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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

समाज
यादों से रची यात्रा : पी.सी. जोशी

शताब्दी
दिनकर
की काव्य चेतना : पुनर्मूल्यांकन खगेन्द्र ठाकुर

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित

लेख
माधवराव सप्रे का महत्व मैनेजर पांडेय

मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह

कहानियां
तमाशे
में डूबा हुआ देश असगर वजाहत

जिद्दी रेडियो पंकज मित्र

फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा

स्वीट होम उमा शंकर चौधरी

विशेष
सागू
मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
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ई-मेल info@tadbhav.com

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अंक/17 जनवरी/08

निशांत की तीन कविताएं

केदारनाथ सिंह को देखते हुए

केदारनाथ सिंह को देखते हुए
एक बाघ देखा

केदारनाथ सिंह को देखते हुए
एक बाप देखा

केदारनाथ सिंह को देखते हुए
सिर्फ केदार देखा

और कुछ नहीं।


केदारनाथ सिंह को लड़ते हुए
फर्क पड़ता है, केदार
÷÷तुमने जहां लिखा है ÷प्यार' प्त्
वहां लिख दो सड़क''
फर्क क्या पड़ता है

बस्ती में एक लड़की
रस्सी से झुलते हुए पायी जाती है, केदार
उसके पे्रमी ने कहा था
÷÷फर्क नहीं पड़ता
यह मेरे युग का मुहावरा है,''प्त्

तुम्हारी आंखों में बैठा हुआ सच
मेरी आंखों में बैठे हुए सच जैसा नहीं है, केदार

फर्क पड़ता है

राह चलते हुए
कभी भी रोककर मांगा जा सकता है पहचान पत्र
अब कभी भी वापस आने पर घर नहीं कहता धन्यवाद
पिता की आंखों में टंगी रहती है पृथ्वी जैसी लम्बी बड़ी उदासी

घिस चुकी होती है घंटे की मोहड़ियां
एक अदद बहाली की तलाश में
कई बार हो चुके होते हैं हम बाघ
अपने ही दाढ़ से अलग करते है अपना टंगा हुआ घर

फर्क पड़ता है, केदार
उन्नीस सौ चौंसठ और दो हजार चार में
यानि कुल चालीस वर्षों का फर्क पड़ता है केदार
एक बुढ़े और एक जवान में।
प्त् केदारनाथ सिंह की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए।

प्प्प्
केदारनाथ सिंह को याद करते हुए
पहली बार
कहां देखा था केदारनाथ सिंह को
कोलकाता के ठनठनियों काली मंदिर के पास
एक गोरा-गारा ठिगना आदमी
चला जा रहा था दो-चार लोगों के साथ

÷÷यही केदारनाथ सिंह है।
हिंदी के सबसे बड़े कवि।''
मित्र प्रकाश ने कहा था

÷÷नहीं, एशिया के सबसे बड़े कवि।''
पत्रकार कृपाशंकर चौबे ने कहा था

हम
अभिभूत थे

किताबों से निकलकर
एक सच्ची-मुच्ची आदमी खड़ा था
हमारे बीच
थोड़ा सा छूकर
देखना चाहते थे उन्हें हम

चाहते थे
हो जाए एक फोटो
उनके साथ
बड़े होने के बाद
एक बार बचपन फिर आ गया था हमारे अंदर
तुम्हारे कारन

केदारनाथ सिंह!
धन्यवाद!


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