पुरखों की स्मृतियों और आस और अस्थियों
पर थमी थी
घर की इर्ंट ईंट
उहापोह और अतृप्ति का कुटुम्ब
वहीं चढ़ाता था अपनी तृष्णा पर सान
एक कबीर
अपनी धमनियों से बुनने की मशक्कत में एक चादर
निर्गुन पुकार में बदल जाता था बारम्बार
कि सपनों की निहंगम देह के बरक्स
छोटा पड़ जाता था हर बार आकार
बावजूद इसके जो था एक घर था :
विरुद्धों के सामंजस्य का पराभौतिक अंतिम दस्तावेज
बीसवीं सदी के बिचले वषोर्ं में
स्मृतियां और स्वप्न जहां दिख रहे हैं
सहमत सगोतिया पात्रा
एलबम की तस्वीर है अब मात्रा
फासलों को पाटने की
वैश्विक कारसेवा में बौखलाया था
जब सारा जहान
दिखा तभी पहली पहली दफा अतिस्पष्ट
देख कर भी जिसे
किया जाता रहा था अदेखा
शिष्टता के पश्चाताप का छछंद...
और दीवारों और स्मृतियों से
एक एक कर उधड़ गये
बूढ़ी त्वचा के पैबंद
गुमराह आंधियों के जोर से
खुलते ही गये आत्मा के घाव
और
इक्कीसवीं सदी का अवतार हुआ
मध्यवर्गीय इतिहास के अंत के उपरांत
कुछ तालियां बजीं कुछ ठहाके गूंजे नेपथ्य से
कुछ जश्न हुए सात समुंदर पार
एक वैश्विक गुंडे ने डकार खारिज की
राहत की सुरक्षित सांस ली
अनावश्यक और बेवजह
घटित हुआ
प्रतीक्षित शक
गोया कि घटना कोई
घटती नहीं अचानक
किस्तों में भरी जाती है हींग आत्मघाती
सूखती है धीरे धीरे धीरे भीतर की नमी
मंद पड़ता है कोशिकाओं का व्यवहार
धराशाई होता है तब एक चीड़ का छतनार
धीरे धीरे धीरे लुप्त होती है एक संस्कृति
एक प्रजाति
षड्यंत्रा के गर्भ में बिला जाती है
खैर! को जुमले की तरह प्रयोग करने से बचता है एक कवि
अपनी चारदीवारी में लौटने से पहले
कि कुटुम्ब की अवधारणा ही अपदस्थ
जब घर की नयी संकल्पना से
ऐसे में
गल्प से अधिक नहीं रह जाता
यह यथार्थ।
उसने कहा था' को याद करते हुए
पानी पर लिखा
एक ने संदेश
दूसरे ने ठीक ठीक पढ़ा
समझ लिया
गढ़ा नया वाक्य
नयी लिपि
नयी भाषा का जैसे आविष्कार किया
दौर की हवाᄉकुल हवा
से एक की सांसों की हवा
को चुम्बन में चुना
होंठों पर सजा लिया
प्रेम में
उन पर
जैसे सच साबित हुए
घटिया फिल्मों के गाने
बहाने भी
कितने विश्वसनीय लगे
प्रेम में
चुना क्या शब्द कोई एक
नया वाक्य नयी लिपि नयी भाषा
महसूस सका?
पूछूं जो कविता सेᄉ÷तेरी कुड़माई हो गयी?'ᄉ
ᄉ÷धत्'ᄉ कहे और भाग जाये ऐसे
कि लगे
सिमट आयी है और... और पास।
वसंत शुक्रिया
खुद को बटोरता रहा
हादसों और प्रेम में भी
रास्ते हमारी उम्मीदों से उलझते ही रहे
ठोकरों की मानिन्द
घरेलू उदासियां रह रह गुदगुदाती रहीं
कटे हुए नाखून सा चांद धारदार
डटा आसमान में
काटता ही रहा एक उम्र हमारी अधपकी फसल
रंध्रों में अंटती रही कालिख और शोर और बेचैनी अथाह
पनाह
जहां का अन्न जिन जिन के पसीनों, खेतों, सपनों का
पोसा हुआ
जहां की जमीन जिन जिन की छुई, अनछुई
जहां का जल जिन जिन नदियों, समुद्रों, बादलों में
प्रथम स्वास सा समोया हुआ
जहां की हवा जिन जिन की सांसों, आकांक्षाओं, प्राणों
से भरी हुई
अब, नसीब मुझे ऐन अभी अभी पतझर में
सबके हित
अपने हित
समर्पित
एक दूब
(कृपया, उ+ब से न मिलाएं काफिया !)
वसन्त शुक्रिया !
दोनों
दोनों में कभी
रार का कारण नहीं बनी
एक ही तरह की कमीᄉ
÷चुप' रहे दोनों
फूल की भाषा में
शहर नापते हुए
रहे इतनी दूर... इतनी दूर
जितनी विछोह की इच्छा
बाहर का तमाम धुआं धक्कड़ और तकरार सहेजे
नहाये रंगों में
एक दूसरे के कूड़े में बीनते हुए उपयोगी चीज
खुले संसार में एक दूसरे को
समेटते हुए चुम्बनों में
पड़ा रहा उनके बीच एक आदिम आवेश का परदा
यद्यपि वह उतना ही उपस्थित था
जितना ÷नहीं' के वर्ण युग्म में ÷है'
कई रंग बदलने के बावजूद
रहे इतना पास.... इतना पास
जितना प्रकृति।
झलक
इतना सरल था कि क्या था पर अवश्य है यह तो
कि बेसुध हो कुछ कदम वह चला ही जाता था
साथ साथ जैसे दुःख न हों दोस्त हों
हालांकि मिलना इस तरह नापसंद था उसे किन्तु
बना रहता था सहज अपनी ही धुनता हुआ
चलता रहता था किसी रिक्शे वाले की तरह जो
सबसे ज्यादा चिल्लाते जोर से गाते या
अकेले ही बड़बड़ाते हुए दिखते हैं जैसे कर रहे हों
दुःखों को भरमाने की कोशिश, वह कुछ ऐसा ही
करता था फिर भी बचाव की लाख ज्यादती के बावजूद
चलने वाला उसके साथ अचानक बदल ही जाता था
प्रश्न मेंᄉ आजकल कर क्या रहे हो?ᄉ की टंगड़ी मार
गिरा ही देता था
इतना सरल था कि क्या था पर इतना तो अवश्य था
कि बिना शिकवा किये वह चौंक कर उठता अपनी डिग्रियों
और हाथों को झाड़ता देखता इस तरह जैसे दिख गया हो
कई दिनों की कठिन धुंध को चीरता सूरज जैसे मिल गयी हो
पिता को अपने बच्चे के पहले दांत की झलक।