जीवन
तो फिर विपथन ही सही... भानु भारती

शताब्दी
उत्पीड़ित और अपमानित लोगों का संसार मोहम्मद मसूद

कहानियां
मिनाल पार्क और तीन बूढ़े वंदना शुक्ला 
ए घुटरू ! ए घुटरू ! कहनी कहो न... शिवेन्द्र

आत्मकथा
मणिकर्णिका डॉ. तुलसीराम

उपन्यास
बखेड़ापुर हरे प्रकाश उपाध्याय

समीक्षाएं 
निज लय का अनुपम गद्य पंकज पराशर
व्यंजना शक्ति का नया रूप अजय वर्मा 
भूमंडलीकरण के दौर में आधुनिकता अरुण होता

लेख
प्राचीन भारत में शिल्पियों की स्थिति रमानाथ मिश्र 
सामाजिक पदानुक्रम का प्रत्यंतरण अवधेश मिश्र

विशेष 
अपनी अपनी आधुनिकता हरबंस मुखिया

कविताएं 
आठ कविताएं विष्णु नागर / कविताएं बद्री नारायण / कविताएं प्रकाश / हलफनामा: कविता के दक्खिन टोले से अशोक कुमार पाण्डेय / कविताएं अपर्णा मनोज / तीन कविताएं अविनाश मिश्र

वृत्तांत 
अर्थात् औरों की कथा अरुण कमल

 समीक्षाएं 
समय की सचाइयां तलाशता साहित्य बिपिन तिवारी
कविता की नाउम्मीदी के खिलाफ मदन कश्यप
तो जीवन कितना वृहत्तर हो जायेगा अनिल त्रिपाठी
काव्य चित्त का परिष्कार और विस्तार जितेन्द्र श्रीवास्तव

समाज 
मार्फत दिल्ली कृष्णा सोबती

शताब्दी
‘मैं’ और ‘वे’ के बीच रामविलास शर्मा का ज्ञानकांड अभय कुमार दुबे 
रामविलास जी की एक डायरी विजय माहन शर्मा 

कहानियां
फेसबुक और बनना पड़ोसी के मकान काकृनवीन जोशी 
परिवार, (राज्य) और निजी सम्पत्ति राकेश मिश्र 
द रॉयल घोस्ट तरुण भटनागर 

लम्बी कहानी 
कट टु दिल्लीः कहानी में प्रधानमंत्राी का प्रवेश उमा शंकर चौधरी 

कविताएं 
कविताएं कात्यायनी / कविताएं एकांत श्रीवास्तव / सात कविताएं गीत चतुर्वेदी / दो कविताएं श्रीप्रकाश शुक्ल / कविताएं यू.के.एस. चौहान / तीन कविताएं प्रीति चौधरी

आत्मकथा
मणिकर्णिका डॉ. तुलसी राम

लेख
दृश्य: बिम्ब और गाथा नित्यानंद तिवारी
महाराष्ट्रीय नवजागरण में निरंतरता वीर भारत तलवार 

बहस
यथार्थवाद और मार्क्सवाद को विकसित करें रमेश उपाध्याय जवाबे शिकवा राजकुमार

वृत्तांत 
अर्थात औरों की कथा अरुण कमल

विशेष
बच्चों को क्या पाठ पढ़ाएं? दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा 

समीक्षाएं/  रोती हुई संवेदनाओं की आत्मकथा चौथीराम यादव
समीक्षाएं/ निरुपनिवेशीकरण के हक में अजय तिवारी  
समीक्षाएं/ कविता सम्प्रति: पीढ़ियों की जुगलबंदी ओम निश्चल 
समीक्षाएं/ वैचारिक आधार की दृढ़ता वीरेन डंगवाल 
समीक्षाएं/ संघर्ष काल में कथाएं वैभव सिंह
समीक्षाएं/ समय और सभ्यता का भाष्य अशोक सिंह यादव 

जीवन
• जीवन क्या जिया! नामवर सिंह
 मुड़ मुड़ के देखता हूं... राजेन्द्र यादव
 यह जान तो आनी जानी है... गुरदयाल सिंह

समाज
 विस्थापन की पीड़ा पी.सी. जोशी

शताब्दी
 नयी चेतना का संघर्ष अजय तिवारी 
 जैनेन्द्र की रचनात्मक दुनिया में स्त्री प्रीति चौधरी

लेख
 'शृंखला की कड़ियां' और मुक्ति की राहें मैनेजर पाण्डेय
• गांधी: अपना सामना सुधीर चंद
 विभाजन, इस्लामी राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमान (संदर्भ: आधा गांव, उदास नस्लें, आग का दरिया व छाको की वापसी) वीरेन्द्र यादव 
 भक्ति के बृहद आख्यान में 'सत्पुरुषों' की पीड़ा बजरंग बिहारी तिवारी
 स्त्री प्रतिरोध के पुरा लेख अवधेश मिश्र

मुलाकात
 भारत में आर्यों की अखंड इकाई नहीं थी डाक्टर रामविलास शर्मा से नामवर सिंह की वार्ता

बहस
 आम्बेडकर चिन्तन में मार्क्स कंवल भारती

संस्मरण
 लखनऊ मेरा लखनऊ मनोहर श्याम जोशी
 मैनपुरी का शहजादा कृष्णा सोबती 
 तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द ज्ञानरंजन 
 फिराक वार्ता विश्वनाथ त्रिपाठी
 पंडित श्रीलाल शुक्ल रवीन्द्र कालिया

 

डायरी 
 गुजरात: यहां भी है, वहां भी है नमिता सिंह

यात्रा
जंगलों की ओर मधु कांकरिया

वृत्तांत 
कितने शहरों में कितनी बार: दिल्ली ममता कालिया

आख्यानक 
घर का जोगी जोगड़ा काशीनाथ सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया: डॉ. तुलसी राम

विशेष 
 रतनबाई जिन्ना: जिन्ना की कामना का नीलकुसुम वीरेन्द्र कुमार बरनवाल
 19वीं सदी में स्त्री चेतना और ताराबाई शिन्दे वीरभारत तलवार
 रणभूमि में भाषा विभूति नारायण राय 
 आत्म और आत्मचरित राजकुमार

कहानियां

 नपनी दूधनाथ सिंह 
 ख्वाजा, ओ मेरे पीर! शिवमूर्ति 
 इति गीतांजलि श्री 
 रंगमंच पर थोड़ा रुक कर देवेन्द्र
 भूलभुलैयां सारा राय 
 खाना योगेन्द्र आहूजा 
 परिन्दे का इंतजार सा कुछ... नीलाक्षी सिंह 
 नोटिस राजू शर्मा 
 क्विजमास्टर पंकज मित्र
 मौसम मो. आरिफ
 इति गोंगेश पाल वृत्तांत कुणाल सिंह 
 सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय 
 भूलना चंदन पाण्डेय 
 एक जिन्दगी... एक स्क्रिप्ट भर! उपासना

कविताएं 
 कोलम्बस का जहाज कुंवर नारायण 
 इब्राहिम मियां का हालचाल केदारनाथ सिंह
 विनोद कुमार शुक्ल की कविता 
 अपने बहीखाते में अशोक बाजपेयी
 होनहार विष्णु खरे 
 हमसे भी तो कुछ सीखना चाहिए मनुष्यों को चंद्रकांत देवताले 
 बैलगाड़ी भगवत रावत
 समुद्र पर हो रही बारिश नरेश सक्सेना 
 मेरे हिस्से की शांति ऋतुराज 
 जगह बदलनी होगी वेणु गोपाल
 खिलौना राजेश जोशी
 दोस्त अरुण कमल 
 कुछ कद्दू चमकाये मैंने वीरेन डंगवाल 
 खेल के नियम विजय कुमार
 पुकार पंकज सिंह 
 मेरी हैसियत विष्णु नागर
 प्रेत विनोद दास
 पिताओं के बारे में कुछ छूटी हुई पंक्तियां कुमार अम्बुज
 निजामुद्दीन देवी प्रसाद मिश्र 
 आधी रात मे रुलाई का पाठ बद्रीनारायण
 हंसने से अधिक रोने की क्रियाएं नवल शुक्ल 
 दृश्यों से लबालब इस दुनिया में हरीश चन्द्र पाण्डेय 
 हवाई थैला मदन कश्यप 
 नदी और पुल विमल कुमार 
 रीमिक्स आशुतोष दुबे 
 बात पवन करण 
 हड़परौली श्रीप्रकाश शुक्ल 
 नमकहराम जितेन्द्र श्रीवास्तव 
 जिसके पीछे पड़े कुत्ते गीत चतुर्वेदी 
 इस बरस फिर हरे प्रकाश उपाध्याय 
 विलाप नहीं कुमार वीरेन्द्र 
 वैश्विक बाजार में लुप्त होने से पहले पटरी बाजार का एक शब्दचित्रा मदन केशरी
 मुक्तिबोध का लिफाफा यू.के.एस. चौहान
 दिल्ली में टाइम क्या चल रहा है सर्वेन्द्र विक्रम
 तुम्हारी जेब में एक सूरज होता अजेय
 नानी का चश्मा फरीद ख

 जीवन 
 यह जान तो आनी जानी है... गुरदयाल सिंह

शताब्दी 
 अज्ञेय : दिक और काल के बरक्स राहुल सिंह
 प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल सा सुबोध शुक्ल
 आत्मकथन शमशेर बहादुर सिंह

लेख 
 वैकल्पिक आधुनिकता, आधुनिकता के विकल्प, अनेक आधुनिकताएं या कुछ और   हरबंस मुखिया
• एक वाकिया' संविधान सभा काः चंद उलझे हुए सवालों पर एक नजर और आदित्य निगम

कहानियां 
 दो कहानियां काशीनाथ सिंह
 सेंदरा पंकज मित्र
 खाली दिनों में लोकबाबू की जंगलगाथा रविंद्र आरोही
 रामबहोरन की अनात्मकथा आशुतोष

 विशेष 
 हाशिमपुरा 22 मई विभूति नारायण राय

कविताएं 
 कविताएं बद्री नारायण
 इस्तिमा से खरीदा चमड़े का कोट नरेंद्र गौड़
 अच्छा आदमी प्रेम रंजन अनिमेष
 कविताएं जितेंद्र श्रीवास्तव
 तीन कविताएं अजेय
 कविताएं फरीद खान

पत्र
 भगवत शरण उपाध्याय के नाम पत्र प्रस्तुतिः डॉ. अरुण वर्मा

वृत्तांत 
 असमाप्त किस्सों की समापन किस्त राजेश जोशी

उपन्यास
 पतिया : देशज नारी विमर्श की प्रथम कृति वीरेंद्र यादव
 पतिया केदारनाथ अग्रवाल

 • आधुनिकता तथा आम आदमी इंद्रनाथ चौधुरी

 हिन्द स्वराज की अंतस्संरचनाः विकास के वैकल्पिक मॉडल

  की तलाश विनोद शाही

 आधुनिक सभ्यता एवं हिन्द स्वराज राजकुमार

 आधुनिक सभ्यता के नाम अभियोगपत्रा राकेश

 आधुनिक सभ्यता का विकल्प आशुतोष कुमार मिश्र

 हिन्द स्वराज : दो सवाल सुधीर चंद्र

 हिन्द स्वराज का वर्णाश्रमी पाठ विभूति नारायण राय

 सुस्तकदमी का सौन्दर्यशास्त्रा आदित्य निगम

 हिन्द स्वराज का क्या करें? प्रणय कृष्ण

  हिन्द स्वराज: ऐतिहासिक अनिवार्यता नंद किशोर आचार्य

 हिन्द स्वराज : कुछ नोट्स त्रिदिप सुद

 मानसिक स्वराज : हिन्द स्वराज के सौ साल बाद 
  
शैल मायाराम

 हिन्द स्वराज का पुनर्पाठ एवं छनीसगढ़ मुक्ति मोर्चा 
   हिलाल अहमद

 गांधीवाद, हिन्द स्वराज और हमारा समय दिनेश कुमार

 सभ्यता का समग्र बोध शम्भू जोशी

 हिन्द स्वराज : एक पाठ अभय कुमार दुबे

 गांधी का हिन्द स्वराज अरुणेश नीरन शुक्ल

मीमांसा
आंखें वे देखी हैं जबसे विश्वनाथ त्रिपाठी 

लेख
मीरां का जीवन संघर्ष अरविन्द सिंह तेजावत  / जनकवि परसन: हिन्दी नवजागरण का लोकपक्ष समीर कुमार पाठक

लघु उपन्यास
पहले प्यार की आखिरी दास्तान रवीन्द्र वर्मा 

कविताएं
कविताएं अनामिका  / कविताएं जितेन्द्र श्रीवास्तव  / कान लपेटे कवि(ता) पीयूष दईया  / तीन कविताएं मिथिलेश शरण चौबे  / तीन कविताएं प्रत्यूष चंद्र मिश्रा / कविताएं अमृत सागर 

जीवन
तो फिर विपथन ही सही...प्ट भानु भारती 

 

 वृत्तांत 

अर्थात् औरों की कथा-ट अरुण कमल 

संस्मरण
प्रेम, करुणा और तकलीफ का समंदर उर्मिलेश 


लम्बी कहानी
बाद उनके... नीलाक्षी सिंह 

समीक्षाएं 
पुरानों का नयापन अर्थात जगूड़ी की कविताएं विजय बहादुर सिंह / आसपास की जीवंत कविताएं प्रांजल धर  / जीवनानुभव के देसी मुहावरे अरुण होता  / लघुकाया में वृहत आख्यान राजेन्द्र राव  / भटकती जिन्दगियां, पराजय और स्वप्न वैभव सिंह  / पराजित परिवेश की अपराजित कहानियां प्रताप दीक्षित  / अभिनेत्राी का वास्तविक जीवन आलोक पराड़कर 

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संपादकीय अंक 30

एक फिल्मोत्सव का आयोजन था। जैसाकि रिवाज है, इस अवसर पर सेमिनार भी हो रहे थे। उनमें से एक सत्रा में कुछ फिल्मकारों के बीच मुझे भी वक्तव्य देना हुआ। मैं सिनेमा की दुनिया का बाशिन्दा नहीं था। दूसरी बात कि ज्ञान के मामले में वैसे ही अभावग्रस्त और पिछड़ा हूं, सिनेमा के प्रसंग में मेरी यह विशिष्टता हदें पार जाती है। बहरहाल, मैंने वहां क्या कहा इसके पूर्व बताना चाहूंगा कि मैंने वहां सुना क्या! उस अवसर पर वक्ताओं द्वारा अभिव्यक्त विचारों में जो एक साम्य था, जिस एक विचार पर आम सहमति बनी वह यह कि पिछले कुछ वर्षों में सिनेमा का परिदृश्य परिवर्तित हो गया है। अब धीरे धीरे कलात्मक सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा का वर्गीकरण समाप्त हो चुका है। हमारे बीच अनेक ऐसी फिल्में आये दिन सामने आ रही हैं जो कलात्मक होने के साथ साथ कारोबार के नजरिये से उल्लेखनीय कामयाबी पाती हैं और इस तरह की घोर व्यावसायिक फिल्में बन रही हैं जो कलात्मक रूप से उत्कृष्ट कही जायेंगी। इस प्रकार की समझ बनने की शुरुआत इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ से हो चुकी थी जो विचारधारा, समाजवाद के सपनांे के धुंधले होते जाने और उपभोक्तावाद, भूमंडलीकरण के विस्तार के साथ मजबूत होती गयी। अब तो वह समझ इतनी सुदृढ़ तथा स्वीकृत हो चुकी है कि इस पर बहस करने की जरूरत भी नहीं महसूस की जाती।
पूर्वोक्त सेमिनार में मैंने क्या कहा उसे बतलाने के बजाय अब जरूरी यह है कि थोड़ा अधिक गहराई तथा विस्तार से उक्त मुद्दे पर बात की जाये। गौर करने पर मालूम हो जाता है कि आज जिस कला और व्यावसायिकता के विभेद की समाप्ति का गान किया जा रहा है वह यथार्थ नहीं यथार्थाभास है। दरअसल जिसे कला कह कर प्रसारित किया जा रहा है या जो कला जैसा लगते हुए कारोबार में सफलता हासिल कर रहा है वह वस्तुतः कलात्मक शिल्प में व्यावसायिकता है। इस तरह की फिल्मों के निर्माण की पृष्ठभूमि में कलात्मक प्रतिज्ञाएं नहीं कारोबारी लिप्साएं निहित होती हैं। इस बात को स्पष्ट करने के लिए तमाम उपभोक्ता सामग्रियों के विपणन हेतु बनायी जाने वाली विज्ञापन फिल्मों का अध्ययन करना चाहिए। हम अपने देश के ही विज्ञापनों के इतिहास पर नजर डालें तो देखते हैं कि इन विज्ञापनों की यात्रा शैल्पिक सौष्ठव और कलात्मक विकास की रही है। आजकल के विज्ञापनों ने तो जैसे कला के इस मूलमंत्रा को ही अपना लिया है कि सृजन में विचार जितने प्रच्छन्न होते हैं कृति उतनी ही श्रेष्ठ होती है। इन दिनों ये जिस रूप में सामने आ रहे हैं उनमें मानवीय भावनाओं, मनोविज्ञान, रिश्तों की उ$ष्मा, लुभावने बिम्बों आदि का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। ये कभी काव्यात्मकता, कभी खिलंदड़पन से भरपूर होते हैं। कहने का आशय यह कि इन विज्ञापन फिल्मों का शिल्प उच्चकोटि का होता है लेकिन इस आधार पर इन्हें उच्चकोटि की कला बताने से बड़ी मूर्खता दूसरी क्या हो सकती है। यही बात फिल्मों पर भी लागू होती है। बहरहाल अगर संक्षेप में कहना आवश्यक हो तो कहा जायेगा कि इस तरह के सिनेमा का शिल्प कलात्मक है किन्तु अंतर्वस्तु व्यावसायिक। यूं शास्त्राीय परम्परा में कहा जा सकता है कि शिल्प और कथ्य में द्वंद्वात्मक सम्बंध होता है। या यह भी कहा गया है कि कथ्य अपने अनुरूप शिल्प का गठन कर लेता है। निश्चय ही ये ऐसी मान्यताएं हैं जो अपने शिखर समय में भी समस्याग्रस्त और संदिग्ध रही हैं। ये उस प्रवृत्ति की द्योतक हैं जिसमें यांत्रिकता को द्वंद्वात्मकता कह कर परोसा जाता है। हकीकत यह है कि कथ्य और शिल्प में इतना जड़वत सम्बंध नहीं होता है और न ही शिल्प इतना परतंत्रा तथा लाचार भी होता है कि वह कथ्य का अनुचर हो जाये। यूं जो वाकई अनुचर होता है वह भी कहीं न कहीं स्वतंत्रा होता है। बड़े से बड़े गुलाम की भी अंदरूनी दुनिया का एक हिस्सा आजाद होता हैµ ये तो शिल्प है जो बेशक अपनी स्वायत्तता रखता है। वह कथ्य से अगर नियंत्रित होता है तो वह कथ्य को नियंत्रित करता भी है।
साहित्य में भी यह होने लगा है कि ऐसी रचनाएं सिर उ$ंचा कर रही हैं जिनका शिल्प कलात्मक हो सकता है किन्तु अंतर्वस्तु बाजारू है। ऐसी कृतियां अपनी बनावट में कई बार बहुत से लोगों को साहित्य होने का मिथ्याभास कराती हैं और बतौर साहित्य सराही भी जाती हैं। आज करोड़ों की कमाई का ढिंढोरा पीटने वाली अनेक रचनाएं और रचनाकार इस तरह का छल कपट करते हुए प्रायः देखे जा सकते हैं। जिस प्रकार कलात्मक सधाव वाली कई फिल्मों का चरम मोक्ष सौ दो सौ करोड़ की कमाई करने वाली फिल्मों के गिरोह में शामिल हो जाना होता है उसी प्रकार इस साहित्य का भी मकसद लाखों में बिकना और करोड़ों कमाना होता है। प्रारम्भ में हमने कलात्मकता और व्यावसायिकता के विभेद की चर्चा सिनेमा के संदर्भ में की थी। ध्यान दें कि इस तरह के सिनेमा और उसके एजेण्टों ने बड़ी होशियारी से इस बहस से एक शब्द को लापता कर दिया है। वह शब्द अथवा इससे आगे बढ़ कर कहें, मुद्दा हैµ सार्थकता। सवाल केवल यह नहीं है कि कोई सृजन कलात्मक है या व्यावसायिक! सवाल यह होना चाहिए कि वह सार्थक है कि नहीं! सार्थकता का पैमाना लागू करते ही कला तथा लोकप्रियता के आयाम बदल जाते हैं। और उनकी फलश्रुतियां कभी कभी एकदम उलट जाती हैं। स्मरण करें, कला फिल्म या क्लास सिनेमा जैसे पद उत्कृष्ट फिल्मों के लिए प्रायः फार्मूला सिनेमा के नागरिकांे की तरफ से उछाले जाते थे और उन्हीं के वारिस अब कला और व्यावसायिकता का फर्क मिटा रहे हैं। वह क्यों ऐसा कर रहे हैं या क्यों ऐसा करने के लिए विवश हुए हैं इसके विषय में थोड़ा रुक कर... पहले याद दिलाना है कि कला या क्लास सिनेमा के बरक्स विवेकवान लोगों द्वारा सार्थक सिनेमा या समानांतर सिनेमा पदों का प्रयोग किया जाता था। इस तरह के सिनेमा या साहित्य का मूल उद्देश्य समाज की किसी ऐसी विराट सचाई, सुंदरता को अभिव्यक्त करना होता है जो मनुष्य की जिन्दगी में सकारात्मक अर्थ में बदलाव लाये। इसके लिए वह पलट कर समाज की किसी ऐसी विकृति और कुरूपता का भी उद्घाटन करता है जो मनुष्यता के शिव और सुकून पर घात लागाये रहती है। अपने इस कार्यव्यापार के लिए ऐसी कृतियांे के रचयिता किसी भी तरह का जोखिम उठाने हेतु तैयार रहते हैं। अपनी अभिव्यक्ति की पूर्णता के लिए आर्थिक या सामाजिक बरबादी का खतरा भी उन्हें डिगा नहीं पाता है। और ऐसे भी दृष्टांत हैं कि लोगों ने जिन्दगी को भी संकट में डालने से गुरेज नहीं किया। ऐसे कलाकार की जो कला होती है वह स्वयं भी एक अंतर्वस्तु बन जाती है। और शायद यही किसी कला की सबसे महान सिद्धि होती है।
हिन्दी साहित्य में भी इधर शिल्प का हुनर कई लोग आजमाने लगे हैं। आये दिन ऐसी रचनाओं से आपका साक्षात्कार हो सकता है जो रोचक, लुभावन, काव्यात्मक या खिलंदड़ ढंग से बिकाउ$ चौकाउ$ विषयों को परोसती हैं। दृष्टव्य है कि कई बार यथार्थ भी अपनी बनावट में शिल्प बन जाता है। जब कोई यथार्थ चलन अथवा नुस्खे में बदल जाता है और उसे कोई रचनाकार अपने अंतर्बोध के आधार पर नहीं बल्कि सफलता और प्रसिद्धि के सुनिश्चित फार्मूले की वजह से लेखन के लिए चुनता है तो वह एक तरह का रूपवाद ही है। यहां यथार्थ अपनी समस्त त्वरा, गत्यात्मकता, संवेदन खोकर एक जड़ ढांचा बन जाता है। इस प्रकार का रचनाकर्म अपने स्थूल रूप में वैचारिक, प्रतिबद्ध और सारवान भले दिखे किन्तु अंततः वह घना बजने वाला थोथा चना ही होता है। लेकिन हम अपने को अभी उस तरह की फिल्मों और साहित्य तक ही सीमित रखना चाहेंगे जो कलात्मक ढांचे में व्यावसायिक अंतर्वस्तु प्रस्तुत करते हैं। या यूं कहें कि जहां कला और व्यावसायिकता के भेद को मिटाने का भ्रम रचते हुए सार्थकता की बेदखली की जाती है।
दरअसल भूमंडलीकरण के फलस्वरूप भारतीय मध्यवर्ग की अवस्थिति में काफी परिवर्तन हुआ है। एक ओर मध्यवर्ग के दायरे का विस्तार हुआ है तो दूसरी तरफ उसकी क्रयशक्ति में भी अभिवृद्धि स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। आर्थिक समृद्धि और तकनीकी विस्फोट ने हमारे इस मध्यवर्ग की कुलीनता, तर्कबुद्धि और सौन्दर्यात्मकता को उच्चतर बनाया है। अब उसका बड़ा तबका मन या बेमन जिससे भी हो, अपने को वैज्ञानिक समझ वाला और सुसंस्कृत दिखाना चाहता है, अतः उसका मनबहलाव पुरानी परिपाटी के मनोरंजन से नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस बात की पूरी गुंजायश बनती थी कि इस मध्यवर्ग की रुझान साहित्य, कला, सिनेमा के सार्थक तथा बेहतरीन रूपों की तरफ जाती। और कोई भी कला हो, उसकी सार्थक श्रेष्ठ अभिव्यक्ति अपने रसज्ञ को अंततः बाजार अथवा किसी भी प्रकार की निस्सार निरर्थक भौतिक चमकदमक की असलियत से दूर ले जायेगी। इस मोड़ पर वर्तमान आर्थिक युग की जो शक्तियां हैं उन्हें दोहरी समस्या से रूबरू होना पड़ सकता है। ;पद्धउसके उपभोक्ता वर्ग में कमी आ सकती है, ;पपद्ध उसी उपभोक्ता वर्ग से ऐसा समुदाय विकसित हो सकता है जो उसका विरोधी बन जाये। क्योंकि उच्चकोटि के सृजन शक्तिकेन्द्रों के सम्मुख मनुष्य के प्रतिरोध की संरचना का भी निर्माण करते हैं। अतएव पूंजी के सूत्राधारों के लिए यह जरूरी था कि वे कला के संसार में ऐसी मिथ्या निर्मितियां तैयार करें जो सच्ची कला, सार्थक विचार और मानवीय सरोकार न होकर इनकी मरीचिकाएं हों। दर्शक महसूस करें कि वे आला दर्जे का सिनेमा देख रहे हैं जबकि उस वक्त वे एक औसत दर्ज की फिल्म में डूब रहे हों। पाठक समझें कि वे बेहद गम्भीर साहित्य पढ़ रहे हैं जबकि मूलतः एक लुगदी किताब पर नजरें गिराये हुए हैं।
यह समय ही आभासी संसार का है। जैसा दिख रहा है वैसा है नहीं। कोई नेता आभास कराता है कि वह महान विचार जनता के सामने रख रहा है जबकि वह वाग्मिता का खेल रच रहा होता है। वह महात्मा गांधी का अनुकरण करता हुआ अपने को उनका वास्तविक अनुयायी घोषित कर रहा होता है जबकि वह महात्मा गांधी के आदर्शों और अवधारणाओं की विराटता पर राख गिरा रहा होता है। वह अहसास जगाता है कि वह कर्म के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है पर वास्तव में वह अपनी रणनीति के रास्ते पर आगे बढ़ रहा होता है।

एक सूचना देते हुए संकोच हो रहा है कि इस अंक से हम तद्भव के मूल्य में बढ़ोत्तरी करने के लिए विवश हो रहे हैं। कागज, छपाई, प्रेषण खर्च आदि की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण बिल्कुल न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ रहा है। फिलहाल हम यही आश्वासन दे सकते हैं कि अब कुछ वर्ष विशेषांकों तथा विशेष प्रस्तुतियों को छोड़ कर तद्भव इसी दर पर निकलती रहेगी। सदस्यों को असुविधा न हो इसलिए सदस्यता शुल्क चार अंकों के बजाय दो अंकों के लिए रखा जा रहा है।

प्रख्यात व्यक्तित्व यू.आर. अनंतमूर्ति, बिपिन चंद्र, नवारुण भट्टाचार्य, ज्योत्सना मिलन, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, तेज सिंह और प्रतिभाशाली युवा कवि समीक्षक रवि शंकर उपाध्याय हमारे बीच अब नहीं रहे, इन सभी के प्रति तद्भव की श्रद्धांजलि।

अखिलेश

 

 

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