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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

समाज
यादों से रची यात्रा : पी.सी. जोशी

शताब्दी
दिनकर
की काव्य चेतना : पुनर्मूल्यांकन खगेन्द्र ठाकुर

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित

लेख
माधवराव सप्रे का महत्व मैनेजर पांडेय

मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह

कहानियां
तमाशे
में डूबा हुआ देश असगर वजाहत

जिद्दी रेडियो पंकज मित्र

फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा

स्वीट होम उमा शंकर चौधरी

विशेष
सागू
मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
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अंक/17 जनवरी/08

कुंवर नारायण की पांच कविताएं

÷जिन्दगी एक सफरनामा है' − यह एहसास शायद जीवन और साहित्य का सबसे पुराना, सबसे नया, सबसे स्थूल और सबसे काल्पनिक ÷रुपक' है : वह जितना ही तात्कालिक है उतना ही समयातीत। जितना यथार्थ उतना ही प्रतीकार्थी। होमर के ÷यूलिसिस' से ÷जेम्स जॉयस के यूलिसिस' तक आदमी के इस दुनिया में अचानक आने, अकारण भटकने और अकस्मात चले जाने की विभिन्न मनः स्थितियों के सबसे सटीक और मार्मिक अनुभवों को पहचान देता हुआ रूपक। इस अनिवार्य जीवन स्थिति के तमाम बिम्बों, प्रतीकों, गूंजों और अनुगूंजों से विश्व साहित्य भरा पड़ा है। उक्त आशय की पृष्ठभूमि में लिखी गयी पांच कविताएं यहां दी जा रही हैं जिनका प्रत्यक्ष और परोक्ष संदर्भ आज की कई परिस्थितियों और मनःस्थितियों से जुड़ता है।

ऐतिहासिक फासले
अच्छी तरह याद है
तब तेरह दिन लगे थे ट्रेन से
साइबेरिया के मैदानों को पार करके
मास्को से बाइजिंग तक पहुंचने में।

अब केवल सात दिन लगते हैं
उसी फासले को तय करने में −
हवाई जहाज से सात घंटे भी नहीं लगते।

पुराने जमानों में बरसों लगते थे
उसी दूरी को तय करने में।

दूरियों का भूगोल नहीं
उनका समय बदलता है।

कितना ऐतिहासिक लगता है आज
तुमसे उस दिन मिलना।

एक चीनी कविमित्र द्वारा बनाये
अपने एक रेखाचित्र को सोचते हुए

यह मेरे एक चीनी कविमित्र का
झटपट बनाया हुआ
रेखाचित्र है

मुझे नहीं मालुम था कि मैं
रेखांकित किया जा रहा हूं

मैं कुछ सुन रहा था
कुछ देख रहा था
कुछ सोच रहा था

उसी समय में
रेखाओं के माध्यम से
मुझे भी कोई
देख सुन और सोच रहा था।

रेखाओं में एक कौतुक है
जिससे एक कागजी व्योम खेल रहा है

उसमें कल्पना का रंग भरते ही
चित्र बदल जाता है
किसी अनाम यात्री की
ऊबड़ खाबड़ यात्राओं में।

शायद मैं विभिन्न देशों को जोड़ने वाले
किसी ÷रेशम मार्ग' पर भटक रहा था।

अगली यात्रा
÷÷अभी अभी आया हूं दुनिया से
थका मांदा
अपने हिस्से की पूरी सजा काट कर...''
स्वर्ग की सीढ़ियां चढ़ते हुए
जिज्ञासु ने पूछा − ÷÷मेरी याचिकाओं में तो
नरक से सीधे मुक्तिधाम की याचना थी,
फिर बीच में यह स्वर्ग वर्ग कैसा?''

स्वागत में खड़ी परिचारिका
मुस्करा कर उसे
एक सुसज्जित विश्राम कक्ष में ले गयी,
नियमित सेवा सत्कार पूरा किया,
फिर उस पर अपनी कम्पनी का
÷संतुष्ट ग्राहक' वाला मशहूर ठप्पा
लगाते हुए बोली − ÷÷आपके लिए पुष्पक विमान
बस अभी आता ही होगा।''

कुछ ही देर बाद आकाशवाणी हुई −
÷÷मुक्तिधाम के यात्रिायों से निवेदन है
कि अगली यात्रा के लिए
वे अपने विमान में स्थान ग्रहण करें।''

भीतर का दृश्य शांत और सुखद था।
अपने स्थान पर अपने को
सहेज कर बांधते हुए
सामने के आलोकित पर्दे पर
यात्री ने पढ़ा −
÷÷कृपया अब विस्फोट की प्रतीक्षा करें।''

प्रस्थान के बाद
दीवार पर टंगी घड़ी
कहती − ÷÷उठो अब वक्त आ गया।''

कोने में खड़ी छड़ी
कहती − ÷÷चलो अब, बहुत दूर जाना है।''

पैताने रखे जूते पांव छूते
÷÷पहन लो हमें रास्ता ऊबड़ खाबड़ है।''

सन्नाटा कहता − ÷÷घबराओ मत
मैं तुम्हारे साथ हूं।''

यादें कहतीं −÷÷भूल जाओ हमें अब
हमारा कोई ठिकाना नहीं।''

सिरहाने खड़ा अंधेरे का लबादा
कहता − ÷÷ओढ़ लो मुझे
बाहर बर्फ पड़ रही
और हमें मुंहअंधेरे ही निकल जाना है...''

एक बीमार
बिस्तर से उठे बिना ही
घर से बाहर चला जाता।

बाकी बची दुनिया
उसके बाद का आयोजन है।

कोलम्बस का जहाज
बार बार लौटता है
कोलम्बस का जहाज
खोज कर एक नयी दुनिया,
नयी नयी माल मंडियां,
हवा में झूमते मस्तूल
लहराती झंडियां।

बाजारों में दूर ही से
कुछ चमकता तो है −
हो सकता है सोना
हो सकती है पालिश
हो सकता है हीरा
हो सकता है कांच...
जरूरी है पक्की जांच।

जरूरी है सावधानी
पृथ्वी पर लौटा है अभी अभी
अंतरिक्ष यान
खोज कर एक ऐसी दुनिया
जिसमें न जीवन है − न हवा − न पानी −

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