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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

  शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी

यह प्रख्यात चिन्तक , आलोचक, उपन्यासकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का शताब्दी वर्ष है। हिन्दी साहित्य के इस अप्रतिम पुरखे को याद करते हुए वरिष्ठ आलोचक, कवि और गद्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी का आलेख

शांतिनिकेतन गुरुदेव के स्वप्नों का आश्रमी विद्यालय था - विश्वनीड़। स्वाधीनता आंदोलन के संस्कृति बोध का साकार रूप। वहां विश्वविद्यालयों जैसा वेतनमान नहीं था। उन्हें ३० रुपये मासिक की वृत्ति पर हिन्दी और संस्कृत पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया था। वे वहां हिन्दी के प्रथम अध्यापक थे। उपेन्द्र कुमार दास ने लिखा है कि पंडित जी को शांतिनिकेतन बुलाने का एक उद्देश्य यह भी था कि छात्र छात्राएं वेद मंत्राों का शुद्ध उच्चारण कर सकें। पंडित जी का विवाह २० वर्ष की आयु में हो गया था। शांतिनिकेतन वे माता जी ( अपनी पत्नी श्रीमती भगवती देवी) के साथ ही गये। परिवार में अनेक वर्षों तक पति पत्नी ही रहे होंगे। उन्होंने १९३९ में पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखा - ÷÷ बच्चों को सम्हालने में इतनी फुरसत भी नहीं मिल पाती कि जम कर पत्रा लिख सकूं।'' अनुमानतः बच्चों से आशय बबुआ ( ज्येष्ठ पुत्रा जगदीश द्विवेदी) और पुतुल ( इंदुमती) से है। पंडित जी ने इस पत्रा में पत्नी के आपरेशन की बात की है - कल आपरेशन हुआ है। कनोडिया जी की कृपा से मातृसेवासदन में प्रबंध हो गया है।

पंडित जी का सम्बंध गांव में अपने माता , पिता, भाइयों और मित्राों सम्बंधियों से लगातार बना हुआ था। वे यथाशक्ति गांव में परिवार की आर्थिक सहायता भी करते थे। उनके गांव के ही एक उच्चाधिकारी श्री नंदराम जी ( आई.ए.एस.) ने लिखा है - ÷÷ शांतिनिकेतन से ग्रीष्मावकाश में जब कभी द्विवेदी जी अपने गांव आते थे, तो प्रायः मेरे घर पर रहते थे। मिडिल स्कूल में वे तथा मेरे पिता जी सहपाठी थे। हमारे परिवार में कुछ पढ़ाई लिखाई का वातावरण था। अतः द्विवेदी जी का सारा दिन प्रायः मेरे घर पर ही बीतता था। वे नित्यप्रति अपनी चिट्ठियां लेने बसरिकापुर स्थित डाकखाना जाते थे और गांव की सभी चिट्ठियों को स्वयं लाते थे। फिर अपनी चिट्ठियों को रख कर शेष चिट्ठियों को बांटने के लिए हम बच्चों को दे देते थे। ... खादी के दो कुर्ते, दो धोती और दो बनियाइन मात्रा ही उनके पहनने के कपड़े रहते थे, जाड़े में एक लम्बा खद्दर का ऊनी कोट तथा एक चादर वे शरीर पर धारण करते थे। पंडित जी का एक ही व्यसन था और वह था ताम्बूल भक्षण। पान की सारी सामग्री वे अपने पास रखते थे और स्वयं पान लगा कर खाते थे तथा दूसरों को खिलाते थे। पान लगाते समय संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों से उदाहरण देकर वे ताम्बूल की महिमा बतलाते जाते थे।'' ( मेरे गांव के पंडित जी, नंदराम जी, ÷ रस सुलभ', आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मृति अंक, जुलाई अगस्त १९९१)

नंदराम जी ओझवलिया के ही रहने वाले हैं। उनके परिवार से पंडित जी की घनिष्ठता आत्मीयता थी। नंदराम जी के छोटे भाई डा. गोविन्द जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। मेरठ विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर हुए। गम्भीर शोधकर्ता हैं। उनके पास पंडित जी के लिखे हुए अनेक पत्रा हैं। मैंने उन पत्राों को देखा है। पत्राों से पता चलता है कि द्विवेदी जी के परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी थी। नंदराम जी और गोविन्द जी के पिता पं. जी के आत्मीय , सहपाठी मित्रा थे। द्विवेदी जी शांतिनिकेतन से भी पत्रा द्वारा उन्हें अपने परिवार की आर्थिक सहायता करने के लिए लिखते थे। बाद में वे उधार चुकता करते थे।

२१.०५.१९४७ को अपने गांव ओझवलिया , पो.आ. बसरिकापुर, जिला बलिया से पं. बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखते हैं - ÷÷ मैं छुट्टियों में यहां घर आया हुआ हूं। आपका पत्रा शांतिनिकेतन से लौट कर आया है।...

÷÷ इधर बड़ी महंगी है। दारिद्रय का तो प्रत्यक्ष नृत्य हो रहा है। लोग पूछते हैं कि सचमुच सुराज हो रहा है। जब पूछते हैं तो उनका मतलब बराबर यही होता है कि क्या ढंग से अन्न वस्त्रा मिलने लायक हालत सचमुच आ रही है। सुराज का अर्थ यहां पेट भर मोटा अन्न और तन भर वस्त्रा ही है।'' ( पृ. ५२ पत्रा, रा.क. प्रकाशन)

२९.०१.१९४० को अभिनव भारती ग्रंथमाला कलकत्ता से चतुर्वेदी जी को लिखते हैं - ÷÷ एक स्वार्थगत बात। मेरे छोटे भाई की परीक्षा फीस के लिए इस माह में ३५ रुपये के करीब अधिक देना पड़ेगा। वि.भा. ( विशाल भारती) कोष से क्या कुछ मिल सकने की आशा है।'' ( पृ. ४५, पत्रा)

लगता है चतुर्वेदी जी ने आंशिक प्रबंध करा दिया। सो ११.०२.१९४० को शांतिनिकेतन से लिखते हैं - ÷÷ कृपापत्रा मिला। २० रुपये मनीआर्डर प्रेमी जी के यहाँ से मिल गया है। अत्यंत उपकृत हुआ हूं।''

पैसा वि.भा. कोष से नहीं। प्रकाशक के यहां से मिला। सम्भवतः इसकी व्यवस्था चतुर्वेदी जी ने करायी।

शांतिनिकेतन से गांव जाने पर परेशानी होती होगी। लोगों की , परिवार की हालत देख कर और उस पर गांव वालों की संकीर्णता, अंधविश्वास देख कर लिखा है - ÷÷ दो महीने तक छुट्टियां रहीं। घर चला गया और वहां ÷ गृह कारज नाना जंजाला' में फंस गया। काम कुछ भी नहीं हुआ। पुराना पं. बड़े दुःख और कटु अनुभव के बाद लिख गया था कि ÷ यदि वांछसि मूर्खत्वं ग्रामे वस दिनत्रायम्‌' अर्थात्‌ यदि मूर्खता ( प्राप्त करना) चाहते हो तो गांव में तीन दिन जाकर वास करो।'' ( उप., पृ. ४६)

१९४८ में ओझवलिया में भयंकर बाढ़ आयी। गांव घर बह गया। पंडित जी ने चतुर्वेदी जी को लिखा - ÷÷ मैं बेघर हो गया हूं।'' पत्रा में यह लिख कर वे हिन्दी भवन की बात करने लगते हैं, लेकिन मन में गांव का घर अटका है। एक दो वाक्यों के बाद फिर गांव का घर याद आता है - ÷÷ मेरा घर बहुत छोटा था, पर वही एक मात्रा स्थान था जिसे मैं अपनी पैतृक सम्पत्ति कह सकता था'' ( पत्रा, पृ. ८१)। यह पैतृक सम्पत्ति पंडित जी ने एक दलित परिवार के नाम कर दी थी।

द्विवेदी जी की आर्थिक स्थिति शांतिनिकेतन में अच्छी नहीं थी। उस स्थिति में भी शांतिनिकेतन का रवीन्द्रदीप्त वातावरण उन्हें उल्लसित रखता था। शांतिनिकेतनकालीन पत्राों से लगता है कि उन्हें जैसे सार्थक सकर्मकता का क्षेत्रा मिल गया हो। शांतिनिकेतन के वातावरण के विषय में उन्होंने पं. बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्रा में अपना उद्गार इस शब्दों में व्यक्त किया है - ÷÷ शांतिनिकेतन में जहां आपको और मुझे द्विजत्व प्राप्त हुआ है और जहां गुरुदेव और दीनबंधु के चरण रज पड़े हैं, जहां शास्त्राी मोशाय और बड़दादा की पगधूलि मिल जाया करती है, जहां आचार्य क्षितिमोहन सेन और आचार्य नंदलाल की पवित्रा हंसी आज भी गूंज रही है।'' ( पत्रा ८५)

वेतन कम मिलने पर भी वे सोचते थे - ÷÷ जिस कार्य को मैं कर रहा हूं उसके लिए मुझे भारतवर्ष के तीन और उसके बाहर के एक ऐसे महापुरुष के आशीर्वाद प्राप्त हैं जिनकी तुलना में सब फीके पड़ जाते हैं। इन चारों के नाम आप जानते ही हैं - रवीन्द्रनाथ, गांधी जी, मालवीय जी, एंड्रयूज। इनके सामने मैं संसार के और किसी को नहीं देख पाता।'' ( पत्रा, पृ. १२४)

फिर भी आर्थिक स्थिति डावांडोल करती थी। १९३९ का पत्रा - ÷÷ पिछली छुट्टियों में मैं अपनी पत्नी की चिकित्सा के लिए कलकत्ते गया था। तब से बजट एकदम गड़बड़ा गया है। इस महीने अनेक कोशिश करके भी एक जरूरी मद में कुछ रुपये जमा नहीं कर सका। मैंने १००० रुपये का इंश्योर कराया है। उसके लिए हर तीसरे महीने १३१ रुपये देना पड़ता है। इस बार की अंतिम तारीख ३१ अगस्त बीत गयी ३० सितम्बर तक और समय है। क्या वि.भा. ( विशाल भारत) से उसके पहले १३१ रुपये मिल सकता है।'' ( पत्रा ४२)

कभी कभी आर्थिक स्थिति का प्रभाव मनःस्थिति पर पड़ता था। वह पत्राों में अभिव्यक्त भी होता था - ÷÷ मैं अपने जीवन को क्या कहूं। केवल किसी प्रकार पेट पालने में ही तो सारी शक्ति खर्च हो गयी। और अब दूर तक बढ़ आने के बाद देखता हूं कि पेट पालने योग्य भी नहीं रह गया हूं। दिन रात इसी उधेड़बुन में लगा रहता हूं कि इस भयंकर महंगी के दिनों में अपना और अपने कहे जाने वालों का पेट कैसे भरूं।'' ( पृ. ६२, पत्रा)

डा. रामसिंह तोमर ने लिखा है कि द्विवेदी जी शांतिनिकेतन से काशी प्रधानतः आर्थिक कारणों से गये। काशी विश्वविद्यालय में नियुक्त हो जाने से उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई। लेकिन अब उनका परिवार बड़ा था। चार पुत्रा , तीन पुत्रिायां। अब उन्हें प्रोफेसर हजारी प्रसाद द्विवेदी की लड़कियों के लायक वर ढूंढने थे। नौकरी के बाद कहां रहेंगे इसका भी इंतजाम करना था। सो आर्थिक तंगी उन्हें आखिर तक रही। लेकिन इस आर्थिक तंगी - शांतिनिकेतन वाली आर्थिक तंगी - में भी उनका शील संकोच ( मुंहदुब्बरपन) और जरा भी सुधार होने पर उल्लास देखिए - पहले चतुर्वेदी जी को सहायता के लिए पत्रा लिखा फिर ख्याल आया चतुर्वेदी जी ही कौन धन्ना सेठ हैं। किसी से कहेंगे। उनको कोई ज्यादा परेशानी न हो सो लिखा - ÷÷ बहुत दिन पहले एक पत्रा लिखा था, मालूम नहीं वह आपको मिला या नहीं। मैंने उसमें कुछ रुपये एक जगह भेज देने की प्रार्थना की थी, अगर रुपये न भेजे गये हों तो उसके लिए चिन्तित होने की कोई जरूरत नहीं। मैं इंतजाम कर लूंगा। आप अगर शीघ्र बता दें कि रुपये का इंतजाम हुआ या नहीं तो मैं उपकृत हूंगा।'' ( पृ. १५, पत्रा)

३७ ई. में द्विवेदी जी की स्थिति शांतिनिकेतन में - ÷÷ मैं आपसे अपने हृदय की बात कह रहा हूं। शांतिनिकेतन में रह कर मैं जो कुछ साहित्यिक कार्य कर सकता हूं। वह नहीं कर सकता। मुझे ३० - ३५ पीरियड प्रति सप्ताह काम करने के बाद भी प्रतिदिन पेट की चिन्ता के लिए कई अनावश्यक या फिर भिन्न काम करने पड़ते हैं।'' ( पृ. २७, पत्रा)

कहीं से कुछ आमदनी हो गयी तो -

÷÷ बात यह थी कि इन दिनों विषम चिन्ता का शिकार बन गया था। सौभाग्यवश मुझे एक हल्का सा काम मिल गया था। मेरी आंखें जहां तक काम दे सकती थीं मैं इसी में चिपटा रहा। पत्रा लिखना बंद कर दिया था। कल पूरे सौ रुपये का काम समाप्त कर चुका हूं। अगले सप्ताह में भगवान की कृपा होगी तो २० रुपये का और कर लूंगा। इस प्रकार इस जून के भीतर १२० रुपये पा जाऊंगा और ऋण की एक किस्त जो जेठ की पूर्णिमा को दे देनी चाहिए थी, आषाढ़ में निश्चित रूप से चुका दूंगा। वह रुपया मुझे अप्रत्याशित रूप से मिल गया है। इसके लिए आप लोगों का आशीर्वाद और स्नेह ही कारण है।

÷÷ अनुत्सृज्य सतां वर्त्य यद् स्वल्पं तद् बहु''

अल्प को बहु मानने का एक और उदाहरण। अपनी आर्थिक स्थिति की बेहतरी की सूचना देने वाले ऐसे उत्साही प्राणी कम मिलेंगे -

÷÷ मेरी आर्थिक स्थिति पहले से अच्छी है। बच्चों का स्वास्थ्य ठीक है। यद्यपि सबसे छोटे दो बच्चों को ही थोड़ा थोड़ा दूध मिल पाता है, पर आपके आशीर्वाद से वे स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। चतुर्वेदी स्वस्थ हैं। पिछले ८ महीनों से मैं हिन्दी भवन का डिरेक्टर हूं।''

प्रसन्न होने और आर्थिक स्थिति सुधरने का ठोस प्रमाण दिया गया है - ÷÷ मेरी तनख्वाह १०० रुपये की जगह २०० रुपये हो गयी है। पुराना कुछ उधार और ऋण है उसको चुका रहा हूं। पिछले आठ महीनों में ऋण लेने का मौका नहीं आया। यह जगह अभी भी अस्थायी ही है।'' ( पृ. ९१, पत्रा)

जिसके पास कुछ नहीं होता उसे कम ही मिल जाए तो वह स्वतः अल्प से बहु हो जाता है। आठ महीनों से ऋण नहीं लिया यह उसके लिए कितने उल्लास की बात है जिसने नौकरी के बावजूद पिछले १५ वर्षों से लगातार ऋण लिया हो अपना और बच्चों का पेट पालने के लिए।

इसी तंगहाली में द्विवेदी जी का वह अट्टहास फूटता था जिसकी चर्चा बलराज साहनी ने की है- ÷ पं. जी हंस रहे हैं तब सब ठीक है।'

तब शांतिनिकेतन रवीन्द्रनाथ के स्वप्न का विद्या आश्रम था। भारत के महान कवि के संकल्प का अनुष्ठान। वह एक विश्व दृष्टि था। मानो नयी दुनिया में यह महादेश अपनी जगह बनाने की साधना कर रहा हो - अथेयं विश्व भारती। यत्रा विश्वं भवत्येकनीडम्‌

भारत की सांस्कृतिक साधना के प्रतीक रवीन्द्रनाथ नोबल पुरस्कार से सम्मानित होकर अपने देश का माथा ऊंचा कर चुके थे। उनके आकर्षण से अनेक विद्वान साधक उनके पास आ पहुंचे थे। रवीन्द्रनाथ का व्यक्तित्व ऐसा था जो इस महादेश की सांस्कृतिक विविधता को आत्मीयता देकर उसका नेतृत्व कर सके। उस समय का भारत गांधी , रवीन्द्रनाथ, दीनबंधु एंड्रयूज, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष, सुब्रहमण्यम भारती, शुब्बुलक्ष्मी, प्रेमचंद, निराला आदि का भारत था। वहां नंदलाल बोस, रामकिंकर, क्षितिमोहन सेन, विधुशेखर भट्टाचार्य, नित्यानंद गोस्वामी, आदामुद्दीन साधना में निरत थे। द्विवेदी जी का व्यक्तित्व वहां अपूर्व गति से निर्मित हुआ होगा - ऐसे सुविशाल, संकीर्णता विरोधी, विविधतापूर्ण, भावी निर्माण के लिए सक्रिय एवं उत्कंठ शांतिनिकेतन को पाकर।

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी को शांतिनिकेतन में आत्मविस्तार का असीम आकाश मिला। उन्होंने ÷ हिन्दी साहित्य की भूमिका' में लिखा है कि यह पुस्तक अहिन्दी भाषी छात्राों को हिन्दी साहित्य का परिचय कराने के लिए तैयार नोट्स पर आधारित है। साफ है कि हिन्दी साहित्य को अखिल भारतीय परिपे्रक्ष्य में देखा गया है। कबीर का अध्ययन करते समय पहली बार कबीर की अनंत तेजस्विता को जुलाहा जाति से जोड़ा गया है और इस प्रकार भक्ति आंदोलन के उद्भव और विकास में प्रसिद्ध इतिहासकारों से दशकों पूर्व वर्णव्यवस्था की भूमिका को रेखांकित किया है। इसका निहितार्थ यह है कि भक्ति आंदोलन को इस्लाम के आक्रमण से उत्पन्न निराशा से न जोड़ कर समूचे भारत की ऐतिहासिक प्रक्रिया से जोड़ा गया है। निस्संदेह इस दृष्टि को अर्जित करने में क्षितिमोहन सेन जैसे संत काव्यमर्मज्ञ की संगति एवं प्रेरणा का हाथ रहा होगा। डा. नामवर सिंह ने ÷ दूसरी परम्परा की खोज' में दिखाया है - ÷ प्रेमा हि पुरुषार्थो महान्‌' ( प्रेम महान पुरुषार्थ है) का सिद्धांत द्विवेदी जी के प्रायः समस्त साहित्य में व्याप्त है। यह रवीन्द्रनाथ, क्षितिमोहन सेन एवं अन्य विद्वानों का समग्र प्रभाव होगा। उस समय शांतिनिकेतन में जो विद्वान ये उनसे द्विवेदी जी का अंतरंग परिचय था। डा रामसिंह तोमर के शब्दों में - ÷÷ आचार्य क्षितिमोहन सेन, म.म.पं. विधुशेखर भट्टाचार्य, पं. नित्यानंद गोस्वामी, श्री नंदलाल बसु, श्री कृष्ण कृपलानी, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डा. प्रबोधचंद बागची तथा इस समय के अनेक शीर्षक विद्वानों और विचारकों से उनका अच्छा अंतरंग परिचय था।'' ( वि.भा.)

कोई मौलाना आदामुद्दीन साहब थे। शांतिनिकेतन के विद्या व्यसनी वातावरण का संकेत श्री उपेन्द्र कुमार दास के इस उल्लेख से मिलता है - ÷÷ इस प्रसंग में याद आता है, पंडित जी ज्योतिष शास्त्राज्ञ हैं ऐसा सुन कर गुरुदेव की इच्छा हुई कि उनसे एक विशुद्ध पंजिका तैयार करवायी जाए किन्तु इस कार्य की ओर से पंडित जी का उत्साह ठंडा पड़ चुका था। इसलिए आज तक यह कार्य पूरा नहीं हो सका। लेकिन उन्होंने भारती संसद में पंजिका के ऊपर पंचांग शीर्षक तीन विस्तृत व्याख्यान दिये।

इस भारती संसद की प्रतिष्ठा के सम्बंध में संसद के प्रथम सम्पादक अध्यापक नगेन्द्रनाथ चक्रवर्ती ने कहा है - ÷÷ एक बार गुरुदेव की इच्छा हुई कि भारतीय शास्त्रा के जो विद्वान अध्यापक हैं वे एक विद्यानुशीलन सभा में अपनी अपनी ज्ञान चर्चा के फलाफल की परस्पर आलोचना करें। इस प्रकार भारती संसद नामक विद्यानुशीलनी सभा की प्रतिष्ठा हुई।''

भारती संसद के प्रथम सम्पादक थे पंडित जी और संस्कृत के अध्यापक नगेन्द्रनाथ चक्रवर्ती। संस्कृत भाषा में भारती संसद का प्रतिवेदन लिखा जाता था। एक बार भारती संसद की सभा में विद्याभवन के तत्कालीन अध्यापक मौलाना आदामुद्दीन साहब ने हदीस के सम्बंध में एक प्रबंध पाठ किया। पंडित जी ने इस सम्बंध में मंदाक्रांता छंद में संस्कृत में एक बड़ी अच्छी कविता लिखी। कविता में मौलाना साहब के व्यक्तित्व का एक जीवंत चित्राण हुआ था जहां तक स्मरण आता है ÷ मौलाना आदामुद्दीन साहब प्रवरः' इस प्रकार कविता का प्रारम्भ था।

भंडारकर ओरियंटल रिसर्च इंसटीट्यूट से जो ÷ महाभारत' प्रकाशित हुआ है, उसका एक पाठांतर प्रस्तुत कलक्शन केन्द्र विश्व भारती था। पाठांतर प्रस्तुतीकरण का कार्य विद्याभवन के पोथीघर में होता था... पंडित जी ने भी इसमें योगदान किया। ... हम जहां तक जानते हैं शोधकार्य के सम्बंध में भी उन्हें गुरुदेव से ही उत्साह और प्रेरणा मिली। गुरुदेव के आग्रह पर ही उन्होंने अपने शोधपरक ग्रंथ कबीर का प्रणयन किया।

नाना प्रकार के विषयों की ओर पंडित जी का आग्रह था। मास्टर मोशाय नंदलाल वसु ने एक बार उन्हें प्राचीन भारत की कला के सम्बंध में कार्य करने के लिए विशेष रूप से उत्साहित किया। पंडित जी ने इस सम्बंध में कुछ कार्य किया एवं कला भवन में ÷ प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद' शीर्षक से व्याख्यान दिये। ÷÷ चायचक्र में ही मास्टर मोशाय ने एक दिन प्राचीन भारत की कला विषय पर कार्य करने को कहा था। यह चायचक्र उन दिनों के शांतिनिकेतन का एक अपूर्व प्रतिष्ठान था। दिन का कार्य समाप्त होने के बाद अनेक अध्यापक और कार्यकर्ता आकर चायचक्र में सम्मिलित होते थे। एक प्याली चाय पीते, किसी दिन इसी के साथ रहता था, किसी सदस्य द्वारा लाया हुआ अल्पाहार। किन्तु नाना प्रकार की कथा कहानी से वे जो आनंद पाते थे, उसकी तुलना नहीं की जा सकती। कितने प्रकार की मजेदार बातें होती - बीच बीच में गम्भीर विषयों पर भी चर्चा होती। पंडित जी चायचक्र में नियमित रूप से जाया करते थे। वे भी मजेदार बातें कहते। बीच बीच में सरस मंतव्यों से सबको आनंद देते। प्रायः प्रतिदिन चायचक्र के बाद हम कई लोग मिल कर घूमने निकलते। बंधु बांधवों में से कई हम लोगों के भ्राम्यमान दल को कौतुक से गोसाई जी आदि का ÷ झुण्ड' कहते, अनिल दा ( अनिल कुमार चंद्र) कहते - ÷ भारती संसद' । गोसाइर्ं जी, पंडित जी, हरिदास दा ( हरिदास मित्रा) ये सब पंडित लोग ही दल के प्रधान आकर्षण थे। स्वास्थ्य रक्षा के लिए भ्रमण होता था। किन्तु इससे देह और मन दोनों के स्वास्थ्य की रक्षा होती थी। चलते चलते कितनी काव्य चर्चा, शास्त्रा कथा, मजेदार गल्प, परिचर्या, यहां तक कि राजनीति चर्चा भी हुआ करती थी। राजनीति की चर्चा चलने पर पंडित जी ही प्रायः मुख्य वक्ता का स्थान ले लेते थे। इसलिए हम बंधु बांधव कौतुकपूर्वक उन्हें ÷ पालिटिकल पंडित' ( उपेन्द्र कुमार दास) कहते थे।''

राजनीति पर चर्चा और राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण द्विवेदी जी का स्वभाव था और वह आजीवन बना रहा। वे राजनीतिक घटनाओं में गहराई से डूब कर चिन्तन करते थे। इतना कि उसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता था। बांगलादेश के युद्ध के समय घटित होने वाली स्थितियों पर उनका लेख साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपा था - जिसमें उन्होंने अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों के दबाव में अपने स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा की है। बांगलादेश बनने के बहुत पहले से कहते आये थे कि अंततोगत्वा पूर्वी बंगाल पाकिस्तान से अलग हो जाएगा। वे यह भी सोचते थे कि पूर्वी और पश्चिमी बंगाल मिल कर कभी एक भी हो सकते हैं।

युवक द्विवेदी के प्रतिभा रूपी बीज को शांतिनिकेतन में फलने फूलने , विकसित होने का असीम आकाश और अनुकूल वातावरण मिला। लोहे को पारस नहीं, स्वर्ण को चमकाने वाला सत्संग मिला। ऐसा वातावरण जिसमें सृजन की प्रेरणा और विस्तार था। सत्संग और वातावरण की इतनी महिमा गाने का मतलब युवक पंडित द्विवेदी की अपनी व्यक्ति प्रतिभा को कम आंकना नहीं। शांतिनिकेतन में अनेक हिन्दी भाषी विद्वान काम करते थे किन्तु उनमें से कोई आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नहीं बना। शांतिनिकेतन में उन्होंने सूरदास, हिन्दी साहित्य की भूमिका, कबीर, प्राचीन भारत के कला विनोद, बाणभट्ट की आत्मकथा, अशोक के फूल, शिरीष, विद्यापति की राधा, ठाकुर जी की बटोर, मेरी जन्मभूमि जैसी कालजयी रचनाएं कीं। महाभारत का गम्भीर अध्ययन किया, वेद मंत्राों का शुद्ध पाठ करने तो वे वहां गये ही थे। ज्योतिष थोड़ी दूर तक साथ रहा फिर छूट गया। यदा कदा, बीच बीच में झलक मार देता था। पंडित जी ने बाद में रवीन्द्रनाथ की कुंडली पर लेख भी लिखा। वे कहते थे मैं गणित ज्योतिष पर विश्वास करता हूं फलित ज्योतिष पर नहीं। कभी कभी हाथ भी देखते थे। लेकिन वह कौतुक ज्यादा होता था। महाभारत के पात्रा भीष्म से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण निबंध लिखा - ÷ भीष्म को क्षमा नहीं किया गया' । उन्होंने पुरातन प्रबंध संग्रह का हिन्दी अनुवाद शांतिनिकेतन में ही किया। अपभ्रंश में रुचि शांतिनिकेतन में ही जग गयी थी। काशी में पृथ्वीराज रासो, संदेश रासक पर काम किया, विद्यापति और अपभ्रंश पुस्तकों पर काम कराया। हिन्दी साहित्य का आदिकाल पर पांच व्याख्यान दिये। आदिकाल पर ऐसे उद्घाटक व्याख्यान देना पंडित जी का ही काम था। ये व्याख्यान आदिकाल पर शोध करने का रास्ता तो खोलते ही हैं, अपभ्रंश काव्य की सरसता का आत्मीय परिचय भी देते हैं। पंडित जी अपभ्रंश का शब्दकोश भी तैयार करना चाहते थे। कहने का आशय यह कि शांतिनिकेतन के सत्संग अध्ययन से पं. जी की प्रतिभा को जो आकाश अवकाश मिला वह जीवन भर काम आया।

ज्योतिष के अध्ययन का प्रसंग काफी मनोरंजक है। पंडित जी ने स्वयं इसका वर्णन किया है - ÷÷ मैं काशी में ज्योतिष पढ़ता था। स्व. पंडित रामयत्न ओझा मेरे गुरु थे। बड़े उदार और बड़े मस्तमौला। मुझे बहुत प्यार करते थे। हालांकि कई बातों में मैं उनसे मतभेद रखता था। शांतिनिकेतन आने के बाद मैंने व्योमकेश शास्त्राी इस प्रच्छन्न नाम से एक लेख सनातन धर्म में लिखा। सनातन धर्म मालवीय जी का पत्रा था और हिन्दू विश्वविद्यालय से निकलता था। आपने मुझे प्रच्छन्न नाम से लिखने को मना किया था। मैं लज्जापूर्वक स्वीकार करता हूं कि कई बार मैंने प्रच्छन्न नाम से लेख लिखा है। ..... व्योमकेश शास्त्राी का सनातन धर्म वाला लेख सचमुच संकोच और भय के कारण ही गुप्त रखा गया था। उसमें गुरु जी के ज्योतिषिक मत की आलोचना थी। उन्हीं दिनों इंदौर में ज्योतिष सम्मेलन होने जा रहा था। मालवीय जी महाराज सभापति थे। उद्योक्ताओं को मेरा लेख पसंद आया और व्योमकेश शस्त्राी उस सम्मेलन की निर्णायक समिति में बंगाल के प्रतिनिधि के रूप में चुने गये। उनके पास चिट्ठी गयी, तार गया, रजिस्ट्री से सब सामग्री भेजी गयी और मैं सब पाता गया। शांति निकेतन में जिस हिन्दी पते वाली चिट्ठी का कोई ठिकाना नहीं लगता, वह मेरे पास आना ही है। व्योमकेश शास्त्राी की चिट्ठी भी मेरे पास आयी और मैंने ले ली। मैंने सम्मेलन वालों को भ्रम में नहीं रखा। उन्हें साफ अपना नाम बता दिया। फिर भी उन्होंने मुझे निर्णायक समिति में रहने पर जोर दिया। लेकिन मैं वहां जाने की हिम्मत नहीं कर सका क्योंकि गुरु जी उस निर्णायक समिति के सामने अपने पक्ष की स्थापना करने वाले थे। यदि मैं जाता तो मुझे उनके मत का सर्वांश में तो नहीं पर कई बातों में समर्थन करना कठिन जान पड़ता। निर्णायक के आसन पर बैठ कर मैं किसी भी व्यक्ति के प्रति संकोच और पक्षपात को पाप समझता हूं सो मैं नहीं गया। .... यह सारी कहानी गुरु जी को बाद में मालूम हुई। वे बहुत प्रसन्न हुए और मुझे डांटते हुए कहा कि मैं तो उस दिन अपनी विद्या सफल मान लेता जिस दिन तू मेरे मत की परीक्षा के लिए निर्णायक की गद्दी पर बैठता। सर्वत्राजयमिच्छते पुत्राात्‌ शिष्यात्‌ पराजय।

÷ बाणभट्ट की आत्मकथा' की प्रेरणा रहस्य है। कुछ सूत्रा हैं लेकिन अफवाहों के रूप में। बाणभट्ट का पंडित जी ने गम्भीर अध्ययन किया था। सुनाते थे - ÷÷ जब शांतिनिकेतन जाने लगा तो गुरु जी के पास गया। किस गुरु के पास गये उन्होंने बताया था - मुझे याद नहीं - शायद पं. वामदेव जी के पास। वामदेव जी द्विवेदी जी और राजबली पांडे जी दोनों के गुरु थे। सुना जाता है कि वामदेव प्रचंड शास्त्राार्थी थे। नौकरी में उमर कम करने के लिए कुंडली बनवायी लेकिन कुंडली बदलवाने के बाद जल्दी ही उनका चोला भी बदल गया। सो द्विवेदी जी ने वामदेव जी से कहा - गुरु जी यहां था तो आपकी छाया थी अब दूर परदेश में किसकी छाया रहेगी? चित्त व्याकुल है। गुरु जी ने सहारा दिया - ए बचवा वाणभट्ट कै जवन कादम्बरी है न तउन सौ बार एहर से औ सौ बार वहर से चिखुर जा।'' खेत में खर पतवार, दूब को पहले खोद कर उखाड़ा जाता है, फिर उसकी मिट्टी झाड़ कर खेत में ही रहने दी जाती है, और व्यर्थ या हानिकर पौधों को खेत से बाहर फेंक दिया जाता है। निराई करते समय चिखुरा भी जाता है। मतलब कि कादम्बरी पढ़ डालो और उसके सार असार को समझ लो। सो पंडित जी ने बाणभट्ट को चिखुरा होगा।

मैंने सुना है , पंडित जी के ही यहां कि बांगला में किसी ने ÷ अशोक की आत्मकथा' लिखी है। लेकिन मुझे इसकी क्षीण स्मृति है। न लेखक के बारे में जानकारी है न रचना के बारे में। हो सकता है कि सुनने में ही कुछ गलती रह गयी हो। इस विषय में मैंने बांगला साहित्य के जानकारों से कोई बातचीत भी नहीं की है।

बाणभट्ट की भट्टिनी के बारे में लोग तरह तरह की बातें करते हैं। नामवर जी ने भी कोई विशेष जानकारी नहीं दी। उनका अनुमान है कि शांतिनिकेतन की कोई विदेशी छात्राा या महिला है , जिसके आधार पर द्विवेदी जी ने भट्टिनी का रूप एवं चरित्रा गढ़ा है। मुझे इस अनुमान पर यकीन नहीं होता। रूप और शील में भारतीय है। रूप का आधार मान भी लें तो यह तय है कि रचनाकार ने उस रूप पर भारतीय नारी का शील संयुक्त किया है। तुवर मिलिन्द ऐतिहासिक व्यक्ति हैं किन्तु एक तो उनका संकेत मात्रा है, चित्राण नहीं, दूसरे ऐतिहासिक तथ्यों की दृष्टि से कालगत साम्य ढ़ूंढ पाना मुश्किल है। अस्तु इन सब पर अन्यत्रा चर्चा होनी चाहिए। पंडित जी शिल्प के मामले में पूरी कारीगरी से काम लेते हैं। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बाणभट्ट की आत्मकथा ७वीं शताब्दी के संस्कृत गद्यकार कवि का प्रबंध काव्य है। बीच बीच में भले ही याद आता रहे कि यह आत्मकथा बाणभट्ट ने नहीं लिखी है। २०वीं सदी के हिन्दी लेखक की है।

÷ चारु चंद्रलेख' अधिकांशतः काशी में लिखा गया है। ÷ अनामदास का पोथा' का प्रारम्भिक अंश ÷ सब हवा है' शांतिनिकेतन में ही लिखा गया था। चारुचंद्र लेख की कथा का आधार पुरातन प्रबंध संग्रह में संकलित कुछ प्रबंध हैं।

यह सब देखने पर श्री उपेन्द्र कुमार दास से पूरी तरह न सही तो लगभग सहमत होना पड़ेगा कि रवीन्द्रनाथ के प्रभाव एवं शांतिनिकेतन के अनुकूल परिवेश में उनकी साहित्यिक सत्ता का पूर्ण विकास हुआ। जो साहित्य स्रष्टा है , वह भी साहित्यिक है और जो समालोचक है, वह भी साहित्यिक है। पंडित जी इन दोनों अर्थों में साहित्यिक थे।

हम लोग कहेंगे कि साहित्यिक हजारी प्रसाद जी शांतिनिकेतन की ही सृष्टि हैं। उनके जीवन के श्रेष्ठ बीस वर्ष शांतिनिकेतन में ही कटे हैं। उनकी सभी उत्कृष्ट रचनाएं इसी समय की हैं। उन्हें कई बार यह कहते सुना है - ÷÷ महाशय, सचमुच लिखने पढ़ने का जो काम किया वह तो शांतिनिकेतन में ही किया।'' ( वि.भा.)

उद्धरण में ÷ सभी उत्कृष्ट रचनाएं' वाली बात मानना मुश्किल है। काशी में पंडित जी ने मेघदूत एक पुरानी कहानी लिखी, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, और संदेश रासक का पाठ शोध, व्याख्या की। चारुचंद्र लेख का अधिकांश लिखा। चंडीगढ़ में पुनर्नवा, कालिदास की लालित्य योजना, सहज सम्प्रदाय लिखा, देवदारू और कुटज निबंध लिखे फिर काशी लौट कर अनामदास का पोथा लिखा। भट्टिनी के शब्दों में बाणभट्ट आर्यावर्त के द्वितीय कालिदास थे और हिन्दी के बाणभट्ट की प्राणमयी रसधारा आजीवन अजस्र रही। मानो अपने बहु प्रयुक्त शब्दबंधों को सार्थक कर रही हो। दलित द्राक्षा के समान निश्शेष रस प्रदान कर रही है। अस्तु!

पंडित जी गये थे वेदमंत्राों का शुद्ध पाठ करने और कराने या ज्योतिष के सिलसिले में किन्तु अंततोगत्वा आसन जमा हिन्दी अध्यापक के रूप में। अध्यापन किया , किताबें लिखीं, पत्रिाका का सम्पादन किया, हिन्दी भवन बनवाया उसके निदेशक अध्यापक रहे। शांतिनिकेतन का हिन्दी भवन हिन्दी साहित्य का एक सर्जना शोधपीठ बन गया, जहां बनारसीदास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन, जैनेन्द्र, यशपाल, चंद्रगुप्त विद्यालंकार आदि जाकर टिकते थे। अज्ञेय, बलराज साहनी, रामसिंह तोमर, रामपूजन तिवारी, मोहनलाल बाजपेयी जैसे लोग किसी न किसी रूप में हिन्दी भवन से जुड़े। रांगेय राघव, धर्मवीर भारती ने वहां शोध किया। शिवानी जैसी प्रसिद्ध लेखिका ने वहां हिन्दी पढ़ी।

बंगाल में तमिलनाडु जैसा हिन्दी विरोध नहीं लेकिन बंगाल का जातीय स्वाभिमान किसी और को नहीं सेंटता। मध्यकालीन साहित्य भाषा युग में हिन्दी कवियों कबीर , तुलसी, सूर, मीरा का बांगला साहित्य और भाषा पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। जायसी का अनुवाद बंगाल में एक शताब्दी बाद ही हो गया था। यह सच है कि आधुनिक युग में बांगला साहित्य का प्रभाव हिन्दी पर ज्यादा पड़ा है, हिन्दी का बांगला पर बिल्कुल नहीं या नगण्य। आज यह देख कर आश्चर्य ही होता है कि द्विवेदी जी ने बंगाल में हिन्दी का एक नया केन्द्र खोला जिसे इतना नाम और सम्मान मिला। नया केन्द्र इसलिए कि कलकत्ता में हिन्दी भाषा और साहित्य का केन्द्र पहले से ही मौजूद था। हिन्दी का पहला समाचार पत्रा उदंत मार्तण्ड वहीं से निकला था। निराला, उग्र और मतवाला वहीं से यशस्वी बने। द्विवेदी जी निराला, उग्र की अपेक्षा बंगाली समाज में अधिक ग्राह्य थे। बंगाली समाज के अतिरिक्त वे कलकत्ते के धनिक मारवाड़ी समाज में भी अधिक ग्राह्‌य ही नहीं, बल्कि प्रिय थे। उन दिनों निराला के घोर निन्दक और विशाल भारत के सम्पादक पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी का शांतिनिकेतन और कलकत्ता के कई हिन्दी प्रेमी मारवाड़ी सेठों से अच्छा परिचय था। शांतिनिकेतन में भी उनका आना जाना था। रवीन्द्रनाथ के पुत्रा रथी बाबू से भी उनका अच्छा परिचय था। लेकिन मुख्य बात थी बंगाली विद्वानों साहित्यकारों का हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति भाव। द्विवेदी जी ने इस विषय में अपने पत्राों में कहीं कहीं कुछ बातें कहीं हैं - द्विवेदी जी को बंगाल में लम्बे अरसे तक रहने का अवसर मिला। उन्हें कभी कभी लोग बंगाली ही समझ लेते थे। वे खाटी बंगाली तो नहीं बन पाये थे ( बनने वाले थे) लेकिन कम हिन्दी लेखक होंगे जो उनसे अधिक बंगाली लगें या बंग जाति के लोगों को आत्मीय लगें। ऐसे द्विवेदी जी का विचार था ( ०३.०४.१९३८ को लिखे गये पत्रा के अनुसार) कि ऐसे बंगाली सज्जन तो हैं जो स्वीकार करते हैं कि बंगाल में हिन्दी का प्रचार होना चाहिए किन्तु वे हिन्दी साहित्य जानना पढ़ना चाहते हैं, हिन्दी भाषा के प्रति उनके मन में कोई विशेष भाव नहीं है। बंगाली विद्वान हिन्दी के प्रति अपना अनुराग ÷ किन्तु' लगा कर ही व्यक्त करते हैं। द्विवेदी जी के शब्दों में - ÷÷ सही बात यह है कि हिन्दी साहित्य के प्रति उनका अनुराग बढ़ नहीं पाता।'' उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ एक वृद्ध हिन्दी लेखक की मुलाकात का जिक्र किया है। हिन्दी लेखक ने आधुनिक हिन्दी कवियों ( १९३८ के) की कविताओं का एक संकलन रवि बाबू को दिया। संकलन उन हिन्दी लेखक का ही था। रवीन्द्रनाथ को उस कविता संकलन को पढ़ कर निराशा हुई। पंडित जी ने रवि बाबू से कहा कि यह काव्य संकलन प्रतिनिधित्व नहीं करता समकालीन हिन्दी कवियों का।

उसी पत्रा में द्विवेदी जी ने १९३८ अप्रैल के अंक में एक लेखक के कथ्य का उल्लेख किया है जिसमें हिन्दी के प्रति बंगाली मनोवृत्ति के एक रूप का पता चलता है। ÷ देश' के उस लेख में बताया गया था कि हिन्दी भाषियों की वास्तविक संख्या कुल 1 करोड़ साठ लाख है जबकि बंगला भाषियों की १० करोड़। लेख में बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, असम को बंगला भाषी क्षेत्रा माना गया है। द्विवेदी जी के शब्दों में - ÷÷ देश की टिप्पणी गाली है।'' ( पृ. ३०)

लेकिन यह बंगाली मनोवृत्ति का केवल एक रूप है। रवीन्द्रनाथ , क्षितिमोहन सेन आदि भारत की भाषाओं के महान्‌ प्रेमी थे। द्विवेदी जी का एक लेख है - रवीन्द्र की हिन्दी सेवा। वस्तुतः हिन्दी भवन की स्थापना शांतिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ के आशीर्वाद से ही सम्भव हुई। द्विवेदी जी हिन्दी साहित्य और हिन्दी साहित्यकारों से रवीन्द्रनाथ का परिचय कराते थे। प्रेमचंद के निधन पर रवीन्द्रनाथ ने बड़े दुःख के साथ कहा था - ÷÷ तुम्हें एक आदमी मिला था जो सचमुच तुम्हारी भाषा की शक्ति को पहचानता था, पर दुःख है, विधाता ने उसे छीन लिया। तुम्हारी भाषा में बड़ी शक्ति है और बड़ी सम्भावनाएं हैं।'' ( ८/४२१)

रवीन्द्रनाथ भारतीय भाषाओं के पक्षधर थे क्योंकि वे उनकी शक्ति पहचानते थे। किसी एक भाषा के ही नहीं वे भाषा मात्रा के समर्थक और पक्षधर थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपाधि वितरणोत्सव पर मातृभाषा ( ओं) की ओर से कहा था - ÷÷ मैं अपनी प्यासी मातृभाषा की तरफ से अपने ही देश के विश्वविद्यालय के द्वार पर खड़ा, चातक की तरह उत्कंठित वेदना के साथ प्रार्थना करता हूं। तुम्हारे अभ्रभेदी शिखर को घेरे हुए जो पुंज के पुंज श्यामल मेघ घूम रहे हैं, उनका प्रसाद आज फलों और शस्यों पर बरसने दो; पुष्पों और पल्लवों से पृथ्वी सुंदर हो उठे, मातृभाषा का अपमान दूर हो, युग शिक्षा की उमड़ती धारा हमारे चिन्तन की सुखी नदी के रेतीले मार्ग से बाढ़ की तरह बह निकले, दोनों तल पूर्ण चेतना से जाग उठें, घाट घाट पर आनंद ध्वनि मुखरित हो उठे।'' ( ८/४२०)

रवीन्द्रनाथ ने उन्हें हिन्दी पर काम करने के लिए कुछ योजनाएं भी दी थीं। जैसे बोलियों के उन शब्दों को एकत्रा करना जो खड़ी बोली में नहीं बोले जाते , प्रयुक्त होने पर साधु भाषा को समृद्ध कर सकते हैं, और अहिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी सीखने के लिए प्रारम्भिक पोथी।

रवीन्द्रनाथ के बाद शांतिनिकेतन में दूसरे बंगाली विद्वान्‌ क्षितिमोहन सेन थे , जिनकी प्रेरणा और संगति का द्विवेदी जी पर और हिन्दी साहित्य पर शुभ प्रभाव पड़ा। वे हिन्दी के मौन सेवक थे। हिन्दी सेवा के कार्य के पक्षों को गहराई से समझते थे। द्विवेदी जी ने एक पत्रा में इस विषय में जो ब्योरा दिया है वह प्रेरणाप्रद होने के साथ ही शिक्षाप्रद है और हमें सचेत भी करता है।

द्विवेदी जी का विचार था कि मुख्य बात संस्कृति के साहित्य के प्रचार की है। संस्कृति के साहित्य से पंडित जी का आशय उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों वाले साहित्य से होगा।

भाषा प्रचार का काम साहित्य के लोकप्रिय होने से ही सम्भव है , द्विवेदी जी के शब्दों में - ÷÷ यह काम चुपचाप बहुत दिनों से श्री क्षितिमोहन बाबू कर रहे हैं।'' ( पृ. ३०, पत्रा) हिन्दी साहित्य सम्मेलन ( वर्धा) ने उनसे सम्मेलन का सदस्य बनने का अनुरोध किया। द्विवेदी जी के अनुसार - ÷÷ क्षिति बाबू ने सदस्यता नहीं ली। क्षिति बाबू का कहना था कि सदस्यता लेने से सब काम चौपट हो जाएगा। लोग समझेंगे कि यह हिन्दी प्रचारक है। यानी ( द्विवेदी जी के मत से ) बंगाल में हिन्दी प्रचार का कार्य स्वार्थमूलक समझा जाता है। हिन्दी प्रचार को अच्छी नजर से नहीं देख जाता।'' द्विवेदी जी का मानना है ÷÷ जब तक प्रचार शब्द का प्रचलन नहीं था बंगाल ने हिन्दी की बहुत सेवा की है। अब प्रचार का फल यह हुआ कि देश पत्रिाका में लिखा गया है कि बंगालियों को हिन्दी नहीं बोलना चाहिए।'' ( ३०-३१, पत्रा)

बंगाल में , विशेषतः कलकत्ता में हिन्दी भाषी लोगों की बहुत बड़ी संख्या बसती थी। निम्नवर्गीय किसान, दलित, किशोर कलकत्ता मजदूरी करने या, पैसा कमाने पहुंचते। वहीं बस जाते, कबीर और तुलसी गाते और साल दो साल में गांव आते। नौकरी के पैसे की तड़क भड़क दिखाते, पैसा खत्म होने पर फिर कलकत्ता जाकर मजदूरी या मामूली नौकरी करने लगते। पुरबिये नौजवान बहुत बड़ी संख्या में सेना में थे। कहते हैं कि बंगाल आर्मी में सबसे अधिक संख्या में पुरबिया सैनिक थे। इसका प्रभाव कलकत्ता की बाजार भाषा पर था। सुनीति कुमार चटर्जी ने कलकतिया हिन्दी की चर्चा की है। कलकत्ता हिन्दी फिल्म निर्माणकारी केन्द्र था। न्यू थियेटर्स मशहूर फिल्म कम्पनी थी। कानन बाला, पहाड़ी सान्याल, देविका रानी, हिमांशु राय, के.सी.डे., पंकज मलिक हिन्दी क्षेत्रा में घर घर मशहूर थे। दुनिया रंग रंगीली बाबा, पिया मिलन को जाना जैसे गीत हिन्दीभाषी लोगों की जबान पर थे। बंगाल में जमीनी तौर पर हिन्दी की उपस्थिति थी। सांस्कृतिक शैक्षणिक जगत्‌ के उच्च भू्र लोगों के बीच नहीें थी। निस्संदेह बंगाली भद्रलोक के बीच हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रचार प्रसार को लेकर एक खास तरह की विरक्ति या हल्का विरोध था। और इस वातावरण में रवीन्द्रनाथ, क्षितिमोहन, एंड्रयूज का प्रोत्साहन वरदान का काम करता था।

भाषा और साहित्य के विषय में द्विवेदी जी का मत स्पष्ट था। उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष कर्मठ हिन्दी प्रचारक का भी है , यह हमें नहीं भूलना चाहिए। उनके मोहक, विचारोत्तेजक भाषण हिन्दी सीखने वालों, प्रचारकों, साहित्य प्रेमियों को प्रेरणा देते थे। वे उन्हें हिन्दी साहित्य का अनुरागी बनाते थे। हिन्दी प्रचारक के रूप में द्विवेदी जी के व्यक्तित्व की सबसे अचूक प्रभावी विशेषता यह थी कि हिन्दी की बात अकेले नहीं करते थे, यानी उसे अन्य भारतीय भाषाओं से काट कर नहीं करते थे। वे अन्य भारतीय भाषाओं की स्थिति और उनके भावी रूप की बात करते हुए हिन्दी का पक्ष प्रस्तुत करते थे। हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य दोनों के बारे में - यही कारण है कि वे हिन्दीतर भाषाओं के समर्थकों और बुद्धिजीवियों और रचनाकारों के बीच लोकप्रिय एवं स्वीकार्य थे। वे भाषा प्रचार के प्रबल समर्थक नहीं थे। उनका विचार था कि हिन्दी का प्रचार, उत्कर्ष हिन्दी साहित्य की रचनाओं से होगा। राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्कभाषा के विवाद में उनकी रुचि बहुत कम थी। या कहें कि इस विवाद को वे हिन्दी के प्रचार और विकास में सहायक या महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। एक पत्रा में वे इस विषय में अज्ञेय के मत का समर्थन करते हुए लिखते हैं - ÷÷ हिन्दी एक प्रादेशिक भाषा है। इसका रूप, इसकी प्रगति अभी लोगों को निर्माण करना चाहिए। राष्ट्रभाषा का नाम देकर इसमें अन्य प्रदेश वालों का अनुचित हस्तक्षेप कभी कभी असह्य हो उठता है। अगर यह राष्ट्रभाषा है तो दूसरों के लिए है। हमारे लिए तो यह मातृभाषा है और हमारा और इसका जीवन मरण का सम्बंध है। औरों के लिए यह सवाल प्रयोजन और सुविधा का है। यह हमारे हास, अश्रु, और मनोस्थितियों की भाषा है। राष्ट्रभाषा मानने या न मानने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है।'' ( पृ. १९)

सरल होने से सुविधा होगी यह भी वे नहीं मानते। मुख्य बात साहित्य की समृद्धि की है।

आगे अपने इस मत को अधिक दृढ़ता और स्पष्टता से कहते हैं - ÷÷ मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिन्दी का प्रचार अच्छे साहित्य के निर्माण से ही हो सकता है। अगर आप इस प्रदेश ( बंगाल प्रदेश) में अपने साहित्य और मातृभाषा की मर्यादा रखना चाहते हैं तो अपना साहित्य समृद्ध कीजिए और उसके उत्तम अंगों का परिचय कराइए। और कोई भी रास्त सुगम नहीं जान पड़ता..... अपने अन्य भाषा भाषी मित्राों से हमें साफ कह देना चाहिए कि हिन्दी प्रचार का काम हमारे स्वार्थ का नहीं है। इसमें आज आपको कोई फायदा मालूम होता हो सीखिये नहीं तो अपने अपने रास्ते जाइये।'' ( पृ. ३१)

पंडित जी के पत्राों , लेखों, भाषणों से यही बात पुष्ट होती है कि वे उत्तम साहित्य रचना को भाषा प्रचार का श्रेष्ठ उपाय मानते थे।

द्विवेदी जी बंगाल स्थित शांतिनिकेतन में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रवक्ता के रूप में कम सक्रिय किन्तु प्रायः मौन कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय थे। सन्‌ १९३८ में चतुर्वेदी जी को लिखते हैं - ÷÷ इस समय शांतिनिकेतन में ७७ विद्यार्थी हिन्दी शिक्षण पर हैं। ३० सदस्य हिन्दी समाज में हैं। ६ बंगाली अध्यापक हिन्दी में अपने विचार प्रकट करने की चेष्टा करते हैं। यह सब कुछ करते समय मैंने सदा अपनी नीति चुप रहने की ही रखी है। प्रचार प्रसार कहते रहने से काम खराब होता है।'' ( पृ. ३१)

गुरुदेव और हिन्दी साहित्य से सम्बंधित एक मनोरंजक किन्तु हतोत्साह करने वाली घटना का उल्लेख करते हैं - ÷÷ गुरुदेव ने एक सप्ताह पहले हम लोगों को बुला कर हिन्दी साहित्य के बारे में बातचीत की। उस दिन हम भी पूरे मूड में थे और गुरुदेव भी। वे बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने कहा कि तुम्हारी भाषा बड़ी शक्तिशालिनी है, तुम्हें अभी आदमी नहीं मिला है, नहीं तो यह भाषा निःसंदेह भारतवर्ष की सर्वाधिक सम्पन्न भाषा होती। मैंने प्रेमचंद की याद दिलायी, उन्होंने अफसोस के साथ कहा कि यह दुख की बात है कि प्रेमचंद इसी उमर में चल बसे। उनसे तुम्हें बहुत आशा थी। इसके बाद ही आपकी ( पं. बनारसीदास चतुर्वेदी) दिशा में रहने वाले एक वृद्ध साहित्यिक ने अपनी संग्रह की हुई हिन्दी की वर्तमान कविताओं का सर्वश्रेष्ठ संग्रह भेज दिया। गुरुदेव ने उसे उलट पुलट कर देखा और अत्यंत निराश भाव से दूसरे दिन कहा - बापू याई चली (?) न केन, तोमादेर एखनो साहित्यिक सेन्स हय निं।''

चिट्ठी के अनुसार द्विवेदी जी ने गुरुदेव से कहा कि यह काव्य संकलन समसामयिक हिन्दी कविता का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो गुरुदेव ने कहा - ÷÷ तो तुम क्यों नहीं एक अच्छा संग्रह करते। ऐसे ही संग्रहों के बल पर तुम हिन्दी साहित्य के प्रति दूसरों का प्रेम आकृष्ट करोगे।'' ( पृ. २९-३०)

शांतिनिकेतन में हिन्दी समाज की स्थापना हुई। हिन्दी के कालजयी साहित्यकारों का स्मृति दिवस मनाया जाता था। विशेषतः मध्यकालीन भक्त कवियों का। प्रेमचंद का समादर था। रवीन्द्रनाथ के मन में मध्कालीन संत कवियों के प्रति गहरा सम्मान था। वे प्रेमचंद साहित्य के प्रशंसक थे। द्विवेदी जी को कबीर पर काम करने की प्रेरणा रवि ठाकुर से मिली थी। इन सबका द्विवेदी जी के चिन्तन पर प्रभाव पड़ रहा था। अन्य भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य के प्रति उनमें जो अपनेपन का , अविरोध नहीं, सहयोग का भाव मिलता है उसमें शांतिनिकेतन के उदार वातावरण का बहुत बड़ा हाथ है। द्विवेदी जी कट्टर हिन्दी वाले कभी नहीं बन पाये। उन्होंने अकेले हिन्दी की उन्नति की बात कभी नहीं की। अन्य भारतीय भाषाएं उनके दिमाग में हमेशा हिन्दी के साथ आती थीं। वे हिन्दी को भारत की सारी भाषाओं और उनके साहित्य का सेतु बनाना चाहते थे। बाद में, वे हम लोगों से भी कहते थे - साहित्य साहित्य होता है। हिन्दी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, बंगला साहित्य नहीं होता। वे शुरू में ही हिन्दी में सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य का परिचयात्मक इतिहास प्रस्तुत करना चाहते थे।

शांतिनिकेतन में रहते हुए लिखे गये विशेषतः पं. बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे गये पत्राों से पता चलता है कि उनके मन में हिन्दी के लिए काम करने की रूपरेखा क्या थी।

द्विवेदी जी की देशाटन में रुचि थी। प्रारम्भ में वे भाषण देने में संकोच करते थे बाद में तो हिन्दी के धुरंधर वक्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए। लेकिन नयी जगहों पर जाना , वहां भाषण देना और हिन्दी प्रेमी नवयुवकों से बातचीत करके अपने विचारों को सुस्थिर करने की प्रवृत्ति उनमें प्रारम्भ से रही थी। ३९ में लिखा है - ÷÷ बारह वर्ष से कलम चला रहा हूं। जहां जहां जाने का अवसर मिला है वहां नयी पीढ़ी के विद्यार्थियों ने मेरे लेखों के सम्बंध में प्रश्न किये हैं। नयी पीढ़ी का विद्यार्थी सावधानी से हमारी बातों पर गौर कर रहा है। वह जिज्ञासु है, संकीर्ण नहीं। वह हिन्दी साहित्य को सारे संसार के साहित्य के संदर्भ में देखना समझना चाहता है। उसकी निगाह में हिन्दी की प्रतिद्वंद्विता बंगाली या उर्दू से नहीं, अंग्रेजी या रूसी साहित्य से है। वह अपने साहित्य को सवार्ंग, सम्पूर्ण और समृद्ध देखना चाहता है।''

द्विवेदी जी इस विचार का समर्थन करते रहे कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन को दक्षिणी भाषाओं तथा बांगला आदि के विशेष अध्ययन की व्यवस्था करनी चाहिए। उनका विचार है कि यदि हिन्दी के जरिए हम कम से कम सारे भारतीयों की आशा आकांक्षा व्यक्त नहीं कर सकते तो राष्ट्रभाषा का शोरगुल व्यर्थ का परिश्रम है।

भारतीय भाषाओं के साथ प्राचीन भाषाओं और उनके साहित्य का भी महत्व है - ÷÷ मेरा एक लेख बहुत दिन का लिखा हुआ पड़ा है। बौद्ध और जैन साहित्य में क्या है। यह विषय है। आपने संस्कृत साहित्य वाला लेख पसंद किया था। यह भी उसी तरह का है।''

१७.०९.१९३९ को लिखे एक पत्रा में वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन और अन्य हिन्दी संस्थाओं से क्या अपेक्षा रखते हैं , इस विषय पर जम कर अपने मन की बातें कहते हैं। ( ४०-४२) पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने उनसे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वास्ते वर्ष भर के प्रोग्राम की बात पूछी। द्विवेदी जी ने हि.सा.स. के कार्यक्रम पर अपने विचार जम कर लिख भेजे। यहां भी उनका बल इस बात पर रहा कि सम्मेलन का प्रधान कार्य साहित्य निर्माण और साहित्य प्रचार का रहना चाहिए। उन्होंने सम्मेलन द्वारा संचालित परीक्षा कार्यक्रमों की प्रशंसा की - ÷÷ किन्तु उन्हें सरकारी मान्यता की ज्यादा परवाह नहीं करनी चाहिए। परीक्षाओं में भारी कमी यह रह गयी है कि आलोचना के नाम पर इन परीक्षाओं में रीतिकालीन ग्रंथ और लक्षण ग्रंथों का इतनी अधिक मात्राा में अभ्यास कराया जाता है कि उस चक्रव्यूह से निकला हुआ महारथी साहित्यिक कन्वेंशन के ऊपर उठने में प्रायः असमर्थ हो जाता है। हमारे साहित्य की आलोचना भी इसीलिए समग्र जगत की उन समस्याओं को दृष्टि में रख कर नहीं होती जो नित्य हमें जूझने को ललकार रही हैं।''

द्विवदी जी कहते हैं - ÷÷ मैं चाहता हूं कि ÷ साहित्य की आलोचना' शब्द का कविता या कहानी की आलोचना के रूप में ही व्यवहार न किया जाय, उसका समूचे जीवन की आलोचना के अर्थ में व्यवहार किया जाय।'' ÷ साहित्यिक आलोचना' समूचे जीवन की आलोचना के अर्थ में व्यवहृत हो - बहुत दिनों बाद मुक्तिबोध ने इसी को ÷ सभ्यता समीक्षा' कहा।

द्विवेदी जी साहित्य के अध्ययन में सामाजिक जीवन को व्यापकतर एवं आधुनिक अनुशासनों के संदर्भों से जोड़ने का प्रस्ताव रखते हैं - ÷÷ मेरा मतलब है हिन्दुस्तान के भिन्न भिन्न भागों की भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक भाषाशास्त्राीय, नृतत्त्व विषयक धार्मिक परिस्थितियों के वैज्ञानिक अध्ययन से। यह कैसा अंधेर है कि अपने देश के विषय में भी हमें अंग्रेजों की लिखी पुस्तकें पढ़ कर ज्ञान प्राप्त करना पड़े।'' पत्रा में एक घटना का उल्लेख करते हैं - ÷÷ डा. कोलिन्स से एक बार मैं पूछने गया था कि क्या कार्य करूं। बूढ़े ने मेरी और अवज्ञा भाव से देख कर कहा - तुम? तुम्हारे देश में क्या काम हुआ है? सब तो करने को बाकी पड़ा है। जिस जिले से आये हो वहां के आदिवासियों के बारे में लिख सकते हो? वहां की बोली के विषय में लिख सकते हो? अपनी जाति का इतिहास। अपने आस पास बिल्कुल नजदीक के रहने वाली किसी जाति के आचार विचार, नृत्य गीत, पूजा पार्वण, गहने, कपड़े - जिस किसी विषय को क्यों नहीं उठा लेते?'' गुरुदेव ने चंदोला जी से स्त्रिायों के विवाह आदि सम्बंधी आचार के विषय में लिखने को कहा था। काका कालेलकर ने कहा - अपने जिले के खेत खलिहान के शब्दों को इकट्ठा करो। द्विवेदी जी ने पत्रा में बताया कि - गुरुदेव ने कहा - ÷÷ तुम अपनी भाषा से उन प्रयोगों को ढूंढ निकालो जिनका प्रचलन तुम्हारी किताबी भाषा में नहीं हो रहा है और जिनके अभाव में भाषा निश्चय ही कमजोर होती जा रही है।''

वे चाहते थे सम्मेलन संस्कृत , प्राकृत, अपभ्रंश के महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुवाद कराये और उनके प्रकाशन की व्यवथा करे। १९३९ में लिखा हुआ द्विवेदी जी का एक लेख है - साहित्यिक संस्थाएं क्या कर सकती हैं? यात्राावृत्त की रोचक शैली में लिखा गया यह निबंध हिन्दी सेवी संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के आदर्श कार्य का उत्कृष्ट प्रस्ताव है। इसमें प्राचीन और आधुनिक के संयोग से हिन्दी को भावी चुनौतियों का सामना करने और उसे कारगर बनाने के योग्य कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया है।

हिन्दी भाषा और साहित्य को लेकर द्विवेदी जी शांतिनिकेतन में जितने सक्रिय थे , उसे नहीं आंका गया है। वे अध्यापक थे, लेखक थे, वक्ता प्रचारक थे। शांतिनिकेतन में जो हिन्दी की गतिविधियां थीं, उसके संचालक थे, हिन्दी और बंगाली बुद्धिजीवी साहित्यकारों के बीच सेतु का काम करते थे। उनके सामने हिन्दी के वास्ते काम करने के लिए भावी योजनाएं थीं। इस क्रम में वे गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव आदि से मिलते थे, उनसे प्रेरणा और परामर्श लेते थे। इसी क्रम में हिन्दी भवन की स्थापना हुई।


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