रतन लाल अब रोज खाता था और लगभग रोज बाहर। उस दिन भी खाकर आया था। रात बहुत हो चुकी थी और तेज बरसात अलग। उसी होटल की बड़ी, शानदार गाड़ी थी जिसमें थोड़ी देर पहले जगमगाते फानूस की रोशनी में उसने पता नहीं क्या क्या खाया था। उसे उन खानों के स्वाद नहीं केवल रंग याद थेᄉ लाल, हरा, हल्का नीला, गुलाबी, पीला और सफेद। एक खाना एकदम काला था, इतना काला जितना अतल अंधकार। सारी रोशनियां अचानक बुझ जाने पर ऐन उस क्षण जो अंधेरा होता है, उतना काला। वह कोलतार या गाढ़ी काली स्याही जैसा अजीब सा खाना उसने परे रख दिया था। और एक मोर के पंखों जैसी रंगबिरंगी डिश भी थी, जो खाने के बाद परोसी गयी थी। यह याद था कि डोंगों और तश्तरियों के आने का सिलसिला एक पल के लिए भी नहीं टूटा था और उस बड़ी, गोल मेज का हर कोना, चप्पा चप्पा भर गया था। इस वक्त सफेद वर्दी और कैप में, जिस पर उसी होटल का ÷लोगो' बना था, आगे की सीट पर बैठा ड्राइवर गाड़ी चला रहा था। शीशे पर चुपचाप गिरती बरसात का पर्दा था जिस पर सब कुछ किसी बहुत पुरानी फिल्म की तरह धुंधला और विवर्ण दिखता था। बरसात के बीच जलमग्न सड़कों पर गाड़ी हिचकोले खाती नाव की तरह आगे बढ़ रही थी, लगता था अभी किसी चट्टान या टापू से टकरा कर टुकडे+ टुकडे+े हो जायेगी।
ᄉ क्या तुमने खाना खाया? उसने बस एक बार ड्राइवर से इतना पूछा था। ड्राइवर ने कहा थाᄉ जी, खा लिया।
गाड़ी जब उसकी गली के किनारे पहुंची थी, उसने एक गहरी सांस ली थी। कार के बाहर पांव रखने पर छपाक की आवाज हुई थी। हल्की बूंदाबांदी उस समय भी हो रही थी, जिससे बचने के लिए उसने सिर पर अखबार तान लिया था और गाड़ी को वापस जाने के लिए कह कर अपने घर तक की दूरी तेज कदमों से पार की थी। बरसात के कारण बिजली गायब थी, दरवाजे बहुत देर तक थपथपाने के बाद खुले थे। पत्नी थी, हाथों में एक मोमबत्ती लिए।
तीन कमरों का मकान था। बाहर का कमरा बैठक था, और भीतर के कमरे में वे सोते थे।
उससे जुड़े तीसरे, छोटे से कमरे पर उनकी बेटी का कब्जा था, पूरे कमरे में उसकी किताबें और खिलौने बिखरे रहते थे। दो कमरों के बीच की थोड़ी सी जगह में एक डाइनिंग टेबल पड़ी थी जिसे वह रात को, जब उसे लिखना होता था, राइटिंग टेबल की तरह इस्तेमाल करता था। वहां थोड़ी देर पहले पत्नी ने रात का खाना खाया था। एक प्लेट में अधखाई रोटी का एक टुकड़ा अभी तक पड़ा था। पत्नी ने मोमबत्ती को डाइनिंग टेबल के बीच रखे उ+ंचे कैंडिल स्टैण्ड में टिका कर पूछा थाᄉ खाना खा लिया?
वह खामोश रहा था, फिर पूछा था, अच्छा उसने भी खा लिया होगा न। सवाल उनकी पांच बरस की बेटी संगीता के बारे में था जो कुछ दिनों के लिए फरीदाबाद गयी थी। वहां उसके छोटे भाई का परिवार रहता था।
पत्नी ने रसोई से एक गिलास पानी लाकर दिया था और बैठक में पड़े टीकवुड के नये सोफे पर पीठ टिका कर आंखें मूंद ली थीं। देर तक टिकी रही एक अशांत, असामान्य खामोशी के बीच पत्नी ने अचानक कहा थाᄉ होम्योपैथी करके देखो। कहते हैं, उसमें ...
ᄉ देखो, एक अधीर आवाज में उसने कहा था। अब होम्योपैथी की किताबें खरीद कर उसकी दवाइयां मत आजमाने लगना। तुम्हारा वानस्पतिक चिकित्सा का बुखार अभी उतरा है। हर दूसरे दिन कोई नया मुरब्बा, चूरन, काढ़ा। मेरी इस अजीब बीमारी ने ही मुझे उनसे बचाया जिसमें जहर भी खा लो, तो पता न चले। कोई और बीमारी होती तो तुम्हारी दवाइयों से ही मर गया होता। इस सबसे कुछ नहीं होगा। जाओ, तुम जाकर सो जाओ, रात काफी हो चुकी है। मुझे तो अभी काम करना है। लाइट नहीं है इसलिए कम्प्यूटर तो ... ठीक है, मुझे एक कापी दे दो और कोई पेन या पेन्सिल और एक अलग मोमबत्ती भी...
ᄉ और एक कप कॉफी?
ᄉ कॉफी या अरंडी का तेल, मेरे लिए सब बराबर है। लेकिन ठीक है, बना दो, शायद रात में देर तक जागना होगा। पत्नी अपनी जगह से उठी और बेटी के कमरे से एक रजिस्टर और पेन लाकर डाइनिंग टेबल पर रख दिये। फिर रसोई में जाकर कॉफी बनायी और प्याला उसे पकड़ाते हुए उनींदी आवाज में कहाᄉ मैं अब सोने जाऊं?
उसके जाने के बाद खामोशी घनी होती गयी। बाहर बरसात भी रुक चुकी थी। खिड़कियों को धक्का लगाती गीली और ठंडी हवाऐं अभी तक थीं, लेकिन धीरे धीरे बेदम पड़ती हुईं। उसने कुर्सी को मेज के पास खिसका लिया और मोमबत्ती को एक सुविधाजनक बिन्दु पर इस तरह जमाया कि उसकी रोशनी पन्ने पर सीधी और साफ गिरे। उस धीरे धीरे रीतती रात की तन्हाई में वह कुछ देर यूं ही कुछ सोचता हुआ खामोश बैठा रहा, फिर रजिस्टर खोल कर उसने एक खाली, नये पन्ने पर लिखना शुरू किया। यह उसके एक पुराने दोस्त माधव मुरमू के नाम एक चिट्ठी थी जिसे उसने पंद्रह बरसों से नहीं देखा था। उसे यह भी नहीं मालूम था कि इस वक्त वह कहां है, है भी या नहीं। चिट्ठी में नाम, प्रिय वगैरह लिखने के बाद उसने लिखाᄉ इतने समय के बाद यह चिट्ठी पाकर, अगर तुम तक पहुंच सकी, तुम्हें ताज्जुब होगा। उससे भी ज्यादा ताज्जुब यह जान कर होगा, शायद, कि अब रोज खाता हूं। जरा सा खाना नहीं और गप्प से खा जाना नहीं, खूब सारा और बड़ी देर। अब मेरा खाना कोर्स बाई कोर्स होता है, हर खाने में सूप और डैजर्ट मिला कर कम से कम चार कोर्स होते हैं और जब खाता हूं तो खाता ही चला जाता हूं । धीरे धीरे, देर तक। बेहतरीन क्राकरी में सुुंदर कढ़े या छपे हुए नैपकिन्स के संग सीधे स्टोव, ओवेन, तंदूर, तवे या बार्बीक्यू से भर भर कर डोंगे या प्लेटें आती रहती हैं और उनके पीछे वर्दीधारी वेटर्स, शैफ और रसोइये और होटल या रेस्तरां के कर्मचारियों की फौज। जहां खाता हूं वहां आम तौर पर नीम अंधेरा या नाममात्रा की रोशनी होती है, कभी मोमबत्तियों, कभी फानूस और कभी सितारों की, और एक बार तो कमाल ही हो गया था। बहुत बड़ी मेज के बीचोंबीच शराब से भरे एक विशाल मर्तबान को तीली दिखायी गयी थी और जलती शराब की जुगनुओं जैसी दिप दिप रोशनी में हमने खाया था। मेरे इर्द गिर्द मुस्कराते, विनीत चेहरों की भीड़ रहती है मगर खाता अकसर अकेले ही हूंᄉ वे सब डोंगों से उठती भाप के परे मुझे खाते हुए देखते रहते हैं, मेरे चेहरे और आंखों में कुछ पढ़ने की कोशिश करते हुए, कोई संकेत, कोई इशारा। मगर इससे यह न समझना कि मैं पेटू हो गया हूं या खाने का कोई खास शौकीन। नहीं, यार, जरा भी नहीं, यह तो अपुन का काम है, नौकरी। खाने की खातिर खाता हूं, न खाऊं तो भूखा मरूं और मेरा परिवार भी।
यहां तक लिखने के बाद नये पैराग्राफ में उसने पहले लिखा : ÷तुम्हें पंद्रह बरस पहले के वे दिन...' फिर इसे काट कर : मैं अभी तक वहीं, उसी अखबार में हूं जहां पंद्रह बरस पहले हम दोनों...। मेरी कुर्सी मेज अभी तक उसी फ्लोर पर हैं, लेकिन अब उस कोने में नहीं। अब सामने के पारदर्शी दीवारों वाले बड़े से केबिन में बैठता हूं, अकेले, और मेरे पीछे की दीवार पर किसी आर्ट गैलरी की तरह, तारीखों और ब्यौरों के साथ, मेरी बड़ी बड़ी तस्वीरें प्रदर्शित हैंᄉ फलाने होटल में बैरों और बावर्चियों के संग, चीफ शैफ से हाथ मिलाते हुए, टेबल पर खूब सारे खानों के बीच, खाने के पहले और दौरान और बाद की तमाम तस्वीरें। एक तस्वीर में मेरा मुंह खुला है और एक बूढ़ा बावर्ची मुस्कराते हुए मुझे सीधे कड़छी से कोई खास चीज, याद नहीं कि कोई पुराना, एंटीक व्यंजन या कोई नवीन आविष्कार, खिलाने की कोशिश कर रहा है। उस कोने में अब वह हीटर भी नहीं, जिस पर हम दोपह र में खाना गर्म करके खाते थे। उसकी जगह वहां एक हॉटकेस है, लेकिन अब दफ्तर में शायद ही कोई खाता है। लंच के समय लोग इधर उधर बिखर जाते हैं। तुम्हारा खाना मुझे अभी तक याद है, (अपने ही) अखबार में लिपटी तीन या चार मोटी, भोंडी रोटियां जिन्हें तुम काम करते हुए तेजी और जल्दी से खा लेते थे फिर भी हमेशा भूखे और अतृप्त रहते थे। हम ट्रेनी पत्राकार थे, मैं अपेक्षाकृत करीब, यू. पी. के लखीमपुर जिले से और तुम झारखंड की बहुत दूर न जाने कौन सी जगह से, जहां तुमने बताया था कि ट्रेन नहीं जाती। हम पूरी तरह बर्बाद होकर दिल्ली आये थे।
नहीं, हमारे घरों में आटा था जब हम अपने अपने इलाकों से दिल्ली के लिए चले थे। हम अकाल, बाढ़ या सूखे में उजड़ कर नहीं आये थे, हमें तो र. स. ने बर्बाद किया था जिसके लिए अल्लाह से दुआ कि उन्हें करवट करवट जन्नत बख्शे। शुक्रिया, सर। वह मूल्यवान बर्बादी आने वाले बरसों में कैसे बर्बाद हुई। कैसा था वह वक्त, विस्फोट या उबाल, र. स. जिसकी महज एक छोटी सी अभिव्यक्ति थेᄉ उस वक्त की शबीह बनायी जाये तो शायद एक नामालूम बिन्दु या धुंधली लकीर से ज्यादा नहीं, फिर भी उन अंदरूनी इलाकों तक के लोग उन्हें जानते थे जहां ट्रेनें नहीं जाती थीं। हम दोनों बहुत देर से दिल्ली आये थे जब वो नहीं थे (उन्हें उनकी जगह से बेइज्जत करके निकाला बहुत पहले जा चुका था), फिर भी वो अपना काम कर गये थे। ट्रेनी पत्राकार के टेस्ट में पास होकर हम अपनी अपनी जगहों से धड़कते दिल और दुनिया बदलने में शिरकत करने के इरादे के साथ आये थे। तब लगता था कि दुनिया बदलने ही वाली है । तुम खबरों की तलाश में दूरदूराज के अज्ञात इलाकों में भटकते थे और अकसर कई दिनों तक दफ्तर नहीं आ पाते थे। इसकी तुलना में मेरा काम बहुत आसान थाᄉ नयी किताबों, खासकर कविता संकलनों की समीक्षाऐं लिखना। अब अखबार में काफी सीनियर हूं, लेकिन काम अभी तक वही है, समीक्षाओं का। सीनियर समीक्षक, लेकिन किताबों, नाटकों, पेण्टिग्ंस, फिल्मों या संगीत के कार्यक्रमों की नहीं, अब खानों की समीक्षाऐं लिखता हूं। हां, खाने। चपर चपर। समझ में आया? अच्छा, गप गप। अब तो समझे? हर हफ्ते मेरी और खानों की रंगीन तस्वीरों के साथ मेरी भोजन समीक्षाऐं छपती हैं। हर हफ्ते अगर रोज नहीं तो तीन या चार दिन किसी न किसी आलीशान होटल या रेस्तरां में खाता हूं । वे रोज रोज नये नये खुलते जाते हैं। बरसों से इतना पोषणयुक्त और इतना सारा खाना खाने का नतीजा यह है कि एक बड़ी फुटबाल जैसा दिखता हूं, जमीन पर लुढ़कता सा चलता हूं, लोग हंसते हैं। मगर मेरे पास कोई विकल्प नहीं, मेरी नियति यही है कि खाता जाऊं, पीता जाऊं, चूसता, काटता, चबाता, ठूंसता, सुड़कता और निगलता जाऊं, किस्मत को कोसता हुआ कि अभी कितना और जीना, कितना और खाना है, और हां, यह भी ध्यान रखते हुए कि यह सब बेआवाज हो। हर जगह मेरे लिए सबसे बड़ी टेबल, सबसे मंहगी क्राकरी, सबसे स्वादिष्ट खाने और सबसे नशीले तरल, और कम नशीले भी, रिजर्व होते हैं, इसी तरह गोश्त में सीने, रान, कलेजी और गुर्दों की सबसे मुलायम, मूल्यवान बोटियां जिन्हें जैतून के तेल में तला जाता है और दाल, सब्जियां (आर्गेनिक, केवल) देगची की गहराइयों से परोसे जाते हैंं जिन्हें छोटे छोटे निवालों में सिर झुकाये खामोशी से खाता हूं, अपने ख्यालों में गुम और वे उत्सुकता से मुझे देखते हुए अंदाजा लगाने की कोशिश करते रहते हैं कि मेरे दिमाग में क्या चल रहा है। एक खाना समीक्षक के दिमाग में खानों के अलावा और क्या होगा, वहां ग्रहों नक्षत्राों, विलुप्त सभ्यताओं, अनजान द्वीपों के निवासियों या किताबों की या इतिहास भूगोल या नागरिक शास्त्रा की जानकारी तो होने से रही। इन चीजों के बारे में जो कुछ जानता था, वह दिमाग से कब का मिट चुका। उन दिनों खाने के सस्ते ठिकानों की तलाश में भटकते हुए तुम जो कहते और बताते थेᄉ किताबों के नाम, दुनिया भर के मूवमेण्ट्स और नयी दुनिया का नक्शाᄉ उन बातों की धुंधली सी याद बाकी है। अलबत्ता खानों के बारे में सब कुछ जानता हूंᄉ उनके स्वाद, पाक विधियां, पोषक तत्व, यखनी, बिरयानी, शोरबों, सूपों, केकों और आइस्क्रीमों की किस्में, अलग अलग इलाकों और मुल्कों के खाने; और प्रवासी और देसी परिन्दों के मांस का, अलग अलग नदियों की मछलियों के स्वाद का बारीक फर्कᄉ और खसखस सूखा डालना बेहतर होता है या गीला, जावित्राी साबुत या पिसी, और धनिया की श्रेणियां, कालीमिर्च की किस्में। पिछले दस बरसों में न जाने कितनी तरह का और कितना कुछ खा गया हूं, और खानों के बारे में जानकारियां जमा की हैं, जिनकी मदद से हर हफ्ते भोजन समीक्षाऐं लिखता हूं, जिनके अनगिनत पाठक हैं और लोकप्रियता असीम। उन समीक्षाओं का एक संकलन, कवर पर मेरी तस्वीर के साथ, छप चुका है और दूसरा छपने वाला है। पहले संग्रह की समीक्षाओं में कहा गया था अलीक, अनन्य, अद्वितीय पता नहीं क्या क्या। उस संग्रह की अब तक...
कुछ सोच कर उसने ऊपरी पैराग्राफ का आखिरी वाक्य काट दिया और नया पैरा शुरू कियाᄉ कभी कभी ऐसा होता है कि खाने के दौरान मेरे सामने बैठा कोई युवा कुक या शैफ एक चौड़ी, अति विनीत मुस्कराहट के साथ एक एक डिश पेश करता है और संक्षेप में उसकी रेसिपि और कैलोरीज बताता है। मेरी राय पर, अगले हफ्ते छपने वाली समीक्षा पर उसकी नौेकरी और कैरियर, या कम से कम अगला प्रमोशन, निर्भर करते हैं, इसलिए आदर और आग्रह से खूब खिलाते हुए वह लगातार मुझे एक टकटकी में देखता रहता हैᄉ उसकी निगाहों में इतनी उत्सुकता, इतनी उम्मीद होती है कि मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगता है, गसा निगला नहीं जाता, लगता है बस आया... आया वह क्षण जब मेरे लिए उन कातर निगाहों का दबाव असहनीय हो जायेगा, चीख कर कहूंगा आई डैम केयर, अब जो होना है हो, सच्चाई तो...। मैं उसे वह सच बता दूंगा जिसे पूरे जमाने से छुपाता हूं, मेरे अलावा बस दो लोग जानते हैं, मेरी बीवी और डॉक्टर सहाय... और तीसरे तुम होगे, थोड़ी देर के बाद। वह सच सामने आया कि गयी मेरी नौकरी, और शायद मेरा अखबार मुझ पर धोखाधड़ी का मुकदमा भी चलाये। मैं शैफ की नौकरी की चिन्ता करूं या अपनीᄉ इसलिए गहरी सांसें लेकर अपने पर काबू पाता हूं, उसकी आंखों में देखने से बचता हुआ खामोशी से खाता रहता हूं, उस खतरनाक क्षण को गुजर जाने देता हूं। चलते वक्त सबको धन्यवाद देता हूं और खाने की तारीफ में कुछ शब्द भी...।
अब तक तुम्हारा धीरज खत्म हो चुका होगा। इतने बरसों के बाद अचानक यह चिट्ठी और उसमें यह सब...। दरअसल, तुम्हारा पता हासिल कर काफी समय से लिखना चाहता था, लेकिन किसी न किसी कारण से टलता रहा। अब इसे और अधिक नहीं टाल सकता। वक्त आ चुका है, अभी या कभी नहीं। यह पार्टी खत्म होने वाली है। तुम जानते हो(गे) कि दुनिया में खाना कम पड़ गया है। हाइती, इंडोनेशिया, फिलिपींंस, कैमरून, मिस्त्रा और पेरू में खाने के लिए मारकाट और दंगे हो चुके हैं जिनमें मरने वालों का हिसाब नहीं। एक कम्पन फैल रहा है, बदहवास आवाजें आ रही हैं कि यह बरबादी की शुरुआत है, एक खामोश सूनामी जो कम से कम दस करोड़ लोगों को लेकर जायेगी। यही फुसफुसाहट अंतर्जाल पर। तुम्हें यह पहले से पता था, तुमने बता दिया था, बेशक इन्हीं शब्दों में नहीं। इन लोगों का रोगनजोश गायब होने वाला है। बिरयानियां गायब होने वाली हैं। टिक्के और कबाब (सींख, शामी दोनों तरह के) गायब होने वाले हैं। पनीर और पनीर से बनने वाले सारे आइटम गायब होने वाले हैं। कढ़ी, केक, कांजी, काजू, कोफ्ते, कीमा कलेजी, कुल्फियां और केकड़े और कुकुरमुत्ते और उनके अलावा और भी, सारे के सारे खाने, सब कुछ गायब हो जाने वाला है। इसलिए जो कहना चाहता हूं वह कहने का वक्त यही है। कुछ समय के बाद इसकी कोई जरूरत नहीं रहेगी, इसलिए इच्छा भी नहीं। फिर मुझे तुमसे उन दिनों की कुछ बातें भी...
यह आखिरी वाक्य काट कर उसने नया पैराग्राफ शुरू किया : तुम्हें साउथ दिल्ली के वसंत कुंज से आने वाली, विशेष संवाददाता मिसेज मोंगिया की याद होगी (उस उम्र में भी थी आकर्षक, नहीं?) जो बर्लिन, कांस और कहां कहां के फिल्म समारोहों की रपटें ÷लाइफ' और ÷टाइम' से टीप कर वहीं बैठे बैठे लिख दिया करती थी। वह तुम्हारी राख के रंग की, स्याह धब्बों वाली अनाकर्षक रोटियां देख कर हंसती थी और अपना डिब्बा खोल कर सैण्डविच पेश करती थी मगर तुम अपनी मेज पर सिर झुकाये, काम में डूबे वही रोटियां खाते रहते थे। तुम, और तुम्हारे संग मैं भी, सस्ते से सस्ते खाने की तलाश में भटकते थे, फुटपाथों और ठेलों पर खाते थे और हर चीज को पता नहीं किस तलाश में आंखें दुखने तक देखते थे। जो भी तनखा थी, लगभग पूरी की पूरी घर चली जाती थी। या तो खुद खा लो या घर में वह जो महारानी बैठी थी, गरीबी, उसे खिला लो। अपने खाने के लिए हम अतिरिक्त काम करते थे, दूसरे अखबारों में लेख, टिप्पणियां और रेडियो वार्ताएं वगैरह। महीना बीतते न बीतते खाना दिखना बंद हो जाता था, तब एक एक दिन छोड़ कर खाते थे और उन दिनों में चाय बिस्कुटों, ज्यादा से ज्यादा डबलरोटी से काम चलाते थे। कड़ी धूप में हम अपने मलाल और कचोटों का मिलान करते मीलों चलते जाते थे या ठसाठस भरी बसों में सफर करते थे। तुम्हें कितनी भूख लगती थी। अपने खाने के लिए तुमने पूरी दिल्ली को छान मारा था और जमीन में दबी एक बस्ती को खोद कर निकाला था। हां, मुझे ऐसा ही लगा था जब तुम मुझे अपने संग पहली बार वहां ले गये थे। उस सारे जमाने से छुपी हुई बस्ती में तुम कैसे पहुंचे थे, यह तुम्हीं जानते होᄉ दिल्ली की तली में, हाथियों के पड़ोस में, नदी के किनारे। अब उस जगह वह बस्ती नहीं है और वहां रहने वाले भी न जाने कहां गये। यमुना ब्रिज के बीचोंबीच लगे एक बोर्ड ÷यहां हाथी रहते हैं' के करीब सीढ़ियां थीं जो बहुत नीचे नदी तक जाती थीं। उन सीढ़ियों और रास्ते का ऊपर से पता ही नहीं चलता था, उनसे अनजान ट्रैफिक अपने शोर और रफ्तार में गुजरता रहता था। हम उतरते गये, उतरते गये, जैसे पाताल तक। नीचे जाकर देखा, वहां एक विशाल बस्ती थी। यमुना के किनारे से पुश्ते तक झोंपड़ियां थी, धुंए और एक अनंत धुंधलेपन से ढकीं और उनके बीच में कुछ पक्के मकान भी थे। उन्हीं में दुकानें, पी सी ओ, होटल थे और एक नाई की दुकान भी।
ᄉ यहां खाता हूं। यहीं से अगले दिन की रोटी बंधवा लेता हूं। यह जगह बिल्कुल मेरे गांव जैसी है। तुमने कहा था।
मैं आश्चर्यचकित, आंखें गड़ा कर चारों ओर देख रहा थाᄉ ऐसा ही मेरा भी...। मैंने कहा था।
ᄉ क्या तुम्हारा गांव नदी के किनारे है? तुमने पूछा था।
ᄉ हां।
ᄉ पानी ज्यादा आ जाये तो झोंपड़ियां बह जाती हैं, बच्चों बर्तनों समेत?
ᄉ हां।
ᄉ वहां हाथी है?
ᄉ हां। नदी के पार। जंगल में।
ᄉ नदी में मछलियां हैं? यमुना के किनारे किनारे चलते हुए तुमने कहा, मटमैले पानी पर निगाहें टिकाये।
ᄉ हां, मछलियां भी...। मैंने कहा।
ᄉ क्या गांव में गिद्ध और चीलें भी हैं?
ᄉ नहीं, लेकिन वे अकसर आते हैं।
ᄉ रातें बहुत अंधेरी होती हैं? सूरज इतना तीखा कि कांटे की तरह चुभता है? हवाएं गर्म होती हैं? अकसर आग लगती है? उम्रें सरपट भागती हैं? जरा सी हमदर्दी मिले तो लोग रो पड़ते हैं, उम्रदराज बूढ़े भी, अपने मोटे, बहुत पुराने चश्मों के पीछे, जिनकी कमानियां धागों से बांध कर किसी तरह...? और लोग गरीब...?
ᄉ हां, सब कुछ ऐसा ही है। मैंने कहा।
उस घड़ी हम दोनों ने एक दूसरे को जैसे पहली बार देखा था, एक दूसरे के चेहरे में अपनी शक्ल पहचानते हुए।
ᄉअच्छा, वहां कत्ल होते हैं?
ᄉहां, कभी कभी कत्ल भी... मैंने कहा।
ᄉऔर सोडोमी? तुमने पूछा। वैसे तुमने यह नहीं, कुछ और कहा था। इस बीच हम झोपड़ियों के बीच के कच्चे रास्ते से पीछे की गली में आ पहुंचे थे जो धुंए और भाप से भरी थी। वहां लुहारों और वैल्डिंग करने वालों की कच्ची, अस्थायी दुकानें थीं। हम गली के बीच वहां तक चलते गये, जहां धधकते कोयलों पर लोहा गरम होकर लाल हो चुका था। तेजी से उसे निकाल कर निहाई पर रखा गया और दो आदमी जल्दी जल्दी और बारी बारी घन मारने लगे। लोहा चिंंगारियां फेंक रहा था। भाप का गुबार बीच बीच में उठता था। भट्टी में दूसरा लोहा डाल दिया गया था जो तपता जा रहा था और देखते ही देखते किनारों से लाल होने लगा। घन मारने और फूली सांसों की आवाजें एक दूसरे में घुली मिली थीं, जिसे एक तीसरी आवाज ने दबा दिया जब उसे पानी के हौज में डाला गया, लोहा ठंडा होने और भाप उठने की आवाज। आग की नदी और धुंए के बादलों को पार कर तुम उस झोंपड़ी में चले गये जहां वह राख या मिट्टी के रंग की बहुत बूढ़ी औरत दरवाजे के बीच खड़ी थी, हमारी ओर देखती हुई। उसका बदन गुदनों से ढका था और वह रंगबिरंगे पत्थरों और मनकों की मालाऐं पहने थी। वे तुम्हारे इलाके के लोग थे। यह महानगर में ठोकरें खाते तुम्हारे आदिम खून की घरवापसी थीᄉ पता नहीं किन अज्ञात आनुवंशिक या नृवंशीय रास्तों से। उस घड़ी मैं समझ पाया था तुम्हारी आंखों की वह अबूझ तलाश, जो और कुछ नहीं, सिर्फ घर वापस जाने की एक मासूम इच्छा थीᄉ और यह भी कि तुम इस शहर में अधिक समय नहीं टिकोगे। मैं दूर से देख रहा था कि उस औरत ने तुम्हें चिपका लिया था और शायद पूछ रही थीᄉ रोट्टी खायेगा? भूख लगी है?ᄉ नहीं, अभी नहीं, तुमने कहा था और फिर मेरी ओर देखते हुएᄉ यह भी आज से यहीं खायेगा। रात हो चुकी थी। मैं बाहर खड़ा यमुना के पार दिल्ली की रोशनियां देख रहा था जो वहां से बहुत मैली, धब्बों जैसी जान पड़ीं।
एक मजे की बात बताऊं, ये लोग प्लीज प्लीज करके, यह लिखने के बाद इस वाक्य में ÷प्लीज प्लीज करके' को काट कर उसने लिखा, मिन्नत करते हुए, विनती करते हुए खिलाते हैं। प्लीज खाइये न, प्लीज यह खाइये, प्लीज खा लीजिये न, ऐसा कहते हैं। आज दिन भर बारिश होती रही थी। कल रात देर तक दमयंती, वह बच्चों के एक स्कूल में पढ़ाती है, कापियां जांचती रही थी, इसलिए सुबह देर तक सोती रही। मुझे जगाना ठीक नहीं लगा और बिस्कुटों के साथ चाय पीकर और रोटी लिए बिना दफ्तर के लिए चल दिया। जिस दिन कहीं बाहर नहीं खाना होता, घर से लंच लेकर जाता हूं। यह एक थकाने वाला दिन था, पिछले हफ्ते जिन तीन रेस्तराओं में खाया था, उनकी समीक्षाऐं लिखनी थीं, यह ध्यान रखते हुए कि इधर के खाने उधर न हो जायें। सामिष निरामिष का और उत्तर दक्षिण का ध्यान न रखूं तो अखबार मुकदमा झेले और नौकरी से अलग जाऊं। लंच के वक्त चपरासी को बुला कर पैसे देते हुए कहा कि दफ्तर से कुछ दूरी पर जो एक ठेले वाला खड़ा रहता है, वहां से मेरे लिए छोले और दो कुल्चे पैक करा कर लाये। उसका इंतजार करते हुए मैं बालकनी में आकर बारिश देखने लगा, तभी मोबाइल पर वह फोन आया। बारिश की आवाज में साफ सुनना मुश्किल था, इसलिए मैंने उससे कहा कि वह जोर से बोले और खुद भी इस तरह चिल्ला कर बात कर रहा था कि मेरी आवाज बाहर हॉल में हर मेज तक साफ जा रही थी, सब लोग मुड़ कर शीशों के पार मेरी ओर देखने लगे थे।ᄉ क्या कहा, नया रेस्तरां? एक और? अच्छा फ्रांसीसी खाने का? क्रेपे सुजेटे, चाकलेट माउस्से, रिसोटो और मेडिटेरेनियन सलाद? अच्छा यूनानी खाना भी... फासोलादा, कोलोमो और एव्गोलेमोनो सूप और अराकास मी ऐगिनेयर्स और स्पानाकोरिजो... आस्ट्रेलियन भी? आस्ट्रेलियन में स्टीक, रोस्टेड लैम्ब, पाव्लोवा, लैमिंग्टन, किडनी पाईज और... और क्या... कंगारू करी? मेरे घर में और दफ्तर के केबिन में भी देश विदेश के खानों की रंगीन किताबों की एक काफी बड़ी लाइब्रेरी है, वहीं से मैंने ये सारे नाम रट रखे थे और अब फोन पर दोहराये जा रहा था, ज्ञान बघारने के अलावा उसे जताने कि अपुन ने दुनिया जहान का खाना खा रखा है, भुख्खड़ हिन्दी वाला न समझे, भूल से भी। वह एक बहुत बड़ी और ऊंची इमारत की सबसे ऊंची मंजिल पर खुले एक नये रेस्तरांं का जन सम्पर्क अधिकारी था। आज उस रेस्तरां का उद्घाटन था। वह उड़नतश्तरी जैसा एक रिवाल्विंग रेस्तरां था, लगातार घूमता हुआ, और उसका नाम भी उन्होंने यही रखा था, ÷द फ्लाइंग सॉसर'। उसकी खिड़कियों से नीचे जमीन पर सब कुछ बहुत छोटा, खिलौनों जैसा नजर आना था और व्यू लगातार बदलता जाना था, और हां इस बात का खास ध्यान रखा गया था कि भूले से भी कोई इनसान नजर न आये। कुछ दिन पहले आया उसका इन्विटेशन कार्ड मेरी दराज में पड़ा था लेकिन मुझे याद नहीं रहा था।
ᄉनहीं, आज मुमकिन नहीं है। मैंने कहा।ᄉ मुझे कहीं जाना है।
ᄉप्लीज सर, ऐसा न कहें, मैंने गाड़ी भिजवा दी है। पहुंचने वाली होगी। उसने कहा।
ᄉदेखिये, मैं फिर कभी आ जाऊंगा। आज मैंने एक डॉक्टर से अप्वाइंटमेण्ट ले रखा है। मुझे थोड़ी देर में वहां के लिए...
ᄉसर, ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। बस मुश्किल से आधा घंटा। प्लीज आ जाइये, खा जाइये। ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा कुछ। आप नहीं खायेंगे तो कौन जानेगा हमारे रेस्तरां को। हमें अपना खाना खुद खाना पड़ेगा, भूखे मरेंगे। आपके पहुंचने से पहले ही हम तैयार रहेंगे। आपके आते ही सर्व करा देंगे।
मैंने बालकनी के गीले शीशे पर एक धुंधले, काले धब्बे को धीरे धीरे आगे आते, बड़ा होते देखा। रुमाल से शीशा पोंछने पर अहाते में खड़ी, चमकती कार नजर आयी। सीढ़ियां उतर कर मैं उसके पास पहुंचा, ड्राइवर ने सिर झुका कर मेरे लिए दरवाजा खोल दिया। जब कार वापस मुड़ कर जाने लगी तब उसके बैक व्यू मिरर में मैंने चपरासी को धीरे धीरे आते देखा, सिर पर छाता ताने, एक पालीथीन के बैग में छोलों कुल्चों समेत, उसे झूले की तरह झुलाते हुए।
रेस्तरां दफ्तर से ज्यादा दूर नहीं था। थोड़ी ही देर में हम वहां पहुंच गये। ड्राइवर ने गाड़ी को पार्क किया और मुझे उस इमारत की लिफ्ट तक ले गया। मैंने भीतर जाकर चौदह नम्बर के खाने को दबाया।
वह एक नया रेस्तरां था जहां हवा में वार्निश और पालिश की गंध अभी तक बसी थी। वहां सब कुछ नया नकोर थाᄉ फानूस, कार्पेट, फर्नीचर, क्राकरी, वर्दियां, मीनू और नैपकिन्स और बाथरूम में नैप्थलीन की गोलियां। और अंधेरा, खुशबुएं और संगीतकारों के साज। हां, वहां संगीत का, ÷लाइव संगीत' का भी इंतजाम था। उस इलाके में तमाम विदेशी कम्पनियों के दफ्तर थे जिनके चेयरमैनों, डायरेक्टरों और अफसरों के लिए उनके अपने देशों के खानों का वह एक खास, आलीशान रेस्तरां था, करोड़ों की लागत से। हल्के अंधेरे में जिस मद्धिम संगीत के साथ उन्हें पहले वाइन के घूंटों के साथ ÷कावियार' के कौरों को गप्प से निगलना था और फिर चर्चा करनी थी कि हे प्रभु दुनिया किधर जा रही है या मनुष्यता कितनी कुत्सित हैᄉ समझा जा सकता था कि वह हिन्दुस्तानी संगीत नहीं होगा, न गजलें, न कव्वालियां। साजों को देख कर मैंने अंदाजा लगाया कि विदेशी कंसल्टेण्ट की महंगी सलाह पर वहां जिस संगीत की व्यवस्था की गयी थी, वह था सम्भवतः पश्चिमी शास्त्राीय संगीतᄉ बीथोवेन, मोजार्ट, बाख, शूबर्ट, शोपां और अन्य तमाम। उससे अलग कुछ भी वहां बेमेल होगा, मैंने सोचाᄉ जैज, जिप्सी संगीत या नीग्रो ÷ब्लूज' तो हरगिज नहीं, जिन्हें सुनते हुए याद आने लगते हैं अपमान, पिटाइयां और फूट फूट कर रोने के क्षण। खास तौर पर मैनेजरों और महामहिमों के लिए वह संगीत खतरनाक हैᄉ खाया पिया बाहर आने लगता है। वहां एक ऊंचे स्टेज पर नयी सफेद वर्दियों में चार संगीतकार थे, जिनमें से एक क्लेरिनेट लिए था, एक सेक्सोफोन, एक वायलिन और एक छोटे बड़े तीन ड्रमों का एक सेट। मैं जैसे ही हाल के भीतर दाखिल हुआ, सूट और टाई पहने जन सम्पर्क अधिकारी ने उन्हें इशारा किया, संगीत बजने लगा, ऊंची आवाज में एक धुन, जानते हो किस गाने की :
खाना मिलेगा
पीना मिलेगा
भैया की शादी है
सब कुछ मिलेगा
एक बहुत लम्बे गलियारे में दो कतारों में लाइन से सैकड़ों खाने सजे थे, नेम प्लेटों के साथ। फ्रें