने का अवकाश बचा रहा। तर्क बुद्धि का पथ प्रशस्त करने के लिए पावनता को बलि बेदी पर चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी। परम स्वाधीन तर्क बुद्धि के क्रमिक क्षरण और अंततः पतित होकर स्वार्थ सिद्धि का साधन बन जाने के इतिहास से हम वाकिफ हैं, इसलिए उसे दोहराने की जरूरत नहीं। लेखक ने अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तक ÷निजब्रह्म विचार' में साफ साफ लिखा है कि ''वैज्ञानिक चेतना धर्म की रागात्मक भूमिका का विकल्प नहीं बन सकती, स्वयं वैज्ञानिक तक की चेतना में नहीं।'' अध्यात्म की खूबी यह है कि वह इस रागात्मक चेतना को संजोये रखता है और तर्क बुद्धि पर भी पाबंदी नहीं लगाता। अध्यात्म से जुड़ कर तर्क बुद्धि के इंस्ट्रूमेन्टल हो जाने की सम्भावना भी क्षीण हो जाती है। क्योंकि यहां जीवन की दैनिक गतिविधियों की ही पूजा, अर्चना की सी पवित्राता के साथ ÷करने का आग्रह है।' इस परिप्रेक्ष्य से देखें तो अध्यात्म या ट्रांसेन्डेन्स कोई त्याज्य चीज नहीं, बल्कि एक ऐसी जरूरत है जो तर्क बुद्धि के एकहरेपन को पूर्ण बनाती है। लब्बोलुआब यह कि आधुनिकता के निकष पर कबीर के अध्यात्म को फालतू मानना पश्चिम में घटित हो चुकी गलती से सबक सीखने की बजाय उसे दोहराना है। लेकिन पश्चिम के इतिहास को सर्वथा निर्दोष और आदर्श मान कर भारत का अध्ययन करने वालों, पुनर्जागरण, सेकुलरिज्म, ज्ञानोदय आदि के हूबहू प्रतिरूप भारत में न खोज पाने के कारण दुखी होने वालों की कतार अभी टूटी नहीं है।
कबीर ऐसे मानवीय समाज की परिकल्पना करते हैं जिसकी बुनियाद प्रेम और विवेक पर टिकी हो, जिसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव, वर्चस्व और हिंसा न हो। उन्हें अस्मितावादी राजनीति के पक्ष में घसीटना व्यर्थ है क्योंकि वे भेदभावपरक अस्मिताओं की आलोचना मानव मात्रा को समान मानने की भावभूमि से करते हैं। प्रति अस्मिताओं के निर्माण के इरादे से नहीं। लेखक ने सही लक्ष्य किया है कि कबीर को यहां धर्मसत्ता के विरुद्ध व्यक्ति सत्ता के विकास की सम्भावनाएं नजर आती हैं और यह सम्भावना परम्परा से चली आ रही चेतना का विस्तार है।
मनुष्य मात्रा को समान मानने वाले कबीर के यहां स्त्राी की छवि, माना जाता है, नकारात्मक है और इस मामले में वे सगुण कवियों से पीछे हैं। लेखक ने तर्क किया है कि उनके यहां विरह प्रेम की छवियां भी खूब हैं। ऐसे विरोधाभास कबीर के कवित्व के अचूक प्रमाण हों या न हों लेकिन इतना तो है कि कबीर के स्त्राी सम्बंधी चिन्तन में वैसी प्रखर चेतना नहीं दिखायी पड़ती, जैसी चेतना सामाजिक और धार्मिक प्रसंगों में दिखायी पड़ती है लेकिन इससे कबीर का महत्व कम नहीं हो जाता। क्योंकि समानता की बात यदि एक बार निकल पड़ती है तो उसका सिलसिला दूर तक जाता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम में भी स्त्राी को समान अधिकार बीसवीं सदी में ही मिल पाये।
इस संकलन में कबीर की कविता को नौ शीर्षकों में संयोजित किया गया है। सभी शीर्षक उनकी कविताओं से लिए गये हैं। इन शीर्षकों के मार्फत कबीर की कविता के केन्द्रीय बिन्दुओं को चिन्हित करने का उपक्रम किया गया है। जाहिर है कि इससे कबीर के आधुनिक पाठकों को उनकी कविता के मूलभूत सरोकारों को समझने में मदद मिलेगी।
इतिहासकार संजय सुब्रह्मण्यम ने लिखा है कि आधुनिकता कोई ऐसा वायरस नहीं जिसका जन्म पश्चिम में हुआ और फिर यह समूची दुनिया में फैल गया। आधुनिकता सिर्फ भौतिक प्रगति का पर्याय भी नहीं। भिन्न भिन्न सभ्यताएं आधुनिकता के अलग अलग रूप अलग अलग समय में विकसित करती हैं। भारतीय सभ्यता ने भी आधुनिकता का एक रूप विकसित किया था जिसमें विवेक और प्रेम को अध्यात्म/ट्रांसेन्डेन्स की भूमि पर एक साथ साधने का उपक्रम था। यहां इस बात का एहसास था कि भौतिक समृद्धि और आत्मिक तुष्टि पर्यायवाची नहीं हैं और ट्रांसेन्डेन्स एक ऐसा परम सुख है जिसकी अनुभूति वर्चस्व वासना से ऊपर उठने पर ही होती है। कबीर की कविता के साक्ष्य पर आधुनिकता की भारतीय परिकल्पना का अभिज्ञान कराने का श्रेय निश्चय ही पुरुषोत्तम अग्रवाल को जाता है। उत्तर आधुनिक चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बड़ी उपलब्धि है। यह उपलब्धि अंग्रेजी नहीं, हिन्दी के लेखक ने अर्जित की है; इसलिए यह हिन्दी के लिए गर्व की बात है।
कबीर साखी और सबद : पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली, मूल्य : 80.00


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