काशीनाथ सिंह - ऐसे रचनाशिल्पी जिनसे खराब क्या, औसत भी, कभी लिखा नहीं जाता। पिछले कई दशक का साहित्यिक समय इस बात का साक्ष्य है कि उनकी अधिसंख्य रचनाएं औसतपन के विरुद्ध विशिष्टता का प्रतिवाद हैं। ÷ रेहन पर रग्घू' उनकी रचना यात्राा का न केवल नवीनतम बल्कि बेजोड़ पड़ाव है। इस उपन्यास के बारे में स्वयं काशीनाथ सिंह का कहना है - ÷÷ काशी का अस्सी मेरा नगर था मगर ÷ रेहन पर रग्घू' मेरा घर है।'' गांव शहर, युवा वृद्ध, जीवन मृत्यु जैसे अनेक विपर्ययों के तनावों से निर्मित इस उपन्यास में पिछले दो दशक के भारतीय यथार्थ के कोहराम से सामना है। पाठकों के लिए इस उपन्यास को हम सगर्व प्रस्तुत कर रहे हैं।
जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!
शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर! थोड़ी देर पहले धूप थी। उन्होंने खाना खाया था और खाकर अभी अपने कमरे में लेटे ही थे कि सहसा अंधड़। घर के सारे खुले खिड़की दरवाजे भड़ भड़ करते हुए अपने आप बंद होने लगे खुलने लगे। सिटकनी छिटक कर कहीं गिरी , ब्यौंड़े कहीं गिरे जैसे धरती हिल उठी हो, दीवारें कांपने लगी हों। आसमान काला पड़ गया और चारों ओर घुप्प अंधेरा।
वे उठ बैठे!
आंगन और लान बड़े बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गये और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी - धड़ाम! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूंदें नहीं थीं - जैसे पानी की रस्सियां हों जिन्हें पकड़ कर कोई चाहे तो वहां तक चला जाय जहां से ये छोड़ी या गिरायी जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे - दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नहीं, खिड़कियों से अंदर आंखों में।
इकहत्तर साल के बूढे+ रघुनाथ भौंचक! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है?
उन्होंने चेहरे से बंदरटोपी हटायी , बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गये!
खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।
घर के बाहर ही कदम्ब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था - अंधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था!
ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया - साठ बासठ साल पहले! वे स्कूल जाने लगे थे - गांव से दो मील दूर! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुंचे ही थे कि अंधड़ और बारिश और अंधेरा! सबने आम के पेड़ों के तने की आड़ लेनी चाही लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खंधों में ले जाकर पटका! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं! बारिश की बूंदें उनके बदन पर गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने के बाद - जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गांव से लोग लालटेन और चोरबत्ती लेकर निकले थे ढूंढ़ने!
यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी क्या ?
और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।
कितने दिन हो गये बारिश में भींगे ?
कितने दिन हो गये लू के थपेड़े खाये ?
कितने दिन हो गये जेठ के घाम में झुलसे ?
कितने दिन हो गये अंजोरिया रात में मटरग़श्ती किये ?
कितने दिन हो गये ठंड में ठिठुर कर दांत किटकिटाये ?
क्या ये इसीलिए होते हैं कि हम इनसे बच के रहें ? बच बचा के चलें? या इसलिए कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएं, इनसे दोस्ती करें, बतियाएं, सिर माथे पर बिठायें?
हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्राु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा ?
इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएंगी! वे चले जायेंगे और इस धरती का वैभव , इसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार, जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आंखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जायं, आंखें रह जाएंगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुंचाती रहेंगी!
उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो , जब उनके लिये सूरज ही न उगे। उगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे - वे नहीं! क्या यह सम्भव नहीं कि वे सूरज को बांध के अपने साथ ही लिए जायं - न वह रहे, न उगे, न कोई और देखे! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस किस चीज को बांधेंगे और किस किस को देखने से रोकेंगे?
उनकी बाहें इतनी लम्बी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जियें तो सबके साथ!
लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था - कल तक कहां था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चांद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहां थी यह तड़प? फुर्सत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पांव कमरे में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है?
सच सच बताओ रघुनाथ , तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे से गांव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक बिहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?
लेकिन रघुनाथ यह सब नहीं सुन रहे थे। यह आवाज बाहर की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर में दब गयी थी। वे अपने वश में नहीं थे। उनकी नजर गयी कोने में खड़ी छड़ी और छाता पर! जाड़े की ठंड यों भी भयानक थी और ऊपर से ये ओले और बारिश। हिम्मत जवाब दे रही थी फिर भी उन्होंने दरवाजा खोला। खोला या वे वहां खड़े हुए और अपने आप खुल गया! भींगी हवा का सनसनाता रेला अंदर घुसा और वे डर कर पीछे हट गये! फिर साहस बटोरा और बाहर निकलने की तैयारी शुरू की! पूरी बांह का थर्मोकोट पहना , उस पर सूती शर्ट, फिर उस पर स्वेटर, ऊपर से कोट। ऊनी पैण्ट पहले ही पहन चुके थे। यही सुबह जाड़े में पहन कर टहलने की उनकी पोशाक थी! था तो मफलर भी लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था - गमछा! बारिश को देखते हुए! जैसे जैसे कपड़े भींगते जाएंगे, वे एक एक कर उतारते और फेंकते चले जाएंगे और अंत में साथ रह जाएगा यही गमछा!
वे अपनी साज सज्जा से अब पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन नंगे बिना बालों के सिर को लेकर दुविधा में थे - कनटोप ठीक रहेगा या गमछा बांध लें।
ओले जो गिरने थे , शुरू में ही गिर चुके थे, अब उनका कोई अंदेशा नहीं!
उन्होंने गमछे को गले के चारों ओर लपेटा और नंगे सिर बाहर आये!
अब न कोई रोकने वाला , न टोकने वाला। उन्होंने कहा - ÷÷ हे मन! चलो, लौट कर आये तो वाह वाह! न आये तो वाह वाह!''
बर्फीली बारिश की अंधेरी सुरंग में उतरने से पहले उन्होंने यह नहीं सोचा था कि भींगे कपड़ों के वजन के साथ एक कदम भी आगे बढ़ना उनके लिये मुश्किल होगा।
वे अपने कमरे से तो निकल आये लेकिन गेट से बाहर नहीं जा सके!
छाता खुलने से पहले जो पहली बूंद उनकी नंगी , खल्वाट खोपड़ी पर गिरी, उसने इतना वक्त ही नहीं दिया कि वे समझ सकें कि यह बिजली तड़की है या लोहे की कील है जो सिर में छेद करती हुई अंदर ही अंदर तलवे तक ठुंक गयी है! उनका पूरा बदन झनझना उठा। वे बौछारों के डर से बैठ गये लेकिन भींगने से नहीं बच सके। जब तक छाता खुले, तब तक वे पूरी तरह भींग चुके थे!
अब वे फंस चुके थे - बर्फीली हवाओं और बौछारों के बीच। हवा तिनके की तरह उन्हें ऊपर उड़ा रही थी और बौछारें जमीन पर पटक रही थीं! भींगे कपड़ों का वजन उड़ने नहीं दे रहा था और हवा घसीटे जा रही थी! उन्हें इतना ही याद है कि लोहे के गेट पर वे कई बार भहरा कर गिरे और यह सिलसिला सहसा तब खत्म हुआ जब छाता की कमानियां टूट गयीं और वह उड़ता हुआ गेट के बाहर गायब हो गया। अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे हवा जगह जगह से नोच रही हो और पानी दाग रहा हो - जलते हुए सूजे से!
अचेत होकर गिरने से पहले उनके दिमाग में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा - उनका मित्रा! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश कीं - पहली बार लोहता स्टेशन के पास रेल की पटरी पर नगर से दूर निर्जन जहां किसी का आना जाना नहीं था! समय उसने सामान्य पैसेंजर या मालगाड़ी का नहीं, एक्सप्रेस या मेल का चुना था कि जो होना हो, ÷ खट' से हो, पलक झपकते, ताकि तकलीफ न हो। वह पटरी पर लेटा ही था कि मेल आता दिखा! जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्।
यह मरने से ज्यादा बुरा हुआ! बैसाखियों का सहारा और घर वालों की गालियां और दुत्कार! एक बार फिर आत्महत्या का जुनून सवार हुआ उस पर! अबकी उसने सिवान का कुआं चुना! उसने बैसाखी फेंक छलांग लगायी और पानी में छपाक् कि बरोह पकड़ में आ गयी! तीन दिन बिना खाये पिये भूखा चिल्लाता रहा कुएं में - और निकला तो दूसरे टूटे पैर के साथ!
आज वही ज्ञानदत्त - बिना पैरों का ज्ञानदत्त - चौराहे पर पड़ा भीख मांगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा! मगर यह कम्बख्त+ ज्ञानदत्त उनके दिमाग में आया ही क्यों? वे मरने के लिये तो निकले नहीं थे? निकले थे बूंदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।
( २)
पहाड़पुर में रघुनाथ एक ही थे।
वैसे कहने को तो रामनाथ , शोभनाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ वगैरह वगैरह भी थे लेकिन वे रघुनाथ नहीं थे।
और रघुनाथ का यह था कि वे जब कभी जहां कहीं नजर आ जाते , गांव घर के लोग जल भुन कर एक ठंडी आह भरते - वाह! क्या किस्मत पायी है पट्ठे ने!
रघुनाथ पहाड़पुर गांव के अकेले लिखे पढ़े आदमी। डिग्री कालेज में अध्यापक। दुबले पतले लम्बे छरहरे बदन के मालिक। शुरू के दस वर्षों तक साइकिल से आते जाते थे , बाद में स्कूटर से। पिछली सीट पर कभी बेटी बैठती थी, बाद के दिनों में बेटे। कभी एक, कभी दोनों। आखिर पांच छः मील का मामला था।
हर सुखी और सफल आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने , आगे बढ़ने और ऊंचाइयां छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिये थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किये थे, उनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गये थे और उन्हें अपने नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था। वे पतले और लम्बे थे इसलिए थोड़ा झुक कर चलते थे। कहीं आते जाते समय, किसी से मिलते जुलते बोलते बतियाते समय थोड़ा झुके रहते थे। पहली बार उन्होंने अपने संदर्भ में किसी दूसरे से बात करते समय पिं्रसिपल साहब के मुंह से ÷ विनम्रता' शब्द सुना। ऐसा उनकी प्रशंसा में कहा गया था। जिस झुके रहने पर वे शर्म महसूस करते थे, वही उनकी खूबी है - यह नया बोध हुआ। इसमें उन्होंने आगे चल कर दो खूबियां और जोड़ दीं - मुसकान और सहमति। कोई कुछ कहे, वे मुसकराते रहते थे और समर्थन में सिर हिलाते रहते थे। यह तभी सम्भव है जब आप अपनी तरफ से कम से कम बोलें।
इस तरह रघुनाथ ने विनम्रता , मितभाषिता और मुसकान के साथ जीवन की यात्राा शुरू की थी।
और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे ÷ किस्मत' कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!
हुआ यह कि एक बार वे कालेज से साइकिल से घर लौटने को हुए तो पाया - चेन टूट गयी है। उन्होंने साइकिल कालेज में ही छोड़ दी और पैदल चल पड़े। गर्मी का मौसम, धूप तेज, हवा का नाम नहीं, बदन पसीने से तर ब तर। रास्ते में कहीं पेड़ पालो नहीं। आकाश में बादल थे लेकिन दूर। उनके मन ने कहा - काश! वे बादल उनके सिर के ऊपर होते छाता की तरह। और देखिए, एक फर्लांग ही आये होंगे कि बादल सचमुच उनके सिर के ऊपर। और यही नहीं, वे उनके साथ साथ छाया किये हुए गांव तक आये!
अगले दिन ने यह साबित कर दिया कि वह मात्रा भ्रम नहीं था। वे क्लास लेने के लिए रजिस्टर लेकर जैसे ही चले , वैसे ही ध्यान गया कि कलम नहीं है। या तो घर छूट गयी या रास्ते में गिर गयी। वे अभी क्लास में पहुंचे भी नहीं थे कि सामने घास में गिरी एक कलम दिखी - धूप में चमकती हुई।
ऐसी बातें औरों के साथ भी होती होंगी लेकिन जाने क्यों , उन्हें लगने लगा कि दीनदयालु परमपिता की उन पर विशेष कृपा है। वह उनकी हर सुविधा असुविधा का ध्यान रखते हैं। इसीलिए वे जो चाहते हैं, वह देर सबेर होकर रहता है।
और देखिए कि उन्होंने जब जब चाहा , जो जो चाहा सब होता गया।
उन्हें कुछ करना नहीं पड़ा , अपने आप होता गया।
पढ़ाई खत्म करने के बाद रघुनाथ रिसर्च कर रहे थे और उनका मन नहीं लग रहा था। आख़िर कब तक करते रहेंगे रिसर्च ? कहीं नौकरी मिल जाती तो जान बचती!
और बहुत दिन नहीं बीते कि नौकरी मिल गयी।
इसका श्रेय उन्होंने हाल में जन्मी अपनी बेटी को दिया। बेटी लक्ष्मी होती है। वही अपने साथ और अपने लिए उनकी नौकरी लेकर आयी थी। लेकिन अब इसके बाद एक बेटा चाहिए। यह उन्होंने नहीं , उनके दिल ने कहा।
और देखिए , चार साल बाद बेटा भी आ गया। उसके बाद एक और बेटा - बस!
इस तरह एक बेटी , दो बेटे, शीला और रघुनाथ - सब मिला कर पांच जनों का परिवार। छोटा परिवार, सुखी परिवार! परिवार सुखी रहा हो या न रहा हो - रघुनाथ सुखी नहीं थे। जिन्दगी उनके लिए पहाड़पुर की धूल धक्कड़ और हंसी खेल नहीं थी। पैदा ही होना था तो स्वयं कीड़े मकोड़े की योनि में क्यों नहीं पैदा हुए? वे वहां भी पैदा हो सकते थे लेकिन नहीं, ईश्वर ने यदि उन्हें ऋषियों मुनियों के लिए दुर्लभ योनि में पैदा किया है तो इसके पीछे उसका कोई मकसद रहा होगा - कि जाओ, साठ सत्तर साल का मौका देते हैं तुम्हें; जाओ, धरती को सुंदर और सुखी बनाओ। धरती सुंदर और सुखी तभी होगी जब तुम्हारे बच्चे सुखी, सुंदर और सम्पन्न होंगे। तुम्हें जो बनना था, वह तो बन चुके; अब बच्चे हैं जिनके आगे सारी जिन्दगी और दुनिया पड़ी है। वही तुम्हारे भी भविष्य हैं। जियो तो उन्हीं की जिन्दगी, मरो तो उन्हीं की जिन्दगी।
और रघुनाथ ने यही किया। उनकी सारी शक्ति और सारी बुद्धि और सारी पूंजी उन्हें ही संवारने में लगी रही!
उन्होंने चाहा - सरला पढ़ लिख कर नौकरी करे।
सरला पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी।
उन्होंने चाहा - संजय साफ्टवेयर इंजीनियर बने।
संजय साफ्टवेयर इंजीनियर ही नहीं बना , अमेरिका पहुंच गया!
उन्होंने चाहा - मैनेजर समधी बनें!
संजय ने यह नहीं चाहा! उसने वह किया जो उसने चाहा!
रघुनाथ का चाहा रह गया। दयानिधान कोई मदद नहीं कर सके उनकी! उन्हें अफसोस इस बात का था कि मैनेजर ने इसे बाप बेटे की मिलीभगत समझा था! वे काफी मानसिक तनाव में चल रहे थे लेकिन कालेज के उनके सहयोगियों ने उन्हें बधाइयां देकर राहत पहुंचायी - कि अच्छा हुआ, एक अंधी खाईं में गिरने से बच गये! इसमें प्रिंसिपल का रोल और अच्छा था। उसने लगभग तीस साल पहले रघुनाथ के साथ ही ज्वाइन किया था कालेज! दोनों का याराना सा था! जब भी मिलते, हंसी मजाक और हाहा हूहू करते! उसने एक दिन धीरे से कहा - ÷÷ रघुनाथ, मुझे आश्चर्य है कि इतनी सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आयी? वह तुम्हारी ही बेटी के बदले तुम्हारे बेटे को खरीद रहा था!''
इस तरह रघुनाथ सहज हो ही रहे थे कि एक दिन घर पर उन्हें प्रिंसिपल के हस्ताक्षर से नोटिस मिली। आरोप दो थे - ÷ नेग्लिजेंस आफ ड्यूटी' और ÷ इनसबार्डिनेशन'! ऐसा कोई संकेत अपनी बातों में नहीं दिया था उसने। पहले कभी!
ये दोनों आरोप निराधार! इसे रघुनाथ ही नहीं , सहयोगी भी जानते थे और प्रिंसिपल भी। सबकी सहानुभूति उनके साथ थी, लेकिन साथ देने को कोई तैयार नहीं था! उन्होंने उत्तर दे दिया था मगर जानते थे कि इससे कोई लाभ नहीं। वे बदहवास से यहां से वहां दौड़ते रहे। आजिज आकर प्रिंसिपल से मिले और उससे सलाह मांगी। उसने कहा - ÷ देखो रघुनाथ, चाहे तुम जितनी दौड़ धूप करो, निलम्बन का मन बना चुका है मैनेजर! उसकी शक्ति और पहुंच को जानते हो तुम! इसके बाद तुम कचहरी जाओगे, मुकदमा लड़ोगे, वह कब तक चलेगा कोई नहीं जानता। हो सकता है, फैसला होने के पहले ही तुम मर जाओ! हां, जब तक मुकदमा चलेगा, तब तक पेन्शन रुकी रहेगी। यह सब देख कर मेरी तो सलाह है कि तुम वी.आर.एस. ( वालंटरी रिटायरमेण्ट स्कीम) ले लो!
रघुनाथ बहुत देर तक चुप रहे! उनसे कुछ बोला नहीं गया!
÷÷ ठीक है लेकिन मेरी एक मदद करें आप!''
÷÷ बोलो, क्या कर सकता हूं मैं?''
÷÷ निलम्बन आप तब तक लटकाये रखें जब तक बेटी की शादी न हो जाय! फिर तो वही करूंगा जो आपने कहा है!''
मनुष्यता का तकाजा था ऐसा करना! प्रिंसिपल ने चिंतित होकर कहा - ÷÷ जाओ, कोशिश करूंगा लेकिन कहीं कहना मत!''
आखिरकार प्रिंसिपल कब तक इंतजार करता?
( ३)
ऐसी मुसीबत में रघुनाथ को किसी और ने नहीं , उन्हीं के बेटों ने डाला था!
बेटों में भी संजय ने! खासतौर से संजय ने!
और यह लम्बी कहानी है - रांची से कैलिफोर्निया तक फैली।
संजय ने प्यार किया था सोनल को! यह प्यार किसी सड़कछाप टुच्चे युवक का दिलफेंक प्यार नहीं था , इसमें गुणा भाग भी था और जोड़ घटाना भी! जितना गहरा था, उतना ही व्यापक! सोनल संजय के प्रोफेसर सक्सेना की इकलौती बेटी थी! थू्र आउट फर्स्ट क्लास, नेट और दर्शन से पीएचडी। नौकरी तो पक्की थी बनारस के विश्वविद्यालय में जहां उसके मामा कुलपति थे- लेकिन उसमें अभी देर थी; तब तक शादी का इंतजार था!
शादी के आडे+ आ रहे थे उसके ओठों से बाहर आ गये दांत और चिपटी नाक जिनकी क्षतिपूर्ति वह अपने सर्टिफिकेट से करती थी! रही सही कसर पूरी कर रही थी सक्सेना की फैलायी हुई यह अफवाह - कि उन्हें एक ऐसे जहीन साफ्टवेयर इंजीनियर युवक की जरूरत है जो एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के तीन साल के कंट्रैक्ट पर कैलिफोर्निया जा सके। इस जरूरत का मतलब पूरा इंस्टीट्यूट समझता था।
संजय फाइनल की परीक्षा दे चुका था , रिजल्ट की घोषणा बाकी थी!
इधर कई बार मां बाप का संदेश आया था कि आओ , लड़की देख जाओ!
लड़की क्या देखना , वह देखी भाली थी! रघुनाथ जिस कालेज में पढ़ाते थे, उसी के मैनेजर और पूर्व विधायक की बेटी थी! गोरी, लम्बी, सुंदर, आकर्षक। एम.ए.। अच्छी हाउस वाइफ! मैनेजर पुराने जमाने के जमींदार, अथाह सम्पत्ति के स्वामी! रघुनाथ की कोई हैसियत नहीं थी उनके आगे। न कायदे के घर दुआर, न जमीन जायदाद। आठ बीघे खेत और एक हल की खेती! बचपन और जवानी तंगहाली में गुजारी थी। बच्चों को पढ़ाया भी तो खेत रेहन रख कर और कालेज से लोन लेकर। जाहिर है, मैनेजर ने ÷ साफ्टवेयर इंजीनियर' देखा था, अपने कालेज के मास्टर रघुनाथ को नहीं।
यह सम्बंध सपने से भी आगे की चीज था रघुनाथ के लिए। फायदे ही फायदे थे इससे! जनपद में पहचान और प्रतिष्ठा जो मिलती , सो अलग! वे क्या से क्या होने जा रहे थे!
तो , गांव आने से पहले सक्सेना सर से विदा लेने गया था संजय!
इसे यों भी कह सकते हैं कि उसे डिनर पर बुलाया था सक्सेना सर ने!
गर्मी की शाम! अपने लान में सक्सेना बेंत की कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे। माली गमलों में पानी दे रहा था। बंगले के अंदर की बत्तियां जल रही थीं। किसी कमरे से संगीत की धुन आ रही थी! रिटायरमेण्ट के करीब , दिल के मरीज प्रो. सक्सेना संजय की मौजूदगी से बेखबर चुपचाप बैठे थे और सामने देख रहे थे। काफी देर बाद उन्होंने पूछा - ÷÷ कौन सा इंस्ट्रईमेण्ट है?''
संजय ने नासमझी में सिर हिलाया!
÷÷ और राग? कौन सा राग है?''
संजय निरुत्तर , फिर सिर हिलाया!
वे मुसकराये और ऊंची आवाज में पुकारा - ÷÷ सोनू!''
जीन्स के पैण्ट और टीशर्ट में उछलती हुई सोनल आयी - ÷ हां पापा!'
संजय खड़ा हो गया। सक्सेना मुसकराये , पहले संजय को देखा, फिर सोनल को! सोनल भी मुसकरायी। संजय सोनल से मिला तो कई बार था, लेकिन देखा पहली बार। उसे लगा कि किसी लड़की को टुकड़ों में नहीं, ÷ टोटैलिटी' में देखना चाहिए! कितना फर्क पड़ जाता है? साथ ही लड़की और पत्नी को एक ही तरह से नहीं देखना चाहिए। रूप रंग, हाव भाव, नाज नखरे लड़की में देखे जाते हैं, पत्नी में नहीं! ये सब पुराने कंसेप्शन हुए - हमारे पापा मम्मी के जमाने के, हमारे नहीं!
सक्सेना ने चुप्पी तोड़ी - ÷÷ यह है सोनल! जिसमें मेरे प्राण बसते हैं। सितार, सरोद, संतूर - माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस इसे पसंद नहीं। फिल्मी गानों को संगीत नहीं मानती! शायद इसलिए कि खुद कथक की डांसर रही है! खैर, तो क्या खिला रही हो हम लोगों को भाई?''
÷÷ वह तो तभी पता चलेगा जब खाएंगे!'' सोनल शर्मा कर भाग गयी!
÷÷ बैठो संजू!'' कहते हुए सक्सेना भी बैठ गये - सिर झुकाये। कुछ सोचते! भर्राये स्वर में बोले - ÷÷ कैसे रहूंगा इसके बगैर? रहूंगा कैसे, समझ में नहीं आता। चौदह साल की थी जब मां गुजरी थी इसकी!''
इसके बाद उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे - ÷÷ तीन चार साल से लगातार आते रहे हैं लड़के। एक से एक। तुम्हारे सीनियर भी, क्लासफेलो भी! लेकिन बेटा, भारी संकट में हूं। तुम्हीं उबार सकते हो इससे! पिछले साल ही कहा था इसने कि शादी करूंगी तो संजय से। नहीं तो जरूरी नहीं है शादी। अपने अंदर छिपाए रहा इस बात को। आज कह रहा हूं वह भी इसलिए कि फैसले की घड़ी आ गयी है! तीन ही चार महीने का समय है कैलिफोर्निया जाने का। इसी बीच शादी है, एयर टिकट है, पासपोर्ट है, बीजा है, सारी तैयारियां हैं। सोनल अमेरिका और हनीमून को लेकर उत्साहित है।''
उन्होंने आंखें पोंछी और संजय को देखा - ÷÷ हर बाप के सपने होते हैं। मेरे भी हैं। न होते तो सैन्ट्रो कार क्यों लेता? अपने लिए फिएट तो थी ही! नयी घर गृहस्थी के सामान क्यों जुटाता? तुम्हारे ही नगर में एक कालोनी है - ÷ अशोक विहार' । उसमें एक छोटा सा बंगला बनवाया है! सब कुछ कम्प्लीट है, बस फिनिशिंग बाकी है। सोचा था कि यहां से रिटायर करूंगा तो ÷ काशी वास' करूंगा! हर आदमी यह चाहता है। तुम्हारे पापा मम्मी भी चाहते होंगे। लेकिन सोचता हूं कल सोनल विश्वविद्यालय में ज्वाइन करेगी, तो कहां रहेगी? मेरा तो सारा जीवन रांची में बीता, सारे दोस्त मित्रा, रिश्ते नाते यहीं हैं, वहां जाकर क्या करेंगे? सो, बंगला उसी के नाम ट्रांसफर कर दे रहा हूं।''
संजय चिन्तित। उसकी आंखों में पापा मम्मी के चेहरे घूम रहे थे। उसे लगने लगा था कि उसने उन्हें ÷ हां' करने में जल्दी कर दी थी! बोला - ÷÷ बहुत देर कर दी सर, सोनल का मन बताने में!''
÷÷ देर सबेर कुछ नहीं होता संजू, हर चीज का समय होता है! अब यही देखो, मेरे साले प्रो. अस्थाना को बनारस में ऐसे ही वक्त पर कुलपति क्यों होना था जब सोनल थीसिस जमा कर रही थी!'' उन्होंने सिगरेट सुलगायी - ÷÷ ऐसे तो सिगरेट मना है लेकिन कभी कभी एक दो कश ले लेता हूं!..... तो तुम्हारे पापा, उनकी परेशानियां समझ सकता हूं। बताते रहे हो उनके बारे में। अभी तक बहन अविवाहित है, परेशान हैं उसकी शादी को लेकर। छोटा भाई है तुम्हारा, पिछले तीन चार साल से ÷ कैट' ÷ मैट' दे रहा है, लोकसेवा आयोग के टेस्ट दे रहा है और किसी में नहीं आ रहा है - उसकी परेशानी! बाई द वे, मेरी तो सलाह है कि वह फ्रस्ट्रेटेड होकर कुछ कर बैठे इससे पहले किसी मैनेजमेण्ट इंस्टीट्यूट में एडमीशन करा दो। ऐसे नहीं, तो डोनेशन देकर! अरे, कितना लगेगा - डेढ़ लाख? दो लाख और क्या? तुमने बताया था कि तुम्हारी पढ़ायी के लिए लोन भी लेते रहे हैं, रेहन भी रखे हैं खेत - इन सारी परेशानियों से निपटने के लिए कितने की जरूरत होगी उन्हें? उनसे बतिया कर तो देखो। क्या चाहते हैं वे? कितना चाहते हैं? देखो, बारात, धूम धाम, बाजा गाजा - ये सब फालतू की चीजें हैं। कोई जरूरत नहीं इस दिखावे और तमाशे की। शादी के लिए कोर्ट है और दोस्त मित्राों के लिए रिसेप्शन। यह मैं कर ही दूंगा, फिर? .... ऐसे एक बात बता दूं, जिस कम्पनी में और जिस कंट्रैक्ट पर अमरीका जाना है, उससे तीन साल में कोई भी इतना कमा लेगा कि अगर उसका बाप चाहे तो गांव का गांव खरीद ले। समझे?''
÷÷ सवाल यह नहीं है सर, पिता जी लोक लाज, जांत पांत में विश्वास करने वाले जरा पुराने खयालों के आदमी हैं!''
सक्सेना गम्भीर हो गये। कुछ देर तक चुप रहे। इसी बीच सोनल साड़ी में आयी - खाने पर बुलाने - ÷ देखो संजू! ÷ ला आफ ग्रेविटेशन' का नियम केवल पेड़ों और फलों पर ही नहीं लागू होता, मनुष्यों और सम्बंधों पर भी लागू होता है। हर बेटे बेटी के मां बाप पृथ्वी हैं। बेटा ऊपर जाना चाहता है - और ऊपर, थोड़ा सा और ऊपर, मां बाप अपने आकर्षण से उसे नीचे खींचते हैं। आकर्षण संस्कार का भी हो सकता है और प्यार का भी, माया मोह का भी! मंशा गिराने की नहीं होती, मगर गिरा देते हैं! अगर मैंने अपने पिता की सुनी होती तो हेतमपुर में पटवारी रह गया होता! तो यह है! मुझे जो कहना था, कह चुका। तुम्हें जो ठीक लगे, करो! हां, जाने से पहले सोनल से भी बात कर लेना!
( ४)
जुलाई में शादी हो गयी चिरंजीवी संजय और आयुष्मती सोनल की - कोर्ट में।
न बारात , न बाजा गाजा!
प्रीतिभोज के लिए न्यौता आया था रघुनाथ के नाम भी , पर वे नहीं गये!
ऐसी चोट लगी थी रघुनाथ और शीला को जिसे न वे किसी को दिखा सकते थे , न किसी से छिपा सकते थे। ऐसी जगहों पर जाना उन्होंने बंद कर दिया था जहां दो चार लोग बैठे हों। उन्होंने मान लिया था कि दो बेटों में से एक बेटा मर गया। जब मां बाप की प्रतिष्ठा की चिन्ता नहीं तो मरा ही समझिए!
सितम्बर में वे अमेरिका जायं चाहे जहन्नुम - इससे कोई मतलब नहीं।
इसी दिन के लिए उन्होंने पाल पोस कर बड़ा किया था , पढ़ाया लिखाया था, पेट काटे थे, कर्जे लिए थे, खेत रेहन रखे थे और दुनिया भर की तवालतें सही थीं!
इनके लाख मना करने के बावजूद राजू गया था। राजू यानि संजय का भाई धनंजय! लौटा तो हाथ में एक ब्रीफकेस था रघुनाथ के लिए जिसे सक्सेना ने भिजवाया था।
रघुनाथ कालेज की तैयारी कर रहे थे। बेमन से ब्रीफकेस को देखा और कहा - ÷÷ रख दो!''
÷÷ अरे? ऐसे कैसे रख दूं? अपने संदूक में रखिए!''
बाबा आदम के जमाने की संदूक जिसमें जाने क्या क्या रखते थे रघुनाथ और उसकी ताली किसी को नहीं देते थे। बिना कुछ बोले उन्होंने उसकी ओर ताली फेंक दी!
राजू ने ब्रीफकेस संदूक में रखा और ताली उन्हें पकड़ाते हुए कहा - ÷÷ और कुछ नहीं पूछिएगा?
शीला उदास मन दरवाजे पर खड़ी थी , अंदर चली गयी!
÷÷ आप लोग तो ऐसा सन्न मारे हुए हैं जैसे गमी हो गयी हो!'' राजू हंसते हुए मां के पीछे पीछे अंदर चला - ÷÷ बहू ऐसी कि लाखों में एक। मां, चिन्ता न करो। सब करेगी वो जो संजू बोलता था! हाथ पांव दबाएगी वो, मूंड़ दबाएगी वो, बरतन मांजेगी वो, झाडू लगाएगी वो, खाना पकाएगी वो - जो जो चाहिए, सब करेगी! जरा अमेरिका से लौट तो आने दो। अभी तो हनीमून पर जा रही है दार्जिलिंग, वहां से दमदम एयरपोर्ट, फिर वहां से अमेरिका। बच गयी तुम, अगर आयी होती तो मुंहदिखायी देनी पड़ती। यल्लो। तुम्हारे लिए फोटो भिजवाया है रिसेप्शन का!...''
राजू और भी न जाने क्या क्या बोलता रहा , वह सुनती भी रही, नहीं भी सुनती रही!
फोटो जोड़े का वहीं पड़ा था जहां वह बैठी थी। एक मन कह रहा था - ÷÷ देखो।'' दूसरा कह रहा था - ÷÷ छोड़ो, जाने दो!''
सारी साधें धरी रह गयी थीं।
रात ढल चुकी थी।
गांव में सोता पड़ चुका था!
एक दिन पहले जम कर पानी बरसा था! सिवान गुलजार हो गया था। झींगुरों की झनकार से पूरा गांव झनझना रहा था। बादल उसके बाद भी छाये रहे। दूर आकाश में बिजली भी चमकती रही। उधर कहीं बारिश हुई हो तो हुई हो , इधर नहीं हुई।
रघुनाथ का घर दुआर गांव के बाहरी हिस्से में था! घर का अगला हिस्सा दुआर , पिछला घर। दुआर का मतलब दालान और बरामदा! इसी बरामदे में सोते थे रघुनाथ और राजू! राजू के सो जाने के बाद चुपके से आधी रात को रघुनाथ अंदर आये, ढिबरी जलायी और संदूक खोल कर ब्रीफकेस निकाला!
जब वे ढिबरी और ब्रीफकेस लेकर शीला के बगल वाली कोठरी में गये तो याद आया कि राजू ने इसकी चाबी नहीं दी है। उन्होंने धीरे से राजू को जगाया। राजू ने बताया कि वह ताली से नहीं , नम्बर से खुलेगा - इन नम्बरों से! और बड़बड़ाते हुए सो गया!
रघुनाथ ने ब्रीफकेस खोला तो भाव विभोर! बेटे संजय के प्रति सारी नाराजगी जाती रही! रुपयों की इतनी गड्डियां एक साथ एक ब्रीफकेस में अपनी आंखों के सामने पहली बार देख रहे थे और यह कोई फिल्म नहीं , वास्तविकता थी।
रघुनाथ की छवि गांव वालों की नजर में झंगड़ा झंझट से दूर रहने वाले जितने शरीफ आदमी की थी उतनी ही सोंठ आदमी की - एक रुपैया में आठ अठन्नी भुनाने वाले आदमी की। लोग यह भी कहने लग गये थे कि बहुत लोभ न किया होता तो यह दिन उन्हें न देखना पड़ता।
रघुनाथ ने मेज को पास खींचा - पहले सौ सौ के नोटों की गड्डियां गिननी शुरू कीं! वे एक एक बंडल की संख्या नोट करते जाते। फिर पांच पांच सौ की गड्डियां उठायीं और अलग नोट करना शुरू किया। गिनते गिनते आधी रात हो गयी और टोटल किया तो चार लाख साठ हजार!
उनका दिल धड़का! चिन्ता हुई। अगर गिनने में गलती भी हुई हो तो इतनी कैसे ? वे उठ कर गये और दुबारा संदूक में झांक आये। आते समय रसोई से कटोरी में पानी ले रहे थे तो शीला जाग गयी। उन्होंने नये सिरे से उंगली भिंगो भिंगो कर फिर गिनना शुरू किया। अबकी फिर टोटल किया तो वही - चार और साठ!
उन्होंने सिर को हाथों में थाम लिया।
÷÷ क्या बात है?'' शीला ने पूछा!
÷÷ पांच लाख में कम हैं चालीस हजार!'' किसी ने संदूक तो नहीं खोला था?
÷÷ ताली तो तुम्हारे पास थी, खोलेगा कौन?''
÷÷ कोई और तो नहीं आया था घर में?''
÷÷ तुम्हीं और राजू आये गये, और तो कोई नहीं।''
थोड़ी देर बाद जाने क्या सोच कर वे उठे और राजू को जगा कर ले आये! राजू आंखें मलते हुए आया!
÷÷ ब्रीफकेस किसने दिया था तुम्हें?'' संजू ने कि सक्सेना ने?
÷÷ क्यों, क्या बात है?''
÷÷ बताओ तो! कम हैं पांच लाख में?''
राजू हंसा - ÷÷ मंगनी की बछिया के दांत नहीं गिनते! संतोष कीजिए, जितना मिल गया मुफ्त का समझिए!''
वे एकटक राजू को देखते रहे - ÷÷ तुमने तो कुछ इधर उधर नहीं किया!''
÷÷ मैं जानता था यही शक करेंगे आप! स्वभाव से ही शक्की हैं।''
÷÷ चुप्प!'' शीला ने झिड़का ÷÷ यही तमीज है बाप से बात करने की!''
÷÷ समझ गया। इसी ने चुराया है, बताया नहीं!''
÷÷ पहले ही समझ जाना चाहिए था। चोर कभी बताता है कि चोरी उसी ने की है?'' राजू बोला।
रघुनाथ ने आश्चर्य से देखा उसकी ओर - ÷÷ क्या हो गया है इस लौंडे को? इसका भाई कम्प्यूटर इंजीनियर! उसने कभी इस तरह से बातें नहीं की अपने बाप से?''
÷÷ बातें नहीं कीं, इसीलिए तो चुपके से शादी कर ली और बाप को खबर तक नहीं दी।''
झनझना उठे क्रोध से रघुनाथ। मन हुआ - उसे घर से निकल जाने को कहें लेकिन जाने क्या सोच कर खुद ही उठे और आंगन में आ गये। कोने में बंसखट पड़ी थी, उसी पर बैठ गये। उन्होंने ईश्वर के लिए सिर उठाया आसमान की तरफ।
आसमान धुला धुला और उजला उजला लग रहा था - जैसे भोर होने को हो!
÷÷ देखो मां! मैं साल डेढ़ साल से कहता रहा हूं इनसे कि मोटरबाइक ले दो। घराने के सभी लड़कों के पास है, एक मेरे ही पास नहीं है। इनका कहना था कि हाथ पांव तोड़ना है क्या? सिर फोड़ना है क्या? चोरी चकारी और लफंगई करनी है क्या? डाके डालना है क्या? किसका हाथ पैर टूटा है बोलो तो? तो संजू ने मुझसे पूछा - तुम्हें भी कुछ चाहिए? जब हम वहां से आने लगे तब! मैंने कहा - ÷÷ हां, मोटरबाइक! उसने मुझे रुपये थमा दिये। उसने ब्रीफकेस में से दिया या कहां से दिया मुझे नहीं पता!''
÷÷ सरासर झूठ! यह जानता है कि संजय अब नहीं आने वाला। हम नहीं पूछ पायेंगे उससे।'' रघुनाथ को यह झूठ बर्दाश्त न हुआ!
शीला खड़ी खड़ी ढिबरी की मद्धिम रोशनी में सुबक रही थी। वह अपने बेटे के इस रूप से अनजान थी!
÷÷ और बतायें! हमारे बापजान के दो बेटे - संजू और मैं! इन्होंने एक आंख से हमें देखा ही नहीं। सारी मेहनत और सारा पैसा इन्होंने उस पर खर्च किया। पढ़ाया, लिखाया, कम्प्यूटर इंजीनियर बनाया और मेरे लिए? कामर्स पढ़ो। जिसे पढ़ने में न यह मेरी मदद कर सकते थे, न मेरा मन लगता था! किसी तरह बीकाम किया तो कोचिंग करो, ये टेस्ट दो, वह टेस्ट दो! मैं थक गया हूं टेस्ट देते देते! इनसे कहो, ये रुपये कहीं इधर उधर खर्च न करें, डोनेशन के लिए रखें। बिना डोनेशन के कहीं एडमीशन नहीं होने वाला! साफ साफ बता दे रहा हूं।''
÷÷ अगर डोनेशन के पैसे न दूं तो?''
÷÷ तो कभी मत पूछिएगा कि यह क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो?''
÷÷ क्या करोगे? डाका डालोगे? तस्करी करोगे? गांजा हेरोइन बेचोगे? कत्ल करोगे?''
÷÷ क्या बक बक कर रहे हैं आप? फालतू?'' झल्ला कर शीला बोली - ÷÷ और तू चुप रह? अनाप शनाप बोल रहा है बाप से।''
राजू ने कमरे से बाहर निकलते हुए पिता को देखा - ÷÷ बस कह दिया।''
÷÷ सुनो सुनो! भागो मत! अपने ही बारे में सोचते हो या कभी अपनी बहन के भी बारे में सोचा? जब होता है तभी जाते हो हजार पांच सौ मार लाते हो उससे? उसकी शादी के बारे में भी सोचते हो कभी?''
÷÷ देख रही हो इनका?'' वह मां की ओर मुड़ा - ÷÷ जिससे कहना था, उससे नहीं कहा; कह मुझसे रहे हैं जो अभी पढ़ायी कर रहा है। डोनेशन की बात आयी तो दीदी याद आ रही है। पहले तो इनसे कहो कि ये कंजूसी और दरिद्रता छोड़ें अब! हंसी उड़ाते हैं लोग। यह ढिबरी और लालटेन छोड़ें और दूसरों की तरह तार खिंचवा के - कम से कम आंगन और दरवाजे पर लट्टू लगवा लें। रोशनी हो घर में! इसके साथ फोन भी लगवा रहे हैं लोग। घर में फोन होगा तो संजू भी जब चाहेगा, बात कर लेगा। तुम भी सरला दीदी से बातें कर लिया करोगी! दीदी से ही क्यों, भाभी से भी!''
माथा पीटते हुए फिर बैठ गये रघुनाथ - ÷÷ हाय रे किस्मत। जिनके लिए कंजूसी की, उन्हीं के मुंह से यह सुनना बदा था।''
÷÷ और एक बात कह दें तुमसे भी और इनसे भी। फिर ऐसी बेवकूफी न करें जैसी संजू के समय की थी। दीदी से साफ साफ बात कर लें कि वह इनकी तय की हुई शादी करेंगी भी या नहीं। यह तो भाग दौड़ करके कहीं तय कर आयें और वह कह दें कि मुझे नहीं करनी। फिर भद पिटे इनकी!''
÷÷ यह तुम कैसे कह रहे हो?''
÷÷ इसलिए कि मैंने एक आदमी को अक्सर उनके साथ देखा है! कौन है वह, नही जानता!''
÷÷ देखा? इसे शरम नहीं अपनी बहन के बारे में इस तरह बात करते हुए?'' रघुनाथ ने दांत पीसते हुए वहीं से कहा!
( ५)
सरला दुविधा में थी - ब्याह करे या न करे?
पक्का सिर्फ इतना था कि उसे वह शादी नहीं करनी है जो पापा तय करेंगे!
कई लोचे थे उसकी दुविधा में!
अब से कोई सात आठ साल पहले। उसने अपने अंदर कुछ अजब सा बदलाव महसूस किया था - मन उखड़ा उखड़ा सा रहता था, कुछ खोया खोया सा था, बेबात पर हंसी आती थी, किताब कापी कहीं रखती थी, ढूंढती कहीं थी, हरदम गुनगुनाये जाने को जी चाहता था, बाहर आने पर सहेलियां हंसने लगी थीं - देखो, देखो। पैरों की चप्पलें - दो डिजाइनों की! क्लास कहानी का, किताब कविता की हाथ में! यही वे दिन थे जब नगर में आने वाली कोई फिल्म उससे नहीं छूटती थी!
ऐसे ही में जाने कैसे कौशिक सर चुपके से आये और उसके दिल में आ बैठे!
कौशिक सर कविता के अध्यापक। बहुत गम्भीर और चुप्पे और सिद्धांतवादी। पतले , लम्बे, आकर्षक! अधेड़ और तीन बच्चों - बल्कि युवाओं के पिता! अद्भुत ÷ सेन्स आफ ह्यूमर' के मालिक! उन्हें प्यार करने में कोई खतरा नहीं था! न खतरा, न किसी तरह का संदेह। उसने बहुत समझदारी और विवेक से काम लिया था अपना ÷ ब्वायफ्रेण्ड' चुनने में। लड़के लड़कियों में ÷ गासिप' की भी आशंका नहीं।
कौशिक सर कृतज्ञ और अभिभूत! अस्तप्राय जीवन का अंतिम प्यार वह भी सरला जैसी सुंदर लड़की का! पचास पचपन की उमर में तो कोई सोच भी नहीं सकता था ऐसे भाग्य के बारे में!
सरला का मन बेचैन , देह बेचैन! महज प्यार भरी बातें और तड़प! और कुछ नहीं। यही तो सहेलियों के साथ भी हो रहा है। कुछ तो अलग हो - कौशिक सर विद्यार्थी थोड़े हैं! ऐसी ही इच्छा कौशिक सर की भी थी लेकिन नगर में ऐसी कोई जगह नहीं, जहां कोई उन्हें जानता न हो!
निश्चित हुआ कि कौशिक सर एक दिन टैक्सी से ÷ अमुक जगह' पहुंचेंगे, वहीं से सरला को ÷ पिकअप' करेंगे और दो चार घंटे के लिए सारनाथ! फिर वहीं सोचा जाएगा ÷ एकांत' और ÷ निर्जन' के बारे में!
प्यार बंद और सुरक्षित कमरे की चीज नहीं। खतरों से खेलने का नाम है प्यार। लोगों की भीड़ से बचते बचाते , उन्हें धता बताते, उनकी नजरों को चकमा देते जो किया जाता है - वह है प्यार! शादी से पहले यही चाहती थी सरला। शादी के बाद तो यह विश्वासघात होगा, व्यभिचार होगा, अनैतिक होगा। जो करना है, पहले कर लो। अनुभव कर लो एक बार। मर्द का स्वाद! एक ऐडवेंचर! जस्ट फार फन!
सरला रोमांचित थी। नर्वस थी और उत्तेजित भी!
जिस दिन जाना था उससे पहले की रात। वह सो नहीं सकी ठीक से। नींद ही नहीं आ रही थी! कई तरह की बातें , कई तरह के खयाल, कई तरह की गुदगुदियां! अपने आप लजाती, अपने आप हंसती। उसने सोच लिया था कि अवसर मिलने पर भी इतना आगे नहीं बढ़ने देना है कौशिक सर को कि वे उसे गलत समझ बैठें! यह तो शुरुआत है...
अभी जाने कितनी मुलाकातें बाकी हैं! नहीं , अब कहां मुलाकातें? ÷ फेयरवेल' हो चुका है। दो चार दिन और चल सकते हैं क्लासेज+ उसके बाद तो इम्तहान! फिर कहां सम्भव हैं भेंट? कौन सा बहाना रहेगा मिलने का?
कौशिक सर लोकप्रिय आदमी! विश्वविद्यालय के ही नहीं , नगर के भी! जानने वाले बहुत से। तरह तरह के लोग! इस बात का गर्व भी था सरला को कि वह जिसे प्यार करती है, वह कोई सीटी बजाने वाला, लाइन मारने वाला सड़कछाप विद्यार्थी नहीं, विद्वान है!
कौशिक सर ने बड़ी सावधानी बरती थी - छुट्टी का दिन न हो, स्कूल कालेज खुले हों, ताकि छात्रा छात्रााएं पढ़ने में और अध्यापक पढ़ाने में व्यस्त हों, पिकनिक या भ्रमण का कार्यक्रम न बनायें, सारनाथ का मेला भी न हो उस रोज!
इसी सावधानी के साथ कौशिक सर सरला के साथ टैक्सी से पहुंचे चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़क के किनारे पहाड़ीनुमा ढूह के ऊपर खंडहर जैसा टूटा फूटा स्तूप! खड़े हो जाओ तो पूरा सारनाथ ही नहीं , दूर दूर तक के गांव गिरावं और बाग बगीचे नजर आयें! खाली पड़ा था स्तूप! नीचे चौकीदार, सिपाही, माली अपने अपने काम में लगे थे! एकदम निर्जन अकेला खड़ा था स्तूप! ÷ हिमगिरि के उत्तुंग शिखर' की तरह। कोई दर्शनार्थी नहीं!
मनु ने श्रद्धा को देखा!
श्रद्धा ने मनु को देखा!
दोनों ने टैक्सी सड़क के एक किनारे खड़ी की और चल पड़े। घुमावदार रास्ते से चक्कर काटते हुए! आगे पीछे नहीं , अगल बगल। साथ साथ। हाथ में हाथ लिये! सरला अकेले में कौशिक सर को ÷ मीतू' बोलती थी। उस दिन वे सचमुच मीतू हो गये थे। सरला - जो हमेशा समीज सलवार और दुपट्टे में रहती थी - वही सरला हरे चौड़े बार्डर की बासन्ती साड़ी में गजब ढा रही थी! बार्डर के रंग का साड़ी से मैच करता बलाउज और माथे पर छोटी सी लाल बिन्दी! हवा उड़ाये ले जा रही थी आंचल को जिसे वह बार बार सम्भाल रही थी!
वे चढ़ायी खत्म करके स्तूप के पास पहुंचे और चारों तरफ नजर दौड़ायी - दोनों के मुंह से एक साथ निकला - ÷÷ जैसे अछोर, अनंत, असीम हरियाली का समुद्र! और उसमें पीले फूले हुए सरसों के जहां तहां खेत - ऐसे लग रहे हैं जैसे पाल वाली हिलती डुलती डोंगियां!'' ÷÷ और हम?'' सरला ने पूछा! कौशिक सर मुसकराये! बोले - ÷÷ मस्तूल वाले बड़े जहाज के डेक पर!''
स्तूप के इस तरफ छाया थी और उस तरफ कुनकुनी धूप! छाया लम्बी होती हुयी वहां तक चली गयी थी जहां माली काम कर रहे थे। वे उस तरफ गये धूप में , जिधर समुद्र था और हिलती डुलती पीली डोंगियां।
वे स्तूप से सटी साफ सुथरी जगह पर बैठ गये - चुपचाप! वे चुप थे लेकिन उनके दिल बोल रहे थे - अपने आप से भी, और एक दूसरे से भी! उनके पास तो रह ही क्या गया था कहने सुनने को? साल डेढ़ साल से यही तो हो रहा था - बातें, बातें, सिर्फ बातें। बातों से वे थक भी चुके थे ओर ऊब भी! सरला बगल में बैठी लगातार कौशिक सर को देखे जा रही थी और वे उसके देखने को देखते हुए दूब नोच रहे थे! फिर सहसा दिलीप कुमार स्टाइल में मुसकरा कर बोले - ÷÷ ऊं? क्या कहा?'' हंसते हुए सरला ने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया - ÷÷ बहुत कुछ? सुनो तब तो!''
वे दिल जो अब तक खंडहर के पीछे गुटर गूं कर रहे थे , कुकडू कूं करने लगे थे भरी दुपहरिया में! कौशिक सर ने सरला की पीठ के पीछे से हाथ बढ़ा कर उसकी सुडौल गोलायी मसल दी! सरला के पूरे बदन में एक झुरझुरी हुयी और वह शरमाती हुयी उनकी गोद में ढह गयी!
अबकी कौशिक सर ने जरा जोर से मसला।
चिहुंक कर सीत्कार कर उठी सरला और आंखें बंद कर लीं - ÷÷ जंगली कहीं के!''
कौशिक सर ने सिर झुका कर उसकी आंखों को चूम लिया!
÷÷ यह क्या हो रहा है चाचा?'' अचानक यह कड़कती आवाज और सामने खड़ा ऐतिहासिक धरोहर का पहरेदार या सिपाही खाकी वर्दी में!
दोनों के चेहरे फक्क्। काटो तो खून नहीं। कौशिक सर ने झटपट आंचल के नीचे से हाथ खींचा और सरला उठ बैठी - बदहवास। उनकी समझ में नहीं आया कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया? जरा सी भी आहट मिली होती तो यह नौबत न आती!
घबड़ाये हुए कौशिक सर उस पहरेदार को ताकते रहे!
÷÷ देख क्या रहे हो, उठो; यह रंडीबाजी का अड्डा नहीं है! आओ!'' वह मुड़ गया।
सरला आंचल में मुंह ढांप कर रो रही थी! कौशिक सर ने किसी तरह उसे खड़ा किया और अपने पीछे आने का इशारा किया।
÷÷ अरे उधर नहीं, इधर! थाने पर!''
÷÷ थाने पर क्यों, ऐसा क्या किया है हमने?'' हिम्मत जुटायी - कौशिक सर ने!
÷÷ वहीं पता चलेगा चाचा कि क्या किया है तुमने? कहां से फांसा है इस लौंडिया को?''
अब तक ÷ चाचा' और ÷ रंडीबाजी' - ये अपमानजनक शब्द थे जो कौशिक सर के कानों में गूंज रहे थे लेकिन अब यह ÷ थाना' - ÷ थाना' माने बहुत कुछ! जलालत। हवालात। अखबारों की सुर्खियां। युनिवर्सिटी में चर्चे। समाज का कोढ़। नौकरी से सस्पेन्शन। किस मुंह से परिवार में जाएंगे? और यह सरला? इसका क्या होगा? किस मुसीबत में आ फंसे उसके चक्कर में?
सरला सुबकना बंद करके एक किनारे खड़ी थी और पहरेदार हाते के गेट के पास! थाना ले चलने की मुद्रा में। चौकीदार और माली भी उसके पास आ गये थे और रोक रहे थे - अरे, छोड़ो भई। जाने दो! उमर देखो चाचा की। काहे पानी उतार रहे हो एक बुर्जुग का! कह भी रहे थे और मजा भी ले रहे थे।
कौशिक सर घबड़ाये हुए सरला के पास आये - ÷÷ परेशान न हो! अभी देखते हैं। सब ठीक हो जाएगा।'' सरला गुस्से में। उसकी नजरें पहरेदार और मालियों पर टिकी थीं।
कौशिक सर गेट पर खड़े पहरेदार को अलग ले गये और फुस फुस बातें करने लगे। बीच बीच में वह उखड़ जाता और हाथ छुड़ा कर भागने लगता! कौशिक सर ने उसे सौ सौ के दो नोट पकड़ाये जिन्हें उसने फेंक दिया और मालियों की ओर इशारा करते हुए पांच उगलियां दिखायी - ÷÷ नहीं चाचा, नहीं होगा इससे। थाने चलिए?''
÷÷ बस्स! बहुत हो चुका यह नाटक!'' सरला लगभग दौड़ती हुई उन दोनों के पास पहुंची - ÷÷ कैसे ये रुपये? तुम हमसे बात करो अब?''
उसने अचकचा कर कौशिक सर को देखा - ÷÷ इनका सुनो चाचा।''
÷÷ चाचा होंगे तुम्हारे, मेरे दोस्त हैं, प्रेमी हैं। हमने प्रेम किया, चूमा अपनी मर्जी से। किसी ने किसी के साथ बलात्कार नहीं किया, किसलिए थाने?''
÷÷ चलो तो वहीं बताते हैं।'' वह चल पड़ा।
आगे खड़ी हो गयी सरला रास्ता रोक कर - ÷÷ कोई नहीं जाएगा थाने वाने! न तुम, न हम। एस.पी. कलक्टर, आई.जी. - जिसे बुलाना हो यहीं बुलाओ! समझ क्या रखा है तुमने?''
वह हक्का बक्का। ताकता रहा कभी कौशिक सर को , कभी सरला को। माली और चौकीदार भी आ गये इस बीच।
÷÷ किसने देखा इश्क लड़ाते हुए? यह चौराहा है? बाजार है यह जहां रेप हो रहा था? फंसाना चाहते हो रुपयों के लिए? तुम हमें क्या ले जाओगे, हम ले चलेंगे तुम्हें!''
मामले की इस नयी पेंच को देखते हुए माली बीच बचाव में आये और उन्होंने निष्कर्ष दिया कि गलतियां इंसान से ही होती हैं इसलिए छोड़िए , हटाइए और अपना अपना काम देखिए!
कौशिक सर जब तक गिरे हुए रुपये उठाते रहे तब तक सरला टैक्सी में बैठ चुकी थी! कौशिक सर उसके बगल में बैठते हुए बोले - ÷÷ मैं नहीं जानता था कि इतनी बहादुर हो तुम?''
÷÷ मैं भी नहीं जानती थी कि इतने डरपोक और कायर हैं आप!''
टैक्सी वापस लौटी। दोनों एक दूसरे से रास्ते भर नहीं बोले।
यह एक डरावना दुःस्वप्न था - जिसने एक लम्बे समय तक पीछा नहीं छोड़ा सरला का।
दुःस्वप्न में पहरेदार का चेहरा ही नहीं था केवल , हथेलियों की छुअन और मसलन भी थी।
( ६)
सरला के इस दुःस्वप्न को और भी बदरंग बना दिया था उसकी पड़ोसिनों ने!
वह जिस बहुमंजिली इमारत के प्रथम तल के किराये के फ्लैट में रहती थी , उसके अगल बगल भी दो दो छोटे कमरों के फ्लैट थे। उनमें उसी के स्कूल की अध्यापिकाएं रहती थीं - बायीं तरफ मीनू तिवारी और दायीं तरफ बेला पटेल। मीनू स्कूल की वाइस प्रिंसिपल थी और वह उसका अपना फ्लैट था - खरीदा हुआ! उसी ने सरला को अपने बगल में दिलवाया था किराये पर!
मीनू बलकट्टी थी - कंधों तक छोटे छोटे बाल! एकदम लाल मेंहदी से रंगे! उम्र चालीस से ऊपर। स्वभाव से सीरियस और रिजर्व्ड। एक हद तक असामाजिक! किसी के शादी ब्याह में तो नहीं ही जाती थी, आयोजनों में भी शामिल होने से बचती थी। घर से स्कूल स्कूल से घर बस यही आना जाना था। मजबूरी में ही हंसती थी। सहेली भी नहीं थी कोई जिसके साथ उठना बैठना हो! उम्र के बावजूद उसका गोरा सुडौल बदन आकर्षक था।
वह कुमारी थी। अकेली रहती थी। उसके दो पामेरियन कुत्ते थे - एक काला, दूसरा सफेद! बेटे या बेटियां कहिए - ये ही थे। इन्हें लेकर वह दिन में दो बार बाहर निकलती थी, टहलाने या नित्य कर्म कराने। पिंजरे में एक तोता भी था जो किसी के घर में घुसने और जाने के समय बोलता था। उसके इस टें टें को वह ÷ सुस्वागतम' और ÷ टा टा' बताती थी। उसकी सारी चिन्ताएं इन्हीं को लेकर थीं। ÷ क्या बतायें, आज पम्मी दिन भर से गुमसुम है!' ÷ आज टूटू की नाक बह रही है।' ÷ पम्मी का पेट खराब है।' ÷ दोनों में बातचीत बंद है।' ÷ टूटू पम्मी से किस बात पर नाराज है, बता नहीं रहा है!' ÷ दोनों मेरे पास सोने के पहले झगड़ा करते हैं, पता नहीं क्यों?' इसी तरह की चिन्ताएं। कातिक के पहले से ही वह उनके लिए परेशान होना शुरू हो जाती थी और तब तक रहती थी जब तक पिल्ले नहीं हो जाते थे और जब हो जाते थे तो कई रोज सोहर के कैसेट बजाती थी और फिर नयी परेशानियां ......
मीनू के घर बाहर से आने वाले सिर्फ दो मर्द थे - एक उसका भाई। वह मीनू से बड़ा था और वकालत करता था! वकालत चलती थी या नहीं - ठीक ठीक नहीं मालूम! वह हर महीने के पहले सप्ताह में आता था और जब आता था तो देर तक भाई बहन में चख चख होती थी। उसके जाने के दो तीन दिनों बाद तक मीनू का मूड खराब रहता था!
दूसरे थे पशुओं के डाक्टर। वे मीनू की ही उमर के या उससे थोड़े बड़े थे। काफी टिप टाप से रहते थे , बाल डाई करते थे और सफारी सूट पहनते थे! वे गर्मी की छुट्टियों में दोपहर में आते थे जब प्रायः लोग बाहर निकलने से बचते हैं। वे आते और शाम पांच बजे से पहले चले जाते! जाड़े के मौसम में कभी कभी मीनू के घर रात के भोजन पर आते। जब वे जाने लगते तो मीनू बालकनी पर खड़ी होकर देर तक हाथ हिलाती रहती!
इसी बालकनी के बगल में सरला की बालकनी थी जहां कभी कभी खड़ी होकर दोनों पार्क का नजारा लेती थीं। मीनू की इच्छा के अनुसार सरला उसे स्कूल में मैडम कहती थी और घर पर दीदी! दीदी उसे सल्लो बोलती थी!
वे बालकनी में खड़ी होकर जो देख रही थीं , वह हफ्ते भर से देख रही थीं!
हर शाम छः बजे के करीब सोलह सत्राह साल का एक लड़का पार्क में आता था - गुलदाउदी का बड़ा सा खिला हुआ फूल लेकर और बैठ कर उसकी पंखुड़ियों पर कुछ लिखता था और इंतजार करता था बी ब्लाक की बालकनी में एक लड़की के आने का! वह शायद दक्षिण भारतीय लड़की थी! वह ब्लाउज और स्कर्ट में आकर खड़ी हो जाती - लहरदार बालों में एकदम फ्रेश जैसे नहा कर निकली हो! लड़का घूमता, पीठ उसकी तरफ करता और उछल कर पैर से ऐसी किक मारता कि फूल उसकी बालकनी में गिरता! लड़की लाल पोलीथिन में लिपटा फूल उठाती और अपनी गोलाइयों के बीच ब्लाउज के अंदर रख लेती!
घास पर चित्त गिरा लड़का उठता और उसकी ओर ÷ किस' उछालता!
जवाब में लड़की मुसकराती , लजाती और होठों से चुम्बन लहरा देती!
÷÷ सल्लो! बहुत दिन हो गये तुम्हें काफी पिलाये! आओ न!'' एक दिन मीनू ने सरला से कहा! यह वह दिन था जब लड़की ने चुम्बन के उत्तर से ही संतोष नहीं किया, गुनगुना कर भी जवाब दिया किन्हीं वक्तों के गाने से - ÷ छोटी सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल।'
सरला जब पहुंची तो मीनू किचेन में थी। वह थोड़ी देर बाद काफी के दो मग के साथ ड्राइंग रूम में आयी - चुप और संजीदा! गयी और एक शीशी भी ले आयी ब्रांडी की जिसे डाक्टर छोड़ गये थे उसके लिए। उसने एक चम्मच इसमें और एक चम्मच उसमें ब्रांडी डाली और उसका लाभ बताया। इसी समय टूटू आयी और मीनू की गोद में बैठ गयी। मीनू उसे देर तक सहलाती और प्यार करती रही - ÷÷ देखना, एक न एक दिन मार दिया जाएगा यह लड़का! इतना प्यारा लड़का!''
÷÷ यह कैसे कह सकती हैं आप?''
मीनू चुप रही फिर सुबकने लगी - ÷÷ नहीं, सल्लो, यही होता है - यही होगा!''
÷÷ यह भी तो हो सकता है कि लड़की किसी दूसरे के घर चली जाय या लड़का किसी और को घर बिठा ले! और यह भी तो हो सकता है कि दोनों शादी कर लें।''
÷÷ यह तो और बुरा होगा!''
÷÷ क्यों?''
÷÷ अपने ही