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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  अंक/19 सम्‍पादकीय

 

 

समाज
लड़की की पुनर्रचना कृष्ण कुमार

शताब्दी
भगवतशरण उपाध्याय अनुसंधाता नहीं व्याख्याता    भगवान सिंह

लेख
अवतारवाद का समाजशास्त्रा और लोकधर्म
  
चौथीराम यादव
प्रेमचंद और राष्टवाद राजकुमार

कहानियां
चोर सिपाही मो आरिफ
लालबहादुर का इंजन राकेश मिश्र
यहां वहां कहां गौरव सोलंकी

विशेष
घर रहेंगे दूधनाथ सिंह

लम्बी कविता
मंच और मचान केदारनाथ सिंह

कविताएं
गिरना नरेश सक्सेना
सात कविताएं गिरिराज किराडू
देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के
   एक नागरिक का खत
श्रीप्रकाश शुक्ल
दतर हरे प्रकाश उपाध्याय
तीन कविताएं वसंत त्रिपाठी
 दो कविताएं यू के एस चौहान
 इस कथा में मृत्यु मनोज कुमार झा

डायरी
जिन्दा जुनूनों का कोलाज सुधा अरोड़ा

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त
    राजेश जोशी

लम्बी कहानी
कहानीकार राजू शर्मा

समीक्षाएं
हिन्दी कहानी का रचनात्मक विस्तार
  
मनोज कुमार पांडेय
व्यापक होती चिन्ताएं अरुणेश शुक्ल
निहितार्थों की समझ शिव कुमार मिश्र
 समय स्वप्न और प्रतिरोध राजीव कुमार


अंक/19   जनवरी /09
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

 

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अंक/19   जनवरी 2009

घर रहेंगे

दूधनाथ सिंह

सन्‌ 1919 में जब महादेवी इलाहाबाद अपनी नियमित स्कूली शिक्षा के लिए आयीं और वॅस्टवेथ गर्ल्स कालेज में दाखिला लिया, तबसे लेकर सन्‌ 1929 तकद्र यानी बी.ए. का इम्तहान देने और परीक्षाफल आने तकद्र कुल दस वर्षों तकद्र वे वॅस्टवेथ कालेज के हॉस्टल में ही रहीं। गर्मियों की छुट्टियों में हर साल अपने पिता, हेडमास्टर बाबू गोविन्द प्रसाद वर्मा के पास नरसिंहगढ़ जरूर जाती रहीं। वॅस्टवेथ कालेज की स्थापना सन्‌ 1895 ई. में लखनマ में चार्ल्स वॅस्टवेथ के नाम पर हुई थी। सन्‌ 1900 ई. के आसपास कॉलेज इलाहाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। चार्ल्स वॅस्टवेथ उस वक्त संयुक्त प्रांत क्कवर्तमान उनर प्रदेशत्र् के लेटिनेण्ट गवर्नर थे और स्त्राी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। सम्पूर्ण उनर भारत में तब वॅस्टवेथ कालेज भद्रलोक की लड़कियों के लिए मात्रा अकेली शिक्षण संस्था थी। पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए. और एम.ए. की कक्षाओं में लड़के, लड़कियां साथ साथ पढ़ते थे लेकिन जब पंडित गंगानाथ झा उपकुलपति हुए तो उनको यह व्यवस्था पसंद नहीं आयी। वे अपना बैडमिण्टन कोर्ट भी गाय के गोबर से लिपवाते थे और उपकुलपति की मेज इतनी लम्बी चौड़ी होती थी कि कोई भी सामने बैठा हुआ अध्यापक उनसे ÷हैण्डशेक' नहीं कर सकता था। सन्‌ 1925 में ÷सर' गंगानाथ झा ने यूनिवर्सिटी कार्यकारिणी में इस आशय का एक प्रस्ताव पारित करवा लिया कि बी.ए. की कक्षाओं में लड़के, लड़कियों का एक साथ पढ़ना उचित नहीं। इस प्रस्ताव के अनुसार ही वॅस्टवेथ कॉलेज में लड़कियों के लिए बी.ए. की शिक्षा के लिए व्यवस्था की गयी। इन लड़कियों को पढ़ाने के लिए यूनिवर्सिटी के ज्यादातर नये और अनाम और तब तक अनुभवहीन अध्यापक जाया करते थे। डॉ. बाबूराम सक्सेना, जो महादेवी की छोटी बहन श्यामादेवी क्कविवाह सन्‌ 1922 ई.त्र् के पति थे, तब इन्हीं अध्यापकों में से एक थे। 1929 में ही महादेवी घनघोर रूप से बीमार पड़ीं। कुछ दिनों तक उन्होंने अपने पिता, जो नरसिंहगढ़ की सारी ÷विपनियों' से छुटकारा पाकर गवर्नमेण्ट हाई स्कूल, भागलपुर क्कबिहारत्र् चले गये थे, के पास आराम किया। जब लगभग छः महीनों तक महादेवी का धीमा बुखार चलता रहा तो डॉक्टरों को तपेदिक का शक हुआ और उन्हें किसी पहाड़ी जगह में भेजने क्कजो उन दिनों तपेदिक के मरीजों के लिए आम चलन थात्र् का निर्णय हुआ। महात्मा गांधी में अपनी अटूट आस्था के कारण महादेवी ने नैनीताल के निकट ÷ताकुला' स्थिति ÷गांधीधाम' का चुनाव किया। लेकिन ÷गांधीधाम' के संचालक श्री गोविन्द शाह को तपेदिक के एक मरीज क्कजो मात्रा एक शक थात्र् को आश्रम में रखना उचित नहीं जान पड़ा, क्योंकि तपेदिक एक छूत की बीमारी है। और फिर ÷बापू' कभी कभी वहां आकर ठहरते हैं। महादेवी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अपने पिता से कह कर ÷ताकुला' के पास ही कहीं अपने लिये कोई और घर लिया और वहां रहने चली गयीं। जिद्दी और गुस्सैल और अपने नरसिंहगढ़ के किशोरवय और युवा रोमांस में बुरी तरह असफल और आहत और लगभग टूटी हुई, और अब एक ÷नयी मीरा' के रूप में विख्यात कवयित्राी महादेवी ने बौद्ध संघ में जाने का निर्णय लिया। जब उस वृद्ध अर्हत्‌ क्कमहंतत्र् के सामने महादेवी प्रस्तुत हुईं तो उस दिन अर्हत्‌ का यह व्रत था कि वे आज स्त्रिायों, भिक्षुणियों का मुख नहीं देखेंगे। सो, उन्होंने महादेवी के सामने अपनी चीवर की ओट कर ली। बिगड़ैल महादेवी उसी आहत और गुस्से की अवस्था में अर्हत्‌ के आवास से बाहर चली आयीं। बाहर निकल कर उन्होंने भिक्षुओं को फटकार भी लगायी, व्यंग्य भी किया और अपने निवास पर लौट आयीं। ÷ताकुला' में आराम करने के बाद महादेवी स्वस्थ हो गयीं और डॉक्टरों का शक गलत निकला। जब ÷गांधीधाम' के संचालक गोविन्द शाह को इस बात का पता चला तो सम्भवतः उन्हें पछतावा हुआ। उन्होंने महादेवी को ÷गांधीधाम' में रहने के लिए कहा, जिसे महादेवी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
इलाहाबाद लौटने के बाद महादेवी ने यह निर्णय लिया कि उन्हें संस्कृत साहित्य और वेद विद्या में एम.ए. करना है। इस सारी मानसिक और शारीरिक उठापटक में महादेवी की पढ़ाई फिर लगभग दो वर्ष के लिए छूट गयी। लेकिन बी.ए. के बाद वॅस्टवेथ कॉलेज के हॉस्टल में रहने की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी थी। ऐसे आड़े वक्त में पुराने आर्य समाजी उनके पिता बाबू गोविन्द प्रसाद वर्मा ने फिर व्यवस्था की। यहां मुट्ठीगंज स्थित ÷आर्य कन्या पाठशाला' क्कजो आर्य समाज की संस्था थीत्र् के हॉस्टल में अपनी प्रिय बेटी के रहने की व्यवस्था उन्होंने करवा दी। वहां एक लड़की सुश्री रामेश्वरी गोयल, जो संयोग से कविताएं भी लिखती थी, उनकी ÷रूम पार्टनर' बनी। रानी शिव कुंवर और सुभद्रा जी के बाद रामेश्वरी गोयल महादेवी की तीसरी प्रिय सखी थी। सुभद्रा जी और रामेश्वरी गोयल का महादेवी के जीवन को एक स्वस्थ और सकारात्मक दिशा में मोड़ने में बहुत बड़ा योगदान है। और यह भी कि इन तीनों की अकाल मृत्यु ने महादेवी को और अकेला करने और कठोर संघर्ष झेलने के लिये अंततः सिद्धार्थ गौतम के दुःखवाद, वेदांतिक तीर्थयात्रााओं, अनंत नींद, निरंतर स्नान और कविता के चीत्कार और गांधी जी के सामाजिक कार्यव्मों में लग कर अपने अंतर अवसाद से भागने की चेष्टा और निर्झरिणी भुलावेभरी हंसी में ले जाकर छोड़ दिया।
इसके पहले महादेवी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत और वेद विद्या में एम.ए. में दाखिला लेने का प्रयत्न किया था लेकिन काशी के पंडित प्रोफेसरों ने यह कह कर इंकार कर दिया कि ÷एक स्त्राी को वेद विद्या पढ़ने का अधिकार नहीं है।'
सुभद्रा कुमारी चौहान के बाद रामेश्वरी गोयल महादेवी के मनमाफिक यह तीसरी सखी मिली थी। पहली सखी नरसिंहगढ़ की हमउम्र रानी शिव कुंवर, दूसरी सुभद्रा जी और तीसरी रामेश्वरी गोयल। दोनों लड़कियां रिक्शे पर साथ साथ बैठ कर यूनिवर्सिटी जाती थीं। अपने बुढ़ापे में इस बात को याद करते हुए महादेवी अक्सर हंसी से लोटपोट हो जाती थीं। रिक्शे में बैठते ही महादेवी रिक्शे का हुड् उठा देतीं। रामेश्वरी फट् से हुड् गिरा देती और कहती ÷ताजा और स्वच्छ हवा'। महादेवी बताती थीं कि ÷आर्यकन्या से यूनिवर्सिटी फाटक तक यह खेल लगातार चलता रहता। उन दिनों बहुत कम लोग और बहुत कम रिक्शे थे। उन दिनों लोग लड़कियों की तरफ ताकझांक भी बहुत कम करते, जैसे आजकल यह ÷शौर्य' बन गया है।' महादेवी इस पर खूब हंसतीं। ÷यूनिवर्सिटी में अंगे्रजी विभाग' पर जब रामेश्वरी मुड़ जाती तो धीरे से ऑर्डर लगातीद्र ÷डरना नहीं'। इस पर फिर हंसी। वो आजकल एक गाना चला हुआ है न ÷बदन पे सितारे लपेटे हुए...' तो बाबा, मैं तो गांधी जी के आघ्वान के बाद खद्दर की सफेद साड़ी पहन कर यूनिवर्सिटी जाती थी, उसमें कहां सलमे सितारे टंके हुए थे? लेकिन लड़कों की दृष्टि में कुछ कुछ ऐसा ही होता था। कक्षा में मात्रा एक काठ की कुर्सी, जिसका अलग से प्रबंध किया गया था, मेरे लिए अलग, थोड़ी दूर रखी रहती थी। मैं आंखें उ+पर उठा कर अपने अध्यापक को देख भी नहीं सकती थी, अपने सगे बहनोई को भी नहीं, जो इस पर मुस्कुराते रहते थे। यह जो मेरी गर्दन में पीड़ा है, वह उन्हीं दिनों की देन है। सिर उ+पर न उठाओ, नोट्स लेते रहो, सिर्फ कर्ण कुहर सतत खुले और सावधान रहें।' इस पर हंसी की फुहार। ÷मुंह लटकाये रहो, सांस खींच कर फेफड़ों को फुलाना मना। तो हम किस गुरुकुल में पढ़े हैं!' महादेवी अपना वृद्ध और फूला हुआ चेहरा उ+पर उठातीं। रामजी पांडेय उन्हें याद दिलाते कि ÷देवी जी, आपके आराम का समय हो गया है।' महादेवी इस पर चकाचौंध भाव से आंखें उठा कर देखतीं।
रामेश्वरी गोयल के साथ महादेवी के जीवन के ठीक उल्टा हुआ। जब बड़े वणिक घरानों से रामेश्वरी की शादी के प्रस्ताव आने लगे तो रामेश्वरी ने सबको परे ठेलते हुए अपने एम.ए. के एक सहपाठी श्री प्रकाश चन्द्र गुप्त क्कहिन्दी के महत्वपूर्ण प्रगतिशील आलोचक और अंग्रेजी विभाग के बाद में प्रोफेसर और अध्यक्षत्र् से शादी कर ली। एम.ए. करने के बाद रामेश्वरी आर्यकन्या पाठशाला की प्रिंसिपल हुई और प्रथम प्रसव में ही उनका देहांत हो गया। जाहिर है कि महादेवी की क्या मानसिक हालत हुई होगी। आज की मशहूर गायिका शुभा मुदगल रामेश्वरी की पोती हैं। मौत की यह घटना सन्‌ 1935 ई. की है। महादेवी तब प्रयाग महिला विद्यापीठ की नयी नयी आवासी प्रिंसिपल थीं। बाद में विद्यापीठ का नया पाठ्यव्म तैयार करते वक्त महादेवी ने अपनी इस सखी की कविताएं उसमें रखीं। यह पाठ्यव्म सन्‌ 1945 तक चलता रहा।
आर्यकन्या पाठशाला के हॉस्टल से महादेवी सन्‌ 1933 में ही आवासी प्रिंसिपल के रूप में प्रयाग महिला विद्यापीठ की पुरानी, हिवेट रोड वाली इमारत के प्रथम तल पर बने एक छोटे से कमरे में आ गयीं। सन्‌ 1935 में जब विद्यापीठ 1, एल्गिन रोड वाले बड़े परिसर में स्थानांतरित हुआ और दोनों परिसर साथ साथ चलने लगे तो महादेवी एल्गिन रोड वाले परिसर में नये नये बने बंगले में रहने चली गयीं। श्री रामकृष्ण डालमियां के एक बड़े अनुदान से वहां छात्रााओं के रहने के लिये हॉस्टल और पढ़ाई के लिये बहुत सारे कमरे बन कर तैयार हुए। और तरह के खचोर्ं के लिए श्री सीताराम सक्सेरिया ने धन इकट्ठा करने में महादेवी और संगमलाल अग्रवाल क्कप्रयाग महिला विद्यापीठ के संस्थापकत्र् की बड़ी मदद की। 1, एल्गिन रोड वाले बंगले और परिसर का दौर महादेवी के साहित्यिक और गैर साहित्यिक रचनात्मक क्ककवि+गद्यकार+चित्राकार+स्त्राी शिक्षा+चित्राकला विभाग की स्थापना+उनर प्रदेश की पहली कांग्रेस सरकार क्क1936त्र् से विद्यापीठ की परीक्षाओं को मान्यता दिलवाना+हिरन, कुने, गायें, बिल्लियां, खरगोश, चिड़ियां पालना+बहुत सारी सेविकाओं का लालन पालन+झूंसी और अरैल के गांधीवादी कार्यव्म+कांग्रेसी नेताओं और उनके परिवारों को सन्‌ 42 के ÷भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान अंदर शरण देना और पुलिस को भीतर न घुसने देना+सांध्यगीत, यामा, दीपशिखा, अतीत के चलचित्रा, स्मृति की रेखाओं की रचना और प्रकाशन+÷चांद' पत्रिाका का सम्पादनत्र् उ+र्जा के विस्फोट और पूर्णाहुति का सर्वोत्कृष्ट समय है। इसी बंगले में रहते हुए महादेवी अपने शिखर पर पहुंची और सन्‌ 1943-44 के ÷बंग दर्शन' के प्रकाशन और चित्रा प्रदर्शनी के बाद यहीं पर वे जीवित राख की ढेरी में भी तब्दील हो गयीं। साहित्य और जीवन का वह नशा जैसे हिरन हो गया। उसके आगे की महादेवी इतिहास का एक कालपात्रा हैंद्र एक ÷मिथिहास'।
अब उस बंगले के बाहर एक भैंस बंधी रहती है और सामने वाले कमरे में लड़कियों के लिए किताबों की एक दुकान खुली हुई है। भारतीय मनीषा के लिए जैसे कुछ भी संरक्षणीय नहीं है। संस्कृति का आलोक क्कजो कि महादेवी थींत्र् जैसे बुझा हुआ है। उनके हस्तलिखित रेकार्ड्स, मौलिक जलरंग और तैलचित्रा, उनके रेखांकनों और बनाये हुए सज्जा चित्राों की मौलिक प्रतियां, किताबें, बिस्तर, बुद्ध और गांधी के कट्आउट्स, उनकी मां हेमरानी देवी का तैलचित्रा सभी नष्ट होने के कगार पर अवैध कब्जे में हैं। कुंवर नारायण की वह कविता मुझे बहुत प्रिय है :
घर रहेंगे,
हमीं उनमें रह न पायेंगे
समय होगा,
हम अचानक बीत जायेंगे।
मुझे अब लगता है कि घर भी एक दिन नहीं रहेंगे। फिर भी...

÷मीरा कुटीर', रामगढ़ नैनीताल

महादेवी का पहला अपना निजी घर नैनीताल से लगभग 20 किलोमीटर दूर रामगढ़ में बना। यह घर उन्होंने अपनी रुचि से जगह चुन कर बनवाया था। घर जब बन कर तैयार हुआ तो महादेवी ने इसका नामकरण कियाद्र ÷मीरा कुटीर'। इसके पहले भी महादेवी अपनी लम्बी बीमारी के दौरान ÷ताकुला' में ÷गांधीधाम' और उसके आसपास कई महीनों तक स्वास्थ्य लाभ के लिए रही थीं। ÷गांधीधाम' से उनका स्वाभाविक लगाव था। सन्‌ 1934 में महादेवी ने अपनी मौसी और भक्तिन के साथ बद्रीनाथ की पहली यात्राा की। डांडी या झम्पान की जगह महादेवी ने यह यात्राा पैदल की। इसका विस्तृत, त्राासद और व्यंग्यात्मक वर्णन उनके प्रसिद्ध स्मृति चित्रा ÷जंग बहादुर' में मिलता है। इस यात्राा से लौटते हुए महादेवी ने नैनीताल के विभिन्न सुरम्य स्थलों में घूमघाम कर मौजा उमागढ़ स्टेट, पट्टी परगना रामगढ़ की देवीधार पहाड़ी पर बांज, देवदार, बुरूंश, चीड़ आदि घने वृक्षों के कुंज में एक सुरम्य स्थल को पसंद किया। दो वर्ष बाद महादेवी फिर ÷गांधीधाम' गयीं और देवीधार की उस जमीन के मालिक श्री कमलापति जोशी से दवामी पट्टे ;चमतउंदमदज समेंमद्ध पर वहां कुल 4 नाली 6 मुट्ठी जमीन खरीदी। इस पट्टे का वार्षिक लगान 10 रुपये क्कदस रुपयेत्र् तय हुआ। इसमें महादेवी को यह अधिकार मिला कि वे इस जमीन पर अपने रहने के लिये मकान बना सकती हैं। यह मकान सन्‌ 1937-1938 के बीच कभी बन कर तैयार हुआ और 1940 से महादेवी नियमित रूप से गर्मियां वहीं बिताने लगीं। 1939 में उनके रामगढ़ जाने का कोई विवरण नहीं मिलता। उस साल वे ÷यामा' के प्रथम प्रकाशन में व्यस्त थीं और सज्जा चित्राों से लेकर प्रूफ रीडिंग तक का काम देख रही थीं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसी वर्ष महान चित्राकार अमृता शेरगिल उनसे मिलने आ रही थीं और वे किसी भी कीमत पर इलाहाबाद से बाहर नहीं जाना चाहती थीं।
रामगढ़ वाले घर में रह कर महादेवी ने क्या लिखा पढ़ा, इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी मेरे पास उपलब्ध नहीं है। इसके दो कारण हैं एक तो घरेलू बैठकों में कभी भी महादेवी अपनी साहित्य रचना के बारे में बात नहीं करती थीं, दूसरे वे अपनी रचनाओं के नीचे कभी तारीख डालती भी थीं जैसाकि बाद के दिनों में निराला अन्यमनस्कता में ही सही, करने लगे थे, तो भी उसमें जगह का नाम नहीं होता था। बहुत कम लेखक ऐसा करते हैं। पता नहीं, रवीन्द्र नाथ भी, शायद, नहीं करते होंगे। वैसे भी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन कविता या रचना किस स्थान पर कहां लिखी गयी। वात्स्यायन ने जरूर अपनी कविताओं पर तिथियां और स्थान डाले हैं। महादेवी ने ÷अतीत के चलचित्रा' के हर संस्मरण के अंत में तारीख डाली है। बाकियों के बारे में सिर्फ पत्रिाकाओं में प्रकाशित होने से यह पता लगता है कि फलां रचना इस सन्‌ या महीने के पहले लिखी गयी। रामगढ़ महादेवी अपने लम्बे चौड़े ÷कुनबे' को लेकर जाती थीं। ऐसे में उन्हें वहां कितना एकांत मिलता होगा, यह सोचने की बात है। दूसरे, महादेवी कभी भी कार्यव्म बना कर नियमित लेखन की आदी नहीं थीं। कल्पना की झंकृतियां या अनुभूतियों के आवेग में अचानक आविष्ट और समाधिस्थ स्थिति की संरचना हैद्र उनका सारा लेखन। अचानक मौन धारण कर लेना और अपने कमरे या मेज की ओर चले जाना, अचानक लोगों से मिलना जुलना बंद, अचानक ही... यही महादेवी की अनंत नींद है। यही निरंतर स्नान है। 1, एल्गिन रोड पर इस तरह का मनमानापन सम्भव था। हो सकता है रामगढ़ में भी महादेवी इसको सम्भव बना लेती हों। लेकिन महादेवी अपनी छोटी बहन के परिवार के प्रति बहुत ममतालु और स1दय थीं। शोरगुल और खिलंदड़ेपन में उनको मजा आता था। गप्प और हंसने हंसाने की अद्भुत कला उनके पास थी। बाद के दिनों में अक्सर एक ही बात के कई कई संस्करण उनसे सुनने को मिलते और हर बार उसमें वे कुछ नया रस पैदा कर देतीं। अगर उन्हें याद दिलाया जाता तो वे चश्मे के उ+पर से आपको थोड़ी कठोरता से झांकती। अक्सर याद दिलाने वाले को वे कहतीं, ÷तुम्हें तो कुछ याद ही नहीं रहता।' रामगढ़ के आसपास की बस्तियों में अक्सर महादेवी घूमनेघामने जाती थीं। झूंसी और अरैल टाइप साक्षरता अभियान भी क्कशायदत्र् चलाने की उन्होंने कोशिश की, लेकिन अपनी ÷स्मृति की रेखाओं' या ÷चलचित्राों' के लिए केवल एक ही पात्रा उठाया ÷लछमा'। यह अद्भुत संस्मरण है। मात्रा इसी में रामगढ़ का जिव् आता है। एक और चलचित्रा ÷बिट्टो' में उन दिनों का जिव् आता है जब महादेवी ÷ताकुला' में बीमारी के दौरान आराम कर रही थीं। ÷लछमा' में महादेवी रामगढ़ वाले घर में अपने पढ़ने लिखने का जिव् जरूर करती हैं। लेकिन वहां, उस घर में महादेवी अपना लिखा पढ़ा कुछ भी छोड़ती नहीं थीं। अपनी अनुपस्थिति में वे रामगढ़ वाले अपने प्यारे और पहले निजी आवास को निरापद नहीं मानती रहीं। वास्तविकता तो यह है कि शुरू में 1, एल्गिन रोड वाले बंगले और बाद में 17 सी, अशोकनगर वाले अपने दूसरे निजी मकान के अलावा वे अपने लिखत पढ़त को और कहीं भी सुरक्षित नहीं मानती थीं। यहां तक कि इस तरह का विश्वास उन्हें ÷साहित्यकार संसद' वाले बंगले पर भी नहीं था और रहने के लिए शायद ही कभी वे वहां गयी हों। वहां तो गंगा प्रसाद पाण्डेय का डेरा रहता था।
÷नाली' और ÷मुट्ठी' कुमायूं गढ़वाल क्कअब उनराखंडत्र् के इलाके में जमीन की पैमाइश का तरीका था। अब वह चलता है या नहीं, इसके बारे में मुझे जानकारी नहीं है। महादेवी ने कमलापति जोशी से 4 नाली 6 मुट्ठी जमीन दवामी पट्टे पर ली थी। 1 नाली 2160 वर्ग फीट जमीन होती है और 1 मुट्ठी 135 वर्ग फीट क्कश्री शेखर जोशीत्र्। इस प्रकार हिसाब जोड़ कर देखें तो महादेवी ने 9450 वर्ग फीट जमीन जोशी जी से दवामी पट्टे पर ली थी। दरअसल जमीन नापने या अधिकृत करने का यह सदियों पुराना आदिम तरीका है। एक मुट्ठी बीज लो और जितनी जमीन में उसे छींट दोगे वह 1 मुट्ठी जमीन का टुकड़ा कहलाता था। कुमायूं गढ़वाल में पंसेरी क्कपांच सेरत्र् वास्तव में ढाई सेर की होती थी। मैदानों में इसे छोटी पंसेरी कहते हैं। इस ढाई सेर की पंसेरी का एक चौथाई अनाज क्कया बीजत्र्द्र लगभग आधा सेर और आधा पावद्र के लिये तांबे का लुटकीनुमा बर्तन होता था। इसे टमटा लोग क्कताम्रकारत्र् बनाते थे। अल्मोड़ा में अभी भी तांबे के बर्तन क्कघड़े आदित्र् बनाने का अच्छा खासा व्यवसाय है। आधा सेर और आधा पाव अनाज के लिये जो तांबे की लुटकी बनती थी उसे ÷मांणा' कहते थे। इसी बर्तन में बीज रख कर किसान मुट्ठी भर भर छींटते जाते थे। हल्का और छोटा होने के कारण बीज छींटने वाले को इसे एक हाथ में पकडे+ रहने में सुविधा होती थी। ÷मांणा' शब्द सम्भवतः व्युत्पनि की दृष्टि से ÷भांणा' का ही बिगड़ा हुआ रूप है, जिसका अर्थ ÷छोटा बर्तन' होता है। ÷त्रिासना छांनि परी धर उ+परि दुरमति भांडा फूटा।' कबीर। उनराखंड के पहाड़ों में क्कसम्भवतःत्र् कुम्हार नहीं होते थे क्योंकि बर्तन बनाने के लिये चिकनी मिट्टी नहीं होगी और न ही आवां लगाने के लिए पर्याप्त साधन और सुविधा। इससे जंगलों में आग लगने का भी डर रहता होगा। इन्हीं स्थितियों में टमटा लोगों द्वारा तांबे के बर्तन के व्यवसाय की शुरुआत हुई होगी। बाद में यह बर्तन मांणा जमीन की पैमाइश का एक नाम बन गया। उनर प्रदेश के मैदानों में भी 10 मांडा क्कमांणात्र् का एक बीघा माना जाता है। एक बर्तन से जमीन की नापजोख तक शब्द की यह यात्राा अद्भुत है। बहरहाल... उनराखंड में यह जो ढाई सेर की पंसेरी चलती थी उसकी माप के लिये जो बर्तन बनता था वह लकड़ी का होता था। वनवासी क्कवणमेसत्र् लोग किसी वृक्ष की जड़ से खूब छील गढ़ कर चिकनी और सुंदर पंसेरी का बर्तन बनाते थे। फिर वे जंगल से बाहर आकर पहाड़ी पगडंडी पर उस बर्तन को रख देते और चुपचाप जंगल में छिप कर देखते रहते थे कि उनका बर्तन किसी राहगीर ने उठा लिया कि नहीं। राहगीर देखते ही समझ जाता था कि यह सुंदर बर्तन किसी वणमेस क्कवनमानुसत्र् ने रखा है। राहगीर को जरूरत हुई तो वह पंसेरी की माप वाला यह काष्ठ भांड उठा लेता था और उस जगह पर अपनी इच्छानुसार खाने पीने, पहनने ओढ़ने की चीजें रख देता। राहगीर के चले जाने पर वणमेस चुपचाप अपनी छिपी हुई जगह से बाहर आता और उसकी कारीगरी की एवज में जो कुछ भी रखा रहता उसको लेकर वन के भीतर गुम हो जाता। वणमेस और सभ्य समाज के बीच यह एक प्रकार से वस्तु विनिमय का प्राचीनतम ढंग जीवित था। जब फसलें तैयार होतीं और उसके खरीदार गांवों में आते तो इसी बर्तन से अनाज नाप नाप कर एक ओर कूरी लगायी जाती। शायद तराजू का चलन नहीं था और दूरदराज के उ+परी इलाकों में माप के लिए इसी सुंदर आदिम कलाकृति क्ककाष्ठ भांडत्र् का उपयोग होता था। जब बनिया पहली कूरी लगाता तो उसके मुंह से निकलताद्र ÷बरकत'। इसके बाद ÷दो' ÷तीन' ÷चार' इत्यादि। हमारे यहां मैदानों में बनिये जब खलिहानों में फसल तौलने आते तो पहली पंसारी की कूरी लगाते ही उनके मुंह से निकलताद्र ÷राम'। ÷राम' माने ÷एक'। बरकत क्कबढ़ोनरी, उन्नतित्र् माने भी ÷एक'। लेकिन दोनों में कितना फर्क है! एक मिलीजुली कौमियत का प्रतीक, दूसरा धर्म का। आखिर उनर भारत के मैदानी इलाके में ही तो ÷सनातन' अयोध्या है!
इस तरह की बातें भी सुनने को मिलती रही हैं कि ÷मीरा कुटीर' के पास ही श्री सुमित्राानंदन पंत ने भी अपना एक कॉटेज बनवाया था जो अब खंडहर अवस्था में पड़ा है। यह सब कुछ मात्रा एक कपोल कल्पना है। हो सकता है पंत जी ने स्नेह और भावुकता में आकर महादेवी से कभी इस तरह का जिव् किया हो कि वे भी रामगढ़ में एक कुटी बनवाना चाहते हैं। इलाहाबाद म्यूजियम में रामगढ़, नैनीताल से दिनांक 26.6.61 को महादेवी ने पंत जी को अल्मोड़ा के पते पर एक अंतर्देशीय पत्रा अवश्य लिखा है, जिसमें ÷मीरा कुटीर' के आसपास एक और कुटीर बनवाने लायक जमीन का जिव् किया गया है। यह पत्रा इतनी जर्जर और धूमिल और अपठनीय अवस्था में है कि बहुत कोशिश करने पर भी उसे पूरी तरह पढ़ना असम्भव है। इस सम्बंध में जब मैंने लक्ष्मण सिंह बिष्ट ÷बटरोही' से बात की तो उन्होंने बताया कि ÷ऐसा कुछ भी नहीं है। दरअसल महादेवी ने गंगा प्रसाद पाण्डेय के लिये ÷मीरा कुटीर' से बाहर दो कमरे बनवा दिये थे।' ÷कुनबे' में पाण्डेय जी भी शामिल होते थे लेकिन ÷कुनबे' के साथ उनका एक ही घर में रहना न महादेवी को पसंद था और न ÷कुनबे' को ही। इन्हीं स्थितियों में महादेवी ने ÷मीरा कुटीर' के बाहर उन दो कमरों का निर्माण करवा दिया था, जिससे वक्त जरूरत पर घरेलू कामकाज के लिए पाण्डेय जी पास भी रह सकें और अलग भी। सृजनपीठ के वर्तमान अध्यक्ष ने उस खंडहर से थोड़ा हट कर ÷शैलेश मटियानी कक्ष' का निर्माण करा दिया है।
अपने पहले निजी मकान ÷मीरा कुटीर' के सम्पूर्ण स्वत्वाधिकार के लिये महादेवी कितनी इच्छुक रही होंगी, इसका पता इसी तथ्य से चलता है कि उन्होंने दिनांक 03.03.52 को असिस्टेण्ट कलक्टर, दर्जा दोयम, नैनीताल की अदालत में रामगढ़ की उस जमीन और मकान के दाखिल खारिज के लिये एक मुकद्दमा दायर किया। उसमें मुद्दई श्रीमती महादेवी, बेटी, गोविन्द प्रसाद, मौजा उमागढ़ पट्टी, रामगढ़, जिला नैनीताल हैं और जाहिर है कि मुद्दालेः कमलापति, चंद्रदन वगैरह हैं। यानी कानून के हिसाब से महादेवी ने मौजा उमागढ़ पट्टी, रामगढ़, जिला नैनीताल का अपने को बाशिन्दा घोषित किया है। यह सच है कि वे 1, एल्गिन रोड वाले विद्यापीठ के अपने आवासी बंगले में रहती थीं, लेकिन वह विद्यापीठ की परिसम्पनि थी। तब तक इलाहाबाद में महादेवी का अपना कोई घर नहीं था। ÷साहित्यकार संसद' क्क1944-45त्र् का बाकायदा एक न्यास था और महादेवी मात्रा उस न्यास की सचिव थीं। उसके घोषित उद्देश्य भी अलग थे और महादेवी न तो वहां बसने का इरादा रखती थीं, न कभी नियमित रूप से जाकर रहीं। ÷साहित्यकार संसद' के खसरे में आज भी ÷द्वारा महोदवी' लिखा हुआ है और वह महादेवी की निजी सम्पनि कभी नहीं रहा। वह घर नजूल की जमीन पर बना हुआ है। तो हम मान सकते हैं कि महादेवी को रामगढ़ के अपने निजी घर से कितना लगाव और कितना प्यार रहा होगा। महादेवी ने रामगढ़, जिला नैनीताल के अलावा उस वक्त तक अपने को कहीं का भी बाशिन्दा घोषित नहीं किया था। इन्हीं स्थितियों में दवामी पट्टे क्क10.06.37त्र् से मुक्ति पाने और सम्पूर्ण अधिकार के लिये उन्होंने उपर्युक्त मुकद्दमा दायर किया। महादेवी मुकद्दमा हार गयीं और असिस्टेण्ट कलक्टर, दर्जा दोयम ने फैसला इन शब्दों में दियाद्र ÷÷रिपोर्ट बंदोबस्ती पेशकार साहब, तारीख 3.3.52 पर, बावत यह दा.खा. क्कदाखिल खारिजत्र् नहीं हो सकता। पटवारी मिसल दाखिल दतर हो। नोट किया। 7.3.52 ैक. ठण्क्ण् डनदहंसपण् छण् छंपदपजंसण्'' इस फैसले से महादेवी को बहुत आघात लगा। लेकिन वे रामगढ़ हर साल गर्मियां बिताने चार महीने के लिए जाती रहीं। उस इलाके की वे बहुत कृतज्ञ थीं। अपनी सारी शारीरिक, मानसिक यातनाओं से बहुत हद तक उन्हें मुक्ति वहीं मिली। वहीं वे स्वस्थ हुईं और तपेदिक जैसी जानलेवा बीमारी के भय से जान छूटी। ÷गांधीधाम' और ताकुला के इलाके उनके मन को शांति देते थे। आजीवन खद्दर पहनने और गांधी जी के सामाजिक कार्यव्मों को चलाने का व्रत उन्होंने वहीं लिया। ÷आनंद भवन' के बाद ताकुला का ÷गांधीधाम' और उसके संचालक गोविन्द शाह उनके लिए बहुत बड़ी पे्ररणा थे। ऐसे में अपने घर का मुकद्दमा हारना महादेवी के लिए बेघर होना था। महादेवी ने इन बातों के बारे में एक तरह का आजीवन मौन साध लिया। उसके बाद ही महादेवी ने इलाहाबाद के उनरी पच्छिमी छोर के एक निर्जन इलाके मौजा नेवादा में अपना दूसरा निजी घर बनवाने के लिये एक छोटे से पुराने मकान सहित जमीन खरीदी। इस बार महादेवी चौकन्नी थीं। उन्होंने ध्यान रखा कि खसरे में दाखिल खारिज ठीक हो, रजिस्टᆭी पक्की हो।
फिलहाल महादेवी के उस ÷मीरा कुटीर' और उसके 9450 वर्ग फीट परिसर के भीतर बाहर जो मूक अशांति फैली हुई है वह बड़ी विचित्रा है। इसका इतिहास महादेवी की मृत्यु के लगभग छः सात वर्षों बाद शुरू होता है। महादेवी ने ÷मीरा कुटीर' की देखरेख और रखवाली के लिए वहां शेर सिंह नामक एक आदमी को चौकीदार नियुक्त कर रखा था। चार महीने गर्मियां बिता कर जब महादेवी इलाहाबाद लौटतीं तो ÷मीरा कुटीर' की देखरेख का जिम्मा शेर सिंह पर ही रहता था। महादेवी के देहावसान के बाद भी शेर सिंह और उसका परिवार ÷मीरा कुटीर' में ही रह रहा था। जब कभी इलाहाबाद से रामजी पाण्डेय अपने परिवार के साथ गर्मियां बिताने के लिए रामगढ़ पहुंचते, क्करामजी पाण्डेय, पुत्रा गंगा प्रसाद पाण्डेयद्र सचिव ÷साहित्य सहकार न्यास'त्र्शेर सिंह का परिवार ÷मीरा कुटीर' के एक कमरे में मिल जाता। इस ÷शेर सिंह समस्या' के कारण वर्तमान अशांति का दौर शुरू नहीं हुआ। शेर सिंह और उसका परिवार तो एक बहाना मात्रा था। शेर सिंह को महादेवी की मृत्यु के बाद ÷सहकार न्यास' के कर्नाधर्ता रामजी पाण्डेय से उसकी तनख्वाह मिलती थी या नहीं, इसका भी कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। शेर सिंह के एक लड़काद्र हरीश और एक बेटी नंदी थी। महादेवी दोनों बच्चों को इलाहाबाद लायीं भी। नंदी महादेवी की भतीजी प्रीति अदावल के यहां काम पर लगी क्कऔर शायद पढ़ती भी होगीत्र् और हरीश को महादेवी जी ने अपने पास रख कर पढ़ाने लिखाने की कोशिश की। लड़के का शायद मन नहीं लगा या वह पढ़ने में सचमुच कमजोर हो, उसे पहाड़ों की याद आ रही हो, वह यहां अपने को अजनबी महसूस कर रहा हो, कुछ भी हो सकता है। तब महादेवी ने उसे यह कह कर रामगढ़ लौटा दिया कि यह पढ़ लिख नहीं सकता। वही हरीश अब पढ़ लिख कर, फिलहाल हल्द्वानी में किसी सरकारी नौकरी में है। ऐसी स्थिति में यह कैसे कहा जा सकता है कि शेर सिंह या उसके परिवार ने ÷मीरा कुटीर' को हड़पने की कोशिश की। महादेवी ने अपने हस्तलिखित और रजिस्टर्ड ÷साहित्य सहकार न्यास' के दस्तावेज में कहीं भी रामगढ़ वाले ÷मीरा कुटीर'का उल्लेख नहीं किया है। लेकिन फिर भी महादेवी के देहावसान के बाद रामजी पाण्डेय अपने मित्रा और हिन्दी विभाग, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अपने गुरु भाई क्कया शायद सहपाठीत्र् श्री लक्ष्मण सिंह बिष्ट ÷बटरोही' को और अपने दूसरे सहपाठी वीरेन डंगवाल क्ककवित्र् को साथ लेकर रामगढ़ गये ही क्कऔर वैसे भी महादेवी की मृत्यु के बाद आराम फरमाने जाते ही रहेत्र् और बटरोही की मदद से शेर सिंह और उसके परिवार को वहां से डरा धमका कर बाहर किया। रामजी पाण्डेय ने शायद इसे अपना पुनीत कर्तव्य समझ कर ऐसा किया हो। उन्हीं दिनों क्कसम्भवतः 1994त्र् मिर्जापुर निवासी, दबंग मानवेन्द्र बहादुर सिंह नैनीताल के कलक्टर थे। बटरोही ने उनसे सम्पर्क साधा। सम्पर्क साधने में भी एक वरिष्ठ लेखक जी की भूमिका थी जो हर बुरा काम करके सदा के लिए गुम हो जाते हैं। कलक्टर साहब ने ÷महादेवी साहित्य संग्रहालय' नाम से एक संस्था बनायी क्कबटरोही का ऐसा कहना हैत्र् या बनवायी जिसके अध्यक्ष खुद कलक्टर और दो लोगों की समिति में एक बटरोही और दूसरा कौन, इसका पता नहीं। जो सबसे बड़ी प्रारम्भिक दुर्घटना हुई, वह यह कि 30.01.95 को बटरोही ने तहसीलदार के सामने न्ध्े 34.प्ण्ध्त्ण् ।बज के अंतर्गत ÷मीरा कुटीर' और पूरे दवामी पट्टे के परिसर से महादेवी वर्मा का नाम खारिज करने के लिए एक प्रार्थनापत्रा दिया। यह बटरोही के निजी नाम से दाखिल किया गया। यह ÷महादेवी वर्मा साहित्य संग्रहालय' के अध्यक्ष और दोनों सदस्यों की राय बात से हुआ या यह मात्रा बटरोही की सूझ थी, इसके बारे में क्या कह सकते हैं! जिस महान स्त्राी और कवयित्राी के नाम पर आप संस्था बना रहे हैं, पट्टे से उसी का नाम खारिज करवाने के लिये प्रार्थनापत्रा भी दे रहे हैं। महादेवी का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है?
30.01.95 के इस प्रार्थनापत्रा का निपटारा 03.07.95 को हुआ। तहसीलदार ने बटरोही का प्रार्थनापत्रा खारिज कर दिया। लेकिन तहसीलदार ने अपने उसी निर्णय में एक दूसरा चमत्कार भी दिखाया। उसने फैसला दिया कि दवामी पट्टे वाली जमीन क्कयानी परिसर और भवनत्र् को उनर प्रदेश राज्य के पंचायती राज के अंतर्गत ग्रामसभा में हस्तांतरित कर दिया जाये और ÷रेवेन्यू रेकार्ड्स' से श्रीमती महादेवी वर्मा का नाम हटा दिया जाय। बटरोही का प्रार्थनापत्रा खारिज करने के बाद भी परोक्षतः फैसला बटरोही की ÷नीयत' के पक्ष में ही हुआ। पंचायती व्यवस्था लागू होने के बाद कोई भी ग्रामसभा ग्रामवासियों द्वारा चुनी हुई, प्रजातंत्रा की सबसे छोटी इकाई है और इस तरह एक सरकारी इकाई है। इस फैसले के बाद ÷मीरा कुटीर' और उसका परिसर अपने आप राज्य सरकार की परिसम्पनि हो गये और जोशी परिवार तथा स्व. महादेवी वर्मा या उनके वर्तमान वारिसान स्वभावतः बेदखल कर दिये गये। उसके बाद जमीन जायदाद सम्बंधी तमाम दफाओं के अंतर्गत जोशी परिवार ने अपनी जायदाद बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके प्रार्थनापत्रा अधिकांशतः खारिज कर दिये गये। ग्रामसभा में हस्तांतरित होने के बाद कानूनी तौर पर 10.06.37 के दवामी पट्टे वाली जमीन अब जोशी परिवार की न होकर सरकार की हो गयी। इस सुविधा का लाभ उठाते हुए कुमायूं विश्वविद्यालय, नैनीताल ने झटपट कार्रवाई की। विश्वविद्यालय ने शासन को हस्तांतरण सम्बंधी आशय का पत्रा लिखा क्कपत्राांक वी.सी./के.यू./2004/270, दिनांक 27.02.2004त्र् जिसके उनर में राजीव चंद, अवर सचिव, उनरांचल शासन ने कुल सचिव, कुमायूं विश्वविद्यालय, नैनीताल, को पत्रा के जवाब में कहा कि ÷मुझे यह कहने का निर्देश हुआ है कि ÷महादेवी साहित्य संग्रहालय, रामगढ़ को विश्वविद्यालय द्वारा शीघ्र अपने सम्पूर्ण नियंत्राण में लेने के सम्बंध में आवश्यक कार्यवाही की जाय...'। यानी तहसीलदार के द्वारा महादेवी की परिसम्पनियों को ग्रामसभा में हस्तांतरित करने के बाद फटाफट कार्रवाई हुई। जाहिर है कि ÷महादेवी साहित्य संग्रहालय' जैसी संस्था किसने बनायी। महादेवी के नाम का इस्तेमाल करते हुए भी महादेवी का नाम रेवेन्यू रेकार्ड्‌स से हटाने फटाने की दरख्वास्त किसने दी, महादेवी वर्मा के नाम पर उनका इस तरह का अपमान करने के बाद भी किसके या विश्वविद्यालय के किस विभाग की देखरेख के अंतर्गत यह ÷पीठ' होगी। एक अच्छा काम घृणित और शातिर ढंग से किया गया। ÷साध्य' उचित लेकिन ÷साधन' अनुचित। और इसमें जमीन जायदाद के अधिग्रहण के सारे दीवानी, फौजदारी कानूनों का बाकायदा बखूबी, सोच समझ कर उपयोग किया गया। इसमें जोशी परिवार के लोगों को किसी नुक्ते पर भी विश्वास में लेने की जरूरत नहीं समझी गयी जिनके पूर्वज श्री उमापति जोशी ने ÷उमागढ़' बसाया था। गरीब लोग हैं, महादेवी मर चुकी हैंद्र ऐसी स्थिति में कानून और धौंस का इस्तेमाल करो और उनका सब कुछ छीनछान लो। बहरहाल, अवर सचिव राजीव चंद के उपर्युक्त पत्रा के बाद कुमायूं विश्वविद्यालय, नैनीताल ने तारीख 19.7.2005 को अधिग्रहण बाकायदा सम्पन्न कर लिया। उनरांचल शासन के शासनादेश सं. 158ग्ग्प्ध्क्क1त्र्2004 दिनांक 13.7.2004 के हस्तांतरण आदेश के नीचे सुपरवाइजर कानूनगो, क्षेत्रा रामगढ़ और तहसीलदार चंद्र सिंह भलौतिया के दस्तखत हैं। उसके नीचे लिखा हैद्र ÷संलग्न विवरण के अनुसार आज दिनांक 19.7.2005 को ÷महादेवी साहित्य संग्रहालय, रामगढ़' की परिसम्पनियां कुमायूं विश्वविद्यालय द्वारा अपने नियंत्राण में ली गयीं।' इसके नीचे ÷विन अधिकारी', ÷कुल सचिव' और ÷सहायक अभियंता' के हस्ताक्षर हैं।
इसके बाद ÷महादेवी वर्मा सृजनपीठ' के प्रशासनिक एवं रचनात्मक कार्यों के संचालन तथा परामर्श हेतु आगामी तीन वषोर्ं के लिए निम्नलिखित दस सदस्यों की कार्यकारिणी का गठन किया गया :

1. कुलपति अध्यक्ष
2. अधिष्ठाता कला संकाय सदस्य
3. अध्यक्ष, हिन्दी विभाग सदस्य
4. विन अधिकारी विन नियंत्राक
5. कुलसचिव सदस्य
6. श्री अशोक वाजपेयी सदस्य
क्कसाहित्यकारत्र्
7. श्री केदार नाथ सिंह सदस्य
क्कसाहित्यकारत्र्
8. श्री दयानंद अनंत सदस्य
क्कसाहित्यकारत्र्
9. सदस्य, कार्यपरिषद सदस्य
कुमायूं विश्वविद्यालय
10. निदेशक, महादेवी वर्मा सृजनपीठ सदस्य/सचिव

किसी के भी मन में यह सवाल उठ सकता है कि इसमें बुराई क्या है? बुराई यह है और यह अनैतिक है कि इससे जोशी परिवार को बाहर रखा गया। महादेवी के सन्‌ 1952 में मुकद्दमा हारने के बाद और महादेवी की मृत्यु के बाद भी जोशी परिवार ने तो ÷मीरा कुटीर' या उस परिसर में कोई छेड़छाड़ नहीं की। महादेवी जी का रखा हुआ शेर सिंह और उसका परिवार ही उसमें रहता था और इलाहाबाद से रामजी पाण्डेय अपना परिवार लेकर रामगढ़ गर्मियां बिताने जाते ही थे। जोशी परिवार ने उनके आने जाने या रहने सहने और मौज मजा करने में कभी कोई बाधा भी नहीं डाली। इस सम्बंध में रामजी पाण्डेय की पत्नी श्रीमती रानी पाण्डेय से मैंने बात की। उन्होंने बताया कि ÷पाण्डेय जी, यश क्कमालवीयत्र्, कवि वीरेन डंगवाल और रानी पांडेय क्कशायदत्र् रामगढ़ गये। वहां बटरोही ने रोना रोया कि ÷साहित्यिक सम्पदा के अधिकारी हम हैं।' तब उन्होंने डी.एम. को शामिल किया। लक्ष्मीदन जोशी की शिकायत यह थी कि ÷बटरोही कब्जा करना चाहते हैं।' यह बात लक्ष्मीदन जोशी के परिवार द्वारा हाईकोर्ट में दाखिल उस दावे में भी है, जो लम्बित है और जिस पर स्थगन आदेश है।
मैं सोचता हूं कि एक लेखक के नाते मुझे उपर्युक्त तथ्यों पर टिप्पणी करने का अधिकार होना चाहिए या नहीं? सभी क्कऔर मैं भीत्र् इस बात की तारीफ करते हैं कि चलो, कम से कम महादेवी का एक घर तो बचा हुआ है और उसके माध्यम से ÷महादेवी सृजनपीठ' चल रहा है। कम से कम उसका तो रख रखाव और उसकी तो सुरक्षा बनी हुई है। मेरा विचार इस सम्बधं में यह है कि सबसे पहले जोशी परिवार को विश्वास में लिया जाना चाहिए था। उनसे कहा जाना चाहिए था कि यह परिसर एक पवित्रा धरोहर है और इसको बचाने के लिए आप लोग इसे सरकार को सौपने के लिए राजी होने की कृपा करें। दूसरी ओर उनराखंड सरकार को इस जमीन और परिसर के अधिग्रहण के लिए जोशी परिवार को उचित मुआवजा देना चाहिए था। पूरे देश में सरकारें जब किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करती हैं तो उसके लिए मुआवजा देती हैं या नहीं? यह सब नहीं हुआ, बल्कि कानूनी तिकड़मों का सोच समझ कर इस्तेमाल किया गया। यह सही है कि पिछली सरकार के बड़े अनुदान और कुमायूं विश्वविद्यालय की देख रेख में अधिग्रहीत कर लिये जाने के बाद ÷मीरा कुटीर' फिलहाल सुरक्षित दीख रहा है। लेकिन हाईकोर्ट का स्थगन आदेश और लम्बित वाद के बाद अभी भी आंतरिक अशांति बनी हुई है। सृजनपीठों का उपयोग उस असीमित अबाधित स्वतंत्राता से होना चाहिए जैसा मध्य प्रदेश की सृजनपीठों पर हुआ करता है, जहां रह कर लेखक को सोचने और काम करने का मौका मिले। जैसा कि विनोद कुमार शुक्ल ने ÷मुक्तिबोध सृजनपीठ', सागर या ÷निराला सृजनपीठ', भोपाल में रह कर अपने तीनों उपन्यास लिखे। या ÷निराला सृजनपीठ' पर रहने के दौरान मैंने केवल दस महीने में दो लघु उपन्यास पूरे किये और ÷आखिरी कलाम' के प्रारम्भिक सौ डेढ़ सौ पृष्ठों का पहला डᆭाट लिखा। सेमिनार और फिजूल की बहसें और उन पर पैसा बहाना कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता, लेकिन क्या करें, लेखक, बुद्धिजीवी और सरकार इसे किसी भी संस्था की सव्यिता का लक्षण मानते हैं। बताओ कि पैसा किस मद में और कहां खर्च किया? अगर नहीं खर्च कर पाये तो अगले विनीय वर्ष में अनुदान में कटौती अनिवार्य। सव्यिता का मतलब जमावड़ों का हड़बोंग। बड़ी बड़ी बातें। वक्तव्य, व्याख्यान। उद्घाटन समापन। और अंततः सृजनात्मक कुछ भी नहीं। हवाई बातें हवा में फुर्र। कबीर ने क्या कहा है :

बोलनां का कहिए रे भाई।
बोलत बोलत तन नसाई॥

साहित्यकार संसद', रसूलाबाद, इलाहाबाद

सन्‌ 1945 में ÷साहित्यकार संसद' की कल्पना साकार हुई। महादेवी इधर बहुत दिनों से सोच विचार कर रही थीं। इसको ठोस रूप देने के लिए रसूलाबाद क्कशहर के बिल्कुल उनरी छोरत्र् में गंगा के किनारे बने एक भवन को खरीदने का निश्चय हुआ। निश्चय ही यह इमारत पहले से बनी हुई थी और यह जमीन किन्हीं मुकर्जी महोदय को ÷कोर्ट ऑफ वार्ड्स' क्कनिष्वंत सम्पनित्र् के रूप में मिली थी। इसका पहला मालिक कौन था, इसके बारे में खसरे से अब कुछ पता नहीं चलता। यद्यपि कि इस भवन का बयाना सम्भवतः सन्‌ 1942 में ही देकर महादेवी ने सन्‌ 1945 में ही श्री मैथिलीशरण गुप्त से इसका उद्घाटन करा लिया था। इस उद्घाटन अवसर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी उपस्थित थे। लेकिन इसका बैनामा 11.03.1947 तक तो नहीं ही हुआ था। मैथिलीशरण गुप्त को इसी तारीख क्क11.03.47त्र् को लिखे एक पत्रा में महादेवी जमीन क्कऔर भवनत्र् के मालिक मुकर्जी महोदय का जिव् करती हैं। इसी पत्रा में ÷कोर्ट ऑफ वार्ड्स' का जिव् भी है। 11.03.47, जबकि अभी ÷बंटवारा' नहीं हुआ था, को इलाहाबाद का साम्प्रदायिक माहौल कैसा था, इसकी भी भनक इस पत्रा में लिखे महादेवी के एक वाक्य से मिलती है। महादेवी लिखती हैं, ÷सब ठीक हो जाने पर ही बैनामा होना उचित है।'... स्पेशल मैनेजर क्ककस्टोडियन अभिरक्षकत्र् दौरे पर थे। पटवारी मुसलमान होने के कारण मुस्लिम बस्ती में रहता था। वहां न कोई उसे बुलाने जाने की हिम्मत करता था और न वह पत्राों के उनर में स्वयं आने का साहस करता था। बहरहाल, बैनामा कब हुआ, इसका मुझे पता नहीं लग सका। अभी के खसरे में इसकी मालकिन सरकार की ओर से ÷महादेवी वर्मा' हैं। क्योंकि जमीन सरकार की है और ÷ल्ी होल्ड' नहीं है, अतः खसरे में ÷महादेवी वर्मा' न लिख कर ÷द्वारा महादेवी वर्मा' दर्ज है। मैथिलीशरण गुप्त और सियाराम शरण गुप्त के तथा महादेवी के बीच हुए इन चार वर्षों क्क1946-50त्र् के पत्रा व्यवहार में महादेवी के सारे पत्रा ÷साहित्यकार संसद' के लेटर पैड पर लिखे गये हैं और पता 1, एल्गिन रोड, इलाहाबाद वाला दिया गया है। ये सारे पत्रा मुझे श्री प्रमोद कुमार गुप्त ने कृपापूर्वक उपलब्ध कराये हैं।
बहरहाल, महादेवी ने ÷साहित्यकार संसद' के लिए एक न्यास क्कटᆭस्टत्र् भी बनाया। इसके सदस्यद्र सर्वश्री माखनलाल चतुर्वेदी, सियाराम शरण गुप्त, इलाचंद्र जोशी, गुलाब राय, वृंदावन लाल वर्मा, भदंत आनंद कौशल्यायन और हजारी प्रसाद द्विवेदी क्क÷संगम', 1952, पृष्ठ 40त्र् थे। दद्दा क्कश्री मैथिलीशरण गुप्तत्र् इसके अध्यक्ष थे और श्रीमती महादेवी वर्मा इसकी सचिव। ध्यान दीजिये कि इसमें कोई भी राजनीतिक व्यक्ति नहीं है। महादेवी ने इसके बहुत उ+ंचे आदर्श और उद्देश्य स्थापित किये थे। जिनमें मुख्य बातें थीं : एकद्र बेघरे लेखकों को अस्थायी तौर पर रहने, खाने पीने की और लिखने पढ़ने की सुविधा मुहैया करवाना। दोद्र समय समय पर संगोष्ठियां आयोजित करना और तीनद्र संसद के नाम पर एक प्रकाशन गृह खोलना। इन तीनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए महादेवी ने जीतोड़ प्रयत्न किये, जैसी कि उनकी आदत थी। गुप्त जी को लिखे 11.03.1947 के उसी पत्रा में महादेवी लिखती हैं, ÷÷विश्राम मेरे लिये दंड जैसा है। इसी से उससे दूर रहना मेरे लिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो जाता है।'' इस बात को वे रचनाकार ही समझ सकते हैं, जिनके लिए लिखना जिन्दा रहना है। महादेवी का लेखन चूंकि वास्तव में समाप्त क्कसन्‌ 1942त्र् हो चुका था, अतः ÷जीवित रहने' के लिए वे तरह तरह के रचनात्मक कार्यों में लगातार अपने को व्यस्त रखती थीं। हिन्दी में उस वक्त सबसे बड़े निर्गृही ÷निराला' थे। महादेवी ने उन्हें ÷संसद' में रहने के लिए जिद करके आमंत्रिात किया। दूसरे लेखक बीमार उपेन्द्रनाथ ÷अश्क' थे जो पत्नी बच्चे के साथ इस सुविधा का लाभ उठाने के लिये आये। महादेवी ने गंगा प्रसाद पाण्डेय को वहां शाश्वत रूप से नियुक्त कर रखा था। वही ÷साहित्यकार संसद' की रोजमर्रा की गतिविधियों की देखरेख करते थे। कोई रसोइया और नौकर और माली भी जरूर होगा। सामने लहराती हुई गंगा, ÷संसद' में फूल पौधे, नये नये पेड़ों को रोपे गये पौधे, साफ सफाई। एक सन्नाटा। महादेवी समझती थीं कि ऐसा वातावरण निराला या किसी भी लेखक के लिखने के लिए अनुकूल पड़ेगा। लेकिन जो कवि, रचनाकार बनने के दिनों से ही बड़ा बाजार, कलकना की गलियों, लोअर अपर चितपुर रोड के ढाबों, फिर लखनマ में भूसामंडी और 57, नारियल वाली गली के गुलजार में रह चुका हो, वह एकांत में कैसे रचना कर सकता था। उसे अनेकांत चाहिए,बिस्तर के नीचे निःसंकोच सुर्ती थूकने की सुविधा चाहिए, उसे निःसीम मानसिक और मारक शारीरिक स्वतंत्राता चाहिएद्र उसे भीतर का एकांत और बाहर का अनेकांत चाहिए। फिर उसे लजीज पकाया हुआ गोश्त चाहिए। यह अंतिम बात वहां वर्जित थी। अपने आर्य समाजी संस्कारों के कारण महादेवी बचपन से ही मांसाहार की कट्टर विरोधी थीं और मद्यपान की भी। इसी को लेकर पिता से भी उनकी कभीकभार खटपट हुई और अपने पति स्वरूप नारायण वर्मा को छोड़ने का एक बहाना यह भी था कि जमींदार हैं, गोश्तखोर हैं। अब निराला, जो कि जेब में कच्चा गोश्त रख कर कहीं बनाने की फिराक में रहते थे, जो 15 अक्टूबर 1961 को दोपहर भर दारागंज के मकान वाले आंगन में गोश्त पकाते हुए धुएं से लाल आंखें किये बैठे रहे, और पकाने के बाद गोश्त की वह बोटी और शोरबा क्कमद्दवत्र् ही बुद्ध की तरह उनके निर्वाण का कारण बना, ऐसे कवि का ÷साहित्यकार संसद' के सन्नाटे और घासपात की उस रसोई में रहना कहां सम्भव था! तिस पर गंगा प्रसाद पाण्डेय अपनी किताब ÷महाप्राण निराला' के लेखन के सम्बंध में तरह तरह की बातें पूछने के लिए उनका नकदम किये रहते थे। महादेवी जब भी हालचाल लेने जातीं, निराला उनसे कभी कोई शिकायत नहीं करते। महादेवी के लिये उनके मन में बहुत सम्मान और संकोच था। लोग समझते हैं कि निराला एक उच्レाृंखल उद्दंड व्यक्ति थे, जबकि वास्तविकता ठीक इसके उल्टी थी। स्त्रिायों के सामने वे अंतर्मुख, चुप और लगभग स्त्रिायों से ज्यादा उनके सामने लजाने वाले इन्सान थे। किसी भी नवयुवती के सामने पड़ने पर एक बार आंखें उठा कर देखने के बाद दुबारा उनकी आंखें उठती तक नहीं थीं। वह कविता ऐसे ही नहीं लिखी गयी :

1
आंखें वे देखी हैं जबसे
और नहीं कुछ देखा तबसे।
2
नयन नहाये
जबसे उसकी छवि में रूप बहाये।
ऐसे में गंगा प्रसाद पाण्डेय की चौबीस घंटों की लपरझपर से निराला भीतर ही भीतर बहुत परेशान थे। अंततः उन्होंने महादेवी के सामने एक बहुत सुंदर बहाना निकाला। उन्होंने महादेवी को सूचना दी कि ÷अब वे संन्यास लेना चाहते हैं।' महादेवी इस पर हंसीं, उन्होंने इसे निराला की डांवांडोल मानसिकता का एक बउरहा सा कथन माना। लेकिन निराला ने ÷संसद' के जंजाल और गंगा प्रसाद पाण्डेय की दांतचियारू घासपाती अवभगत की खिचखिच से छुट्टी पाने के लिए एक दिन सचमुच गेरू के ढेले मंगाये, उन्हें कूट कर एक हांडी में भिगोया, अपनी लुंगी और कुर्ता और बंडी उसमें रंगी, सुखायी, और गेरुआ वस्त्रा धारण कर पैदल ही वहां से दारागंज की संकुल गलियों में कमला शंकर के दरवाजे पर दस्तक दी। निराला के घुटनों में उस वक्त भी गठिया का दर्द था। फिर भी वे भाग निकले, जैसे चौधरी साहब के यहां, उन्नाव से भागे थे। अंदर जाते ही वे तखत पर लेट गये और कमलाशंकर की पत्नी क्कबच्चीत्र् से कहा कि दर्जी बुला कर कुर्ते का नाप लिवाओ और चारखाने की लुंगियां खरीदो। तो इस तरह दारागंज पहुंच कर उनका संन्यास गंगा में प्रवाहित हुआ। दारागंज पहुंचते ही निराला का अवरुद्ध कंठ जैसे एकाएक फूट पड़ा। एक एक दिन में छः छः, सात सात कविताएं। हर कविता शीर्षक रहित, लेकिन हर कविता के नीचे तारीख। ÷गेरू के ढेले कूटने' की स्मृति गयी नहीं थी। 21 जनवरी, 1950 को निराला ने फिर वसंत पर एक कविता लिखी :

फूटे हैं आमों में बौर
भौंर वन वन टूटे हैं
होली मची ठौर ठौर
सभी बंधन टूटे हैं।

...माथे अबीर से लाल
गाल सेंदुर के देखे
आंखें हुई हैं गुलाल
गेरू के ढेले कूटे हैं।

जिस ÷साहित्यकार संसद' को लेकर महादेवी ने मैथिलीशरण गुप्त को यह लिखा था क्क1947त्र् कि ÷भाई सियाराम जी से कह दीजियेगा कि मैं एक इतना सुंदर आश्रम बना रही हूं कि जिसे देखने वे दौड़े चले आवेंगे', उसके प्रथम अतिथि का यह हश्र हुआ। दूसरे लेखक ÷अश्क' थे जो बीमारी की अवस्था में अपनी पत्नी बच्चे के साथ रहने आये। अश्क को प्लूरिसी क्कतपेदिक का एक रूपत्र् थी। महादेवी स्वयं 1929-30 के दिनों में इस बीमारी की आशंका और धीमे बुखार से एक बार अधमरी हो चुकी थीं। उन्हें तपेदिक कभी हुआ नहीं लेकिन उसका शक और डर उन्हें याद था। पता नहीं, अश्क को किस बहाने से हटाया गया। निराला ने खुद छोड़ दिया, ÷अश्क' को छोड़ना पड़ा। उसके बाद कोई तीसरा अस्थायी अतिथि उस एकांत में रचना करने और गंगा प्रसाद पाण्डेय का ÷आतिथ्य' ग्रहण करने नहीं आया। बाहर से आने वाले लोग कभी कभी एकाध दिन के लिए ठहर जाते हों तो ठहर जाते हों। लेकिन एक दो दिन की आवभगत से वे कृतकृत्य होकर ही जाते थे।
÷साहित्यकार संसद' को आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित और सम्पन्न बनाने के लिए महादेवी ने कई तरह के प्रयत्न किये। ÷संसद' की तरफ से कोई पुरस्कार भी दिया जाता था, या देने की योजना थी। इस पुरस्कार का नाम क्या था और इसकी पुरस्कार राशि कितनी थी, इसका पता पत्राावली से नहीं चलता। पीलीभीत के रहने वाले कोई व्यवसायी श्री जगदीश प्रसाद साहू ने इस पुरस्कार के निमिन दस हजार रुपये की एक रकम ÷संसद' को दी थी। यह रकम इलाहाबाद निवासी क्कमिंटो पार्क हाउस, यमुना बैंक रोड, इलाहाबादत्र् श्री सीताराम अग्रवाल जी की मार्फत भेजी गयी थी, जो अपने 11.06.49 के पत्रा में अपने को विनम्रतापूर्वक ÷एक छोटा सा दलाल' कहते हैं। श्री सीताराम अग्रवाल लिखते हैं, ÷उक्त व्यवसाय की परम्परा के अंतर्गत ही मेरा थोड़ा सा उनरदायित्व साहू साहब के प्रति है और मैंने कुछ सुझाव भी उपस्थित किये हैं, वे केवल इसलिए कि साहू साहब की सहज व्यावहारिकता व नियमानुकूल कार्य संचालन की साधारण मनोवृनि को संतोष रहे।' अग्रवाल साहब के सुझाव गुप्त जी क्कश्री मैथिलीशरण गुप्तद्र अध्यक्ष, साहित्यकार संसदत्र् को इस प्रकार हैं :
1. किस विषय पर पुरस्कार दिया जायेगा।
2. किन पुस्तकों पर विचार होना है।
3. किस तारीख तक और कहां निर्णायक वर्ग अपनी सम्मति भेज दे।
4. किस तारीख को निर्णय निर्णायक वर्ग को विदित हो जायेगा और कब उसका सार्वजनिक प्रकाशन हो जायेगा।
5. किस तारीख को कहां और किस प्रकार पुरस्कार दिया जायेगा।
6. किस तारीख को अगले पुरस्कार के लिए विषय अथवा विचारणीय पुस्तकों का निर्वाचन होगा।
इसके अलावा भी श्री सीताराम अग्रवाल ने पुरस्कार राशि प्रदान करने के लिये अत्यंत विनम्रतापूर्वक उसकी प्रव्यिा के सम्बंध में लिखा है, ÷दूसरी बात यह है कि पुरस्कार की रकम यदि ÷साहित्यकार संसद' चेक से देती है तो, वह चेक पहले साहू साहब के नाम वॅस बियरर बना दिया जाया करे। ताकि उसको पाकर उसके पीछे साहू साहब पुरस्कार पाने वाले को सेकेण्ड इंडोर्स बना कर अपने एक भेंटपत्रा के साथ भेज दें, जिससे वे पुरस्कार पाने वाले को बधाई भी दे सकें। इस प्रकार एक छोटी सी और सुंदर रस्म पूरी हो जायेगी।'
इस पत्रा की शुरुआत में ही पता चलता है कि इस वर्ष क्क1949त्र् का पुरस्कार श्री दिनकर को ÷कुरुक्षेत्रा' पर दिया गया है। महादेवी ने ÷पथ के साथी' वाले गुप्त जी के संस्मरण में जो दस हजार रुपये की थैली गुप्त जी द्वारा भेंट करने की बात लिखी है वह ÷थैली' दरअसल, यही है।
इसके अलावा भी अनेक अनुदानों का जिव् इस पत्राावली में है। रॉयल एक्सचेंज, कलकना से श्री लक्ष्मी निवास बिड़ला जी ने एक हजार रुपये का चेक भेजा। यह चेक संसद के अध्यक्ष गुप्त जी के नाम भेजा गया, लेकिन गुप्त जी का पता 1, एल्गिन रोड, इलाहाबाद दिया हुआ था। महादेवी ने इसे ÷संसद' के हिसाब में जमा कर लिया, फिर वहां से लौटने पर अपने हिसाब में। जब दोनों जगहों में चेक नहीं भुना तो महादेवी ने गुप्त जी को पत्रा लिखा ÷श्री लक्ष्मी निवास जी का चेक पहले ÷साहित्यकार संसद' के हिसाब में हिन्दुस्तान कामर्शियल बैंक में जमा किया, फिर अपने हिसाब में इम्पीरियल बैंक भेजा किन्तु वह दोनों स्थानों से लौट आया। आप अपने हिसाब में जमा करके दूसरा चेक भेजने का कष्ट करें। इसके अलावा उसी पत्रा में श्री सीताराम सक्सेरिया का भी जिव् है। महादेवी बीस हजार रुपये कर्ज लेने का उपव्म कर रही हैं। ÷हिन्दुस्तान कामर्शियल बैंक' की शर्तें कुछ ठीक हैं। एक जगह लिखती हैं ÷वहां कर्ज देने का प्रावधान नहीं है।' ऐसी ही स्थिति में अपने ÷सदा सहायक' सक्सेरिया जी को वे लिखती हैं। सक्सेरिया जी ने शायद कलकने से ÷ल्ी इंडिया इंश्योरेन्स' का नाम सुझाया होगा। महादेवी लिखती हैं, ÷कलकने से लेने में हमें 3 प्रतिशत ब्याज देना होगा और सुविधानुसार चुका सकेंगे।' इसी सम्बंध में महादेवी कलकने जाने की योजना बना रही हैं लेकिन फिर स्थगित कर देती हैं क्योंकि ÷साहित्यकार संसद को युक्त प्रांत के शिक्षा विभाग से 5000.00 रुपये की सहायता मिलने की सूचना आ गयी। उसे मंगाने का प्रबंध किये बिना जाना ठीक नहीं जान पड़ा।' इसके पहले के क्क20.12.46त्र् पत्रा में महादेवी लिखती हैं क्कउसी कलकना यात्राा के दौरानत्र्, ÷जनवरी में बापू के दर्शनार्थ जाना चाहती हूं। अब तक उनके व्यक्तित्व के सामीप्य से दूर रही हूं। क्योंकि कभी कभी ऐसे असाधारण व्यक्तित्व की निकटता हमारे अहंकार को स्फीत कर देती है।' लेकिन युक्त प्रांत के शिक्षा विभाग से मिलने वाली मदद को मंगाये बिना कलकने जाना या बापू का दर्शन भी एक व्यावहारिक निर्णय नहीं है। मैंने कहीं पीछे लिखा है कि अपने भीतर महादेवी बहुत व्यावहारिक महिला थीं। गालिब का एक मिस्‌रा याद आता है, ÷कौन है जो नहीं है हाजतमंद!' इसके अलावा भी बड़े लोगों की निकटता से अहंकार के स्फीत होने में एक सच्चाई तो है ही, भले महादेवी उस वक्त यह वाक्य सरे राह लिख गयी हों। क्योंकि गांधी जी की निकटता के इसी ÷स्फीत अहंकार' के कारण गुप्त बंधुओं क्कदद्दा और सियाराम शरण जीत्र् ने ÷संसद' की सदस्यता से सन्‌ 1950 में इस्तीफा दे दिया। कोई इसे बापू के प्रति श्रद्धा कह सकता है। दूसरे महादेवी ने जो यह लिखा है कि ÷अब तक उनके सामीप्य से दूर रही हूं', तो इससे संदेह होता है कि ÷सक्सेरिया पुरस्कार' क्क1935, इंदौरत्र् लेने के बाद या उसके पहले महादेवी कभी बापू से मिली भी थीं या नहीं? इसीलिए मैं कहता हूं कि महादेवी अपने जीवित रहते भी आधा मिथ+आधा इतिहास क्कमिथिहासत्र् हैं।
महादेवी ने उ+पर जो कहा है कि महान लोगों के सम्पर्क में रहने से अक्सर अहंकार स्फीत हो जाता है, इस बात में सच्चाई भी है। गुप्त बंधु निश्चय ही गांधी जी के निकट सम्पर्क में थे। महात्मा जी ने ÷साकेत' पढ़ कर मैथिलीशरण जी को एक पत्रा भी लिखा था। दुनिया में एक नाथूराम गोडसे और उसके ÷पंथ' के अलावा कौन है जो महात्मा गांधी पर श्रद्धा नहीं रखता। बुद्ध के बाद महात्मा गांधी ही संसार में एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी अहिंसा इस पृथ्वी को बचा सकती है। गुप्त बंधु भी गांधी जी के प्रति इस श्रद्धा भक्ति में सराबोर थे तो इसमें कोई बुराई या कुछ भी अजीब नहीं है, लेकिन निराला के उस विवरण, क्कजो ÷गांधी जी से बातचीत' क्कइंटरव्यू द्वारा प्राप्तत्र् शीर्षक से निराला रचनावली भाग 6, पृष्ठ 220 पर छपा हुआ हैत्र् से गुप्त बंधुओं का एक आधे अधूरे वाक्य पर ÷साहित्यकार संसद' से इस्तीफा दे देना उचित नहीं जान पड़ता हालांकि यह बातचीत सन्‌ 1939 की है। साक्षात्कारकर्ता कौन है, इसका जिव् कहीं नहीं मिलता। निश्चय ही श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय तो नहीं हैं। इस बातचीत के अंत में इस तथ्य का भी जिव् है कि ÷कवि सियारामशरण जी को अपने पत्रा का मजमून सुनाया तो उन्होंने कहा, ÷महात्मा जी का स्वास्थ्य आजकल अच्छा नहीं है, आप ऐसा न लिखें।' यह सच है कि पूरे साक्षात्कार का शब्दशः विवरण तो निराला ने तब सियारामशरण जी को नहीं दिया होगा, लेकिन उसके बाद ही ÷प्रबंध प्रतिमा' का प्रथम संस्करण तो 1942-43 में छप चुका था। तब क्या यह मान लिया जाय कि सियारामशरण जी ने इस ÷बातचीत' को न पढ़ा हो, जिसके अंत में उनका सशरीर जिव् है? यह सम्भव है। और अगर पढ़ा भी होगा तो गुप्त बंधु कहां से इस्तीफा देते? ÷भारती भंडार' में तो वे किसी पद पर थे नहीं।
दरअसल हुआ यह कि गंगा प्रसाद पाण्डेय ने ÷संसद' में निराला के रहने का लाभ उठा कर गद्गदायमान भाव से एक किताब लिखी जिसका शीर्षक ÷महाप्राण निराला' है। उसी तरह उन्होंने ÷महीयसी महादेवी' भी लिखी। ÷महाप्राण' और ÷महीयसी'। ÷महाप्राण निराला' संसद प्रकाशन गृह से प्रकाशित हुइर्ं। इसी किताब में वह विवरण उद्धृत है जिस पर खिन्न होकर गुप्त बंधुओं ने 2.4.1950 को संसद के अध्यक्ष पद और सदस्यता से इस्तीफा दिया। महादेवी ने ÷महाप्राण निराला' की भूमिका भी लिखी थी। एक तो महादेवी लिखित भूमिका, दूसरे ÷साहित्यकार संसद प्रकाशन' से उसका प्रकाशन, और उसमें महात्मा गांधी के लिए वह अपमानजनक वाक्यद्र यह सब कुछ बर्दाश्त से बाहर था। महादेवी ने एक लम्बे पत्रा में लाख सफाई दी कि भूमिका लिखते वक्त उन्होंने पूरी किताब पढ़ी भी नहीं थी। कोई भूमिका लेखक भूमिका लिखी जाने वाली किताब को पूरी नहीं पढ़ता। और फिर महादेवी? और वह भी गंगा प्रसाद पाण्डेय की किताब! अधिकांशतः भूमिकाएं या तो श्रद्धा भाव से क्कजो गंगा प्रसाद पाण्डेय के लिए महादेवी के मन में क्यों होता!त्र् या रस्म अदायगी के रूप में लिखी जाती हैं। यह मात्रा रस्म अदायगी थी, और इसलिए थी कि किताब निराला पर थी, चाहे जैसी हो। मैथिलीशरण जी का पत्रा कुछ यों है : ÷पूज्यनीया महादेवी जी, ÷साहित्यकार संसद' से यह त्यागपत्रा देकर मैं अपने उसी पद पर प्रतिष्ठित रहना चाहता हूं, जो आपके अनुग्रह भाजन होने के रूप में पहले से ही मुझे प्राप्त है। वस्तुतः वही मेरे लिए बहुत है। आप सानंद होंगी। आपकाद्र मैथिलीशरण।' सियारामशरण जी का पत्रा थोड़ा बड़ा है, लेकिन उतना ही विनम्र। दोनों पत्रा एक ही साथ ÷रजिस्टर्ड ए.डी.' से भेजे गये हैं।
दरअसल वह क्या था, जिस पर इतना बावेला मचा? निराला उस साक्षात्कार में कहते हैं, ÷कमरे के भीतर जाने के साथ मेरी निगाह महात्मा जी की आंखों पर पड़ी। देखा, पुतलियों में बड़ी चालाकी है।' यही वाक्य इस्तीफे की वजह बना। दरअसल सियारामशरण जी ने पूरा साक्षात्कार कभी पढ़ा ही नहीं होगा। उसी रौ में निराला यह भी कहते हैं, ÷...आंखों में दिव्यता, जो बड़े आदमी में ही दिखती हैद्र बड़े धार्मिक आदमी में, लेकिन आधी दृष्टि बाहर दुनिया को दी हुई जैसे, आधी भीतरद्र अपनी समझ की नाप के लिए।' महात्मा गांधी के पूरे व्यक्तित्व की इससे सुंदर समीक्षा और इससे सुंदर संक्षिप्त आकलन और क्या हो सकता है! लेकिन गुप्त बंधुओं को केवल एक शब्द ÷चालाकी' खटक गया। बस। महादेवी जी ने एक जगह लिखा है, ÷सियारामशरण जी की कविता और अच्छी होती, अगर गांधी जी का साथ उन्हें इतना न मिला होता।'
महादेवी ने साहित्यकार संसद की ओर से सन्‌ 1951में एक लेखक सम्मेलन भी किया जिसमें बहुत सारे नये पुराने लेखक शामिल हुए। यह सम्मेलन अखिल भारतीय स्तर का था। दूसरी भाषाओं से कौन कौन लेखक इसमें शरीक हुए, इसकी भी सूची कहीं मुझे उपलब्ध नहीं हो सकी। मराठी से मामा बरेरकर जरूर आये थे। सन्‌ 1955 में महादेवी ने ÷संसद' की ओर से ÷साहित्यकार' नामक एक पत्रिाका भी शुरू की जिसके सम्पादक महादेवी के अलावा श्री इलाचंद्र जोशी भी थे। पत्रिाका का हिन्दी साहित्यिक पत्राकारिता में कोई खास योगदान नहीं है।
लेखकों के लिए अस्थायी निवास और उनकी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने और इस तरह उन्हें मुक्त और स्वतंत्रा होकर लिखने देने के अलावा महादेवी का उद्देश्य एक प्रकाशन गृह भी खोलना था। लेखक प्रकाशक द्वंद्व में बहुत सारे लेखक अपनी रचनाओं का ÷कृति स्वामित्व' बहुत थोड़े थोड़े पैसों में बेच देते थे। जैसे कि निराला या शुरू के जमाने में प्रेमचंद ने किया था। महादेवी सोचती थीं कि प्रकाशन गृह से लेखकों को सच्ची और ÷वास्तविक' रॉयल्टी मिलेगी और ÷साहित्यकार संसद प्रकाशन गृह' एक सफल और ईमानदार प्रकाशन गृह साबित होगा। शुरू में कुल चार किताबें ÷संसद' से छपींद्र 1. ÷अपरा' क्कनिराला की कविताओं का चयन/चयनकत्रर्ाी स्वयं महादेवीत्र् 2. ÷हमारी नाट्य परम्परा' क्कश्रीकृष्ण दासत्र् 3. ÷प्रेयस' क्ककविता संग्रहद्र बालकृष्ण रावत्र् और 4. आदि मार्ग क्क नाटकद्र उपेन्द्रनाथ ÷अश्क'त्र्। बाद में ÷महाप्राण निराला' क्कगंगा प्रसाद पाण्डेयत्र् और ÷सांध्यगीत' क्कमहादेवी, तीसरा संस्करण, लेखकों के सहायतार्थत्र् और ÷आराधना' क्कनिराला, 1954त्र्। ÷संसद प्रकाशन गृह' से बिव्ी की समुचित व्यवस्था न होने तथा अन्य कई प्रकार के आर्थिक आरोप प्रत्यारोपों से तंग आकर महादेवी ने ÷अपरा', ÷सांध्यगीत', ÷महाप्राण निराला' और ÷आराधना' की सोल एजेन्सी ÷भारती भंडार' लीडर प्रेस को 35 प्रतिशत कमीशन पर दे दिया। ÷हमारी नाट्य परम्परा', ÷प्रेयस' और ÷आदिमार्ग' का क्या हुआ, इस सम्बंध में स्पष्ट रूप से कुछ ज्ञात नहीं।
लेकिन संसद प्रकाशन गृह से प्रकाशित पुस्तकों की रॉयल्टी, ÷अपरा' पर मिले 2100.00 रुपये के पुरस्कार, निराला की चिकित्सा के लिए भारत सरकार और प्रदेश सरकार से मिली सहायता राशियों को लेकर महादेवी की काफी बदनामी होने लगी। सारी धनराशि महादेवी की मार्फत ही आती थी। इन बातों से तंग आकर महादेवी ने 23 अप्रैल, 1954 के ÷भारत' क्कदैनिक अखबारत्र् में एक लम्बा वक्तव्य देकर अपनी सफाई पेश की : ह्यअपरा से जो 2100 रुपये का पुरस्कार मिला, उससे मुंशी नवजादिक लाल के पुत्रा प्रकाशचंद्र को जो क्षय रोग से पीड़ित हैं, 1900.00 रुपये भेजे जा चुके हैं। रसीदें सुरक्षित हैं।... 1952-53 में उनर प्रदेश सरकार ने निराला की चिकित्सा के लिए 500.00 और खर्च के लिए 100.00 निराला की रसीद देकर कमला शंकर सिंह ले गये थे।... ÷अर्चना' पर उनर प्रदेश सरकार ने 1000.00 रुपये का पुरस्कार दिया। पहले यह रकम मंगायी न गयी, क्योंकि निराला ने कमला शंकर सिंह को रसीद देना स्वीकार न किया। अंत में निराला के आग्रह पर महादेवी जी ने रुपये मंगाने की व्यवस्था की और उनके पुत्रा तथा अन्य दो सज्जनों की जानकारी में उन्हें दे दिये।... 1953-54 में उनर प्रदेश सरकार ने 100.00 रुपये प्रति मास के हिसाब से 1200.00 रुपये का अनुदान स्वीकार किया। निराला किसी अन्य को रसीद न देते थे, इसलिए यह रकम भी पड़ी रही। अंत में निराला ने शिक्षा मंत्राी को लिखा। महादेवी जी ने वह निधि भी मंगवा कर उन्हें उनके पुत्रा की जानकारी में दे दी।...कलकने में निराला अभिनंदन समिति ने साहित्यकार संसद को या मुझे 2500.00 रुपये की निधि भेंट नहीं की है, न अब तक इस तरह की कोई रकम प्राप्त हुई, अतः इस प्रकार का भ्रामक प्रचार लज्जास्पद है।... ÷अपरा' के प्रथम संस्करण का 1010.00 रुपये 11.09.47 तक निराला को मिला है। सहायक निधि से 1300.00 रुपये उन्हें समय समय पर दिये गये हैं, इसमें कुछ रुपये गांव और रायबरेली के पते पर भेजे गये। सभी रकमों की रसीदें आदि ऑडिटर द्वारा परीक्षित हैं।... ÷अपरा' का दूसरा संस्करण इसी महीने हुआ है। ÷आराधना' इसी महीने छपी है। अपने सोल एजेण्ट लीडर प्रेस से जब इनका हिसाब मिलेगा तब वह भी उन्हें दिया जायेगा। इस वर्ष साहित्यकार संसद से रामकृष्ण त्रिापाठी को 400.00 रुपये और कमला शंकर सिंह को 400.00 रुपये प्राप्त हो चुके हैं।... भारत सरकार से 1952-53 में उनम पुस्तकों के प्रकाशन के लिए 10,000.00 रुपये मिले हैं, लेखकों की सहायता के लिए नहीं। वह धन पुस्तकों के प्रकाशन पर ही व्यय किया जायेगा।... निराला की चिकित्सा के लिए उनर प्रदेश सरकार से 100.00 रुपये प्रति मास मिलने का आश्वासन मिला है। भारत सरकार से 100.00 रुपये प्रति मास मिलने की आशा है। प्रकाशकों से भी निराला की रॉयल्टी समय समय पर प्राप्त होती रहेगी।ऋ क्कनिराला की साहित्य साधना-1, पेपरबैक संस्करण, पृष्ठ 397-98 से उद्धृतत्र्
इस पर पक्ष विपक्ष में कई विवाद हैं। शिव गोपाल मिश्र, कमला शंकर और इलाचंद्र जोशी के। मेरा कहना है कि इस स्पष्टीकरण प्रसंग से स्वयं महादेवी और ÷साहित्यकार संसद' की छवि ही धूमिल हुई। नेहरू के आग्रह पर जो 100.00 रुपये की रकम केन्द्र सरकार से मंजूर हुई थी और जो 100.00 रुपये उनर प्रदेश की सरकार भेज रही थी, ये दोनों रकमें महादेवी की मार्फत आती थीं। इस ÷स्पष्टीकरण' और उसके पक्ष विपक्ष में छपी खबरों का नतीजा यह हुआ कि केन्द्र और राज्य, दोनों सरकारें अपनी सहायता राशि डी.एम. इलाहाबाद की मार्फत भेजने लगीं। राम विलास जी ने निराला की गंगा नदी के घड़ियालों के बारे में बड़बड़ से जो अंग्रेजी का एक वाक्य उद्धृत किया है उसका प्रतीकार्थ समझना चाहिएद्र श्डपेजमत व्दमए लवन बंददवज उांम ने ूववकमद ीमंकमकण् डपेजमत ैमबवदकए लवन बंददवज बंजबी ने ूपजी हवसकण्श्
इसका नतीजा यह हुआ कि ÷साहित्यकार संसद' धीरे धीरे ठप हो गया। जब महादेवी ने यह जगह चुनी थी तो वहां चारों ओर जंगल खेत और मंहदौरी रसूलाबाद गांवों की छिदरी छिदरी बस्तियां थीं। गंगा इस किनारे पर थी। भवन के ऐन नीचे श्मशान घाट नहीं था। न जाने किसकी खोज थी कि वहीं किनारे पर महान वंतिकारी चंद्रशेखर आजाद का दाह संस्कार हुआ था। तब वहां स्मृति चिघ्न के रूप में एक स्तम्भ बनवा दिया गया। अब वहां दाह संस्कार एक पुण्य कर्म माना जाने लगा। घाट सीढ़ीदार पक्का बन गया। एक दुर्दम्य महाराजिन बुआ थीं जो दाह संस्कार करवाती थीं। जब गंगा उस किनारे चली गयी तो उस स्त्राी और उसकी संतानों ने विचित्रा साहस का परिचय दिया। बाढ़ उतरने पर बालू काट कर गंगा का एक सोता दाह संस्कार के लिए वे इस किनारे ले आयीं। लेकिन अगली बाढ़ में वह फिर बालू से पट गया। महाराजिन बुआ अब नहीं हैं और ÷साहित्यकार संसद' एक कब्रगाह की तरह दिखता है। उसके उ+पर चारों ओर घनी संकुल बस्तियां हैं।
÷साहित्यकार संसद' की उस कब्रगाहनुमा इमारत पर भी अवैध कब्जा है।
और हमारी सरकार को कुछ भी याद नहीं है।

17-सी, अशोक नगर, इलाहाबाद

यह घर मौजा नवादा में है। इसका खसरा नम्बर 114/327 है। खसरा की जो नकल मेरे पास है उसमें महादेवी ने अपनी वार्षिक आय 1800.00 रुपये लिखायी है। महादेवी ने इस मकान को बना बनाया खरीदा, लेकिन यह घर बहुत छोटा और मामूली था। घर के चारों ओर अमरूदों, आमों, कटहल, नीम और सेमल का खूब घना बगीचा था। महादेवी ने यह पूरी जगह सन्‌ 1950-55 के बीच कभी खरीदी। पूरी जमीन का रकबा एक सवा एकड़ से कम नहीं होगा। महादेवी के रहन सहन के हिसाब से सम्भवतः वह बंगला छोटा भी था और रहने के काबिल नहीं था। उन्होंने क्कस्व.त्र् श्री कांति किशोर अग्रवाल को इस बंगले को गिराने और अपनी जरूरतों और इच्छाओं के हिसाब से पुनर्निर्माण के लिए ठेके पर दिया। कांतिकिशोर अग्रवाल साउथ मलाका में प्रयाग महिला विद्यापीठ की पुरानी इमारत के पास ही रहते थे और देवी जी के पूर्व परिचित और उनके प्रति श्रद्धा रखते थे। उन्होंने घने बगीचे के भीतर बने उस घर को पूरी तरह ढहा दिया या उसी को बढ़ा घटा कर ठीकठाक किया, यह सही सही पता नहीं चलता लेकिन जो बंगले का वास्तुशिल्प है उससे लगता है कि पुरानी इमारत पूरी तरह ढहा दी गयी और बिल्कुल एक नयी इमारत बनी। क्योंकि उन दिनों के हिसाब से इसका वास्तुशिल्प नया है। खपरैल का इस्तेमाल कहीं नहीं है, जैसाकि तब इलाहाबाद में ÷बड़े लोगों' के बंगलों का रिवाज था। सिर्फ पुरानी शैली का पोर्टिको जरूर है जहां महादेवी की पुरानी फोर्ड क्क?त्र् खड़ी रहती थी और उसकी बगल से सीढ़ियां चढ़ कर हम उस शाश्वत अल्पना पर रखी गोल मेज के इर्दगिर्द रखी कुर्सियों पर बैठते और अंदर बुलाये और बैठाये जाने का इंतजार करते।
मौजा नवादा तब एक छितरा बिखरा गांव था। छोटी सी गली कूचों वाली बस्ती थी। चारों ओर बबूल के जंगल और आम के बगीचे थे। थोड़ी दूर पर गंगा थी जो अभी भी मरी मरी जिन्दा है। खेत और हल बैल, चरती हुई या गंगा से नहा कर लौटती हुई चमकती भैंसें दिखती थीं। जब शहर बढ़ने लगा तो लोगों की नजर इधर भी गयी। उन्होंने गरीब किसानों से औनेपौने दामों पर जमीनें खरीदीं और बसना शुरू हुए। तब इस इलाके का नाम नेवादा और मマसरैंया से हटा कर ÷अशोक नगर' रखा गया। ÷इलाहाबाद विकास प्राधिकरण' जब बना तो उसकी भी नजर इधर गयी। ÷आवास विकास निगम' की भी। पत्राकारों के बसने के लिए भी उधर ही जगह तय हुई। अब तो बड़े बड़े बिल्डर्स ने भी अपनी प्यारी नजर उधर फेरी है। अब अशोक नगर नाम सुनते ही लगता है कि यहां रहने वाले लोग कितने भाग्यशाली हैं!
सन्‌ 1952 में रामगढ़ वाले मकान ÷मीरा कुटीर' और उसके परिसर का दवामी पट्टे वाला मुकद्दमा हार जाने और सन्‌ 1955 में प्रयाग महिला विद्यापीठ सम्बंधी झगड़ों के बाद ही महादेवी ने 17-सी, अशोक नगर वाला प्लाट खरीदा। ÷मीरा कुटीर' के सम्बंध में उन्होंने रामगढ़, उमागढ़ पट्टी, नैनीताल का अपने को बाशिंदा घोषित किया था। 1, एल्गिन रोड वाले बंगले में वे इसलिए रह रही थीं कि विद्यापीठ की आवासी प्रिंसिपल थीं। उनके सिर पर हमेशा तलवार लटकी रहती थी, जबकि उनका सारा लेखन विद्यापीठ के उसी आवासी बंगले में रहते हुए हुआ। अब जो लोग विद्यापीठ पर काबिज हैं, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं। अब तो प्रिंसिपल क्कमहादेवीत्र् के कार्यालय वाले कमरे में अध्यापिकाएं अपने अपने टिफिन खोल कर ÷दोपहर का भोजन' करती हैं और महादेवी की उस कुर्सी पर बैठने की होड़ लगी रहती है। इंटर सेक्शन में भी महादेवी की तस्वीर एक आल्मारी के उ+पर रखी धूल फांक रही है। बहरहाल, कहने का मतलब यह कि महादेवी 1, एल्गिन रोड वाले बंगले में रहते हुए भी ÷बेघर' थीं। इसी मनःस्थिति में शहर के उनरी पश्चिमी कोने के तब के उस वीराने में बगीचों के सघन झुरमुट में छिपे उस ÷पिकनिक घर' को उन्होंने खरीदा।
महादेवी अकेली थीं लेकिन उनके नौकरों चाकरों और पशु पक्षियों का एक बड़ा परिवार उनके साथ था। महादेवी सन्‌ 1955 तक मिथक बन गयी थीं। उनके दर्शन करने वालों का रोज-ब-रोज आना जाना होता रहता था। लेखक थे, बहन का भरा पूरा परिवार था। इन सब बातों के मद्देनजर बंगले की वास्तु रचना की गयी। स्वयं महादेवी ने उसके वास्तु शिल्प की एक मोटी रूपरेखा तैयार की। ऐसा नहीं है कि महादेवी कोई वास्तु शिल्पी थीं लेकिन उन्होंने अंतिम रूप से बसने के लिए अपनी जरूरतों का ध्यान रखा। बंगला पूर्वमुखी है। आगे पीछे उनर दक्खिन को फैले चौड़े बरामदे हैं। आगे वाले बरामदे के दोनों कोनों पर दो कमरे हैं जो बरामदे में खुलते हैं। इसी में उनर वाले कमरे में पहले श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय और उनके देहावसान के बाद उनके पुत्रा श्री क्कअब स्व.त्र् रामजी पाण्डेय रहते थे। पोर्टिको से अंदर जाते ही सामने जो दरवाजा खुलता था वह एक लम्बी चौड़ी बैठक है। उस दरवाजे के उ+पर वीणा बजाती हुई सरस्वती की मूर्ति सीमेण्ट में उकेरी हुई है। बरामदे में घुसते ही बरबस सरस्वती की उस सुघड़ पीठ पर दृष्टि चली जाती है। चेहरा नहीं दिखता सिर्फ पीठ और गर्दन और सिर का पिछला हिस्सा, कुहनियां और वीणा। इस लम्बे चौड़े बरामदे से दोनों ओर अंदर जाने के लिए गलियारे हैं। दक्खिनी गलियारे में ही दायीं ओर महादेवी की लाइब्रेरी और फिर शयनकक्ष है। अंदर वाले बरामदे और बैठक के बीच उनर दक्खिन फैला हुआ एक बहुत बड़ा हॉल है। इसी हॉल को बीचोंबीच से एक लकड़ी का पार्टिशन लगा कर महादेवी ने दो हिस्सों में बांट दिया था। एक लम्बा, ल्लिदार पर्दा यहां से वहां तक खिंचा रहता था। उस पर्दे के बीच एक छोटा दरवाजानुमा पर्दा लगा हुआ था। हॉल का वह बंटा हुआ उनरी भाग ही वह ऐतिहासिक गप्प गोष्ठी वाली बैठक थी। एक तखत, खद्दर की सफेद चादर और सिर्फ एक गावतकिया। बगल में गांधी और बुद्ध के लकड़ी के कट्आउट्स। बासी गुलाबों या बेलें और लोबान की गंध। गोधूलिद्र हमेशा। बैठने का इंतजाम जमीन पर बिछे गद्दों और गावतकियों के सहारे। बीच में छोटे पायों की संगमरमर की एक सफेद गोल मेज, जिस पर नाश्ता सजता। लोग अर्द्धचंद्राकार ढंग से बैठते और सामने वाला अर्द्धचंद्र महादेवी के लिए छोड़े रहते। पार्टिशन के उस ओर महादेवी ने खाने की मेज और कुर्सियां रख छोड़ी थीं। जब गैस आ गयी तो गैस और चूल्हा वहीं रखे रहते। वैसे महादेवी की रसोई भीतरी बरामदे के दक्खिनी छोर के बाहर दो कमरों और एक छोटे से आंगन में थी। तब खाना पत्थर कोयले की अंगीठी पर बनता था और वहां से लाकर मेज पर रखा जाता। महादेवी अकेले ही उस एकांत में खाना खातीं। जब गैस आ गयी तो शाम के नाश्ते के लिए चुपचाप वे उसी गैस पर कुछ न कुछ बनाती होतीं। उस वक्त उनका आंचल कमर में खुंसा होता। बिल्कुल सुगृहणी, तलने भुनने में दनचिन, चुपचाप। छौंक से अचानक नौकरों को पता चलता तो वे जल्दी जल्दी आते। महादेवी हंसतींद्र ÷पकौड़ियां तल रही हूं।' वे भारी मोटी आवाज में कहतीं।
÷हरी मिर्ची की पकौड़ियां!' वे बेसन में लपेटते हुए जोर से हंसतीं। आंखें छौंक बघार के धुएं से गीली। होठों पर हंसी।
यही तो महादेवी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व है :
मेरे हंसते अधर नहीं, जग
की आंसू लड़ियां देखो।
मेरे गीले पलक छुओ मत
मुर्झायी कलियां देखो!
छोटे पर्दे के उसी द्वार से स्वच्छ, नीली पाड़ वाली खद्दर की साड़ी का आंचल माथे पर खींचती, हंसती महादेवी सचमुच ÷सांध्यगीत' की तरह प्रकट होतीं और अपने वाले अर्द्धचंद्र में बैठ जातीं। पहले ही से उनकी जबान पर कोई फिक्‌रा होता। फिर वे नाश्ता परोसते हुए उसी फिक्‌रे से गप्प शुरू करतीं। कभी कभी परिचय भी होता, लेकिन कोई नया आगंतुक हो या परिचित लोग, जो अंदर की गोष्ठी में आ गया सो आ गया। फिर महादेवी परिचय अपरिचय का कोई लिहाज नहीं करतीं। जो भी विषय चुन लिया, चुन लिया। उसमें से अनेक शाखाएं प्रशाखाएं निकलतीं जातीं। लेकिन अपने लेखन, अपने जीवन, अपनी बीमारी, अपने अंतरंग पर कभी कुछ भी नहीं। अपनी निजी समस्याओं पर भी कुछ नहीं। विद्यापीठ के झगड़ों के सम्बंध में एक बार गोपेश जी ने ब्रघ्मदेव क्करायत्र् का नाम ले लिया। हंसते हंसते महादेवी एकाएक चुप हो गयीं। कठोर। उनका चेहरा घृणा से थोड़ा विकृत हो गया। उन्होंने चश्मे के भीतर से गोपेश जी को घूरा। उस दिन सारी सांध्य गोष्ठी चौपट हो गयी। गोपेश जी की जैसी कि सहज सरल आदत थी, उन्होंने सफाई देनी शुरू की तो महादेवी उठ गयीं और बिना कुछ कहे अंदर चली गयीं। सभी की आधी प्याली चाय बाकी थी। सभी उठ गये। गोपेश जी फाटक के बाहर तक अपनी टाई बार बार पकड़ें और बार बार ÷अरे भई, अरे भई' करें। तब किसी ने कहा, ह्यअब चलो भी...।ऋ
लेकिन इस घर को लेकर भी एक मुकद्दमा तो चला ही। बिल्डर श्री कांति किशोर अग्रवाल ने ठेके से बारह हजार रुपये ज्यादा का हिसाब महादेवी के सामने पेश किया। अग्रवाल साहब ने कहा कि इस बीच सीमेण्ट महंगा हो जाने के कारण बाजार से उठ गया और काला बाजार में चला गया। मुझे ब्लैक में सीमेण्ट लेकर लगाना पड़ा। महादेवी बिगड़ गयीं : ÷मेरे मकान में ब्लैक का सीमेण्ट! उतार लो अपना सीमेण्ट।' महोदवी ने कहा।
अब सीमेण्ट कैसे उतर सकता था!
लाचार होकर कांति किशोर अग्रवाल को मुकद्दमा करना पड़ा। अग्रवाल साहब मुकद्दमा जीत गये तो महादेवी के वकील ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने पहले बारह हजार रुपये की रकम कोर्ट में जमा करने को कहा। तभी मुकद्दमा सुना जायेगा। महादेवी के कहने पर लोकभारती प्रकाशन ने यह रुपया कोर्ट में जमा किया। महादेवी हाईकोर्ट में भी मुकद्दमा हार गयीं और रुपया अग्रवाल साहब को मिल गया। इस तरह महादेवी, जैसाकि वे ÷साहित्य सहकार न्यास' की अपनी वसीयत में लिखती हैं: ह्यमैंने अपनी चल अचल सम्पनि में से बंगला नं. 17-सी, अशोक नगर को, जिसकी मैं एकाकी और पूर्णरूपेण स्वामिनी हूं', इस बंगले की ÷पूर्णरूपेण और एकाकी' स्वामिनी बनीं। इसी ÷पूर्णरूपेण और एकाकी स्वामित्व' के लिए उन्होंने ÷मीरा कुटीर', रामगढ़ पर भी दवामी पट्टे का मुकद्दमा लड़ा था और सफल नहीं हुईं। 17-सी, अशोकनगर का मुकद्दमा हार कर भी वे पहली बार निर्गृही से गृही क्कगृहणीत्र् हुईं। मेरे एक मित्रा अक्सर कहते हैं कि ÷मध्यवर्ग के हर आदमी की एक ही ख्वाहिश होती हैद्र अपनी सुरक्षित मृत्यु के लिए एक घर बनावाना।ऋ बात थोड़ी काली और कड़वी है लेकिन सच तो है। महादेवी भी जब इस घर में गयीं तो बीमारियों से जूूझती हुई गयीं। लेकिन इस घर को उन्होंने खूब ÷एन्ज्वाय' भी किया। प्रशांति और एकांत और अवसाद को निरस्त करने वाली सांध्य गोष्ठियां। महादेवी को कभी किसी नौकर ने भी उस घर में मुड़ेतुड़े लिबास में नहीं देखा। शयनकक्ष से बाहर निकलतीं तो एकदम धुली धुली, स्वच्छ ताजा हवा के झोंके की तरह, मांड़ी लगी कड़क खद्दर की साड़ी में माथे पर आंचल खींचते हुए। सुबह की चाय महादेवी कभी भी बिस्तर में अलसाये हुए नहीं लेती थीं। चाय के बाद उसी खाने की मेज पर बैठे बैठे वे कहतीं, ÷लाओ, भाई, कौन सी सब्जी काटनी है।' फिर वे बड़े सलीके से, सफाई से पूरे ÷परिवार' के लिए सब्जियां काटतीं। 17-सी, अशोक नगर में इस तरह महादेवी की सुबह शुरू होती। फिर बाहर परिसर मेंद्र फूलों पनियों, पेड़ों को निहारतीं... अनंत नीले आकाश की ओर आंखें उठातीं, ÷अपने परिवार' का हालचाल लेतीं, कभी किसी सघन लता या पेड़ की छांव में मेज कुर्सी निकलवा कर कुछ लिखती पढ़तीं। उस वक्त सब लोग दूर दूर से उन्हें देखते। दोनों फाटक अंदर से बंद कर दिये जाते, जिससे अति प्राचीन, आद्य और आधुनिक उस कवयित्राी की समाधि कोई भंग न कर सके।
महादेवी के शयनकक्ष में सन्‌ 1987 तक जयशंकर प्रसाद की तस्वीर लगी थी। इसके अलावा ÷मीराबाई', ÷हिमालय' क्कहे चिर महान्‌त्र् ÷दीपशिखा' और श्री शम्भूनाथ मिश्र द्वारा बनायी हेमरानी देवी क्कमहादेवी की मांत्र् के चित्रा लगे थे। अब उसमें क्या बचा है या ÷है', मुझे नहीं मालूम। इसके अलावा महादेवी के सारे रेखांकन और चित्रा भी उसी घर में होंगे। उस घर में अब रामजी पाण्डेय का परिवार रहता है।
महादेवी के शयनकक्ष में एक तहखाना भी है।
मैं सोचता हूं कि यह महादेवी के परम अंतःकरण का प्रतीक है।
महादेवी के पास रखने या छिपाने या सहेजने को और क्या था!
वह कविता याद आती है :
टूट गया वह दर्पण निर्मम!

उसमें हंस दी मेरी छाया
मुझमें रो दी ममता माया
अश्रु हास ने विश्व सजाया
रहे खेलते आंखमिचौनी
प्रिय, जिसके परदे में ÷मैं' तुम।
टूट गया वह दर्पण निर्मम!
वह निर्मम दर्पण तो नरसिंहगढ़ के महलों की आंखमिचौनी में ही कभी टूट गया।
केवल उसके तड़कने की अनुगूंज बाकी है।


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