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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
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अंक/16 जुलाई/07

   जिनके परतौ से चिरागां हैं हजारों के दिमाग
अनिल त्रिपाठी

युद्ध क्षेत्रा में दुश्मन के सबसे कमजोर मोर्चे पर हमला करके जीत हासिल कर लेना भले ही सफल रणनीति हो , पर बौद्धिक क्षेत्रा में सबसे मजबूत और मुश्किल मोर्चे की विजय ही असली विजय है। ग्राम्शी का यह कथन नामवर जी के लेखन और जीवन संघर्ष का मूल स्वर रहा है। उन्होंने ताउम्र बौद्धिक क्षेत्रा के सबसे मजबूत और मुश्किल मोर्चे की ही विजय की है। वे हिन्दी आलोचना के ÷ द क्रिटिक' हैं। सही मायनों में ÷ प्रैक्टिसिंग क्रिटीक', जहां पश्चिमी जगत के बौद्धिक विमर्शों के साथ साथ भारतीय काव्यशास्त्रा की पूरी परम्परा की अनुगूंज मौजूद है। उनमें सजग पुनर्नवता है इसलिए तथ्यात्मक रूप से वरिष्ठ किन्तु असाधारण रूप से युवा हैं। अभी हाल ही में प्रकाशित समीक्षा ठाकुर द्वारा संकलित किये गये उनके साक्षात्कारों की पुस्तक ÷ बात बात में बात' और छोटे भाई एवं प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह को लिखे पत्राों के संग्रह ÷ काशी के नाम' को पढ़ते हुए न केवल पिछले छः दशकों की साहित्यिक और वैचारिक बहस मुबाहिसां की ऊष्मा से हम रूबरू होते हैं बल्कि यह भी कि नामवर जी के आलोचक के निर्माण में कौन से कारक एवं परिस्थितियां सक्रिय रही हैं, इसकी भी जानकारी मिलती है। सचमुच ÷ अ क्रिटिक इन द मेकिंग' का पूरा पता देती हैं ये पुस्तकें।

वे हमारे समय के सबसे बड़े वक्ता हैं। उनकी वक्तृत्व कला का लोहा अन्य अनुशासनों के बौद्धिकों ने भी स्वीकार किया है। कई बार उन पर आरोप लगा है कि वे लिखते नहीं बोलते हैं। ऐसे ही एक प्रश्न के उत्तर में वे ÷ बात बात में बात' में कहते हैं - ÷÷ जिस समाज में साक्षरता पचास फीसदी से कम हो, हिन्दी समाज में वहां वाचिक परम्परा के द्वारा ही महत्वपूर्ण काम किया जा सकता है।'' दरअसल व्याख्यानों का मुख्य उद्देश्य यही रहा है कि अपने साहित्य में, संस्कृति में और समाज में साहित्य सम्बंधी जो सोच विचार चल रहा है उसे कैसे बदला जा सके, कैसे समृद्ध किया जा सके। विषय के बारे में जिस सूझबूझ के साथ वे मैदान में आते हैं वह विलक्षण है। उनके सम्भाषणों पर यदि गौर करें तो हमें कुछ निश्चित प्रविधि या पद्धति का पता चलता है। एक पद्धति में वे सबसे पहले विषय से सम्बंधित विचारसूत्रा की पूरी संरचना को खंगालते हुए जब अवधारणात्मक सरणि तक पहुंचने के करीब होते हैं तभी कोई ÷ प्वाईंट आफ रेफरेंस' लाकर सहसा इस विचार सरणि को आलोकित कर देते हैं। फिर वह विचारसूत्रा जो अभी तक लोगों के लिए ÷ हाइपोथेटिकल' था वह सप्रमाण सिद्ध होकर लोगों के सामने आ जाता है। यह रेखागणित में प्रमेय सिद्ध करने जैसा है जिसे तर्कशास्त्रा में निगमनात्मक प्रविधि कहा जाता है। एक और प्रविधि से भी वे काम लेते हैं जो प्रायः विरोधी मंच से विरोधियों की खोज खबर लेने के लिए होती है। इसमें वे परिधि से केन्द्र की तरफ आते हैं। इस प्रक्रिया में ÷ फाइंडिंग्स' के लिए तथ्यों का बारीकी से इस्तेमाल करते हैं और फिर किसी शेर पर कविता की पंक्ति के सहारे अचूक तरीके से अपनी बात कहते हैं। ऐसे में विरोधी या प्रतिपक्ष को संभलने का भी मौका नहीं देते। यह रासायनिक अभिक्रिया की तरह घटने वाली प्रक्रिया है जिसके निष्कर्ष का पूर्वानुमान लगाना अत्यंत कठिन है।

लेकिन इतना ही नहीं हैं नामवर जी। समकालीन विमर्श से शब्द लूं तो कह सकता हूं कि वे कम्प्लीट ÷ टेक्स्ट' की तरह हैं, जिसके निर्माण एवं संरचनात्मक विन्यास की प्रक्रिया को जानना मुझ जैसे तमाम पाठकों के लिए अभीष्ट और रोमांचित कर देने वाला अनुभव है। काशीनाथ सिंह के संस्मरण तो एक स्रोत हैं ही - वे अल्टीमेट हैं, जिनके बारे में नामवर जी की राय है - ÷÷ तुमने तो इस विधा में नयी जान डाल दी। अब संस्मरण लिखने वालों के सामने एक चुनौती होगी।'' लेकिन ÷ बात बात से बात' एवं ÷ काशी के नाम' पुस्तक को पढ़ना बिल्कुल अलग किस्म का अनुभव है। ये प्राथमिक स्रोत बेहद दिलचस्प हैं और बड़े काम के हैं क्योंकि इनसे एक और असदुल्ला खां गालिब का पता मिलता है और गालिब की इस दिल्ली में ÷ टेक्स्ट' का एक सूत्रा हाथ लगता है। ÷ बना कर फकीरो का हम भेस गालिब - तमाशाए अहले करम देखते हैं।' एक दूसरा सिरा भी हाथ आता है - ÷ वो जो रखते थे इक हसरते तामीर सो है।'

इस हसरते तामीर पर मौसम की पहली मार ÷ नीम के फूल' पर पड़ी, जो सहकार प्रकाशन से १९५१ में छपते छपते रह गया। ÷ दूसरा सप्तक' के समय यदि यह संग्रह आ गया होता तो नामवर जी की विकास यात्राा की एक नयी खिड़की खुलती, उसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन छप कर आया ÷ बकलम खुद' - निबंधों का संग्रह। यह तथ्य है कि वे उस समय कविताएं लिख रहे थे और कवि गोष्ठी में जाकर कविता पाठ करते थे। शुरुआती दिनों में बनारस के साहित्यिकों के बीच एक होनहार अच्छे कवि की छवि बनी थी। वे आठवीं में थे जब उनकी कविता क्षत्रिाय मित्रा में छपी जिसकी दो पंक्तियां हैं - ÷ तान के सोता रहा जल चादर / वायु सा खींच जगा गया कोई।' जिस पर केदारनाथ सिंह की टिप्पणी है - ÷÷ मुझे नामवर जी के विकास के एकदम शुरुआती दौर में सहसा जग पड़ने के इस बिम्ब का आना महत्वपूर्ण लगता है। आगे की सारी यात्राा इसी जग पड़ने के एहसास के जटिल, बहुआयामी और गहन से गहनतर होते जाने का इतिहास है।'' स्पष्टतः कविता से यह लगाव आगे आलोचना के विकास में प्राणतत्व के रूप में मौजूद रहा । मूलतः वे कविता के आलोचक हैं लेकिन यहां यह कह देना जरूरी है कि कहानी की आलोचना को व्यापक स्तर पर शुरू करने एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय भी उन्हीं को है।

यह कम अचरज का तथ्य नहीं है कि मात्रा तेरह वर्ष की उम्र में १९४१ में त्रिालोचन जी से परिचय होने के बाद पहली पुस्तक जो खरीद कर पढ़ी वह निराला की अनामिका थी। १५ वर्ष की उम्र में त्रिालोचन जी से ÷ तार सप्तक' लेकर पढ़ा। लेकिन समझ में नहीं आया जिस पर त्रिालोचन शास्त्राी ने सलाह दी कि अभी तक आपने बोधपूर्वक पढ़ा है अब भावपूर्वक पढ़िए। एक प्रश्न के उत्तर में नामवर जी ने भावबोधपूर्वक तार सप्तक को पढ़ने की बात कही है। गांव में कामता प्रसाद विद्यार्थी के साहचर्य में स्वाधीन चेतना का विकास हुआ। सन्‌ १९४२ में हुए धानापुर कांड को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। स्कूल में मार्कण्डेय सिंह जैसे गुरुजनों की छाप उनके मन में अमिट है। विचारों की स्पष्टता, भाषा की स्पष्टता वागाडम्बर से बचना जैसे संस्कार नामवर जी को गुरु मार्कण्डेय सिंह से ही मिले थे। १९५१ में एम.ए. किया, और उसके ठीक बाद उन्होंने शुरू के दिनों में जो लेख लिखे उनमें से एक है - ÷ इतिहास का नया दृष्टिकोण' जिसे शिवदान सिंह चौहान ने तब की ÷ आलोचना' के इतिहास अंक में प्रकाशित किया था। दूसरा आलेख बदरी विशाल पित्ती के आग्रह पर ÷ कलात्मक सौन्दर्य की समस्या' नाम से लिखा गया था जो अक्टूबर १९५२ की ÷ कल्पना' में छपा। मेरे लेखे ÷ इतिहास का नया दृष्टिकोण' उनकी पहली बड़ी तैयारी है आलोचना के मैदान में उतरने की। इस लेख में ऐतिहासिक भौतिकवाद के परिप्रेक्ष्य में द्वंद्वात्मक प्रणाली की बात है। आलेख में जिस तरह इतिहास परम्परा को विश्लेषित किया गया है उससे नामवर जी की यह दृष्टि साफ तौर पर दिखाई पड़ती है कि आगे उनके आलोचनात्मक लेखन का विकास किस तरह होगा। २४ वर्ष की उम्र में उनकी स्पष्ट जिद है कि हमें ÷ तैयार तो हर क्षेत्रा में हर पहलू से भ्रांति निवारण के लिए रहना है।' इस पहली उड़ान के बाद उनकी आलोचकीय प्रतिभा का वह निदर्शन होता है जो हिन्दी आलोचना के इतिहास में अप्रतिम दस्तावेज के रूप में हमारे सामने है। आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां ( १९५४), छायावाद ( १९५४) इतिहास और आलोचना ( १९५७) उसी दौर की पुस्तकें हैं। आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां और छायावाद जैसे पुस्तकें १० दिन में, कविता के नये प्रतिमान २१ दिन में, दूसरी परम्परा की खोज १० दिन में लिखी गयी पुस्तकें हैं। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह सब कुछ करने के लिए कितनी बड़ी तैयारी की होगी। वे ÷ वादे वादे जायते तत्व बोधः' पर विश्वास करते हैं। संवाद की पुस्तक ÷ बात बात में बात' शीर्षक स्वयं ही संवादशीलता की प्रभावकारी भूमिका को बताती है। इसमें समकालीन एवं अतीत के भी साहित्य एवं सामाजिक मुद्दों पर गम्भीर बहस है। नामवर जी से संवाद का अर्थ ही है अपने समय की रचनात्मकता का एक्सरे देखना। पुस्तक में ऐसे कई साक्ष्य हैं जब उन्होंने स्वीकार किया है कि किसी समय मेरा कोई स्टैण्ड रहा हो लेकिन वह आज न हो । वह उस समय की जरूरत थी आज की नहीं। वे ÷ सेल्फ क्रिटीक' को भूमिका को अनिवार्यतः स्वीकार करते हैं और जड़ता के विरुद्ध संघर्ष को उपयोगी हथियार मानते हैं। उनके अनुसार आलोचक का दायित्व फौज के ÷ सैपर्स एवं माइनर्स' की तरह है। वह न्यायाधीश नहीं है। नामवर जी विवेक एवं दृष्टि के संतुलन पर विशेष तवज्जो देते हैं और निरंतर इस आलोक में पर्याप्त परिवर्तन की गुंजाइश के हिमायती हैं। उनका यह कहना कि ÷ मेरा तो सूत्रा वाक्य है कि शास्त्रा को अपने ऊपर सवारी मत करने दो, शास्त्रा पर सवारी करो फिर चाहे वह भारतीय काव्यशास्त्रा हो या पश्चिमी काव्यशास्त्रा' मूलतः वैचारिक दृष्टिकोण से अधिक जीवन संघर्षों के बीच कमाया हुआ मूल्य है, सत्य है। उन्होंने प्रायः ऐसी जगहों से बचने की कोशिश की है जहां ÷ तुलसी तहां न जीतिए जहं जीतहु हू हार' । कहानी आलोचना एवं कहानी के बारे में बात करते हुए वे थोड़े मायूस से दिखते हैं। लेकिन कहानी आलोचना की दृष्टि से विश्वनाथ त्रिापाठी की ÷ कुछ कहानियां कुछ विचार' को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। नयी कहानी आंदोलन के बाद के कथाकारों में ज्ञानरंजन पर टिप्पणी करते हैं कि उन्होंने बहुत ही पावरफुल कहानियां लिखी हैं। भीतर तक खलबली मचा देने वाली कहानियां हैं। ज्ञान को बहुत कम लिख कर हिन्दी साहित्य में जितना आदर और सम्मान मिला है उसकी मिसाल शायद बहुत ज्यादा न मिले। युवा पीढ़ी के कथाकारों में उदय प्रकाश एवं अखिलेश को अत्यंत महत्व देते हैं। उनकी सम्पूर्ण आलोचना दृष्टि की सबसे बड़ी खासियत है रचना का केन्द्र में होना। जिसे टेक्सचुअल क्रिटिसिज्म का नायाब नमूना कहा जा सकता है। इसलिए डी.एच. लारेंस के इस कथन से उनकी सहमति है कि ÷ कहानी पर विश्वास करो कहानीकार पर नहीं।' सोवियत रूस के विघटन के बाद की परिस्थिति में भी मार्क्सवाद पर उनका पूरा भरोसा है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब बहुत सारे लोग लगभग संशयग्रस्त थे तब भी वे अडिग हैं और कहते हैं - ÷ अब भी अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में' । इतना ही नहीं - ÷ मार्क्सवाद मेरे लिए नानार्थ सम्भावनाओं का टेक्स्ट है' कह कर नामवर जी एक बार फिर उत्तर आधुनिक विमर्शों के इस दौर में न केवल उसकी प्रासंगिकता बताते हैं बल्कि उसके अवधारणात्मक आधार का विस्तार करते हैं। उनके लिए मार्क्सवाद का विचार ÷ गाइड टू एक्शन', ÷ क्रिटीक आफ क्रिटिकल क्रिटीक' है - व्यवहारतः जिसमें ÷ स्थिति विशेष के अनुसार विचार करने की सर्जनात्मकता की अपार सम्भावनाएं हैं।

÷ काशी के नाम' पुस्तक में संग्रहीत पत्राों में नामवर जी की सार्वजनिक आलोचकीय छवि से इतर उनके व्यक्तित्व का एक नया रूप सामने आता है। इसमें वे बड़े भाई, पिता, परिवार के संरक्षक की भूमिका में हैं। ÷ जीवनानुभव के कोमल रेशों और मनुष्यता के महीन धागों से बुने और बंधे' ये पत्रा उनके दृश्य जीवन के मान मूल्यों के स्रोत का पता बताते हैं। सहसा विश्वास ही नहीं होता यह भी एक यथार्थ है हिन्दी की इस अपार मेधा का। यहां कभी किसी संदर्भ में उनका ही कहा हुआ एक वाक्य याद पड़ता है - ÷ आज के जमाने में यथार्थ ही इतना अविश्वनीय ढंग का होता है कि किम्वदंती मालूम होता है।' जैसे कठोर नारियल के भीतर कोमल गिरी। एक नामवर के भीतर और एक नामवर। जीवन के कठिन और दुर्निवार समस्याओं के बीच संघर्ष की निहाई पर ही दृष्टि में रोशनी आती है। इन्हीं संघर्षों ने नामवर जी को नामवर बनाया। सही मायनो में ये जीवनानुभव ही उनके उस्ताद हैं। ये पत्रा कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हार न मानने की उनके दुर्धर्ष जीवट एवं दृढ़ता का समुज्ज्वल साक्ष्य हैं। उदाहरण के लिए सागर विश्वविद्यालय से नौकरी छूटने के बाद का यह पत्राांश देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा है - ÷÷ घबराना मत, मेरा चित्त एकदम स्थिर है, चूंकि यहां से निपट कर आना है इसलिए थोड़ा समय लगेगा।'' निपट कर आने की ध्वनि में जो अंतर्भुक्त है वह है नैतिक दृढ़ता एवं साहस। जरा रुक कर इसी के साथ आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के एक पत्रा का हवाला लें। यह पत्रा ६.६.१९११ को रायकृष्ण दास को लिखा गया है। अंश इस प्रकार है - ÷÷ आपसे कोई बात छिपी नहीं है। अब जब इस झगड़े में पड़ गये हैं तब बिना इसे किसी परिणाम तक पहुंचाये किनारा खींचना अपने को उपहासास्पद बनाना है।'' आचार्य शुक्ल के बिना परिणाम के किनारा न खींचने और नामवर जी के निपट कर आने में मानसिक बनावट एवं ÷ टेम्परामेण्ट' के धरातल पर पर्याप्त समानता दिखाई देती है। यही नहीं बल्कि बारीकी से यदि ध्यान दें तो नामवर जी के आलोचनात्मक गद्य में मौजूद हंसमुख प्रवृत्ति, विट और सेंस आफ ह्यूमर आदि गुण आचार्य शुक्ल के गद्य के निकट जान पड़ते हैं। यदि परम्पराओं की बात छोड़ दें तो वक्तृत्व शैली, भाषा एवं तर्क के स्तर पर भी वे शुक्ल जी के करीब हैं। शुक्ल जी उनके लिए ÷ स्थिति पृथिव्यः इव मानदंडः' की तरह हैं। उन्होंने कहा है - ÷÷ यह सार्वजनिक रूप से मैं कहना चाहता हूं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास के बारे में कि यह लगभग मेरे उन ग्रंथों में से है, जिन्हें मैं नित्य पढ़ता हूं और आज से नहीं और यह मैं मानता हूं कि - ÷ आप बेबहरा है तो मोतकिद ए मीर नहीं' । हिन्दी साहित्य का कोई विद्यार्थी यदि आचार्य रामचंद्र शक्ल के इतिहास को नियमित रूप से नहीं पढ़ता है तो मैं उसे हिन्दी साहित्य का अधिकारी अध्येता नहीं मानता।''

किसी भी लेखक की डायरी एवं चिट्ठी उसके जीवन को जानने का सबसे विश्वसनीय प्राथमिक साक्ष्य होती है। यहां तक कि आत्मकथा एवं जीवनी से भी अधिक। नामवर जी की चिट्ठियां इसका प्रमाण हैं। निपट अंधेरे में भी दीप्त होती उनकी अडिग निर्णय क्षमता के साथ साथ जिन्दादिली , फाकामस्ती, पारिवारिक दायित्वबोध, साहित्यिक हलचल आदि विषय जिस तरह से इन पत्राों में अनुस्यूत हैं वह अप्रतिम रूप से समूचे युग की बनावट, बुनावट और ताप का पता देते हैं। यहां बुद्धि के साथ साथ दिल की धड़कनें भी साफ सुनी जा सकती हैं। निस्संदेह यहां ÷ यात्राा के लिए निकलती रही है बुद्धि पर हृदय को भी साथ लेकर।' विभिन्न पत्राों के कुछ अंश उद्धृत करने से अपने को रोकना मुश्किल हो रहा है -

( १) वर्षों की मनोकामना पूरी हुई। इसी तरह तुममें मेरी सारी आकांक्षा पूर्ण हो - मैं सुखी मरूंगा। इससे अधिक क्या कहूं? दिल भरा हुआ है, अब मैं का.वि.वि. के हिन्दी विभाग में आऊंगा... अपने भाई से मिलने।

( २) तुम आदमी हो कि सोंठ... तुम जाने किस गम में उदास बैठे हो... कुछ भी न कहा, न अहो, न अहा...।

( ३) मेरी दिलचस्पी इसमें है कि वे मूछें तुम्हारे उपन्यास में खड़ी मिलें...।

( ४) तुमसे ईर्ष्या तो क्या होगी गर्व अवश्य हुआ कि इस जोरदार लेख का लेखक मेरा भाई है, जी होता है माथे पर डिठौना लगा दूं।

( ५) जिन्दगी के जो भी दिन बचे रह गये हैं जी भर कर लिख डालना चाहता हूं वह जो, मित्राों के खयाल में, सिर्फ मैं ही लिख सकता हूं लेकिन जैसा कि शमशेर भाई कह गये हैं - ÷ होना भी कहां था वो जो हम समझे थे' - दुःख यही है, मोह भी यही है लेकिन... यह सख्त जान किसान बेटा इतनी जल्दी हथियार डालने वाला नहीं।

( ६) तुमने राष्ट्रवाणी के मुक्तिबोध विशेषांक में छोटे भाई शरत मुक्तिबोध का निबंध पढ़ा? पढ़ लेना। कौन जाने कभी तुम्हें भी लिखना हो। तब याद रखना कि गद्य ऐसा ही हो बल्कि इससे भी ज्यादा खुश्क ( काशीनाथ जी ने तब तक संस्मरणात्मक लेखन नहीं किया था)

इन पंक्तियों में जो भाव इशाअत हुए हैं वे दिली और जज्बाती हैं। और भी बहुत सी पंक्तियां हैं लेकिन उनसे इतर भी कई भावाभिव्यक्तियां हैं - मसलन एक जगह तो वत्सल एवं स्नेह जिस तरह से वारिद होता है उसे कोई शब्द देना कठिन है। पंक्तियां देखें - ÷÷ गुड्डी को बहुत बहुत प्यार। नीना को नी... नी... ना... ना...।'' प्यार एवं स्नेह का ऐसा रूप जिसमें बिना ÷ शब्द' के प्रयोग के - बिना कहे ही सब कुछ प्रकट होता है। नी... नी... ना... ना...। व्यंजना शक्ति के द्वारा अनकहा भी कैसे आलोकित हो रहा है। यह है चारुता। इन पत्राों में नसीहत भी है और जिन्दादिली भी है। ÷ सेन्स ऑफ ह्यूमर' का एक बेमिसाल उदाहरण देखें - ÷÷ परसाई ने तो यह सवाल पूछा था कि यदि आपको सपने में जैनेन्द्र दीख जायें तो इसका क्या अर्थ हुआ, मैं तुमसे पूछना चाहता हूं कि तुम यदि बनारस से भाग कर एरणाकुलम आओ और सहसा एक दोपहर को सामने सड़क पर मय सरो सामान रिक्शानशीन त्रिाभुवन जी दीख जाएं तो तुम्हें कैसा लगेगा? और यही नहीं बल्कि तुम्हें देखते ही उन्हें प्रेम भी उमड़ आये तो?'' यह है नामवर जी का अंदाजे बयां।

जीवन संघर्षों के दौरान हृदयंगम अनुभवों एवं बौद्धिक तर्कशीलता के दुर्लभ संयोग से बुनी और बंधी उनकी आलोचना हमारे लिए आदर्श है। अन्यथा आज की स्थिति तो यह है कि जो लिखता है वही समझता है। वागाडम्बर और अस्पष्टता की महामारी की चपेट में आयी आज की आलोचना के लिए नामवर जी सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं। बिल्कुल नये तक को वे तरजीह देते हैं। उनके अनुसार - ÷÷ उभरने वाले लेखक में कुछ भी अच्छा दिखाई पड़े तो उसे प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि उसको आगे और बढ़ना है। उभरते हुए अंकुर को वहीं मसल दंेंगे आप तो बड़ा भारी अपराध होगा।'' ऐसे लोग जिन्हें कोई जगत गति नहीं व्यापती या ÷ सींग तुड़ा कर बछड़ा बनने की कोशिश में हैं।' नामवर जी के इस कथन से प्रेरणा लेनी चाहिए।

इस वर्ष वे अस्सी वर्ष के हो रहे हैं। लेकिन चाल ढाल में वही चुस्ती , वक्तृत्व में वही धार, किसी भी विषय एवं साहित्यिक विमर्श के लिए वक्ता के रूप में आज भी पूरे हिन्दी समाज की पहली पसंद। अब जब ये पंक्तियां लिखी जा रही हैं तब बहुत सम्भव है कि वे कहीं किसी भाषण की तैयारी में हों या सीधे माइक पर या फिर माइक से उतर कर मंच पर आसीन हों और मुंह में पान की गिलौरियां दबाये श्रोताओं की थाह ले रहे हों। इतने लम्बे समय में आलोचना या साहित्य की अदालत में उन पर कई मुकदमे चले हैं लेकिन इस अदालत के जजों अर्थात पाठकों ने उन्हें सिर आंखों बिठाया है। निकानोर पार्श ने नेरूदा पर टिप्पणी करते हुए एक जगह लिखा है कि - ÷÷ नेरुदा को खारिज करने के दो तरीके हैं, एक तो उन्हें न पढ़ कर और दूसरा उन्हें दुर्भावना से पढ़ कर। मैंने दोनों आजमाये। मगर कोई भी कारगर न हुआ।'' हिन्दी में नामवर की स्थिति इससे अलग है। हो भी क्यों न आखिर ÷ जिनके परतौं से चिरागां हैं हजारो के दिमाग' क्या उसे खारिज किया जा सकता है? सच तो यह है कि हिन्दी की कोई भी आलोचना नामवर जी से बिना संवाद बनाये आगे बढ़ ही नहीं सकती।

 

बात बात में बात : ( संकलन) समीक्षा ठाकुर, प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : ३७५ रु.

काशी के नाम : नामवर सिंह संकलन सम्पादन : काशीनाथ सिंह, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : ४०० रु.

 


 

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