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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

   सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत
वरुण कुमार

अपना क्या है इस जीवन में

सब तो लिया उधार

सारा लोहा उन सब का

अपनी केवल धार

यह कवि की अतिरिक्त विनयशीलता है या परम्परा , समाज, विरासत के प्रति कृतज्ञता का बोध! एक तरफ कलाकार की सर्जक भूमिका उससे कुछ नया, अपूर्व सृजित करने की मांग करती है तो दूसरी तरफ स्वयं कलाकार दूसरों का ऋण स्वीकार करता हुआ कहता है - सब तो लिया उधार! एक कवि रचनाकार द्वारा व्यक्त अनुभवों में, विचारों में, जीवन में, जीवन दृष्टि में कितनी मौलिकता है और कितना अंश उसने दूसरों से ग्रहण किया हुआ है यह आलोचना के क्षत्रा में गम्भीर बहस का मुद्दा रहा है मगर अभिव्यक्ति के धरातल पर, रचना की भाषा में व्यक्तिगत तत्वों और विरासत से ग्रहण किये गये तत्वों का कितना योग होता है इसकी, विशेष कर गद्य की विधाओं में, बहुत कम पड़ताल हुई है। कविता की भाषा में लय छंद अलंकार, ध्वन्यात्मक योजना, व्याकरणिक नियमों से छूट लेने की स्वतंत्राता आदि ऐसा बहुत कुछ होता है जिनके बल पर कवि की अभिव्यक्ति के सम्बंध में मूल्यवान निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। गद्य में इनकी उपस्थिति अत्यल्प या नगण्य होने के कारण एक कहानी, उपन्यास, ललित निबंध का लेखक भाषा के प्रयोक्ता के तौर पर कितना मौलिक और रचनात्मक है और कितना अभिव्यक्ति के पूर्वप्रपचलित उपादानों का ऋणी इस पर स्पष्ट और सप्रमाण कुछ खास कह पाना सदैव कठिन रहा है। इस कारण गद्य की विधाओं में, शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के प्रादुर्भाव के बावजूद, इस प्रकार के अध्ययन की कमी रही है।

किसी लेखक के कृतित्व में अभिव्यक्ति के स्वनिर्मित साधन और विरासत से मिले साधन क्या हैं और उनके बीच क्या सम्बंध है हम यहां इस बात की चर्चा विशेषकर गद्य के संदर्भ में करेंगे।

 

कोई भी उक्ति प्रत्यक्षीकरण का एक प्रकार (mode of perception) है। वह संसार को देखने का नजरिया प्रस्तुत करती है। व्याकरणिक संरचना भी उसी का प्रतिफल है। उक्ति चाहे कितनी ही छोटी, कितनी ही साधारण प्रतीत होने वाली क्यों न हो वह अपनी संरचना एवं अर्थ में यह अवश्य बताती है कि उसमें वस्तुएं, घटनाएं आदि किस रूप में, एक दूसरे के साथ किस सम्बंध में देखी जा रही हैं। ÷ यह कलम है' यह उक्ति ÷ कलम' जाति की अवधारणा, सर्वनाम की अवधारणा, ÷ यह' और ÷ कलम' का सम्बंध ( जाति सदस्यता), काल की संकल्पना, उसमें ÷ यह' की स्थिति ( वर्तमान) आदि बहुत कुछ प्रकट करती है। इस प्रत्यक्षीकरण के तरीके को उस भाषा का प्रयोक्ता विरासत के रूप में ग्रहण करता है और इसे अपनी आवश्यकतानुसार संशोधित भी करता है। इसी कारण अलंकारों आदि का जन्म होता है। इसी कारण भाषा में परिवर्तन होते हैं : जैसे, नये शब्द, नये पदबंधों का आना, विन्यास सम्बंधी परिवर्तन आदि।

इस तरह , प्रत्यक्षीकरण का तरीका दो प्रकार का होता है :

( क) जो उस भाषा के प्रयोक्ता को विरासत में मिला होता है। अभिव्यक्ति के पहले से उपलब्ध साधन - शब्द सम्पदा, व्याकरणिक संरचनाएं, प्रचलित उपमान, मुहावरे, अलंकार आदि इसी के अंतर्गत आते हैं। ये सभी उस भाषा की संहिता ( कोड) के अंतर्गत आते हैं। ये सामाजिक तत्व हैं, यानी प्रयोक्ता को समाज द्वारा मिले होते हैं।

( ख) जो उसका स्वनिर्मित होता है। इसके अंतर्गत अभिव्यक्ति के वे सभी तरीके आते हैं जिन्हें वह खुद ईजाद करता है। किन्तु वह स्वनिर्मित उस भाषा के कोड के ही अनुरूप होता है। स्वनिर्मित इडियम और मुहावरे , अलंकार आदि इसी के अंतर्गत आते हैं। ये प्रयोक्ता के अपने व्यक्तिगत तत्व हैं। इनकी महत्ता साहित्य में सबसे अधिक है।

कोई कृति या रचना भी एक बोध , एक दृष्टि, प्रत्यक्षीकरण का एक प्रकार प्रस्तुत करती है। रचना के तत्व - पात्रा, वातावरण, घटना, संवेग आदि - किस रूप में एवं एक दूसरे से किस प्रकार अंतर्सम्बंधित हैं यही उसका बोध है। यह बोध या प्रत्यक्षीकरण का प्रकार सर्वथा नवीन, अपूर्व या विलक्षण नहीं होता, उसका बहुत बड़ा भाग पूर्व प्रचलित, विरासत से प्राप्त तत्वों पर आधारित होता है। इसलिए किसी भी बोध या रचना में सामाजिक एवं व्यक्तिगत दोनों ही तत्वों का योग होता है। उसमें भी सामाजिक तत्वों का योगदान सबसे अधिक होता है। यह बात हर लेखक, हर रचना के बारे में सत्य है। एक लेखक की विशेषता सिर्फ इस बात में नहीं है कि वह किस हद तक सर्जनात्मक - नये का निर्माण करने में सक्षम है, बल्कि इसमें भी कि वह विरासत से प्राप्त साधनों का कितनी सफलतापूर्वक उपयोग कर पाता है।

यहां हमारे अध्ययन का विषय यह है कि लेखक के कृतित्व में अभिव्यक्ति के स्वनिर्मित एवं विरासत से मिले साधनों के बीच क्या सम्बंध है।

 

विरासत से प्राप्त एवं स्वनिर्मित तत्व

 

उपर्युक्त चर्चा के आधार पर किसी रचना में भाषाई दृष्टि से विरासत से प्राप्त एवं स्वनिर्मित निम्नलिखित तत्व उपस्थित होते हैं -

१. व्याकरणिक संरचनाएं : यह रचनाकार/प्रयोक्ता को विरासत से प्राप्त होता है। ये पूर्णतः सामाजिक होते हैं, अर्थात्‌ विन्यास के सांचे उस भाषा के प्रयोक्ता समाज द्वारा ही निर्मित होते हैं। किसी भाषा में इन सांचों की संख्या अगणनीय होती है, लेकिन असीमित भी नहीं होती, क्योंकि विन्यास के रूप में शब्दों का कोई भी क्रम उस भाषा में ग्राह्‌य नहीं होता।

२. इडियम ( मुहावरे) : यह भाषा में बहुत अधिक व्याप्त है। इडियम एक या एक से अधिक रूपिमों ( MORPHEME - अर्थ की लघुतम इकाई) का ऐसा समूह है जो एक सम्पूर्ण अर्थ की सृष्टि करता है। यह वाक्य से छोटी इकाई है। यह पदबंध के रूप में हो सकता है किन्तु यह पदबंध से भिन्न है, क्यांकि पदबंध एक सम्पूर्ण अर्थ नहीं देता। हमारी इस परिभाषा के अनुसार इडियम के अंतर्गत मुहावरे, अलंकार, प्रतीक आदि सभी चले आते हैं, क्योंकि ये सभी एक रूपिम या रूपिमों के समूह या समुच्चय की तरह आचरण करते हैं एवं सम्पूर्ण या विशिष्ट अर्थ देते हैं।

इडियम की उपर्युक्त धारणा अत्यंत व्यापक है। व्यवहार में इडियम इससे संकीर्ण अर्थ में प्रयुक्त होता है - एक या एक से अधिक रूपिमों का ऐसा समूह जो एक सम्पूर्ण अर्थ तो देता है किन्तु यह अर्थ उसके घटकों के अर्थ से सम्बंधित नहीं होता। यह आंगिक सम्पूर्ण (organic whole) की तरह होता है , जिसमें अंगों की अलग भूमिका नहीं होती, सभी अंग मिल कर ही अर्थवान होते हैं। उदाहरण के लिए ÷ नौ दो ग्यारह होना', ÷ लाल पीला होना' । इनके अर्थ का इनके घटकों के अर्थ ( नौ और दो का योग ग्यारह होता है, लाल और पीला रंग) से किंचित भी सम्बंध नहीं है। इस अर्थ में मुहावरे एवं इडियम एक समान हैं। लेकिन इडियम एवं मुहावरों में अंतर है। हिन्दी में मुहावरा हमेशा एक से अधिक शब्दों का होता है, जबकि इडियम एक रूपिम का भी हो सकता है। एक रूपिम के मामले में, जिसके और अर्थपूर्ण घटक की कल्पना नहीं की जा सकती, इडियम उसके शाब्दिक या अभिधेय अर्थ से भिन्न अर्थ देता है। जैसे, ÷ वामाचार', ÷ वामपंथ', ÷ विधि वाम होना' प्रयोगों में ÷ वाम' तथा ÷ दक्षिणाचार', ÷ दक्षिणपंथ' प्रयोगों में ÷ दक्षिण' इडियम है क्योंकि यहां इनका अर्थ वाम या दक्षिण दिशा नहीं है। इन्हें हिन्दी में मुहावरे की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अब से हम अपने विवेचन में इडियम का प्रयोग इसी अर्थ में करेंगे।

इडियम दो प्रकार का होता है - एक जो विरासत से प्राप्त होता है, यानी जो लोक प्रचलन में है, उस भाषा की सम्पत्ति बन चुका है; दूसरा, जो व्यक्ति द्वारा निर्मित है, जो लोक प्रचलन में आ भी सकता है और नहीं भी। इस दूसरे प्रकार के इडियम रचनाकार की नयी दृष्टि का वहन करते हैं। इनकी संख्या बहुत ही कम होती है, बल्कि यह नगण्य जैसा होता है।

३. अलंकार : अलंकार एक या एक से अधिक रूपिमों का एक ऐसा समूह है जो एक सम्पूर्ण अर्थ की सृष्टि तो करता है लेकिन उसमें उसके घटकों के अर्थ अक्षुण्ण रहते हैं। यह यांत्रिाक सम्पूर्ण (mechanical whole) की तरह होता है जिसमें घटकों की अपनी अलग भूमिका भी होती है और सभी मिल कर भी अर्थवान होते हैं। अलंकार की व्याप्ति एक शब्द में भी हो सकती है और कई वाक्यों में भी : उदाहरणार्थ, चंद्रमुख, हिरण्यगर्भ, धूप का आंचल, चेतना की अंधी गली।

अलंकारों की सृष्टि किसी नये अर्थ के वहन के लिए , किसी नये प्रकार के प्रत्यक्षीकरण को व्यक्त करने के लिए होती है। इसलिए वैसे अलंकार जो रूढ़ हो चुके हैं, जिनमें नया अर्थ वहन करने की क्षमता खत्म हो चुकी है उन्हें हम अपने प्रस्तुत विवेचन में अलंकार के अंतर्गत नहीं रखेंगे। अलंकारों से हमारा अभिप्राय केवल ऐसे अलंकारों से होगा जो लेखक के खुद के गढ़े हुए हैं। रूढ़ हो चुके अलंकार विरासत से प्राप्त हुए हैं। उनके बारे में हम यह मानते हैं कि वे उस भाषा के इडियम के हिस्से बन चुके हैं। विरासत से प्राप्त इडियम एवं बुनियादी भाषिक संरचनाएं उस नींव या भित्ति की तरह हैं जिन पर अलंकारों का निर्माण होता है।

आलोचकों ने अलंकारों का अत्यंत विशद विवेचन किया है , उन्होंने इडियम में उतनी रुचि नहीं ली है। इसके विपरीत भाषाविदों ने इडियम पर विस्तृत चिन्तन किया हैं, अलंकारों पर ध्यान नहीं दिया है। इसका कारण यह है कि अलंकार भाषाविद के लिए महत्वपूर्ण तत्व नहीं है, क्योंकि वह लोकभाषा में प्रचलित नहीं है। जब वह प्रचलित हो जाता है, तो उसका अंतर्भाव इडियम के ही अंतर्गत हो जाता है। एक आलोचक के लिए अलंकार का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि वह विरासत से प्राप्त ( यानी लोकभाषा में प्रचलित) नहीं है, वह रचनाकार का खुद का गढ़ा हुआ है। भाषाविद की रुचि सामान्य ( प्रचलित भाषा) में है और आलोचक की रुचि विशिष्ट ( कृति) में। दोनों विपरीत कारणों से इस तथ्य के लिए जिम्मेदार हैं।

हमारे लिए इडियम एवं अलंकार दोनों ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि हम एक भाषाविद् के नजरिए से भी रचना को देख रहे हैं।

इडियम व विरासत से प्राप्त अन्य तत्वों के बारे में उल्लेखनीय तथ्य केवल यह नहीं है कि उनकी बुनियाद पर अलंकारों का निर्माण होता है , बल्कि उनकी मूल भूमिका इससे कहीं बहुत अधिक व्यापक है - रचना के सम्प्रेषण में सहायक होना। किसी भी रचना के सम्प्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि उसके सांस्कृतिक संदर्भ पाठक या भावक को ज्ञात हों। यह सांस्कृतिक संदर्भ विरासत के तत्वों में ही होता है। इसके अभाव में रचना का सम्प्रेषण एवं मूल्यांकन सम्भव नहीं है। यदि सांस्कृतिक संदर्भ का ज्ञान न हो तो रचना किस हद तक असम्प्रेषणीय हो सकती है इसे हम निम्न उदाहरण से स्पष्ट करते हैं :

नूत्का इंडियंस दिन भर के काम के बाद आमोद प्रमोद के लिए एक अलाव के गिर्द बैठे हैं। उनमें से एक बूढ़ा एक कहानी कहता है , जो हिन्दी रूपांतर में इस प्रकार चलती है -

÷÷ क्वाटयाट को दो लड़कियां दिखीं। ÷ तुम लोग किसकी लड़कियां हो?' क्वाटयाट ने उन दोनों लड़कियों से पूछा। लड़कियों ने उसे नहीं बताया कि उनका पिता कौन है। बार बार क्वाटयाट ने पूछा कि उनका पिता कौन है, लेकिन वे बताती नहीं थीं। अंत में लड़कियां क्रोधित हो गयीं। ÷ हम लोग जिनकी संतानें हैं', उन्होंने कहा, ÷ वह सूर्यकिरण है।' बहुत देर तक लड़कियों ने यह कहा।

और तब क्वाटयाट को इस तथ्य के कारण पसीना आने लगा कि उनका पिता सूर्यकिरण है। क्वाटयाट को पसीना आने लगा और वह मर गया। अब क्वाटयाट को पसीना आ रहा था और वह फूले हुए गुब्बारे की तरह फूलने लगा, और इसका कारण थीं लड़कियां। अब क्वाटयाट का तापक्रम बढ़ गया और वह मर गया। वह काफी समय तक मरा हुआ रहा और वह फट गया, एक जोर की आवाज करते हुए जिस वक्त वह फटा। यह तब हुआ जब वह मरा हुआ था कि उसने सुना कि वह किस प्रकार जोर की आवाज के साथ फटा।''

एडवर्ड सापिर और मारिस स्वदेश की पुस्तक Nootka texts, Linguistic society of America, Philadelphia (1939) से

यह कथा नूत्का इंडियनों में पीढ़ियों में कही और सुनी जाती है। उसकी व्याप्ति उनके समाज में उसी तरह है जिस तरह हिन्दू समाज में रामकथा की है। यानी इस कथा से उस समाज के अधिकांश सदस्य परिचित हैं। हम नहीं समझ पाते कि इस कथा के प्रति हमारी प्रतिक्रिया कैसी हो , क्योंकि हमारे पास प्रत्यक्षीकरण का वह प्रकार नहीं है जो इस कहानी के रसास्वादन और आकलन के लिए आवश्यक है। हम नहीं समझ पाते कि इसमें कौन सा इडियम है, कौन अलंकार है और वे क्या अर्थ रखते हैं, व्याकरणिक संरचना क्या है यानी तत्वों को परस्पर किस सम्बंध में देखा गया है। हम यहां नूत्का कृति का हिन्दी अनुवाद देख रहे हैं, जो मूल से अलग है। अगर हम यह कल्पना करें कि नूत्का भाषा में व्याकरणिक संरचनाओं में घटक तत्वों का वही सम्बंध है जिस तरह हिन्दी में है तो भी हम इडियम और अलंकारों को पहचान पाने और उनका अर्थ समझ पाने में असमर्थ हैं, क्योंकि इनका अनुवाद नहीं हो सकता। हमें विरासत से प्राप्त तत्वों का पता नहीं है इसलिए स्वनिर्मित तत्वों को भी पहचान पाने में असमर्थ हैं। इस कारण अर्थ पूर्णतः ग्रहण नहीं हो पाता। विरासत से प्राप्त सामग्री में ही वह सांस्कृतिक संदर्भ मौजूद होता है जो रचना के सम्प्रेषण के लिए आवश्यक है। यही रचनाकार और पाठक के बीच संवाद की स्थिति लाता है। यह वह सेतु है जिसके सहारे पाठक रचनाकार के रचे हुए नये संसार में प्रवेश करता है। यही वह आधार, वह पृष्ठभूमि है जिस पर नये का निर्माण होता है।

४. प्रतिकूल प्रयोगः अब तक जिन तत्वों की चर्चा की गयी वे लेखक पाठक के बीच संवाद की स्थिति लाते हैं और रसास्वादन में सहायक होते हैं। लेकिन किसी रचना में ऐसे तत्व भी हो सकते हैं जो लेखक और पाठक के बीच संवादहीनता की स्थिति लाएं और रसास्वादन में बाधक हों। ऐसे तत्व हैं प्रतिकूल प्रयोग। प्रतिकूल प्रयोग कई स्तरों पर हो सकता है :

( क) व्याकरणिक संरचना के स्तर पर : व्याकरण सम्बंधी त्राुटियां।

( ख) इडियम के स्तर पर : ऐसे प्रयोग जो उस भाषा के इडियम के प्रतिकूल हों, जैसे, हिन्दी में ÷ टांग खींचना' की जगह ÷ टांगे खींचना' ।

( ग) अलंकार के स्तर पर : ऐसे अलंकार जो दूरारूढ़ हों, जिनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाये या जो अनावश्यक हों: जैसे, एक अपरिमेय रहस्यमयता की सुरलहरी में माया का मर्म गरजने लगता है। ( माया का मर्म, निर्मल वर्मा)। इसमें रहस्यमयता जो ÷ रहस्यमय' का एक कदम और अमूर्तन है। उसका सुरलहरी होना और उसके भीतर माया का मर्म होना, उसका गरजना यह सब मिल कर अत्यंत अस्पष्ट हो जाते हैं।

ऐसा नही है कि संवादहीनता केवल इन्हीं तीन स्तरों पर दोष के कारण होती है। इसके लिए एक और स्तर जिम्मेवार हो सकता है - अर्थ का स्तर। अर्थ के स्तर पर ऐसे तत्वों का अभाव हो सकता है जिनके कारण रचना का सम्पूर्ण अर्थ निर्मित नहीं हो पाये, या ऐसे असंगत या अनावश्यक तत्व हो सकते हैं जो अर्थ में अस्पष्टता लायें और रसास्वादन में बाधक बनें।

५. सीमारेखा स्थितियां : अंत में, एक ऐसा वर्ग भी है जो लेखक और पाठक के बीच संवाद की स्थिति लाने में सहायक भी हो सकता है और बाधक भी। यह वर्ग है अन्य भाषा के प्रभाव से आये शब्दों मुहावरों और विन्यासों संरचनाओं का। यह खासकर हिन्दी के संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि हिन्दी के अर्थ और संरचना दोनों ही स्तरों पर अंग्रेजी का गहरा असर है। सीमारेखा स्थितियां निम्न प्रकार की हो सकती हैं :

( क) ऐसे मुहावरे जो कि विदेशी भाषा से आकर हिन्दी में खप चुके हैं, जैसे, अंग्रेजी का leg pulling हिन्दी में ÷ टांग खिंचाई' या ÷ टांग खींचना' मुहावरे के रूप में प्रचलित हो चुका है। ऐसे इडियम संवादहीनता की स्थिति नहीं लाते क्योंकि इनका अर्थबोध सरलता से हो जाता है।

( ख) ऐसे मुहावरे जो विदेशी भाषा से लिये गये हैं और इस भाषा में प्रचलित नहीं हैं। ऐसे इडियमों का अर्थबोध तभी हो सकता है जब पाठक भी मूल भाषा के इडियम के अर्थ से परिचित हो, अन्यथा वे संवादहीनता उत्पन्न करेंगे। इनके बारे में पाठक को यह भ्रांति हो सकती है कि वे लेखक के स्वनिर्मित हैं जबकि वे लेखक को विरासत ( अन्य भाषा की) से प्राप्त हुए होते हैं।

( ग) ऐसे शब्द प्रयोग, ऐसी व्याकरणिक संरचनाएं हो सकती हैं जिनका अर्थबोध तो हो जाता है मगर जो व्याकरणिक रूप से अशुद्ध न होने पर भी हिन्दी की प्रकृति से काफी अलग होने के कारण पाठक को उनसे संवाद स्थापित करने में कठिनाई होती है। ऐसे वाक्य विन्यास हिन्दी में विशेषकर अंग्रेजी से प्रभावित लक्षित होते हैं। वैसे तो हिन्दी में विशेषकर संस्कृत और अंगे्रजी के प्रभाव बहुत दूर तक आत्मसात हो गये हैं किन्तु फिर भी, उदाहरण के लिए, अज्ञेय और निर्मल वर्मा की वाक्य रचनाएं अंग्रेजी से इतनी अधिक आयातित हैं कि वे हिन्दी के पाठक के लिए संवादहीनता का खतरा उपस्थित करती हैं। डा. नगेन्द्र के शब्द उधार लेकर कहें तो अंग्रेजी का प्रभाव इनके ÷ रेशे रेशे' में भिदा है। ऐसी स्थिति में अंग्रेजी की विरासत से अपरिचित या कम परिचित पाठक को इनकी रचनाएं समझने में कठिनाई होगी। उसी तरह की स्थिति जयशंकर प्रसाद की संस्कृतनिष्ठ भाषा के मामले में बनती है जिसमें संस्कृत की विरासत से अल्पपरिचित पाठक के लिए कई बार उनकी रचनाओं से संवाद स्थापित करना मुश्किल होता है।

उपर्युक्त चर्चा के बाद , समाहार के रूप में, रचना में उपस्थित तत्वों को हम निम्न आरेख द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं :

विश्लेषण की विधि और उदाहरण : अब हम विश्लेषण द्वारा यह जानने का प्रयास करेंगे कि भाषाई स्तर पर किसी कृति में उपर्युक्त विवेचित तत्व किस अनुपात में हैं और वे लेखक की भाषा एवं प्रत्यक्षीकरण सम्बंधी किन विशेषताओं को प्रकट करते हैं। इसके लिए किसी एक लेखक का उदाहरण लेना सुविधाजनक होगा ताकि विश्लेषण की प्रक्रिया और उसके अनुप्रयोग को क्रमशः कृति, कृतित्व और लेखक के स्तर पर सम्पूर्णता में दिखाया जा सके। किन्तु विश्लेषण के लिए हम यहां किसी पूरी रचना को उद्धृत नहीं कर सकते, ऐसा करना अत्यंत अव्यावहारिक होगा। हमें कोई न कोई अंश लेना होगा। अंश में ऐसी कई चीजों को स्पष्ट करना मुश्किल हो सकता है जिसके लिए पूरी रचना का संदर्भ होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा की ÷ परिन्दे' शीर्षक कहानी में कहीं भी परिन्दे अलंकार या उपमान के रूप में प्रयुक्त नहीं हुए हैं लेकिन पूरी रचना में परिन्दे निर्वासन का प्रतीक बन कर उभरते हैं; वह निर्वासन जिसे कहानी का हर पात्रा भोग रहा है - लतिका, डा. मुकर्जी, ह्यूबर्ट आदि। यह प्रतीक पूरी रचना के स्तर पर लेखक स्वयं रचता है। इसलिए नीचे दी गयी विधि केवल एक सतही हद तक ही विश्लेषण में सहायक होगी यदि अर्थ के स्तर पर अन्य संदर्भगत तत्वों पर ध्यान न दिया जाए। अर्थ का स्तर किसी भी अभिव्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

हमने उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा को लिया है , यद्यपि तुलना करने की आवश्यकता होने पर हम यथास्थान दूसरे रचनाकारों का भी उल्लेख करेंगे। नीचे उनकी कहानी ÷ परिन्दे' का एक अंश उद्धृत है। इसमें हमने मुहावरों को बोल्ड अक्षरों में और अलंकारों को इटैलिक में प्रस्तुत किया है :

÷÷ मिस वुड ने धीरे से अपनी दोनों बाहों को क्रॉस किया। फादर एलमंड को मिस वुड की मूर्खता पर इतना अधिक क्षोभ हुआ कि उनसे आगे कुछ और नहीं बोला गया। डाक्टर मुकर्जी से उनकी कभी नहीं पटती थी, इसलिए मिस वुड की आंखों में वह डाक्टर को नीचा दिखाना चाहते थे। किन्तु मिस वुड लतिका का रोना ले बैठीं। आगे बात बढ़ाना व्यर्थ था। उन्होंने छड़ी को जंगले से उठाया और ऊपर साफ खुले आकाश को देखते हुए बोले - ÷ प्रोग्राम आपने यूं ही बदला, मिस वुड, अब क्या बारिश होगी' ।''

÷÷ ह्यूबर्ट जब चैपल से बाहर निकला तो उसकी आंखें चकाचौंध सी हो गयीं। उसे लगा जैसे किसी ने अचानक ढेर सी चमकीली उबलती हुई रोशनी मुट्ठी में भर कर उसकी आंखों में झोंक दी हो। पियानो के संगीत के सुर रुई के छुई मुई रेशों की भांति अब तक उसके मस्तिष्क की थकी मांदी नसों पर फड़फड़ा रहे थे। वह काफी थक गया था। पियानों बजाने से उसके फेफड़ों पर हमेशा भारी दबाव पड़ता, दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। उसे लगता था कि संगीत के एक नोट को दूसरे नोट में उतारने के प्रयत्न में वह अंधेरी खाईं पार कर रहा है।

÷÷ आज चैपल में मैंने जो महसूस किया, वह कितना रहस्यमय, कितना विचित्रा था, ह्यूबर्ट ने सोचा। मुझे लगा, पियानों का हर नोट चिरंतन खामोशी की अंधेरी खोह से निकल कर बाहर फैली नीली धुंध को काटता, तराशता एक भूला सा अर्थ खींच लाता है। गिरता हुआ हर ÷ पोज' एक छोटी सी मौत है, मानों घने छायादार वृक्षों की कांपती छायाओं में कोई पगडंडी गुम हो गयी हो, एक छोटी सी मौत जो आने वाले सुरों को अपनी बची खुची सांसें समर्पित कर जाती है, जो मर जाती है, किन्तु मिट नहीं पाती, मिटती नहीं इसलिए मर कर भी जीवित है, दूसरे सुरों में लय हो जाती है...'' ( परिन्दे, पृ. १३९)

इस उद्धरण में कुल ३०० शब्दों में १४१ शब्द ( ४७ % ) अलंकारों में प्रयुक्त हुए हैं जबकि मुहावरों में केवल ७ शब्द ( २.३३ % ) हैं। पूरी परिन्दे कहानी में अलंकारों और मुहावरों में प्रयुक्त शब्दों का प्रतिशत क्रमशः ११.५ % और ०.५ % है। निर्मल वर्मा की कुछ अन्य कहानियों में ये आंकड़े इस प्रकार हैं -

 

तालिका 1

 

कथाकृतियां अलंकारों में प्रयुक्त मुहावरों में प्रयुक्त शब्दों

शब्दों का प्रतिशत का प्रतिशत

सितम्बर की एक शाम १६.१ % नगण्य

एक दिन का मेहमान १०.३ % ० %

दहलीज २८.७ % नगण्य

तालिका की अंतिम कहानी ÷ दहलीज' यौन बोध से सम्बंधित है। हमने तुलना के लिए यौन बोध से ही सम्बंधित मोहन राकेश की एक कहानी ÷ ग्लास टैंक' ली है जिसमें उक्त तत्वों का प्रतिशत निम्नांकित है -

तालिका २

 

कथाकृति अलंकारों में प्रयुक्त मुहावरों में प्रयुक्त शब्दों

शब्दों का प्रतिशत का प्रतिशत

ग्लास टैंक ७.४ % ०.४ %

 

तालिका 1 और २ से निम्नांकित बातें स्पष्ट होती हैं :

 

( क) निर्मल वर्मा में हिन्दी इडियमों और मुहावरों का प्रतिशत बहुत कम , नहीं के बराबर है। ÷ दहलीज' में मुहावरों का प्रतिशत नगण्य है। इसकी तुलना में मोहन राकेश की ÷ ग्लास टैंक' में मुहावरों का प्रतिशत अधिक है। मोहन राकेश की यह कहानी उनके कृतित्व में कोई अलग, विशेष किस्म की कहानी नहीं है। अतः इसके आंकड़ों को उनकी कथाकृतियों पर सामान्य रूप से लागू किया जा सकता है। हिन्दी साहित्य के कुछ अन्य प्रमुख कथाकारों प्रेमचंद, रेणु, अज्ञेय के कथा साहित्य का सर्वेक्षण करने पर यह बात प्रथम दृष्टि में ही स्पष्ट होती है कि रेणु और प्रेमचंद हिन्दी इडियम एवं मुहावरों का प्रयोग निर्मल वर्मा की तुलना में बहुत अधिक करते हैं। मोहन राकेश इन दोनों की तुलना में कम लेकिन निर्मल वर्मा की तुलना में अधिक प्रयोग करते हैं। अज्ञेय में भी हिन्दी इडियम और मुहावरों का अभाव दिखता है।

( ख) निर्मल वर्मा में अलंकारों का प्रतिशत अधिक है। तालिका में दी गयी कहानियों में अलंकारों का न्यूनतम प्रतिशत १० % है। ÷ दहलीज' में तो यह २८ % तक चला गया है, जबकि ÷ ग्लास टैंक' में मात्रा ७.८ % हैं। स्पष्ट है, राकेश अलंकारों का आश्रय कम लेते हैं। अज्ञेय, रेणु, प्रेमचंद में अलंकार अधिक परिमाण में नहीं हैं। प्रेमचंद में तो बहुत ही कम हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि यदि किसी रचना में इडियमों और मुहावरों तथा अलंकारों का प्रतिशत जान लेने के बाद जो भी बचता है वह बुनियादी हिन्दी संरचनाएं हैं , जिन्हें तालिका में प्रदर्शित किया जा सकता है, लेकिन निर्मल वर्मा के मामले में ऐसा नहीं है। इसका कारण है इनकी रचनाओं की मूल परिकल्पना अंग्रेजी में हुई है, जिसके साक्ष्य इनकी रचनाओं में लगातार मिलते हैं। इनमें ऐसी व्याकरणिक संरचनाएं बहुतायत में हैं जो यद्यपि हिन्दी व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध या अग्राह्य तो नहीं हैं लेकिन वे समग्र रूप में, एवं जहां जहां अलगाव में भी, हिन्दी के प्रचलित सांचों के अनुरूप कम हैं। वे अंग्रेजी से प्रभावित हैं और कई बार अंग्रेजी के रूपांतर ही प्रतीत होते हैं। उदाहरणार्थ -

 

१. .... उसकी ( बादलों की) छायाएं नंदा देवी और चूली की पहाड़ियों पर गिर रही थीं। ( परिन्दे, पृ. १४३)

इसमें ÷ छायाओं का गिरना' अंग्रेजी के ÷ shadows falling ' का अनुवाद है। हिन्दी में छायाएं ÷ गिरती' नहीं ÷ पड़ती' हैं। इडियम का दोष।

२. हवा का वेग ढीला पड़ने लगा। ( वही, पृ. १४३)

यहां ÷ ढीला पड़ना' अंग्रेजी के slacken का अनुवाद है।

३. वह चमकीला दिन था। ( लाल टीन की छत, पृ. १९५)

That was a bright day.

४. रेल की लाइनें वहीं थीं, सुरंग के नीचे ( वही, पृ. १९५)

Under the tunnel

५. वहां कोई पेड़ नहीं थे। ( वही, पृ.१९५)

There were no trees.

( इसमें व्याकरण की दृष्टि से भी दोष है। हिन्दी में कोई सिर्फ एकवचन संज्ञा के लिए आता है - जैसे, कोई आदमी)

६. ( चिड़िया की) छाया उन तीनों के सिर पर मंडरा कर हवा में धुल जाती।

'Dissolve into air' का रूपांतर ( पिछली गर्मियों में, पृ. १४१)

इनकी भाषा अनुवाद की भाषा जैसी प्रतीत होती है। इसको एक दृष्टि से दोष माना जा सकता है - तब जबकि पाठक को दूसरी भाषा ( अंग्रेजी) की व्याकरणिक संरचनाओं का पूरा परिचय नहीं हो। प्रेमचंद, रेणु आदि में ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं है। मोहन राकेश में भी अत्यल्प है। अज्ञेय में यह प्रवृत्ति बहुत प्रबल है। इस मामले में वे निर्मल वर्मा के काफी नजदीक ठहरते हैं।

 

समीक्षा : ऊपर प्राप्त निष्कर्षों को निर्मल वर्मा के पूरे कथा साहित्य पर लागू करते हुए कहा जा सकता है कि उनमें अलंकारों की प्रचुरता है और इडियमों मुहावरों की विरलता। ( कथाकृतियां ही नहीं, यह विशेषता इनके यात्राा संस्मरणों में भी उतनी ही प्रबलता से विद्यमान है।) इस कारण इनकी दृष्टि, इनका प्रत्यक्षीकरण बहुत नया लगता है। इस दृष्टि प्रत्यक्षीकरण के निर्माण में व्यक्तिगत तत्वों ( विशेषतः अलंकार) का योगदान अधिक है और इडियमों मुहावरों की कमी और वाक्य संरचनाओं की हिन्दी से कम अनुरूपता के कारण साझे तत्वों का योगदान कम है। लेखक जिस अर्थ संसार की सृष्टि करता है वह, इस कारण, पाठक को बहुत नया प्रतीत होता है। रचना की शर्त होती है कि वह नये का सृजन करे। इस अर्थ में निर्मल वर्मा सर्जक कलाकार हैं, और इस रूप में वे अत्यंत सफल हैं। किन्तु नये के निर्माण में व्यक्तिगत तत्वों ( विशेषतः अलंकार) का योगदान अधिक है और साझे तत्वों ( इडियम मुहावरे तथा व्याकरणिक संरचनाएं) का कम, इस तथ्य का दूसरा पहलू भी है - कि यह संवादहीनता का खतरा उपस्थित करता है, यानी इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि अलंकार प्रचुर परिमाण में होने के कारण अपनी ही ओर पाठक का ध्यान खींच लें और उसका ध्यान समग्र पर से हट जाए। भाषा माध्यम है और उसे पारदर्शी होना चाहिए। निर्मल वर्मा की रचनाओं में अलंकारों का बाहुल्य और यत्रा तत्रा उलझाव इस पारदर्शिता में बाधक है।

ऐसा नहीं है कि नयी दृष्टि के लिए सिर्फ अलंकार ही उत्तरदायी होते हैं , व्याकरणिक संरचनाओं और इडियमों मुहावरों के द्वारा भी नये का साक्षात्कार कराया जा सकता है। उदाहरण के लिए ÷ कुमारसम्भवम्‌' ( कालिदास) की तुलना में ÷ रामायण' ( वाल्मीकि) में अलंकारों का प्रयोग बहुत कम है जबकि रामायण की विराट अर्थगर्भिता के सामने कुमारसम्भवम्‌ की तुलना नहीं है। कई महान लेखकों में यही तथ्य परिलक्षित होता है कि जैसे जैसे वे परिपक्व हाते गये हैं उनकी निर्भरता अलंकारों पर घटती गयी है। प्रेमचंद की परवर्ती रचनाओं ( कफन, पूस की रात आदि), शेक्सपियर की परवर्ती रचनाएं ( जैसे, किंग लियर) आदि में अलंकारों का प्रयोग बहुत कम, नहीं के बराबर है लेकिन वे नये का बोध कराने में अत्यंत सक्षम हैं। इसलिए अलंकार ही अभिव्यक्ति की मौलिकता का परिचायक हो यह आवश्यक नहीं, सर्जनात्मक प्रतिभा विरासत से प्राप्त सामग्री के निजी संयोजन के बल पर ही नया और अपूर्व सृजित करने में सक्षम होती है।

रचना का नवीन होना ही - चाहे वह अलंकारों के कारण हो या इडियमों मुहावरों, सामान्य शब्दों और व्याकरणिक संरचनाओं के कारण - पर्याप्त नहीं है। इससे आगे यह भी आवश्यक है कि उस नये का मूल्य भी हो। और मूल्य निर्णय की कसौटियां सदैव नैतिक होंगी।


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