समाज शताब्दी • उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित लेख • मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह कहानियां • फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा विशेष कविताएं वृत्तांत संस्मरण आत्मकथा लम्बी कहानी |
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उर्वशी की भूमिका में दिनकर ने मनु, इड़ा और पुरुरवा, उर्वशी के मिथक की तुलना करते हुए कहा है− ÷÷मनु और इड़ा तथा पुरुरवा और उर्वशी, ये दोनों ही कथाएं एक ही विषय को व्यंजित करती हैं। सृष्टि विकास की जिस प्रक्रिया के कर्त्तव्य पक्ष का प्रतीक मनु और इड़ा का आख्यान है, उसी प्रक्रिया का भावना पक्ष पुरुरवा और उर्वशी की कथा में कहा गया है।'' एक काव्यनाटक के रूप में उर्वशी का उद्देश्य क्या रहा होगा, इसे समझने में यह कथन मदद करता है। ÷आधुनिकता' की भारतीय परियोजना उन पश्चिमी उपकरणों की मोहताज रही जो तर्कबुद्धि की महत्ता से आक्रांत थे। इनके द्वारा मांजी गयी हमारी ÷आधुनिक' चेतना मानुष्यिक संघटन के भावनात्मक पक्ष को नजरअंदाज करती गयी। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि हमारा ध्येय यह नहीं होना चाहिए कि तर्कबुद्धिवाद की दार्शनिक उपलब्धियों को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। बात सिर्फ इतनी है कि तर्कबुद्धि पर अंधी आस्था यांत्रिाकता और स्थूलता की प्रवृत्ति को जन्म देती है, जो स्वयं तार्किकता की दार्शनिक जड़ों में मठ्ठा डालने का काम करती है। कला और साहित्य के क्षेत्र में जब यह प्रवृत्ति आलोचनात्मक व्यसन बन जाती है तब किसी रचना की शक्ति और कमजोरी का सही आकलन करना असम्भव हो जाता है। हिन्दी में यह प्रवृत्ति हमेशा विद्यमान रही है और कई रचनाकार इसके शिकार हुए। दिनकर इन्हीं रचनाकारों में से एक हैं। यह बात अलग है कि वह ताकतवर नहीं, बल्कि कमजोर शिकार हैं क्योंकि वह नशे के नहीं, खुमार के कवि हैं। उस पीड़ा से बचने की तब राह नहीं मिलती है, देवत्व ÷गंध' की सीमा में कैद है। इस कैद से मुक्त होना ही मनुष्य होना है : काम का यह निकष देवों को हीन और मनुष्यों को श्रेष्ठ साबित करता है। प्रतिबंध रहित प्रेम नश्वरता का वरदान है। इसी वरदान को प्राप्त करने के लिए उर्वशी अमरत्व की ऊंचाई से उतर कर नश्वरता के धरातल पर कदम रखती है। उसकी यह यात्रा एक ढलान है-स्वर्ग से धरती की ओर, शिखर से धरातल की ओर, ऊंचाई से नीचे की ओर। ऊपर से नीचे की ओर आना हमेशा पतन की व्यंजना नहीं करता। ढलान में एक किस्म की गरिमा हो सकती है, यह संदेश उर्वशी देती है। छायावाद के प्रभुत्व वाले दौर में ढलान की इस गरिमा को पहचानना असम्भव था। छायावाद की महत्वपूर्ण रचनाएं (कहने की जरूरत नहीं कि निराला की रचनाएं अपवाद हैं) धरती से स्वर्ग की ओर, धरातल से शिखर की ओर और नीचे से ऊपर की ओर मनुष्य की उठान को महिमामंडित करती हैं। जिस हद तक दिनकर ढलान की गरिमा को अभिव्यक्त करने में सफल होते हैं, उस हद तक ÷उर्वशी' नयी चेतना का काव्य बन कर उभरता है। ÷उर्वशी' की कथा जैसे जैसे आगे बढ़ती है, नयी चेतना का आवेग गहराता जाता है। मगर उसकी छायावादी सौन्दर्य दृष्टि जब धरती को स्वर्ग से बड़ा दर्जा देने वाली नयी चेतना के इस गहराते आवेग से टकराती है, उससे उलझती है तो अपनी धार खो बैठती है। परिणाम यह होता है कि कविता जिस नयी चेतना का वाहक बनना चाहती है, उसकी भाषा लगातार उससे दूर भागती है। नयी चेतना, नयी भाषा की मांग करती है। कवि इस नयी भाषा को कविता की परम्परागत भाषा में तोड़फोड़ करके प्राप्त करते हैं। मगर दिनकर को यह तोड़फोड़ मंजूर नहीं। हां, वह भाषा में कुछ ठोंकपीट अवश्य करते हैं, उसे विषयानुकूल बनाने के लिए। यह ठोंकपीट कहीं कहीं सफल भी हो जाती है। रानी औशीनरी की व्यथा को अभिव्यक्त करने वाली भाषा इसका उदाहरण है : दुख दर्द जतलाओ नहीं, ÷उर्वशी' में धरती और स्वर्ग, देह और आत्मा, मही और आकाश, देव और मनुज, मातृ सुख से वंचित अप्सरा नारी और मातृ सुख को भोगने वाली साधारण नारी के द्वंद्व को उकेरा गया है। मूलतः यह द्वंद्व काम और योग का द्वंद्व है। तमाम शब्दाडम्बर के बावजूद यह द्वंद्व तीसरे अंक में सर्वाधिक तीक्ष्ण है। पुरुरवा की इन पंक्तियों में यह द्वंद्व साकार रूप ग्रहण करता है : नहीं इतर इच्छाओं तक ही अनासक्ति सीमित है, इस पर आश्चर्यग्रस्त उर्वशी प्रश्न करती है : उर्वशी स्वर्ग की अप्सरा है, मगर इन प्रश्नों में धरती का नारीत्व गूंज रहा है। धरती और नारी जननी हैं। उर्वशी अपनी कसी हुई देहयष्टि का त्याग कर माता बनने को तैयार है। मां बनने पर उसका सौन्दर्य ढल जाएगा। मगर वह जानती है कि यह ढलान गरिमामय है। उर्वशी के मुख से फूटे इन प्रश्नों में नारीत्व की गरिमा छिपी है। ये प्रश्न पुरुरवा को देह के अधिकारों के प्रति सचेत करते हैं : मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूं, उर्वशी मानवीय भावना के उद्दाम आवेगों का प्रतिनिधित्व करती है। वह दृढ़ है कि ÷रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी' क्योंकि ÷निरी बुद्धि की निर्मितियां निष्प्राण हुआ करती हैं।' पुरुरवा का पुरुष भी ÷रक्त' को ÷बुद्धि' से अधिक बलशाली मानता है, मगर एकदम विपरीत कुसुम और कामिनी, बहुत सुंदर दोनों होते हैं, ÷उर्वशी' की भूमिका में दिनकर लिखते हैं : ÷÷भावना और तर्क, हृदय और मस्तिष्क, कला और विज्ञान अथवा निरुद्देश्य आनंद और सोद्देश्य साधना, मानवीय गुणों के ये जोड़े नवीन मनुष्य को भी दिखायी देते हैं और वे प्राचीन मानव को भी दिखाई पड़े थे। मनु और इड़ा का आख्यान तर्क, मस्तिष्क, विज्ञान और जीवन की सोद्देश्य साधना का आख्यान है; वह पुरुषार्थ के अर्थ पक्ष को महत्व देता है। किन्तु पुरुरवा उर्वशी का आख्यान भावना, हृदय, कला और निरुद्देश्य आनंद की महिमा का आख्यान है; वह पुरुषार्थ के काम पक्ष का माहात्म्य बताता है।'' ÷उर्वशी' में पुरुषार्थ के काम पक्ष के माहात्म्य का बोध किस तरह किया गया है इसका गवाह तृतीय अंक का यह संदेश है : ÷उर्वशी' यह संदेश देती है, मगर आगे बढ़ कर नहीं, बल्कि पीछे हटकर। उर्वशी आरम्भ में धरती और देह के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करती है। मगर अब वह ÷सौन्दर्य लहर' के बल द्वारा पुरुरवा को दीक्षित करने के क्रम में देह को भ्रम के रूप में निरूपित करने लगती है : यहां दिनकर के साहित्य बोध पर दृष्टिपात करना तस्वीर को कुछ और साफ करने में सहायक होगा। संयोग से इसके लिए ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, भूमिका के कुछ अंश को एक बार फिर उद्वृत करना होगा : ÷÷कला, साहित्य और विशेषतः काव्य में भौतिक सौन्दर्य की महिमा अखंड है। फिर भी, श्रेष्ठ कविता, बराबर, भौतिक से परे भौतिकोत्तर सौन्दर्य का संकेत देती है, ÷फिजिकल' को लांघ कर ÷मेटा फिजिकल' हो जाती है।'' इस तरह दिनकर की काव्य चेतना जिसे महत्वपूर्ण मानती है, वह ÷फिजिकल' नहीं, बल्कि ÷मेटा फिजिकल' है। अतः दिनकर की सौन्दर्य लहर, जिसकी श्रेष्ठता का बखान उर्वशी करती है, पाठक को बहा कर वहीं ले जाती है, जहां पुरुष अध्यात्म की चिन्तन लहर पहुंचती है। ये वेदांत से निःसृत पुरातन मूल्य हैं, जिन्हें आजादी के बाद सत्ता की बागडोर संभालने वाले भारत के तथाकथित नीति निर्माताओं ने परम्परा की संज्ञा दी और उन पर उदारता का मुलम्मा चढ़ाया। दिनकर भारतीय परम्परा की इसी शासकीय व्याख्या के अलम्बरदार थे। ÷उर्वशी' की रचनात्मक गत्वरता को जो शक्ति नियंत्रिात कर रही है, उसे ÷संस्कृति के चार अध्याय' में बिना किसी लागलपेट के देखा जा सकता है। दिनकर का वेदांती मन रामकृष्ण परमहंस के संदर्भ में भारतीय महापुरुष की व्याख्या इस तरह करता है : ÷÷किन्तु रामकृष्ण ने नारी की ऐसी निन्दा कभी नहीं की। अपनी पत्नी की तो उन्होंने प्रशंसा ही की है। हां, काम भोग को साधना की बाधा वे भी मानते थे और उनका भी उपदेश यही था कि नर नारी एक दूसरे से अलग रह कर ही अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। अपना उदाहरण देते हुए उन्होंने एक बार कहा था, ÷उन दिनों मुझे स्त्रिायों से डर लगता था। ... अब वह अवस्था नहीं रही। अब मैंने मन को बहुत कुछ सिखा पढ़ा कर इतना कर लिया है कि स्त्रिायों की ओर आनंदमयी माता के भिन्न भिन्न रूप जान कर देखा करता हूं। तो भी, यद्यपि, स्त्रिायां जगदम्बा के ही अंश हैं, तथापि साधु साधक के लिए वे त्याज्य ही हैं।'' (संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 494)। इस पर आगे दिनकर टिप्पणी करते हैं : ÷÷कामिनी और कांचन के विषय में किसकी क्या दृष्टि है तथा इनके आकर्षण से कौन कहां तक बचता है, यही वह कसौटी है जिस पर भारतीय महापुरुषों की जांच होती आयी है। रामकृष्ण इस कसौटी पर खरे उतरे।'' (वही)। स्पष्ट है कि किसी महापुरुष की भारतीयता का निकष यही है कि वह कामिनी और कांचन का परित्याग करे। इसी तरह दिनकर के वेदांती मन की गांठ का पता वहां भी चलता है जब ÷संस्कृति के चार अध्याय' में भारतीय सभ्यता पर इस्लामी प्रभाव के बारे में वह अनर्गल टिप्पणी करते हैं। छिपा नहीं देवत्व, रंच भर भी, इस मर्त्य वसन में, यह ÷अदेह विभा' भारतीय पुरुष अध्यात्म का ध्येय रही है। ÷उर्वशी' इसी पुरुष अध्यात्म का रूमान है क्योंकि यहां देह में डूब कर, उसकी तरंगों के आवेग में बह कर ÷अदेह' तक पहुंचा गया है। ÷अदेह विभा' की चमक बिखेरने के लिए देह का तिरस्कार नहीं, बल्कि स्वीकार है। छायावादी सौन्दर्यबोध और राष्ट्र व परम्परा की शासकीय धारणाओं का अनुभागी होने के चलते दिनकर को इस ÷अदेह' के पुंसत्व ने बंधक बना रखा है। इस बंधन के बावजूद उन्होंने देह को साधने की कोशिश की है। दिनकर को जिस सांस्कृतिक काव्यधारा का कवि माना जाता है वह नयी कविता आंदोलन के समानांतर प्रवाहित हुई थी। नयी कविता का नया भावबोध देह की महत्ता को नये सिरे से परिभाषित कर रहा था। दिनकर नयी कविता के बाहर के कवि हैं, फिर भी नये भावबोध के असर को उन्होंने शिद्धत से महसूस किया। अतः यह उचित ही कहा गया है कि नयी कविता के बिना ÷उर्वशी' की कल्पना कठिन थी। विडम्बना यह है कि दिनकर के पिछड़े संस्कार नयी चेतना के साथ ज्यादा दूर तक नहीं जा पाये। देह धारण करने के बावजूद उनकी उर्वशी ÷अदेह' का ही गुणगान करती रही। दिनकर की काव्य भाषा भी देह के साथ उतनी सहज नहीं, जितनी कि ÷अदेह' के साथ। सबसे ध्यान देने योग्य यह है कि ÷उर्वशी' का काव्य देह से ÷अदेह' में संक्रमित हो जाता है, महज भावोच्छवास द्वारा। अतः ÷उर्वशी' वास्तविकता के किसी धरातल को तोड़ने के बजाए हवाई किले बनाने लगती है। ÷उर्वशी' का आरम्भ नारी सौन्दर्य के सम्बंध में जिस नयी संवेदना की उम्मीद जगाता है, उसका अंत नारीत्व की पिटी पिटायी सनातनी अवधारणा का साक्ष्य बनता है : चलते चलते कुछ बातें दिनकर की उस टिप्पणी पर जो उन्होंने पुरुरवा उर्वशी के पुत्र आयु के सम्बंध में की है। वह ÷उर्वशी' की भूमिका में लिखते हैं :÷÷जब देवी सुकन्या यह सोचती है कि नर नारी के बीच संतुलन कैसे लाया जाए, तब उनके मुंह से यह बात निकल पड़ती है कि यह सृष्टि, वास्तव में, पुरुष की रचना है। इसलिए रयचिता ने पुरुषों के साथ पक्षपात किया, उन्हें स्वत्व हरण की प्रवृत्तियों से पूर्ण कर दिया। किन्तु, पुरुषों की रचना आदि नारियां करने लगें, तो पुरुष की कठोरता जाती रहेगी और वह अधिक भावप्रवण एवं मृदुलता से युक्त हो जाएगा। TOP (Back to अनुक्रम) |