''सच्चा बुद्धिजीवी वही है जिसका मन मुक्त और निर्भीक होता है।''
''बुद्धिजीवी से अपेक्षित है आलोचना, निर्मम आलोचना जो न अपने निष्कर्ष से कतराती है और न शासक वर्ग के साथ टकराव से भागती है।'' (कार्ल मार्क्स)
मेरी मेज के एक सिरे पर विख्यात समाजशास्त्राी डॉ. पी.सी. जोशी की छह किस्तों में सम्पन्न लेखमाला ÷यादों से रची यात्राा' रखी हुई है। दूसरे सिरे पर 25 जून, 2008 का ÷द टॉइम्स ऑफ इंडिया' का नयी दिल्ली संस्करण रखा हुआ है। ये दो परस्पर भिन्न ÷ओबजेक्ट्स' एक जगह क्यों हैं? आखिर एक विश्लेषणात्मक व सर्जनात्मक लेखमाला और रोजमर्रा की घटनाओं, सूचनाओं व रोमांचकारी प्रवृत्तियों से भरे एक अखबार के बीच क्या रिश्ता हो सकता है? यह अटपटा मेल जिज्ञासा जगाने के लिए काफी है।
डॉ. जोशी की इस श्रृंखला को नियमित रूप से तो नहीं लेकिन यदाकदा टुकड़ों में पढ़ता रहा हूं। पिछले दिनों जब अखिलेश जी ने इसकी सभी छह किस्तें एक साथ प्रेषित कीं तो मैं इन्हें आद्योपांत पढ़ने से स्वयं को रोक नहीं सका। ÷यादों से रची यात्राा' को पढ़ते समय मुझे ज्ञान व विश्लेषण के एक खुले आकाश की अनुभूति हुई जिसमें मैं निर्बाध होकर विचरण कर रहा हूं; सभी दिशाओं से विचारों की ताजा हवा के झोंके स्पर्श करते हुए गुजर रहे हैं; नयी सर्जनात्मकता नये आविष्कार के लिए ये आमंत्राण दे रहे हैं। इसीलिए सचेत पथिक डॉ. जोशी का यात्राा समापन कथन समीचीन प्रतीत होता हैᄉ÷÷इतिहास बताता है कि वैचारिक क्षेत्रा में नयी लहर के उभार के बहुत पहले भावनात्मक मंथन से पे्ररित संस्कृति नयी लहर का सबसे सशक्त माध्यम बन जाती है और वैचारिक नवोदय के लिए जमीन तैयार करती है। जहां किताबी बुद्धिजीवी विफल रहा है वहां बहुत बार जिन्दगी की किताब से जुड़ा, संस्कृतिकर्मी नये स्वरों का वाहक साबित हुआ है। आज ऐसे ही स्वप्नदर्शियों के लिए जमीन तैयार हो चुकी है, ऐसा मुझे लगता है।''
अब मेज के दूसरे किनारे पर रखे अखबार की खबर ली जाए। अड़तीसवें सफे पर प्रकाशित पांच कॉलमी खबर कहती है कि तीन चौथाई अमेरिका चमत्कारों और स्वर्ग नरक में विश्वास रखता है। दस में से नौ से अधिक अमेरिकियों की आस्था ÷गॉड' (ईश्वर) में है। ईश्वर कम से कम महीने में एक बार अमेरिकियों की प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं; कुछ को तो सप्ताह में एक बार ईश्वर से सीधा उत्तर प्राप्त होता है। करीब 79 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों का विश्वास है कि चमत्कार होते हैं।
अब देखना यह है कि डॉ. जोशी की पूर्व साम्यवादी देश सोवियत संघ की यात्राा और विश्व कुबेर अमेरिका के समाज की चेतना अवस्था में क्या अंतरसम्बंधता है? वैसे मैं पहले चाह रहा था कि डॉ. जोशी की इस श्रृंखलाबद्ध कृति पर ही बात की जाय। लेकिन अमेरिकी समाज की इस खबर ने बरबस मुझे दूसरा रूट अपनाने के लिए विवश कर दिया। चूंकि इन दोनों घटनाओं का सम्बंध आधुनिक समाज से है, यद्यपि दोनों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्थाएं अलग अलग हैं। लेकिन इस विभिन्नता या परस्पर विरोधी व्यवस्थाओं के बावजूद ÷परिवर्तन' का चरित्रा प्रतिगामी प्रकार का क्यों है? दोनों ही समाज (समाजवादी रूस और पूंजीवादी अमेरिका) चेतना और व्यवहार के धरातल पर ÷पुरोगामी' क्यों नहीं है? क्यों वे बीते कल की ओर लौटने के लिए व्यग्र हैं? मार्क्सवाद बतलाता है कि उत्पादन पद्धति व साधनों में परिवर्तन के साथ साथ उत्पादन सम्बंधों में भी परिवर्तन आता है। दूसरे शब्दों में दोनों प्रक्रियाएं ÷को टर्मिनस' हैं। डॉ. जोशी की ÷यादों से रची यात्राा' के साथ यात्राा करने से इस बात का एहसास होता है कि 1917 में समाजवादी क्रांति और राज्य के चरित्रा में आमूलचूल परिवर्तन के बावजूद ÷समाजवादी इंसान' जन्म नहीं ले पाता है। क्रांतिकारी राजनीतिक व्यवस्था समाज को बदल नहीं पाती है। जो भी परिवर्तन होते हैं वे सतह पर होते हैं लेकिन लोगों के रक्त में क्रांतिकारी संस्कारों का संचार नहीं हो पाता है। इतिहास के अनुभव दर्शाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन की गति प्रायः धीमी ही रही है। इसके बरक्स राजनीतिक शासन पद्धति और प्रौद्योगिकी पद्धति के परिवर्तनों की गति हमेशा तीव्रतर रहती आयी है। जहां डॉ. जोशी ने निजी अनुभवों तथा अन्य विद्वानों की संदर्भ सामग्री के माध्यम से यह बतलाया है कि सोवियत संघ में क्रांति के वर्षों बाद भी व्यक्ति की बुनियादी मानसिकता में अपेक्षित तब्दीली नहीं आयी। स्टालिन की कारगुजारियों का विश्लेषण करते हुए यह भी प्रकट होता है कि सोवियत सत्ता की नौकरशाही का चरित्रा तकरीबन जारशाही युग जैसा रहा। 1990 में चीन की यात्राा के दौरान जो मेरे अनुभव थे वे भी इससे भिन्न नहीं थे। चीन के ग्रामीण समाज के संस्कार और केन्द्र की लाल सत्ता के चरित्रा के बीच काफी अंतर मुझे दिखाई दिये थे। गांवों में वैसा ही अंधविश्वास और परम्परागत देवी देवताओं के प्रति वैसी ही श्रद्धा थी जो आज 21वीं सदी के अमेरिकी समाज में दिखाई देती है। यहां यह याद दिलाना भी जरूरी हो गया है कि राष्ट्रपति बुश ने खाड़ी युद्ध के संदर्भ में एक बार कहा था कि ईश्वर ने उनके स्वप्न में आकर उनसे कहा था कि तुम मानवता और लोकतंत्रा की रक्षा के लिए इराक पर चढ़ाई कर दो। अमेरिका के कुछ राज्यों में डार्विन के सिद्धांत पर प्रतिबंध लगा हुआ है। कैथोलिकों के पोप की धर्माज्ञा से अमेरिका में श्प्दजमससपहमदज क्मेपहदश् (यह एक ऐसी धार्मिक अवधारणा है जो कि विकासवादी विज्ञान व सिद्धांत के विरुद्ध है। इसके समर्थकों का दावा है कि ईश्वर और श्ेनचमतपदजमससपहमदज ंसपमदेश् का अस्तित्व है। अतः पाठ्यक्रमों में विकासवादी विज्ञान के स्थान पर इसे पढ़ाया जाना चाहिए।) को प्रचारित किया जाता है। यही वजह है कि पूंजी, विकास और उन्नति के अंतिम मॉडल अमेरिका में इतना जबरदस्त अंधविश्वास मौजूद है। जिस देश का राष्ट्रपति स्वप्न में ईश्वर के संदेश सुनता है तब यदि सामान्य जनता महीने या सप्ताह में ईश्वर के साथ संवाद करती है तो इसमें कैसा आश्चर्य? अंधविश्वास या श्रद्धा व्यक्ति में रहे या नेतृत्व में या शासन व्यवस्था में या धर्म में, इसका गुण व प्रभाव समान है। ÷फेथ' विवेक पे्ररित नहीं होता है जबकि ÷कॅनविक्शन' विवेक व विवेचना से जन्म लेता है। इसमें स्वीकृति और अस्वीकृति, दोनों के लिए जगह रहती है। फेथ प्रतिरोध को जन्म नहीं देता है जबकि कॅनविक्शन से प्रतिरोध पैदा होते हैं। अतः जहां स्तालिन के रूस में फेथ को प्रोत्साहित किया गया वहीं आज बुश के अमेरिका में भी उसे ही फैलाया जा रहा है! पूंजीवादी समाज से उम्मीद रहती है कि वह मध्ययुगीन दृष्टि से मुक्त होकर विवेक के युग में प्रवेश करेगा लेकिन आज यह प्रतिगामी यात्राा का प्रदर्शन कर रहा है!
जोशी जी ने अपनी श्रृंखला की पांचवीं किस्त में भीष्म साहनी और नेमिचंद जैन के कुछ अनुभवों का उल्लेख किया है। उदाहरण के लिए, भीष्म जी को मास्को में एक शाम एक बूढ़ा आदमी कूड़ेदान में कुछ तलाशता हुआ दिखायी देता है। भीष्म जी स्वयं से सवाल करते हैंᄉ''वह ऐसा क्यों कर रहा है? क्या इसका कुछ खो गया है या अपने पेट भरने के लिए कुछ ढूंढ रहा है? मन को निश्चय ही धक्का सा लगा। फिर मैं स्वयं ही इसकी सफाई भी देने लगा। कोई सनकी होगा, कोई पागल ही कूड़े के ढेर में हाथ डालेगा। वरना सोवियत देशों में कोई ऐसा क्यों करेगा?''(भीष्म जी यहां सोवियत सत्ता को सवालों के कठघरे में खड़ा करने से संकोच करते हैं या यह एक दूसरे प्रकार के सत्ता में अंधविश्वास को दर्शाता है।) डॉ. जोशी अपने एक अन्य अनुभव के संदर्भ से यह दिखलाने की कोशिश करते हैं कि अधिसंख्य कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी और सोवियत समर्थक ÷प्रश्न और संदेह' से कतराते हैं। 1985 की यात्राा की यादों को लिखते हुए नेमि जी के एक अनुभव का जिक्र करते हैं। नेमि जी का मुख्तसर अनुभव यह है कि किसी ÷कौल गर्ल' ने उनसे सम्पर्क करने की कोशिश की थी। वह औरत उन्हें अपने घर ले जाना चाहती थी लेकिन नेमि जी ने उसके साथ जाने से मना कर दिया। लेकिन जब नेमि जी ने अपने इस रात्रिाकालीन अनुभव को सुबह नास्ते पर अन्य लोगों के साथ बांटने की कोशिश की तो कम्युनिस्ट सदस्य भड़क उठे और बोलेᄉ÷यह लेनिन का देश है जिसने वेश्यावृत्ति चाहे खुली हो या प्रच्छन्न, उसे जड़ से मिटा दिया था। यहां ऐसी बात हो ही नहीं सकती।' कम्युनिस्ट सदस्यों का तर्क था कि ÷मनोरंजन उद्योग' के नाम पर वेश्यावृत्ति की खुली छूटᄉयह सब पूंजीवादी समाज और उसकी विलासिता पोषक मनोवृत्त्ि
ा की उपज है। जोशी जी के अनुभवों को निजी अनुभवों से मैं थोड़ा सा विस्तार देता हूं।
इसी वर्ष के मेरे अनुभव भी इससे भिन्न नहीं हैं। 1985 में मुझे तत्कालीन प्रधानमंत्राी राजीव गांधी की राजकीय यात्रााओं को कवर करने के सिलसिले में हवाना (क्यूबा) और मास्को (सोवियत संघ) जाने का अवसर मिला था। हवाना की पहली शाम हम मीडियाकर्मियों ने राष्ट्रपति फिदेल कास्त्राो के साथ बितायी थी लेकिन दूसरी शाम हमें एक रेस्त्राां में आयोजित ÷कैबरे डांस' में ले जाया गया था। डांस में भाग लेने वाली युवतियां तकरीबन निर्वस्त्रा थीं। उनकी भावभंगिमाएं असाधारण रूप से मादक थीं। हम लोगों में से किसी को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था कि कॉमरेड फिदेल के देश में ऐसा भी हो सकता है! यह भी सुनने को मिला था कि हवाना में कॉलगर्ल भी उपलब्ध हैं। कुछ की दलील यह थी कि कम्युनिस्ट देश होने के बावजूद क्यूबा में स्त्राी की व्यापारिक निर्वस्त्राता को समाप्त नहीं किया जा सका है। कुछ ने तो यह भी कह दिया कि कैबरे डांस और वेश्यावृत्ति यहां की संस्कृति है। इस तरह के दृश्यों को व्यापक परिपे्रक्ष्य में देखा जाना चाहिए। हवाना में ऐसे भी वृद्ध व वृद्धाएं दिखायी दिये जो कि अर्द्ध भिखारी प्रतीत होते थे। क्यूबा से जब हम लोग मास्को पहुंचे थे तो मुझे भी एक शाम भीष्म जी जैसा अनुभव हुआ था। हम लोगों को क्रेमिलिन के पास एक बड़े होटल में ठहराया गया था। जब मैं अकेले घूमने निकला और भूमिगत ट्रेन से थोड़ा बहुत अनुभव प्राप्त किया तब एक दो दृश्य मेरे लिए अविश्वसनीय थे। 1990 में मैंने शंघाई में ऐसे दर्जनों ग्रामीण श्रमिकों के जत्थों को देखा था जो कि अपने सरों पर सामान लादे दौड़े जा रहे थे और उनके पीछे दौड़ रही थी पुलिस। पूछने पर पता चला कि ये लोग गांव से रोटी रोजी की तलाश में बगैर अनुमति के शहरों में आते हैं। पुलिस इन्हें पकड़ कर पिटाई करती है और वापस गांवों में खदेड़ देती है। राजधानी बीजिंग में तो कई ऐसे वृद्ध दिखायी दिये जो कि लगभग भिखारी ही थे और चोरी छिपे भिक्षा से अपना जीवनयापन करते थे। इस तरह लेनिन स्तालिन के देश सोवियत संघ, माओ-त्से-तुंग के देश चीन और फिदेल के देश क्यूबाᄉइन तीनों साम्यवादी राष्ट्रों में अनुभवों की समान निरंतरता दिखायी देती है। आखिर ऐसे क्या कारण रहे हैं कि ये देश अतीत की व्यवस्थाओं और उनकी विरासतों से स्वयं के वर्तमान को श्क्म.सपदाश् नहीं कर सके? लेकिन इसका सबसे दुखद पक्ष यह रहा है कि सोवियत संघ के पतन से पहले औसत औपचारिक कम्युनिस्ट ने कभी श्क्म.सपदाश् की जरूरत को महसूस नहीं किया और न ही अदृश्य श्सपदांहमश् को देख पाया। यह भी एक दूसरे प्रकार का अंधविश्वास है। डॉ. जोशी ने सटीक ही लिखा है कि ÷÷ऐसी (अंध) विश्वासी मानसिकता के सामने सभी तर्क और प्रमाण बेकार। कई निष्पक्ष किन्तु सोवियत समाज के हितैषियों ने इस बात की पुष्टि की कि सोवियत रूस के बड़े शहरों में ऐसे धंधे तेजी से बढ़े हैं।''
डॉ. जोशी की यात्राा विविध संदर्भों और सघन अनुभवों से निश्चित ही समृद्ध है। उन्होंने विभिन्न विद्वानों के अवलोकनों के माध्यम से अनेक गम्भीर सवाल उठाये हैं। उनका यह कहना सही है कि रूसी क्रांति ने सामाजिक महापरिवर्तनों का जो सिलसिला शुरू किया था वह निःस्संदेह अप्रत्याशित पथ पर था। मैं तो यह कहूंगा कि यह प्रत्येक दृष्टि से विलक्षण आविष्कार था क्योंकि इससे पहले व्यक्ति और सम्पत्ति, समाज और सम्पत्ति तथा समाज व राज्य के परस्पर सम्बंधों में बृहत स्तर पर बहुआयामी परिवर्तन लाने की कोशिश कभी नहीं की गयी थी। यह सही है कि फ्रांसीसी क्रांति ने कुतुबनुमा का रोल जरूर अदा किया था। इस संदर्भ में मार्क्स का यह कथन जो कि फ्रांसीसी क्रांति के बाद की क्रांतियों के लिए मार्गदर्शी बना था, सही प्रतीत होता हैᄉ÷÷मनुष्य अपना इतिहास स्वयं रचते हैं लेकिन ऐसे नहीं जैसे वे चाहते हैं। वे उसे रचते हैं उन परिस्थितियों में जो स्वयं उनकी चुनी हुई नहीं हैं बल्कि जो उन्हें अतीत से विरासत में मिली हैं।'' लेनिन, स्टालिन, गांधी, माओ, होची मिन्ह, फिदेल कास्त्राो जैसे युगनायकों ने अपने समय की भौतिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर ही परिवर्तन का चरित्रा व रणनीति तैयार की थी। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत उस समय आती है जब परिवर्तन के सूत्राधार राज्य के चरित्रा और उत्पादन सम्बंधों में बुनियादी बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। राजनीति में सत्ता परिवर्तन एक सामान्य प्रक्रिया है लेकिन व्यवस्था परिवर्तन उससे बड़ी प्रक्रिया है। संक्षेप में, म्ेजंइसपेीउमदज और ैलेजमउ दो अलग अलग विमर्शों की मांग करते हैं। आमतौर पर सरकार परिवर्तन को व्यवस्था परिवर्तन के रूप में देखने की गलती कर ली जाती है जबकि सत्ता प्रतिष्ठान बृहत्तर व्यवस्था का एक हिस्सा होता है। सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि व्यवस्था परिवर्तन किया जाय। जब व्यवस्था परिवर्तित हो जाती है तब सत्ता का चरित्रा भी बदल जाता है। पड़ोसी नेपाल के ताजा अनुभवों की दृष्टि से देखें तो वहां अभी राजशाही ही समाप्त हुई है, न कि राज्य का बुनियादी चरित्रा बदला है। यहां फिर यह बात दोहराना प्रासंगिक रहेगा कि नेपाल में सामाजिक परिवर्तन और शासन व्यवस्था के परिवर्तन में फिलहाल गहरा अंतराल दिखायी देता है। मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार यह होता है कि वह वर्तमान में अतीत की परिस्थितियों के सामानांतर विकल्प की रचना कर दे और अब भविष्य के लिए स्वप्नों को जन्म दे। क्योंकि आज का वर्तमान कल के भविष्य के लिए विरासत की ही शक्ल लेगा। इस संदर्भ में डॉ. जोशी का यह प्रश्न मौजूं लगता है कि ÷÷समाजवादी विचारधारा जिसका जन्म और विकास ही पूंजीवादी उदारवाद से असहमति के माध्यम से हुआ वह एक व्यवस्था के रूप में उभरने और संगठित राज्य होने के बाद वैचारिक, असहमति के प्रति इतनी असहिष्णु, और अनुदार क्यों बन गयी। साथ ही समाजवादी व्यवस्था असहमति के वाहक बुद्धिजीवियों को और उनके राजनीतिक संगठनों को व्यवस्था का शत्राु समझने और इसलिए उनके प्रति कठोर उत्पीड़न और दमन का रुख अपनाने को क्यों विवश और बाध्य हुई?''
डॉ. जोशी के इस सवाल की ओर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है कि साम्यवाद जैसी वैज्ञानिक विचारधारा को ÷आस्था' में क्यों रूपांतरित किया गया? उन्होंने स्तालिन युग के अनुभवों के संदर्भ में सवाल उठाया है कि ÷÷वे कौन से कारण थे, वे कौन सी परिस्थितियां थीं, वे कौन से दबाव थे जो स्वयं कम्युनिस्टों को विवेक के प्रकाश की दुनिया से फिर (अंध) विश्वास के धुंधलके की दुनिया में वापस ले आये? वे कौन से कारण थे कि एक नयी वैचारिक लहर और उद्वेलन के उत्पे्ररक और अग्रणी, हर विचारशील व्यक्ति को अपने विवेक और विवेचन से अपनी ओर आकर्षित करने वाले कम्युनिस्ट एक कट्टर और संकीर्णतावादी पंथ ;ेमबजद्ध में सिकुड़ते चले गये और उनका ÷संवाद' अपने ही मतावलम्बियों के बीच का एकतरफा ÷प्रदान' होकर रह गया, उसमें दूसरों से ग्रहण करने कीᄉ÷आदान'ᄉकी गुंजाइश घटती चली गयी। असहमति के प्रति अनुदारता और असहिष्णुता जितनी ही बढ़ती गयी उतना ही विवेकवान और संवादप्रिय कम्युनिस्ट कट्टर, (अंध) विश्वासी और दब्बू कम्युनिस्ट में तब्दील होता चला गया।'' डॉ. जोशी स्वयं ही इन सवालों का तर्कसंगत उत्तर भी देते हैं कि स्तालिनवाद ने ÷÷कम्युनिज्म को एक कट्टरपंथ रूपी धर्म में और कम्युनिस्ट पार्टी को क्रिस्चियन चर्च की तरह श्रेणीबद्ध, धार्मिक साम्प्रदायिक संस्थान में परिवर्तित कर दिया। धार्मिक परम्परा में किसी मुद्दे पर अंतिम राय जांच पड़ताल, विचार विमर्श, वैचारिक संवाद द्वारा नहीं बनती है बल्कि अंतिम निर्णय का अधिकार धार्मिक संस्थान के सर्वोच्च, शीर्षस्थ अध्यक्ष का होता है, जो सभी को स्वीकार्य है।'' डॉ. जोशी अपने इस निष्कर्ष के पक्ष में तर्क यह देते हैं कि ÷÷स्तालिन ने जब मार्क्सवाद और कम्युनिज्म और पार्टी की सदस्यता को स्वीकार किया तो वे मार्क्सवाद के मूल पे्ररणास्रोत, विवेकवाद और प्रबुद्धवाद के कठिन रास्ते से लेनिन की तरह मार्क्सवाद तक नहीं पहुंचे थे। वे एक छलांग में ÷धार्मिक प्रीस्ट' से ÷मार्क्सवादी प्रीस्ट' में तब्दील हो गये। यही नहीं उन्होंने मार्क्सवाद को भी धार्मिक पाठ के ही सांचे में एक नये प्रकार के धर्म के रूप में ढाल दिया। रूसी कम्युनिस्टों की नयी पाठ्यपुस्तक ÷रूस की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास' एक धार्मिक पाठ के सांचे में ढाली हुई पुस्तक है जो नये युग के प्रीस्ट यानी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के प्रशिक्षण का आधार थी।'' यहां यह बतलाना भी प्रासंगिक रहेगा कि स्तालिन कम्युनिस्ट बनने से पहले एक रूसी धार्मिक प्रशिक्षण संस्थान (मोनास्ट्री) में याजक (क्रिस्चियन प्रीस्ट) के पेशे के लिए प्रशिक्षित होने गये थे। उनके चरित्रा की कट्टरता, अशिष्टता, असहिष्णुता महज चारित्रिाक दोष नहीं, एक कट्टर धार्मिक प्रशिक्षण (इनडोक्ट्रीनेशन) का परिणाम थी। यह स्तालिन का एक मनोवैज्ञानिक व समाजवैज्ञानिक विश्लेषण है। यह एक सीमा तक सही भी हो सकता है। चीन के माओ और चाओ एन लाई के सम्बंध में भी लगभग इसी प्रकार का विश्लेषण किया गया है क्योंकि लेनिन व स्तालिन के समान चीन के इन दोनों नेताओं की सामाजिक व पारिवारिक पृष्ठभूमियां नितांत भिन्न थीं। भारतीय संदर्भों में देखें तो औपनिवेशिक काल के दौरान इंग्लैण्ड में दीक्षित भारतीय नेताओं (जवाहरलाल नेहरू, सीनियर कुमार मंगलम्, इंद्रजीत गुप्त, इंदिरागांधी आदि) में जितना ÷सोफस्टीकेशन' था उसकी तुलना में ठेठ भारतीय मिट्टी में रमने वाले नेताओं में कम था। आज भी यह स्थिति है। खुरदुरी पृष्ठभूमि से निकलने वाले नेताओं (लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती आदि) से सुसंस्कृत व परिष्कृत व्यवहार तथा बौद्धिक सूक्ष्मता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अतीत से विरासत में जो मिलता है उसे वे अपने वर्तमान में प्रतिबिम्बित करना चाहते हैं और उन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य की रचना करते हैं। ÷डी क्लॉस' की प्रक्रिया कम्युनिस्ट पर भी समान रूप से लागू होती है। एक बुर्जुवा और कम्युनिस्ट, दोनों को ही समान रूप से ÷डी क्लॉस' होने की आवश्यकता रहती है। मैं समझता हूं कि क्म.सपदा और क्म.बसें की प्रक्रियाएं समानांतर रूप से चलती हैं। जब इनमें अंतराल आ जाता है तब कई प्रकार की जटिलताएं पैदा हो जाती हैंᄉ साम्यवादी व्यवस्थाओं में ऐसा हुआ भी है।
लेकिन यहां एक और सवाल मैं खड़ा करना चाहूंगा। निःस्संदेह स्तालिन शासन की ज्यादतियां ऐतिहासिक रूप से अक्षम्य हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या क्रांति को स्वयं की रक्षा का अधिकार होना चाहिए या नहीं? यही सवाल एक बार फिदेल कास्त्राो ने पश्चिम के वामपंथी बुद्धिजीवियों से किया था। छठे दशक में हवाना में चुनिन्दा वामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच साम्यवाद के विभिन्न पक्षों को लेकर विमर्श हुआ था। चूंकि इनमें से अधिसंख्य बुद्धिजीवी बौद्धिक रूप से खुले समाजों के थे। इसीलिए इन्होंने ÷अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता' व ÷व्यक्ति की स्वतंत्राता' के मुद्दे को जम कर उछाला था। कास्त्राो ने सभी के तर्कों को ध्यानपूर्वक सुना और अंतिम दिन अपने समापन भाषण में उन्होंने एक ही सवाल किया था कि जब बुद्धिजीवी, पूंजीपति या कोई अन्य व्यक्ति अपनी स्वतंत्राता की रक्षा के लिए अधिकार चाहता है तो क्या आप लोग क्रांतिकारियों को क्रांति की रक्षा का अधिकार देंगे या नहीं? क्योंकि क्रांति के लिए रक्त बहता है, लोग अपना बलिदान देते हैं और नये सपनों की रचना के लिए क्रांति लाते हैं, तो क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता के नाम पर इन तमाम उपलब्धियों और बलिदानों को ÷स्वाहा' कर देना चाहिए? वैसे यह सही भी है कि प्रत्येक परिवर्तन और क्रांति को अपनी उपलब्धियों की रक्षा का अधिकार दिया जाना चाहिए क्योंकि समाज में जब तक श्ंदजवहवदपेजपब बवदजतंकपबजपवदेश् रहेंगे तब तक इस तरह के टकराव व हादसे होते रहेंगे। क्या पूंजीवादी लोकतंत्रा स्वयं की रक्षा के लिए सत्तातंत्रा का हिंसक इस्तेमाल नहीं करते हैं? किस प्रकार नेपाल में जनवादी शक्तियों को वहां की राजशाही ने दबाया और उनके विरुद्ध हिंसा का इस्तेमाल किया, क्या इसे भुलाया जा सकता है? क्या भारत में पूंजीवादी वर्गों की हिफाजत में राजसत्ता का इस्तेमाल नहीं किया जाता है? कम्युनिस्ट शासनों के अत्याचारों और तानाशाहियों को तो जम कर प्रचारित किया जाता है लेकिन पूंजीवादी व्यवस्थाओं की हिंसक प्रवृत्तियों पर क्या पर्दा नहीं डाला जाता? आज भारत को ही लें। डेढ़ लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं। क्या यह राज्य द्वारा जनित परोक्ष हिंसा नहीं है? सवाल यह भी पैदा होता है कि कितने ऋणग्रस्त पूंजीपतियों ने किसानों की भांति आत्महत्या की? सवाल यह भी पैदा होता है कि जब सोवियत संघ का अंत हो चुका है और ÷वारसा संधि' का पटाक्षेप हो चुका है तब ÷नाटो' को क्यों जीवित रखा जा रहा है? क्यों अमेरिका अपने सैनिक अड्डों (अफगानिस्तान, इराक, फिलीपींस, जापान आदि) को विभिन्न क्षेत्राों में बनाये हुए है? जब तथाकथित उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था के संचालक व प्रबंधक अपनी व्यवस्था की हिफाजत में हजारों लोगों को मिसाइलों (अफगानिस्तान, इराक आदि) से भून सकते हैं तब हम साम्यवादी नेताओं को ही अकेले कठघरे में कैसे खड़ा कर सकते हैं? यह भी विचारणीय मुद्दा है।
डॉ. जोशी स्वयं अपने लेखों में कह चुके हैं कि स्तालिन को अत्यंत दुर्गम परिस्थितियों में सोवियत संघ के अस्तित्व की रक्षा करनी पड़ी थी। यहां तक कि चर्चिल ने भी यह स्वीकार किया था कि स्तालिन का रूस ही हिटलर के फासीवाद को जवाब दे सकता है। डॉ. जोशी ने के.पी.एस. मेनन की पुस्तक के हवाले से लिखा हैᄉ÷÷फर्क यह था स्तालिन के शासन में बच्चे सचमुच स्कूल जाने लगे थे। यूरोप के किसी भी देश में किताबें इतनी सस्ती नहीं थीं और पढ़ने की आदत इतनी व्यापक नहीं थी जितनी सोवियत संयुक्त गणराज्य में थी। इसके परिणामस्वरूप, सर्वशक्तिमान सत्ता का ख्याल अशिक्षित रूसियों को मान्य था, वह एक प्रबुद्ध पीढ़ी के अस्तित्व में आने के बाद बर्दाश्त के बाहर हो गया। इसे बिना जाने स्तालिन ने ही स्तालिनवादी व्यवस्था के विघटन की स्थितियां पैदा कर दी थी।'' यहां इतना तो स्वीकार किया जाना चाहिए कि स्तालिन ने रूसी जनता को शिक्षा से लैस कर कम से कम उसमें सवाल करने की क्षमता तो पैदा की। यदि जनता में समाजवाद और फासीवाद के अंतर को समझने की क्षमता नहीं होती तो क्या हिटलर की सेनाओं से लड़ा ला सकता था? जब साम्यवादी सत्ताओं को पश्चिमी दृष्टि से देखने की कोशिश की जाती है तो उसमें कई खतरे भी निहित होते हैं। जब हम एक तरफ यह कहते हैं कि लेनिन और स्तालिन की अलग अलग पृष्ठभूमियां रही हैं और उनकी पारिवारिक जीवनशैलियां उन्हें प्रभावित करती रही हैं, तब यह कैसे सम्भव है कि पूंजीवादी व्यवस्थाओं के अभ्यस्त बुद्धिजीवियों की दृष्टि नितांत ÷स्थिति निरपेक्ष' रहेगी। क्योंकि भौतिक परिस्थितियां मनुष्य की चेतना का निर्माण करती हैं। तब यह कैसे स्वीकार किया जाय कि यूरो अमेरिका के बुद्धिजीवियों ने साम्यवादी व्यवस्थाओं को ÷पूर्वाग्रहों' तथा विभिन्न ÷सापेक्षताओं' से मुक्त होकर देखा होगा।
1991 में जब सोवियत संघ का पतन हुआ था तब मैंने लिखा था कि ÷÷वैसे, चुनौतियां योरोप में मार्क्सवाद के लिए नयी नहीं हैं। पिछली सदी में ही इसे समय समय पर गम्भीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अक्तूबर क्रांति के बाद भी कई विचारकों ने इसकी भावी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किये थे। स्तालिन शासन के अनुभवों को लेकर तो इसकी जम कर आलोचना हुई। बोरिस पास्तरकनाक, एलेक्जेंडर सोल्जनित्शिन सहित अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने मार्क्सवाद पर आधारित समाजों को जम कर कोसा। 1950 में लंदन से एक बहुचर्चित पुस्तक प्रकाशित हुई ÷दी गॉड थैट फैल्ड'। इसके छपते ही यूरो अमेरिकी देशों सहित पूरे विश्व में साम्यवादी व्यवस्था को लेकर कोहराम मच गया। चारों तरफ से साम्यवाद पर प्रहार हुए। फैसले दे दिये गये कि साम्यवाद मानवता का दुश्मन है। साम्यवादी व्यवस्था क्रूर, दमनकारी, संवेदनहीन, अमानवीय और प्रगति व समृद्धि विरोधी है। साम्यवादी देशों में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता के लिए कोई स्थान नहीं है। पूरा समाज एक किस्म का गैस चेम्बर है। पुस्तक के लेखक आर्थर कोइस्टलेर, इग्नाजिओ साईलोन, रिचार्ड राइट, आंद्रे गाइड, लुईस चेर और स्टीफेन स्पेण्डेर ने साम्यवाद से मोहभंग का वर्णन किया है। इन लेखकों का कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरा रिश्ता रहा है। ये पार्टी के कार्यकर्ता और सहयात्राी भी रहे हैं। इन्होंने संवेदना के धरातल पर साम्यवादी व्यवस्था को नकारा है।'' (चुनौतियों का चक्रव्यूह, रा.श. जोशी, सामयिक प्रकाशन, पृष्ठ-47)।
डॉ. जोशी ने सोवियत संघ के अंतिम वोल्शेविक राष्ट्रपति व महासचिव मिखाइल गोर्बाचेव की आठवें दशक की पुस्तक ÷पेरोस्त्रााइका' और ÷ग्लास्तनॉस्त' (पुनर्निर्माण और खुलापन) का उल्लेख किया है। इस पुस्तक में गोर्बाचेव ने सोवियत संघ या यह कहिये सम्पूर्ण साम्यवादी राष्ट्रों के लिए नयी अवधारणाएं प्रस्तुत की थीं। निःस्संदेह ये अवधारणाएं बंद स्तालिनवादी अवधारणाओं के ठीक विपरीत हैं और ÷सम्पूर्ण सम्बंधविच्छेद की भावना' इनमें गुंजित हुई थी। डॉ. जोशी ने ठीक ही लिखा है कि ÷÷इसी के फलस्वरूप प्रबुद्ध बुद्धिजीवी समुदाय में एक नयी बौद्धिक और भावनात्मक ऊर्जा का उभार हुआ, और बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा आत्मपरीक्षण और आत्मालोचना की पुनः शुरुआत हुई।'' लेकिन जब हम गोर्बाचेव के इस अवदान का उल्लेख करते हैं तब हमें बरबस यह भी याद आ जाता है कि उनकी इन दोनों अवधारणाओं के साथ ही मनुष्य द्वारा किया गया उच्चतम समाज व राज्य रूपांतरण आविष्कार (क्रांति व समाजवादी व्यवस्था) का भी दर्दनाक अंत हो गया। गोर्बाचेव की अवधारणाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके प्रवर्तक ने बड़ी शाइस्तगी (या बड़ी धूर्तता) के साथ ÷अंतर्विरोधों' के अस्तित्व को ही गायब कर दिया। हमें यह याद रखना चाहिए कि अंतर्विरोधों के चरित्रा के आधार पर ही पूंजीवादी राज्य और समाजवादी राज्य के चरित्राों में अंतर किया जाता है। पूंजी का स्वामित्व अंतर्विरोध का चरित्रा निर्धारण करता है। जब गोर्बाचेव ने यूरोपीय महाद्वीप का समान ÷ईथोस' या ÷कॉमन यूरोपीयहोम' की बात की तो इसके साथ ही उन्होंने पूंजीवादी राज्य और समाजवादी राज्य के बीच व्याप्त आधारभूत शत्राुतापूर्ण अंतर्विरोध (ंंंदजंहवदपेजपब बवदजतंकपबजपवद) को ही नकार दिया। उस समय मैंने लिखा था कि गोर्बाचेव का पेरोस्त्रााइका का नारा पश्चिम की जनता को जम कर लुभायेगा। संक्षेप में, ÷÷किसी भी मार्क्सवादी के लिए समानता की बात वर्ग हितों के आधार पर ही हो सकती है। लेकिन, इस नारे का आविष्कार करते समय रूसी नेता वर्ग दर्शन के पाबंद नहीं रहे हैं। वे सिर्फ अपने राष्ट्रीय एवं जातीय हितों से पे्ररित हुए हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि हम लोगों की एक समान यूरोपीय सभ्यता है। इस पुस्तक के माध्यम से सोवियत राष्ट्रपति ने पश्चिम को यह भी संकेत भेज दिये थे कि ÷स्थान स्थान पर टकराव और लौह आवरण की कृत्रिामता समाप्त होनी चाहिए। क्योंकि हम दोनों की जड़ें समान हैं।' उन्होंने चार बरस पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे नये राजनीतिक दृष्टिकोण के लिए स्वयं को अनुकूलित कर चुके हैं। इसलिए वे पुराने नजरिए से यूरोप के राजनीतिक नक्शे को देखना नहीं चाहते। ÷युद्ध और आंसुओं में हिस्सेदार बनने के अलावा भी इस महाद्वीप के पास देने के लिए बहुत कुछ है।' यह उनका कूटनीतिक संदेश था।'' (चुनौतियों का चक्रव्यूह, रा.श. जोशी, सामयिक प्रकाशन, पृष्ठ-51)।
दरअसल, व्यवस्था परिवर्तन और राजसत्ता के रूपांतरण की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है। जब विचारधारा और उसके प्रतिबद्ध वाहक राजसत्ता से बाहर होते हैं तब एक दूसरी प्रकार का गतिविज्ञान (डायनेमिक्स) कार्य करता है। जब विपक्ष से सत्ता में पहुंच जाते हैं और उसके संचालक की भूमिका निभाने लगते हैं तब दूसरे प्रकार का गतिविज्ञान कार्य करने लगता है। प्रतिरोधी से शासक में रूपांतरण जितना कठिन होता है उससे कहीं अधिक कठिन होता है प्रतिरोधी की भूमिका को शासक रहते हुए बनाये रखना। क्योंकि सत्ता का परम्परागत गुण यह रहा है कि वह प्रतिरोध की स्वाभाविक शत्राु होती है। पूंजीवादी व्यवस्थाओं में भी जब प्रतिपक्ष शासक बन जाता है तब उसकी भाषा और व्यवहार, दोनों ही बदल जाते हैं। हम अपने देश में भी इसका अनुभव ले सकते हैं। इस संदर्भ में हमें याद रखना चाहिए कि तथाकथित दूसरी आजादी (सम्पूर्ण क्रांति और जनता पार्टी का शासन) के शासनकाल में दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध सामंती तत्वों की हिंसा का विस्फोट हुआ था। इंदिरा गांधी के आपातकाल के विरोधी इन वंचित वर्गों की रक्षा करने में नाकाम रहे थे। जब कांगे्रस के शासनकाल में कालाहांडी में भूख से मौत होती है तब सत्ताधारी दल उसका कारण कुपोषण बतलाता है लेकिन प्रतिपक्ष भाजपा उसे भूख से परिभाषित करती है। इसके विपरीत जब भाजपा सत्ता में आती है तब दोनों दल अपनी अपनी परिभाषाओं की अदला बदली कर लेते हैं! मैं समझता हूं कि बोल्शेविक शासक स्वयं का प्रतिपक्ष जीवित नहीं रख पाये और न ही प्रतिरोध और राजसत्ता के गतिविज्ञान को ठीक तरह से समझ पाये। यह प्रश्न व्यापक स्तर पर बहुआयामी विमर्श की मांग चाहता है।
वैसे यह भी सही है कि शासन शैलियों और उत्पादन प्रौद्योगिकी के आविष्कार और उनके निरंतर परिष्करण के मामले में पूंजीवादी राज्य समाजवादी राज्यों से लगातार आगे रहे हैं। पूंजीवादी राज्यों ने समाजवादी व्यवस्था को ऐसे चक्रव्यूह (महंगी जीवनशैली, उपभोक्तावाद और शस्त्राों की प्रतिस्पर्धा) में धकेला जिससे वह निकल नहीं सकी। उसकी नियति अभिमन्यु से भिन्न सिद्ध नहीं हो सकी। मुझे यहां अमेरिकी उद्योगपति फोर्ड का एक कथन याद आता है। 1973 में जब सोवियत संघ और इटली के बीच कार निर्माण को लेकर समझौता हुआ था तब फोर्ड ने अमेरिकी साप्ताहिक ÷न्यूजवीक' या ÷टॉइम्स' को दिये अपने एक इंटरव्यू में कहा थाᄉजिसका सार यह है कि हमें यह आशा करनी चाहिए कि अब रूसी एक देश के रूप में व्यवहार करेंगे, न कि एक उद्देश्य (बंनेम) की भूमिका निभायेंगे। आज फोर्ड की वह मनोकामना पूरी हो रही है।
और अंत में।
लौकिक समाज को जिस ÷प्रोमीथियस' (साम्यवादी शासन व्यवस्था) से उम्मीद थी कि वह धरा पर समानता के दीप जलाये, क्या उसके दुखद अंत से मानवता को पहुंची क्षतियों का अभी तक अनुमान लगाया जा सका है? कितने समाजविज्ञानी हैं जिन्होंने इस ओर ध्यान दिया है? अतीत के जख्मों का नॉस्तलजियाई शैली में विलाप जितना आसान होता है उससे कहीं अधिक दुष्कर है वर्तमान में ही भविष्य के स्वप्नों का मर जाना। फिर भी मैं डॉ. जोशी की उद्घाटन किस्त में उद्धृत प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हाब्सबॉम के इस आशा भरे नोट के साथ अपनी इस लम्बी टिप्पणी को समाप्त करना चाहूंगा : ÷÷अक्तूबर क्रांति ने जिस महान प्रयोग की शुरुआत की थी, उसकी विफलता इतिहास का अंत नहीं, जैसा फ्रांसिस फूकूयामा ने कहा है। वह केवल इतिहास के एक अध्याय की समाप्ति है। वह इतिहास अब नहीं दोहराया जाएगा, यद्यपि उसने, कम से कम आरम्भ के वर्षों में जो आशा जगायी थी, वह मानवीय आकांक्षाओं का एक चिरस्थायी हिस्सा रहेगी। साथ ही व्यापक सामाजिक अन्याय जिसने पिछली शताब्दी में साम्यवाद को जबर्दस्त ऊर्जा प्रदान की थी, वह इस शताब्दी में घटती नहीं दिखाई देती...''
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