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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

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शताब्दी
दिनकर
की काव्य चेतना : पुनर्मूल्यांकन खगेन्द्र ठाकुर

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित

लेख
माधवराव सप्रे का महत्व मैनेजर पांडेय

मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह

कहानियां
तमाशे
में डूबा हुआ देश असगर वजाहत

जिद्दी रेडियो पंकज मित्र

फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा

स्वीट होम उमा शंकर चौधरी

विशेष
सागू
मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
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अंक/17 जनवरी/08

स्वीट होम
उमा शंकर चौधरी

वह एक ऐसा घर था जहां उजियारा कभी खत्म नहीं होता था
उमाशंकर चौधरी युवतम लेखकों में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। कविता और कहानी दोनों ही विधाओं में समान महारथ के साथ सक्रिय हैं। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।

उस घर के पते में फलां विला, चिलां काटेज की तरह कहीं भी स्वीट होम नहीं था, और न ही मकान मालिक ने उस मकान के बाहर नेम प्लेट पर नम्बर के साथ ही स्वीट होम लिखवा रखा था। वह घर बाहर से देखने पर बिल्कुल सामान्य घर की तरह ही दिखता था और उसमें रहने वाले लोग भी लिलिपुट के निवासी की तरह बिल्कुल नहीं होकर सामान्य ही थे। लेकिन हमारे लिए वह घर असामान्य था और हम उस घर को ÷स्वीट होम' कहते थे। स्वीट होम इसलिए कि वह घर हमें एक ठंडक और सुकून देता था और हम उस घर से बाहर कहीं भी रहते, उस घर में लौट आने को बेताब होते थे। उस घर में पैर रखते ही हमारी सारी बेचैनी और सारा तनाव फुर्र से उड़ जाता था और हम एकदम से हलके हो जाते थे।
उस घर में ढाई फ्लोर थे। उसमें एक ग्राउंड फ्लोर था, एक फर्स्ट फ्लोर था और आधा सेकेण्ड फ्लोर था। सेकेण्ड फ्लोर जो आधा बना हुआ था उसकी छत आधी खाली थी और वहां गमले रखे हुए थे। जहां गमले रखे हुए थे वहां वह गर्मी के मौसम में शाम को हवा खाने और ठंड के मौसम में धूप सेंकने आती थी। हम उस खाली जगह को जन्नत कहते थे और वहां जाकर उसके अहसास को जीने की कोशिश करते थे। उस घर में ढाई फ्लोर थे, जिसके ग्राउंड फ्लोर में वह रहती थी यानि उसका पूरा परिवार यानि मकान मालिक रहते थे और ऊपर के डेढ़ फ्लोर में हम किरायेदार रहते थे। वह नीचे के फ्लोर में रहती थी और हम ऊपर के डेढ़ फ्लोर में रहते थे। वह नीचे के फ्लोर में रहती थी इसलिए हम ऊपर के डेढ़ फ्लोर में रहते थे।
उन दिनों हम छात्रा थे और सफलता असफलता के बीच पेण्डुलम की तरह झूल रहे थे। हम किराये के मकान में रहते थे और खूब पढ़ाई किया करते थे। हम जहां भी रहते थे तीन चार लड़के इकट्ठे रहते थे, जिससे कमरे के किराये और भोजन पर होने वाले खर्च पर बनिस्पत असर पड़ जाता था। हम तीन या चार लड़के एक साथ रहते तो थे पर यह जरूरी नहीं था कि वे लड़के हमेशा वही होते थे। हमारा साथ, हमेशा जब तक साथ होते तो बहुत ही मजबूत दिखता था फिर अचानक पता चलता कि तीन दिन के बाद उसे छोड़ कर जाना है।
लेकिन यह कहानी तब की है जब हम इकट्ठे लगभग दो साल से साथ रह रहे थे।
अपने पहले वाले मकान के छूटने के बाद जब हम अपना नया आशियाना ढूंढने निकले थे तब हम चार लड़के साथ थे। चार लड़के यानि चार छात्रा। वह मकान तीन ओर से खुला था और उसमें धूप सीधे बालकनी में आती थी। वह मकान सोफियाना था और सामने अमरूद का पेड़ था। अमरूद का पेड़ इतना घना था कि फर्स्ट फ्लोर और सेकेण्ड फ्लोर की बॉलकनी से हाथ बढ़ा कर उसे तोड़ा जा सकता था। उस अमरूद के पेड़ पर लगने वाले अमरूद के बीज लाल थे। उस पेड़ पर प्रायः एक ऐसा पक्षी आकर बैठता था जिसकी चोंच आगे की ओर नुकीली थी और जिसका रंग अजीब तरह से स्लेटी था। हमने इससे पहले ऐसा पक्षी नहीं देखा था। हम उस पक्षी का बॉलकनी में बैठ कर इंतजार करते थे। सामने की गली चौड़ी थी, जिसमें स्ट्रीट लाईट लगी हुई थी और जिसमें हम रहने के बाद रात की दूधिया रोशनी में बैडमिण्टन खेला करते थे। पहले वह बैडमिण्टन खेला करती थी फिर हमने खेलना शुरू किया था। बैडमिण्टन खेलते हुए वह एक परी जैसी लगती थी, ऐसे जैसे बैडमिण्टन की चिड़ी के पत्ते ही एक दिन उसके पंख हो जायेंगे और वह एक दिन दूर आसमान में उड़ जायेगी। वह प्रायः सफेद कपड़े पहनती थी। सफेद कमीज, सफेद सलवार और सफेद चुन्नी। उसके कपड़े का सफेद रंग उस चिड़ी से बहुत मिलता था और जब चिड़ी दूसरी ओर से हिट करने पर उसकी ओर बढ़ती थी तब एक सेकेण्ड को उसका रंग उस सफेद कपड़े में खो जाता था और वह हमारी आंखों से एकाएक बिल्कुल ओझल हो जाती थी। हम अमरूद के पेड़ के झुरमुट से उसे झांका करते थे। इस झांकने के क्रम में हम बहुत कुछ झांका करते थे और उस बहुत कुछ पर हम बहुत देर तक बातें किया करते थे। फिर हमने एक योजना के तहत बैडमिण्टन खेलना शुरू किया कि शायद वह हमारे साथ एक दिन खेलना शुरू कर दे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब हमने बैडमिण्टन खेलना शुरू किया था, तब उसने बैडमिण्टन खेलना बंद कर दिया था।
उस मकान से निकलते ही यदि बाये की ओर मुड़ जाया जाता तो वहां एक मार्केट थी लेकिन यदि सीधे चला जाता तो वहां एक बड़ा सा पार्क था। उस पार्क के बीच में छः हैलोजन का बड़ा सा सेट था, जो अपनी रोशनी से पूरे पार्क को ढंके हुए था। उस पार्क में ढेरों लोग सुबह सूरज की रोशनी में और शाम को हैलोजन की रोशनी में टहलने आया करते थे। हमारे लिये दोनों ही रोशनी और कहें कि वह पार्क उपयोगी नहीं थे, क्योंकि हममें से कोई भी पार्क में टहलने नहीं जाया करता थे। इसलिए जब हम उस मकान को देख रहे थे तब हमने उस पार्क की ओर ध्यान नहीं दिया था। मकान हमें पसंद आ गया था, इसलिए हमने उसे लेने का निर्णय ले लिया था। हमारे मकान मालिक की उम्र लगभग पचपन साल की थी। उसकी पर्सनॉलिटी एक सरकारी नौकरी करने वाले की थी और वे सरकारी नौकरी ही करते थे। उस समय वे कुर्ता पायजामा पहने हुए थे और दाढ़ी के साथ साथ उनकी मूंछ भी नहीं थी। उनकी पत्नी, जो उनके साथ खड़ी थी पति की तुलना में अधिक मोटी थी लेकिन देखने में बहुत सुंदर थीं। मकान मालिक काफी मजाकिया किस्म के थे और अपनी पत्नी को वे होम मिनिस्टर कहते थे। मकान का निर्णय करते वक्त जब हमने उनसे उनका टेलीफोन नं. मांगा था तब उन्होंने पहले यह कहा था कि सुबह नौ बजे के पहले और शाम को छः बजे के बाद ही वे फोन पर मिल पायेंगे। उन्होंने अपने नं. के साथ अपना नाम लिखवाया था- मि. फारूक इमाम नदीम तब अचानक हमारे पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी थी और उल्टे पांव हम, बहाना बना कर वापस भाग आये थे।
उस समय हम अक्सर खाना खाते समय देश की जिन विभिन्न समस्याओं पर बहस किया करते थे उनमें साम्प्रदायिकता एक बड़ा मुद्दा था। हम बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात दंगे, बेस्टबेकरी कांड पर खूब बातें करते थे और इसे स्वतंत्रा भारत का काला धब्बा कहते थे लेकिन पिछले एक दो दिनों में हम शांत थे और एक दूसरे से नजरें चुरा कर खाना खाते थे। हमारी सारी प्रगतिशीलता उस दिन हमारे पैरों की बेड़ियां बनने लगीं थीं। हममें से यदि कोई भी उस दिन अकेला होता तो उस मकान में दुबारा वापस नहीं जाता लेकिन उस दिन हमारे पास अपने को अधिक प्रगतिशील साबित करने का एक मौका था। हमने प्रगतिशीलता की होड़ में उस मकान में रहने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि जब हमने उस मकान में रहना शुरू किया था तो हम सभी को उस नल से आने वाले सप्लाई वाटर को पीने में भी दिक्कत होती थी और हमारी रसोई में लगे टाईल्स हमें थोड़े अलग अंदाज के लगते थे। शुरू में हमें उस मकान मालिक पर काफी शक होता था। जिस दिन भारत पाकिस्तान का मैच होता था तब हम इंडिया की इनिंग में चुपके से सीढ़ी पर आकर यह सुनने की कोशिश करने लगते कि कहीं वे सहवाग या सचिन के आउट होने पर तालियां तो नहीं बजा रहे हैं, या फिर पाकिस्तान की जीत पर कहीं उनके यहां सेवईं तो नहीं बनायी जा रही हैं। हम अक्सर मकान मालिक को या फिर उसके एकलौते बेटे को ऊपर घेर लेते और कहते ᄉ ÷÷लादेन का तो कुछ पता नहीं चल रहा अब तो लग रहा है मारा ही गया।'' हम कहते ᄉ ÷÷अमेरिका है लेकिन बड़ा ही कद्दावर''। हम थोड़े बचते हुए उनसे यह भी जानने की कोशिश करते कि बाबरी मस्जिद विध्वंस और हाल ही में हुए गुजरात दंगों में यह मोहल्ला कैसा था? हम इसकी टोह में रहते कि कहीं उस समय भी इस मकान में कोई हमारे जैसे ही किरायेदार हो, जिसका इन्होंने निपटारा कर दिया हो।
शुरू में हममें से हर कोई मकान मालिक को किराया देने जाने से बचना चाहता था कि कहीं वे कुछ खाने पीने को न कह दें। हम अक्सर नीचे सीढ़ी से ऊपर आते वक्त काफी जल्दी में होते कि कहीं पकौड़ी की एक प्लेट आगे बढ़ा कर वे लेने को न कह दें। हम सभी अपने मन को इस स्थिति का सामना करने के लिए रोज तैयार करते कि अगर ऐसी स्थिति आयी तो हम यह कह देंगे कि आज तो मंगलवार है, आज तो मैं नमक खाता ही नहीं। या फिर यह कि तेल की चीजें तो मुझे बिल्कुल ही मना हैं। हमने यह भी विचार लिया था कि अगर स्थिति बहुत ही भयानक हो जायेगी तब हम पकौड़े के टुकड़े लेकर एकदम से सीढ़ी पर चढ़ जायेंगे और फिर तो हम जानें और हमारी फ्लोर। लेकिन ऐसी नौबत नहीं आयी, शायद वे भी हमारी विकट स्थिति को समझते थे। लेकिन जब हम उस मकान में रहने लगे तब धीरे धीरे हमारे भीतर से ये फोबिया दूर होता चला गया और इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यह था कि हमें उसकी सुंदरता ने अपनी ओर एकबारगी आकर्षित कर लिया था और धीरे धीरे हम सभी उसके प्यार में डूबने लगे थे और कुछ दिनों के बाद स्थिति यह हो गयी थी कि किराया पहुंचाने हममें से कौन नहीं जायेगा, इस पर विचार होने लगा था।
उन दिनों जब हम मकान ढूंढने के लिए निकलते थे तब हमारे बीच एक मौन समझौता होता था कि हम ऐसे कमरे की तलाश करेंगे जिसमें कोई भी लड़की नहीं हो। मकान ढूंढते हुए हमारी सिक्स्थ सेंस काम करती थी और हम मकान देख कर उसके सामने खड़े होकर एक लम्बी सांस अंदर की ओर लेते थे और कह देते थे कि इसमें कोई कुंवारी कन्या है या नहीं? मकान को पहले स्तर पर देखने के लिए स्वीकार और इंकार करने का हमने एक कोड बना रखा था। अगर लम्बी सांस अंदर की ओर लेने के बाद हमें निर्णय धनात्मक लगता तब हम कहते ᄉ ÷हरियाली' और आगे बढ़ जाते। यानि वह घर कुंवारी लड़की से बाधित है। अगर हमारा निर्णय ऋणात्मक होता तब हम कहतेᄉ÷सूखा' और उस मकान को देखने के लिए उसकी घंटी बजा देते। यानि उस मकान में किसी कुंवारी लड़की की परछाई नहीं है। लेकिन इससे यह अर्थ कदापि नहीं निकलता था कि हम तब औसत लड़कों की तुलना में काफी शरीफ थे और हम लड़कियों की ओर आंख उठा कर नहीं देखते थे। वास्तव में हमारा ऐसा मानना था कि जिस भी मकान में लड़की होती है वह मकान मालिक ढेरों बंदिशों का बखान शुरू कर देता है। ज्यादा शोर नहीं करना है, ज्यादा मिलने वाले नहीं आयेंगे, सिगरेट और शराब नहीं, रात को देर से नहीं लौटना है आदि। हमारे साथ सबसे बड़ी दिक्कत थी कि तब हम सिगरेट के धुंए के छल्ले उड़ाने में दिक्कत महसूस करने लगते थे और उस घर में रहने के कारण उस लड़की को खुल कर देख भी नहीं पाते थे। ऐसे मौके पर हमारी नजर प्रायः पड़ोसियों पर होती और नैन मटक्का के लिए कम से कम बीस वर्ष पूर्व जाकर एक खूबसूरत लड़की पैदा करने के लिए अपने मन में हम उनसे गुजारिश करते थे। परंतु हमारी सिक्स्थ सेंस ने इस बार पूरी तरह हमें धोखा दे दिया था। उस मकान को पहली नजर में देखने से लेकर उसे लेने के निर्णय करने तक में हमें इसकी कोई निशानी नहीं मिल पायी थी कि उस घर में किसी लड़की का निवास था। जबकि हम सभी ने बारी बारी से उस घर के सामने लम्बी लम्बी सांसों को अंदर कर उस घर को पास किया था। यह अलग बात है कि जब हम उस घर में रहने लगे थे तब हमें उस घर में हमेशा ही ऐसे प्रमाण मिलने लगे थे जो साबित करते थे कि वहां वह रहती है। छत का वह आधा हिस्सा जहां ढेरों गमले थे और जहां खूशबू थी वहीं एक तार पर वह अपने कपड़े पसारती थी। वह कोई खुशकिस्मत दिन होता था जब वह रात में अपने सूखे कपड़े उठाना भूल जाती, तब हम उन कपड़ों को छूकर ढेरों कल्पनाएं करते थे। हम यह महसूस करने की कोशिश करते कि वहां उसका कौन सा अंग होगा और वह कितना मुलायम होगा। लेकिन हमारे लिये यह अच्छा था कि हमारे मकान मालिक को हम पर खूब विश्वास था। हमारे बीच की बौद्धिक बहसों को वे सुनते थे और धीरे धीरे उनके मन के भीतर यह विश्वास जगने लगा था कि हम वे हैं जो इस समाज को बदल देंगे। हमें एक अतिरिक्त तरह की छूट दे दी गयी थी। शायद उन्हें ऐसा लगने लगा था कि सिगरेट के धुंए के छल्ले उड़ाये बगैर भला क्रांति कैसे सम्भव है?
हम चार लड़कों के अतिरिक्त हमारे ऊपर के उस आधे बने फ्लोर में भी दो लड़के पहले से रहते थे, जिसमें एक लड़का लगभग हमारे साथ नया नया आया था। उसमें पुराना वाला लड़का काफी मोटा था और कसरत पर खूब ध्यान देता था। वह मोबाईल का आदी था और मोबाईल पर बहुत तेज आवाज में बातें किया करता था। बातें करते हुए वह प्रायः हंसता रहता था। उसकी हंसी में जीवंतता थी लेकिन फोन के उस तरफ के आदमी को उसकी हंसी के बीच से शब्दों को चुनना पड़ता था, कम से कम हमारा ऐसा मानना था। जो लड़का लगभग हमारे साथ नया नया आया था वह हम लोगों से लगभग तीन चार साल छोटा था और अभी अभी अपनी ग्रेजुएशन कम्पलीट करके आया था। वह देखने में बिल्कुल टाइटेनिक का हीरो लियाण्डो डीकॉपोरिया की तरह लगता था और हमने उसका नाम चॉकलेटी रख रखा था। उसके बाल बड़े थे और चेहरा खूब गोरा था। हममें से कोई भी अगर उसे अपने पास ज्यादा देर बैठा लेता था तब हम उसे यह कह कर चिढ़ाने लगते थे कि ÷बस यही अपराध मैं बार बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं'।
उस डेढ़ फ्लोर मिला कर हम जितने भी लड़के रहते थे सब सरकारी नौकरियों की तैयारी करते थे। कोई उसमें थोड़ी बड़ी नौकरी की तैयारी करता तो कोई थोड़ी छोटी। हम सभी लगभग मध्यवर्गीय परिवार से आते थे, और हमारे पैसे महीने की पच्चीस तारीख तक खत्म हो जाते थे। हम डाकिये का इंतजार करते थे और डाकिया लगभग दो तीन तारीख तक हम सभी के घर से आने वाले ड्राफ्ट को पहुंचा जाता था। पच्चीस के बाद के दिन हमारे लिए काफी तकलीफ भरे होते थे। उन दिनों हम खाना खाते वक्त काफी चिन्तित होते थे और कभी कभी हम जान बूझ कर किसी दोस्त, किसी जान पहचान वाले के यहां चले जाते थे और वहां तब तक बैठे रहते थे जब तक उनका खाना खाने का समय न हो जाय। हम वहां से तब उठने लगते थे जब खाना खाने के लिए वे तैयार हो रहे होते। अक्सर वे हमें तब पकड़ कर खाना खिला देते थे। लेकिन अगर वे तब भी इशारों में हमारी बात नहीं समझते तब हम कहतेᄉ÷÷हमने आपका काफी वक्त खराब किया, आप खाना खाइये, हमें तो अभी जाकर खाना बनाना भी है।'' तब उनका जवाब होताᄉ ÷÷अरे अब जाकर बनायेंगे, यहां तो बना हुआ है।'' और हमारे दिल की मुराद पूरी हो जाती। लेकिन कई बार कोई हमारा भी गुरु निकल जाता और वह कहताᄉ ÷÷अरे खिचड़ी बनाने में वक्त ही कितना लगता है।'' उन दिनों हमें सबसे अधिक चिन्ता सिगरेट की होती। हमारा सिगरेट पीना तब काफी कम हो जाता और हम तब आपस में यह कहने लगते थे कि सिगरेट पीने से पत्नी के होंठों को किस करने में उसके होंठों को वह कोमलता नहीं मिल पायेगी, जिसकी वह हकदार है। इस तरह भविष्य में पत्नी के होंठों को उचित न्याय दिलाने के लिए सिगरेट से अपने को तब बचाते थे। लेकिन ज्योंही हमारा ड्राफ्ट हमारे एकाउंट में कैश हो जाता था और हमारे हाथ में पैसे आ जाते थे, हमारा न्यायतंत्रा गड़बड़ा जाता और हम फिर से उसी तरह सिगरेट पीने लग जाते थे।
हम उन दिनों सबसे अधिक बचते थे अपने अपने घर जाने से। हमें अपने घर वालों का लम्बा लम्बा लेक्चर काफी थकाऊ लगता था और उससे भी ज्यादा उन लोगों के ताने जो हमारे गांव के बड़े बुजुर्ग थे। जिन्दगी से हमारी अपेक्षाएं बहुत बड़ी नहीं थी लेकिन गांव में हमें हमेशा यह सुनने को मिलता कि वहां किस किस लड़के ने कितनी आसानी से सफलता पा ली है। उसका बेटा तो दिल्ली गया भी नहीं यहीं शहर में रह कर क्लर्क बन गया। उसके तो अच्छे संस्कार बचपन से ही दिख रहे थे देखो आज मास्टर बन गया और कैसा बढ़िया अपना घर चला रहा है। कोई वहां अपनी परचून की दुकान खोल कर सुखी था कोई वहां अपना टेंट हाऊस ÷झंकार लाइट एंड टेण्ट हाउस' खोल कर सबकी शादियां करवा रहा था और तो और सबसे बड़ी बात यह थी कि हमारे गांव से मात्रा दो किलोमीटर दूर शहर में सहारा या एलआईसी के दफ्तर में एजेण्ट बन कर लोगों को पकड़ने के लिए अजीब तरह का चूतियापा करने वाले लड़के भी गांव वालों की नजर में हमसे बढ़िया और ऊपर थे। तब अक्सर हमें यह लगने लगता था कि इस दुनिया के सबसे बड़े निकम्मे हम ही हैं और सबसे बड़े चुगद भी, जो लगे हुए हैं अपनी कलम को घिसर घिसर करने में। हमें तब अपने घर वालों की बातों का उतना बुरा नहीं लगता था। हम सोचते थे, वे पैसे देते हैं तो इतना तो हक बनता ही है उनका। लेकिन जिन्होंने हमें फुटबॉल समझ रखा था, वे थे हमारे गांव के वे बड़े बुजुर्ग जो हमारी बेरोजगारी का तब रस लेते थे। हम सभी के पास तब कुछ न कुछ इसका अनुभव था और सुनाने के लिए एक से एक वाकया। जब कभी हम साथ बैठते और इस तरह की बातें खुल कर सामने आने लगतीं तब हमारे संस्मरण तरल हो जाते और एक के बाद एक बहने लगते। इस संदर्भ में जो दो बातें मजेदार थीं वे ये हैं। पहली, हममें से ही कोई एक लड़का जब अपने घर गया तब वहां लोगों ने उसे अपने पास बुला कर बैठा कर यह जानना चाहा कि, सुनने में आया है कि वह दिल्ली में फिल्में बहुत देखता है, तो क्या यह खबर सही है। उसने आव देखा न ताव एकदम से गुस्से में आकर कह दिया थाᄉ ÷÷देख चाचा, सिनेमा बनाने वाले करोड़ों रुपये खर्च कर फिल्में बनाते हैं, लाखों खर्च कर सिनेमा हॉल के मालिक सिनेमा हॉल बनवाते हैं। पैसा मेरा बाप भेजता है, समय मेरा अपना है, फिर तेरी क्यों फटती है।'' इस संदर्भ में दूसरा वाकया था एक लड़का जो भोजपुरी इलाके का रहने वाला था जब अपने घर गया तब किसी एक दिन जब वह सूट बूट पहन टहलने को निकला तब दरवाजे पर से आवाज देकर उसे बुलाया गया था जहां गांव के कई बूढ़े और खेती करने वाले जवान बीड़ी पीने के साथ दिन भर ताश खेलते रहते थे। उनमें से जो सबसे अधिक बुजुर्ग थे उन्होंने उसे अपने पास बैठाया और बहुत ही प्यार से हाल समाचार पूछा। ताश तत्काल बंद था, लोगों की उत्सुकता के केन्द्र में वह लड़का था और उसकी बेकारी। उस बूढ़े ने फिर धीरे से वह सवाल दागा, जिसका उसे अंदेशा था, ÷÷बेटा वहां का करा ला?'' वह थोड़ी देर शांत रहा और लोग ताश से अधिक रस उस समय उसके चेहरे पर उड़ने वाली हवाइयों का लेते रहे। लेकिन उसने इस मजे को ज्यादा देर तक बरकरार रहने नहीं दिया, जब सब शांत थे, तब एक मिनट तक रुक कर उसने एकबारगी कहाᄉ÷झांट उखाड़ा ला।''
हम जिस मोहल्ले में तब रहते थे, या यूं भी कहा जा सकता है कि जिस मोहल्ले का जिक्र मैं यहां कर रहा हूं वह दिल्ली के उत्तर पूर्वी एरिया में बसा मुखर्जी नगर है। मुखर्जी नगर यानि जहां जाने के लिए मात्रा एक दो ही सीधी बस थी। या फिर किसी भी बस से किंग्सवे कैम्प जाकर वहां से ऑटो रिक्शा से वहां जाया जा सकता है। हम जहां रहते थे, वहां से मात्रा आधा किलोमीटर की दूरी पर बत्राा सिनेमा हॉल था, जहां रोज शाम को 6 बजे हम पहुंच जाते थे। हमारा यह लगभग रोज का काम था कि उसके कैम्पस में बनी रेलिंग पर तब तक बैठ कर सिगरेट फूंकते रहते थे जब तक कि भीड़ इवनिंग शो के लिए घुस नहीं जाती थी। हम उस भीड़ में उन लड़कियों को ढूंढ निकालते थे जिसने जींस के साथ टॉप पहन रखा हो, और फिर लगभग उस आधे घंटे तक उस जींस और टॉप के बीच में बार बार बनने वाले खाली जगह को हम अपनी आंखों से मापा करते थे। भीड़ उधर हॉल के भीतर घुसती और इधर हम हॉल के कैम्पस से बाहर आ जाते थे।
हमारी जिन्दगी तब तक फंसी हुई जिन्दगी थी। हमारी जिन्दगी के सारे सुख तब अटके हुए थे महज एक रिजल्ट पर। हमारे मन में भीतर ढेरों ख्वाब पल रहे थे लेकिन हमेशा यह लगता कि एक बार नौकरी तो हो जाए। चूंकि हमारी जिन्दगी तब तक फंसी हुई जिन्दगी थी इसलिए तब हमारे पास ढेरों दबे हुए ख्वाब थे। जिसे हमने नौकरी के तुरंत बाद के लिए रख छोड़ा था। हमारे ख्वाब तब अजीब अजीब तरह के थे। आज यह सोच कर आश्चर्य होता है कि हममें से किसी एक का ख्वाब तब यह भी था कि नौकरी का रिजल्ट देखते ही वह दिल्ली के टूर पर निकल जायेगा। आश्चर्य इस बात में नही था कि उसके ख्वाब में दिल्ली का टूर था। आश्चर्य इसमें था कि वह दिल्ली का टूर बैलगाड़ी से करना चाहता था। वह कहताᄉ ÷÷साली नौकरी तो हो जाए फिर देखना मैंने तो बैलगाड़ी वालों से बात कर रखी है। पीछे गद्देदार बिछावन रहेगा और कान में ईयर फोन, पूरे एक सप्ताह तक घूमता रहूंगा। एक दिन तो सिर्फ इण्डिया गेट के किनारे बैलगाड़ी लगा कर रखूंगा और यह देखूंगा कि साले इतने लोग वहां क्या देखने आते हैं?'' अपने आप में यह भी आश्चर्य था कि जब कभी उसे गाजियाबाद की तरफ जाने का मौका मिला था उसने बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी वाले से बात भी कर ली थी। उसने कई बार पुलिस वालों से भी पूछा था कि बैलगाड़ी से दिल्ली में घूमने में कोई पाबंदी तो नहीं है। बत्राा सिनेमा हॉल पर लड़कियों के जींस और टॉप के बीच की दूरी को मापते हुए हम अक्सर कहतेᄉ ÷÷नौकरी के बाद या तो जी.बी. रोड जाऊंगा या फिर मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्थान, लेकिन एक दिन ढेर सारे पैसे देकर उसके साथ बंद कमरे में अकेला रहूंगा।'' हमने इस समस्या का भी इलाज ढूंढ़ लिया था कि यह जरूरी थोड़े ही है कि उस दिन उसने जींस पहन ही रखी हो। हम कहते जींस और टॉप हम साथ में ले जायेंगे और उसे पहना कर हम सिर्फ उस गैप को जी भर कर देखने की कोशिश करेंगे, बस और कुछ नहीं।
लेकिन हमारी जिन्दगी के वे बेचैनी भरे दिन थे। सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही थीं, और हमारी उम्र लगातार बढ़ती जा रही थी। कई ऐसी परीक्षाएं थीं जिसकी उम्र की ऊपरी सीमा हमने पार कर ली थी और बहुत सी परीक्षाएं ऐसी थीं जिसकी उम्र की ऊपरी सीमा को छूने में हमें महज एक दो वर्ष और बचे थे। ऐसा नहीं था कि हम एक खराब छात्रा थे। हम उन दिनों लगातार किसी की प्रारम्भिक परीक्षा तो किसी की लिखित परीक्षा पास कर रहे थे। हमारे लिए उन दिनों सबसे महत्वपूर्ण दिन रविवार का होता जब हमारा अखबार वाला अखबार के साथ ÷रोजगार समाचार' फेंक जाता। लगभग हर सप्ताह हममें से किसी न किसी का रिजल्ट आ ही जाता। कभी हम किसी प्रारम्भिक परीक्षा में तो कभी लिखित परीक्षा में सफल हो जाते तो कभी असफल। लेकिन हमारे लिए पूर्ण सफलता तब कोसों दूर थी। उन दिनों हमने टाइम्स ऑफ इंडिया या हिन्दुस्तान टाइम्स में आने वाले सिचुएशन वेकेण्ट और क्लासीफाइड के कॉलम को कई बार देखने की कोशिश की थी लेकिन वे हमारे लिए निरर्थक थे। हमने उन दिनों कॉल सेण्टर और कम्प्यूटर की दुनिया में लाखों नौकरियों के बारे में सुना था। लेकिन हम उसके लिए बिल्कुल ही अनफिट थे। हम तब यह सुन कर आश्चर्य करते थे कि अमेरिका, आस्टे्रलिया या जर्मनी में अगर आपको पिज्जा भी मंगवाना हो तो आप जब दुकान को फोन करेंगे तब वह फोन पहले दिल्ली आयेगा और दिल्ली के कॉल सेण्टर में बैठा वह 15000 रुपये कमाने वाला भारतीय युवक उसके पिज्जे का ऑर्डर उस दुकानदार को देगा। या फिर मेलबॉर्न में बैठी किसी महिला की वाशिंग मशीन ऐन उस वक्त खराब हो जाए जब वह पति की शर्ट पर से लिपिस्टिक के दाग को मिटा रही होगी तब उसे ठीक करने के लिए भारतीय युवक वाशिंग मशीन की कम्पनी को यहां से फोन करेगा। हम जिस मोहल्ले में रहते थे वहां हमारे आसपास ऐसे कई स्थानीय निवासी थे जिनके बेटे बेटियां कॉल सेण्टर और कम्प्यूटर की नौकरी करते थे और पंद्रह बीस हजार आसानी से कमाते थे। लेकिन चूंकि हम एक मध्यवर्गीय और ग्रामीण परिवार से आते थे और हमारी प्रारम्भिक पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल में हुई थी इसलिए हमारी अंगे्रजी काफी कमजोर थी। हम तब घर और गांव के दबाव, पिता की महत्वकांक्षा के दबाव, अपनी जिन्दगी को स्थिर करने के दबाव में थे और तब सरकारी नौकरियां कम हो गयी थीं, हमारी उम्र इन परीक्षाओं के लिए लगभग खत्म हो रही थी, हमारी अंगे्रजी कमजोर थी और हम इन निजी नौकरियों के लिए बिल्कुल ही बेकार थे, इसलिए वे दिन हमारे लिए काफी तकलीफ भरे और बेचैनी लिए हुए थे और ऐसे ही बेचैनी भरी हमारी जिन्दगी में उसका प्रवेश हुआ और हम उसके प्यार में, उसे देखने में अपने सारे गम को भूल जाते थे।
हमारी जिन्दगी में वह रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप में बारिश की फुहार थी, डोसा के गर्म तवे पर पानी की छन्न सी आवाज थी। वह हमारी जिन्दगी थी।
वह जो हमारी जिन्दगी में बारिश की फुहार की तरह थी, उसका नाम आतिया था। आतिया नदीम। उसकी उम्र लगभग 21-22 के करीब थी। वह देखने में बहुत सुंदर थी और उसका चेहरा बिल्कुल गोल था। वह बहुत पतली नहीं थी, और ज्यादा मोटी भी नहीं। उसे शायद कुर्ता सलवार ही पंसद था, क्योंकि वह जींस नहीं पहनती थी। वह अपनी कमीज के ऊपर प्रायः चुन्नी को बिल्कुल फैला कर चारों ओर घुमा कर रखती थी और पीछे चुन्नी के ऊपर उसके बाल एक जूड़े में गुंथे हुए रहते थे। उसके बालों की दो लटें आगे की ओर घुंघराली थीं जो उसके मुंह पर ही रहती थीं। वह अपनी गे्रजुएशन खत्म कर चुकी थी और इस वक्त इग्नू से एमसीए कर रही थी। उसकी आवाज बहुत मीठी थी। वह घर का काम खुद ही करती थी और घर की सफाई करते समय वह हल्के हल्के गुनगुनाती भी थी। उसकी आवाज हमें कविता कृष्णमूर्ति की तरह लगती थी और जब वह गुनगुनाती, तो हम सभी अक्सर चुप हो जाते थे और उसके गाने को सुनने लगते थे। हमें हमेशा ऐसा लगता था कि अगर कभी वह एफएम रेडियो पर नौकरी की कोशिश करती तो उसका चुनाव पक्का था। वह हमारी उन तकलीफ, बेचैनी और अनिश्चितता के दिनों की सबसे बड़ी राहत थी। हम बड़े से बड़े गम को उसे देख कर भूल जाते थे और मन में यह सोचते थे कि ईश्वर जरूर कुछ न कुछ अच्छा करेंगे। अगर जिन्दगी को बुरा ही करना होता तो इतने लड़कों के बदले इतनी अच्छी लड़की के इतने नजदीक रहने का अवसर हमें ही क्यों मिलता? वह हमारे मन में विश्वास की तरह थी।
उस डेढ़ फ्लोर में हम जो छः लड़के रहते थे उनमें से पांच लड़के उसको प्यार करते थे। जो लड़का ऊपर के फ्लोर में हमारे आने के बाद आया था और जिसे हम टाइटेनिक का हीरो लियाण्डो डिकापोरिया कहते थे, वह उम्र में हम लोगों से चार पांच वर्ष छोटा था और हम लोगों को भैया कहता था। हम लोग उससे जूनियर की तरह व्यवहार करते थे और उसे प्यार व्यार के चक्कर में नहीं पड़ने देते थे। एक दूसरा कारण यह था कि वह अमीर घर से था और उसके नाम का हर महीने ड्राफ्ट नहीं आता था। उसने अपने पास आईसीआईसीआई बैंक का एटीएम कार्ड रख रखा था और उसके पिता उसमें वहीं से ढेरों पैसे जमा कर देते थे। वह सिगरेट नहीं पीता था इसलिए, हमें ठीकठाक यह भी नहीं पता चल पाता था कि कभी उसकी जेब में पूर्ण रूप से पैसे खत्म हुए हैं या नहीं। उसका मोबाइल फोल्डर वाला था जो हमें तब अत्याधुनिक लगता था। उसने कुछ दिनों के बाद एक कैमरा वाला मोबाइल खरीद लिया था, जो तब बिल्कुल नया नया आया था और जिसमें उसने हम सभी का फोटो खींच कर रख रखा था। उसकी अमीरी भी एक कारण था जिससे हम लोग उससे थोड़ा दूर दूर रहते थे। टाइटेनिक के उस हीरो के अलावा जो हम पांच लड़के थे सब समान रूप से अपने अपने अंदाज से आतिया के प्यार में डूबे हुए थे।
हम सभी उससे बात करना चाहते थे उसकी तारीफ करना चाहते थे, उसे देखना चाहते थे। आतिया को लेकर हम सभी लड़के आपस में खूब बातें किया करते थे लेकिन हमारे भीतर इस संदर्भ को लेकर जलन भी बहुत थी। आतिया को लेकर हम लोग एक दूसरे से इतने डरे हुए रहते थे कि किसी भी दिन वह किसी भी एक लड़के से बात कर लेती थी तब हमें लगता था कि अब तो वह उसकी ही हो जायेगी। उसका हमारे जीवन में इतना महत्व था कि यदि वह हमसे कोई किताब लेकर पढ़ती थी तब उसके लौटाने पर हम उस किताब को बहुत ही बारीकी से पलटते थे और यह ढूंढने की कोशिश करते थे कि कहीं उसने अपने दिल की बात किताब की उन पंक्तियों के बहाने उसे रंग कर या उसे अंडरलाइन करके न कह दी हो। जब हम खूब अच्छी तरह आरपार किताब को पलट लेते तो कई कई दिनों तक उसे फिर पलटते तक नहीं थे कि उसके हाथों का स्पर्श उससे कहीं खत्म न हो जाय। हम रोज सुबह उठ कर अपने अपने मन में उसके नजदीक जाने, उसे अपनी ओर आकर्षित करने और उसके दिल में उतर जाने का झन्नाटेदार प्लान बनाते और रोज रात में उसकी यादों, अपनी असफलता, और उम्मीद की किरण के साथ सो जाते।
कुछ महीनों की इस आपाधापी के बाद हम पांचों लड़कों ने आपस में यह समझौता सा कर लिया था कि उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश तो हम सभी करेंगे लेकिन यदि वह किसी एक को कुछ भी ग्रीन सिग्नल देने लगेगी तब हम बाकी अपने दिल पर पत्थर रख कर उसे आगे बढ़ने का मौका देंगे। इस निर्णय के पीछे यह कटु यथार्थ था कि आखिरकार वह लड़की प्यार तो एक को ही कर सकती है। इस कठोर निर्णय के उपरांत हमारे बीच की प्रतियोगिता काफी कड़ी हो गयी थी। हम सभी अपने अपने ढंग से अपनी अपनी विशेषताओं को खोल कर उसके सामने रखना चाहते थे। हम तब स्मार्ट लगने की खूब कोशिश करते थे और सीढ़ी पर उसकी पदचाप को सुनते ही अपने मुंह से सिगरेट को एक बारगी फेंक देते थे। लेकिन इस मद में आगे बढ़ाᄉ कोलम्बस। उसने यह घोषित कर दिया कि आतिया ने उसे ग्रीन सिग्नल दे दिया है।
उसका नाम जय प्रकाश था, लेकिन हम उसे कोलम्बस कहते थे। वह खोजी प्रवृत्ति का था और आतिया के संदर्भ में जितने भी प्रकार के शोध थे उसने ही किये थे। आतिया का जन्मदिन कब है? वह क्या कोर्स कर रही है? उसे क्या खाना पसंद है? उसके फेवरेट हीरो हीरोइन कौन हैं? और यहां तक कि उसके पास अंडरमारमेण्ट्स के कितने जोड़े हैं और किस किस रंग के हैं? आदि। चूंकि वह खोजी प्रवृत्ति का था तो यही एक बड़ा कारण भी बना उसके इस प्यार में आगे बढ़ने का। हम सभी की तुलना में उसको इसकी जानकारी अधिक होती कि आतिया आज कब ऊपर चढ़ेगी, कब वह पौधों में पानी डालेगी, और कब वह सूखे कपड़े उतारने आयेगी, हम जब अपने अपने कमरे में अपनी अपनी किताबों से सर टकरा रहे होते थे तब वह सिगरेट पीने का बहाना कर या मूड फ्रेश करने के बहाने से बाहर निकलता और फिर थोड़ी देर बाद बातें करने की आवाजें आने लगतीं। हमारा मानना था कि चूंकि उसे मौके अधिक मिले इसलिए उसने इस मैदान को जीत लिया था।
हमारे बीच हुए समझौते के मुताबिक हम सभी ने अपने कलेजे पर पत्थर रख उसे बढ़ जाने दिया और उसके बाद शुरू हुआ उसके प्यार का सिलसिला।
चूंकि हमने कोलम्बस को आगे बढ़ जाने दिया था इसलिए तब हम सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी बन गये थे। वह जब ऊपर छत पर गमलों के बीच फूल की खुशबू ले रहा होता और तभी वह वहां आती तो वह कहता, उसे मालूम था कि मैं यहां इस खुशबू के बीच हूं। वह कहता कि उसे पीला रंग पसंद है इसलिए वह अब प्रायः पीले रंग का ही कुर्ता पहनती है। हम लोग अगर कभी बाहर रहते और वह गली में रहती तो वह कहता कि वह जानबूझ कर मुझे सुनाने के लिए ऊंची आवाज में बात कर रही है। वह उन बातों में अपने संदर्भ से जुड़ी बातें भी निकाल लेता था और हमें यह साबित कर देता था कि वह उससे बेइंतिहा मोहब्बत करती है। उनके बीच आपस में खामोश झड़प भी होती थी और वे एक दूसरे से गुस्सा कर रूठ भी जाते थे। यह हम सभी ने देखा था कि एक दिन जब आतिया सीढ़ी से ऊपर आ रही थी तब सीढ़ी के ठीक सीधे में पड़ने वाले रसोईघर के दरवाजे को धड़ाम से कोलम्बस ने इसलिए बंद कर दिया था कि वह उससे तब रूठा हुआ था।
हमने कोलम्बस की इस बेइंतिहा मोहब्बत का तब खूब मजा भी लिया था। हम उससे कह देते थे कि आजकल वह तुमसे सीधे सीधे आंखें नहीं मिला पा रही है यह तभी होता है जब वह प्यार में गहरे डूबी हुई हो। एक बार जब आतिया सूखे हुए कपड़ों को छत पर से लेकर फ्लोर से होते हुए नीचे जा रही थी तब उसके उन कपड़ों के ढेर से एक चुन्नी गिर गयी थी तब हमने कोलम्बस को यह कह दिया था कि ऐसा आज तक क्यों नहीं हुआ? यह तुम्हारे प्यार को दी गयी हरी झंडी हैं और यह महज संयोग था कि उस चुन्नी का रंग भी कजली हरा था। कोलम्बस के खोजी मस्तिष्क ने तब यह बता दिया था कि उसकी यह चुन्नी बहुत पुरानी नहीं है और यह सम्भव है कि उसने इस चुन्नी का सिर्फ इसलिए उपयोग करना शुरू कर दिया हो कि एक दिन उसका इस्तेमाल इस तरह हरी झंडी के रूप में किया जा सके। हमने एक दिन उस सीढ़ी के दरवाजे से चिपके पोस्टर पर, जिससे होकर वह ऊपर आती थी, रात में छुप कर कोलम्बस का नाम लिख दिया थाᄉ ÷मेरे जय प्रकाश'। और वह इतना बौरा गया था कि उसने पूरी रात बॉलकनी में टहलते ही बिता दी, सिर्फ छोटी गोल्ड फ्लैक के पैकेट के साथ।
हमें इसका अंदाजा तो धीरे धीरे होने लगा था कि कोलम्बस और आतिया के बीच का प्यार एकतरफा है लेकिन इसे साबित होने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगा। सर्दी की वह रात थी जब रात के 8:30 बजे कोलम्बस बिल्कुल थर थर कांपता हुआ हमारे पास आया था और यह बताया था कि ÷अब पिटने के लिए तैयार हो जाइए।'
बात यह हुई थी कि जब कोलम्बस ने उस हरी चुन्नी को हरी झंडी समझ लिया था और सीढ़ी पर के पोस्टर पर लिखे अपने नाम को प्यार का दस्तावेज, तब उसने अब सामने और बिल्कुल स्पष्ट रूप से आने का मूड बना लिया था। उसने यह समझ लिया था कि प्यार के इस भंवर में उसकी नैया गुड़ गुड़ गोते खा रही है और अब उसे खुद ही इसे पार लगाना है। फिर कोलम्बस के खोजी मस्तिष्क ने यह पता किया कि आज रात के आठ बजे आतिया अपनी पड़ोस की सहेली के साथ मोहल्ले के बाजार में निकलेगी नये वर्ष के कार्ड खरीदने। उसने अपने प्यार के इजहार के लिए इसे भी एक इशारा समझा और इसे एक उचित और उपयुक्त स्थान भी। जब तक आतिया ÷मिनी शॉपी' नामक गिफ्ट की उस दुकान में आर्चिज के कार्ड की पंक्तियों में अपने विचार मिलाने की कोशिश करती रही कोलम्बस ठीक उस दुकान के सामने सड़क के इस तरफ जैकेट की जेब में हाथ डाले आसमान के तारे गिनता रहा। ज्यों ही आतिया आर्चीज कार्ड और अपनी सहेली के साथ बाहर आयी कोलम्बस कुछ दूर तक उसके पीछे पीछे और उसके बाद उसके साथ हो लिया। कोलम्बस को अपने साथ देख अचानक आतिया रुक गयी। कोलम्बस ने हिम्मत जुटा कर कहाᄉ ÷÷मुझे आपसे अकेले में कुछ कहना है।'' आतिया ने उसकी आंखों और उसकी जबान की लड़खड़ाहट को पकड़ लिया। आतिया ने एकबारगी बोल दियाᄉ ÷आप गलत सोच रहे हैं, मैं किसी और से इश्क करती हूं।''
हमें यह पूरा विश्वास था कि आतिया इस बात की शिकायत अपने पिता और भाई से अवश्य करेगी, और हम जवाबतलब के लिए अवश्य बुलाए जायेंगे। जब कोलम्बस जैकेट के भीतर थर थर कांपता हुआ हमारे पास यह संदेश देने पहुंचा था कि ÷अब पिटने के लिए तैयार हो जाइये' तब उसकी आवाज में डर के साथ साथ प्यार में चोट खाये हुए दिल का आर्तनाद भी रहा होगा। लेकिन सच यह है कि उस समय हम इतने डर गये थे कि हमारे सामने सिर्फ एक ही सवाल था कि अब क्या होगा? हम सभी के ऊपर तब खौफ के काले बादल मंडरा रहे थे और हम सभी तब कोलम्बस को हिकारत की निगाह से देख रहे थे। हमें तब यह भी लग रहा था कि हमें जब बहुत हद तक मालूम चल गया था तब इसे हमें रोक लेना चाहिए था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, आतिया ने शायद घर में कुछ भी नहीं बताया और हम बाल बाल बच गये। जब हम बाल बाल बच गये और इस मुद्दे को दो तीन दिन गुजर गये तब हमारे भीतर खुशी की एक लहर भी दौड़ गयी थी कि चलो वह कोलम्बस की तो नहीं हुई। लेकिन फिर याद आया कि वह खाली भी तो नहीं है। कोलम्बस के द्वारा सुनायी गयी घटना में आतिया के द्वारा कही गयी इस पंक्ति का खास महत्व था कि ÷मैं किसी और से इश्क करती हूं।' हमारे लिए यह सवाल बहुत बड़ा सवाल था कि यह ÷कोई और' कौन है?
कहानी में जिस तरह अभी तक पाठक कोलम्बस और आतिया को लैला मंजनू और शीरीं फरहाद समझ कर उनके दास्ताने मोहब्बत में उलझे रहे और उस ओर ध्यान नहीं दे पाये कि आखिर वह छठा लड़का टाइटेनिक का हीरो इस बीच क्या कर रहा था, उसी तरह हम भी कोलम्बस और आतिया के प्यार में गहरे डूबे हुए उस ओर ध्यान नही दे पाये थे। सभी लोगों के दिमाग को उलझा देख इस समय का इस्तेमाल उसने बहुत अच्छा किया था और ठीक पाठक की तरह हम भी तब यह जान कर चौंक गये थे कि आतिया का यह कोई और कोई और नहीं लियाण्डो डिकापोरिया था, जिससे वह इश्क करने लगी थी।
लियाण्डो डिकापोरिया, जो हममें सबसे जूनियर था, और जिसके पास कैमरा वाला मोबाइल था और जिसे हमने इस योग्य कभी नहीं समझा था कि वह भी कभी इस प्रेम प्रकरण के लायक है, उसकी उम्र लगभग बाइस वर्ष के करीब ही थी। वह या तो आतिया के बराबर का ही होगा या फिर वह आतिया से दो चार छह महीने छोटा भी हो सकता था। उसका नाम आशीष था। वह देखने में खूबसूरत था और खूब बनठन कर रहता था। उसके पास खुद के सजने के लिए ढेरों परफ्यूम, आफ्टर शेव, डियोडरेण्ट और जेल थे। वह महंगे कपड़े पहनता था और रोज शेविंग करता था। वह हमसे इस मद में अलग था कि हम घर से बाहर, मोहल्ले के भीतर कुछ भी पहने निकल जाते थे, लेकिन वह उस घर से कदम तभी बाहर निकालता था जब वह पूरी तरह तैयार हो जाता था। उसकी आंखें हल्की भूरी थीं और जब वह हंसता था तब ऐसा लगता था जैसे वह क्लोज अप का विज्ञापन कर रहा हो।
कोलम्बस ने जब यह घोषित कर दिया था कि आतिया ने उसे ग्रीन सिग्नल दे दिया है तब से उसे यह पता चलने तक कि वह किसी और से इश्क करती है, के बीच लगभग चार महीने लगे। यह वह समय था जब हम शुरुआती दिनों में इस सदमे में रहे कि आतिया अब हमारी नहीं रही और फिर बाद के दिनों में हम इसकी टोह लेते रहे कि अगर आतिया, कोलम्बस की लैला है तो वह उसे किस तरह प्यार करती है। वास्तव में उन दिनों जब आतिया हमारी फ्लोर से होते हुए छत पर जाती थी, और जिसे कोलम्बस यह साबित करता था कि वह बार बार छत पर इसलिए आती है कि वह उसे प्यार करती है, तब वास्तव में वह छत पर आशीष से मिलने जाती थी। जब आतिया के समय को मालूम कर कोलम्बस पढ़ाई छोड़ सिगरेट का बहाना कर बाहर निकल आता था और आतिया से वह दो मिनट बात कर लेता था तब वास्तव में आतिया ऊपर के फ्लोर पर आशीष से मिलने जा रही होती थी। आशीष जिस ऊपर वाले फ्लोर पर रहता था उस पर सिर्फ एक ही कमरा बना हुआ था और उसके सामने खाली जगह में गमले रखे हुए थे। तब आशीष उन गमलों और खुशबू के बीच आतिया से ढेरों बातें किया करता था और अपने मोबाइल से उन फूलों के बीच उसकी तस्वीर कैद किया करता था।
जब कोलम्बस ने यह बता दिया था कि आतिया की जिन्दगी में कोई और है तब हमारा ध्यान कोलम्बस की ओर से हट गया था और हम आतिया को लेकर काफी चौकन्ने हो गये थे। हमारे दिमाग में तब जो पहली बात आयी थी वह यह कि वह इस घर से बाहर किसी और को प्यार करने लगी है। हमें कुछ दिनों तक यह लगता रहा कि वह इंस्टीट्यूट से देर से इसलिए लौटती है कि वहां उसका ब्यॉयफ्रैण्ड है। हम रोज उसके लौटने पर यह अंदाजा लगाते थे कि ÷साली आज तो पक्का लोदी गार्डन या पुराना किला गयी होगी।' उसके लौटते हुए कपड़े की बेतरतीबियत को देख कर हम यह कहते कि ÷आज तो लग रहा है कि खेल हो गया है।' लेकिन दस पंदह दिनों के भीतर हमारा यह भ्रम भी जाता रहा था और उसके छत पर जाने की फ्रिक्वेंसी और वहां घंटों आशीष से कर रही बातचीत ने हमारे मन में शक पैदा कर दिया था और फिर धीरे धीरे यह शक यकीन में बदल गया कि यह ÷कोई और' कोई नहीं बल्कि टाइटेनिक का लियाण्डो डिकापोरिया यानि आशीष ही है। हमने आशीष को बुला कर जब इस चक्कर के बारे में पूछा तब उसने साफ कहा था कि ÷वह आप लोगों की भावज है।'
हमें जब यह निश्चित हो गया कि हमारे लिए आतिया की कहानी का पटाक्षेप हो चुका है, आतिया का अपना मनपंसद साथी मिल चुका है तब हमने अपने आप को पीछे हटा लिया था। हमारी आंखों के सामने उसका प्यार परवान चढ़ रहा था, और हम सिर्फ उसे महसूस कर रहे थे।
आशीष चूंकि मुझसे अतिरिक्त स्नेह रखता था और मुझ पर अधिक विश्वास करता था इसलिए तब इस कहानी में आतिया आशीष के अतिरक्ति मैं ही बचा रह गया था। आशीष को भी तब एक आदमी चाहिए था जो उसके नित नये नये अनुभवों को सुन सके। मैंने उसे काफी स्पेस दिया था और उसने ढेरों बातें मुझसे शेयर की थीं। वह कहता आज आतिया ने मेरा मोबाइल नं. मांगा और मैं जब लिखने के लिए कागज ढूंढ रहा था तब उसने अपना हाथ बढ़ा दिया और साथ में यह भी कहा कि तुम पहले लड़के हो जिसने मेरे हाथ को छुआ है। वह अपने मोबाइल में फूलों के बीच खींची गयी आतिया की तस्वीर को दिखाता और यह बताता कि यह किस दिन की तस्वीर है। उसने यह भी बताया कि इस वेलेनटाईन डे पर उसने उसे ब्रेसलेट गिफ्ट किया था और यह भी कि आने वाले जन्मदिन पर वह उसे दिल के आकार वाले कान के टॉप्स गिफ्ट करेगा। उसने बाद में यह भी बताना शुरू कर दिया था कि अब वह कभी कभी बाहर भी मिलने लगा है। आतिया के इंस्टीट्यूट से वे दोनों साथ हो जाते थे और कभी फिल्म देखने तो कभी पुराना किला भी जाते थे। पुराने किला में खींची गयी तस्वीर भी उसने दिखायी थी और उसने काफी खुश होकर यह भी बताया था कि वहां पर उसने उसे एक किस भी किया था।
लेकिन प्यार के ये दिन भी ज्यादा दिन नहीं चले। हमें आशीष और आतिया के प्रेम के बारे में पता चलने के दो तीन महीने बाद तक तो सब ठीक चला लेकिन उसके बाद दो तीन दिनों तक खिंचे खिंचे रहने के उपरांत आशीष ने अचानक एक दिन यह बताया कि वह यह मकान छोड़ने जा रहा है। मेरे चौंकने और कारण पूछने पर उसने यह बताया कि ÷वह शादी करने के लिए कह रही है।' मेरे पांव के नीचे से तब जमीन खिसक चुकी थी कि ÷अरे हमने इस ऐंगल से तो सोचा ही नहीं था।'
आशीष ने जब यह बताया था कि वह इस मकान को छोड़ने जा रहा है और वह आतिया की गिरफ्त से काफी दूर चला जाना चाहता है, तब उसके बाद उसने लगभग 7-8 दिनों के बाद उस मकान को छोड़ दिया था। ये बीच के दिन वे दिन थे जो काफी हलचल भरे थे। आशीष और आतिया के बीच काफी खिंचाव आ चुका था। आतिया आशीष से सम्पर्क करने की काफी कोशिश करती थी, लेकिन आशीष उससे मिलना नहीं चाहता था। वह कमरे में या छत पर कभी अकेला खड़ा नहीं होता था, नीचे उतरते हुए वह धड़ाक से नीचे उतर जाता था। आतिया का फोन अपने मोबाइल पर रिसीव नहीं करता था। आतिया ने कई बार बाहर से ऐसे नम्बरों से भी फोन करने की कोशिश की जो अंजान थे, लेकिन आशीष ने उनमें कोई रुचि नहीं दिखायी। आशीष मेरे पास आकर मोबाइल के सारे मिस्ड कॉल दिखाता और कहता ÷चुड़ैल मुझे खा जायेगी।' मैंने कहा ÷तुमको परेशानी क्या है। पढ़ी लिखी लड़की है एमसीए कर रही है। देखने में सुंदर है। उम्र भी तुम्हारे बराबर है? तुमको इतना प्यार करती है। अपने पिता से बात करो। कोई न कोई रास्ता निकल ही आयेगा। शादी तुम जब चाहो तभी करना।' आशीष ने मुझे घूरा था। ऐसे जैसे क्या मैं सही में उसका भला चाहने वाला हूं। आशीष ने कहा ÷आप कैसी बात करते हैं भैया वह मुसलमानी है। साली के तो मुंह से भी बदबू आती है।' मैं एकदम झन्न से रह गया था।
आतिया को यह मालूम था कि आशीष मेरे ज्यादा नजदीक है। आतिया यह भी जानती थी कि उसके इस प्यार के बारे में मुझे सब मालूम है। उसे यह लगता था कि आशीष अगर किसी की भी थोड़ी बात मान सकता है तो वह मैं ही हूं। आतिया मेरे पास आयी थी। एकदम निराश, हताश। ऐसे जैसे वह आशीष को किसी भी तरह अपनी जिन्दगी से जाने देना नहीं चाहती है। मुझे याद है वह दिन जब आतिया मेरे कमरे में थी। दिन के एक डेढ़ बजे रहे होंगे, कमरे में मैं अकेला था। आतिया के आने से मैं हैरान था। आतिया मेरे ठीक सामने खड़ी थी, उसके बाल बिखरे हुए थे। वह बीमार लग रही थी। मैं उसे देख कर चौंक गया था। उसे खड़ा होने में दिक्कत हो रही थी, मैंने उसे कुर्सी की ओर इशारा किया लेकिन वह बगैर हिले डुले वैसे ही खड़ी रही। कमरे में निस्तब्धता थी और चुप्पी को उसने तोड़ा था, बिल्कुल धीमी आवाज में ᄉ ÷÷उसे किसी भी तरह रोक लीजिए। मुझे मालूम है वह आपकी बात को कभी भी नहीं टालेगा। मेरा प्यार पाक है, मैं उसे बहुत मोहब्बत करती हूं।'' उसकी आंखों के कोर भीग गये थे, और मैं उसे बस देख रहा था। वह कुछ देर और वहीं खड़ी रही और मैं चुप रहा। वह और अधिक कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी। उसका नीचे वाला ओंठ कांप रहा था और उसको खड़े रहने में अब और भी तकलीफ होने लगी थी। उसने जाते हुए कहाᄉ ÷मैं हनुमान तो हूं नहीं कि अपना सीना चीर कर दिखाऊं।'' वह रोने लगी और झटके से मेरे कमरे से बाहर हो गयी। मुझे आश्चर्य हुआ उसके मुंह से हनुमान का नाम सुन कर यह मिथक सुन कर और उसके चेहरे के हावभाव को देख कर। उसके जाने के बाद मैं काफी देर तक वहीं खड़ा रहा और फिर याद आया कि वह तो मेरे बहुत करीब रह कर बात करती रही लेकिन उसके मुंह से बदबू तो नहीं आयी।
मैंने आशीष को समझाने का एक और प्रयास किया था। मैने उससे कहाᄉ ÷÷आशीष वह तुम्हें बहुत चाहती है।'' आशीष ने एक झटके में कहाᄉ÷÷तो मैं क्या करूं? आपका दिमाग खराब हो गया है। प्यार करती है तो जान दे दे, मैं क्या करूं?'' मैं उसे देखता रह गया। उसने फिर ठंडा होकर मुझसे कहाᄉ ÷÷आप भोले हैं, आपको कुछ नहीं मालूम है सारे मुसलमान साले आईएसआई के ऐजेण्ट होते हैं। सब का सम्बंध पाकिस्तान से है। आपको क्या लगता है कि दिल्ली जैसे महानगर में इतना बड़ा मकान होना एक नौकरी से सम्भव है। और उस पर ये ऐशोआराम एसी, मोबाइल और गाड़ी। साली पता नहीं कहां कहां मुंह मारती होगी। इसके चक्कर में मैं भी एक दिन आतंकवादी ठहरा दिया जाऊंगा। प्यार करना और बात है। घूमना फिरना और बात है।'' इस संदर्भ में आशीष से हुई यह मेरी आखिरी बात थी। इसके बाद आशीष चला गया अपने सामान के साथ। आतिया अपने दरवाजे की जाली के पीछे से उसे बस देखती रह गयी थी। लेकिन मैं आशीष को दोष नहीं दे पाया। मैं जानता था कि वह आशीष नहीं होकर कोलम्बस होता या फिर हममें से कोई भी तब भी, इस कहानी का अंत यही था।
आशीष और आतिया के प्यार के इस दुखद अंत ने हमें अंदर से झकझोर दिया था। और फिर धीरे धीरे हम सभी उस मकान से बाहर हो गये। हम सब अलग अलग हो गये। हमारे बीच के आपसी सम्बंध धीर धीरे खत्म हो गये। वह मकान जिसे हम कभी ÷स्वीट होम' कहते थे और जहां लौटने के लिए हममें से सब बेचैन होते थे, उससे निकलते हुए हम सब जितने दुखी थे, उससे ज्यादा हमारे मन में इसका सुकून था कि हम बाल बाल बच गये। हम सभी तब यह सोच रहे थे कि अगर आशीष के बदले हम होते तो क्या होता?
यह कहानी जब मैं लिख रहा हूं तब उस मकान को छोड़े हुए मुझे लगभग चार वर्ष हो गये हैं। इस बीच दुनिया बहुत बदल गयी। अब कैमरे वाला मोबाइल आम हो गया। कम्प्यूटर का भारी भरकम मॉनीटर एल.सी.डी. में बदल गया। लेपटॉप की कीमत गिर गयी और दिल्ली में बहुत सी दूरियां मैट्रो से तय की जाने लगीं। लोगों की जेब में अब स्मार्ट कार्ड मिलने लगे और लोग उससे किरायों में होने वाले दस प्रतिशत की बचत करने लगे। लेकिन ये मेरे लिए वे दिन थे, जो अभी भी अनिश्चितताओं भरे थे। इस चार साल में मैं लगभग तैंतीस वर्ष का हो गया था। कोई भी नौकरी नहीं मिली थी। घर जाना लगभग बंद हो गया था। शादी नहीं हुई थी। किसी तरह अपने जीवन को खींच रहा था। तब अचानक एक सुबह खुशी की लहर दौड़ गयी, जब मुझे यह पता चला कि जो बहुत पहले क्लर्क की एक नौकरी की परीक्षा दे रखी थी उसमें मेरा चुनाव हो गया है। नौकरी शब्द तब मुझे आह्‌लादित कर रहा था। याद आ रहे थे वे सारे ख्वाब जो हमने नौकरी मिलने के तुरंत बाद के लिए संजोये थे, वे सब ठंडे पड़ चुके थे। वे साथ रहने वाले लड़के अब साथ भी नहीं थे।
इस नौकरी का फॉर्म चूंकि मैंने उसी घर से भरा था इसलिए उसका ज्वाइनिंग लेटर वहीं आया। मैंने जब उस घर में चार वर्ष के बाद पहला कदम रखा तब वह घर काफी खामोश था। पूरे घर पर एक उदासी दिखी। वहां लगभग एक घंटा बैठा और जो नयी बातें पता चलीं वे इस प्रकार हैं :
आशीष के उस मकान के छोड़ने के एक महीने के भीतर ही हम सभी के उस मकान को छोड़ देने के बाद उसके घर वाले आशीष और आतिया के सम्बंध के बारे में जान गये थे। आतिया काफी दुखी रहने लगी थी। उसने इंस्टीट्यूट जाना, घर से निकलना छोड़ दिया था। वह दिन भर कुरान लिए बैठी रहती थी, और उसने दिन में पांच बार नियमित नमाज अदा करनी शुरू कर दी थी। उसके घर वाले डर गये थे और झटपट में उसकी शादी कर दी गयी थी। उसकी शादी हुए भी लगभग साढ़े तीन वर्ष हो चुके थे। आतिया की माँ ने बताया ÷÷वह हमारी जिन्दगी की बड़ी ही मनहूस घड़ी थी जब हमने तुम लोगों को इस घर में पनाह दी। मेरी बेटी सुन्न हो चुकी है। उसने निकाह तो कर लिया है, लेकिन अपने आप को अंदर से मार रही है वह। वह सूख कर बिल्कुल आधी रह गयी है। उसे कोई औलाद नहीं है। कई डाक्टरों से मशवरा कर चुकी हूं। मगर उसकी ख्वाहिश ही मर चुकी है। डॉक्टर कहते हैं वह अंदर से खत्म हो गयी है। वह कभी मां नहीं बन सकती। मेरी बच्ची को तो बरबाद कर दिया तुम लोगों ने।''
मैं जब वहां से उठा तब मेरे हाथ में नौकरी का ज्वाइनिंग लेटर था। उस नौकरी का ज्वाइनिंग लेटर जिसे लेकर हमारे मन में ढेरों ख्वाब थे। और जिसके नहीं मिलने पर अवसाद के घनघोर क्षणों में हम उसे देख कर आनंदित होते थे। वे अवसाद के दिन बहुत लम्बे थे, और आज उसका खात्मा हुआ लेकिन इस मोड़ पर ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था। आज मुझे मालूम नहीं है कि आशीष कहां है, और कोलम्बस या और सब। लेकिन मैं यह जानता हूं कि आतिया अभी जीवित है लेकिन पता नहीं कब तक।
अभी शायद इस कहानी को खत्म कर कल दिल्ली की सैर पर निकलूं।

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