सेल्फ पोटेट
यह जो कटा फटा सा
कच्चा कच्चा और मासूम चेहरा है
उसे जमाने की भट्ठी ने
खूब खूब तपाया है
केवल आरामशीन नहीं चली
लेकिन हड्डियों और दिल को
ठंड ने अमरूद की फांकों सा चीर दिया है
असमय इस चेहरे से रुलाई फूटती है
दरअसल टᆭेन की खिड़की सा हो गया है चेहरा
जिसके भीतर से आंखें
दृश्यों को छूते हुए निर्लिप्त गुजर जाती हैं
बहुत रात तक
चांदनी से बतियाती जुबान
एक झटके से लहूलुहान हो जाती है
जब उसे याद आती है
ध्वस्त खेतों की सिसकती फसलें
नारियल और ताड़ के गहरे रंग के छितरे वृक्ष
समुद्र की रेतीली तटों पर सूखी मछलियों के ढेर
नमक की डली इसकी नसों में है
घाटियों के काले पत्थरों से निर्मित हैं इसके होंठ
दुनिया का कोई रंग
इस चित्रा का असल बयान नहीं कर सकता
यदि इसमें भरना ही है कोई रंग
जो दिखाये इसकी सच्चाई
तो गुजरे जमाने में ध्वस्त हुई किसी मीनार
या अधबनी किसी इमारत की धूल ले आओ
इन भरी भरी आंखों में निचोड़ दो असली रक्त
तम्बाखू से काले हुए होंठ और मटमैले दांतों के लिए
बुलाओ गुम हो चुकी समुद्री मछली को
अंधेरी रातों से
वह आयेगी और खिलखिला जायेगा यह चित्रा
बिल्कुल असल की तरह
लेकिन मेरे चित्राकार,
फिलहाल इस चेहरे को
मुल्तवी कर दो अगली शताब्दी के लिए!
वर्ष 1972
जिन्दगी, तुम्हारी असंख्य उलझी शिराओं में
एक फूल की तरह
डाली पर, मैं, खिला
माली के पसीने की चमक
झलकतीद्र ओझल होती हुई मुझमें
इस जन्म के लिए मैंने
पिछली किसी शताब्दी में
प्यार को बीज की तरह बोया था
अनेक गुजरते अंधड़ों, अटपटे मौसमों
कीटों की जबरदस्त फौज
और घोड़ों की नाल से लहूलुहान धरती के नीचे
बड़ा दुर्गम था वह समय
पृथ्वी ने आसमान को सौंप दिया था
तपे लोहे के रंग का सूरज
और बिलख रही थी
उदार दिखते उनींदे तानाशाहों के शयनकक्ष में
लेकिन संगीत की याद में तड़पते किसी नन्हें दिल की तरह
बची रही धरती में सांसें
शताब्दियों बाद
बलखाती पुष्ट नीम की पनियों पर
सोना उड़ेलता सूरज
जब चिड़िया के कोमल पंखों को छुआ
और गिलहरियों ने अपनी पिछली टांगों पर बैठ कर
चूमे तुम्हारे हाथ
तभी डाली पर, मैं, खिला
मैं खिला प्यार को बीज की तरह
सीने में धारण किये हुए
मूल्य खो चुकी सम्पनि की तरह सहेज कर उसे
लेकिन समय मेरी आशाओं के विरुद्ध
अब भी था उतना ही भयंकर
बमवर्षक विमानों से
अभी तक उठ रही थी बारूद के धुंए की ताजा गंध
सरहदी हत्यारे पुरस्कृत हो रहे थे राजधानी में
युद्ध को राष्टᆭभक्ति का दूसरा नाम
ऐलान कर दिया गया था
मैं जन्मा
और मेरी चौंकती आंखों में
बचे खुचे लोकतंत्रा के ढहने की धूल थी
सपनों से
मरे हुए चूहे की गंध उठती थी
जिसे पार नहीं कर सकी
मेरे मुंह से उठती कच्चे दूध की गंध
बाद में आसमानी सितारे
देर तक अंगार वृष्टि करते रहे
जलती हुई उल्काएं
विलीन होती रहीं सागरी जल में
धरती की सिसकती पीठ पर
कोड़े फटकारते रहे राजनीतिज्ञ
उन्माद...हां उन्माद ही था
बरसता हुआ, टपकता हुआ
समय ने मुस्कुराते हुए करवट बदली
और देश उसकी कांख में बिलबिला गया
और कुछ शातिर लोगों ने
हंसी हंसी में देश की खोपड़ी तोड़ दी
तड़...तड़...तड़...
एक बीती हुई रात को याद करते हुए
रात
तुम लौट गयी चुपचाप
मुझे अकेला, निस्संग छोड़ कर
भर कर प्यार की कई कई स्मृतियां
तुममें हिचकोले खाता हुआ
मैंने चूमा पत्नी का माथा
होंठों पर एक भरपूर चुम्बन
अंधेरे में टटोलते हुए किया समूचे शरीर का स्पर्श
रात, जब तुम गहरा रही थी
मैं प्यार की दैहिक व्यिा में लीन था
असंख्य लहरों पर सवार
किसी दिव्य पुरुष की तरह
पुरुष होना उस रात मुझे
वैसे नहीं लगा जैसे लगता रहा है मनु को
न ही स्त्राी किसी सजायाता कैदी की तरह लगी
रात
तुम्हारे गहराते आंचल की छोर को मुंह में दबाये
मैंने सुनी असंख्य कीटों की जिन्दा आवाजें
चौराहे पर चाय का टपरा लगाने वाले का स्टोव
नीली लौ के साथ सीने में दहकता रहा
रेल की पटरी पर टᆭेन दौड़ाते डᆭाइवरों की उनींदी आंखें
लालटेन की तरह दिपदिपाती रहीं भीतर
मैंने अतीत के गुनाहों और
भविष्य के सम्भावित गुनाहों से
शून्य को ताकते हुए
देर तक जिरह की
और फैसले को अनिर्णीत ही छोड़ कर
उस देश के बारे में ईमानदारी से सोचा
जिसमें रहता हूं मैं
मुझे याद आये खिले हुए फूलों के कई कई रंग
अंततः मैंने तय किया
कि सुबह किसी एक अपरिचित फूल के बारे में
पूरी जानकारी लूंगा
रात
जिस वक्त तुम मुझे
अलविदा कहने को तैयार खड़ी थी
टेᆭन की खिड़की पर बैठे किसी मुसाफिर की तरह
मैंने कहाद्र
÷तुम फिर आओगी, मुझे पता है'
और यह भी किद्र ÷तुम
अंधेरा नहीं हो केवल'
÷बहुत उजली हो, धुली धुली
प्यार की अनंत आवाजों से सजी
सपनों की रंगीन दुनिया की धरातल'
÷और प्रेम में डूबी एक स्त्राी की तरह