जैसे तैसे अपरम्पार भय और दहशत के बीच सन् सत्तावन बीता। गांव वाले कहते थे कि यह संख्या सताने वाली होने के कारण ही सत्तावन कहलाती है। किन्तु सन् अट्ठावन भी सत्तावन से भिन्न नहीं था। नौ ग्रहों के मेल से उत्पन्न अनिष्टकारी सम्भावना तथा मुड़िकटवा, धोकरकसवा एवं लकड़सुुंहवा बाबाओं का आतंक जारी रहा। किसी भी साधु या लम्बी दाढ़ी वाले व्यक्ति को देखते ही लोग इधर उधर भागने लगते थे। सबसे बुरा हाल छोटे छोटे बच्चों का था। स्कूल जाने वाले बच्चे सबसे ज्यादा डरते थे। मैं उस समय कक्षा चार में पहुुंच गया था। बहुत दिनों तक आसपास के गावों के बच्चों के साथ हम झुंड बना कर स्कूल जाते थे। हमारा स्कूल मिट्टी की दीवार वाला चार कमरों का एक खपड़ैल मकान था जिसके एक कमरे में एक तरफ ढेर सारा चैला तथा गोहरा रखा हुआ होता तथा दूसरी तरफ खाना बनाने के लिए मिट्टी का चूल्हा होता था जिस पर प्राइमरी स्कूल के पांचों अध्यापकों का रोज दोपहर का खाना पकाया जाता था। अतः पांच कक्षाओं में से सिर्फ तीन कक्षाओं के ही छात्रा स्कूल में बैठ सकते थे। वैसे भी खाना पकाने से उठते धुएं के फैल जाने से छात्राों को बहुत परेशानी होती थी, इसलिए अधिकतर कक्षाएं स्कूल के पास स्थित शिव मंदिर के बगल में पोखरे के किनारे पेड़ों के नीचे लगती थीं। हम सुबह स्कूल पहुंचते ही पोखरे पर दौड़ते हुए जाते और किसी घनी छाया वाले पेड़ के नीचे जगह छेंकते ताकि धूप से बचते हुए दिन भर वहां पढ़ सकें। कभी कभी घनी छाया वाले पेड़ के नीचे कब्जा करने की होड़ में अन्य कक्षाओं के छात्राों से मार पीट तक हो जाती थी। इसकी शिकायत हेड मास्टर तक पहुंच जाती। एक दिन हेड मास्टर परशुराम सिंह ने फैसला दिया कि कोई भी घनी छाया वाला पेड़ किसी एक कक्षा के लिए निर्धारित नहीं रहेगा, बल्कि जिस किसी कक्षा के छात्रा वहां पहले पहुंचेंगे, वे ही उस पेड़ के नीचे बैठेंगे। हम सिर्फ कक्षा दो तक स्कूल के अंदर बैठ कर पढ़े थे। बाकी पांचवीं तक विभिन्न पेड़ों के नीचे हमारी शिक्षा जारी रही। इन पेड़ों पर गौरैयां तथा कौओं की भरमार थी। ये ही हमारे सहपाठी होते थे। वषोर्ं बाद यह समझ कर बड़ी संतुष्टि की अनुभूति हुई कि पूरा का पूरा भारतीय दर्शन ही पेड़ों के नीचे सोचा गया था, जिनमें सर्वोपरि थे गौतम बुद्ध जिन्होंने ÷निर्वाण' यानि हमेशा के लिए दुखों से छुटकारा की विधि एक पेड़ के नीचे ही ढूंढ निकाला था। अतः ज्ञान की उस महान परम्परा का एक सूक्ष्मतम् अणु भी बन कर किसे गर्व नहीं होगा? इसलिए अब स्कूली इमारत न होने की शिकायत करने की हिम्मत नहीं होती है। घोर जाड़े के दिनों में स्कूल के सामने तथा बगल में स्थित बड़े मैदान में खुली धूप में कक्षाएं लगती थीं। मैदान में कक्षा लगने से मुझे एक बड़ा फायदा होता था। मैं गणित के प्रश्नों को चिकनी जमीन पर खपड़े से लिख कर हल कर लेता था। फिर उसे छोटे छोटे अक्षरों में पटरी या कागज की कापी पर उतार लेता था। इसका एकमात्रा कारण यह था कि मेरे पास कागज की कापी का हमेशा अभाव रहता था। इसलिए रफ के कागज बचाने के लिए जमीन पर गणित हल कर लेता था। उस समय पुड़िया में स्याही बाजार में बिकती थी जिसे पानी में घोल कर लिखा जाता था। हमें पुड़िया वाली स्याही खरीदना एक बड़ी समस्या लगती थी। अतः मेरे जैसे लगभग सभी गरीब बच्चे घर में चावल को तवे पर खूब जला कर कोयले जैसा कर देते थे, फिर उसे सिल पर लोढ़े से पीस कर पाउडर बना कर पानी में घोल कर स्याही बना लेते थे। इसी से हमारा काम चल जाता था। गर्मी के दिनों में प्यास लग जाना एक बड़ी समस्या थी। स्कूल के पास एक कुआं था, जिसके चबूतरे तक को हम दलित बच्चे छू नहीं सकते थे। पानी पिलाने की विनती मुंशी जी से की जाती। वे हमारी कक्षा में पढ़ने वाले परसूपुर गांव के हरखू मिसिर को पानी पिलाने के लिए कहते। हरखू मिसिर उम्र में काफी बड़े थे। वे लगभग नौ वर्ष की उम्र में पढ़ने आये थे। इसलिए मुंशी जी उनको कुएं से बाल्टी खींच कर पानी पिलाने को कहते थे। वे पानी पिलाते समय खूब खिलवाड़ करते थे। हम अंजुरी मुंह से लगाये झुके रहते, और वे बहुत उ+पर से चबूतरे पर खड़े खड़े पानी गिराते। वे पानी बहुत कम पिलाते थे किन्तु सिर पर गिराते ज्यादा थे जिससे हम बुरी तरह भीग जाते थे। इस खेल में हरखू मिसिर का बड़ा मनोरंजन शामिल था। मुंशी जी भीगे कपड़ों को देख कर हमें खूब गाली देते और कहते कि ठीक से पानी क्यों नहीं पीते। उल्टे हरखू शिकायत करते कि यह बाल्टी की तरफ मुंह कर रहा था, इसलिए भीग गया। इस शिकायत पर और भी गाली पड़ती। पानी पीना वास्तव में एक विकट समस्या थी। कभी कभी तो हम चुपके से पोखरे पर चले जाते; जिसका पानी गहन जलकुम्भियों से ढका रहता था। हम जलकुम्भियों को हटा कर उसका पानी पीते।
उधर साल में तीन दिन, 15 अगस्त, 26 जनवरी तथा 2 अक्तूबर के दिन पूरे प्राइमरी पाठशाला के छात्राों को गांधी टोपी पहन कर तथा हाथ में घर से बना कर लाये हुए कागज के तिरंगे झंडे को लेकर आसपास के गांवों में प्रभातफेरी निकालना पड़ता था। हम जुलूस में अलग झंडियां लेकर ÷गांधी, नेहरू तथा सरदार पटेल जिन्दाबाद' का नारा लगाते हुए चलते तथा साथ में यह भी गाते : ÷हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाईᄉ सब हैं भाई भाई।' वैसे भी प्राइमरी स्कूल में हमें गांधी टोपी रोज पहन कर आना पड़ता था। इन दिनों खासतौर पर मास्टर साहब लोग भाषण में कहते कि गांधी जी ने अछूतोद्धार के लिए लड़ा था तथा उन्होंने छुआछूत हटाया था। गांधी जी ने ही हमें आजादी दिलायी अतः हमें उनके कदमों पर चलना चाहिए। ये बातें सुन कर मैं बहुत खुश होता था किन्तु मुझे जब भी गांधी जी याद आते, अविलम्ब मुंशी जी तथा हरखू मिसिर याद आने लगते थे। विशेष रूप से एक घटना मुझे नहीं भूलती। कक्षा चार में ही एक बार हरखू मिसिर पानी पिलाने कुएं पर गये। घिर्री पर डोर चढ़ा कर बाल्टी को कुएं में डाला। मैंने कुतूहलवश कुएं के चबूतरे को एक उंगली से क्षण भर के लिए छू दिया। किन्तु हरखू मिसिर बाल्टी को कुएं में डुबाते हुए नीचे से कनखिया पीछे देख रहे थे और मुझे उंगली चबूतरे से लगाते हुए उन्होंने देख लिया। मेरे द्वारा इस महापातकी क्रिया से उनका ब्राह्मणत्व इतना आहत हुआ कि उनके हाथ से डोर छूट गयी और बाल्टी कुएं की तलहटी में जा पहुंची। हरखू मिसिर शोर मचाते हुए मुंशी जी के पास दौड़े और चिल्लाते रहे कि चमरा ने कुआं छू लिया। मैं बहुत डर गया था। उस दिन मुंशी जी दिन भर रुक रुक कर गालियां देते रहे। इसके बाद मैं कभी पानी पिलाने के लिए कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। हरखू मिसिर एक विचित्रा किस्म के व्यक्ति थे। उनके पिता जी का बचपन में ही देहांत हो चुका था। उनकी एक बहन और चार भाई थे। उनके चाचा सिंगापुर में कोई छोटी मोटी नौकरी करते थे इसलिए सिंगापुर से इन सबके लिए वे अच्छे अच्छे कपड़े भेजा करते थे। हरखू मिसिर अक्सर एक सिंगापुरी चारखाने की जांघिया तथा अधबहियां पहन कर स्कूल आते थे। हमारे साथ पढ़ रही तीन लड़कियों में एक हनौता गांव की सतिया नोनियाइन थी, जो उम्र में हरखू की ही तरह बड़ी थी। एक दिन सतिया के सामने वाली दूसरी कतार में बैठे हरखू मिसिर बेकाबू होकर जांघिया के नीचे से अपना एक अंग विशेष बाहर कर दिये। सतिया जोर से चिल्ला उठी, ''मुंशी जी! देखा हरखुवा हम्मै...देखावत हउवै।'' इतना सुनते ही मुंशी जी ने उस दिन हरखू मिसिर की जबर्दस्त पिटाई की। उन्होंने एक अरहर के डंडे से उन्हें बेतहाशा मारा। हरखू हाथ पैर जोड़ते रह गये। उस दिन चौथी कक्षा के सारे बच्चे बुरी तरह डर गये थे। उन दिनों सवर्णों में मृत्युभोज के अवसर पर ब्राह्मणों को बुला कर खिलाने का बड़ा प्रचलन था। हरखू मिसिर अक्सर मृत्युभोज के लिए जाया करते थे और वे कक्षा में बड़े शान से बताते रहते थे कि जब भी मृत्युभोज में निमंत्राण मिलता, वे दो दिन पहले से घर में खाना बंद कर देते थे तथा दांत में एक लौंग दबा कर रहते थे। जब कभी निमंत्राण मिले काफी दिन बीत जाते तो वे प्रायः कहते, ''केतना दिन होय गयल, सरवा कौनो ना मरत हौ।''
पांचवीं कक्षा में जाते जाते, हर साल रामनवमी के अवसर पर मंदिर के पास लगने वाले मेले में खेली जाने वाली रामलीला में, हरखू मिसिर को सीता जी की भूमिका के लिए चुन लिया गया। स्कूल के मास्टर जी लोग ही मंदिर के बाबा हरिहर दास के सहयोग से रामलीला करवाते थे। सीता जी के वेष में साड़ी पहने हरखू मिसिर एकदम युवती कन्या जैसे दिखाई देते थे। तमाम दलित लड़कों को रावण की सेना में विभिन्न राक्षसों की भूमिका दी जाती थी। हम राक्षस बने रामलीला में रोज मरते रहते थे। बाद में रामलीला तथा मेला समाप्त होने के बाद सबसे बुरी हालत सीता जी बनने वाले की होती थी। पास ही हाई स्कूल में पढ़ने वाले छात्राों में से कई गुंडा किस्म के लड़के वास्तव में उसका अपहरण करके पास के अरहर या गन्ना की खड़ी फसलों में अंतर्ध्यान हो जाते। असली सीता जी तो सिर्फ एक बार अपहृत हुई थीं, किन्तु यह रामलीला वाली सीता अनेक बार अपहृत हुई। बाद में हरखू मिसिर को समय समय पर अपहृत होने में बड़ी ख्याति मिली, किन्तु किसी ÷जटायु' से इसकी शिकायत उन्होंने कभी नहीं की।
उन दिनों प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय ÷सिरगोदवा बाबा' का बड़ा आतंक था। कई बार स्कूल में अफवाह उड़ गयी कि ÷सिरगोदवा बाबा' आने वाले हैं। इतना सुनते ही सैकड़ों बच्चे स्कूल से भाग कर दूर दूर फैले गन्ने के खेतों में जाकर दिन भर के लिए छिप जाते। शाम होने पर सभी डरते हुए घर जाते। कई बार मैं भी गन्ने के खेतों में छिपा रहा। वास्तव में यह सिरगोदवा बाबा कोई और नहीं बल्कि स्कूलों में सरकार द्वारा भेजे गये चेचक का टीका लगाने वाले कम्पाउंडर होते थे जिन्हें मेरे पिता जी कम्पोटर बाबू कहते थे। ये टीके जबरन छात्राों को लगाये जाते थे। इन टीकों के लगाने का तरीका बड़ा दुखदाई होता था। बाहों के उ+परी हिस्से पर त्रिाकोण में तीन बड़े बड़े छेद होकर उभड़ जाते थे और जिन्दगी भर के लिए बड़े बड़े दाग पड़ जाते। जिन्हें ये टीके लगाये जाते, वे कई दिन तक बुखार से भी पीड़ित रहते। अतः इन टीका लगाने वालों से सभी लोग भयाक्रांत रहते। लोग इन टीका लगाने वालों को सिरगोदवा बाबा कहते थे।
आजादी के बाद स्कूली छात्राों के बीच ÷श्रमदान' एक आवश्यक क्रिया होती थी, जिसके तहत हम स्कूल पहुंचते ही पूरे स्कूल की सफाई करते। सभी बच्चे अपनी कमीज या कुर्ते से झाड़ू लगाते। स्कूल से करीब एक किमी. दूर एक बावली थी, जिसमें चिकनी मिट्टी पायी जाती थी। दीपावली आने से पहले हर साल वहां से हम सभी गीली मिट्टी अपने कपड़ों में बांध कर लाते और स्कूल की पुताई करते। श्रमदान करने से जमींदारों के बच्चे बहुत घबड़ाते थे, किन्तु दलित बच्चे इसमें सबसे आगे होते थे। गैर दलित बच्चों के लिए एक श्रमदान था स्कूल के पांचों अध्यापकों को बारी बारी से कुएं से पानी निकाल कर दोपहर के समय नहलाना तथा उनकी धोती कचार कर दोनों तरफ से धोती का एक एक खूंट पकड़ कर मैदान में दौड़ते हुए सुखाना। एक धोती को दो बच्चे पकड़ कर तब तक दौड़ते रहते थे जब तक कि वह सूख न जावे। छुआछूत के चलते यह काम दलित बच्चों से नहीं लिया जाता था। दोपहर के समय रोज एक घंटे का लेजर होता था जिसके दौरान बच्चे अपने घर से लायी गयी खाद्य सामग्री को खाते। गरीबी के चलते दलित बच्चे प्रायः दो मुट्ठी दाना लाते थे जिसे वे छिपा छिपा कर खाते थे। मेरी तरह कुछ बच्चे ÷लाटा' लाते थे। जौ के सत्तू में महुवे के फूल जिसे गोदा कहते थे, को सुखा कर थोड़ा गुड़ डाल कर सान लिया जाता था इसे लाटा कहते थे। महुवे का फूल कठजमुनियां की तरह गोल तथा बड़ी गुरिया की तरह एकदम सफेद होता था, जो गर्मी के दिनों में सुबह सुबह हजारों की संख्या में पेड़ों के नीचे बिछ जाता था जिसे दलित बटोर कर घर लाते और धूप में सुखा कर गगरी में रख देते थे। यह खाने में बड़ा मादक तथा मीठा होता था। महुवा ही एक ऐसा पेड़ होता है जिसका फूल ही फल की तरह होता है। इसी से देशी शराब भी बनायी जाती थी। किन्तु लाटा खाना एक तरह से दरिद्रता का प्रतीक था। इसलिए मैं अक्सर लाटा अंगोछे में बांधे स्कूल के पास वाले नाले के किनारे एकांत में चला जाता था, जहां अनेक कब्रें थीं। वहीं एक खेत की मेढ़ पर बैठ कर लाटा खाने के बाद नाले का दो चार घूंट पानी पीकर स्कूल आ जाता था। लाटा आदि खाने के बाद लेजर के दौरान प्रायः रोज हम बच्चों के लिए एक खास मनोरंजन का केन्द्र थाᄉ स्कूल से करीब पचास गज की दूरी पर स्थित दो पक्के कमरों वाली एक वैदिक संस्कृत पाठशाला। इस पाठशाला में दो पंडित अध्यापक थे तथा करीब बीस बड़े बड़े छात्रा। ये सभी आधी धोती पहने और आधी ओढ़े बिना किसी अन्य बस्त्रा के सिर मुड़ाये, किन्तु गाय की पूंछ के बराबर चुर्की रखे, ललाट पर त्रिापुंड टीका लगाये साक्षात पाणिनि के अग्रज लगते थे। वे दिन भर विभिन्न संस्कृत के सूत्राों को रटते रहते थे। इनकी रटंत विद्या में ÷खट् चटत् पटत्' जैसी शब्दावली बार बार सुनाई देती थी। हम प्राइमरी स्कूल के बच्चे उनके इन सूत्राों को तोड़ मरोड़ कर अपना एक नया ÷सूत्रा' बना लिए थे, जो इस प्रकार था : ÷खट् चटत पटत - खट् चटत् पटत् - अगड़म् बगड़म् स्वाहा। हम कई बच्चे एक साथ संस्कृत पाठशाला की पिछली दीवार के जंगले के पास जाकर उपरोक्त ÷सूत्रा' को जोर जोर से दोहराते, जिसे सुन कर अंदर बैठे पंडित छात्रा अपना रटना बंद करके गालियां देते हुए हमें दूर दूर तक दौड़ा कर खदेड़ते थे, किन्तु वे शीघ्र ही थक कर चूर हो जाते। इसलिए वापस आ जाते। हमें उक्त ÷सूत्रा' द्वारा उन्हें चिढ़ाने में बहुत मजा आता। कभी कभी ये पंडित स्कूल में आकर अध्यापकों से शिकायत करते। अध्यापकों के डांटने पर दो चार दिन तक हम नहीं जाते, किन्तु पुनः सब कुछ शुरू हो जाता। इस संदर्भ में एक रोचक बात यह होती थी कि जब भी हम उस जंगले के पास उक्त चिढ़ाने वाले सूत्रा को दोहराते, पाठशाला के अंदर बैठे सारे पंडित सबसे पहले चिल्लाते हुए यह बोलते : ÷अशुद्धम् वर्तते-अशुद्धम् वर्तते' इसके बाद वे गालियां देते हुए हमें खदेड़ते थे। सभी बच्चे शुरू में ÷अशुद्धम् वर्तते' का अर्थ नहीं समझते थे, किन्तु एक दिन हाई स्कूल के संस्कृत अध्यापक चंद्रशेखर पांडे से कुछ बच्चों ने ÷प्रणाम पंडित जी' कहते हुए अशुद्धम वर्तते का अर्थ पूछा। उन्होंने बताया कि अशुद्धम् वर्तते का मतलब ÷गलत' है। ये बच्चे सारे बच्चों को लेजर के समय ÷अशुद्धम वर्तते' का असली अर्थ बता दिये। इतना जानने के बाद सभी बच्चे पुराने ÷सूत्रा' को छोड़ कर उसी जंगले के पास खड़े होकर रटंत विद्या में व्यस्त पंडितों को चिढ़ाने के लिए ÷अशुद्धम् वर्तते-अशुद्धम् वर्तते' की रट लगाने लगे। इस नये ÷सूत्रा' को सुन कर सारे पंडित क्रोध से पीड़ित होकर अंधाधुंध गालियां देते हुए दूर तक खदेड़ने लगे। बच्चों के इस नये हथियार से पंडित आगबबूला तो अवश्य हो जाते, किन्तु उसकी प्रतिक्रिया में संस्कृत की कोई अन्य शब्दावली उनके मुंह से नहीं निकल पाती। धीरे धीरे थक हार कर पंडितों ने बच्चों को खदेड़ना बंद कर दिया, जिसके बदले बच्चे भी उन्हें चिढ़ाना कम कर दिये। सच मानिये, तो पंडितों द्वारा क्रोधित होकर गालियां देते हुए खदेड़ने से बच्चों का काफी मनोरंजन होता था, किन्तु जब खदेड़ना बंद हो गया, तो बच्चे भी उदास होकर चुप रहने लगे। संस्कृत पाठशाला के सामने एक छोटा सा पीपल का पेड़ था। जाड़े के दिनों में सारे पंडित उसी पेड़ के इर्द गिर्द बैठ कर अपनी पढ़ाई करते थे। लेजर के समय जब प्राइमरी स्कूल वाले कुछ बच्चे उनके सामने से चुपचाप गुजर जाते, तो ये पंडित स्वयं बच्चों द्वारा चिढ़ाने वाली पहली शब्दावली... ÷अगड़म् बगड़म् स्वाहा' आपस में दोहराते हुए खूब ठहाका लगाते। वास्तव में वह संस्कृत पाठशाला प्राइमरी स्कूल के चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चों के लिए एक विचित्रा मनोरंजन का केन्द्र थी। पाठशाला में छुट्टियां बहुत रहती थीं, क्योंकि हिन्दू पंचांग के अनुसार अनेक व्रत वाले दिन होते थे। अतः जिस दिन पंडित नहीं आते, उस दिन संस्कृत पाठशाला सूनी सूनी लगती और प्राइमरी स्कूल वाले बच्चे इस सूनेपन से काफी निराश हो जाते, क्योंकि उनकी चिढ़ाने वाली सामग्री का उपयोग नहीं हो पाता था। हम जब तक उस प्राइमरी स्कूल में पढ़ते रहे, तब तक हमारे और संस्कृत पाठशाला के पंडितों के बीच यह रोचक आंखमिचौनी जारी रही। आज भी वे गाय की पूंछ के बराबर चुर्कीधारी पंडित मुझे बहुत याद आते हैं और मन करता है कि यदि वे पुनः मिल जांय तो मैं...अगड़म् बगड़म् स्वाहा दोहराउ+ं, जिसके बदले गालियां सुनते हुए दूर तक खदेड़ा जाउ+ं।
चौथी पांचवीं कक्षा में जाते जाते मैं बहुत कुछ सीख चुका था, इसलिए पढ़ाई में बहुत मन लगने लगा था। गणित में मुझे हमेशा शत् प्रतिशत अंक मिलते थे। इन दोनों कक्षाओं में शाम के समय अंतिम घंटा मेन्टल का होता था, जिसके तहत गणित के जबानी प्रश्न पूछे जाते थे तथा सोचने के लिए मुश्किल से एक मिलट का समय दिया जाता था। जवाब न दे पाने वाले छात्राों को खड़ा रहना पड़ता था। फिर अध्यापक पूरी कक्षा से कहते जो उत्तर देना चाहता है, वह तुरंत बताये। मैं हमेशा उत्तर सबसे पहले बता देता था। इसके बाद अध्यापक मुझे आदेश देते कि जिन छात्राों ने उत्तर नहीं दिया है, उन्हें मैं एक एक झापड़ या मुक्का मारूं। मैं अक्सर रोज ही इस प्रक्रिया में अनेक छात्राों की पिटाई कर देता, जिसके कारण छात्रा, खास करके सवर्ण जातियों के बच्चे मुझसे बहुत घृणा करने लगे थे, जिसका प्रमुख कारण था मेरा अछूत होना तथा उ+पर से चेचक वाला चेहरा तथा एक आंख का खराब होना। ऐसे छात्रा लेजर के दौरान मुझे इंगित करके बाजार में सामान बेचने वालों की बोली की नकल पर कहते : ''ले अमरूद ए काना ए काना।'' यानि एक आना का बिगड़ा हुआ रूप ÷ए काना'। ऐसा सुन कर मुझे बहुत बुरा लगता, किन्तु कुछ बोल नहीं पाता था जिसकी खास वजह थी मेरे घर का वातावरण जिसमें मुझे इस तरह की शब्दावली से अक्सर जूझना ही पड़ता था। किन्तु मैंने स्कूल में इससे निपटने का एक उपाय ढूंढ लिया था। जो छात्रा वैसा कह कर मुझे चिढ़ाते थे, उन्हें मेन्टल के दौरान अध्यापक द्वारा झापड़ मारे जाने के लिए कहने पर मैं बहुत जोर से मारता था जिससे वे तिलमिला कर रह जाते थे किन्तु वे अध्यापकों के डर से कुछ कर नहीं पाते थे। बाद में कई छात्रा मेन्टल वाला घंटा आने से पहले मुझसे गिड़गिड़ाते हुए कहते : ''आज जोर से मत मरिहा।'' मेरा यह हथियार बड़ा काम का सिद्ध हुआ और धीरे धीरे सामान बेचने वाली बोली बंद हो गयी।
चौथी कक्षा के बाद मुंशी जी से छुटकारा मिल गया था, क्योंकि पांचवीं कक्षा को हमेशा हेड मास्टर परशुराम सिंह पढ़ाते थे। हेड मास्टर साहब प्रायः सवर्ण छात्राों से कहते : ''ठीक से सवाल पढ़िके ना अइबा त येही चमरै से रोज पिटवाइब।'' यह सुन कर मैं बहुत खुश होता और इससे मुझे गहन अध्ययन की बहुत प्रेरणा मिलती। पढ़ाई के दृष्टिकोण से हेड मास्टर परशुराम सिंह मेरे सबसे बड़े प्रेरणास्रोत थे। वे हमेशा कक्षा में मेरी प्रशंसा करते और जब ज्यादा खुश होते तो कहते : ''ई चमरा एक दिन हमरे स्कूले क इज्जत बढ़ाई।'' उन दिनों प्राइमरी स्कूलों में ÷डिप्टी साहेब' यानि स्कूल इंस्पेक्टर का बहुत खौफ रहता था। तीन चार माह में एक बार जिला केन्द्र से कोई न कोई डिप्टी साहब अवश्य स्कूल का दौरा करने आ जाते तथा नियमित रूप से वे पता लगाते कि स्कूलों में पढ़ाई लिखाई ठीक से चल रही है या नहीं। एक बार एक डिप्टी साहब आने की तारीख निर्धारित कर दिये थे। स्कूल के अध्यापकों के बीच बड़ा हड़कम्प मच गया था, जिसका प्रमुख कारण था कि डिप्टी साहब चमार थे। हड़कम्प इस सवाल पर सबसे ज्यादा मचा हुआ था कि खाना तो रोज की तरह अध्यापकों के चौके में बन जायेगा, किन्तु अपनी थाली में कैसे खिलायेंगे? हेड मास्टर साहब ने मुझसे कहा कि मैं अपने घर से एक लोटा तथा थाली लाउ+ं, किन्तु यह बात किसी को भी न बताउ+ं। मैंने वैसा ही किया और उसी में डिप्टी साहब को खाना दिया गया। चमार डिप्टी साहब से सबसे ज्यादा डर इस बात के लिए था कि यदि वे स्कूल से नाराज हो गये तो जिला केन्द्र पर शिकायत कर देंगे और सारे अध्यापकों की तनख्वाह रोक दी जायेगी। वैसे जब भी कोई डिप्टी साहब आते, हमेशा तीसरी से पांचवीं कक्षा के बीच किसी कक्षा का चयन करके उसके बच्चों से कुछ सवाल पूछते। मुआयना करने का उनका यही तरीका होता था। ऐसे अवसरों पर हेड मास्टर साहब हमेशा मुझे मुआयना वाली कक्षा में सबसे पीछे बैठा देते। मुझे उनका निर्देश होता था कि डिप्टी साहब जब भी कोई सवाल किसी से भी पूछें, तो तुम तुरंत खड़े होकर उत्तर दे देना। मैं ऐसा ही करता था। ऐसा करने पर डिप्टी साहब अक्सर चिढ़ कर कहते कि तुमसे तो हमने सवाल पूछा नहीं था? इस पर हेड मास्टर साहब हमेशा डिप्टी साहब से कहते कि साहब यह एक ÷हरिजन' का बेटा है जो हमारे स्कूल का सबसे अच्छा विद्यार्थी है और आदतन हर काम पहले करता है। उनके इस तर्क पर डिप्टी साहब का पूरा ध्यान ÷हरिजन' के इर्द गिर्द चला जाता और वे तुरंत पूछने लगते कि और कितने हरिजन यहां पढ़ते हैं तथा वे पढ़ने में कैसे हैं, आदि आदि? इस तरह मुआयना समाप्त हो जाता। हेड मास्टर साहब की यह रणनीति हमेशा सफल होती, किन्तु एक बार वही पुराने वाले डिप्टी साहब दोबारा आ गये। उस समय हेड मास्टर साहब बहुत घबड़ा गये थे क्योंकि पहले वाली रणनीति दोहरा नहीं सकते थे। जैसे तैसे मुआयना हुआ और अच्छा ही रहा। किन्तु इस बार मेरा उपयोग न हो पाने से मुझे थोड़ी निराशा जरूर हुई थी।
उस जमाने में डिप्टी साहब का स्कूलों में काफी भय समाया रहता था। एक बार मैं चौथी कक्षा (1958) में पढ़ रहा था। स्कूल के बाहर एक टूटी दीवारों वाला बिना छत का खंडहर था, जिसमें हमें बैठा कर मुंशी जी पढ़ा रहे थे। इस खंडहर का फर्श समतल था। मुंशी जी आदतन हमेशा हुक्का पीते रहते थे, तथा बच्चों से आग जलवा कर अपनी तम्बाखू वाली बड़ी सी चिलम भरवाते रहते थे। उस खंडहर के बगल में कई बीघा खेतों में बड़ी बड़ी अरहर की फसल खड़ी थी। हुक्का पीते हुए मुंशी जी ने अचानक देखा कि एक बीधा दूरी पर एक आदमी धोती कुर्ता पहने किन्तु सिर पर हैट लगाये स्कूल की तरफ चला आ रहा है। मुंशी जी ने हैटधारी होने का मतलब यह निकाला कि डिप्टी साहब बिना सूचना दिये स्कूल का मुआयना करने आ रहे हैं, क्योंकि उस समय डिप्टी साहब लोग हमेशा हैट पहन कर आते थे। वास्तव में ÷हैट' अफसर होने का सबसे बड़ा प्रतीक था, क्योंकि अभी कुछ ही वर्ष पूर्व हैटधारी अंग्रेज भारत छोड़ कर वापस इंग्लैण्ड गये थे, किन्तु अपनी विरासत पढ़े लिखे भारतीयों के लिए बरकरार रखी थी। अतः उस धोती कुर्ते वाले हैटधारी को मुंशी जी ने डिप्टी साहब समझ कर डर के मारे आग जलती हुई चिलम समेत हुक्के को अरहर की खड़ी फसलों के बीच फेक दिया। उस खेत में अरहर की सूखी पत्तियां बड़ी मात्राा में गहनता के साथ फैली हुई थीं। कुछ ही पलों में चिलम की आग से सूखी पत्तियां जलने लगीं और उसकी लपटें बड़ी तेजी से फैलने लगीं। कुछ पल तक तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय? उधर डिप्टी साहब के डर से जोर जोर से बोल कर मुंशी जी किताब पढ़ाने लगे। इसी बीच हैटधारी व्यक्ति स्कूल के पास से गुजरने वाली पगडंडी से होता हुआ आगे निकल गया। इसके बाद मुंशी जी ने सारे बच्चों को अपनी अपनी पटरी से आग बुझाने के लिए दौड़ा दिया। जैसे तैसे पटरी से पीट पीट कर ढेर सारे बच्चों ने आग बुझायी। गनीमत यह थी, कि अरहर के डंठल अभी कच्चे थे, इसलिए उसमें आग नहीं लग पायी, वर्ना कई बीघा में फैली फसलें जल कर राख हो चुकी होतीं। मुंशी जी समेत पूरे स्कूल ने राहत की सांस ली। इस बीच मुंशी जी धड़कते हुए दिल के साथ बोल पड़े : ''सरवा! डेरवाय देहलै।'' बाद में पता चला कि वे स्कूल के पास वाले टड़वा गांव के तेजई सिंह नामक जमींदार थे, जो सिर्फ पांचवीं तक पढ़े थे किन्तु हैट लगा कर हमेशा साहबी रोब झाड़ा करते थे। उस दिन मुंशी जी को हेड मास्टर साहब ने बहुत धिक्कारा था।
डिप्टी साहब की कड़ी में, एक दिन जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ रहा था, अचानक असली डिप्टी साहब स्कूल का मुआयना करने आ गये। उस दिन हेड मास्टर परशुराम सिंह पांचवीं कक्षा के सारे विद्यार्थियों को अपने गांव जिगरसंडी ले गये थे, जहां उनसे कई गाड़ी गन्ना छिलवाया गया था। कारण यह था कि हेड मास्टर साहब इस क्षेत्रा के सबसे बड़े जमींदार थे, जिनके घर बाईस जोड़ी बैलों की खेती होती थी। जाड़े के दिनों में उनका गन्ना चिरैयाकोट थाना स्थित चीनी मिल में बैलगाड़ियों पर लद कर जाता था। अतः एक दिन जल्दी जल्दी गन्ना छील कर गाड़ियों में लादने के लिए वे छात्राों को अपने गांव ले गये। गनीमत यह थी कि पहली से चौथी कक्षा के छात्रा एवं अध्यापक स्कूल में ही थे। उस दिन डिप्टी साहब ने हेड मास्टर साहब के बारे में पूछा तो अन्य अध्यापकों ने बता दिया कि वे पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को लेकर पास वाले गांव में ÷श्रमदान' के लिए गये हैं। स्मरण रहे कि आजादी के पहले दशक में स्कूलों में श्रमदान का प्रचलन था जिसके तहत बच्चों को आसपास के गांवों में श्रमदान करना पड़ता था। डिप्टी साहब हेड मास्टर तथा छात्राों के आने का इंतजार करने लगे। काफी देर बाद, दोपहर के बाद, हम लोग स्कूल वापस आये। डिप्टी साहब स्कूल के बाहर ही बैठ कर हमें आते हुए देख रहे थे। पास आने पर अचानक हेड मास्टर साहब से बिना कुछ पूछे, कुछ छात्राों से ही पूछ लिया कि वे कौन सा ÷श्रमदान' करके आ रहे हैं? छात्राों ने बिना सोचे बिचारे सही सही बता दिया। गन्ना छीलने की बात सुन कर डिप्टी साहब आगबबूला हो गये और वापस जाने लगे। उस दिन हेड मास्टर साहब बहुत गिड़गिड़ाये थे तथा बड़ी मुश्किल से डिप्टी साहब को मना कर स्कूल में वापस ले आये थे। बाद में बच्चों के बीच अफवाह उड़ी कि हेड मास्टर साहब ने डिप्टी साहब को एक महीने की तनख्वाह घूस में देकर मनाया था। इस घटना के बाद कभी दोबारा गन्ना छीलने वाला ÷श्रमदान' नहीं हुआ।
उधर वापस गांव में देखा जाय तो सन् 1958-59 लगभग 1957 का ही अग्रसारित रूप था। इस अवधि में हमारे पूरे क्षेत्रा में भयंकर सूखा पड़ गया तथा दोनों वर्ष बहुत कम बारिश हुई थी। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। उचित सिचाई के साधनों की निहायत कमी के कारण अधिकतर फसलें सूख गयी थीं। अतः 1957 में नौ ग्रहों के मिलने से होने वाले अनिष्ट की अफवाहों का ÷साकार रूप' सूखे से उत्पन्न स्थिति में लोगों को साफतौर पर दिखाई देने लगा था। इसलिए अंधविश्वासों का हद से ज्यादा बोलबाला हो गया था। खाद्यान्नों की कमी के कारण लोग भुखमरी के शिकार होने लगे थे। अनेक गांवों में विशेष रूप से दलित परिवार के लोग रात में अक्सर फाका करने लगे थे। हमारे घर वालों की भी यही स्थिति थी। हमारी दादी हुक्की पीने की बड़ी शौकीन थी। इसलिए एक बोरसी में हमेशा कंडे की आग सुरक्षित रहती थी। दलित बस्ती की अनेक औरतें चूल्हा जलाने के लिए प्रायः रोज दादी से आग मांग कर ले जाती थीं। उस समय अनेक घरों में फाका के कारण चूल्हे नहीं जलते थे, इसलिए दादी से कोई जब आग मांगने नहीं आता तो वह बड़ी दुखित होकर कहती कि लगता है उसके घर खाना नहीं पकेगा। दादी की इस उक्ति में अत्यंत करुणा का भाव छिपा रहता था, किन्तु जिस दिन स्वयं हमारे घर में चूल्हा नहीं जलता, उसके बारे में वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थी। दादी की इस चुप्पी के बारे में जब आज मैं सोचता हूं, तो लगता है कि उसके अंदर कितनी भारी पीड़ा सुलगती रही होगी। उस अकाल के दौरान सबसे सस्ती वस्तु चीनी मिल से निकला हुआ चोटा होता था। अधिकतर दलित बाजार से चोटा लाकर सुबह और दोपहर को उसका रस घोल कर पीते थे तथा उसके साथ मटर की दाल पानी में भिगो कर एक दो मुट्ठी खा लेते थे। रात के समय यदि उपलब्ध हुआ तो आटे की मोटी लिट्टी बना कर नमक प्याज से लोग गुजारा करते थे। चोटा लगातार पीते रहने से विशेष रूप से बच्चों को अक्सर पेचिश की बीमारी हो जाती थी। ऐसा होने पर दादी प्रायः गांव की औरतों को कहती कि वे अमरूद या अमलताश की पत्ती पीस कर छानने के बाद उसका रस पेचिश पीड़ितों को पिलावें। इस रस से पेट हमेशा ठीक हो जाता था। गांव के आसपास के छोटे मोटे जलस्रोतों के सूख जाने के कारण दलित बच्चे अक्सर बहुत कम नहा पाते थे, इसलिए खुजली की बीमारी बड़ी तेजी से फैल जाती थी। दादी खुजली ठीक करने के लिए भंगरैया नामक पौधे की पत्तियां पीस कर उस पर छोपने के लिए कहती थी, जिससे खुजली ठीक हो जाती थी। फोड़े फुंसी के उ+पर वह अकोल्ह के पत्ते पर मदार के दूध को पोत कर चिपकवा देती थी, जिससे उसका इलाज हो जाता था। इस प्रकार के अनेक नुस्खों से उस अकाल में दादी अनेक लोगों का मुफ्त में इलाज कर देती थी। सबसे मजेदार बात तो यह थी कि दीवाली का त्योहार आने पर मेरी मां परम्परा के अनुसार अनाज पछोरने वाले सूप को एक लकड़ी से भद भद पीटते हुए रात की अंतिम घड़ी में घर के एक एक कोने में जाती और साथ में जोर जोर से अर्द्ध गायन शैली में ÷सूप पीटो दरिद्दर खेदो' का जाप भी करती रहती। गांव की अन्य महिलाएं भी ऐसा करती थीं, किन्तु कोई घर से दरिद्रता भागा पाने मंें कभी सफल नहीं हुई। उस अकाल में भी खूब सूप पीटे गये, किन्तु हर घर के कोने कोने में वही समाई हुई थी। ऐसा लगता था कि मानो धरती की सतह से पानी कहीं उड़ गया था, किन्तु हर बड़े छोटे भूखे की आंखों में तो एक एक समंदर हिलोरें ले रहा था। गांव के जमींदारों के पास अन्न के भंडार हमेशा होते थे। वे कई मन अनाज अलग से रखते थे जिसे ÷बेंगही' कहते थे। बेंगही का मतलब था खेत में बोने के लिए बीज। वे हर साल दलितों को हर फसल के बोने के लिए ÷सवैय्या' पर बेंगही देते थे। सवैय्या का मतलब था कि यदि एक सेर बेंगही दिया गया तो फसल कटने के बाद सवा सेर अनाज लौटाना पड़ेगा। यह बेंगही सारे दलित हरवाही के बदले उन्हीं जमींदारों द्वारा दिये गये छोटे छोटे खेत के टुकड़ों में बोने के लिए लाते थे। किन्तु उस अकाल में पेट भरने के उद्देश्य से जब उनसे बेंगही मांगी जाती, तो वे ÷डेढ़िया' पर देने को तैयार होते। ÷डेढ़िया' का मतलब था एक सेर के बदले डेढ़ सेर वापस करना। उस भुखमरी के दौर में यह अमानवीय डेढ़िया की मुनाफाखोरी बड़ी दुखदाई सिद्ध होती थी। अधिकतर दलित डेढ़िया न चुका पाने के भय से बहुत कम बेंगही उधार ले पाते थे। ऐसी बेंगही न चुका पाने पर दिन भर जमींदारों के खेत पर ÷बनि' के बदले कई दिन तक मुफ्त में काम करना पड़ता था। ÷बनि' का मतलब होता था दिन भर काम के बदले एक सेर अनाज की मजदूरी। उन दिनों किलो या ग्राम का प्रचलन नहीं था। अतः सारी तौल सेर तथा छटाक में होती थी। एक सेर का बटखरा एक टूटा हुआ पत्थर का टुुकड़ा होता था जो सरकारी सेर से बहुत छोटा होता था। हमारे गांव के ब्राह्मण तो ईंट तोड़ कर अपना सेर चलाते थे जो असली सेर से लगभग एक चौथाई कम का होता था। वे बनि इसी ईंट से तौल कर, वह भी सबसे खराब अनाज, दलितों को देते थे, किन्तु बेंगही वापस असली सेर से तौलते थे। अतः बेंगही तथा कमतौली हुई बनि का मिलना भी दूभर हो जाता था।
डेढ़िया बेंगही का चक्रविधि भुगतान और ईंट वाली तौल से चुकायी जाने वाली बनि आदि को लेकर दलितों तथा ब्राह्मणों के बीच अक्सर बड़ी तनातनी हो जाती थी। प्रायः हर साल दलित कुछ दिनों के लिए हड़ताल कर देते थे। हड़ताल के दौरान कभी कभी लाठी डंडे तक चल जाते थे। जब भी लाठी डंडे चलने की नौबत आती, गांव के सारे दलित पंचायत के लिए हमारे घर चौधरी चाचा के यहां आते। उसी कुएं के चबूतरे पर पंचायत होती और चौधरी चाचा सबकी राय से ÷कूर' बांध देते थे। ÷कूर' बांधने का मतलब था किसी निर्धारित समय तथा स्थान पर जमीन पर खपड़े से एक खूब लम्बी रेखा खींच देना। उस रेखा के दोनों तरफ काफी दूर पर दोनों परस्पर विरोधी पक्ष खड़े होते। रेखा के इस पार खड़े दलित उस पार खड़े ब्राह्मणों को चुनौती देते कि यदि हिम्मत हो तो रेखा पार करके दिखावें। यदि ब्राह्मण रेखा पार कर लेते, तो तुरंत दलितों से लड़ाई शुरू हो जाती। ब्राह्मण हमेशा भाले और बल्लम से लैस रहते थे किन्तु दलित सिर्फ लाठियां रखते। ऐसी कूर बंधी लड़ाइयों में दलित महिलाओं की वीरता देखते ही बनती थी। ये सारी महिलाएं मरे हुए बैलों तथा गायों की बड़ी बड़ी तलवारनुमा पसलियां अपने घरों में अवश्य हथियार के रूप में रखती थीं। कुछ दलित औरतें गांव के पास वाले गड्ढों में फेकी हुई ÷बियाना' कमाने वाली हाड़ियों को उठा लातीं। गांव की ब्राह्मणियों को जब बच्चे पैदा होते तो ये दलित महिलाएं उन्हें पैदा करवा कर उनकी नाल खेरी काट कर एक हड़िया में भर कर गड्ढे में फेक आती थीं तथा बारह दिनों तक जच्चा बच्चा दोनों की वे लगातार मालिश आदि करती थीं। यहां तक कि उनके मल मूत्रा भी वे हड़िया में भर कर फेकती थीं। इन्हीं सारी क्रियाओं को ÷बियाना' कमाना कहते थे। हमारे घर में चौधरानी चाची बियाना कमाने में सिद्धहस्त थी तथा गांव के अधिकतर बच्चों को वही पैदा करवाती थी। कूर की लड़ाई के दौरान जब दलित महिलाएं इन हाड़ियों तथा गाय बैलों की पसलियों को लेकर ब्राह्मणों को मारने के लिए दौड़तीं तो वे जान बचा कर भाला बल्लम फेक कर बड़ी तेजी से पीछे भागने लगते, क्योंकि बियाना की हाड़ियों और मरे बैलों तथा गायों की पसलियों से छू जाना वे महापाप समझते थे। ये औरतें कुछ हाड़ियों तथा पसलियों को जोर लगा कर दूर फेकतीं, जिससे ब्राह्मण अत्यंत भयभीत हो जाते थे। इस प्रक्रिया में हमेशा दलितों की जीत होती थी। इसके बाद कई ब्राह्मण गिड़गिड़ाते हुए पुनः काम शुरू करने के लिए राजी करते थे। तथा कुछ दिनों तक असली सेर से तौल कर बनि देते थे, किन्तु बाद में फिर वही ईंटों वाला सेर हावी हो जाता था। फसल कटाई के दौरान सेर भर अनाज बनि में देने का प्रचलन नहीं था, बल्कि बीस ÷केड़ा' फसल पर एक केड़ा बनि के रूप में मिलता था। ÷केड़ा' का मतलब था दोनों बाहों के बीच जितनी फसल अंट जाती थी, उसे एक केड़ा कहते थे। अतः फसल काटते समय दलित केड़ा बना बना कर खेत में रखते जाते थे तथा पूरे खेत की कटाई के बाद सारे केड़ों को गिन कर बनि वाले केड़े बीस पर एक के हिसाब से निर्धारित होते थे। इन केड़ों में से एक या दो केड़े दलित अपनी मर्जी से चुनते थे तथा बाकी ब्राह्मण मालिकों की मर्जी से। जिस केड़े को दलित अपनी मर्जी से लेते उसमें रखी जाने वाली खूब दानेदार फसलों को दबा दबा कर रखते थे। अधिकतर दलितों को ठीक से गिनती नहीं आती थी, इसलिए ब्राह्मण केड़ा गिनने में चालाकी कर जाते थे, किन्तु दूसरी कक्षा के बाद मेरे घर वालों के लिए केड़ा गिनने में मेरी गणित हमेशा काम आती रही। गांव के कुछ अन्य दलित भी मुझे केड़ा गिनने के लिए ले जाते थे। किन्तु उस अकाल के दौरान बहुत कम फसलें उत्पन्न हुईं इसलिए बनि के केड़े भी कम ही मिले।
इन अकाल के दिनों में दलितों को बहुत ज्यादा श्रम करना पड़ता था, किन्तु कमाई बहुत कम हो पाती थी। विशेष रूप से जमींदारों के खेतों की सिचाई के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। दलितों को जमींदारों द्वारा काम पर बुलाने के लिए एक विचित्रा परम्परा थी। हर रोज रात के पिछले पहर में जब भी विभिन्न गांवांें में पालतू मुर्गे जोर जोर से ÷कुकड़ू कू' की आवाज निकालते हुए बोलते थे, सारे जमींदार अपने अपने घरों के बाहर खड़े होकर हरवाहों के नाम लेकर जोर जोर से बुलाने लगते थे। हर दलित हरवाहा अपने मालिक की आवाज सुन कर जोर से चिल्ला कर उत्तर देता : ÷आवत हई मालिक'। जमींदारों द्वारा बुलाये जाने वाले शब्द प्रायः बड़े ही निरादरपूर्ण होते थे। पहली आवाज पर कुछ उत्तर न मिलने पर वे गालियां देते हुए दोबारा आवाज लगाते थे। दलित इन गालियों का जवाब नहीं दे पाते थे। इस तरह प्रतिदिन सूर्योदय से एक दो घंटे पहले ही मुगोर्ं की बांग पर दलित काम पर चले जाते थे और शाम तक श्रम करते रहते थे। अत्यधिक काम के बाद थक कर अधपेट खाकर रात में सोये हुए दलित मुर्गे की आवाज के बाद बिना नींद पूरी हुए मजबूरी में जागने पर प्रतिदिन दुखित होकर उन मुगोर्ं को गालियां देते थे। अतः वे जमींदारों का सारा गुस्सा मुगोर्ं पर ही उतार कर संतुष्ट हो जाते थे। इतना ही नहीं हल जोतते समय अनेक दलित बैलों को खूब गालियां सुनाते थे। ये गालियां बैलों के ÷गोसयां' यानि मालिक की बहन बेटी की ऐसी की तैसी कर देने वाली होती थीं। युवा हरवाहे ऐसी गालियां कुछ ज्यादा ही देते थे। किन्तु पुराने लोग शांत रहते थे। मेरे पिता जी बहुत शांत प्रकृति के थे। अतः वे कभी भी ऐसा नहीं करते थे। उनके परोपकारी स्वभाव की प्रतीक उनकी एक आदत मुझे आज भी प्रेरणा देती रहती है। वे जब भी कहीं जाते, हमेशा रास्ते में पड़े कंकड़ पत्थर तथा कांटे आदि को उठा कर दूर फेकते जाते, ताकि उनसे कोई घायल न होने पाये। उनकी इस करतूत का अनुसरण करते हुए मुझे आज भी बहुत संतुष्टि मिलती है।
जहां तक उस अकाल में सिचाई का सवाल है, वह बहुत मेहनत का काम था। सिचाई बड़े ही आदिम तरीके से होती, जैसे ÷दोन' चलाना, ÷ओड़िचा' चलाना, ÷ढेकुल' चलाना, ÷पूर' नाघना तथा ÷घर्रा' खींचना। इन कामों में हरवाहे का पूरा परिवार शामिल हो जाता था। टिन से बनी लम्बी नालीनुमा आकृति जो बीच से थोड़ा टेढ़ी होती थी, उसे ÷दोन' कहते थे। किसी जल स्रोत के किनारे लगभग 10 फीट लम्बे तीन बांसों के उ+परी छोर को त्रिाभुज आकार में रस्से बांध कर गहुवा बना कर तीन कोनों में खड़ा कर दिया जाता था। उसके उ+पर एक काफी लम्बा बांस ढीला करके बांध दिया जाता था। बांस का अगला हिस्सा पानी के किनारे रधी दोन से एक पांच फीट लम्बी मोटी रस्सी से बंधा रहता था। बांस के पिछले हिस्से में एक बड़ी टोकरी, ईंट पत्थर से भर कर बांध दी जाती थी। इस तरह दोन का संतुलन कायम हो जाता था। दो आदमी रस्सी पकड़ दोन को पानी में डुबा कर भरते फिर उसे उ+पर की तरफ ठेलते। इस प्रक्रिया में बांस के पीछे बंधी ईंट पत्थरों वाली टोकरी नीचे की तरफ जाती और इस संतुलन द्वारा दोन का पानी जमीन पर बनी नाली में गिरता रहता। इसे ही दोन चलाना कहते थे। अतः दोन का पानी नाली द्वारा दूर दूर स्थित खेतों में सिचाई के लिए चला जाता था। हमारे गांव के ताल में दोन चलती थी। ÷ओड़िचा' बांस की खपच्चियों से बना छातानुमा दउरा या टोकरा होता था, जिसकी मेहखड़ पर दो तरफ दो दो मोटी रस्सियां बांध दी जाती थीं, उसे दो आदमी या औरतें पकड़ कर संतुलन के साथ पानी के किनारे आमने सामने खड़े होकर ओड़िचा को पानी में डुबा डुबा कर जमीन पर बनी नाली पर गिराते। रस्सियों के संतुलन से पानी आसानी से ओड़िचा के बाहर हो जाता था। इस तरह नालियों से होकर पानी खेतों में चला जाता था। ÷ढेकुल' दोन की तरह ही चलायी जाती थी, किन्तु वह हमेशा कुएं से पानी निकालती थी। सारा तरीका दोन जैसा ही होता था, किन्तु दोन के बदले बटुला की आकृति में बनी लोहे के चादर की ढेकुल बड़ी मोटी डोर से बांस में बंधी होती थी। ÷पूर' नाधना दो बैलों की जोड़ी द्वारा होता था। जुआठा में बैलों को नाध कर बरहा (मोटा रस्सा) से बांध दिया जाता था फिर बरहे के दूसरे हिस्से में चमड़े से बनी एक बड़ी मोट या चरसा को बांध कर कुएं के उ+पर रखी घिर्री से पानी में लटका दिया जाता था। कुएं के सामने उ+पर से नीचे की तरफ तिरछी बनी पौदर जिसका अगला हिस्सा काफी गहरा होता था, में बैलों को एक आदमी हांकते हुए ले जाता था। इस प्रक्रिया द्वारा मोट का पानी उ+पर आता था जिसे हमेशा एक औरत मजदूर पकड़ कर नाली में गिरा देती थी। इस औरत के काम को मोट छीनना कहते थे। घर्रा खींचने की सारी प्रक्रिया पूर जैसी ही होती थी, किन्तु पौदर में बैलों के बदले स्वयं आदमी बरहे को पकड़ कर मोट को खींचते थे। पूर और घर्रा दोनों में औरत ही मोट छीनती थी छुट्टियों के दिन मैं भी पिता जी के साथ घर्रा खींचने में सहायता करता था और मेरी मां हमेशा मोट छीनती थी। अपनी मां को मजदूरी करते देख कर मुझे बहुत दुख होता था। उस अकाल में सिचाई के ये आदिम तरीके बहुत श्रम वाले होते थे, जबकि खेतों की सिचाई अत्यंत अपर्याप्त हो पाती थी। क्योंकि ताल में बहुत कम पानी रह गया था तथा कुओं में पानी बहुत नीचे चला गया था।
वैसे गांव में कुओं की संख्या भी काफी कम थी। हमारे पूरे गांव में सिर्फ छः कुएं थे, जिनमें से सिचाई के लिए तीन कुओं का ही उपयोग होता था, क्योंकि शेष तीन कुएं ब्राह्मणों के पानी पीने के लिए थे तथा उन्हें दलित छू नहीं सकते थे। गांव वाले कुओं को ÷इनार' कहते थे। एक तो अकाल, दूसरे छुआछूत के चलते ब्राह्मणों के कुओं का इस्तेमाल न हो पाने के कारण स्वयं उनकी ही फसलों को नुकसान झेलना पड़ता था। विशेष रूप से धान की फसलों की सिचाई बिल्कुल नहीं हो पाती थी, क्योंकि इनके खेत गांव के पूरब मुर्दहिया के जंगलों के पास होते, जबकि सारे कुएं पश्चिम तरफ अन्य फसलों वाली सीवानों में थे। अतः धान की सिचाई असम्भव थी। इसलिए अकाल के दौरान धान की सारी फसलें सूख जाती थीं तथा उनमें बालियां नहीं लग पाती थीं। सूखने के बाद मुश्किल से उनके तने सात आठ इंच का होकर मुर्झा जाते थे। इन मुर्झाये हुए तनों को कूसी कहा जाता था। फसलें सूखने के कारण पशुओं को खिलाने के लिए चारा ठीक से नहीं मिल पाता था। इसलिए लोग इन पशुओं को कूसी चराने के लिए खेतों में ले जाते थे। मैं भी कूसी चराने जाया करता था। पानी की कमी के कारण धान के खेत जिन्हें ÷कियारा' कहा जाता, की जमीन फट कर चारों तरफ विभिन्न प्रकार की दरारों में बदल जाती थी। कियारों की इन फटी दरारों से अनेक जगहों पर तरह तरह की प्राकृतिक कलाकृतियां बन जाती थीं। सारे खेत रेखागणित के नमूने लगते थे। कई दरारों में तो चिड़ियों की चोंच, उ+ंट की गर्दन समेत मुंह तथा हाथी के सूंड़ नजर आते थे। उस अकाल का यह एक अनोखा सौन्दर्य था, जिसमें मानव की भुखमरी और असीम पीड़ा का साम्राज्य था। धान की रोपनी करती हुई दलित मजदूरिनें हमेशा एक लोकगीत की कुछ पंक्तियां दिन भर गाती रहती थीं, जो इस प्रकार थीं : ÷अरे रामा परि गय बलुआ रेत, चलब हम कइसे ऐ हरी।' इसी तरह जब ये मजदूरिनें पूर तथा घर्रा के दौरान मोट छीनते हुए कुएं से पानी निकालतीं तो दलित मजदूर एक लोकगीत गाते : ÷उ+ंचे उ+ंचे कुअना क नीची बा जगतिया रामा/निहुर के पनिया भरै, हइ रे सावर गोरिया/पनिया भरत कै हिन कर झुमका हैरैले रामा/रोवत घरवां आवै ले रे सावर गोरिया।' इस तर्ज पर औरत के सारे आभूषणों के कुएं में गुम हो जाने का वर्णन हो जाता था। इस प्रकार श्रम के अनेक सौन्दर्य गीत भुखमरी के शिकार दलितों के जीवन के अभिन्न अंग थे, जो किसी कालिदास या जयदेव के बस की बात नहीं थी। ऐसे ही दलित महिलाएं मेले ठेले या राह चलते जब भी अपने किसी नजदीकी महिला से मिलतीं, तत्काल वहीं खड़ी होकर परस्पर गले मिल कर देर तक गायन शैली में रोते हुए अपने दुख दर्द को आपस में बांट लेती थीं। ब्याहता युवतियां भाइयों के मिलने पर उनके घुटने पकड़ कर इसी शैली में अपना दुखड़ा सुना देती थीं। भारत के इस दुखियारे समाज की यह एक अनोखी कला है। जहां तक श्रम गीतों का सवाल है, कियारों में दरारें फटने से पूर्व रोपनी के समय गाये जाते थे। विरोधाभास सिर्फ यह था कि फसलों के सूख जाने के कारण उन जमींदारों से कहीं ज्यादा दुख इन दलितों को होता था, क्योंकि उनके बनि के केड़े मिलने अब दुर्लभ हो गये थे। गांव के इर्द गिर्द के अनेक जलस्रोतों के सूखने के साथ ही मुर्दहिया के जंगलों में रहने वाले विभिन्न प्रकार के पक्षियों के संगीतमय कलरव अब कर्कशता में बदल गये थे। विशेष रूप से कौवों का कोलाहल बहुत कर्कश लगता था। ये प्यासे कौवे चोंच फैलाये हांफते हुए घरों के आसपास मड़राते रहते थे, क्योंकि जंगल में खाद्य सामग्री मिलनी तो दूर, उन्हें पानी भी नहीं मिलता था। मेरी दादी समेत अनेक बूढ़ी महिलाएं मिट्टी के बर्तन में पानी भर कर घर के बाहर रख देती थीं, जहां अनेक पक्षी चें चें करते हुए आ जाते थे। छोटी छोटी अनेक चिड़ियां पेड़ों से गिर कर मर जाती थीं। दलित बच्चे उन्हें भून कर खा जाते थे। एक बार हमारे घर के पास एक नीम के पेड़ से गिर कर एक भूखा प्यासा कौआ मर गया। अचानक कुछ ही घंटों में वहां न जाने कहां से हजारों कौवे इकट्ठा होकर कांव कांव करने लगे। दो दिन तक ये कौए उसी पेड़ पर मड़राते रहे तथा दिन भर चिल्लाते रहते थे। कौवों का यह अनोखा शोक किसी अन्य जीव में नहीं मिलता।
गांव में स्थित पोखरियों जैसे अनेक जलस्रोतों के सूखने से कुछ दिन पूर्व मछलियों को मार लिया जाता था। मछली मारने के संदर्भ में दलितों के बीच एक अनोखी परम्परा थी, जिसका पूर्ण रूप से हमेशा पालन किया जाता था। जब भी मछली मारना होता दलित बस्ती का एक नौजवान जोर जोर से चिल्ला कर उस पोखरी या बावली का नाम लेकर कहता : ÷चिल्हिया चिल्होर, मछरी क झोर।'
यह नारा सुनते ही गांव के सारे दलित जाल, ताप, पहरा आदि उपकरण लेकर मछली मारने दौड़ पड़ते। इस तरह सामूहिक रूप से एक साथ सभी लोग मछली मार लाते। मछली मारते समय एक अनोखा दृश्य होता था। समय समय पर लोग ÷चिल्होर चिल्होर मछरी क झोर' वाला नारा लगाते रहते। उस समय चील और कौवे बड़ी संख्या में वहां मड़राते। जब सारी मछली मार ली जाती, तब अंत में सभी लोग एक साथ ÷चिल्हिया चिल्होर' वाला नारा लगा कर मछली के साथ अपने अपने घर वापस चले जाते। लोगों के वहां से चले जाने के बाद शाम तक उस पोखरी के किनारे चील, कौवे बैठे रहते थे, सम्भवतः इस आशा में कि कोई न कोई बची हुई मछली उन्हें अवश्य मिलेगी। चिल्हिया चिल्होर वाले नारे का उपयोग दलित बच्चे अपने एक खेल के लिए भी करते थे। बच्चों का दो ग्रुप विपरीत दिशा में दौड़ कर जाता और किसी मेढ़ या झाड़ी के पीछे छिप कर चिकनी जमीन पर खपड़े से अधाधुंध बायें से दायें की तरफ समांतर छोटा छोटा चीन्हा खींचता। करीब पांच मिनट बाद पुनः वही नारा लगाते हुए दोनों ग्रुप एक दूसरे द्वारा खींचे गये चिह्नों को ढूंढ कर मिटाते। थोड़ी देर बाद फिर वही नारा लगा कर एक दूसरे द्वारा बनाये गये बिना मिटे चिह्नों को गिना जाता। मान लीजिए एक ग्रुप का 50 चिह्न बचा तथा दूसरे का 100 तो पचास को सौ में से घटा कर शेष पर प्रति 10 पर एक के हिसाब से पांच थप्पड़ का दंड दिया जाता था। इसका मतलब हारा हुआ पक्ष पांच थप्पड़ खाता था। यह खेल हमारे बीच अत्यंत लोकप्रिय था। उस अकाल की भुखमरी के दौरान भी हमें ÷चिल्हिया चिल्होर' का खेल बहुत अच्छा जगता था।
अकाल के बावजूद उन दिनों बड़े कड़ाके की जाड़ा पड़ा। जाड़ों में हम स्कूल से आते ही गांव के अन्य बच्चों के साथ घर से नमक लेकर विभिन्न सीवानों में खड़ी चने की हरी हरी फसलों के बीच उसकी पुनगी खोट खोट कर खाते। सभी बच्चे इस कच्चे साग से पेट भर लेते थे। कोई भी अपने चने से साग खोटने से मना नहीं करता था, क्योंकि खोटने से कंछियां ज्यादा निकलती थीं, इसलिए पैदावार अधिक होती थी। शाम को दलित औरतें मटर तथा सरसों का साग खोट कर घर लातीं तथा सभी लोग उसे पका कर रात में खाते। किन्तु अकाल की गर्मियों के दिन बहुत कष्टदायी हो गये थे।
सन् 1959 की गर्मियों के शुरू में ही एक बार बड़ी बड़ी टिड्डियों का बड़ा भारी प्रकोप आया। अभी अभी जौ तथा गेहूं की फसलें पक कर तैयार होने वाली थीं। विभिन्न गांवों में खबर फैल गयी थी कि अफ्रीका से टिड्डियां आ रही हैं और वे जहां उतरती हैं, वहां पूरे खेत के दानों को साफ कर देती हैं। हमारे गांव में भी हड़कम्प मच गया था। दलित बस्ती में शीघ्र ही जमींदार आकर सबको टिड्डियां उड़ाने की तैयारी करने के लिए कहने लगे। सभी दलित बच्चे, बूढ़े, जवान जिसको जो भी बजाने के लिए मिला जैसे थाली, बाल्टी, लोहे की चादर, गगरा, गगरी, टिन, कनस्तर, डब्बे आदि लकड़ी से जोर जोर पीटते हुए खेतों में फैल गये। मैं भी एक थाली पीटते हुए अपने पिता तथा मां के साथ ब्राह्मण जमींदारों के खेत से टिड्डियां भगाने गया था। उक्त ÷वाद्ययत्राों' को पीटते हुए हम सभी जोर जोर से ÷हा हा' करते हुए लगातार चिल्लाते रहते थे। इन तमाम बेसुरे वाद्यों के स्वर तथा हाहाकार के शोर से पूरा क्षेत्रा गूंज उठा था। लाखों लाख टिड्डियों के एक साथ अत्यंत तेज गति से उड़ने की सांय सांय करती हुई आवाज बहुत विचित्रा सी लगती थी। जिस खेत में वे उतर जातीं, अविलम्ब उसकी सारी फसलें ठूठी हो जातीं। बालियां गायब हो जातीं। उनके चले जाने के बाद सारे सीवानों में हजारों टिड्डियां उड़ते समय एक दूसरे से टकरा कर गिर कर मर गयी थीं तथा काफी संख्या में वे मरने के लिए छटपटा रही थीं। ऐसी टिड्डियों का खेतों में जाल सा बिछ गया था। शीघ्र ही इन खेतों में मरी हुई टिड्डियों को खाने के लिए चीटियों की भरमार हो गयी थी। बड़ा विचित्रा नजारा था। फसलों का बहुत नुकसान हुआ था। ये टिड्डियां काफी बड़ी बड़ी थीं। करीब करीब छः इंच लम्बी थीं। उनके मरने के बाद सारे खेतों से एक विचित्रा सड़ांघ आती रही, जो कई दिनों तक जारी रही। दूसरी तरफ बिना बालियों वाली खड़ी ठूठी फसलें अनेक लोगों को रुलाती रहीं। टिड्डियां तो अंततोगत्वा न जाने कहां चली गयीं, किन्तु अपने पीछे काफी तबाही छोड़ गयीं।
उन गर्मी के दिनों में हमारी दलित बस्ती में चोटे का रस, मटर की भिगोई दाल तथा महुवे का लाटा एक बार फिर हावी हो गया। साथ ही डेढ़िया वाली बेंगही भी वापस आ गयी। इतना ही नहीं, पेचिश तथा खुजली भी और साथ में इलाज के लिए दादी द्वारा बताये गये नुसखों की भी वापसी हो गयी। दलित औरतें और बच्चे प्रायः मुर्दहिया के जंगलों तथा गांव के ताल से खाने योग्य वनस्पतियों को ढूंढने निकल जाते। जंगल में तो कुछ भी नहीं मिलता किन्तु झाड़ियों में चूहों को मार कर घर लाया जाता। कई बिलों में पानी डाल कर उसमें छिपे चूहों को बाहर निकलने पर मजबूर किया जाता था, इसके बाद उन्हें मार डाला जाता। कभी कभी इन बिलों से जहरीले सांप भी निकल कर भागते। जंगल में खरगोश तथा साही भी ढूंढ कर मारे जाते किन्तु इनकी संख्या बहुत कम होती थी। इधर ताल से सेरुकी नामक पौधे की जड़ें उखाड़ ली जातीं जो एक बड़ी प्याज के बराबर चुकंदर जैसी लगती थी। इन्हें पानी में उबाल कर खाया जाता था। ताल के किनारे कर्मी के पौधे तथा दुधिया नामक बड़ी बड़ी लताएं होती थीं, जिनके पत्ते पान जैसे होते थे। कर्मी तथा दुधिया की लताओं का साग बड़ा स्वादिष्ट होता था। इन प्राकृतिक स्रोतों से दलितों को बहुत राहत मिलती थी। साथ ही जब ये प्राकृतिक खाद्य सामग्री समाप्त हो जाती, तो असाढ़ का महीना आते आते घरों के पास की जमीनों पर फेकी गयी आम की गुठलियों से पौधे निकलने लगते थे। दो चार पत्तियों के पनप जाने के बाद बैगनी रंग के ये पौधे बहुत मनमोहक लगते थे। इन्हें अमोला कहा जाता था। बच्चे जमीन से गुठली समेत इन अमोलों को उखाड़ लाते तथा गुठली के उ+पर का फटा हुआ कड़ा छिलका हटा कर अंदर से कच्ची गुठली निकाल लेते। बच्चे इन कच्ची गुठलियों को आग में भून कर खा जाते थे तथा कई अमोलों वाली गुठलियों से पौधे तोड़ कर फेक दिये जाते। गुठली के जिस हिस्से से पौधे निकलते थे, उस तरफ से उसमें छेद बन जाते थे। छेद वाले हिस्से को बच्चे पत्थर पर रगड़ कर बासुरी के मुंह जैसा सपाट बना लेते। मुंह से फूंक कह इन्हें बजाने पर शहनाई जैसी सुरीली आवाज निकलती। बच्चों का यह वाद्ययंत्रा ÷अमौली' के रूप में जाना जाता था। जब भी बच्चे भुनी हुई गुठलियों को खाते, उसके बाद इन अमौलियों को वे देर तक अवश्य बजाते। दलित बच्चों द्वारा अमौली से निकाले गये इस सुरीले स्वर में हमेशा गुठली खाने से प्राप्त संतुष्टि की उद्घोषणा समाहित होती थी। मुझे भी अमौली बजाना बहुत अच्छा लगता था।
इस दौरान सबसे बुरी हालत नाइयों, धोबियों, मुसहरों तथा नटों की होती थी। हमारे पूरे क्षेत्रा में मात्रा एक परिवार बगल के टड़वां गांव में नाई का था। उसी गांव में दो परिवार धोबियों का रहता था। उस क्षेत्रा के करीब एक दर्जन गांवों के बाल काटने का काम वही नाई परिवार करता था तथा धोबी इन सभी गांवों के लोगों के कपड़े धोते थे। हैरत में डालने वाली परम्परा यह थी कि ये सभी सारा काम मुफ्त में करते थे। मजदूरी के रूप में इन्हें साल भर में रबी तथा खरीफ की फसलों से सिर्फ एक एक केड़ा हर घर से मिलता था। किन्तु उस अकाल में धान के केड़े इन्हें नहीं मिले, क्योंकि सारी फसलें सूख गयी थीं। अतः इन परिवारों की बड़ी दुर्दशा होती थी। विशेष रूप से धोबियों को प्रतिदिन सैकड़ों कपड़े, वह भी साड़ी तथा धोती जैसे बड़े कपड़े, धोने पड़ते थे। कपड़ा धोने में जाति भेद नहीं था। हर जाति के कपड़े इन्हें धोने पड़ते थे। धोने का काम वे ÷रेह' से करते थे। उ+सर की एक विशेष प्रकार की भुरभुरी मिट्टी जो धरती की सतह पर धूल जैसी बिखरी होती थी, जिसमें चूने की तरह कोई प्राकृतिक रसायन मिला रहता था, उसे ÷रेह' कहते थे। रेह से कपड़े साफ हो जाते थे। हमारे गांव तथा टड़वां गांव के बीच स्थित भर्थैया की झील थी जिससे हमारे स्कूल वाला नाला निकलता था, वहीं पाटा पर पीट पीट कर कपड़े धोये जाते थे। एक ढाई फीट लम्बे तथा डेढ़ फीट चौड़े पत्थर को भर्थैया के किनारे थोड़ी सी उ+ंचाई पर रख कर धोबी पानी में खड़े होकर उस पत्थर पर पीट पीट कर कपड़े धोते। इसी पत्थर को धोबियों का पाटा कहा जाता था। वे हमेशा पाटे पर कपड़ों को पीटते हुए एक विशेष नारे को विचित्रा स्वर शैली में दिन भर गाते रहते थे। काम करते हुए धोबी पुरुष तथा महिला दोनों ही एक नारे का संगायन करते रहते। वह नारा था : ÷सिउ राम सिउ ᄉ सिउ राम सिउ'। यानि ÷सिया राम' का बिगड़ा हुआ रूप। जब भर्थैया में कई धोबी तथा धोबिनें पाटा पीटते हुए एक साथ सिउ राम सिउ गाते तो पास से गुजरने वाले राही अचानक वहां थोड़ी देर तक रुक कर इस अनोखे स्वर को अवश्य सुनते। इन धोबियों का वार्तालाप शैली का एक लोकगीत अत्यंत लोकप्रिय था, जिसे धोबी पुरुष बैलों के गले में पहनायी जाने वाली बड़ी बड़ी घंटियों का घुंघरू बना कर कमर में बांध कर एक अनोखी नृत्य शैली में नाच नाच कर गाते थे। साथ में घंटा तथा लोहे के करताल नामक वाद्य भी खूब जोर से बजते रहते थे। यह नृत्य तथा लोकगीत बेहद आकर्षक होते थे। आम भाषा में ÷धोबियउवा नाच' कही जाने वाली यह दुनिया की एकमात्रा ऐसी नृत्य शैली है जिसमें घंटियों वाला घुंघरू पैर के बदले कमर में बांधा जाता है। इस नाच के साथ वार्तालाप के रूप में गाये जाने वाले लोकगीत का संदर्भ यह है कि गांवों में एक कहावत के अनुसार ÷धोबी की बिटिया के न नयिहरे सुख न ससुरे सुख'। अर्थात धोबी की बेटी को मायके तथा ससुराल दोनों जगह कपड़े धोने पड़ते हैं। अतः नव ब्याहता धोबिन का अपने पति से झगड़ा होता है और वह मायके चले जाने की धमकी देती है, जिसके बाद दोनों के बीच सवाल जवाब के रूप में यह लोकगीत शुरू हो जाता है जिसकी कुछ पक्तियां इस प्रकार हैं :
ᄉ ''जो तैं धोबिनी जइबी अपने नइहरवा
कि ह-म धोबिया अइबै अपनी ससुररिया
कि ह-म धोबिया।
ᄉ जो तैं धोबिया अइबे अपने ससुररिया
कि ह-म धोबिनी सुतबै अम्मा जी की गोदिया
कि ह-म धोबिनी।
ᄉ जो तैं धोबिनी सुतबी अम्मा जी की गोदिया
कि ह-म धोबिया सुतबै तोहरी गोड़वरिया
कि ह-म धोबिया।
ᄉ जो तैं धोबिया सुतबे हमरी गोड़वरिया
कि ह-म धोबिनी, मरबो लतवा क मरिया
आदि आदि।
इसी तरह पास वाले पारूपुर नामक गांव में सिर्फ एक परिवार मुसहरों का था। उस परिवार में एक दर्जन से ज्यादा बेटे बेटियां थे, जिन्हें एक छोटी सी झोपड़ी में रहना पड़ता था। उनकी जीविका का मात्रा एक ही साधन थाᄉ पलाश के पत्तों से पत्तल बना कर शादी विवाह आदि के अवसर पर खेप पहुंचाना। वे इन अवसरों पर खाने के बाद फेके गये जूठे पत्तलों से बचे हुए भोजन को झाड़ झाड़ कर कपड़े बिछा कर इकट्ठा करके अपने परिवार को खिलाते थे। यह एक अत्यंत अमानवीय परम्परा थी। कोई उन्हें कभी निमंत्रिात करके नहीं खिलाता था और न कोई समाज सुधारक उनकी इस प्रथा को छुड़ाने के लिए प्रयास ही करता था। उन अकाल के दिनों में बहुत कम विवाह सम्पन्न हो पाते थे, क्योंकि खाद्यान्नों की कमी से इन्हें भविष्य के लिए स्थगित कर दिया जाता था। सिर्फ मृत्युभोज ही सम्पन्न हो पाते थे। अतः इन मुसहरों की बहुत दयनीय हालत हो गयी थी। वे मेढक तथा चूहे खाने के लिए भी जाने जाते थे, किन्तु बरसात न होने के कारण उस वर्ष मेढकों का कहीं अता पता नहीं था, इसलिए उनकी परेशानी बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी। खेत मजदूरी की भी परम्परा उनके बीच नहीं थी, वे बड़ी कड़ाई के साथ अपने पेशे से कटिबद्ध थे। वे अक्सर फाका करते थे किन्तु कभी किसी से कुछ मांगते नहीं थे। ऐसे ही स्वयं हमारे गांव में एक परिवार नट का था। सोफी नामक इस नट के तीन बड़े बेटे, एक बहू तथा दो जवान होती बेटियां थीं। उनकी पत्नी भी थी। सोफी शादी विवाह में ढोल बजाते हुए आल्हा गाकर भीख मांगते थे। कभी कभी वे बकरा काट कर गांव में मांस भी बेचते थे। उस अकाल में विवाहों के बंद हो जाने से उनका आल्हा भी बंद हो चुका था। उनकी जीविका का कोई अन्य साधन नहीं था। यह नट परिवार हमारी दलित बस्ती के पूरब में मुर्दहिया के प्रवेश क्षेत्रा में झोपड़ी बना कर रहता था। एक तरह वे मुर्दहिया के मोहाने पर रहते थे। ऐसा लगता था कि भूत भूतनियों की चौकीदारी वे ही करते थे। सोफी की बहू तथा दोनों बेटियां सौन्दर्य के मामले में अपरम्पार सम्पन्न थीं, किन्तु भूख उन्हें भी लगती थी, पर उसे मिटाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं होता था। धीरे धीरे मजबूरी में उनका सौन्दर्य काम आने लगा। गांव के कुछ अभद्र ब्राह्मण युवक संध्या के समय मुर्दहिया के उस मोहाने पर लगता था कि भूतों की चौकीदारी करने लगे। उन नटनियों का सौन्दर्य मुर्दहिया की उन्हीं कटीली झाड़ियों के पीछे प्रायः गुम होता रहा।
इसी बीच हमारी दलित बस्ती में एक अनहोनी हो गयी। बस्ती के एक पुराने कुएं से पानी निकालते समय एक औरत उसमें फिसल कर गिर गयी। जब तक लोग उसे निकालें वह मर चुकी थी। उसकी लाश को मुर्दहिया पर दफना दिया गया। पहले से ही घोर अंधविश्वासों तथा भूत भूतनियों के आतंक से पीड़ित हमारी दलित बस्ती में कुएं में गिर कर मरी हुई, इस नयी चुड़ैल का भय बुरी तरह से छाने लगा। लोगों ने उस कुएं का पानी पीना बंद कर दिया तथा संध्या होते ही उसके पास कोई नहीं जाता। चुड़ैल के भय से लोग इतना आतंकित हो गये थे कि कई लोग दावा करने लगे कि रात में उन्हें कुएं से जोर जोर से पानी के हलकने की आवाज सुनाई देती है। हमारे घर में वह गुस्सैल नग्गर चाचा का छोटा बेटा जिसका नाम कुद्दन था, एक अजीब भुतहे रोग से पीड़ित हो गया। वह अचानक रात में नींद से जाग कर जोर जोर से चिल्लाने लगता था कि वह चुरइन (चुड़ैल) सामने खड़ी है। घर के सभी लोग लाठी लेकर उठ जाते थे, किन्तु किसी को कुछ भी दिखाई नहीं देता। वह फिर भी कहता रहता कि देखिये वह उधर खड़ी है। उसकी इस मनोरोगी समस्या से हमारे परिवार में आतंक छा गया था। मजबूरी में ओझा बुला कर चुरइन को भागाने के लिए ओझैती करायी जाने लगी। एक ओझा और दूसरे सोखा से यह ओझैती होने लगी। ये ओझा और सोखा हमारे रिश्तेदार थे। स्वयं नग्गर चाचा के दोनों बेटों की शादी इसी ओझा की दो सगी बेटियों से हुई थी। सोखा उसी ओझा के छोटे भाई थे। ये दोनों ओझैती से बहुत पैसा कमाते थे। वास्तव में ओझैती सम्पूर्ण रूप से एक अंधविश्वासी मनोवैज्ञानिक जालसाजी होती है, जिसका सच्चाई से कोई सम्बंध नहीं होता है। हमारे ये दोनों ओझा सोखा ओझैती के बाद चुड़ैल या भूत बैठाने के लिए बनारस स्थित पिचाश मोचन नामक पोखरे पर जाते थे। वहां वे एक लाल कपड़े में ÷भूत' को गठिया कर ले जाते थे। हमारे घर से वे ÷चुरइन' तथा ÷भूत' को पकड़ कर इसी तरह से ले गये थे। वे पहले लौंग तथा जौ के अक्षत से काली तथा दुर्गा का नाम विचित्रा शैली में बोल बोल कर हिचकी लेते तथा कांपते, गिनगिनाते हुए उठ उठ कर खड़े होते। उनके इस रूप को देख कर डर लगने लगता था। इस तरह के कर्मकांड के बाद वे धार लेकर हमारे मकान के पीछे लगी ÷केरवट' यानि केले के पेड़ों के झुंड के पास धार को समर्पित करके एक विशेष जगह की मिट्टी खोदने लगते थे। थोड़ी देर तक खुदाई की क्रिया करने के बाद उसमें से चांदी का एक रुपया वाला सिक्का (वही ÷विस्टौरिया') ढूंढ निकालते थे और कहते थे कि भूत मिल गया। वास्तव में ÷विस्टौरिया' की यह भुतही खुदाई एक जालसाजी वाला नाटक होता था। वे स्वयं पहले से ही उस ÷केरवट' के पास ÷विस्टौरिया' गाड़ आते थे जिसे बाद में नाटकीय ढंग से ढूंढ निकालते थे। इसके बाद वे इस विस्टौरिया वाले सिक्के के साथ, लौंग, जायफल तथा अक्षत समेत कुछ अन्य सामग्री लाल कपड़े में बांध कर पिशाच मोचन ले जाते। इस प्रक्रिया के पहले वे एक मिट्टी की हड़िया में कंडा जला कर उसमें ढेर सारे सूखे लाल मिर्चे डाल कर उसका जहरीला धुवां चुड़ैल या भूत से पीड़ित व्यक्ति को सुंघाते। फिर ओझा उसी नाटकीय शैली में ओझैती करते हुए जोर जोर से चुरइन या भूत को सम्बोधित करके पूछताᄉ बोल दुष्ट भागती या भागता है कि नहीं? जाहिर है कि जहरीले धुवां से पीड़ित व्यक्ति स्वयं उससे छुटकारा पाने के लिए चिल्लाने लगता कि हां, हां अब मैं भाग रही या रहा हूं। कभी भी वापस नहीं आउ+ंगी या आउ+ंगा। ऐसा कबूलने के बाद पीड़ित व्यक्ति स्वयं संतुष्ट हो जाता है कि अब चुरइन या भूत भाग गया। हमारे घर में इसी ढंग से उस चुड़ैल से छुटकारा मिला था। बाद में उन ओझा ने पिशाच मोचन में भूत को बैठा कर वापस आने के बाद देवी दुर्गा को एक बकरे की बलि दिलवायी।
उधर बस्ती में जब भी कोई बीमार पड़ता, इसकी सारी जिम्मेदारी उसी कुएं वाली चुुड़ैल पर थोप दी जाती खास करके जब छोटे बच्चे ज्वर से पीड़ित होते, तो यह अंधविश्वास बहुत गहरा हो जाता था। एक अंधविश्वास के चलते लोग बत्तख नामक पालतू पक्षी को बच्चे के उ+पर बैठने पर मजबूर करते। इसमें मान्यता यह थी कि चुड़ैल भाग जायेगी। इन बीमार बच्चों को कोई दवा नहीं दी जाती। इस तरह कई बच्चे मर जाते, फिर हुल्लड़ मच जाता कि चुड़ैल ने बच्चे को खा डाला। बीमार औरतों को चुड़ैल से छुटकारा दिलाने के लिए ओझा लोग ÷बिरई' लगाते थे। उसी कुएं के पास पीड़िता को ले जाकर उसके कान में बरगद की एक कोमल लिपटी हुई पंखुड़ी डाल कर वही मिर्चे के धुएं वाली हाड़ी उसे सुंघा कर कबूल करवाते कि वह भाग रही है। धुआं सुंघाते समय ओझा उस पीड़िता का बाल पकड़ कर कुएं में गिराने का नाटक करते हुए बार बार पूछता कि चुरइन तू भागती है कि नहीं? वास्तव में गिरने से डर कर तथा धुएं के आतंक से पीड़िता भयंकर रूप से चिल्ला कर भागने वाली बात बोल देती थी। इसे ही बिरई लगाना कहते थे। उस समय एक बार मेरी मां को भी बिरई लगायी गयी थी, जिससे मैं बुरी तरह डर गया था। कई ओझा तो पीड़िता को थप्पड़ों से मारते भी हैं। इस प्रक्रिया में भूत भगाने के लिए कुछ लोग ÷मटुवाही' भी कराते थे। मटुवाही कराने वाले एक तरह से ओझा ही होते थे, किन्तु उन्हें ÷मटुवाह' कहा जाता था। मटुवाही हमेशा मुर्दहिया के पास एक पेड़ के नीचे सम्पन्न होती थी। इसके लिए एक विशेष दिन निर्धारित किया जाता। उस दिन वहां सैकड़ों लोग आसपास के गांवों से भी मटुवाही देखने आ जाते थे। इस प्रक्रिया में सनी मिट्टी का, छोटी गेंद के बराबर, एक गोला बना कर जमीन पर रख दिया जाता। मटुवाह ओझा की शैली में हिचकते गिनगिनाते आगे पीछे, दायें बायें नाटकीय ढंग से डग भरते घंटों गाते हुए देवी का गुणगान करता रहता। उसका यह गायन बड़ा आकर्षक लगता था। इस प्रक्रिया में देवी प्रसन्न होकर उस मटुवाह से पूछती कि आखिर उस मिट्टी की गेंद में कौन सी वस्तु छिपा कर रखी हुई है। यदि इस छिपी वस्तु का नाम मटुवाह बता देता तो मान लिया जाता कि भूत अब पकड़ में आ गया है। इसी को ÷मटुवाही' कहते हैं। मटुवाही सम्पन्न होने में पांच छः घंटे का समय लगता था। वास्तव में मटुवाही भी पूर्णरूपेण एक मनोवैज्ञानिक जालसाजी होती थी। षड्यंत्रा के माध्यम से मिट्टी की गेंद में कोई वस्तु छिपाई जाती थी, जो काम मटुवाह का कोई एजेण्ट करता था तथा छिपी हुई वस्तु के बारे में मटुवाह को पूरी जानकारी होती थी। वह तो सिर्फ लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से संतुष्ट करने के लिए घंटों तक मटुवाही का नाटकीय कार्य सम्पन्न करता था, ताकि लोग आश्वस्त हो सकें कि वास्तव में मटुवाह ने अपने दैवी चमत्कार से भूत को पकड़ लिया है। हमारे गांव वाले साल में एक दो बार मटुवाही अवश्य ही कराते थे।
इस भूत चुड़ैल भगाने की प्रक्रिया में एक विशेष तांत्रिाक क्रिया का भी आयोजन हर साल किया जाता जिसे ÷कराहा चढ़ाना' कहा जाता था। कराहा हमेशा गांव के अहीर लोग एक ÷पौहारी बाबा' (पावहारी) द्वारा चढ़वाते थे। पौहारी बाबा हमारे गांव के एक अहीर ही थे तथा भर्थैया झील के पास वाले जंगल में एक झोपड़ी बना कर रहते थे। उनकी पूजा पद्धति या तांत्रिाक सिद्धि के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं चल पाता था। क्योंकि वे सब कुछ गुप्त रूप से अपनी झोपड़ी में करते रहते थे। वे झोपड़ी के बाहर हमेशा हड़िया में अहरा लगा कर खाना पकाते और रखाते। वे सुबह शाम देशी घी की अगियारी करते तथा किसी भी रोगी को दवा के नाम पर अगियारी से बनी राख को खाने के लिए देते। इस राख को ÷भभूत' कहा जाता था। उनकी यह भभूत भूत भूतनी भगाने के लिए भी दी जाती थी। गांव के लोगों का विश्वास था कि उनकी भभूत चमत्कारी होती थी। इस चमत्कार को सिद्ध करने के लिए वे कराहा चढ़ाते थे। इसके लिए वे अहिरौटी के अंदर खुले मैदान में गोहरे (यानि गोबर का उपला) का अहरा लगाते थे। फिर कुछ भवानी देवी का जाप करते हुए एक गोहरा को ओझाओं की तरह गिनगिनाते हुए आसमान में फेकते। गोहरा शीघ्र ही जलता हुआ नीचे गिरता जिसे वे हाथों से पकड़ कर अहरे में आग लगा देते। गोहरे को आसमान में फेक कर जलाने वाले तंत्रा से वहां उपस्थित सैकड़ों लोग वशीभूत होकर भवानी देवी की जयकार करने लगते। इसके बाद वे जलते हुए बड़े अहरे पर कराहा (यानि कड़ाहा) रख कर उसमें कई बाल्टी दूध पकाते। शीघ्र ही खौलते हुए दूध से पौहारी बाबा लोटा भर भर कर नहाने लगते। नहाते समय भवानी देवी का नाटकीय मुद्रा में हिचक हिचक कर जाप भी करते थे। साथ ही अपनी तेल पिलाई लाठी को भी वे उस खौलते दूध से धोते, फिर लाठी को कंधे पर रख कर एक खतरनाक पहलावानी मुद्रा में अहरे के चारों तरफ घूमते। उस समय ऐसा लगता था कि मानो वे सारी दुनिया को उसी लाठी से मिटा देंगे। बीच बीच में वे पुनः खौलते दूध से नहाते रहते। घंटों तक चलने वाली इस तांत्रिाक क्रिया को दूर दूर से लोग देखने पहुंचते थे तथा चमत्कृत होकर वापस जाते। कराहा चढ़ाने के बाद पौहारी बाबा का तांत्रिाक चमत्कार और भी ज्यादा स्थापित हो जाता तथा उनके यहां भभूत लेने वालों की संख्या बढ़ती रहती। मैंने स्वयं दो बार पौहारी बाबा के इस ÷कराहा चमत्कार' को देखा था। आज के जमाने में आग जलाने या आग पर चलते हुए भी न जलने का रहस्य विज्ञान द्वारा उजागर हो चुका है। यह किसी भी तरह से चमत्कार नहीं है, किन्तु उस समय अंधविश्वासी मान्यताओं के चलते मूर्खतावश इसे चमत्कार समझा जाता था। वास्तव में ये सारी क्रियाएं ठगबाजी की ही परम्पराएं थीं। एक तो अकाल की महामारी दूसरे अंधविश्वासों का बोलबाला दलितों के लिए ÷गरीबी में आटा गीला' करने वाला साबित होता था।
उन्हीं दिनों अकाल की खबर सुन कर हमारे मुनेस्सर चाचा कलकत्ता से आठ सप्ताह की छुट्टी लेकर गांव आये तथा साथ में एक टिन की बाल्टी और छाता भी लाये थे। बाल्टी में एक भारी भरकम लाल कपड़े में चौकोर बंधी एक गठरी थी, जिसे बाहर निकाल कर हाथ पैर धोकर खोला तो उसमें से एक मोटी लाल जिल्द वाली एक फीट लम्बी तथा पौन फीट चौड़ी किताब निकली, साथ में लकड़ी का बना किताब रख कर पढ़ने वाला उपकरण भी, जिसे वे रीहल कहते थे। मैंने किताब का चढ़ौना पढ़ा तो उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था : ÷प. ज्वाला प्रसाद शर्मा द्वारा टीकाकृत रामचरित मानस'। उस पर बम्बई का पता भी लिखा था। मुनेस्सर चाचा ने तुरंत मुझसे कहा कि बिना हाथ पैर धोये इसे कभी नहीं छूना तथा इसे कभी जमीन पर भी नहीं रखना। हमेशा रीहल पर रख कर लोगों को गा गाकर सुनाना। मुनेस्सर चाचा अनपढ़ थे और पढ़ नहीं सकते थे। वे कलकत्ता में रहने वाले हिन्दी भाषी लोगों को हिन्दुस्तानी कहते थे। उन्होंने बताया कि अनेक हिन्दुस्तानी अपनी बाड़ी में इस किताब को कपड़े में बांध कर खूटी पर टांग कर रखते हैं तथा छूूट्टी के दिन किसी पढ़वैता से पढ़वा कर सुनते हैं। मुनेस्सर चाचा ने यह भी बताया कि हमारी जूट मिल में काम करने वाले एक हिन्दुस्तानी पंडित ने कहा है कि जिस घर में यह किताब रहती है, उस घर में चुड़ैल और भूत कभी नहीं आते। इसलिए हिन्दुस्तानी लोग इसे अपने घर में जरूर रखते हैं, चाहे भले ही वे अनपढ़ क्यों न हों। मुनेस्सर चाचा की यह बात सुन कर न सिर्फ हमारे घर वाले, बल्कि दलित बस्ती के अनेक लोग बहुत राहत महसूस करने लगे और उनका यह विश्वास गहराने लगा कि अब यह किताब भूतों को भगाने में मददगार सिद्ध होगी। गर्मी का दिन था। पहले ही दिन मुनेस्सर चाचा ने मुझसे कहा कि आज ही शाम को कुएं की जगत पर बैठकी होगी, वहीं पढ़ कर सुनाना। उन्होंने बस्ती के लोगों को भी कह दिया कि वे शाम को कुएं पर आवें और ÷रामायण' सुनें। मैंने शाम के समय हाथ पैर धोकर कुएं पर बैठ कर रीहल पर ÷रामायण' को रखा। साथ ही मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। डर इस बात का था कि इसे ठीक से पढ़ पाउ+ंगा कि नहीं। मुनेस्सर चाचा निर्देश दिये कि सुंदरकांड खोलो। वे इसे कलकत्ता में किसी से सुन चुके थे तथा उनका यह बहुत ही पसंदीदा कांड था। मैंने लालटेन की रोशनी में विषयसूची देख कर सुंदरकांड खोला। कुएं की जगत पर करीब 25-30 आदमी बैठे थे। सभी ने हाथ जोड़ लिए। शुरू में मंगलाचरण के रूप में कुछ संस्कृत के श्लोक थे, जिन्हें देख कर मैं एकदम घबड़ा गया और मेरी जबान तुतलाने लगी। यह मेरे लिए बहुत बड़ा संकट था। मैं चौथी कक्षा में ही पढ़ रहा था। मुझे यह भी पता नहीं था कि संस्कृृत क्या होती है। सिर्फ स्कूल के पास वाले संस्कृत पाठशाला के पंडितों को चिढ़ाने वाले सूत्राों के अलावा कुछ भी पता नहीं था। तुतलाते हुए मैंने शुरू के दो तीन संस्कृत वाले छंदों का लिखा हुआ सिर्फ अर्थ पढ़ा, जिनमें राम तथा अंत में हनुमान जी की वंदना थी। यह सुनते ही मुनेस्सर चाचा ने जोर से नारा लगाया : ÷सिया वर रामचंद्र की जय, हनुमान की जय।' इसी नारे को सारे लोगों ने दोहराया। शुरू में ही ऐसा सुन कर मेरा तुतलाना कम हो गया और विश्वास लगने लगा कि रामायण पढ़ सकता हूं। बीच बीच में मुनेस्सर चाचा कहते थे कि गा गा के सुनाउ+ं। यद्यपि स्कूल के मंदिर पर लगने वाले रामनवमी मेले के अवसर पर साधुओं द्वारा रामायण गायकी मैं सुन चुका था जिसकी एक खास शैली थी, किन्तु गाते हुए मुझे बड़ी हिचक होती थी। इसलिए शुरू के दिनों में सिर्फ गद्य रूप में पढ़ता था, किन्तु कुछ दिन बाद गाने भी लगा। सुंदरकांड के शुरू में रावण द्वारा अपहृत सीता को ढूंढने हनुमान जी के लंका जाने का वर्णन तथा सर्पों की माता ÷सुरसा' नामक चुड़ैल से मुलाकात एवं छाया पकड़ने वाली एक अन्य राक्षसी की हत्या वाले प्रकरण थे जिन्हें सुन कर कुएं पर बैठे श्रोताओं की उत्सुकता बहुत तेज हो गयी। चौपाइयों के साथ मैं अर्थ भी पढ़ता जाता था, इसलिए सभी लोग बड़े ध्यान से सुनते थे। चुड़ैल के प्रकरण से उनकी रुचि हद से ज्यादा बढ़ने लगी। जिसका मूल कारण था दलित बस्ती में पहले से ही व्याप्त चुड़ैल का आतंक। कुछ और राक्षसों की हत्या तथा लंका दहन का वर्णन सुन कर उपस्थित लोग बहुत रोमंचित हो उठे और सभी लोग हनुमान जी की जयकार करने लगे। पहले जब भी कुएं पर बैठकी होती, लोग हमेशा लगातार गांजा पीते रहते तथा मुझे स्वयं रस्सी की गांठ जला जला कर चिलम भरनी पड़ती थी, किन्तु रामायण बाचने वाला वह पहला दिन एक ऐसा दिन था, जब किसी ने भी गांजा नहीं पिया। पहले दिन का वाचन लंका दहन के बाद समाप्त हो गया। लोग अगले दिन पुनः कुएं पर आने का वचन भी दे गये। उस रात बस्ती में मेरी बहुत प्रशंसा हुई थी। शुरू के कुछ महीनों तक रोज ही शाम को मजदूरी करके वापस आने के बाद थोड़ी देर तक लोग मुझसे रामायण सुनते, सम्भवतः इस विश्वास के साथ कि उन्हें भूत अब तंग नहीं करेंगे।
उसी दौर में गांव में एक अलग किस्म की डराबनी घटना हुई। हमारे गांव के सबसे ज्यादा धनवान ब्राह्मण जमींदार निरंजन पांड़े थे। इनके बड़े भाई जटाधारी साधु बन कर बभनौटी से एक फर्लांग पश्चिम तरफ बरम बाबा के चौरा के पास कुटी बना कर रहते थे। रूप रंग से वे पौराणिक विश्वामित्रा की तरह लगते। उन्हें लोग पंडित जी के नाम से जानते थे। ÷बरम बाबा' के चौरा के पास एक छोटा चबूतरा था, जिसे सत्ती माई का चौरा कहते थे। बरम बाबा के चौरे पर गांव के लोग सत्य नारायण की कथा का आयोजन करते रहते थे। वास्तव में ÷बरम बाबा' कोई विशेष देवता नहीं थे, किन्तु बगल में सत्ती माई के चौरे से पता चलता था कि बरम बाबा गांव के ही बहुत पहले के कोई ब्राह्मण थे, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी उनकी चिता में जल कर सती हो गयी थी। इसलिए दोनों का वहां बहुत पुराना चौरा बना दिया गया था। बरम बाबा के चौरे पर एक बहुत मोटा और विशाल पीपल का जर्जर पेड़ था जिसे देखने से पता चलता था कि वह पेड़ 19वीं सदी के पूर्वार्ध का अवश्य होगा, किन्तु गांव में किसी को यह नहीं पता था कि ये दोनों चौरे सती प्रथा के प्रतीक थे। यह रहस्य कभी नहीं खुल पाया। सभी ब्राह्मण यह कहते थे कि सदियों पूर्व आंधी में उड़ते हुए एक पीपल का पौधा आकर वहीं खड़ा हो गया, जिसे ईश्वर का चमत्कार मान कर लोग पूजने लगे। अतः वह चौरा तथा पीपल बहुत पवित्रा माने जाते थे। निरंजन पांडे+ के बड़े भाई का जटाधारी वेश में वहां निवास करने से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बरम बाबा और सत्ती माई उन्हीं के पूर्वज रहे होंगे। किन्तु इस रहस्य से भी पर्दा कभी नहीं हटा।
गांव में चुल्ली नामक दलित अपने दो बेटों के साथ निरंजन पांड़े की हरवाही करते थे। चुल्ली की पत्नी का नाम सोमरिया था। वह भी एक अनोखी महिला मजदूरिन थी। सप्ताह के हर दिन के नाम वाली औरतें जैसे सोमरिया, मंगरी, बुधिया, बेफइया, सुखिया, सनीचरी, तथा अतवरिया ये सभी हमारी बस्ती में रहती थीं। सोमरिया, गांव में चुगलखोरी के लिए बहुत प्रसिद्ध थी। उसकी एक अनोखी आदत यह थी कि उसके घर से कोई भी छोटी मोटी चीज खो जाती, तो वह अपनी झोपड़ी के पास वाले कुएं पर रात में सबके सो जाने के बाद सन्नाटे में खड़ा होकर जोर जोर से भद्दी भद्दी गालियां देते हुए खोये हुए समान का नाम लेकर बिना किसी को इंगित किये उसे लौटा देने का हांका लगाती थी। अगर एक गांठ लहसुन या प्याज भी उसके घर से गायब हो जाती, तो उसके लिए भी उसी शैली में वह रात के सन्नाटे में वापस करने की मांग दोहराती रहती। उसकी यह शैली इतनी आतंकित कर देती थी कि कई बार गांव के लोग उस छोटी मोटी सामग्री को अपने घर से ले जाकर उसकी झोपड़ी के पास रख देते थे, ताकि वह रोज रोज कुएं पर सोता पड़ने पर शोर न मचावे। गांव में लगभग सभी का विश्वास था कि सोमरिया को जब भी किसी चीज की आवश्यकता होती, वह एक जालसाजी के तहत उसे चोरी चले जाने का नाटक करते हुए उस कुएं पर हांका लगाती थी, ताकि लोग उसकी मांग को मुफ्त में पूरा कर दें। उसकी यह रणनीति बड़ी कामयाब रहती थी। एक दिन उसने रात में हांका लगाते हुए एक विचित्रा सूचना दी, जिसमें उसने बताया कि निरंजन पांड़े के घर डाका पड़ने वाला है, इसलिए सभी लोग जागते रहें। यह सुन कर पूरा गांव दहल गया। शीघ्र ही पांड़े ने सूचना दी कि डाकुओं की एक चिट्ठी आयी है जिसमें डाका डालने का दिन निर्धारित किया गया है। उस समय गांवों में एक अफवाह फैली थी कि अकाल में डाकू चिट्ठी से सूचना देकर डाका डालते हैं। इस अफवाह का नाजायज फायदा उठा कर कुछ शरारती पढ़े लिखे लोग डर पैदा करके अपना मनोरंजन करने लगे थे। इसी कड़ी में किसी ने निरंजन पांड़े को वैरंग चिट्ठी भेज दी। किन्तु उनकी धनाढ्यता को देखते हुए सबको विश्वास हो चुका था कि डाका अवश्य पड़ेगा। पांड़े के बारे में गांव के लोगों के बीच चर्चा होती थी कि उनके घर में तराजू से तौल तौल कर ÷बिस्टौरिया' के सिक्के जमीन में गाड़े गये हैं। अतः डाका पड़ने वाले कथित दिन की रात से दलित बस्ती के सारे पुरुष लाठी डंडा लेकर निरंजन पांड़े के घर के चारों तरफ दो दिन तक पहरा देते रहे। संयोगवश डाका नहीं पड़ा किन्तु गांव में कई दिन तक दहशत कायम रही।
इसी बीच सन् 1959 के मध्य में बभनौटी में एक अप्रत्याशित घटना हुई। नन्हकू पांड़े, जो ढोलक बहुत अच्छा बजाना जानते थे, एक अकेले व्यक्ति थे। लोग ढोलक बजाने के कारण उन्हें ÷मिरदंगी' कहते थे। उनकी उम्र चालीस वर्ष की थी किन्तु बड़ी भारी तोंद वाले कुंवारे व्यक्ति थे। बगल के परसूपुर नामक गांव में एक विधवा युवती अपने मामा के घर आयी थी। वह ब्राह्मणी भी थी। हमारे गांव के कुछ बदमाश युवा ब्राह्मणों को एक खुराफात सूझी कि उस विधवा ब्राह्मणी का अपहरण करके मिरदंगी से जबरन विवाह करवा दें। इसके लिए करीब 20 ब्राह्मण युवक दिन के दस बजे ही लाठी भाले लेकर परसूपुर जाकर उस औरत को जबरन उठा कर गांव में ले आये। जिस समय वे उसे उठा कर गांव ला रहे थे, ये सारे ब्राह्मण युवक वीरतावश ÷बरम बाबा की जय, बरम बाबा की जय' का नारा भी लगाते जाते थे। मैंने उस जोर जोर लगाये जाने वाले नारे को सुना था और स्वयं उन्हें उस युवती को जानवर की तरह कंधे से उ+पर टांगे हुए लाते देखा था। उसे मिरदंगी के घर में बंद कर दिया गया। विवाह का मंडप उनके घर के सामने सजाया जाने लगा। उनकी शादी अमिका पांड़े ही कराने वाले थे। दलित बस्ती के लोग एकदम डर गये थे। जिस समय मंडप सजाया जा रहा था, उस समय वहीं चारपाई पर बैठ कर मिरदंगी स्वयं अंधाधुंध ढोल बजा रहे थे। कुछ औरतें गाना भी गा रही थीं। अमिका पांड़े के पतरा के अनुसार विवाह रात के नौ बजे होने वाला था। गांव के ब्राह्मण विशेष रूप से बहुत उत्साहित, इसलिए भी थे कि अपहरण के समय परसूपुर वालों ने हिम्मत नहीं दिखाई कि वे रोक सकें। अतः उनके बीच विजई होने का अपार गर्व था। इसी बीच मुहूरत के कुछ समय पूर्व रात में ही चिरैयाकोट थाने से थानेदार समेत कई बंदूकधारी पुलिस एक एक्का पर बैठ कर गांव में आ धमके क्योंकि युवती के अपहरण की पूरी सूचना उन्हें समय पर मिल चुकी थी। मिरदंगी समेत अठारह ब्राह्मणों को पुलिस गिरफ्तार करके ले गयी। उन सभी को दूसरे दिन आजमगढ़ जेल भेज दिया गया। हमारे पूरे गांव में गिरफ्तारी के डर से, यहां तक कि दलित बस्ती के भी, कई लोग भाग कर अपने रिश्तेदारों के यहां छिप गये। अत्यंत दहशत का वातावरण छाया हुआ था। कई दिनों के बाद गांव में वातावरण शांत हुआ, वह भी जब सारे ब्राह्मण जमानत पर छूट कर वापस आये। संयोगवश कोई अन्य गिरफ्तारी नहीं हुई। उस गिरफ्तारी की रात सारे ब्राह्माों को पुलिस डोर में बांध कर पैदल ही करीब पांच किमी. दूर थाने में ले गयी थी, जबकि थानेदार उस युवती को अपने एक्का पर अकेले बैठा कर रात में थाने गये। हमारी दलित बस्ती में घर घर चर्चा होने लगी कि आधी रात को थानेदार साहब उस युवती को रास्ते में पड़ने वाले मुर्दहिया के जंगल में रोक कर न जाने क्या क्या करते रहे। तरह तरह की अटकलबाजी होती रही। अठारह ब्राह्मणों पर अपहरण का मुकदमा चला। कुछ ब्राह्मण वकीलों ने हमारे गांव के ब्राह्मणों की वकालत की। कुछ महीने बाद फैसले की तारीख निर्धारित की गयी। सारे ब्राह्मण डरे हुए थे कि उन्हें सजा अवश्य मिलेगी। अतः ये अठारहों ब्राह्मण रात के पिछले पहर उठ कर आजमगढ़ फैसला सुनने के लिए गांव से करीब चार मील दूर जहानागंज, एक्का पकड़ने के लिए पैदल जाने लगे। उनका रास्ता गांव के उस जोगी बाबा की जंगल स्थित झोपड़ी से जाता था, जो किसी भी शब्द को पहले सुन कर उससे कविता बना कर गाने लगते थे। ये ब्राह्मण उनकी झोपड़ी आने पर बहुत तड़के ही जोगी बाबा के पैरों पर गिर कर उनका आर्शीवाद लेने लगे, किन्तु बिना कुछ बोले। ब्राह्मणों को गोड़ (यानि पैर) पर गिरते पाकर जोगी बाबा ने गाया : ÷जइसन पड़त हउवा गोड़ᄉ वइसै अइहैं बढ़िया मोड़, नहिं संसतिया सहबा रामᄉ नहिं संसतिहा सहबा राम'। इसके बाद सभी ब्राह्मण आजमगढ़ कचहरी गये और सबूत के अभाव में छूट कर चले आये। गांव भर में शोर मच गया कि जोगी बाबा की कृपा से वे छूट गये। वास्तव में ब्राह्मणों के लिए यह एक बड़ा मोड़ था। मेरी जिन्दगी में भी एक नया मोड़ आया। मैंने भी उस अकाल में महुवे का लाटा खाते तथा अमौली की सुरीली धुन बजाते पांचवीं कक्षा पास कर लिया।
...अगले अंक में जारी
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