प्रख्यात लेखिका ममता कालिया की इस गद्य श्रृंखला ने अपनी हर अगली किस्त में ज्यादा पाठक, सम्मान और लोकप्रियता अर्जित की। निश्चय ही ÷कितने शहरों में कितनी बार' ने हिन्दी गद्य को समृद्धि, गरिमा और ऊंचाई दी है। प्रस्तुत है समापन किस्त।
शहर कब किसके हुए हैं, शहरयार तक के नहीं। तभी न उनके दिल से निकली थी यह नज्म ÷इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है?' उन्हें क्या पता हर शहर में हर शख्स परेशान ही रहता आया है। कितने वक्त में कोई शहर हमारा बन पाता है। हम अपने बंजारे मन से पूछते हैं। यह मन तो मानों उतावला हुआ पड़ा है कि कब हम इस पर अपनी गठरी मोटरी लादें और यह दौड़ पड़े। लेकिन हम मन को अपनी मजबूरियां समझाते रहे, खुक्ख पड़ी बैंक की पासबुक दिखाते रहे और धीरज धरवाते रहे। लेखन जगत की च्वूइंगगम और चॉकलेट उसे चटाते रहे। आज फलां जगह की अध्यक्षता, फलां जगह की मुख्य अतिथिगिरी। अरे लगा लो दिल। ऐसी गर्मियां और कहां मिलेंगी! लेकिन तीन घटनाएं ऐसी हो गयीं कि मूढ़ से मूढ़ मनुष्य भी डोल जाता। अपना लोटा डोर समेट कर बोल पड़ता, ÷रहना नहिं देस बिराना है।,
1988 की बात है। जैसे इलाहाबाद में हर चार साल में दंगे भड़कते थे वैसे या उससे ज्यादा मेरी मां की तबियत खराब हुआ करती। अभी वे चोपला पर चाट खा रही हैं, अभी खबर आती वे तो मोहननगर के नरेन्द्र मोहन हॉस्पिटल के सघन चिकित्सा कक्ष में दाखिल हैं। उनकी बीमारियां हिन्दी फिल्मों की नाटकीयता लिये आतीं और बांग्ला फिल्मों की मंथरता लिये विदा होतीं। इलाहाबाद में सन् 1988 में साम्प्रदायिक दंगे उबाल पर थे। गाजियाबाद से खबर आयी मां बीमार है। संक्षिप्त सी सूचना थी, किसी तीसरे आदमी के मुंह से दी गयी। पर मैं कैसे इसे झूठ मानती जबकि मेरा कलेजा हर समय कलपता था अपने एकाकी मां बाप के लिए। परिवार में तय हुआ कि बिना एक भी दिन गंवाये, ममता को आज ही चले जाना चाहिए। उस वक्त शहर से निकलना उतना ही जटिल था जितना शहर में घुसना। दिन का कर्फ्यू, पी.ए.सी. की हथियारबंद गश्त, स्टेशन जाने को न वाहन न साधन। ऐसे में मैं घर की खिड़की से झांक रही थी कि बगल के पड़ोसी ने पूछा, ÷÷क्या बात है?''
÷÷स्टेशन जाना है, कोई पुलिसवाला दिखे तो कोतवाली से पास बनवा लूं।'' मैंने बताया।
अनीस अहमद ने सुना, कुछ कहा नहीं। थोड़ी देर में उनकी खिड़की से एक कैंची वाला हाथ बाहर बढ़ा जिसने बाहर के खम्भे से हमारे टेलिफोन का तार काट दिया। मैं भाग कर फोन के पास गयी। उठा कर देखा, ठंडा और ठप्प पड़ा था। संचार का एकमात्रा साधन संकट काल में छिन गया। रानीमंडी में अपनी अल्पसंख्यक स्थिति पर पहली बार चिन्ता करनी पड़ी। मुझे लगा जैसे यह सिर्फ टेलिफोन का तार नहीं, परस्पर विश्वास और सद्भाव का तार किसी ने काट डाला है। यह शहर में फैले तनाव का परिचायक था। दंगे के दिनों में रानीमंडी के बाशिन्दे समझते थे कि सब हिन्दू पुलिस के मुखबिर हैं। मैंने रवि से कहा, ÷÷ऐसे हालात में कैसे चली जाऊं, तुम बच्चों और झाई जी को अकेले संभाल लोगे?'' रवि ने कहा, ÷÷तुम रुक भी तो नहीं सकतीं, यहां की फिक्र मेरे ऊपर छोड़ो, दंगे थम भी सकते हैं।'' गली गली लुकते छिपते हम किसी तरह कोतवाली पहुंचे, वहां से पास बनवाया और पुलिस की ही जीप में मैं स्टेशन गयी।
उन वर्षों में गाजियाबाद जाना बेचैनी का सफर होता। घर पर तो बस ताला लटका रहता, माता पिता मोहन नगर के अस्पताल में मिलते। लाल कम्बल ओढ़े पड़ी हुई ममी, कुर्सी पर अखबार लेकर बैठे हुए पापा। हालत यह कि जिसकी आंखें बंद हैं वह सो नहीं रहा, कोमा में पड़ा है। जिसके हाथ में अखबार है वह पढ़ नहीं रहा, मरीज की कलाई पर लगी ड्रिप को बूंद बूंद ताक रहा है। रेल की धूल और ऑटोरिक्शे के धक्के, आंखों की नींद और आंसू सबको पीछे धकेल मैं धीरे से अटैची कमरे की दीवार से टिकाती और कहती, ÷÷पापा मैं आ गयी।''
÷÷अरे मुन्नी आ गयी, बहुत जानो। इंदु देख तेरी बेटी आयी है आंख खोल।'' पापा टूटने लगते, ÷÷तीन दिन से ऐसे ही पड़ी है तेरी मां, न हिले, न डुले, न बोले। डॉक्टर कुछ नहीं बताते, कहते हैं अग्रवाल साब चालीस परसेण्ट बचने का चांस है। बताओ उनका चालीस परसेण्ट मेरे किस काम का। बाकी साठ परसेण्ट किससे मांगू?''
ऐसे क्षणों में मुझे बेटी और बेटा, नर्स और वॉर्डबॉय, दोस्त और सलाहकार, सब बन जाना होता। निकल जाता मेरे अंदर से, कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद, एक अन्य अवतार हो जाता मेरा वजूद ᄉ अस्पताल के गलियारों में डॉक्टरों के पीछे भागता, दवा की दुकान से दवाइयां खरीदता, पैथोलोजी लैब से रिपोर्ट लाता, एक्सरे रूम से मां की स्टे्रचर ट्रॉली के साथ साथ लपकता। पापा कोमा विषय पर गहन सैद्धांतिक अध्ययन में लिप्त हो जाते। वे अपनी जानकारी से डॉक्टरों को इतना चकरा डालते कि डॉक्टर उनसे गुजारिश करते, ÷÷प्लीज अग्रवाल साहब हमें इलाज करने दीजिये।''
मां का मस्तिष्क आघात ठीक होता, कभी चालीस दिन में, कभी चौदह दिन में। यकायक वे एक दिन होश में आ जातीं। पुनर्जन्म की तरह वे अपनी दुनिया में लौटतीं, अपनी नयी दिनचर्या में नयी नयी दवाओं की बंदनवार बैग में रख कर। कमजोरी के मारे वे फिर नये सिरे से चलना सीखतीं, उन्हें हर चीज का स्वाद नया लगता, उनके अंदर बच्चों जैसी जिज्ञासा और विस्मय जन्म लेने लगते, दरअसल उस समय उन्हें सेवा सुश्रूषा की बेहद जरूरत होती पर उनको घर पहुंचाते ही मेरा मनपाखी छटपटाने लगता अपने शहर, अपने घर द्वार लौटने को। मैं सोचती काश किताबों की तरह मेरे भी दो संस्करण हो जाते। एक इस शहर में रह लेता, एक उस शहर में।
यह कितनी विचित्रा सचाई है कि सन् 1988 से सन् 2003 के बीच हुई तो होंगी कई अच्छी घटनाएं भी लेकिन वे हमें शहर में रोक रखने में कोई निर्णायक भूमिका अदा नहीं कर पायीं।
जैसे गर्मियों के एक रविवार की सुबह मेरी सहेलियां अनिता गोपेश और शशि शर्मा मुझे खींच ले गयीं रसूलाबाद के गंगा तट पर कि आज लहरों पर लेट कर गप्प मारेंगे। हम नाव से बीच धार पहुंचे। अनीता को तैरना आता था, हम दोनों को डूबना। इसीलिए मैं और शशि तो घुटने घुटने पानी में आराम से बैठ गयीं और हाथ पैर फैला कर तैरने का नाट्य करती रहीं। इस घाट पर नदी ÷तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल' कतई नहीं थी। जल में तरंग भी थी और तीव्रता भी। जल शीतल इतना कि लगे कोई देह में बर्फ के इंजेक्शन लगा रहा है। अनीता तैरने को मचल रही थी। चपल मछली सी वह दूर चली जाती और जल प्रवाह के साथ साथ तैरती हुई वापस आती। नदी का वेग उसे दूर खींचता, बतरस का चाव उसे लौटा लाता। हम तीनों साथ साथ सुमित्राा नंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन और कैलाश गौतम को याद करते रहे। तीनों की धड़कनों में प्रयाग की गंगा रही और बही थी। हमने गंगा का न आचमन किया न सूर्य नमस्कार, न प्राणायाम किया न अभ्यर्थना, हम एक दूसरे को किस्से और कविता सुनाते रहे। बचपन में कभी पापा से सुनी पंक्तियां याद आती गयीं ᄉ ÷हर हर हर हर हहर हहर / ऊंची आती लहर लहर ऐसी लगती दूरी पर जैसी मोती की झालर।' पंत जी की ÷नौका विहार' तो हम तीनों को याद थी। लेकिन सबसे ज्यादा जुबान पर चढ़ी हुई थी कैलाश गौतम की कविता, अमौसा का मेला :
÷गुलब्बन क दुलहिन चलै धीरे धीरे / भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे।' एक कहती
÷सजल देह जइसे हौ गौने की डोली / हंसी सो बताशा शहद हउवै बोली।' दूसरी कहती।
÷अ देखेलीं ठोकर बचावै ली धक्का / मनैमन छोहारा मनैमन मुनक्का।' हम सब बोलतीं।
धूप सिर पर चढ़ आयी थी। नाव वाले ने कहा, दुई घंटे से ऊपर होबे करी। हम सब बेमन से उठे कि मैं चिहुंक पड़ी, ÷÷अरे मेरी साड़ी कहां गयी?'' शशि और अनीता हक्कीबक्की एक बार मुझे देखें, एक बार पानी के वेग को। गंगा की लहरों में कब साड़ी मेरे बदन से अलग होकर बह गयी थी मुझे पता ही नहीं चला। नाव वाले ने मुश्किल समझ कर तसल्ली दी, ÷÷जाये दें, पानी का वेग देखें, साड़ी तो बनारस पहुंच गयी होगी।''
मैं झेंपती रही, अनिता और शशि हंसते हंसते लोटपोट होती रहीं। वे सुनाने लगीं, ÷÷कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ / जिससे उथल पुथल मच जाये / एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये।'
अनिता ने कहा, ÷÷जब आप कह रही थीं कि पानी हमें काट कर आगे बह रहा है, वह आपका चीरहरण कर रहा था।'' नाव में रखे सूखे कपड़े पहन लिये गये पर वह साड़ी गंगा को समर्पित हो गयी। इस अनुभव की स्मृति हमें जब तब गुदगुदा जाती और हम हंसने लगते।
शशि, शादी के बाद लखनऊ चली गयी। मैं और अनिता कभी कभी मिलते। हमारे दो मकसद होते। कुछ बहुत अच्छा पढ़ लेते तो उसे बांटने की इच्छा होती या इकट्ठे सिनेमा देखने की। सिनेमा के लिए रवि को राजी करना डॉक्टर के यहां ले जाने जैसा मुश्किल काम था। अगर कभी साथ चले भी गये तो इनकी टीका टिप्पणी ने रसभंग कर डाला।
ᄉ यह घिसी पिटी कहानी देखने में क्या तुक है।
ᄉ यह फिल्म हमने पहले भी कई बार देखी है।
ᄉ मैं बोर हो रहा हूं।
दो चार बार ऐसे प्रयोगों के बाद यह स्पष्ट हो गया कि रवि के लिए सिनेमा संत्राास के सिवा कुछ नहीं है। अनिता के साथ बहुत फिल्में देखीं। काम के दबाव को उतार फेंकने का यह हमारा तरीका था। हमारा रसायन भी एक जैसा था। चुप बैठे रह कर भी हमारी रुचियों की जुगलबंदी बनी रहती। बाहर निकल कर कभी हम चाट और चाय की एय्याशी के बाद घर जाते तो कभी सीधे वापस।
दशहरे के दिनों में इलाहाबाद में रात भर मेले का रेला रहता है। सड़क के किनारे रंगीन रोशनी की झालर, खोमचेवाले, झांकियों के रथ, भीड़, बच्चे, रिक्शे, स्कूटर और कारों का एक सिलसिला चला करता है। हम दोनों ने मुट्ठीगंज में फिल्म देखी और गौतम टॉकीज के बाहर से ही वापसी का रिक्शा किया। हमारी बातें भी चल रही थीं और रिक्शा भी चल रहा था। भीड़ भरे बाजार को पार कर रिक्शा हिन्दू हॉस्टल के फाटक पर पहुंचा जहां से कटरे का रास्ता शुरू होता है। यकायक रिक्शे की चेन उतर गयी। वहां घुप्प अंधेरा था। रिक्शेवाले ने अंदाजे से चेन ठीक की और रिक्शे को पैदल चलाने लगा। अनिता ने कहा, ÷÷जल्दी चलो, हमें देर हो रही है।'' तभी कहीं से एक मोटरबाइक पर दो लड़के आये। पीछे की सीट वाले लड़के ने मेरी गोद में रखा मेरा पर्स बड़ी सफाई से छीना और उसकी मोटरबाइक दन्नाती हुई आगे भाग गयी। ÷अरे मेरा पर्स कहां गया।' मेरे चिल्लाने से निरपेक्ष रिक्शेवाला वैसे ही रिक्शा चलाता रहा। अनिता ने अपना शक जाहिर किया, ÷÷इस जगह अक्सर लोगों के पर्स लूटे जाते हैं, रिक्शेवाले जब तुम्हें पता था तुमने यहां रिक्शा क्यों रोका?''
रिक्शेवाले ने कहा, ÷÷हम तो नये आये हैं, हमें क्या पता कहां क्या होता है?''
हमने तय किया कि पुलिस थाने में रिपोर्ट की जाय।
वहां का अनुभव और भी निराला था। हमारी बात सुन कर सबसे पहले एक सिपाही ने रिक्शेवाले को पीट कर उसकी कुल कमाई छीन ली और उसे एक तरफ बिठा दिया। फिर उसने हमें दीवान के सामने प्रस्तुत किया जो वायरलैस पर मेले की गश्त का हाल ले रहा था। कुछ देर बाद वह हमसे मुखातिब हुआ। उसने दो बातें कहीं, ÷÷पर्स पकड़ कर नहीं बैठतीं आप लोग? पर्स में कितने रुपये थे?'' दोनों ही बातों के उत्तर से उसे संतोष नहीं हुआ। यह बताने पर कि पर्स में साढ़े सात सौ रुपये थे, उसने बड़ी खिल्ली उड़ायी ÷÷और सिर्फ साढ़े सात सौ के लिये आप थाने चली आयीं।''
इसके बाद एक नौजवान सब इंस्पेक्टर आया। उसने हमारी लिखी रिपोर्ट दीवान को सौंपी और अनिता से कहा, ÷÷आप चल कर मौका वारदात दिखायें।''
सब इंस्पेक्टर अगले हफ्ते से रोज अनिता के घर दो तीन पर्स लेकर पहुंचने लगा, ÷÷जो आपको जंचे, रख लीजिये।''
पर्स के साथ घर की चाभियों का गुच्छा, टेलिफोन डायरी, पार्कर पेन और रेवलॉन लिपस्टिक की हानि में सबसे ज्यादा परेशानी चाभियों की हुई। सभी अलमारियों और दरवाजों के ताले तुड़वाने और बदलवाने पड़े।
इस प्रसंग में मेरी बेवकूफी तो अपनी जगह थी ही मेरी लापरवाही भी जाहिर थी। फिर भी अपनी नागरिक चेतना को धक्का लगा। जब अखबारों में छिनैती और डकैती की खबरें पढ़ती थी हमेशा यही सोचती कि ये औरों के संग होने वाली दुश्वारियां हैं। मन में खुशफहमी रहती, बच्चा बच्चा तो यहां जाना पहचाना है और हम यहां के खास अपने हैं। अपनों को कौन लूटता है। लुटते तो बेचारे परदेसी हैं। खैर धारणा ध्वस्त हुई, तबियत जरा पस्त हुई।
शहर के लिये किसी का रहना जरूरी नहीं होता। ये तो लोग होते हैं जो उससे नाता जोड़ते हैं। कुछ लोग तो अपने नाम के साथ उसे नत्थी कर लेते हैं जैसे वसीम बरेलवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी। कुछ लोग नत्थी नहीं करते फिर भी उनके साथ शहर की शोहरत चिपक जाती है जैसे मजाज के साथ लखनऊ, गालिब के साथ दिल्ली, राही मासूम रजा के साथ अलीगढ़, कमलेश्वर के साथ मैनपुरी, राजेन्द्र यादव के साथ आगरा। रहे हैं ये सब और शहरों में भी लेकिन वह एक शहर इनका अतापता बन गया। शहर वालों को भी इनके किस्से कहानी सुनाने में मजा आने लगा; शहर के कुछ अड्डे इनके नाम से सरनाम हुए, साल दर साल इनके हवाले से न जाने कितने सच झूठ तमाम हुए।
हमने चाहा था इलाहाबाद हमें चंदन पानी, मोती धागा, सोना सुहागा जैसा अपना ले, आखिर हम तीस साल यहां रह लिये, अट्ठाईस साल नौकरी कर ली, यहां की हवाएं, सर्दी गर्मी झेल ली। अगर कोई अतिथि बाहर से आया तो हमने मेजबान की तरह उसकी अगवानी की; शहर की खासियत और खूबसूरती का खुले दिल से बखान किया।
एक शाम विश्वविद्यालय के खुले मंच पर फैज, फिराक और महादेवी वर्मा को इकट्ठे देखा और सुना। तीनों ही साहित्यकार लेकिन हर एक का अंदाजेबयां और। फैज की शान में रात को विभूति राय के घर पर दावत हुई। जब वे कमरे में दाखिल हुए उन्हीं की कविताओं का हमारा रेकार्ड स्टीरियो पर बज रहा था। वे पहले हैरान हुए, फिर खुश हुए और एल.पी. के कवर पर उर्दू में लिख दिया ᄉ ममता को, मुहब्बत के साथ। इस मौके पर हिन्दी उर्दू लेखकों का भाईचारा भी नजर आता रहा। सभी युवतर लिखने वाले जश्न में आये हुए थे। डॉ. अकील रिजवी के नेतृत्व में अली अहमद फातमी, असरार गांधी, काजमी जी, ताहिरा परवीन, आतिया निशात, गजाल जैगम, शाइस्ता फाखरी थे तो शम्सुर्रहमान फारुखी जैसे पायेदार और गम्भीर आलोचक की भी उस शाम की सभा में शिरकत थी।
हिन्दी उर्दू अदब के इस तरह के संगम इलाहाबाद की खासियत तब से रहे जब प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें यहां होती थीं। जियाउल हक और प्रकाश चंद्र गुप्त इन बैठकों के शक्तिपीठ थे और कोई भी रचनाकार तब तक मुकम्मल नहीं माना जाता जब तक दोनों जुबानों से उसे सनद न मिले। पता नहीं तब भी हिन्दी वालों को क्या मेरी तरह यह अफसोस हुआ होगा कि उन्होंने उर्दू पढ़नी लिखनी क्यों नहीं सीखी। कितना अजीब है कि सभी उर्दूभाषी अदीब हिन्दी जानते हैं लेकिन सभी हिन्दी भाषी उर्दू की मामूली जानकारी भी नहीं रखते। एक अकेले रघुपति सहाय ÷फिराक' हिन्दी भाषी अदीबों की यह कमी पूरी करने के लिए नाकाफी थे।
फिराक साब के क्या कहने। उन्हें कोई न रोक सकता था न टोक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लॉन पर उनके ही सम्मान में पार्टी का आयोजन था। साहित्य अकादमी ने फिराक को महत्तर सदस्यता से अलंकृत किया था, इसी उपलक्ष्य में यह उत्सव था। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल डॉ. चेन्ना रेड्डी भी विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। फिराक साब काफी तरंग में थे हालांकि उनके हाथ में जाम नहीं था। उन्हें लतीफे सुनाने की धुन चढ़ी तो उनकी जुबान से ऐसे ऐसे लतीफे निकले कि लोग मुंह फेर कर हंसने लगे। फिराक साब को लगा चेन्ना रेड्डी सुन नहीं रहे हैं उन्होंने जोर से कहा, ÷÷इधर आओ चेन्ना रेड्डी यह लतीफा तुम्हारे नाम।'' जो कुछ उन्होंने सुनाया उसका ताल्लुक समलैंगिकता के किसी पहलू से था। चेन्ना रेड्डी का चेहरा पहले उतरा फिर तन गया। फिराक साब को कोई फर्क नहीं पड़ा। वे अपने पास बैठे प्रोफेसर स्कंदगुप्त को बताने लगे कि कई लोगों में सेंस ऑफ ह्यूमर (विनोदप्रियता) नहीं होती, खासकर हिन्दी वालों में।
फिराक साब की विनोदप्रियता और मुंहफटपन के कई किस्से अनिता और शशि को जुबानी याद थे। दोनों उनसे मिलने जाती रहती थीं। अनिता ने ही बताया कि एक बार फिराक साब के घर चोर घुस आया। फिराक साब और अनिता दोनों बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकानों में रहते थे। ऐसा लगता था उन मकानों की बनावट चोरों की सहूलियत के लिए ही हुई थी, वहां आयेदिन चोरियां होतीं। फिराक साब को रात में ठीक से नींद नहीं आती थी। आहट से वे जाग गये। चोर इस जगार के लिए तैयार नहीं था। उसने अपने साफे में से चाकू निकाल कर फिराक के आगे घुमाया। फिराक बोले, ÷÷तुम चोरी करने आये हो या कत्ल करने। पहले मेरी बात सुन लो।''
चोर ने कहा, ÷÷फालतू बात नहीं, माल कहां रखा है?''
फिराक बोले, ÷÷पहले चक्कू तो हटाओ, तभी तो बताऊंगा।''
फिर उन्होंने अपने नौकर पन्ना को आवाज दी, ÷÷अरे भई पन्ना उठो, देखो मेहमान आये हैं, चाय वाय बनाओ।''
पन्ना नींद में बड़बड़ाता हुआ उठा, ÷÷ये न सोते हैं न सोने देते हैं।''
चोर अब तक काफी शर्मिन्दा हो चुका था। घर में एक की जगह दो आदमियों को देख उसका हौसला भी पस्त हो गया। वह जाने को हुआ तो फिराक ने कहा, ÷÷दिन निकल जाय तब जाना, आधी रात में कहां हलाकान होगे।'' चोर को चाय पिलायी गयी। फिराक जायजा लेने लगे कि इस काम में कितनी कमाई हो जाती है, बाल बच्चों का गुजारा होता है कि नहीं। पुलिस कितना हिस्सा लेती है और अब तक कै बार पकड़े गये।
चोर आया था पिछवाड़े से लेकिन फिराक साहब ने उसे सामने के दरवाजे से रवाना किया यह कहते हुए, ÷÷अब जान पहचान हो गयी है भई आते जाते रहा करो।''
महादेवी वर्मा राष्ट्रीय चेतना की बुद्धिजीवी थीं। वे शिक्षा जगत से भी गहरे जुड़ी हुई थीं। उनके नाम का गजब दबदबा था। उनके बारे में इलाहाबाद जैसे जालिम शहर में कोई किस्सा कहानी प्रचलित नहीं थी। मैं प्रायः उन्हें मंच पर देखती। उनके मानवीय पक्ष से मेरा सम्पर्क बहुत बाद में हुआ। अक्सर दक्षिण भारत या महाराष्ट्र के शोध छात्रा मेरे घर आकर कहते, ÷÷हमें इलाहाबाद में तीन चीजें देखनी हैं, संगम, महादेवी वर्मा और ममता कालिया।'' मैं कहती ÷÷भई दो काम तो निहायत आसान हैं, रह गयी तीसरी जगह तो संभल कर जाना। पहले फोन से पूछ लो, तब जाना।''
महादेवी जी के व्याख्यान उनके आख्यान जैसे ही होते थे। हृदय के उद्गार। जब जब उन्हें सुना, रोमांच हो आया। अपनी खरखरी आवाज में वे ऐसी खरी खरी सुनातीं कि श्रोता का मानस झनझना उठता। वैसे उनके शब्दों में मात्रा झंकार ही नहीं टंकार भी होती थी।
मैंने उनसे काफी देर में संवाद किया। कानपुर विश्वविद्यालय के डॉ. गुप्ता के साथ मैं उनके घर गयी। उन्होंने हंसमुख मुद्रा में स्वागत किया। वे हमें अपने हाथ से काट कर सेब और नाशपाती खिलाती रहीं। उन्होंने डॉ. गुप्ता से कहा, ÷÷भाई विद्याभूषण जी से कई बार बात हुई। उन्होंने दिल्ली में पूछा ममता तो आपके पास आती होंगी। मैंने बताया आपकी बेटी तो कभी मिलने नहीं आयी।''
मुझे बड़ा संकोच हुआ। अगले ही क्षण महादेवी जी ने मेरा संकोच दूर कर दिया। हंसते हुए वे बोलीं, ÷÷गुप्ता जी, इनकी संस्था सेवासदन से अब मेरा कोई लेना देना नहीं है। वास्तव में हमारी और इनकी संस्थायें भगिनी हैं लेकिन सौतेली भगिनी हैं।'' मैं उनकी स्पष्टवादिता से बहुत प्रभावित हुई। उन्होंने मुझे संकट से उबरने का मौका दिया। इतिहास बताता है कि सेवासदन कॉलेज की स्थापना में महादेवी जी का योगदान था। उन्होंने सपना देखा था कि सेवासदन ऐसी शिक्षा संस्था हो जिसमें वे लड़कियां पढ़ सकें जो पहले किसी कारणवश नहीं पढ़ पायी। तब यह आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था और आम तौर पर इसमें बाल विधवाएं, परित्यक्ताएं और बड़ी उम्र की अविवाहित लड़कियां पढ़ा करतीं। बाद में सैद्धांतिक मतभेद के चलते महादेवी जी सेवासदन के प्रबंधतंत्रा से अलग हट गयीं। उन्होंने नयी संस्था ÷प्रयाग महिला विद्यापीठ' गठित कर ली। महादेवी जी के अंदर एक जिद थी। वे मानती थीं कि ÷भारतीय नारी जिस दिन अपने पूरे प्राण प्रवेग से जाग सके उस दिन उसकी गति रोकना किसी के लिए सम्भव नहीं।' इसी के तहत उन्होंने ÷श्रृंखला की कड़ियां' के निबंध लिखे। वे स्त्राी समाज को जगाना, झकझोरना, उकसाना चाहती थीं। महादेवी जी हमारे समय की एक प्रखर बुद्धिजीवी और जुझारू व्याख्याता के रूप में सामने आती हैं जिन्हें उनके पद्य की अपेक्षा गद्य के लिए ज्यादा याद रखा जाएगा। कविता की सीमाएं टटोल कर ही उन्होंने गद्य का विकल्प स्वीकार किया था। उन्होंने अपने निबंधों के द्वारा स्त्रिायों में अधिकार चेतना का आह्वान किया। मुझे अफसोस होता है कि मैंने उनके सान्निध्य में और अधिक समय क्यों नहीं बिताया। जीवन की दौड़ भाग अपनी जगह थी, कॉलेज की आपाधापी चलती थी पर यह मेरा ही बचकाना बागी मन था जो हर स्थापित व्यक्ति से कतरा कर निकलना पसंद करता।
ग्यारह सितम्बर 1987 को महादेवी जी का निधन हुआ। 12 सितम्बर को खबर फैलते ही कॉलेज की सब लड़कियों ने तय किया कि वे महादेवी जी के अंतिम दर्शन करने अशोक नगर, उनके घर पर जाएंगी। हम सब जब वहां पहुंचीं तो शवयात्राा रसूलाबाद के लिये प्रस्थान कर चुकी थी। उन दिनों रसूलाबाद घाट तक जाने के लिए वाहन के नाम पर सिर्फ बड़े टैम्पो मिला करते थे। हम सभी शिक्षक, विद्यार्थी टैम्पो में वहां गये। घाट पर इतना विशाल जनसैलाब था मानो पूरा शहर आज रसूलाबाद पहुंचा हो। कॉलेज की कई लड़कियां रो रही थीं। एक लेखक को इससे बड़ी शोक संतप्त भीड़ ने पहले कभी ऐसी श्रद्धांजलि दी हो, याद नहीं पड़ता।
इलाहाबाद की खासियत ही समझें कि यह शहर अपने सितारे के टूटने के बाद ही स्वीकार करता है कि हां वह सितारा था। उसके जीते जी, शहर ÷किन्तु परंतु' की शब्दावली में उसके पैर के नीचे की मिट्टी खोदता रहता है। यही वजह है कि इलाहाबाद में रहते आये रचनाकार कभी रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर पाये। बंगाल अपने नायक निर्मित करता है। उत्तर प्रदेश अपने नायक खंडित करता है। सूर्यकांत त्रिापाठी निराला का योगदान रवि बाबू से कतई कम नहीं था पर उनके जीवन काल और रचना वर्षों में शहर ने उन्हें उनके हाल बेहाल पर छोड़ दिया। मुझे महसूस होता है यदि महाप्राण निराला को नगर से सराहना और नगरवासियों से सहयोग मिलता तो वे एक प्रसन्न जीवन जीते और परितृप्त मृत्यु को प्राप्त होते। यह वह जगह है जहां लेखक पुरस्कार से नहीं, तिरस्कार से मरता रहाहै।
हिन्दी के लेखक की स्थिति का साम्य शायद किसान की वर्तमान दशा से सटीक बैठता है। जैसे किसान अपना खून पसीना एक कर खेत में लहलहाती फसल तैयार करता है उसी तरह लेखक महीनों बल्कि वर्षों की मेहनत से एक रचना अथवा पुस्तक पूरी करता है। दोनों ही मुंहअंधेरे उठते हैं। एक कुदाल फावड़ा लेकर खेत पर जाता है, दूसरा कलम कागज लेकर मेज पर जुट जाता है। खेती का मूल्य किसान की मेहनत, उम्मीद और लागत तीनों से कम आंका जाता है। एक पुस्तक पूरी लिख लेने में लेखक की मेहनत का भी मूल्यांकन कुछ इसी प्रकार होता है। जीवन के सभी मनोरंजन से स्वयं को काट कर, विचारों को केन्द्रीभूत कर, आंखों में आइड्रॉप टपका कर, एक नन्हीं कलम या कम्प्यूटर के सहारे रात रात जाग कर लेखक जो लिखता है, उसके पास कोई आश्वासन नहीं होता यह किताब छप कर बाजार में कब आयेगी या आयेगी भी या नहीं। प्रकाशक की खांटी शब्दावली में किताबें बिकती ही नहीं हैं। ऑटोमेशन के युग में वह किताब का पहला संस्करण ही पुनर्मुद्रित कर बेचता रहता है, उसे द्वितीय, तृतीय की संज्ञा से अभिहित किये बिना क्योंकि उसके लिए वह महज माल है। लेखक और पाठक के बीच वह ऐसा बिचौलिया है बाजार भाव जिसकी मुट्ठी में है। जैसे किसान और उपभोक्ता के बीच न जाने कितने दलाल, आढ़तिये, मंडी निरीक्षक और पटवारी होते हैं, उसी तरह लेखक और पाठक के परोक्ष और दूरस्थ सम्बंध लेखक और पाठक दोनों की हानि करते हैं। ÷खाक हो जाएंगे हम उनको खबर होने तक' वाला आलम रहता है। प्रेमचंद और निराला ने इसे भोगा। उनके बाद के लेखक भी भोग रहे हैं। लेखन से जीवनयापन की बात सोचना अपने परिवार के लिये एक डरावना भविष्य तैयार करने जैसा है।
भविष्य के भेड़िये से बचने के लिए इलाहाबाद में बड़े बड़े लेखक भी छोटी छोटी नौकरियां करते देखे जाते थे। यों भी हिन्दी में लेखन कोई पूर्णकालिक काम नहीं समझा जाता। फिर लेखन नाम के कर्म के पीछे चलने वाली तैयारी किसी को दिखाई भी नहीं देती। परिवार के सदस्य सोचते हैं इसे चारपाई तोड़ने की आदत है। पर वे नहीं जानते कि लेखन, क्रिया से अधिक प्रक्रिया का नाम है। सोच विचार के समय को सुस्ती या निठल्लापन समझे जाने का दंश लेखकों ने खूब झेला होगा। यह तो वे जानते हैं उनके दिल दिमाग की पतीली और बटलोई में विचारों की कैसी खदबद मची रहती है।
अमरकांत जी यों तो बलिया के थे, बीसवीं सदी के छठे दशक से वे इलाहाबाद आ गये। वे मित्रा प्रकाशन की पारिवारिक पाक्षिक पत्रिाका ÷मनोरमा' के संयुक्त सम्पादक थे। उन्हीं की उपस्थिति का प्रताप था कि कभी कभी मनोरमा में किसी शीर्ष रचनाकार की कोई बहुत उत्कृष्ट रचना पढ़ने को मिल जाती। वे दस से पांच दफ्तर में बैठते, पूरी लगन से अपना काम करते लेकिन समय खत्म होते ही कमल पत्रा पर पड़े जल बिन्दु की तरह दफ्तर से उठ जाते, निसंग और निर्लिप्त। तब तक वे दिल का एक दौरा झेल चुके थे। वे अपना हर काम बड़े सहज और सधे ढंग से करते, चाहे वह सड़क पर चलना हो या ठहर कर बात करना या किसी मित्रा के घर जाना। जैसे उनकी कहानियां विकसित होती हैं, खरामा खरामा, वैसा ही उनका जीवन राग था, एकदम मद्धम जिसमें ÷नी' कोमल होता है।
मेरे लेखन पर तब तक बम्बई की छाप और छवि कुछ गहरी ही थी। रही सही कसर बीटनिक पीढ़ी की ऑफबीट कविताएं पढ़ने सुनने से पूरी हो गयी थी। मैंने इंग्लिश में कविताएं लिखनी शुरू कीं तो पत्रिाकाओं में उनके छपते ही राइटर्स वर्कशॉप से मेरे दो काव्य संग्रह भी आ गये। न किसी से मिन्नत करनी पड़ी न पांडुलिपि भेजनी पड़ी। उन्हें सराहना भी खूब मिली। कई बार इंग्लिश के नये कवि मिलने के लिये घर आने लगे। मुझे भारतीय आंग्ल साहित्य की दुनिया का यह स्वागत भाव अच्छा लग रहा था। मन में यह भी था कि हिन्दी में कितनी भी मेहनत कर लो यहां लेखक को सराहना की जगह आलोचना ही मिलती है।
रवि यह सब चुपचाप देख रहे थे हालांकि उन्हें ये सरोकार पसंद नहीं आ रहे थे। एक बार उन्होंने कहा, ÷÷इनमें से बहुतेरे तो सी.आई.ए. के एजेण्ट हैं।'' मैंने कहा, ÷÷तुम्हें तो आधी दुनिया सी.आई.ए. की एजेण्ट नजर आती है। होंगे बहुत से इंग्लिश लेखक, मैं तो नहीं हूं।'' किताबों के अलावा अमेरिका या अमेरिकी सूचना विभाग से अपना कुल जमा रिश्ता बस इतना था कि घर में हर महीने वहां की पत्रिाका स्पैन का अंक निःशुल्क आता था। रवि हमेशा चीजों को चरम रूप में देखते हैं, मुझे लगा।
एक दिन मैंने अपना इंग्लिश कविता संग्रह ÷ट्रिब्यूट टु पापा' अमरकांत जी को दिया। उन्होंने वहीं बैठे बैठे कविताएं पढ़ डालीं। उत्साहित होकर मैंने अगला कविता संग्रह भी दिखाया। उन्होंने कविताएं पढ़ कर कहा, ÷÷आप तो इंग्लिश में निहिलिज्म (शून्यवाद) की ओर बढ़ रही हैं। क्यों लिखी हैं आपने ये कविताएं? फैशन में हैं इसलिए। लेखक को हमेशा फैशनेबिल लेखन से बचना चाहिएं।''
फिर मैंने बहुत दिनों तक इंग्लिश में कविताएं नहीं लिखीं। अमरकांत जी हमेशा क्लैसिक्स पढ़ने पर जोर देते। वे स्वयं तॉलस्तॉय, चेखव, गोर्की, स्टैंडल के पाठक और प्रशंसक थे। किसी भी कथा आंदोलन का उफान उन्हें उकसाता नहीं था। उन्होंने कभी फैशन के मुताबिक लेखन नहीं किया। ÷न दैन्यं न पलायनं' का जीता जागता उदाहरण थे अमरकांत जी। उन्होंने मुझे कई बार दलदल से निकाला, कभी चालू फैशन की, कभी घरेलू लेखन की दलदल। मथुरा पर केन्द्रित अपने उपन्यास के प्रारम्भिक पृष्ठ मैंने उन्हें सुनाये तब वे पहली बार खुश हुए और कहा, ÷÷इस तरह लिखिये, आप क्या लिखती रहती हैं?''
इस शहर ने अगर कई बार हमें चारों खाने चित्त गिराया तो दंगल के दांवपेच भी सिखाये। इलाहाबाद के आंवे में पक कर ही साहित्यकार, सृजन के क्षेत्रा में संजीवन पाता है। यह समझने में बीसवीं सदी समाप्त होने पर आ गयी। मुझे लग रहा था अब सुख के दिन शुरू ही होने वाले हैं। मेरी नौकरी का यह अंतिम वर्ष था। सत्रा लाभ मिलने पर 30 जून 2001 को मैं अवकाश प्राप्त करने वाली थी। सन् 2000 की बात है। 30 अक्टूबर का दिन था। कॉलेज में परीक्षा फॉर्म का काम समेटा जा रहा था। फीस का एक बैंक ड्राफ्ट बनवाया जा चुका था। दूसरे ड्राफ्ट के लिये परीक्षा शुल्क का हिसाब मैं रजिस्टर से मिला रही थी। तभी एक लड़का कार्यालय में आया, ÷÷मैडम, बहन का दाखिला करवाना है।''
मैंने कहा, ÷÷अक्टूबर खत्म होने को है अब दाखिला कैसे हो सकता है?''
÷÷इसका मतलब उसका परीक्षा फार्म भी नहीं भरा जाएगा।'' लड़के ने चिन्ता जतायी।
अंतिमा सिंह का बी.ए. प्रथम वर्ष का परीक्षाफल कानपुर विश्वविद्यालय से नहीं आया था। मैं तीन बार कॉलेज का कर्मचारी भेज चुकी थी पर हर बार यही पता चलता कि परीक्षाफल अपूर्ण है। अंतिमा के भाई को चिन्ता थी कि उसका साल बरबाद हो जाएगा। उसकी दो और बहनें भी मेरे कॉलेज में पढ़ रही थीं।
अरुण सिंह को मैंने नियम समझाने की कोशिश की लेकिन वह जिद पर अड़ा रहा कि अंतिमा को उत्तीर्ण मान कर द्वितीय वर्ष का फॉर्म भरवाया जाय। मेरे हाथ नियमों से बंधे थे। बीच का रास्ता ढूंढते हुए मैंने सोचा उसे अस्थायी प्रवेश देकर फॉर्म भरवा दिया जाय।
÷÷लड़की कहां है।'' मैंने पूछा।
÷÷गांव में।''
÷÷उसे ले आइये।''
÷÷लड़की नहीं आयेगी।''
÷÷क्यों?''
÷÷क्यों का क्या मतलब। कह दिया नहीं आयेगी। हम जो आये हैं।''
÷÷ऐसे न प्रवेश होगा न परीक्षा फॉर्म भरा जायेगा, जाइए।''
मैंने कहा और मैं फिर रजिस्टर में व्यस्त हो गयी।
लड़का बैठा रहा।
इसमें कुछ भी नया नहीं था। अभिभावक अक्सर उठने में देर लगाते।
तीनों बहनों की उम्र थी उन्नीस, बीस और इक्कीस। लड़का बाईस तेईस से ज्यादा का नहीं था लेकिन अभिभावक के खाने में पिछले साल बहनों ने यही एक नाम लिखा था, अरुण सिंह। तब भी मैंने एतराज किया था कि उन्नीस, बीस और इक्कीस की देखभाल बाईस कैसे कर सकता है। लड़कियों ने मुंह बना कर कहा था, ÷÷बिल्कुल कर सकता है मैडम, हमारा भाई है।'' मैं चुप हो गयी थी क्योंकि मुझे पता था कि लड़कियों की देखभाल तो चार साल के भाई के हाथों में भी सौंपी जाती थी।
तभी कोई भारी चीज मेरे सिर से टकरायी और खून का फव्वारा सिर से फूट निकला। जब तक मैं कुछ समझती या चीखती लड़का तेजी से उठ कर भाग निकला। अरुण सिंह ने मेरी मेज से उठा कर कांच का भारी पेपरवेट मेरे सिर पर मार दिया था।
खून का जैसे नल खुल गया। सिर के बीचोंबीच लग कर पेपरवेट ने गहरा घाव कर दिया। एक हाथ से, सिर से गिरती खून की मोटी धार रोकते, दूसरे हाथ से घंटी कस कर दबाते मैं दरवाजे के बाहर देखने लगी कि कोई आये। गलियारे में दोपहर बारह बजे का सन्नाटा था। सभी अध्यापिकाएं अपनी अपनी क्लास में थीं। कार्यालय के बाहर दाई का स्टूल खाली पड़ा था। हैरानी की बात थी। घंटी की आवाज से कोई अंदर नहीं आया।
यह होश खोने का नहीं होश में आने का वक्त था। अट्ठाईस साल इस कॉलेज की प्रिंसिपली में मैं मानती थी कि कॉलेज और मैं पर्यायवाची बन चुके हैं। मेरा ख्याल था कि कॉलेज पर मेरा पूरा नियंत्राण है। दोनों यकीन गलतफहमी साबित हुए। मैंने घंटी तब तक बजायी जब तक वह टूट नहीं गयी। फिर मैं लपक कर सामने वाली कक्षा तक गयी। सिर के आगे पीछे रक्त की धाराएं गिर रही थीं। कार्यालय का फर्श लाल हो चुका था। कक्षा तक जाने और लौटने में मेरी चप्पलों के रक्तरंजित निशान ईंटों पर बन गये। लड़कियां चिल्ला पड़ीं। खून, खून। मिनटों में सारा कॉलेज इकट्ठा हो गया। अध्यापिकाओं ने सोचा मुझे गोली मारी गयी है। सब दाई और चपरासियों को डांटने लगे कि गुरु जी को कौन मार कर चला गया। जितनी देर मैं कॉलेज की हद में रही, घायल होकर भी चौघराहट दिखाती रही। फीस के रुपये अपने सामने बड़े बाबू से गिनवाये, रजिस्टर से हिसाब मिलवाया, बैंक ड्राफ्ट थमाया, डायरी पर्स में डाली। मन में कोई टहोका दे रहा था, ÷चलो तुम्हारा वक्त पूरा हुआ। आ गयी मेरे गमन की सांध्य बेला।'
कॉलेज के लायब्रेरियन संजय वर्मा की भागदौड़ से फर्स्टएड मिली जो अपर्याप्त थी। डॉक्टर ने कहा कि चोट गहरी है और मुझे अस्पताल जाना होगा।
रवि और प्रबुद्ध भागमभाग कॉलेज पहुंचे।
न जाने किसने खबर कर दी। कुछ अखबारों के संवाददाता आ पहुंचे। पुलिस तब भी नहीं आयी हालांकि पुलिस चौकी एकदम करीब थी।
सरकारी अस्पतालों की बेरुखी झेल कर अंततः जब मुझे एक निजी अस्पताल में शल्य चिकित्सा मिली तब तक रात के दस बज चुके थे। रवि और प्रबुद्ध फिक्र और थकान से निढाल हो रहे थे। चोट में छब्बीस टांके लगे। सिर पर पट्टियों का मुकुट पहन जब मैं उन दोनों के साथ घर लौटी, रात के ग्यारह बज रहे थे।
अखबारों के स्थानीय पृष्ठ अगले दिन इस वारदात से रंगे हुए थे। घटनास्थल और घायल की तस्वीरों के हवाले से खबर फैल गयी। बहुत लोग आये। अपने लिए नगरवासियों, मित्राों, परिचितों, पाठकों का प्रेम प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिला। इलाहाबाद और कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी आये। पुलिस भी आती रही, ऊलजलूल सवाल पूछती रही। मैं अपना दुखता सिर संभाले बताती रही, ÷÷हां लड़के ने पतलून कमीज पहनी हुई थी, लम्बा था, अपनी डायरी मेरी मेज पर छोड़ गया, बाकी विवरण उसकी डायरी से देख लें।''
मुझे बिस्तर पर खबर मिलती रही कि लड़का जजों की कॉलोनी में आराम से घूम रहा है, क्रिकेट मैच देख रहा है, युनिवर्सिटी जा रहा है लेकिन पुलिस जाने किन सड़कों पर दौड़ भाग कर रही थी।
वास्तव में यह चोट सिर्फ सिर में नहीं लगी थी। मेरे अंदर और बहुत कुछ टूट फूट गया। मेरी अकड़ और आत्मविश्वास, दोनों खंडित हो गये। बिस्तर पर पड़े पड़े बार बार चलचित्रा की तरह वह घटना मेरी आंखों में घूम जाती और तीखा पराजयबोध मेरी नस नस में उतार देती। रही सही कसर कॉलेज के मैनेजर ने पूरी कर दी जब उन्होंने अपना रुख जाहिर किया।
रवि ने उनसे कहा, ÷÷आप इनकी सुरक्षा का प्रबंध करें तो ये काम पर लौटें।''
मैनेजर ने जवाब दिया, ÷÷मैं इनकी सुरक्षा का क्या प्रबंध करूं। मैं तो अपनी भी सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकता। आप तो लेखक पत्राकार हैं। डी.एम. से कह कर इनको सुरक्षा दिलवाइये।'' रवि का मानना था कि यह मांग निजी स्तर पर नहीं कॉलेज के माध्यम से की जाय।
मैनेजर का ख्याल था कि इसमें कॉलेज कहीं नहीं आता। उनका तो यह भी ख्याल था कि लड़के से मेरी कोई पुरानी दुश्मनी थी जिससे उसने हमला किया। मेरे कथन पर कि मैं तो उसे पहचानती भी नहीं थी उन्होंने कोई गौर नहीं किया। उन्होंने कहा, ÷÷इनकी निजी सुरक्षा आपका निजी मामला है, उसमें कॉलेज को क्यों घसीटा जाय।''
मैं कॉलेज का काम करते हुए, नियमों का परिपालन करते हुए हिंसा की शिकार हुई थी। पूरे शहर में मेरा कोई शत्राु नहीं था। कॉलेज अपना पल्ला झाड़ रहा था।
मैनेजर एकदम जड़ और निरपेक्ष थे। संकटकाल में वे इसी तरह तटस्थ और उदासीन हो जाया करते थे।
मुझ जैसी मूर्खा को अच्छा सबक मिला जिसके भावतंतु कॉलेज के अस्तित्व के साथ ऐसे जुड़ गये थे कि मैं सर्दी गर्मी चौमासा, टिक टिक घड़ी की तरह अविराम नौकरी पर जाती रही, पति की पार्ट टाइम पत्नी, बच्चों की क्वार्टर टाइम मां बनी लेकिन नौकरी फुलटाइम बजाती रही। छुट्टियों में बाहरी इम्तहान करवाती रही, 15 अगस्त, 26 जनवरी सब दिन कॉलेज को समर्पित कर दिये। कच्चे कॉलेज को पक्का बनाने के लिये मैंने इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली एक कर दिये। रचनाकार विभूति राय शायद इसीलिए कहते हैं ÷नौकरी को नौकरी की तरह करना चाहिए।' उनका आशय होता है कि नौकरी में अपनी उम्मीदें, सपने और विश्वास नत्थी नहीं करने चाहिए, तीनों दुख देते हैं।
हमें कहां पता होता है हम कब किन कच्चे पक्के तारों की गुंजलक बनते चले जातेहैं।
गौतम और गांधी के देश में मेरे अंदर अहिंसा और क्षमा की जगह असंतोष और आक्रोश का लावा फूट रहा था। मैं अपराधी को जेल में नहीं अपने सामने चाहती थी ताकि उससे पूछ सकूं, ÷÷तुमने ऐसा क्यों किया? मेरी जगह तुम होते तो क्या करते?'' सिर के तेरह बाहरी टांके आठवें दिन डॉक्टर ने निकाल दिये, भीतरी तेरह टांके अपने आप घुलने के लिये छोड़ दिये। सिर में जब तब चिलक उठती। केश विन्यास हमेशा के लिए बिगड़ गया।
मित्रा हितैषियों का आना जाना अभी थमा नहीं था। वे तरह तरह से दिलासा देते। कोई कहता, ÷÷बड़ी खैर हुई उस लड़के के पास कट्टा (देसी रिवॉल्वर) नहीं था। आजकल तो स्कूली बच्चे भी रखने लगे हैं।''
कोई कहता, ÷÷गनीमत है उसकी जेब में एसिड का बल्ब नहीं था।'' एक अन्य हितैषी ने सुल्तानपुर का प्रकरण बताया। इसकी खबर मैंने पढ़ रखी थी। अंदरूनी बातें हितैषी ने बतायीं कि कैसे इंटरमीडिएट कॉलेज के प्राचार्य मान बहादुर सिंह की कॉलेज परिसर में हत्या कर दी गयी। मान बहादुर सिंह हिन्दी के कवि थे ᄉ बलिष्ठ शरीर और अच्छी कद काठी। उनकी एक कविता पुस्तक ÷बीड़ी बुझने के करीब' हमारे प्रेस में छपी थी। मोटर बाइक पर वे धड़धड़ाते हुए आते। वे कवि से ज्यादा खिलाड़ी नजर आते थे।
उनकी हत्या के पीछे वजह थी कि कॉलेज में ÷ग' वर्ग की नियुक्तियों के मामले में एक असफल अभ्यर्थी ने उन्हें दिन दहाड़े तलवार से काट कर उनके अंग प्रत्यंग कॉलेज परिसर में जगह जगह उछाल दिये। उस कॉलेज में दो हजार छात्रा पढ़ते थे; सौ से अधिक अध्यापक थे। दोपहर बारह बजे यह वारदात हुई जब सब उपस्थित थे।
लेकिन पुलिस के यह पूछने पर कि क्या किसी ने हत्यारे को देखा, सब चुप्पी खींच गये।
हितैषी ने बात समेटी, ÷÷आप तो बहुत लकी हैं। लड़का चोट मार कर चला गया। न गोली चली न बम।''
मैंने अपनी चिलकती चोट सहलाते हुए सोचा यह दुर्भाग्य से निकलता हुआ सौभाग्य है, बदली के बीच फंसे हुए चांद की तरह।
बहरहाल घाव था तो पुर भी गया। कॉलेज जाना भी शुरू हो गया पर मन में श्मशान वैराग्य आ बैठा, ÷चल उड़ जा रहे पंछी' 30 जून, 2001 को कॉलेज के फाटक से जब बाहर निकली, सच्चे दोस्त की तरह रवि मेरे साथ थे। उन्होंने कहा, ÷÷भूल जाओ कि तुम यहां अट्ठाईस साल आती रहीं, सोच लो यह जगह कभी तुम्हारी थी ही नहीं।''
घर की दिनचर्या में नये सिरे से दीक्षा ग्रहण की। सवेरे दस से चार तक घर में दिन कैसे बीतता है, मुझे इल्म ही नहीं था। एक उपन्यास जो अब तक लंगड़ा चल रहा था, सीधे पैरों उसे खड़ा किया। घर के और जिन्दगी के जाले साफ किये। गुजरात और महाराष्ट्र के व्यापक दौरे किये। लौट कर आने के लिए घर था, परिवार था, प्यार था, सत्कार था। किन्तु जीवन एक गोल चक्र में घूम रहा था, उसमें ऊर्ध्वगामिता और अग्रगामिता गायब हो रही थी। ऐसा इसलिए भी लग रहा था कि अवकाश प्राप्ति के दो वर्ष बाद भी पेंशन का सिलसिला कायम नहीं हुआ था। सभी प्रासंगिक प्रपत्रा सन् 2001 में ही शिक्षा निदेशालय को सौंप दिये गये थे लेकिन वहां का बाबूतंत्रा कुछ ऐसा था कि वे हर पेंशन प्रत्याशी को कुर्बानी का बकरा समझते। वे हर बार एक नयी आपत्ति लगा कर मामला लटका देते। मेरी भी जिद थी, बाकायदा नौकरी की है, बाकायदा पेंशन लूंगी, बेकायदा कोई काम न करूंगी। वित्त नियंत्राक के मुंहलगे बाबू ने ड्राइवर से संदेश भिजवाया, ÷÷अपनी मेमसाहब से कहना, निदेशालय आते जाते बूढ़ी हो जाएंगी, पेंशन शुरू नहीं होगी।'' कहीं सरकारी मारगांठ पड़ी थी जो खुल नहीं रही थी।
रवि समझाते, ÷÷देखो प्राइवेट नौकरी वालों को चालीस पचास साल काम करने पर भी पेंशन नहीं मिलती। मजदूर, कारीगर, लुहार, ठठेर सब मेहनत पर टिके हैं, जिस दिन हाथ न चलायें उस दिन भोजन नहीं मिलता। कितने ही शिक्षक होंगे जिन्हें ठीक से तनखा भी नहीं मिलती।''
मैंने अपने प्रयत्नों से कॉलेज को नियमित और नियमबद्ध करवाया था। मैं इन तर्कों से क्या तसल्ली हासिल करती। मैं कहती लेखक से शिक्षक बनी और शिक्षक से लेखक, अब लेखक से भिक्षुक नहीं बनूंगी। नियमगत अधिकार के लिये एक भी पैसा रिश्वत नहीं दूंगी।''
÷÷हमारा खर्च ही कितना है। मैं मछली मार कर लाऊंगा, तुम तवा रख कर रोटी सेक लेना; इसीलिए गंगा किनारे घर लिया है।'' रवि मुझे हंसाते।
मैं सोचती वाकई पेड़ों पर चहचहाने वाले पंछी पखेरू, घास की आस में घूमते ढोर मवेशी, छोटी मोटी दुकान चलाने वाले लोग कोई भी तो पेंशन नहीं पाता। न जाने कितने शिक्षक हैं जिनका पेंशन प्रकरण पंद्रह बीस साल से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। इन्हीं में एक प्रकरण और सही।
समय के साथ सबसे अच्छी बात यही है कि यह सरकता है। हम जैसे लोग जो अपने को थोड़ा बहुत लेखक मानते हैं, बहुत जल्द अपना मन लगा लेते हैं, किसी अगली किताब में, किसी मैग्जीन में। कभी दूसरों की परेशानियां सुन कर अपनी मुसीबतें हल्की और सहनीय लगने लगती हैं। लिखने से रोजगार नहीं मिलता लेकिन तबीयत संभलती है। एक बार अपने रचे पात्राों में मन रम जाय तो हम रिद्म में जीने लगते हैं। इसे पराजितों का सिद्धांतवाद कहें लेकिन इसमें बड़ा दम है।
मैंने भी एक किताब शुरू कर डाली।
सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का मौसम था। निमंत्राण हम दोनों को था पर टिकट एक दी जा रही थी। सरकार के पास पैसों का टोटा था। दूरस्थ देश सूरिनाम का टिकट भी कोई सस्ता नहीं था।
मेरा मन अपनी किताब में लगा हुआ था। मैं हफ्ते, दो हफ्ते के लिये उससे अलग नहीं होना चाहती थी।
रवि सूरिनाम चले गये।
मैं और भी लगन से लेखन में लग गयी। ऐसा लग रहा था जैसे दो हफ्ते की छुट्टी पर हूं।
एक रात, बनारस से डॉ. शुकदेव सिंह का फोन आया कि रवि की कलकत्ते जाने की तैयारी कर दो। मैंने बताया वे सूरिनाम में हैं।
सूरिनाम से रवि योरोप चले गये। एक दिन फोन किया। वे मस्ती में थे। मित्रा मंडली साथ थी। फोन पर कभी रवि बोलते, कभी स्वदेश दीपक। दोनों एक दूसरे का साथ पाकर मगन थे। मैंने शुकदेव जी का प्रस्ताव बताया। रवि ने लापरवाही से कहा कि लौटेंगे तब सोचेंगे।
रवि के पास फुर्सत नहीं थी। लौट कर वे अपना उपन्यास एबीसीडी लिखने में रम गये। कई बार कलकत्ते से फोन आये कि आप लोग आकर बात तो कर जाएं। अगस्त में हम कलकत्ते गये। यह पहली बार जाना नहीं था। मैं इससे पहले तीन चार बार कलकत्ते जा चुकी थी, कभी किसी आयोजन में तो कभी अपनी दीदी प्रतिभा के पास। अगस्त का कलकत्ता बारिश में सराबोर था। थियेटर रोड से पार्क स्ट्रीट जाने में हम तरबतर हो गये। तब दीदी ने हमें कुछ चित्रा विचित्रा कपड़े बदलने के लिये दिये। हम रात उन्हीं के घर ठहर गये।
हर संस्था और प्रतिष्ठान का एक प्राणतत्व होता है जिससे वह ऊर्जा और उन्मेष अर्जित करता है। भारतीय भाषा परिषद में श्री परमानंद चूड़ीवाल ऐसे प्राणतत्व थे। उन्होंने अपनी स्पष्टवादिता और सज्जनता से हमें इतना प्रभावित कर लिया कि हम मान गये कि हम पहली दिसम्बर को आकर कार्य संभाल लेंगे।
इलाहाबाद पहुंच कर अपनी दो दिनों की डाक देखी। मन्नू ने एक पंजीकृत चिट्ठी अलग से पकड़ायी। खाकी लिफाफे में मेरी पेंशन स्वीकृति का शासनादेश था। मैं उस लिफाफे को सम्बोधित करने लगी, ÷÷कम्बख्त दो दिन पहले नहीं आ सकता था, बेकार चौदह सौ किलोमीटर का चक्कर लगवा दिया।''
तबीयत की पस्ती मिटी। मूड दुरुस्त हुआ। बाबा नागार्जुन के शब्दों में ÷कौवे ने खुजलायी पांखें कई दिनों के बाद' अंततः प्राप्त हुए इस कालनिर्णय के पीछे न जाने कितने परिचितों की सदाशयता और मित्राों की दौड़भाग थी। वे राज्य से न्याय तो चाहते ही थे, उससे भी बढ़ कर वे मुझे प्रसन्न देखना चाहते थे। मन आकंठ भर आया। ये ऐसे हितैषी थे जिनका शुक्रिया अदा करना भी सम्भव नहीं था। उनकी सज्जनता के आगे भाषा मौन हो जाती।
मैंने पाया कि सरकारी दफ्तरों में कोई स्थायी शत्राु या मित्रा नहीं होता। वे कागज की डोर से बंधे रहते हैं। कल तक जो चुनौती भिजवा रहे थे, अब दौड़ दौड़ कर मेरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा रहे थे। मेरा मूड कुछ ऐसा था कि मुझे हर मनुष्य में देवता नजर आ रहा था।
एक दिक्कत पेश आ रही थी। अपनी जो कलम कल तक सरपट दौड़ रही थी अचानक जाम हो गयी। कहां तो रातों में जाग जाग कर मैं लिख रही थी कहां अपनी पांडुलिपि के 175 पृष्ठ मुझे मुंह चिढ़ाने लगें। आगे लिखो तो जानें। रातोंरात पात्राों के नाम भूल गये, कथा का विकास भाड़ में पहुंच गया, कलम छूने में भी डर लगे। ऐसा लगा जैसे अब तक का किया हुआ काम किसी और ने किया। वह तो कोई और था जो तरंग के तार दर कहानी पर कहानी टांगे जा रहा था अब तक। मैं एक अवकाश प्राप्त, पेंशनयाफ्ता बूढ़ा की तरह घर में सिर्फ खटिया तोड़ रही थी। उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में सी गे्रड कॉलेज के शिक्षक की पेंशन, कोई पेशवाओं की जागीर नहीं होती जिस पर खुशी में बौराया जाय। अगर लिखने का सिलसिला टूट गया तो जीवन में बाकी क्या बचेगा, खांसने और खंखारने के सिवा। मुझे लगा मेरा आने वाला समय भयावह होगा। एक छोटे शहर की उदास बस्ती के दुमंजिले मकान के एक अकेले कमरे में गुमनाम मौत की ओर बढ़ती हुई एक कमनाम कलमनबीस पड़ी रहेगी चुपचाप।
हिश्ट! नहीं मांगती अपुन को इत्ती मनहूस जिन्दगी! अगर यह दिनचर्या भीगा कम्बल है तो कम्बल ही उतार फेंको।
अपनी दिनचर्या अकेली अपनी कहां होती है। उसमें अपने से जुड़े तमाम सदस्यों की दिनचर्या भी जुड़ कर खलल डालती है। रवि दारू सिगरेट छोड़ चुके थे लेकिन नाश्ता, खाना खाने में उनका मनमानापन बरकरार था। पहले मैं सोचती थी इस अराजकता की वजह, इनका सुराप्रेम है। मैंने पाया बिना सुरापान के भी वे अपनी मस्ती में रहते। किसी से फोन पर बात करके ही वे इतनी तरंग में आ जाते कि दारू की सारी कसर पूरी हो जाती। लेकिन उनकी आदतों से मुझे खास तकलीफ नहीं होती थी।
असली खलल पड़ रहा था, मन्नू की आदतों से। सूचना तकनीकि के संसार में धमाकेदार प्रवेश लेने के बाद अब वह हताशा में हाथ पैर मार रहा था। उसे माइक्रोसॉफ्ट का अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिला था क्योंकि उसने हिन्दी फॉण्ट के क्षेत्रा में कोई बड़ी पहल की थी। इसी बिना पर वेब दुनिया ने उसे नौकरी ऑफर कर दी थी जहां दो महीने काम कर वह वापस इलाहाबाद आ गया। जो रिसर्च वह करना चाह रहा था उसके कद्रदां नहीं मिल रहे थे। रात रात भर वह इंटरनेट पर लगा रहता। जब हम सुबह जागते वह सोने चला जाता। उसके शरीर की घड़ी उलटी दिशा में चलती। वह दिन भर सोता। मैं नीचे से आवाज देती, ÷÷मन्नू नाश्ता कर लो, मन्नू खाना खा लो।'' मन्नू गुर्रा कर जवाब देता, ÷÷चुप रहो, जब भूख लगेगी तब खायेंगे।'' मैं भुनभुनाती, बड़बड़ाती। रवि मूक चिन्ता करते। मन्नू के कमरे की खिड़की के बाहर सिगरेट के टोटों का ढेर बढ़ता जाता। मन्नू आधी रात में ठंडे पानी से नहाता। जब हम सो जाते, मन्नू फ्रिज से निकाल कर ठंडा ठार खाना खाता।
जैसे मुझे अभिशाप मिला हुआ था ᄉ तुम एक परेशानी से निकल कर दूसरी, तीसरी में पड़ती रहोगी। तुम्हारा जीवन इसी व्यग्रता में बीतेगा। लगता था बच्चों का मनोविज्ञान समझने में हमें जीरो नम्बर मिलता रहेगा। बड़ा बेटा अन्नू हर साल नयी कामयाबी हासिल कर रहा था। छोटा बेटा मन्नू अपनी कोई समस्या हमसे बांटने को तैयार नहीं था। ऐसी नौबत आ गयी कि हमारा प्यार भी उसे नागवार मालूम हो रहा था। उसे अपने व्यवसाय के न ग्राहक मिल रहे थे न गुणग्राहक। इलाहाबाद में उतनी सम्भावनाएं भी नहीं थीं। नकारात्मक ऊर्जा अपने अंदर इकट्ठा कर मन्नू ने घर में ही अपना निर्वासन कर रखा था। शेष समाज से उसका व्यवहार संतुलित और तार्किक था। हमारे दोस्त डॉ. नरेन्द्र खोपरजी और डॉ. अभिलाषा से उसका संवाद रहता था। मन्नू की अकड़ कुछ ऐसी थी कि उनके जरिये भी हम अपनी बात उस तक नहीं पहुंचा सकते थे, मदद की कौन कहे। कड़की के दिनों में भी मन्नू का टेलिफोन बिल दस हजार से नीचे न होता। मन्नू परेशान रहता लेकिन हमारा सहयोग लेना उसे बरदाश्त नहीं था। हमें सहयोग देना भी उसे गवारा न था।
घर खुशनुमा हो तो शहर खुशगवार लगता है। यहां तो घर ही काटने दौड़ रहा था। हमने एक झटके में तय कर लिया हमें यह घर और शहर दोनों छोड़ देने हैं।
30 नवम्बर 2003, की शाम प्लेटफार्म नम्बर एक पर दोस्तों का एक छोटा सा समूह हमें कालका मेल पर विदा देने आया था। उनमें मन्नू भी था। उसके चंद दोस्त भी इस समूह में शामिल थे। यश और सुधांशु मालवीय, आरती और आशा, वाजदा खाना और गोकर्ण सिंह यहां थे। मन्नू अपने दोस्तों के सामने मुझसे कह रहा था, ÷÷मुझे अकेला छोड़ कर जा रही हो, ना जाओ मां।''
ऊपर से मैं शांत थी, अंदर से अशांत। सामान बांधने के दिनों में मन्नू ने एक भी बार अगर इस शिद्दत से कहा होता, ÷ना जाओ मां' तो क्या मैं रुक नहीं जाती। उस समय हमारी बांधा जूड़ी वह दर्शक की तरह देखता और सीढ़ी चढ़ कर अपने कमरे में बंद हो जाता।
प्रकट मैंने कहा, ÷÷अब तक मैंने तुम्हें बंदरिया की तरह पाला अब बिल्ली की तरह पालूंगी।'' मैं उसे हिदायतें देती रही, कामवाली के लिए सुबह दरवाजा खोल देना। वह खाना बना देगी। नाश्ता खुद बना लेना। वह सिर हिलाता रहा। हिदायतें उसने कभी नहीं मानीं। हमारे जाने के बाद भी नहीं। भूखा रहा, दुबला हो गया, बीमार पड़ा किन्तु अपने सुर में जिया।
उसके सुख दुख से अपने को स्वतंत्रा करना एक रुआंसा अध्याय था जो रोज लिखा जाता। फोन में सिर्फ उसकी आवाज सुनायी देती पर मुझे कैमरा नजर आता। उसका कमरा, सूखा चेहरा, ठंडी रसोई, दरवाजे पर फड़फड़ाते अखबार मुझे सब दिखाई देते। मेरा मन उड़ता रहता इस पार से उस पार। किसी दोस्त का फोन आता, मैं बावली की तरह पूछती, ÷÷मन्नू दिखा था, कैसा लग रहा था, क्या कर रहा है।''
कुशल अभिनेता की तरह मन्नू हमें कुछ पता न लगने देता। अपने कार्य कौशल और जीवट से उसने वैब की दुनिया में धीरे धीरे अपनी जगह बनायी, व्यवसाय जमाया और दुर्दिन को धकेल दिया।
मां काली और मार्क्सवाद का शहर कलकत्ता
कुछ शहर अपने प्लेटफार्म से ही अच्छे लगने लगते हैं। हर शहर के रेलवे प्लेटफार्म की अलग अदा होती है। अब हावड़ा को ही लीजिए। गाड़ी खड़ी हुई नौ नम्बर प्लेटफार्म पर। नौ नम्बर प्लेटफार्म ऐसा है जहां रेल के डिब्बे तक कार जा सकती है। नौ नम्बर पर न पैदल चलना पड़ा न पुल चढ़ना पड़ा। चूड़ीवाल जी स्वयं स्वागत के लिये आये थे। साथ में दो गाड़ियां, सहायक और कर्मचारी। हमारे पास इतना सामान ही नहीं था। गृहस्थी का चौका चूल्हा दो चार दिन बाद ट्रक से पहुंचना था।
हावड़ा स्टेशन से शेक्सपियर सरणी तक सड़कों का विस्तार, पेड़ों की हरियाली, कारों की कतार, यह जता रही थी कि यह महानगर है लेकिन लोगों की धीमी चाल, मामूली लिबास और फुरसतपसंदी इसका संकेत दे रही थी कि कलकत्ता एक बड़ा सा उपनगर है। चूड़ीवाल जी कुछ खास जगहों पर इशारा कर रहे थे, ÷÷ये विक्टोरिया मेमोरियल है, यह फोर्ट विलियम है, यह तारामंडल बना है, यह एस्प्लेनेड आ गया, वह है राइटर्स बिल्डिंग, अब यह देखिये यह मैदान है, यहीं लगता है पुस्तक मेला।'' जैसे किसी छोटे बच्चे को नयी जगह से परिचित कराते हैं, चूड़ीवाल जी हमें इसी तरह शहर दिखा रहे थे। अच्छा लगा कि वे परिषद की बजाय नगर का नक्शा हमारे आगे खींच रहे थे। उनके साथ परस्पर सम्प्रेषण की डोर ऐसी बंधी जो अंत तक बनी रही ᄉ उनके आकस्मिक और त्राासद अंत तक।
दफ्तर का पहला दिन, पहले दिन की तरह ही सुखदायक था। सभी सहयोगी सज्जन और सुजन लगे। वैसे मन में कोई आलोचक बैठा कह रहा था, पहले दिन तो हर जगह आदर्श लगती है, यह स्थायी भाव नहीं है। मैं अपने आलोचक को, होठों पर उंगली दबा कर चुप कर रही थी।
शाम को परिषद के मंत्राी की ओर से कलकत्ता क्लब में हमारा रात्रिाभोज था। बड़ा बेटा अन्नू मुम्बई से हमें कलकत्ता छोड़ने साथ आया था। उसने कहा, ÷÷हम अपनी तरह से कलकत्ते को डिस्कवर करते, मां तुम्हें क्या जरूरत थी प्रायोजित डिनर के लिए हां करने की।''
रवि को क्लब ले जाना और भी मुश्किल काम था। पहले तो वे अड़ गये, ÷÷मैं अपने धन और साधन का खाना खाऊँगा।''
मैं दोनों की मिन्नतें करती रहीं, ÷÷प्लीज चलो, नहीं खाना तो मत खाना लेकिन न जाने में तो उस मंत्राी की तौहीन हो जायेगी।''
खैर हमें लेने गाड़ी आ गयी। रवि अपने शाश्वत परिधान में थे ᄉ जीन्ज, कुरता और वॉकिंग शूज। दरबान ने एक नजर रवि पर डाली और खेद प्रकट किया, ÷÷सॉरी मैडम ये अंदर नहीं जा सकते, ड्रैस कोड ठीक नहीं है।''
अच्छी छुट्टी मिली। इस भाव से रवि तुरंत मुड़ लिये। वहां खाना न खा सकने का उन्हें कोई मलाल नहीं। अनिरुद्ध, अन्नू के पास सूट बूट टाई का सरंजाम था पर वह भी जीन्ज के साथ कमीज पहन कर आया था। अड़ियल वह भी था। नापास होने पर उसने कहा ÷÷मैं अपने बाप का बेटा हूं, भूखा रह लूंगा पर कपड़े नहीं बदलूंगा।''
रवि काउंटर पर पूछने लगे, ÷÷अगर मकबूल फिदा हुसैन आपके क्लब में आ जायं तो आप क्या करते हैं?''
स्वागत अधिकारी ने, बिना लज्जित हुए बताया, ÷÷हम उन्हें यहां से वापस भेज चुकेहैं।''
हमारे मेजबान न जाने किस कौशल से हमें क्लब का लॉन पार करवा कर ऐनेक्सी तक ले जाने में कामयाब हो जाते हैं। बड़े प्रेम से हमें खाना खिलाते हैं। उसी रास्ते जब हम वापस लौट रहे हैं उन्हें क्लब का कोई नुमाइंदा तलब करता है।
जरूर ड्रेस कोड को लेकर कोई विवाद हुआ लगता है। अरबपति मेजबान का मुंह तमतमाया हुआ है जैसे उन्हें कुछ अप्रिय सुनने को मिला है। कलकत्ता क्लब आजादी के 57 साल बाद भी मृत मूल्यों को सीने से चिपकाये फिरंगी वैभव जीने की कोशिश कर रहा है।
यहां लोग क्यों आते हैं। घर में बैठे बैठे घुटने अकड़ जात