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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

समाज
यादों से रची यात्रा : पी.सी. जोशी

शताब्दी
दिनकर
की काव्य चेतना : पुनर्मूल्यांकन खगेन्द्र ठाकुर

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित

लेख
माधवराव सप्रे का महत्व मैनेजर पांडेय

मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह

कहानियां
तमाशे
में डूबा हुआ देश असगर वजाहत

जिद्दी रेडियो पंकज मित्र

फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा

स्वीट होम उमा शंकर चौधरी

विशेष
सागू
मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
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अंक/17 जनवरी/08

नये समाज की छवियां
राजीव रंजन गिरि

बीसवीं सदी का अवसान सोवियत संघ के रूप में समाजवादी व्यवस्था के ढहने और मुक्त बाजार के उभार के साथ हुआ। सोवियत संघ के ढहने से वैश्विक भू राजनीतिक परिदृश्य एकध्रुवीय दिशा में तब्दील होता गया। जिस समूह के लिए सोवियत प्रतिबद्धता और प्रेरणा का अवलम्ब था उसका निजी सपना भी दरकने लगा। मुक्त बाजार के प्रणेताओं को इससे वैचारिक ताकत मिली, उनका मनोबल बढ़ा। इसका सबसे अधिक असर तीसरी दुनिया के देशों में दिखना शुरू हुआ। समाजवादी व्यवस्था के चरमराने से तीसरी दुनिया के देश मुक्त बाजार की मंडी बनने लगे। भारत में विकास का नेहरूवादी सपना तो काफी पहले टूट चुका था। बीसवीं शताब्दी का अंत आते आते उसका बचा खुचा वजूद भी समाप्त हो गया। राजनीति आधुनिक युग का युगधर्म थी। विभिन्न सामाजिक समूह जो अब तक इस व्यवस्था में हाशिए पर थे मुख्यधारा में आये। जिस राजनीति ने कभी मुक्ति की राह दिखायी थी उसी के सहारे भारत मुक्त अर्थव्यवस्था की मंडी बना। हालांकि राजनीति के जरिए व्यापक समाज में बदलाव की कामना कुछ समूहों में बची रही। साथ ही मुक्त बाजार द्वारा दिखाये गये स्वप्न को पूरा करने यानी जल्द शोहरत और धन पाने की लालसा राजनीति के द्वारा पूरा करने की कामनाएं भी प्रकट होने लगीं। अन्य किसी प्रोफेशन की तुलना में राजनीति को कैरियर बनाने वाले जल्द सफल दिखने लगे। इस दौर के आते आते सफलता और विकास का पूरा मानदंड बदल गया। इन मानदंडों पर सवाल उठाने वाले विकास विरोधी समझे जाने लगे। महानगरों के अलावा इन सबका असर कस्बाई शहरों में सीधे तौर पर दिखाई देने लगा।
युवा कहानीकार प्रभात रंजन के पहले कहानी संग्रह ÷जानकीपुल' की ज्यादातर कहानियां उपरोक्त पृष्ठभूमि से उपजी हैं। संग्रह में कुल बारह कहानियां हैं। चार कहानियों ᄉ मोनोक्रोम, इजी मनी, पर्दा गिरता है और हिडेन फैक्ट को छोड़ कर शेष कहानियों का लोकेल कस्बाई है। इन चार कहानियों का लोकेल भले बिहार का कोई कस्बा नहीं है महानगर है, लेकिन बगैर किसी नैतिक ऊहापोह के जल्दी धनी बनने की कामना करीब करीब सभी पात्राों में है। संग्रह की पहली कहानी मोनोक्रोम कॉलेज के दिनों में प्रेमी प्रेमिका रहे राहुल और लिच्छवि की है। मोनोक्रोम ब्लैक एंड व्हाइट को ही तकनीकी भाषा में कहा जाता है। कॉलेज छोड़ने के बाद राहुल शर्मा व्यावसायिक लेखक बन चुका है, लेकिन लेखक के रूप में उसका कोई खास मुकाम बना नहीं है। इस बीच लिच्छवि टीवी एंकर बन चुकी है। साथ ही पेज थ्री पार्टियों पर एक अंग्रेजी अखबार में कॉलम भी लिखती है। उसका सम्पर्क यानी पीआर राहुल की तुलना में ज्यादा लोगों से है। एक दिन राहुल किसी अखबार में लिच्छवि की तस्वीर एक मशहूर फिल्म प्रोड्यूसर के साथ देख लेता है। उस अखबार में यह भी लिखा होता है कि उस फिल्म प्रोड्यूसूर सुकांत के साथ लिच्छवि का चक्कर चल रहा है। इस जानकारी के बाद राहुल को यह लगता है अगर लिच्छवि चाहे तो व्यावसायिक लेखक के रूप में उसके असफल कैरियर को सफल बना सकती है। इसलिए एक दिन वह फोन करके लिच्छिवि को डिनर पर बुलाता है। राहुल बहुत कोशिश करता है कि लिच्छवि को पुराने प्यार की भावुकता की याद दिलायी जाए, मगर वह पाता है कि लिच्छवि में अपने कुछ होने का अहसास पहले से काफी बढ़ चुका है। वह एक प्रोफेशनल बन चुकी है।
जब लिच्छवि को राहुल अपने काम की बात बताता है तो वह उससे साफ साफ कह देती है ᄉ ÷÷तो इसलिए तुमने मुझे यहां बुलाया था... देखो राहुल मैं तुम्हें प्रोफेशनली तो जानती नहीं हूं...।'' यह नये दौर का सम्बंध है। बाद में लिच्छवि राहुल से ही फोन करवा कर सुकांत को उसी रेस्तरां में बुलवाती है। उससे राहुल को मिलवाती है और फिर सुकांत के साथ उसकी सिएलो गाड़ी में बैठ कर चली जाती है। कहानी में जब सुकांत लिच्छवि से राहुल के बारे में पूछता है तो वह बताती है कि वह कॉलेज में उसका सीनियर था और उसे लगता है कि उसे उस आदमी की मदद करनी चाहिए। जवाब में सुकांत का यह वाक्य बड़ा प्रसंगिक लगता है ᄉ ÷÷शुक्र है तुम्हें इतना तो याद है कि तुम्हें किसके लिए कितना क्या करना है।''
सम्बंधों को लेकर लिखी गयी यह कहानी पुरानी पीढ़ी के कथाकारों से भाव के धरातल पर निहायत तौर पर अलग है। बदलते समय के साथ व्यक्ति चरित्रा में आ रहे परिवर्तन को दिखाना न केवल इस कहानी की बल्कि पूरे संग्रह की खासियत है।
संग्रह की दो अन्य कहानियों ÷इजी मनी' और ÷पर्दा गिरता है' को मोनोक्रोम से जोड़ कर पढ़ने पर इनके अर्थ उद्घाटित होते हैं। पर्दा गिरता है की शीरीन अब भी शालीन से प्यार करती है। लेकिन उसे धीरे धीरे यह महसूस होता है कि जिन्दगी में तटस्थता भी एक चीज होती है। शीरीन के लिए जिन्दगी एक आर्ट है। वह शालीन से कहती है कि ÷÷यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम मुझे एक अच्छे नाटक की तरह याद रखो या भूल जाओ, लेकिन मैं तुम्हें हमेशा याद रखूंगी।'' शीरीन ऐसा क्यों कहती है? क्योंकि यह इजी मनी का जमाना है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसी इजी मनी के दौर की नायिकाएं हैं शीरीन और लिच्छवि। शीरीन का विकास जब लिच्छवि के रूप में होता है तब माफी मांगने या भावनाओं में बहने की गुंजाइश नहीं रह जाती है। प्रभात रंजन की इन कहानियों में आयी लड़कियां अपने कैरियर, अपने चुनाव को लेकर बहुत सजग हैं। लेकिन इन लड़कियों का जीवन संघर्ष इन कहानियों में नहीं आया है। वह आता तो इन कहानियों से अधिक संदर्भ और आयाम जुड़ते।
इन कहानियों से जोड़ कर संग्रह की एक और कहानी ÷हिडेन फैक्ट' को भी पढ़ा जा सकता है। कथाकार ने इसमें अर्नेस्ट हेमिंग्वे की हिकमत का उपयोग किया है। उनके कहानी लेखन की तकनीक को आलोचकों ने हिडेन फैक्ट का नाम दिया था। इसी हिकमत का सहारा लेकर कहानी में मुख्य कथा को छोड़ कर सस्पेंस बनाये रखने की कोशिश की गयी है। इस कहानी में भी इजी मनी की कामना देखी जा सकती है। पेण्टर महोदय की कोठी में किताबों की कैटलॉगिंग करते करते नटराज को एक डायरी मिलती है। डायरी में उन पेण्टर महोदय के अज्ञात जीवन सूत्रा हैं। नटराज उसे छिपा कर रखना चाहता है। पेण्टर महोदय की डायरी है। उनकी मृत्यु के बाद उसे बेच कर काफी धन प्राप्त किया जा सकता है।
प्रभात रंजन की कहानियों में खबरों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। सिर्फ इस अर्थ में नहीं कि फ्लैशबैक जैसी कहानी खबर को पढ़ कर लिखी गयी है। वास्तव में, आज के दौर में अनेक खबरिया चैनल, समाचारपत्राों के छोटे छोटे संस्करण खबर के कारोबार में लगे हैं। मगर समाज की सच्ची तस्वीर उनमें उभर कर नहीं आ पाती है। इसलिए आज कथाकारों से उम्मीद की जाती है कि वे समाज की सच्ची तस्वीर पेश करें। कहानी और खबर के रिश्ते पर विचार करते हुए आलोचक सुधीश पचौरी ने लिखा है ᄉ ÷÷आज की कहानी और खबर में क्या फर्क है? इससे पहले कि हम यह कहें कहानी खबर बन कर खुद से बेखबर हो गयी है, हमें यह पूछना चाहिए कि खबर और कहानी के बीच फर्क कहां और कैसे पैदा होता है? समकालीन कहानी की एक बड़ी विशेषता कहानी को खबर बनाना नहीं खबर को कहानी बनाना है। इस तरह उसकी एक खासियत और है कि वह नितांत समकालीन बनती जा रही है, समकालीन यानी खबर की तरह अभी और इसी वक्त सम्प्रेषित की जाने योग्य एक सूचना। उसके बाद उसका क्या होगा यह कहानी की चिन्ता के बाहर की चीज है। इस अर्थ में कहानी एक नश्वर जगत में स्थापित होने लगी है। मगर क्या वह खुद एक नश्वर क्रिया है या हो सकती है? अगर हम कहानी और खबर के बीच बन रहे नये रिश्ते को समझने की कोशिश नहीं करेंगे तो हम बहुत जल्दी कहानी की नश्वरता या अंत में यकीन करने लगेंगे।'' (उत्तर यथार्थवाद, वाणी प्रकाशन 2004, पृष्ठ - 74-75)।
÷फ्लैशबैक' कहानी में प्रकट तौर पर स्टिंग ऑपरेशन के दुरुपयोग की घटना है। ऊपरी तौर पर यही लगता है कि यह कहानी किसी राजनेता का स्टिंग ऑपरेशन करने में धरे गये एक अपराधी की है। इस तरह की घटनाएं समाचारपत्राों में रोज छपती हैं, समाचार चैनलों द्वारा तो स्टिंग ऑपरेशन करवाये भी जाते हैं। मगर यह कहानी केवल इतनी ही नहीं है। इस कहानी के केन्द्र में वह डिजेनरेशन है जो पिछले पंद्रह सालों के दौरान बिहार के कस्बों बड़ी तेजी से घटित हुआ है। बाजार कस्बाई युवाओं की आंखों में भी सपने भर रहा है और उन सपनों को जल्दी से जल्दी पूरा करने की गलाकाट महत्वाकांक्षा भी उनके अंदर पैदा कर रहा है। वे किसी भी कीमत पर अपने सपनों को पूरा करने चाहते हैं। राजनीति को प्रोफेशन बनाने की बात समीक्षा के आरम्भ में मैंने की थी। फ्लैशबैक कहानी के वाचक की सुनें ᄉ ÷÷मेरे ढेरों चाचा अलग अलग सरकारी महकमों मे काम करते थे, पिता जी भी सरकारी अधिकारी थे। मन ही मन सोचता कि इन लोगों ने जीवन भर सरकारी कुर्सियों पर बैठ बैठ कर घूस ले लेकर भी कितना कमाया। दो एक छोटे छोटे शहरों में एकाध छोटे बड़े मकान, चढ़ने के लिए गाड़ी, बिजली के लिए एकाध जेनरेटर सेट... कितना कमाया होगा उन लोगों ने। मैं एक ही झटके में राजनीति के माध्यम से लम्बा हाथ मारना चाहता था। टाटा सफारी गाड़ी में बैठ कर चलता, जिस पर आगे पार्टी का झंडा लगा होता। किस पार्टी का यह तय नहीं किया था।''
कस्बाई समाजों में आये बदलावों पर प्रभात रंजन की बड़ी बारीक नजर है। केवल राजनीति ही नहीं सामाजिक अंतरसम्बधों के बदलावों को लेखक ने अपनी कहानियों में बखूबी पकड़ा है। इन कहानियों के लोकेल बिहार के दो सबसे पिछड़े शहर सीतामढ़ी या मोतिहारी हैं। ये दोनों शहर बाढ़ में बुरी तरह तबाह हो जाते हैं। ऐसे पिछड़े शहरों को कहानी का लोकेल बनाना कथाकार की एक युक्ति भी हो सकती है। एक लोकेल की होने के बावजूद इन कहानियों में एकरसता या पुनरावृत्ति नहीं है। फ्लैशबैक कहानी स्थानीय नेता बांके बिहारी के अपराधी में बदल जाने की कहानी है। कहानी जिस सीतामढ़ी में घटित हो रही है वहां के युवा तेजी से करोड़पति बनने की होड़ में या तो राजनीतिक सौदेबाजी कर रहे हैं या ब्लू फिल्मों की सीडी का अवैध धंधा। अगर आप धन कमा लेते हैं तो शहर में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। यह ऐसा दौर है जिसमें कोई यह नहीं पूछता धन कहां से आ रहा है? इसी तरह मिस लिली का अरुण चौधरी है या सोप ऑपेरा का रामकिशन सभी इस अर्थव्यवस्था के पैदावार हैं। सबको जल्दी सफलता चाहिए। सब रातोंरात सब कुछ पा लेना चाहते हैं, वह सब जो बाजार में दिखाई देता है। उन्हें पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, जाते हैं।
इन कस्बों में भयानक विद्रूपताओं का नंगा खेल खूब चल रहा है। अलग अलग पेशों के लोग आपस में मिल कर इस भयावह खेल को गति और अंजाम दे रहे हैं। बांकेबिहारी जिस महिला के जरिए सांसद का स्टिंग ऑपरेशन करना चाहता है वह ज्यादा लोभ के चक्कर में सांसद को असलियत बता देती है। बांकेबिहारी के दरबार में बैठ कर सांसद बनने वाला व्यक्ति उसे पहचानने से भी इंकार कर देता है। मिस लिली की लिली, फ्लैशबैक के डॉक्टर साहेब और मृदुलाभूषण की सफलता का रहस्य उजागर होने के बाद उसकी भयावहता का पता चलता है।
प्रभात की कई कहानियों में कथा के साथ साथ उपकथाओं के रूप में किस्से भी चलते रहते हैं। मिस लिली, इंडियन आइडल जैसे कार्यक्रमों के टीवी पर प्रसारण के बाद कस्बों में उन जैसे कार्यक्रमों में पहुंचने के सपने जिस तरह से बनने लगे हैं उनकी कहानी है। इसमें लेखक ने बड़ी अच्छी तरह दिखाया है कि किस तरह कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के दौर में कस्बों में जेनरल नालेज की कोचिंग तक शुरू हो गयी थी। ऐसे ही एक उमेश भवशिंका की कथा मिस मिली में आती है जिसके बारे में सीतामढ़ी में उस दौर में सभी कहते थे कि कौन बनेगा करोड़पति वालों ने उसे कभी इसलिए नहीं बुलाया क्योंकि उनको पता था कि उमेश सारे सवालों के जवाब जानना है। किस्सागोई का तत्व प्रभात रंजन की कहानियों में प्रबल है।
संग्रह की शीर्ष कहानी ÷जानकीपुल' में पुल नहीं बन पाता। लेकिन पुल स्वप्न की तरह हर कहीं मौजूद है। पुल बनने से गांव शहर से जुड़ जाएगा। पुल यानी विकास का रास्ता। कई पीढ़ियों के मन में इसका सपना बसा है। ऐसा सपना जो कभी पूरा नहीं होता। पुल के शिलान्यास की खबर मुखिया जी के मुंह से सुन कर दादा जी ने जवाब में टंगी जवाहरलाल नेहरू की धुंधली सी तस्वीर की ओर बस देख भर लिया था। मानो उनके प्रति कृतज्ञताज्ञापन कर रहे हों। आजादी के बाद विकास और नेहरू एक दूसरे के पर्याय के तौर पर देखे जाने लगे थे। दादा जी के सामने नेहरू जी की धुंधली तस्वीर है जिसके साथ विकास की आस भी धुंधला चुकी है। कहानी का वाचक इला को पुल के बारे में बताता है। इला कहती है कि अच्छा है, एक बार पुल बन जाए तो मैं तुम्हारे गांव गन्ने या आंवले का पेड़ देखने आऊंगी। जवाब में जब वाचक कहता है कि तब गांव गांव थोड़े ही रह जाएगा। तब इला आश्चर्य से पूछती है कि जब यह नहीं रह जाएगा तुम्हारे गांव में तो वहां बाकी क्या रह जाएगा। गांव का बुनियादी गुण भले समाप्त हो जाए पर उसे शहर बनना कुबूल है। शहर यानी विकास। अर्थशास्त्रा के एक पारिभाषिक शब्द सृजनात्मक विध्वंस के जरिए इस कहानी को परखा जा सकता है।
अंत में ÷बदनाम बस्ती'। यह विरल गद्य का एक नमूना है। लेखक ने अगर इसे कहानी माना है तो ठीक ही है क्योंकि इसमें कहीं भी यह दावा नहीं है कि यह एक सत्यकथा है। विकास के मौजूदा मॉडल ने स्थानीय स्तर पर कला संस्कृति को नष्ट करने का काम किया है। मुजफ्फरपुर का एक इलाका जहां कला की दुनिया आबाद थी, नृत्य संगीत के एक से बढ़ कर एक कलाकार थे। अब जिसकी पहचान वेश्यावृत्ति के केन्द्र के रूप में बन गयी है। उसे एक ऐसी बस्ती के रूप में याद किया जाता है जहां बदनाम लोग रहते हैं। समाज और कानून दोनों नजरिए से बदनाम बस्ती। मुजफ्फरपुर के उस इलाके के जानने वालों को इसमें कई सही पात्रा मिलेंगे। मगर यह सचाई इसकी व्याख्या के सामने मुश्किल पेश करेगी। कहानी और खबर के रिश्ते को समझे बिना बदनाम बस्ती के पाठ के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। प्रभात ने संग्रह की कहानी लापता के अंत में नोट के तौर पर लिखा है ᄉ ÷÷इस कहानी में कितना पत्राकार का झूठ और कितना लेखक का सच इसका निर्णय मैं पाठकों पर छोड़ता हूं।''
महावृत्तांतों के टूटने के दौर में प्रभात रंजन की इन बारह कहानियों में ऐसे लघु वृत्तांत तैयार करने की जद्दोजहद दिखाई देती है जिसको शामिल किये बिना समाज की मुकम्मल तस्वीर नहीं बनती है। इन कहानियों में केवल सीतामढ़ी या कुछ अन्य शहरों की तस्वीर भर नहीं है इनमें उत्तर भारत के कस्बों के नये बनते समाज की छवियां हैं।
जानकी पुल : प्रभात रंजन, प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्य : 120.00


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