28 वर्षीय युवा राहुल सिंह आलोचना की दुनिया में अत्यंत प्रौढ़ समझ के साथ सक्रिय हैं। पिछले दिनों सामने आये उनके थोड़े से काम ने लोगों का बहुत ज्यादा ध्यान आकृष्ट किया है।
हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के उदय के कारणों और परिस्थितियों पर विचार करने के क्रम में यह बात सामने आयी कि आधुनिकता के लिए भौतिक आधारों की उपस्थिति के साथ साथ सामाजिक आधार का भी होना जरूरी है; कारण, आधुनिकता केवल भौतिकवाद की प्रक्रिया नहीं बुद्धिवाद की भी प्रक्रिया है। आधुनिकता के सीमित भौतिक आधारों (रेल, डाक, तार आदि) का विकास अंगे्रजों के द्वारा भारत में किया गया। इन भौतिक आधारों पर भी अधिकार अंगे्रजों का ही था। लेकिन क्या आधुनिकता के सामाजिक आधार का भी निर्माण और विकास अंगे्रजों के आगमन के साथ या बाद में ही हुआ? इस सवाल के जवाब के मूल में भारतीय मध्यवर्ग का आरम्भिक इतिहास छिपा है क्योंकि ÷भारतीय मध्यवर्ग आधुनिकता का उत्पाद और उत्पादक दोनों है।'1 चूंकि मध्यवर्ग भारतीय नहीं यूरोपीय अवधारणा है, भारत में वर्ग की नहीं वर्ण और जाति की अवधारणा रही है, इसलिए सवाल यह भी उठता है कि क्या यूरोप विशेषकर फ्रांस और इंग्लैण्ड में भी मध्यवर्ग आधुनिकता का उत्पाद और उत्पादक दोनों रहा है? या यह बात भारतीय मध्यवर्ग पर ही लागू होती है? इसकी जानकारी के लिए यूरोप में मध्यवर्ग के विकास पर नजर डालना आवश्यक है।
÷ऐतिहासिक रूप से बूर्जुआ वर्ग ही आगे चल कर मध्यवर्ग के नाम से जाना जाने लगा क्योंकि यह वर्ग जमींदार और मजदूरों के बीच का था। वैसे अपने वास्तविक और आरम्भिक अर्थों में बूर्जुआ मध्य कालीन यूरोपीय शहर के ÷मुक्त निवासियों' ;थ्तमम त्मेपकमदजेद्ध के लिए प्रयुक्त होता था। बूर्जुआ पद सबसे पहले मध्यकालीन फ्रांस के उन निवासियों के लिए प्रयोग में आया था जो समाज में किसानों और जमीन पर आधिपत्य जमाये रखने वाले कुलीनों के मध्य स्थित था।'2 क्लाउड अल्वेयर ;ब्संनकम ।सअंतमेद्ध ने अपनी किताब ÷होमो फेबर' में मध्यवर्ग को व्यापक संदर्भ में देखने की कोशिश की है और उसी क्रम में मध्यवर्ग के जन्म के ठोस कारणों को सामने रखा है -- ÷÷वे कहते हैं 16वीं शताब्दी के मध्य में तीसरी बार जनसंख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी जिसका एक परिणाम अनाज और जमीन की कीमतों में वृद्धि के रूप में सामने आया। इसका मतलब यह कि जिनके पास जमीनें थीं, जो और जमीनें खरीद सकते थे, वे समृद्ध हो गये और दूसरे बचे लोग काफी गरीब हो गये। जनसंख्या का यह गरीब तबका, जिनका जीवन भूमि से जुड़ा था, काम की (किसी भी काम की) तलाश में विकासशील शहरी केन्द्रों की ओर उन्मुख हुआ। जड़ से उजड़े हुए इन भूमिविहीन मजदूरों ने शहरी क्षेत्रा के मजदूरों की परेशानियां बढ़ा दीं। अतिरिक्त श्रम की उपलब्धता से मजदूरी (पारिश्रमिक) में काफी कमी आयी। उदाहरण के तौर पर 1571 में निर्माण के क्षेत्रा में मिलने वाली मजदूरी से सौ साल पहले खरीदे जा सकने वाले भोजन का दो तिहाई हिस्सा ही खरीदा जा सकता था और जीवन स्तर में आयी यह गिरावट अगले चालीस साल तक जारी रही।''3 कठिन परिस्थितियों में यह जड़ विहीन वर्ग संघर्ष करता रहा। जीने के लिए अलग अलग पेशे अपनाये, कृषि से लेकर किस्म किस्म की कारीगरी तक में इसने हाथ आजमाये। इन्हीं में से कुछ अपने उद्यम के बल पर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सके। नये कामों को करने का जोखिम उठाया और कामयाबी हासिल की। शहरों में जनसंख्या बढ़ती चली जा रही थी जमीन पर आधिपत्य पुराने भू स्वामियों (सामंतों) का था जो मुख्यतः कृषि के लिए भूमि का उपयोग कर रहे थे। इस बीच अपने उद्यम से विकसित तबका, (बूर्जुआ वर्ग) जिसके पास धन था पर जमीन नहीं थी, अपने विकास के लिए सामंतों के भूमि पर बने इस एकाधिकार को तोड़ना चाह रहा था।
÷पश्चिमी यूरोप में राष्ट्र राज्यों के उदय के साथ मध्य काल का अवसान देखा जाता है, साथ ही राजतंत्रा के हाथों में शक्ति का केन्द्रीकरण भी देखने को मिलता है। इस दौर में अपने वर्ग स्वार्थ की पूर्ति के लिए बुर्जुआ वर्ग ने अपना समर्थन सामंतों के खिलाफ राजतंत्रा को दिया।'4 परिणामतः सामंतवाद कमजोर हुआ और पूंजीवाद के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस तरह बूर्जुआ वर्ग ने स्वयं को पूंजीवाद का समर्थक साबित किया। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को अगर फ्रांस के संदर्भ में रख कर देखें तो बात ज्यादा स्पष्ट होगी।
÷यूरोप सामंतशाही की गिरफ्त में था। इंग्लैण्ड में अवश्य 1688 की रक्तहीन क्रांति के बाद सत्ता पर मध्यवर्ग हावी होता जा रहा था। (मध्यवर्ग से मतलब बूर्जुआ वर्ग) ...1715 से 1785 के मध्य अकेले फ्रांस में करीब 100 किसान विद्रोह हुए थे। इसके अतिरिक्त हड़तालें होती रहती थीं। पेरिस में किताबों की जिल्द बनाने वालों से लेकर बढ़ई और लोहार तक हड़ताल करते थे। ...फ्रांस की क्रांति के बीज उसी समाज में बिखरे हुए थे। सारा समाज तीन भागों में बंटा हुआ था जिसमें पादरी प्रभुत्वशाली थे। दूसरा वर्ग सामंतों का। इनके पास फ्रांस की अधिकांश जमीन थी। तीसरा वर्ग ऐसे लोगों का था जो न पादरी थे न सामंत अर्थात् समाज का बहुमत। इसमें किसान, मजदूर, नौकरी पेशावाले, वकील, पत्राकार सभी शामिल थे।' सबकी अलग अलग समस्याएं थीं लेकिन ये सब एक बात से जुड़ते थे, इन्हें सामाजिक समानता नहीं प्राप्त थी। सार्वजनिक स्थानों से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक इन्हें अपनी हेयता का आभास रहता था। इन सबके ऊपर था कर का बोझ। इसे भी वह शायद वहन कर लेता लेकिन उसे यह अहसास था कि सम्पन्न और कुलीन व्यक्ति राज्य को कुछ भी नहीं दे रहा है और सारे लाभ उठा रहा है। दूसरी ओर किसान सब कुछ दे रहा है और बदले में उसे कुछ भी नहीं मिल रहा है। इस स्थिति में उसका असंतोष यदि बढ़े तो स्वाभाविक ही था।
जब अमरीका का स्वतंत्राता संग्राम अंग्रेजों के विरुद्ध शुरू हुआ तो दुश्मन के दुश्मन की मदद करने के लिए फ्रांस ने अमरीका की भरपूर मदद की। इससे आर्थिक दबाव बढ़ा। करदाताओं की एक सीमा होती है। जब वहां से वसूली बढ़ने की सम्भावना नहीं रही, धनिकों पर कर लगाने की दृढ़ नीति लागू नहीं की जा सकी और राज्य के खर्चे पूरे नहीं पड़े तो स्थिति डांवाडोल हो गयी। तत्कालीन फ्रांस की आर्थिक स्थिति सुधारने का एकमात्रा तरीका था उन लोगों पर कर लगाना, जो करमुक्त थे, जो देश की अधिकांश जमीन और सम्पत्ति के मालिक थे। विशिष्ट लोगों की सभा अपने जैसे विशेषाधिकार सम्पन्न लोगों पर कर कैसे लगाती? परिणामतः राजा से मतभेद होने के कारण उसने स्वयं को देश की संविधान सभा घोषित कर दिया। पेरिस की क्षुब्ध भीड़ ने 14 जुलाई 1789 को क्रांति कर दी।'5
क्रांति के मूल में जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक कारण थे वह तो ऊपर की बातों से स्पष्ट है लेकिन फ्रांसीसी क्रांति का विचारधारात्मक आधार विकसित करने में मोन्तेस्क्यू (1689-1755) वाल्तेयर (1694-1760) और रूसो (1712-1782) का बड़ा योगदान था। फ्रांस की क्रांति का नारा : समानता, स्वतंत्राता और भ्रातृत्व रूसो के विचारों से प्रेरित था। इसलिए इतिहासकारों का मानना है कि ÷वास्तविक क्रांति से पहले एक बौद्धिक क्रांति हो चुकी थी।'6 और बौद्धिक क्रांति का अगुआ था फ्रांसीसी समाज का वह तीसरा वर्ग जिसमें बूर्जुआ वर्ग शामिल था। ÷जिसका ध्यान पूंजी बढ़ाने और मुनाफा कमाने पर ही रहता था। लेकिन इनकी पूंजी बढ़ाने और मुनाफा कमाने का व्यापार आसानी से चल नहीं सकता था क्योंकि सत्ता सामंतों के हाथ थी, भूमि पर उनका अधिकार था और भूमि से सम्बंधित होने के कारण खेतिहर और मजदूर भी उन्हीं के मातहत थे। इसीलिए बूर्जुआ वर्ग ने अपने को गरीबों का रहनुमा कहना शुरू किया और समता, स्वतंत्राता तथा भ्रातृत्व का नारा दिया। निम्नवर्ग उसके चकमे में आ गया और बेहतर जीवन की आकांक्षा से प्रेरित होकर उसने सामंतों के खिलाफ विद्रोह किया। लेकिन विद्रोह के बाद जब नयी समाज व्यवस्था कायम करने की बात चली तो शासन सूत्रा संभालने और नीति नियम निर्धारण में बूर्जुआ वर्ग ही सामने आया। तब उसने सारे काम अपने लाभ के लिए किये और निम्नवर्ग का कोई उपकार न किया।'7 इससे बूर्जुआ वर्ग का अवसरवादी चरित्रा प्रमुखता से इतिहास में दर्ज हुआ।
फ्रांसीसी क्रांति को मध्यवर्ग के विकास के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा सकता है। फ्रांसीसी क्रांति की जमीन जिन दिनों विकसित हो रही थी उन्हीं वर्षों में सबसे पहले बूर्जुआ पद से अलग हट कर मध्यवर्ग पद का प्रयोग पहलेपहल होने के प्रमाण मिलते हैं। ÷रेवरेण्ड थॉमस गिस्बर्न ने सबसे पहले मध्यवर्ग का एक पद के रूप में प्रयोग 1785 में किया था। इस पद के माध्यम से गिस्बर्न ने उस धनी और ठेकेदार (जोखिम उठा कर नया उद्यम शुरू करने वाला) वर्ग की ओर संकेत किया था, जो जमींदारों और कामकाजी मजदूरों के बीच में स्थित था।'8 इस तरह बूर्जुआ वर्ग से जिस वर्ग का संकेत होता था, मध्यवर्ग का सामाजिक आधार भी वही था। यही कारण रहे कि बाद के दिनों में बूर्जुआ वर्ग मध्यवर्ग का पर्याय हो गया। इसके कारण कई किस्म की उलझनें भी पैदा हुईं। मसलन भारत जैसे देश में जहां न बूर्जुआ वर्ग और न ही मध्यवर्ग जैसे शब्द परम्परा से उपलबध थे वहां इसे समझने की कोशिश इन्हीं आयातित पारिभाषिक शब्दों से करने के प्रयत्न हुए, जिसके परिणाम उलझाने वाले हुए।
÷उच्च मध्यवर्ग का वह रूप जो बूर्जुआ वर्ग का पर्याय समझा जाता है, सभी देशों में एक सा नहीं रहा है। विभिन्न देशों के इतिहास से इस बात की पुष्टि होती है। जैसे भारतवर्ष में मध्यवर्ग का अस्तित्व बहुत पहले से था और उसमें भी कुछ लोग पद, प्रतिष्ठा, सामाजिक और आर्थिक हैसियत की दृष्टि से बहुत ऊंचा स्थान रखते थे फिर भी उनको अंगे्रजी बूर्जुआ वर्ग का पर्याय नहीं कहा जा सकता है। ...भारतीय परिस्थितियों में इनका वैसा महत्व नहीं था जैसा कि इंग्लैण्ड या फ्रांस में बूर्जुआ वर्ग का। इस दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट है कि उच्च मध्यवर्ग को केवल बूर्जुआ वर्ग का ही पर्याय नहीं मानना चाहिए। यदि हम ऐसा करेंगे तो इस वर्ग के केवल एक ही रूप का बोध होगा जो मुख्यतः इंग्लैण्ड और फ्रांस की ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज है।'9 लेकिन भारतीय मध्यवर्ग और हिन्दी साहित्य के संदर्भ में विचार करें तो आप पायेंगे कि ऐसी भूल हुई है। यहां बूर्जुआ लगभग पूंजीपति का बोधक है और मध्यवर्ग बूर्जुआ के अर्थ में दूर दूर तक प्रयुक्त नहीं होता। हिन्दी साहित्य में यह दोनों अलग अलग अर्थों में प्रयुक्त होते हैं।
मध्यवर्ग के विकास के इतिहास में अगर फ्रांस की क्रांति एक महत्वपूर्ण पड़ाव है तो इसका दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति है। इन दोनों क्रांतियों का उल्लेख इसलिए भी कर रहा हूं कि 19वीं सदी का निर्माण इन दोनों क्रांतियों से उत्पन्न शक्तियों ने किया था। जहां तक इंग्लैण्ड का सवाल है तो ÷मध्यवर्ग के उत्थान का पहला चरण चौदहवीं शताब्दी में ही देखने को मिलता है जब दुकानदारों के रूप में एक अलग सामाजिक और कामकाजी वर्ग का उदय होता है। आगामी सौ वर्षों में यह वर्ग व्यापारिक पूंजी की मदद से कारीगरों को वस्त्रा निर्माण के लिए, डिजायन के लिए अग्रिम राशि उपलब्ध कराने लगता है और उत्पादित वस्त्राों का व्यापार करने लगता है। पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के व्यापारिक पूंजीपतियों ने जनसाधारण की शिक्षा के नाम पर ऐसे विद्यालयों की स्थापना की जो उनकी बढ़ती भौगोलिक और व्यापारिक जरूरतों की पूर्ति में सहायक हों।'10 इसके दूरगामी परिणामों का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ÷अठारहवीं शताब्दी ने भौगोलिक ज्ञान की उस आधारशिला को पूर्ण कर दिया था, जिस पर उन्नीसवीं शताब्दी का निर्माण करना था।'11 यहां हर बात के ब्योरे में जाने का अवकाश नहीं है इसलिए उनकी तरफ संकेत मात्रा किया जा रहा है। तकनीकी क्षेत्राों में उन्नति के हर कदम के साथ कौशलों का उद्भव और विकास भी तेजी से होता है। इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति ने विश्व इतिहास में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ÷औद्योगिक क्रांति के पहले चरण की प्रधान विशेषता विभिन्न शक्तिचालक कारखानों की स्थापना है जो आरम्भ में जनशक्ति से और बाद में कोयले की शक्ति से चले। इससे ऐसे मजदूरों के समूहों का निर्माण हुआ जो पहले के ग्रामीण मजदूरों की तुलना में ज्यादा गरीब था। इन उद्योगों ने अपनी सुविधानुसार नये शहरी केन्द्रों का निर्माण किया जो बसे हुए शहरों से दूर थे। औद्योगीकरण के अगले चरण में रेलवे और जहाजरानी उद्योग का विकास हुआ। इससे जहां एक ओर वितरकों के लिए दूरी कम हुई वहीं दूसरी ओर नये उत्पादकों के लिए बाजारों के नये द्वार खुले। उद्योगों की बढ़ते तकनीकी प्रकृति के कारण नौकरी में वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान की जानकारी रखने वालों की भागीदारी बढ़ी। उत्पादन और वितरण की बढ़ती जटिलताओं ने एक नये प्रबंधक वर्ग को जन्म दिया। ऐसे पेशे जो अब तक कमतर आंके जा रहे थे अचानक महत्वपूर्ण हो उठे। सर्वहारा के साथ साथ प्रबंधकों और निदेशकों का भी एक समूह उठ खड़ा हुआ।'12 इसे नव मध्यवर्ग ;छमू डपककसम ब्सेंद्ध की संज्ञा दी गयी। मध्यवर्ग ने बीसवीं शताब्दी के आरम्भ तक एक लम्बा रास्ता तय कर लिया था। इसके चरित्रा, स्वरूप और भूमिका में बदलाव आ चुका था। इसके इतिहास को रेखांकित किये जाने की जरूरत सामने आने लगी थी।
बीसवीं शताब्दी के पहले दशक के बाद मध्यवर्ग की अवधारणा को लेकर समाजशास्त्रा और समाजविज्ञान की अन्य शाखाओं में कई अध्ययन और शोध सामने आने शुरू हुए। दरअसल यह पूरी कोशिश मध्यवर्ग के स्वरूप को समझने की थी जिससे आने वाले समय में इसकी भूमिका का कुछ अनुमान किया जा सके। क्योंकि फ्रांस की क्रांति में इस वर्ग ने जो भूमिका निभायी थी वह सर्वहारा के हितों के विरुद्ध थी। मध्यवर्ग की अवधारणा और उससे जुड़े मुद्दों पर मार्क्सवादी दृष्टि से विचार करते हुए प्रसन्ना मिश्र ने लिखा है : ÷÷सामाजिक उत्पादन की ऐतिहासिक पद्धति में अपने अनिश्चित और परिवर्तनशील भूमिका के कारण इसे किसी निश्चित अवस्थिति में नहीं रखा जा सकता है। किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन में इसकी भूमिका संदिग्ध और ढुलमुलपन से युक्त रही है। जिन्हें इतिहास की थोड़ी समझ है वे इस बात का निर्णय करने में सक्षम हैं कि यह वर्ग अपनी सुविधानुसार लोकतांत्रिाक अधिकारों और फासीवादियों का समर्थक हो सकता है। इसलिए इसके मस्तिष्क और गतिविधियों पर सतर्कतापूर्वक नजर रखे जाने की जरूरत है। एकीकृत मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका पर मार्क्स एंगेल्स का अटल विश्वास था पर नये और पुराने दोनों मध्यवर्ग के संदर्भ में उनके मन में बहुत थोड़ा सम्मान था।13 स्वयं मार्क्स ने ÷कैपिटलः थियरिज ऑफ सरप्लस वैल्यू' के चौथे खंड में रिकार्डो की आलोचना लगातार बढ़ते मध्यवर्ग की अनदेखी के कारण की है। एंगेल्स ने भी लिखा है, ÷÷मेरे लिए सबसे बड़ी बाधा तथाकथित बुद्धिजीवियों के द्वारा गुमराह किये जाने वाले मत के समर्थन में व्यक्त किये जाने वाले विचार हैं।''14 इनके अलावा लेनिन, माओत्से तुंग आदि ने भी सर्वहारा आंदोलनों पर विचार करते हुए इस वर्ग की भूमिका को रेखांकित किया है। मार्क्सवादियों की इन चिन्ताओं से इतर अन्य विचारकों, चिन्तकों और समाजशास्त्रिायों ने मध्यवर्ग से जुड़ी दूसरी समस्याओं पर भी विचार किया है। सबसे पहले तो इसके विकास को रेखांकित करते हुए इसका इतिहास प्रस्तुत किया गया। जिसमें मूल रूप से कुछेक सवालों पर बल दिया गया। जैसे मध्यवर्ग के अंतर्गत किन्हें शामिल किया जा सकता है? विकसित औद्योगिक समाज की वर्ग व्यवस्था में इनका स्थान कहां है? मध्यवर्ग में केवल एक ही वर्ग है या इसमें कई वर्ग हैं? मध्यवर्ग किसके निकट है : पूंजीपति के या सर्वहारा के? या वह इन दोनों से स्वतंत्रा हैं? इसकी सम्भावित ऐतिहासिक भूमिका क्या हो सकती है? पुराने मध्यवर्ग और नये मध्यवर्ग में क्या फर्क है? मध्यवर्गीय जीवनमूल्य कौन कौन से हैं? मध्यवर्ग में स्त्राी के स्थान और भूमिका के सवाल तो उठाये ही गये साथ ही भविष्य के समाज में इसका क्या योगदान होगा जैसे सवालों पर भी विचार किया गया है।
अपने आरम्भिक अर्थों में मध्यवर्ग जिसका बोध कराता था फ्रांस की क्रांति के समय उसका वही अर्थ नहीं रह गया था और आगे की औद्योगिक क्रांति ने तो पूरी तस्वीर ही बदल डाली। बदलते दौर में कभी आर्थिक आधार तो कभी रहन सहन का स्तर, कभी पेशे तो कभी जीवनमूल्यों के आधार पर इसकी पहचान और परख की गयी। इस लिहाज से त्वल स्मूपे और ।दहने डंनकम की किताब ÷दी इंग्लिश मिडिल क्लासेज' बहुत महत्वपूर्ण और दिलचस्प है। महत्वपूर्ण काम के स्तर पर और दिलचस्प अंदाज के स्तर पर। इसका पहला अध्याय है ÷हू आर दि मिडिल क्लासेज?'। इसमें ये लिखते हैं : ÷कोई व्यक्ति किस वर्ग से ताल्लुक रखता है इसके निर्धारण के लिए कई कारकों पर विचार करना पड़ता है जिनमें आय, व्यवसाय, उच्चारण, खर्च की आदतें, आवास, संस्कृति, खाली वक्त को कैसे गुजारने की चाह, कपड़े, शिक्षा, नैतिक दृष्टिकोण और अन्य व्यक्तियों के साथ उसके सम्बंध प्रमुख हैं।''15 उसके बाद इन्होंने मध्यवर्ग के अंतर्गत आने वाले पेशेवर समूहों को इन कारकों की कसौटी पर कसा है और जैसे जैसे वे इन्हें परखते जाते हैं यह कारक मध्यवर्ग के निर्धारण के लिए अपर्याप्त जान पड़ने लगते हैं। स्वयं मध्यवर्ग के अंतर्गत किसी एक पेशे से जुड़े सारे लोगों के वर्ग निर्धारण में समस्या पैदा हो जाती है। जैसे ये लिखते हैं : ÷÷आय के आधार पर वर्ग का निर्धारण कठिन है क्योंकि कम आय किसी को सर्वहारा घोषित कर सकती है तो उससे ज्यादा आय उसे मध्यवर्ग का साबित कर सकती है।... आय के आधार पर वर्गीकरण करते समय आनुवांशिकता का प्रभाव, परिवेश और शिक्षा के प्रकार्यों को भी ध्यान में रखना चाहिए।''16 दूसरी जगह पर वे लिखते हैं कि पेशे के आधार पर भी वर्ग का निर्धारण सम्भव नहीं है। कई पेशों का उदाहरण देते हुए वे इसको प्रमाणित करते हैं। वे लिखते हैं : ÷÷ज्यादातर पेशों में ऐसे लोग होते हैं जो निजी ÷पै्रक्टिस' कर के शुल्क वसूलते हैं जबकि अन्य लोग (समान योग्यता धारण करने वाले) राज्य या निजी संस्थानों से वेतन प्राप्त करते हैं।''17 इससे जो निष्कर्ष निकल कर सामने आता है वह यह कि इस वर्ग की संरचना अत्यंत जटिल होने के साथ परिवर्तनशील भी है। इस वर्ग की पहचान सापेक्षता में मतलब किसी से तुलना करके ही की जा सकती है।
मध्यवर्ग से जुड़ी दूसरी बड़ी समस्या यह जानना है कि वह किन समूहों या व्यक्तियों का समुच्चय है और किसके निकट है सर्वहारा के या पूंजीपति के। चूंकि मध्यवर्ग वर्गीकरण के मार्क्सवादी सिद्धांतों के खांचों में फिट नहीं बैठता है और समाज में निर्णायक भूमिका निभाने वाले वर्ग के रूप में सामने आने के बाद इसकी अनदेखी सम्भव भी नहीं थी, इसलिए इस सवाल को केन्द्र में रख कर जब छानबीन की गयी तो नतीजे कुछ इस प्रकार सामने आये कि मध्यवर्ग जिन ÷इंडिविजुअल्स' का समुच्चय है वे ÷इंडिविजुअल्स' अलग अलग पृष्ठभूमि से आते हैं। अतः इस असमान और जटिल समूह को एक वर्ग में श्रेणीबद्ध कर पाना मुश्किल है। जबसे मध्यवर्ग अवधारणा के तौर पर सामने आया है तब से ही मध्यवर्ग के भीतर उच्च मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की उपस्थिति को रेखांकित किया जा रहा है। ÷÷विकसित औद्योगिक समाज की वर्ग व्यवस्था में इन वर्ग या वर्गों के स्थान निर्धारण को लेकर कई सिद्धांत प्रचलित हैं। इनका विभाजन मार्क्सवादी और वेबरपंथी सिद्धांतों के रूप में किया जा सकता है। पहले उत्पादन सम्बंधों के आधार पर अलग अलग सामाजिक वर्गों के उत्पत्ति की बात की जाती थी बाद में उत्पादन सम्बंधों के स्थान पर बाजार महत्वपूर्ण हो गया। इस संदर्भ में मार्क्स के मतों में अंतर्विरोध देखने को मिलते हैं। एक ओर मार्क्स कहते हैं कि पूंजीपति और मजदूर वर्ग के मध्य बढ़ती शत्राुता मध्यवर्ग के लिए ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर देंगे कि उन्हें इनमें से किसी एक का साथ देना ही होगा। वहीं दूसरी ओर कहते हैं कि मध्यवर्ग को अपना आकार इस रूप में बढ़ाना चाहिए कि वे भौतिक वस्तुओं के उत्पादन में प्रत्यक्ष भूमिका निभा सकें जिससे व्यापारिक मजदूर वर्ग की महत्ता में वृद्धि हो सके।
कई मार्क्सवादियों का मानना है कि कार्यालयों में काम करने वाला मजदूर मूलतः एक अस्थायी वर्ग का हिस्सा है। कुछ ने तो मध्यवर्ग जैसे किसी वर्ग की उपस्थिति को अस्वीकार करते हुए इसे बीच का एक स्तर माना। इस वर्ग को अस्थायी और असुरक्षित रोजगार वाला बता कर ऐसा कहा गया कि जब कार्यालयों का यंत्राीकरण और विस्तार होगा तो यह वर्ग रोजगार विहीन होने के बाद सर्वहारा की चेतना का अनुभव कर इनके साथ आ जुड़ेगा और यह भी कहा गया कि कुछ समय के बाद समाज के मध्य का यह स्तर सर्वहारा की चेतना को धारण कर उनकी राजनीति, संघ और संगठनों में शामिल होकर वामपंथी दलों के पक्ष में होगा। जबकि कुछ मार्क्सवादियों ने इस वर्ग के सर्वहाराकरण की किसी भी सामान्य प्रक्रिया से इनकार किया।
मार्क्सवादी अपेक्षाओं के प्रत्युत्तर में वेबरपंथी लेखकों ने विरोधी तर्क प्रस्तुत किये। उदाहरण के लिए लॉकवुड ;स्वबाूववक 1958द्ध ने कहा ÷÷लिपिक वर्ग सर्वहारा की चेतना को नहीं अपना सकते क्योंकि जिस कार्य दशा में वे हैं वह अभी भी उन्हें मानवीय श्रम करने वाले मजदूरों की तुलना में ज्यादा गरिमा प्रदान करता है।'' गिडिन्स (1973) ने कहा कि सामाजिक वर्गों के द्वन्द्वात्मकता का सिद्धांत असफल होगा क्योंकि मध्यवर्ग ने अपने कामकाज के क्रम में मानवीय श्रम की तुलना में, जो सम्मानजनक आर्थिक लाभ अपनी तकनीकी और शैक्षणिक योग्यता के बल पर हासिल किया है, उसको पहचान पाने में मार्क्सवाद का यह सिद्धांत अक्षम है। कुछ लेखकों ने किसी एकीकृत श्रेणी के रूप में मध्यवर्ग की उपस्थिति से इंकार किया है बल्कि उनका मानना है कि यह एक खंडित वर्ग ;थ्तंहउमदजंतल ब्सेंद्ध है। जिसका निर्माण विभिन्न सामाजिक समूहों के मेल से हुआ है जो इस वर्ग की भांति ही अलग अलग प्रतीकों का अभिग्रहण अपने हिसाब से करता है। बाद के शोधों ने इस बात को प्रमाणित किया है कि मध्यवर्ग व्यापक असमानताओं का समुच्चय है।'18
पुराना मध्यवर्ग ही वह आधार था जिस पर नये मध्यवर्ग का आगे चल कर विकास हुआ इसलिए नये मध्यवर्ग को पुराने मध्यवर्ग का विकास भी कहा गया। हालांकि पुराने मध्यवर्ग और नये मध्यवर्ग के अलगाव के कई बिन्दु हैं। जहां पुराने मध्यवर्ग का सामाजिक आधार सिर्फ कारीगर, छोटे दुकानदार, व्यापारी, किसान, छोटे उद्योगपति और पूंजीपति थे; वहीं नये मध्यवर्ग में कौन शामिल थे इसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। पुराने मध्यवर्ग का सम्बंध जहां व्यापारिक पूंजीवाद से था वहीं नये मध्यवर्ग का सम्बंध औद्योगिक पूंजीवाद से रहा। ÷पुराना मध्यवर्ग पूंजीवादी वर्ग संरचना का हिस्सा बने बिना उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति से चालित होता था जबकि नये मध्यवर्ग ने अपना ढुलमुल वर्ग चरित्रा सीधे पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की संरचना से लिया था।'20 बी.बी. मिश्रा ने नये मध्यवर्ग की दो अन्य विशेषताओं की ओर संकेत किया कि पहला, इसने सामान्य जीवन शैली और व्यवहार पद्धति विकसित की और दूसरा यह कि अपने सामाजिक और राजनीतिक आचरण से उदार और लोकतांत्रिाक मूल्यों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। इस तरह नये मध्यवर्ग के सामने आने से हम देखते हैं कि यूरोपीय समाज में निर्णायक भूमिका निभाने वाले एक वर्ग के रूप में यह उभरा है। अब यह वर्ग वहां शक्ति संरचना का हिस्सा बनता है। जिस ÷पब्लिक स्फियर' की चर्चा जार्गुन हेबरमास ने की है उस ÷लोकवृत्त' में इस वर्ग की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यूरोप में मध्यवर्ग के विकास में स्त्रिायों की चर्चा ज्यादा नहीं मिलती है, जो उदाहरण मिलते हैं वह भी पुरुष वर्ग के उत्थान की तुलना में उल्लेखनीय नहीं जान पड़ता। सामाजिक विचारों के कोश के अनुसार ÷ज्यादातर पेशेवर कामगार पुरुष थे और निम्न स्तर के ÷व्हाईट कॉलर वर्कर्स' में अधिसंख्य स्त्रिायां थीं।'21 एक दूसरे स्तर का भेदभाव भी यहां देखने को मिलता है और वह यह कि ÷महिला सिविल सर्वेण्ट्स को समान पद पर होने के बावजूद पुरुषों की तुलना में 10 फीसदी कम वेतन मिलता था।'22
इस तरह यह कहा जा सकता है कि यूरोप का मध्यवर्ग चुनौतियों का सामना करते हुए विकसित हुआ है। फ्रांस की क्रांति और इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति से प्रभावित होता हुआ और उन्हें प्रभावित करता हुआ इसका विकास हुआ है। क्या भारत में भी मध्यवर्ग का विकास अपनी परिस्थितियों के कारण हुआ या अंगे्रजों का उपनिवेश होने के कारण मध्यवर्ग के विकास को भी उन्होंने अन्य क्षेत्राों की तरह प्रभावित किया? यों तो ÷किसी भी देश के संदर्भ में यह तय कर पाना बहुत मुश्किल है कि किन सामाजिक वर्गों के मेल से वहां मध्यवर्ग का निर्माण हुआ है और यह काम तब और भी मुश्किल हो जाता है जब विचार भारत के संदर्भ में किया जा रहा हो।'23 मध्यवर्ग के संदर्भ में उठने वाले सवालों और समस्याओं का उल्लेख किया जा चुका है। इन सवालों और समस्याओं से इतर भारतीय मध्यवर्ग की कुछ खास समस्याएं रही हैं। जैसे भारतीय मध्यवर्ग का विकास एक साथ और समरूप तरीके से नहीं हुआ है। पश्चिम के मध्यवर्ग से यह कुछ अर्थों में अलग भी रहा है। अलगाव के कुछ बिन्दुओं पहला है, ÷मध्यकालीन यूरोप में अस्तित्वमान मध्यवर्ग का प्रमुख आधार जमीन था लेकिन बाद के दिनों में, जमीन से जब कोई बंधा नहीं रहा तब, यह बड़ी तेजी और व्यापकता के साथ समरूप मध्यवर्ग के निर्माण की प्रक्रिया में लग गया। जबकि मध्यकालीन भारत में अस्तित्वमान मध्यवर्ग के ये कारक निःसंदेह एक समरूप मध्यवर्ग के निर्माण कि प्रक्रिया में सक्षम थे लेकिन यह लगातार कृषि व्यवस्था से सम्बद्ध होकर उस पर निर्भर और उसके अधीनस्थ होते चले गये। जहां यूरोप में मध्यवर्ग ने अपनी उपयोगिता कृषि व्यवस्था के बाहर साबित की थी वहीं भारत में मध्यवर्ग की उपयोगिता बहुत कुछ इस कृषि व्यवस्था के घेरे के भीतर आबद्ध रही।'24 इसके लिए कुछ तो परिस्थितियां भी जिम्मेदार रहीं। ÷इंग्लैण्ड में चारागाहों की कमी के कारण घोड़ों (पशुओं) के लिए चारा की उपलब्धता भूमि की अतिरिक्त जुताई और दोहरे श्रम को निमंत्राण देती थी। इसलिए व्यापार के लिए भारत सरीखे मार्ग को, मतलब हजारों पशुओं की सहायता से व्यापार करना, अपनाना उनके लिए मुनासिब नहीं था। इन कारणों से वहां न सिर्फ पहिये का व्यापक इस्तेमाल हुआ बल्कि आगे चल कर व्यापार और वाणिज्य के नये साधनों का आविष्कार भी हुआ।'25 दूसरा, यूरोप का मध्यवर्ग पुनर्जागरण (रेनेसां), ज्ञानोदय (एनलाइटेनमेण्ट) और औद्योगीकरण (इंडस्ट्रीयलाइजेशन) का परिणाम रहा है जबकि भारत में तो पुनर्जागरण (रेनेसां) को लेकर ही विवाद है, ज्ञानोदय और औद्योगीकरण की अवस्थाएं तो उसके बाद की हैं। तीसरा, ÷भारतीय समाज की स्थिति यूरोप से भिन्न थी। इसलिए राजनीतिक क्षेत्रा में भी यूरोपीय और भारतीय मध्यवर्ग को अलग अलग भूमिकाएं निभानी पड़ीं।'26
अलगाव के इन बिन्दुओं से यह बात स्पष्ट होती है कि भारतीय मध्यवर्ग पर बात करने के क्रम में प्रतिमान यूरोपीय मध्यवर्ग ही रहा है। यूरोपीय प्रतिमानों के आधार पर कुछ विचारकों ने भारत के संदर्भ में ÷वास्तविक' मध्यवर्ग के अस्तित्व को ही नकार दिया है। ÷1970 के आसपास कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहासकारों ने भारतीय राष्ट्रवाद की संशोधनवादी व्याख्या करते हुए शिक्षित भारतीयों को अन्य शक्तिशाली लोगों के ÷आश्रित' ;ब्सपमदजेद्ध के तौर पर देखा है जिनके पास किसी स्वतंत्रा राजनीतिक कार्यसूची का सर्वथा अभाव था।'27 भारतीय मध्यवर्ग के बारे में मिशेलगुगलिएल्मो टोरी ;डपबीमसहनहसपमसउव ज्वततपद्ध भी कहते हैं, ÷÷अगर (भारत में) एक आधुनिक और राजनीतिक रूप से वर्चस्वशाली मध्यवर्ग का अस्तित्व था तो उसके सांस्कृतिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति के तौर पर सामाजिक सुधारों का क्रियान्वयन हो गया होता।''28 हरजोत ओबरॉय मध्यवर्ग को एक ऐसी ÷कैटगरी' के तौर पर देखते हैं जो यूरोप में औद्योगीकरण के ऐतिहासिक अनुभव का परिणाम है ÷जबकि भारत में छोटे नौकरशाह और शहरी पेशेवर अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में केवल औद्योगीकरण का ख्वाब देख सकते हैं इसलिए यह अनुत्पादक वर्ग बिल्कुल भी मध्यवर्ग के उपयुक्त नहीं है।'29
इन आक्षेपों के बावजूद कई सवाल हैं जो भारतीय मध्यवर्ग के स्वरूप से जुड़े हैं। भारत में मध्यवर्ग का उदय और विकास सभी जगहों पर न तो एक साथ हुआ है और न एक समान रहा है। ÷सम्भवतः यह कहना कि बंगाल भारत में आधुनिक मध्यवर्ग का जन्म स्थान रहा है, ऐतिहासिक रूप से गलत नहीं होगा।'30 जबकि ÷भारत के उत्तर पूर्व के घाटी क्षेत्राों की बात करें तो वहां मध्यवर्ग का विकास भारत के अन्य भागों के समान ही हुआ है जबकि वहीं के पहाड़ी इलाकों में मध्यवर्ग का स्वतंत्रा विकास हुआ है।'31
चूंकि मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य पर आगे चर्चा करनी है इसलिए भारतीय मध्यवर्ग पर बात करने के बजाय हिन्दी भाषी क्षेत्राों में मध्यवर्ग के विकास पर बात करना जरूरी है। ऐसा मान लिया गया है कि भारत में ÷आधुनिक' मध्यवर्ग का विकास अंगे्रजी शासन के परिणामस्वरूप हुआ है। अब इस पर ज्यादा विवाद भी नहीं है लेकिन इस ढंग के शोध भी हाल के दिनों में प्रकाशित हुए हैं जिसमें अंगे्रजी राज के पहले मध्यवर्ग की जड़ें तलाशी गयी हैं और उसके नतीजे बताते हैं कि उन पारम्परिक अस्तित्वमान आधारों तथा नये अवसरों के मेल से इस आधुनिक मध्यवर्ग का विकास हुआ है। बनारस और लखनऊ इन दो शहरों के ÷विषय अध्ययन' ;बेंम ेजनकलद्ध के आधार पर हिन्दी भाषी प्रदेशों में मध्यवर्ग के विकास पर थोड़ी बात की जा सकती है।
बर्नार्ड कुहन ;ठमतदंतक ब्वीदद्ध ने 1960 में बनारस प्रदेश को केन्द्र में रख कर एक गम्भीर शोधपूर्ण आलेख प्रकाशित कराया था। जिसका शीर्षक था : ज्ीम प्दपजपंस ठतपजपेी प्उचंबज वद प्दकपं . । बेंम ेजनकल वि जीम ठंदंतें त्महपवदण्32 यह आलेख बनारस प्रदेश में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना का विषय अध्ययन है जो वर्तमान जिलों में बलिया, बनारस, गाजीपुर, जौनपुर और मिर्जापुर (इसके दक्षिणी भाग को छोड़ कर) को अपने विषय क्षेत्रा के अंदर शामिल करता है। इस आलेख में बर्नार्ड कुहन ने उस वर्ग के उदय के बीज (मूल) को हमारे सामने रखा है जो आगे चल कर मध्यवर्ग का रूप धारण करता है। ÷मुगल साम्राज्य के विघटन के साथ अठारहवीं शताब्दी में तीन राजनीतिक तंत्राों का उद्भव होता है। राष्ट्रीय (मुगल), प्रादेशिक और स्थानीय।'33 मुगल काल में काजी, कोतवाल, अमीन, सरिस्तादार आदि के जो पद थे वे मुगल साम्राज्य के विघटन के बाद भी बने रहे और प्रादेशिक तथा स्थानीय शासनों में अपनी भूमिका निभाते रहे और ÷ऐसा प्रतीत होता है कि अठारहवीं शती के अंत में यह स्थितियां (पद) परिवार के भीतर ही वंशानुगत हो गयीं। अठारहवीं शती के अंत में, जब उनके (काजियों के) न्यायिक अधिकार सीमित कर दिये गये, तब काजी दस्तावेजों का अभिप्रमाणन और विवाहों का पंजीकृत करने का काम शुल्क लेकर करने लगे। उन्नीसवीं शती के आरम्भिक लेखों के अनुसार, जिनका सम्बंध काजियों से है, पद की वंशानुगत प्रकृति को अंगे्रजों ने स्वीकार कर लिया और किसी सम्पत्ति के विषय के अधिकार पत्रा तथा विवाह के पंजीयन और साज संभाल का जिम्मा काजियों को मिला।'34
मुगलों के पतन के बाद राष्ट्रीय राजनीतिक तंत्रा पर अंगे्रजों ने अधिकार कर लिया था लेकिन प्रादेशिक और स्थानीय निकायों में समाज की ऊंची जातियों का अधिकार बना रहा। मुगलकाल में भू राजस्व की उगाही और जमा करने का जिम्मा प्रादेशिक और स्थानीय निकायों पर था। मार्क्स के अनुसार ÷हिन्दुस्तान की संस्थाओं के गहरे अध्ययन के आधार पर यह राय बनी है कि मूल हिन्दुस्तानी संस्थाओं के अंतर्गत भूमि का स्वामित्व ग्राम पंचायतों के हाथ में होता था। खेती के लिए व्यक्तिगत लोगों के हाथों में उसे वितरित करने का अधिकार इन्हीं ग्राम पंचायतों को होता था और जमींदार तथा तालुकेदार का अस्तित्व पहले केवल सरकारी अफसरों के रूप में होता था। वे नियुक्त इसलिए होते थे कि गांव से प्राप्त होने वाले लगान की निगरानी करें, उसे वसूलें और उसे राजा को दे दें।'35
÷राजस्व की वसूली की पुरानी प्रणाली यह थी कि पैदावार का एक निश्चित हिस्सा ही राजस्व घोषित कर दिया जाता था किन्तु, जब विविध कारणों से पैदावार कम होती थी तो उसी मात्राा में राजस्व भी कम हो जाता था। किन्तु, अंगे्रजी हुकूमत में कर रुपये पैसों से निश्चित किया गया, भले ही पैदावार की मात्राा कुछ भी क्यों न हो। वे किसान, जो कर अदायगी के लिए आवश्यक धन इकट्ठा नहीं कर पाते थे, अपनी जमीन को या तो गिरवी रखने या बेच देने पर बाध्य होते थे।'36
÷अंगे्रजों के आगमन के पहले भूमि कभी भी पूर्णतया निजी सम्पत्ति के तौर पर किसी के अधिकार में नहीं रही। उत्पादन के लाभांश के पारम्परिक हिस्से पर राज्य का अधिकार होता था, जिसे भू राजस्व के नाम से जाना जाता था।'37 ÷भारतीय शासन अपना अधिकांश राजस्व पारम्परिक तौर पर भूमि से प्राप्त करता था। जब अंगे्रज सत्ता में आये तो, राजस्व वसूली के क्रम में उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों के भूमि सम्बंधी अधिकारों का अभिलेख ;त्मबवतकद्ध और परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इस दायित्व ने अंगे्रजों को भारतीय सामाजिक संरचना को आकार प्रदान करने की महान शक्ति एक साधन के रूप में दे दी। एक वर्ग या दूसरे के अधिकारों और विशेषाधिकारों का प्रतिपादन उनकी अपनी इच्छा पर था, ऐसा करते हुए अंगे्रज किसी वर्ग के वर्चस्व की स्थापना सुनिश्चित कर रहे थे। कहना न होगा कि अंगे्रजों की भूमि नीति ने भारतीय समाज के भीतर शक्ति के वितरण को इस तरह प्रभावित किया कि सम्भवतः यह वास्तव में सामाजिक परिवर्तन के अत्यंत प्रभावशाली घटक के रूप में सामने आया जिसके दरवाजे अंगे्रजों ने उन्नीसवीं शती में खोल दिये थे।'38
इस प्रकार अंगे्रजों की भूमि नीति सामाजिक परिवर्तन की प्रधान कारक साबित हुई। चूंकि अब तक भारतीय शासन में राजस्व का अधिकांश हिस्सा भूमि से आता था। अतः अंगे्रज इसकी अनदेखी नहीं कर सकते थे लेकिन राजस्व वसूली के लिए जिस आधारभूत संचरना की आवश्यकता थी, वह रातोंरात खड़ी नहीं की जा सकती थी। परिणामतः परम्परा से चली आती प्रणाली को स्वीकृति प्रदान करनी पड़ी। इसके परिणामस्वरूप ÷अंगे्रज जिला अधिकारियों के सामने बड़ी संख्या में लिपिक, चपरासी और ÷स्क्राइब्स' की तत्काल नियुक्ति का कार्य सामने आ पड़ा। जवाबदेही वाले कुछ पदों पर उनको कुछ भारतीयों की भी नियुक्ति करनी पड़ी जैसे अमीन या तहसीलदार (स्थानीय कर संग्रहकर्ता), सरिस्तादार (अभिलेख रखने वाला और प्रधान लिपिक) और कानून अधिकारी।'39 अतः यह स्पष्ट है कि अंगे्रजों की यह आधारभूत संरचना परम्परा से चली आती आधार भूमि पर निर्मित हुई। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि अंगे्रजों ने राजस्व वसूली का आधार परम्परा से चली आती संरचना को तो बनाया लेकिन भूमि सम्बंधी नीतियों में व्यापक फेरबदल किये। यद्यपि यह परिवर्तन अधिकाधिक राजस्व उगाही और अंग्रेजी सत्ता के प्रभाव विस्तार के हित को ध्यान में रख कर किया गया था, फिर भी इसके कुछ सार्थक नतीजे भारतीयों के पक्ष में भी रहे जो आगे चल कर सामने आये।
अंगे्रजों ने 1793 में इस्तमरारी बंदोबस्त कानून लागू किया। इस कानून के अनुसार ÷सार्वजनिक भूमि उन जमींदारों या कर वसूलने वालों के हाथ में पहुंच गयी, जो वसूली का एक निश्चित हिस्सा सरकार को देने की शर्त मानने को तैयार थे।'40 ÷1795 में भू राजस्व वसूली अंगे्रजों ने उन्हें सौंपा, जिन्हें वे जमींदार मानते थे। कर अदा न कर पाने की स्थिति में अंगे्रजों ने भूमि को बेचना आरम्भ किया।'41 भूमि जब विक्रय की वस्तु हो गयी तो भारतीय सामाजिक संरचना में कई बदलाव देखने को मिले। कई जगहों पर पुराने जमींदार वर्ग निष्प्रभावी होते चले गये और नये जमींदार वर्ग का अभ्युदय हुआ। भूमि जब खरीद फरोख्त की वस्तु हो गयी तो भूमि की माप (अमीन) और निबंधन (रजिस्ट्री) से जुड़े लोगों की आवश्यकता बढ़ी। मुगलकाल में राजभाषा फारसी थी। अतः राजकाज से जुड़े काम इसी भाषा में होते थे। राजकाज और रोजगार की भाषा होने के कारण इसका ज्ञान गैर मुस्लिम कायस्थों, कश्मीरी पंडितों और खत्रिायों ने भी प्राप्त किया। इसका प्रभाव उन्नीसवीं शती के अंत में उत्तर भारत में देखने को मिला। ÷उत्तर भारत में सबसे पहले जातीय संगठन के उदय और निर्माण का नेतृत्व कायस्थों और कश्मीरी पंडितों के समुदायों की ओर से देखने को मिला। यह उस समय घटित हो रहे एक प्रकार के सामाजिक परिवर्तन का प्रत्यक्ष परिणाम था।'42
बहरहाल, जहां पुराने जमींदार अपदस्थ हुए थे और नया जमींदार वर्ग उभरा था, वहां यह जानना जरूरी हो जाता है कि इस नये जमींदार वर्ग में कौन शामिल था? इतिहासकार सतीश चंद्र ने अठारहवीं सदी में भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रवृत्ति का विलेषण करते हुए एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है कि ÷स्रोतों से माूलम होता है कि अवध में यह रिवाज हो गया था कि जब भ्ूा राजस्व बाकी पड़ जाता था तो उसका भुगतान परिवार का साहूकार करता था। साहूकार वैसे लोगों का एक नया वर्ग था जो बहुत से जमींदारों द्वारा भू राजस्व वसूली के अनुबंध पर लिए गये किसी इलाके या तालुक्के के भू राजस्व की अदायगी का जिम्मा अपने हाथों में लेते थे। अगर जमींदार या तालुक्केदार भू राजस्व की अदायगी के पैसे नहीं दे पाता था तो साहूकार उन पैसों का भुगतान कर देता था और जब जमींदार या तालुक्केदार के पास पैसा आ जाता था तब वह अपना हिसाब माहवारी एक प्रतिशत से लेकर कभी कभी तीन प्रतिशत तक के ब्याज के साथ पूरा कर लेता था।....यह स्पष्ट नहीं है कि पैसे वाले लोगों ने जमींदारों की खरीदारी में दिलचस्पी लेनी शुरू की थी या नहीं। इस काम में जमींदारियों की अपेक्षाकृत अधिक बिक्री के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन ये जमींदारियां आमतौर पर छोटी छोटी होती थीं। जमींदारियों का विक्रय मूल्य उससे प्राप्त सालाना राजस्व का लगभग ढाई गुना हुआ करता था। इससे लगता है कि इन जमींदारियों से होने वाली आमदनी बड़े बड़े साहूकारों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं। इसका एकमात्रा उल्लिखित अपवाद पंजाब के एक खत्राी व्यापारी द्वारा वर्धवान राज की खरीदारी था।'43
जैसा ऊपर की बातों से स्पष्ट है कि साहूकार जमींदारियां खरीदने की बजाय सूद पर पैसे लगाकर और व्यापार के माध्यम से मुनाफा कमाना चाहते थे तो सवाल उठता है इन जमींदारियों को खरीद कौन रहा था? इसका जवाब बर्नार्ड कुहन ने अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के हवाले से विस्तार से दिया है। ÷इस समय भारतीयों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पदों के रूप में राजस्व सेवा के द्वार खुले थे। 1805 ई. तक तहसीलदार के रूप में भारतीयों का पूर्ण नियंत्राण प्रशासन और राजस्व उगाही के क्षेत्रा में था। यहां तक कि बनारस की प्रशासनिक व्यवस्था अंगे्रजों के द्वारा हस्तगत कर लिये जाने के बावजूद स्थानीय स्तर पर कर संग्रह का कार्य पुराने अमीनों के हाथ में ही रहा, जो अब तहसीलदार के नाम से जाने जाते थे। तहसीलदारों का कार्य यह था कि राजस्व दाताओं से कर संग्रह कर उसे जिलाधीश के कोषागार की ओर बढ़ा दें। उन्हें वेतन नहीं दिया जाता था, लेकिन जमा की गयी राशि का 11.5 प्रतिशत कमीशन के तौर पर प्राप्त होता था। उन्हें प्रशासनिक बल भी मुहैया कराया गया और वे जिले में न्याय व्यवस्था बनाये रखने को कटिबद्ध थे। .....1797 1805 के दौरान अपने आधिकारिक पद का लाभ उठाते हुए इन्होंने भारी मुनाफा कमाया क्योंकि पहली बात तो यह कि प्रशासनिक बल के आधार पर लूटखसोट करके वे 11.5 प्रतिशत से ज्यादा लाभ अर्जित कर पाने में सक्षम थे और आगे चल कर जो बात ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हुई, वह यह कि गैरकानूनी तरीके से बलपूर्वक बकाया राजस्व के नाम पर अपने मातहतों को जमीन बेचने को बाध्य करने की स्थिति में थे। साथ ही लाभदायी भू सम्पत्तियों को छद्म नामों से खरीदने में भी सक्षम थे। चूंकि तहसीलदारों का नियंत्राण भूमि के ÷रिकार्ड' और राजस्व से जुड़े आंकड़ों पर होता था। इससे वे इस बात से अच्छी तरह परिचित थे कि कौन सी भू सम्पत्ति का मालिकाना हक उनके लिए लाभदायी होगा। चूंकि वे उसके कर निर्धारण के साथ ही साथ सारे कानूनी दांवपेंच से परिचित थे और गैर कानूनी अधिकारों से लैस भी इसलिए बेहद कम समय में व्यापक भूसम्पत्ति अर्जित कर पाने में यह वर्ग सफल रहा।''44 आगे चल कर ईस्ट इंडिया कम्पनी की भूमि सम्बंधी नीतियों के फलस्वरूप इस वर्ग के लिए और अनुकूल परिस्थितियां निर्मित होती चली गयीं। जिससे 1840 तक एक नया भूस्वामी वर्ग विकसित हो गया। 1840 के पहले जहां फारसी राजकाज की भाषा होने के कारण रोजगार प्राप्त करने का मुख्य साधन थी वहीं ÷1840 के बाद प्रशासन में अंगे्रजी के उपयोग पर लगातार बल दिया जाने लगा।'45 ÷उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में कम से कम उत्तर भारत के उन परिवारों में जिनकी पारिवारिक परम्परा शैक्षणिक उपलब्धियों से जुड़ी थी, शिक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण और बिकाऊ कौशल हो गयी। इन परिवारों के लड़के अंगे्रजों द्वारा भारत में स्थापित स्कूलों, कॉलेजों की ओर आकर्षित हुए और उनमें से कुछ तो ऊंची डिग्री प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड चले गये।'46 अंगे्रजी पढ़ी लिखी पीढ़ी के सामने फारसी भाषा वालों की अपेक्षा अब (1850 के बाद) कहीं बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध थे। ÷अंगे्रजी भाषा कानूनी पेशे में प्रवेश का पारपत्रा (पासपोर्ट) भी थी। यह पेशा पारम्परिक रूप से नौकरी पेशा समुदायों के लिए उन्नति के अवसर प्रदान करता था। शुरुआत में न्यायपालिका पर ब्रिटिश बैरिस्टरों का वर्चस्व था। लेकिन जल्दी ही भारतीय अधिवक्ताओं की एक दूसरी कतार खड़ी हो गयी। इन्हें वकील कहा गया। इनमें से कई वकीलों ने प्रिवी कौंसिल की उद्घोषणाओं की न्यायिक पेंचीदगियों पर महारत हासिल करके धन और प्रतिष्ठा दोनों कमाया।'47
भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने अपनी आत्मछवि के अनुरूप एक देशी प्रभुवर्ग (नेटिव्स एलीट) की रचना की थी। यह उपनिवेशवादियों की सर्वाधिक शानदार और स्थायी उपलब्धि थी। 1835 में ही मैकाले ने अपने विख्यात शिक्षा सम्बंधी कार्यवृत्त विवरण में इस इरादे को किसी संकोच और द्वंद्व के बिना इस प्रकार व्यक्त कर दिया था : ÷÷हमें इस समय एक ऐसे वर्ग की रचना करने के लिए भरसक कोशिश करनी चाहिए जो हम और हमारे करोड़ों शासितों के बीच दुभाषिये की भूमिका निभा सके अर्थात् व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग जो रक्त और त्वचा के रंग में तो भारतीय हो लेकिन रुचि, अभिमत, नैतिक मानदंडों और प्रतिभा में अंगे्रज हो।''48 मैकाले की यह इच्छा गिलक्राइस्ट के प्रयत्नों का विस्तार मात्रा थी। इस प्रक्रिया में तेजी तथा समाज के अन्य तबकों में इसका विकास चार्ल्सवुड की शिक्षा नीति से हुआ। ÷सर चार्ल्सवुड के 1854 ई. के ÷डिस्पैच' पहली बार निजी एवं मिशनरी सहायता से जन शिक्षा की आवश्यकता को पहचाना और चयनित शिक्षा की नीति को छोड़ दिया, जिसे छनन सिद्धांत ;थ्पसजतंजपवद जीमवतलद्ध कहते हैं।'49 इससे शिक्षा पर ऊंचे वर्ग का एकाधिकार टूटा और शिक्षा जन के लिए सुलभ हुई। परिणाम यह हुआ कि पारम्परिक शिक्षा पर उच्च वर्गों का बना हुआ वर्चस्व टूट गया। अब यूरोप का ज्ञान भारत में वैधानिक रूप से हर वर्ग और समूह के लिए उपलब्ध था। प्रेस की वजह से वेदों का ज्ञान शूद्रों तक पहुंचा। जाति के कारण आरोपित बंधनों से मुक्त होकर उसने भी अपनी ÷वैयक्तिक्ता' को महसूस किया। जन्म के आधार पर प्राप्त विशेषाधिकारों के स्थान पर मानवाधिकारों की बात की जाने लगी।
इस दिशा में शिक्षा संस्थानों के साथ साथ न्यायालयों के गठन और उसके नये स्वरूप ने भी भारतीय समाज व्यवस्था को प्रभावित किया। वारेन हेस्टिंग्स द्वारा लागू की गयी नयी न्याय व्यवस्था के दो परिणामों पर गौर किया जा सकता है। ÷समानता के नियम की स्थापना तथा सकारात्मक अधिकारों की चेतना का निर्माण। अंतिम बात निम्न वर्गों के अत्यधिक दब्बूपन के कारण धीरे धीरे विकसित हुई, जिसने उन्हें समान कानूनों की व्यवस्था का लाभ लेने और कानूनी कार्यवाही द्वारा अपने अधिकारों को सही साबित करने से रोका। किन्तु शनैः शनैः परिवर्तन हुआ। उदाहरणार्थ 1841 में देखा गया कि चमार, जो कि उत्तर भारत के अछूत थे, अपने जमींदारों के खिलाफ मुकद्मा दायर करने से नहीं डरते थे।'50
भारत में प्रेसिडेन्सियां जहां (कलकत्ता, मद्रास और बम्बई) कायम हुई को छोड़ कर अन्य हिस्सों में विशेषकर हिन्दी भाषी प्रदेशों (पश्चिमात्तर प्रांत) में मध्यवर्ग के विकास की रूपरेखा कमोवेश ऐसी रही है। प्रेसिडेन्सियों में सुविधाओं की उपलब्धता से मध्यवर्ग का विकास हिन्दी भाषी प्रदेश की तुलना में तेजी से हुआ। कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में जहां विश्वविद्यालयों की स्थापना 1857 में हुई थी वहीं हिन्दी भाषी प्रदेश में पहला विश्वविद्यालय 1887 में इलाहाबाद में खुला। आधुनिक ढंग की शिक्षा का प्रसार हिन्दी भाषी प्रदेशों में प्रेसिडेन्सियों की तुलना में बाद में हुआ। परिणामतः शिक्षित मध्यवर्ग का निर्माण भी हिन्दी भाषी क्षेत्राों में बाद में हुआ। इसके कई परिणामों में से एक यह भी हुआ कि शिक्षा के कम प्रचार प्रसार के कारण यहां समाज सुधार और धर्म सुधार आंदोलनों का वैसा प्रभाव नहीं पड़ा जैसा बंगाल या महाराष्ट्र में पड़ा। जो भूमिकाएं बंगाल महाराष्ट्र में समाज सुधारक और धर्म सुधारक निभा रहे थे, हिन्दी भाषी प्रदेशों में अपने अंतर्विरोधों के साथ साहित्यकारों ने निभायीं।
भारतीय मध्यवर्ग के विकास में 1857 का आंदोलन एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। 1857 से पहले जहां मध्यवर्ग एक ÷सोशल कैटगरी' के रूप में उपस्थित था वहीं 1857 के बाद वह एक ÷पोलिटिकल कैटगरी' के रूप में सामने आता है। 1947 के बाद का समय इसके ÷इकोनोमिक कैटगरी' के रूप में विकसित होने का है। इस वर्गीकरण में जो विशेषण लगे हैं वह उस दौर में उनके द्वारा निभायी गयी प्रमुख भूमिका को सामने लाते हैं।
आधुनिक ढंग की शिक्षा के प्रचार प्रसार के अभाव में हिन्दी भाषी प्रदेशों में महाराष्ट्र और बंगाल की तुलना में शिक्षित मध्यवर्ग का अनुपात बहुत कम था। बंगाल की जिस 34वीं इन्फेण्ट्री ने अंगे्रजों के खिलाफ विद्रोह किया था उसमें मूलतः अवध के किसान सिपाही थे। बकौल बिपन चंद्र ÷÷सेना में अवध के प्रत्येक कृषक परिवार का कोई न कोई प्रतिनिधित्व करता था, अवध के 75,000 सैनिक सेना में थे।''51 अंगे्रजों की नयी भूमि नीति से वह सर्वाधिक प्रभावित हुए थे। इस प्रभावित तबके में हिन्दू मुस्लिम का विभाजन नहीं था। दोनों समान रूप से अंगे्रजों से त्रास्त थे। विद्रोह के कई कारणों में एक कारण यह भी था लेकिन इनके विद्रोह की जो व्याख्या प्रस्तुत की गयी है उसको बंगाल के जमींदारों के एक प्रसंग में रख कर देखने की जरूरत है। 1820-25 के आसपास जहां सरकारी नौकरी पेशा वाला तबका सुख सुविधा प्रतिष्ठा सुरक्षा के कारण व्यवस्था अभिमुख था, वहीं दूसरी ओर बंगाल में स्थायी बंदोबस्ती वाले जमींदारों की लगान मुक्त जमीनें छीनने की कोशिश के कुछ दूसरे परिणाम सामने आये। जमींदारों ने लैण्डलार्ड्स सोसायटी की स्थापना की। इस परिघटना की जो व्याख्याएं इतिहासकारों (बांग्ला) ने की है वह इतिहास चेतना पर जातीय चेतना के हावी होने का उदाहरण है। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी52 ओर एस.एन. मुखर्जी53 ने इसकी व्याख्या इस रूप में की है : ÷÷भारत में राष्ट्रवाद के मूल की तलाश में 1857 के पूर्व के दशकों की ओर जाना आवश्यक है। यह वह दौर था जब अंगे्रजी राज द्वारा सृजित कुछ सामाजिक वर्गों को अपने आर्थिक हितों पर खतरे दिखाई दे रहे थे और इन हितों की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं को पश्चिमी पद्धति पर संगठित किया था।''54
1857 के विद्रोह पर शिक्षित मध्यवर्ग की क्या प्रतिक्रिया थी? स्वयं उस आंदोलन में हिन्दी भाषी प्रदेश विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रांत और बंगाल की क्या भूमिका रही? बहुत बाद के दिनों तक बंगाल के इतिहासकारों की 1857 सम्बंधी सोच क्या थी? इनका मानना था कि अंगे्रज इस देश में प्रगतिशील भूमिका निभा रहे थे। उनके राज में विकास हो रहा था। अगर 1857 का विद्रोह सफल हो जाता तो प्रतिक्रियावादी सामंतों के शासन में भारत का विकास रुक जाता और पुनः सामंतवादी ताकतें देश पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेतीं। अब आप स्वयं तय करें कि एक जमींदार वर्ग जो अपने आर्थिक हित की रक्षा के लिए संगठन की स्थापना करता है वह स्वयं को पश्चिमी ढंग से संगठित करता है और जहां किसान, मजदूर, सिपाही, देशी शासक और सामंत अपने हितों की रक्षा के साथ साथ राष्ट्रहित के लिए साम्राज्यवाद से लड़ते हैं, वहां वे सामंतवादी और प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं। हद है।
जिस बात की ओर मैं संकेत करना चाहता हूं वह यह कि हिन्दी भाषी प्रदेशों का चरित्रा आरम्भ से ही मध्यवर्गीय नहीं रहा है। यह 1857 के बाद की परिस्थितियों का परिणाम है। शिक्षा के साथ सिर्फ अवसर ही नहीं अवसरवाद की प्रवृत्ति भी समान रूप से हर क्षेत्रा में बढ़ी है। 1857 के बाद अंगे्रजों के भारत सम्बंधी सोच में व्यापक बदलाव देखने को मिलते हैं। सामाजिक राजनीतिक आर्थिक दृष्टि तो बदलती ही है वह रणनीति (स्टै्रटजी) के तहत एक इतिहास दृष्टि भी भारतीय समाज पर आरोपित करते हैं। इसलिए आधुनिक भारत को समझने के लिए 1857 के बाद का दौर बहुत महत्वपूर्ण है।
1857 के जो तात्कालिक परिणाम सामने आये वह यह कि भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति हुई और विक्टोरिया का शासन आरम्भ हुआ तथा भू राजस्व सम्बंधी नीतियों में बदलाव देखने को मिला। इससे सामाजिक राजनीतिक आर्थिक और ऐतिहासिक चेतना के विकास को एक दिशा मिली। कल तक जो अंगे्रजी राज को बनाये रखने में सहयोगी की भूमिका में थे उसी वर्ग से कुछ ऐसे लोग भी निकल कर सामने आये जो राजनीतिक तौर पर अंगे्रजों के प्रतिस्पर्धी साबित हुए। 1857 के विद्रोह से अछूतों में एक नयी चेतना का प्रसार हुआ। बंगाल आर्मी के विद्रोह का दमन अंगे्रजों ने बम्बई आर्मी और मद्रास आर्मी की सहायता से किया था। बम्बई आर्मी और मद्रास आर्मी में कौन शामिल थे इसका उल्लेख करते हुए आम्बेडकर लिखते हैं : ÷÷उनमें अधिकतर अछूत थे, बम्बई की सेना में महार थे और मद्रास की सेना में परायण थे। जिस अछूत समुदाय ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर भारत को जीतने में उनकी मदद की थी, उसका फल यह मिला कि ब्रिटिश सरकार ने लगभग 1890 में भारतीय सेना में अछूतों की भर्ती पर प्रतिबंध लगा दिया था।''55 1890 तक अंगे्रजों को यह समझ आ गयी थी कि भारतीय समाज की संरचना को यथावत बनाये रखने में ही उनकी कुशल है।
1857 के विद्रोह के बाद अंगे्रजों ने औद्योगिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए भारत में अपने साम्राज्य को ज्यादा दृढ़ बनाने की कोशिश की। अंगे्रजों की इस कोशिश में छिपी मंशा को स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने कहा है : ÷÷औद्योगिक स्वार्थ भारत के बाजार के ऊपर जितने निर्भर होते गये, अंगे्रज उतने ही अधिक इस बात की आवश्यकता अनुभव करते गये कि उसके राष्ट्रीय उद्योगों को तबाह कर चुकने के बाद अब उन्हें भारत में नयी उत्पादक शक्तियों की सृष्टि करनी चाहिए।''56 और ÷÷पुनर्रचना की पहली शर्त यह थी कि भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हो और वह महान मुगलों के शासन में स्थापित एकता से अधिक मजबूत और अधिक व्यापक हो। इस एकता को ब्रिटिश तलवार ने स्थापित कर दिया है और अब बिजली का तार उसे और मजबूत बनायेगा तथा स्थायित्व प्रदान करेगा। भारत अपनी मुक्ति प्राप्त कर सके और हर विदेशी आक्रमणकारी का शिकार होने से बच सके, इसके लिए आवश्यक था कि उसकी एक अपनी देशी सेना हो; अंगे्रज ड्रिल सार्जेण्ट ने ऐसी ही एक सेना संगठित और शिक्षित करके तैयार कर दी है। एशियाई समाज में पहली बार स्वतंत्रा अखबार कायम हो गये हैं। इन्हें मुख्यतया भारतीयों और यूरोपीयनों की मिलीजुली संतानें चलाती हैं और वे पुनर्निर्माण के एक नये और शक्तिशाली साधन के रूप में काम कर रहे हैं। ...भारतीयों के अंदर से, जिन्हें अंगे्रजों की देखरेख में कलकत्ते में अनिच्छापूर्वक और कम से कम संख्या में शिक्षित किया जा रहा है, एक नया वर्ग पैदा हो रहा है, जिसे सरकार चलाने के लिए आवश्यक ज्ञान और यूरोपीय विज्ञान की जानकारी प्राप्त हो गयी है। .भाप ने योरप के साथ भारत का नियमित और तेज सम्बंध कायम कर दिया है, उसने उसके बंदरगाहों को पूरे दक्षिण पूर्वी महासागर के बंदरगाहों से जोड़ दिया है और उसकी उस अलगाव की स्थिति को खत्म कर दिया है जो उसके प्रगति नहीं करने का मुख्य कारण भी है।
÷÷मिलशाहों के वर्ग को पता लग गया है कि भारत को एक उत्पादन करने वाले देश में बदलना उनके अपने हित के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है। इस काम के लिए, सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि वहां पर सिंचाई के साधनों और आवाजाही के अंदरूनी साधनों की व्यवस्था की जाय। अब वे भारतीय रेल का जाल बिछा देना चाहते हैं और वे बिछा देंगे। इसका परिणाम क्या होगा, इसका उन्हें कोई अनुमान नहीं है।''57 मार्क्स का यह भारत सम्बंधी ÷आब्जर्वेशन' प्रोफेटिक साबित हुआ। एम.एन. श्रीनिवास