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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/17 सम्‍पादकीय

समाज
यादों से रची यात्रा : पी.सी. जोशी

शताब्दी
दिनकर
की काव्य चेतना : पुनर्मूल्यांकन खगेन्द्र ठाकुर

उर्वशी : पुरुष अध्यात्म का रूमान प्रियम अंकित

लेख
माधवराव सप्रे का महत्व मैनेजर पांडेय

मध्यवर्ग की अवधारणा और हिन्दी साहित्य राहुल सिंह

कहानियां
तमाशे
में डूबा हुआ देश असगर वजाहत

जिद्दी रेडियो पंकज मित्र

फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन प्रत्यक्षा

स्वीट होम उमा शंकर चौधरी

विशेष
सागू
मुंडा की कहानी : उसी की जुबानी
  वीर भारत तलवार

कविताएं
पांच
कविताएं कुंवर नारायण

सात कविताएं विष्णु खरे

दो कविताएं प्रियदर्शन

तीन कविताएं निशांत

दो कविताएं सलिल चतुर्वेदी

वृत्तांत
कितने
शहरों में कितनी बार ममता कालिया

संस्मरण
चेरोखरवारों
का गांव विजयमोहन सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया
: डॉ. तुलसी राम

लम्बी कहानी
साहिब
है रंगरेज गीत चतुर्वेदी



अंक/17 जनवरी/08
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
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अंक/17 जनवरी/08

सागू मुंडा की कहानीः उसी की जुबानी
वीर भारत तलवार

काले रंग, नाटे कद और बीच बीच में गला खंखारते रहने वाले उम्रदराज सागू मुंडा से मेरी मुलाकात 1974 में हुई थी। मैं आदिवासियों के बीच काम करने के इरादे से रांची जिले के खूंटी सब डिवीजन में जंगलों के काफी अंदर के एक गांव जोजोहातु में रहने लगा था। सागू मुंडा जोजोहातु से ठीक अगले गांव चोंडोर में रहते थे। उस इलाके के आदिवासियों के बीच सागू मुंडा को मुंडा लोकगीतों और मुंडा इतिहास की कुछ विशेष जानकारी थी। जोजोहातु में रहने वाले कांडे मुंडा, जो मुंडारी में कविता लिखते और रांची आकाशवाणी में छोटी सी नौकरी करते थे, एक शाम यह कहते हुए मुझे सागू मुंडा से मिलाने ले गये कि चलिए, मैं आपको अपने गुरु से मिलाता हूं। सागू मुंडा से मिलने के बाद मैंने भी उन्हें अपना गुरु मान लिया और उनसे मुंडा गीतों और इतिहास की बातों को जानने समझने में जुट गया। उन दिनों माघ पूस का महीना चल रहा था। मुंडाओं ने खेतों से धान काट कर अपने अपने लिपेपुते खलिहान में जमा कर लिया था और हाथों से धान के गुच्छों को पटक पटक कर धान की पकी हुई बालियों को पौधों से अलग कर रहे थे। मैं और मेरे गुरु सागू मुंडा, दोनों दिन की खिली हुई धूप में उन्हीं के गांव के एक मुंडा दयाल मास्टर के खलिहान में बैठ जाते, घंटों मुंडा लोकगीतों पर बातें करते रहते और मैं अपने नोट्स लेता रहता। सामने दयाल मास्टर की पत्नी अपने खलिहान में काम करने के लिए आती और आते ही अपनी धोती कमर में खोंस कर धान पटकने के काम में लग जाती। जैसे जवान लड़के बेपरवाह अपनी बुश्शर्ट उतार कर एक किनारे फेक देते हैं, वैसे ही वह अपना ब्लाउज उतार कर फेक देती ताकि धूप में वह पसीने से भीग कर खराब न हो जाए और धान के गुच्छों को पत्थर पर पटकने के काम में फुर्ती से हाथ ऊपर नीचे चलाने में रुकावट न बने।
सागू मुंडा से उसके जीवन और समाज के बारे में मैंने जो कुछ सुना, उसके आधार पर उन्हीं दिनों मैंने एक लेख लिखा जो आदिवासी समाज, संस्कृति और इतिहास पर केन्द्रित मेरी ही पत्रिाका ÷शालपत्रा' के प्रवेशांक, 1977 में छपा। लेख लिखने का मकसद बाहर के साहित्यिक समाज को और खुद
आदिवासी समाज को भी सागू मुंडा के महत्व से परिचित कराना था। मैं सागू मुंडा को बहुत मानता था और उनकी हर तरह से सहायता भी कर देता था। मैंने उनके जीवन की सबसे बड़ी इच्छा को भी पूरा कर दिया कि उनकी कोई किताब छपे। उनकी किताब ÷मुंडा कोऊः इतिहास' मैंने बनारस जाकर छपवायी थी। प्रेस के मालिक ने जब किताब का प्रूफ देखने के लिए मुझे दिया तो पहले तो मैंने काफी संकट महसूस किया कि इसे मैं कैसे ठीक करूं? इस वक्त पहली बार मुंडारी भाषा के मेरे ज्ञान की भी परीक्षा हो गयी। अंत में मुझे खुद सुखद आश्चर्य हुआ कि पहले कैथोलिक मिशन के फादर हॉफमन के बनाये मुंडारी व्याकरण का अच्छी तरह अभ्यास करके और फिर जोजोहातु गांव में रह कर (जहां लोग खासकर बच्चे और स्त्रिायां, हिन्दी कम ही जानते थे) इतनी मुंडारी मैं सीख चुका था कि टटोल टटोल कर शुद्ध मुंडारी भाषा की किताब का प्रूफ देख सकूं। लेकिन किताब की छपाई का करीब साढे+ चार सौ रुपयों का बिल अदा करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे? पैसे जुटाने के लिए मैं बनारस से दिल्ली चला गयाᄉ अपने दोस्तों, समर्थकों के पास। उन दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष पी. एन. हक्सर थे। उनकी बड़ी बेटी और उसके पति, दोनों मेरे राजनीतिक समर्थकों में थे। उन्होंने मुझे हक्सर के सचिव युगांधरन से मिलवाया था। युगांधरन मेरे और भी बड़े समर्थक बन गये थे। रुपयों की मदद पाने के लिए मैं सीधे योजना आयोग भवन में युगांधरन के पास गया। वहीं मेरी मुलाकात ब्रह्मदेव शर्मा से हुई जो उन दिनों युगांधरन के सीनियर और केन्द्र सरकार के गृह मंत्राालय में आदिवासी विंग में सरदार भूपिन्दर सिंह के साथ संयुक्त सचिव थे। मैंने उनसे भी मदद मांगी। उन्होंने किताब को हिन्दी के बजाय मुंडारी में छापने पर बड़े तीखेपन के साथ एतराज उठाया तो मेरा हिन्दी के साम्राज्यवाद पर उनसे झगड़ा हो गया। लिहाजा उन्होंने मेरी मदद नहीं की लेकिन युगांधरन ने अपने मातहतों से बिना किसी संकोच के उधार मांग कर चार सौ रुपये जुटा कर उसी वक्त मेरे हवाले कर दिये। बनारस लौटकर मैंने प्रेस मालिक का बिल अदा कर दिया।
बनारस से जोजोहातु लौट कर मैंने उस किताब की करीब करीब सारी प्रतियां सागू मुंडा को सौप दीं। अपने लिखे हुए को किताब की शक्ल में छपा देख कर वे बहुत खुश हुए। प्रेम और आशीर्वाद की भावना से भर कर उन्होंने मुझसे कहा, ÷÷तुम ही मेरे असली चेले हो।'' उस बूढे+ आदिवासी के इन शब्दों को अपने परिश्रम का पुरस्कार समझ कर और अपने जीवन का एक मूल्यवान सर्टिफिकेट मान कर मैंने अपने मन में संजो लिया।
लेकिन सागू मुंडा को उस किताब से सिर्फ खुशी ही नहीं मिली, कुछ रुपया भी मिला जिसका उनके जीवन में और भी ज्यादा अभाव था। एक प्रति की कीमत एक रुपया रखी गयी थी और मैंने उन्हें उस किताब की लगभग ढाई तीन सौ प्रतियां दी थीं। सागू मुंडा और उनकी बेटी कई महीनों तक आस पास में लगने वाले साप्ताहिक हाट में उस किताब को ले जाकर बेचते रहे और इस तरह उन्होंने कुछ रुपया भी कमा लिया।
सागू मुंडा पर लिखे अपने लेख में मैंने सागू मुंडा को पहला मुंडा इतिहासकार बताया था और उनके इतिहास लेखन की काफी सराहना की थी। लेकिन उस इतिहास लेखन में कई बातें तथ्यहीन और भ्रामक भी थीं जैसा कि बाद में पता चला। ÷शालपत्रा' में उस किताब की समीक्षा लिखने के लिए मैंने उन्हीं दिनों छुट्टियों में अमेरिका से भारत आये मुंडारी के कवि डॉ. रामदयाल मुंडा से कहा (डा. मुंडा शिकागो के मिनीसोटा विश्वविद्यालय में भारतीय साहित्य के प्राध्यापक थे)। रामदयाल जी की समीक्षा से पहली बार सागू मुंडा के इतिहास लेखन की त्राुटियां और कमजोरियां भी सामने आयीं। बेशक, अपनी समीक्षा में रामदयाल जी ने उनके लेखन के अच्छे पक्षों की भी तारीफ की थी, खासकर लोकगीतों और सामुदायिक स्रोतों से इतिहास की जानकारी इकट्ठा करने के प्रयत्नों की। यह समीक्षा ÷शालपत्रा' के चौथे अंक, फरवरी, 1978 में छपी थी।
करीब तीस बरसों के बाद आदिवासियों के बीच रहने के दौरान लिखे हुए अपने पुराने कागजों की छानबीन की तो उसमें अनायास ही मुझे सागू मुुंडा की वह जीवन कहानी भी मिल गयी जो उन्होंने मुझे सुनायी थी और जिसे मैंने लिख लिया था। पारखी और मुस्तैद सम्पादक अखिलेश के आग्रह पर वही कहानी यहां पेश है तद्भव के पाठकों के लिए ᄉ वीर भारत तलवार

पिता का नाम श्यामू मुंडा था मां रांदाए मुंडाइन। मां लांदूप की थी। पिता कैथी लिपि जानते थे। पिता की मां डाड़ीगुटु गांव की थी। वहां पिता अपने मामा के घर में रहते थे। उस जमाने में स्कूल नहीं होता था। मामा लोग गरीब थे। पिता जिलिंगा गांव में (खूंटी के उत्तर) नागवंशी लोगों के घर में नौकरी करने लगे। वे दिन भर हाथी की देखभाल करते थे, पेड़ के पत्ते तोड़ कर उसे खिलाते थे। एक ब्राह्मण नागवंशी पुत्राों को पढ़ाने आता था। उसी में पिता भी कुछ पढ़ लेते थे। वहीं कैथी लिपि सीखी। पिता जवान होकर अपनी मां के साथ चोंडोर आये। वे दोनों बहुत गरीब थे। मां कोयनार के नये पत्तों को (जिन्हें खाया जाता है) तोड़ते समय गाछ से गिर कर मर गयी। पिता के पिता की मृत्यु पिता के बचपन काल में ही हो गयी थी। उसी के बाद पिता अपनी मां के साथ मामाओं के घर चले गये थे। पिता के पिता का नाम टोया मुंडा था। उनका जन्म चोंडोर में ही हुआ था।
मेरे पिता के चार बेटे हुएᄉ सोना, टोया, सागू, चटन सिंग। दो बेटियां थीं राणी और देवकी। चोंडोर के एक रैयत मंगरा मुंडा से राणी का ब्याह हुआ। देवकी का ब्याह मरोगहादा से नीचे सरजोमा गांव में हुआ। मेरे बड़े भाइयों की मृत्यु हो गयी। छोटे भाई की भी मृत्यु हो गयी।
मेरा जन्म 1903 में हुआ। जन्म के चार वर्ष बाद मां का देहांत हो गया। उसका चेहरा कैसा था, यह भी मुझे याद नहीं। मां कैसे मरी, वह गोरी थी या काली, नाटी थी या ऊंची कुछ भी याद नहीं है। 1920 में मेरे पिता जी की मृत्यु हो गयी।
मां की मृत्यु के बाद पिता ने एक विधवा को रखा। वह विधवा दो भाइयों को तो प्यार करती थी, लेकिन छोटे दो भाइयों को बहुत सताती थी। कभी कभी भोजन भी नहीं देती थी। मेरे पिता विद्वान थे, इधर उधर गांवों में जाते थे, वहीं भोजन मिल जाता था बच्चों की चिन्ता करने के लिए उन्हें समय नहीं था। हम दोनों अनाथ लड़के कहीं पीपल का फल पकने पर पीपल, गूलर का फल पकने पर गूलर खाते थे। इस तरह दिन बीतते थे। उस जमाने में घर में धन तो बहुत था, लेकिन हमारे पास कपड़ा लत्ता नहीं था। बड़े भाई के छोड़े हुए फटे कपड़े हम पहनते थे। मैं बकरी चराता था, बैल चराता था। लड़कों के साथ दिन रात खेलता था। मैं बच्चा था, जवान लड़कियां मुझे अपने पास सुला लेती थीं। वे मुझे बहुत प्यार करती थीं। मैं ÷हरमुज' खेलता था, केसेद केसेद और गूली इंनूं, भंवरा इंनूं। जब अखाड़े में नाच होता, लड़कियों के साथ मैं जाता था। जाड़े में अखाड़े के पास एक पत्थर पर मुझे बैठा कर लड़कियां अपने कपड़ों से मुझे ओढ़ देती थीं। मैं अखाड़े में नाचती लड़कियों के गीत सुनता था। इस तरह मैंने बहुत से गीत सीखे। गितिःओड़ा में भी मैंने लड़कियों के ढेर सारे गीत सुने। कभी कभी जंगल में चिड़िया के शिकार में भी जाता था। मैंने बचपन से ही तम्बाखू, हड़िया और शराब नहीं पीया ᄉ कभी भी नहीं।
13 वर्ष की उमर में मेरे पिता का देहांत हुआ। इस उमर तक मैं लिखना पढ़ना कुछ भी नहीं जानता था। पिता के देहांत के बाद एक दिन रात को मेरे मंझले भाई ने कहा- ÷÷अब तो पिता का देहांत हो गया। अब हमारे घर में कोई लिखा पढ़ा आदमी नहीं रहा। जोजोहातु में स्कूल खोला जा रहा है। तुम वहां लिखने पढ़ने जाओ।'' तब मैं वहां गया और एक ही बरस में मैंने लोअर पास कर लिया। उस जमाने में जो तेज लड़का होता था, उसे ऊपर की क्लास में भेज दिया जाता था। लोअर में चार क्लासें होती थीं। लोअर पास करने के बाद मेरे मंझले भाई ने मुझे बुर्जू के जर्मन मिशन स्कूल में 1921 में भर्ती किया। लेकिन छः महीना पढ़ने के बाद, वर्षा काल आने पर मुझे बहुत तेज बुखार ने धर पकड़ा। मुझे सूल रोग (पेचिश) हो गया। उन दिनों न खूंटी में अस्पताल था, न मुरहू में। तब मेरे साथियों ने कहा, ÷÷अब अगर तुम यहां रहोगे तो मर जाओगे।'' तब बिना छुट्टी लिए मैं घर चला आया। रास्ते में तजना नदी थी। तजना में पानी भरा हुआ था। नदी को पहले मैंने देखा नहीं था। भरी नदी का अर्थ नहीं समझता था। जब मैं नदी में घुसा तो मेरे पैर ऊपर हो गये। किनारे लगी घास को मुट्ठियों में पकड़ कर मैंने अपनी जान बचायी। तजना के पास ही कोटना गांव है। मेरे गांव की एक लड़की का ब्याह उसी गांव में हुआ था। मैं उसके घर चला गया। उसके पति ने मुझे नदी पार करवा दिया। जब मैं घर चला आया तो मैंने सारा हाल मंझले भाई से कह सुनाया। मैंने बतलाया, ÷÷पादरी प्रचारक मास्टर ने न तो मुझे छुट्टी मांगने पर छुट्टी दी और न दवा मांगने पर दवा दी। तब मैं यूं ही चला आया।'' उसने कहा, ÷÷तुम स्कूल छोड़ दो अब तुम जवान हो चले हो। अब हम लोग तुम्हारी शादी करेंगे।''
मैंने स्कूल छोड़ दिया। लेकिन लिखने पढ़ने की लालसा मुझसे नहीं छूटी। मैंने लहेरियासराय से 40 रुपये की किताबें मंगवायीं। मैंने ऊपर क्लास और मिडल क्लास की सभी किताबें मंगवायीं। इन्हें मैंने एक सूची में देखा था। मरांगहारा के डाकघर में किताबें आयीं। मैंने घर पर पढ़ना शुरू किया तो मुझे बहुत से साथी भी मिल गये। मैंने साथियों को पढ़ना सिखाया। कुछ दिनों के बाद मैं लांदु में एक प्राइवेट स्कूल में मास्टरी करने लगा। प्रति माह प्रत्येक छात्रा से दो आना मिलता था। उसी से मैं अपनी धोती और कमीज खरीदता था। अब तो मेरे दिन बदल गये। मैं रोज रोज नयी नयी धोतियां पहनने लगा और हाट बाजार में अपने साथियों के साथ घूमने लगा। अखाड़े में भी दोस्तों के साथ नाचने जाने लगा। बहुत आनंद से जीवन बीत रहा था।
मेरे दो खास मित्रा थे। एक तो लेयो मुंडा (चोंडोर गांव) और दूसरा श्यामू मुंडा (चोंडोर) ये दोनों अब मर चुके हैं। एक दिन मैं लेयो के साथ एक दूसरे गांव सेरेंगडीह गया। इरादा था लड़कियों के साथ आनंद मनाना। गांव से बाहर पूरब की ओर कुसुम गाछ के नीचे पड़ी एक चट्टान पर हम लोग लेट गये। जब हम लोग जगे तब सामने (उत्तर) की ओर एक ऊंचा कुसुम गाछ था। उसी गाछ पर एक चूड़िन भूत जल रहा था और उसका प्रकाश चारों और फैल रहा था। तब हम दोनों डर गये। जब हम लोग लौटने लगे तो वह भूत गाछ से उतर कर हम लोगों के सिर के ऊपर मंडराने लगा। उसकी दुर्गंध से हम लोगों का मन इतना बिगड़ गया कि हम आपस में बातचीत भी नहीं कर पा रहे थे। तीन चार दिन तक भूत का असर हमारे शरीर पर रहा। गंधक जैसी गंध नाक में समायी रही।
(सबका जन्म सिर की तरफ से होता है। लेकिन मेरे पिता और भाइयों ने मुझे बतलाया कि मेरा जन्म पैर की तरफ से हुआ। ऐसे लड़के पर बिजली गिरने का भय रहता है। इसलिए मेरे पिता ने बिजली से बचने के लिए बरसात के दिनों में एक पोपले में करनीधान का हड़िया (बिना चीपे) ओखली के अंदर रख कर तीन साल की बरसात में तीन बार चखाया था। इससे दुर्घटना की सम्भावना समाप्त हो गयी)

शादी होने के बाद की घटनाएं
मेरे शरीर में इतना बल था कि आठ आदमी मिल कर लाठियों से मुझे दबाते थे, तब भी मैं उन्हें दूर फेंक देता था। मैं खम्भे के ऊपर खड़े होकर खेल दिखाता था। मैंने बम्बई से कसरतों के खेलों की एक किताब मंगवायी थी ÷अर्धमाल विद्या प्रकाश'। उसमें 64 कसरतों का खेल था। उसी से मैंने वह खेल सीखा था। मेरे कसरत का खेल देखने के लिए दो तीन सौ लोग बराबर मेरे गांवों में आते रहते थे। मैं उन्हें खेल सिखाने के लिए प्रत्येक आदमी से दो रुपया लेता था। मैं दूसरे गांवों में भी निमंत्राण मिलने पर खेल सिखाने जाया करता था। एक बार खूंटी के रोमन काथलिक मिशन के फादरों ने मुझे बुलाया और तीन महीने तक अपने पास रखा। रांची का डी.सी. भी खूटी में मेरा खेल देखने आया। वहां मैं मिशन के स्कूल के छात्राों और शिक्षकों को सिखाया करता था। मैं बहुत तेज दौड़ता था। एक बार जंगल में कुछ शिकारी एक भालू को दौड़ाते आ रहे थे। मैं आगे खड़ा था और मेरे हाथ में एक छोटी सी कुल्हाड़ी थी। भालू ने हांफते हुए अपना मुंह खोल रखा था। मैंने कुल्हाड़ी उसके मुह में चला दी। कुल्हाड़ी उसके मुंह के अंदर घुस गयी और हाथे से उसके दांत टूट गये। पीछे बहुत से लोग पहुंचे और सभी ने अपने अपने हथियार से उस घायल भालू को मारा।
एक बार हम लोग गांव से चार आदमी दिगड़ी गांव की ओर जा रहे थे। गर्मी के दिन थे। जवान लोग अखाड़े के सामने सोये हुए थे। उन्होंने हमें देखा। हमें मारने का विचार किया। दिगड़ी से पहले सालगा गांव के पास पहुंचने पर पचासों आदमी दौड़ कर आये और हम पर पत्थर फेकने लगे। मेरा छोटा भाई भी साथ था। पत्थर हमें नहीं लगे, लेकिन मेरे साथी डर गये। चार आदमी मुझ पर लाठी चलाने के लिए आगे आये और उनके पीछे खड़ी भीड़ चिल्लायीᄉ इन्हें मारो! जल्दी मारो।
मैंने उनसे कहा, ÷÷हमें मत मारो। हम लोग तो राहगीर हैं। हमारा दोष क्या है?''
वे नहीं माने। उन्होंने लाठियां नहीं फेकी। तब मैंने उन पर मंत्रा फूंकाᄉ उनके हाथ से लाठियां गिर गयीं और भीड़ भाग खड़ी हुई। मेरे साथियों ने उन चारों को, जिनके हाथ में थोड़ी देर पहले तक लाठियां थीं, मारना चाहा लेकिन मैंने उन्हें मना कर दिया। क्योंकि उन्हें मारना व्यर्थ था। उस स्थान से दिगड़ी गांव आधा मील दूर है। यह घटना शुक्रवार को घटी थी। घटना की खबर मेंरे गांव के जवानों तक पहुंची, जो मेरे चेले थे। उन्होंने दूसरे दिन, बाजार वाले दिन, सालगा वालों को पीटना तय कर लिया। मेरे बहुत मना करने पर भी उन्होंने दो आदमियों को पीट दिया। सालगा के सभी स्त्राी पुरुष बाजार छोड़कर भाग गये। मेरे उन चार साथियों में एक सानिका मुंडा (चोंडोर) अभी भी जिन्दा है।
दिगड़ी गांव में बहुत से ईसाई हैं। उसके बाद एक गांव है रोंगो, वहां भी बहुत ईसाई हैं। एक बार हम चार आदमी रोगों गये। रोगों के पास दो छोटे पहाड़ों के बीच एक आम का गाछ है। रोगों गांव की युवतियों से हमें मिलना था और वही आम का गाछ हमारा मिलन स्थल था। अंजोरी रात का समय था। गांव वालों को पहले ही पता लग गया। सागू पहलवान को फंसाने के लिए गांव वालों ने डेलकुसी (रस्सी का फंदा) बना रखा था। हमारे पहुंचने से पहले गांव वाले आम के नीचे बैठे हुए थे। उन्हें बैठा देख हम दूसरी तरफ एक चट्टान पर बैठ गये। मेरे साथियों ने भागने का प्रस्ताव रखा। मैंने कहा मेरा नाम सागू दुनिया में विख्यात है। अगर मैं भाग गया तो ईश्वर भी हंसेगा। तब हम एक घंटे तक चट्टान पर बैठे रहे। गांव वालों ने डेलकुसी से एक पत्थर चलाया जो एक गूलर के पेड़ पर जा लगा। अब लड़कियां आने को नहीं थी। इसलिए हम लोगों ने लौटना तय किया। हम आम के सामने से गुजरे तो मेरे दो साथियों ने दुश्मनों पर दो पत्थर मारे जो उन्हें लग गये। वे भाग कर पहाड़ पर चले गये। और वहां से डेलकुसी से हम पर पत्थर चलाने लगे। वे पत्थर मेरे सिर के ऊपर मंडराते थे और मेरे मंत्रा के बल पर वापस शत्राु की ओर लौट जाते थे। मेरे उन चार साथियों में एक दुग्गा मुंडा (चोंडोर) अब भी जिन्दा बचा हुआ है।
एक बार शनिवार की अंजोरी रात को मैं अपने एक साथी के साथ मरांगहादा बाजार से गांव लौट रहा था। रास्ते में स्वांसियों की कपड़े की दुकान थी। एक सरजकल गांव है जिसमें स्वांसी रहते हैं। दुकान के पास सरजकल गांव के समूचे स्वांसियों की भीड़ लगी हुई थी। उस भीड़ में मेरे दो स्वांसी दोस्त रामनाथ और गोवर्धन भी थे। दोनों ने कहा, ÷÷आज हमारे प्राण जाने को हैं। आप हमें बचा सकते हैं या नहीं?'' मैंने पूछा, ÷÷क्या बात है?'' उन्होंने कहा, ÷÷शुक्रवार के दिन खूंटी बाजार में मुर्गा लड़वाते हुए स्वांसियों ने मरांगहातु के दो आदमियों को पीटा था। आज मरांगहातु के लोग और स्वांसी एक ही रास्ते से होकर लौटेंगे तो मरांगहातु के लोग स्वांसियों को मारेंगे। मैंने कहा, ÷÷हम तुम्हें बचा सकते हैं।'' तब गोवर्धन ने मुझे डिड़ू महाराज (ब्राह्मण) की मिठाई दुकान (मरांगहादा बाजार में) ले गया और मुझे बहुत मिठाई खिलाया। काफी मिठाई खाकर हम लोग भीड़ के पास आये। तब मैं मरांगहातु वालों के पास गया। मैं निहत्था था। मैंने उनसे पूछा, ÷÷तुम कहां के लोग हो और इतनी देर तक यहां क्यों खड़े हो?'' मेरे इतना पूछते ही वे सब भाग खड़े हुए। स्वांसी बहुत खुश हुए। किसी ने मुझे चार रुपये दिये, किसी ने पांच, किसी ने एक। मुझे बहुत रुपये मिले।

1955 के आस पास की घटना
मैंने बहुत से गुंडों और चोरों को पीटा और पीट कर उनके आतंक को खत्म किया था। जून का महीना था। जोजोहातु के बंगाली सिंह मुंडा के साथ मैं मरांगहादा बाजार से शाम को पांच बजे लौट रहा था। रास्ते में मैंने लोगों की भीड़ देखी। वहां देखाᄉ तमाड़ के मएपन हातु का जीबोन स्वांसी पीरीहातु की एक लड़की चांदमुनी को बायें हाथ से पकड़ा हुआ है और दाहिने हाथ में चाकू है। जीबोन इस इलाके का नामी गुंडा था। वह लोगों को धमकी दे रहा था, ÷÷सामने मत आओ! मैं मनुष्य नहीं हूंᄉ मैं कल हूं।'' कल यानी बमगोला।
कोई उसके सामने नहीं आ पा रहा था। मैं उन दिनों सरपंच था और बंगाली सिंह चीफ अफसर था। हमने लड़की से पूछा, ÷÷तुम कहां की हो?''
हमने जीबोन से पूछा, ÷÷तुम कहां के हो?''
वह बहुत रोब से बोला, ÷÷मैं मएपन का जीबोन स्वांसी हूं। तुम लोग मेरे ऊपर क्या करना चाहते हो, करो?''
हम दोनों बिना कुछ किये वहां से चले आये। क्योंकि सरपंच को बिना फरियादी के अपने क्षेत्रा से बाहर का मामला अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। मैं 1950 से 1966-67 तक सरपंच रहा।
जीबोन अपने तीन जवान साथियों के साथ चांदमुनी को अपने गांव ले ही गया।
दूसरे दिन चांदमुनी के भाई और पिता तमाड़ के राजा खेत्राोमोहन सहदेव के पास अपना दुखड़ा लेकर पहुंचे। उन्होंने तमाड़ के राजा को 25 रुपये दिये और अर्ज किया कि लड़की को छुड़ा दीजिए। तब राजा के साथ चांदमुनी के रिश्तेदार जीबोन के घर गये। जीबोन पहले से ही चांदमुनी के भाई लोहरा की स्त्राी को अपनी पत्नी बना कर घर में रखा था। जब राजा वहां पहुंचा तो उसे जीबोन से भय लगा। उसने अपना स्टैण्ड बदल लिया और चांदमुनी के रिश्तेदारों से कहा, ÷÷यह लड़की तो तुम्हारे घर जाना नहीं चाहती। तुम लोग भी इसकी शादी कहीं न कहीं तो करोगे ही। जीबोन कोई बुरा आदमी नहीं है। अच्छा आदमी है। समझो इसी से उसकी शादी हो गयी है।''
यह सुन कर चांदमुनी के रिश्तेदार निराश होकर अपने गांव लौट आये। जीबोन ने पुरस्कार के रूप में तमाड़ के राजा को एक खस्सी दी।
चांदमुनी के रिश्तेदारों को मेरी याद आयी। वे मेरे पास पहुंचे और सारा वृत्तांत सुना कर मुझसे सहायता करने के लिए कहा। मैंने कहा, ÷÷देखिए स्वांसी पेंडा+ पत्तोर बुसू सेंगलᄉ अर्थात स्वांसी लोग तो पुआल की तरह तेजी से जल उठते हैं और एक ही मिनट बाद बुझ जाते हैं। इसलिए आप लोग तीन दिन तक विचार करो कि तुम्हें जीबोन से लड़ना है या नहीं। अगर भय लगे तो मत आना। अगर तीन दिन विचार करने के बाद भी जीबोन से लड़ने की इच्छा हो तो कुछ चावल दाल लेकर मेरे घर आना।''
तीन दिन बाद वे मेरे घर आये। यहीं ठहरे। रात में मैंने योजना तैयार की। मैंने उनसे कहा, ÷÷सुबह जब मुर्गा बोले तो तुम लोग खूंटी के लिए प्रस्थान करो और खूंटी के विश्राम घर (सरकारी) में ठहरो। मैं खाना खाकर साइकिल पर आऊंगा।''
मैं भी खाना खाकर रवाना हुआ। पोस्ट आफिस से दो लिफाफा खरीद कर एक डी.एस.पी. और डी.सी. के पास भेजा। उन्होंने मेरा पत्रा पाने के बाद तमाड़ के एक जवान दरोगा को मएपन भेजा। दरोगा ने मएपन में चांदमुनी को उपस्थित पाया। दरोगा ने वहां चार गुंडों को जोरों से पीटा और खूंटी हाजत में भेज दिया और लड़की को मएपन के मुंडा की जिम्मेदारी में सौप दिया गया। वह मुंडा गांव के चौकीदार के साथ लड़की को पीड़ीहातु पहुंचा दिया।
बाद में मुकदमा चालू हुआ। बंगाली सिंह और मुझे नोटिस मिला। चांदमुनी के भाई और पिता को भी नोटिस मिला। गुंडे एक एक हजार की जमानत पर हाजत से छूटे। खूंटी के लोगों ने जीबोन को समझाया, ÷÷सागू मुंडा कौन आदमी है, तुम्हें पता नहीं है? उससे लड़ना है तो एक नहीं, दो वकील पकड़ो।''
तब जीबोन ने दो वकील चुनेᄉ रामबाबू और धूरा बाबू। कचहरी का बाबू जीबोन से डरने लगा। उसने मुझसे कहा, ÷÷मैं जीबोन से डरता हूं। इसलिए इस मुकदमे की आप ही पैरवी कीजिए, मैं सिर्फ सामने रहूंगा। (एस.डी.ओ. के कोर्ट में) बहस आरम्भ हुई। पहले रामबाबू से। उसने मुझसे यही सवाल किया कि जब घटना घट रही थी तब तुम वहां से कितनी दूर पर थे? मैंने कहा, ÷÷हम और आप जितनी दूर हैं, उतनी ही दूर।''
कचहरी में उपस्थित लोग वाह! वाह! कर उठे। कचहरी के बाबू ने कहा, ÷÷अब छोड़िए छोड़िए! यह सागू मुंडा है।''
घूरा बाबू तो मेरे दोस्त ही थे। उन्होंने मेरी पीठ ठोंकीᄉ अलबत्ता! फैसले का दिन मुकर्रर हुआ। उस दिन पीड़ीहातु वाले पहले पहुंचे। मैं देर से पहुंचा। फैसले के अनुसार जीबोन सिंह को तीन साल का जेल हुआ और उसके तीन साथियों को रिहा कर दिया गया।
मेरे गांव के लोग मुझसे डरते भी थे और मुझसे जलते भी थे। उन्होंने मुझे मारने के लिए जेल से छूटने के बाद जीबोन को तय किया। जीबोन तो मुझसे चिढ़ा हुआ था ही। शनिवार को गांव वालों ने जीबोन को बुलाया। मेरे शत्राुओं ने जीबोन को खाना खिलाया और गांव के दक्षिण तरफ अपनी मीटिंग शुरू किये। उन्होंने दो सौ रुपये मेरी लाश के लिए तय किये। जीबोन बंदूक लेकर आया। आधी रात को जीबोन मुझे मारने के लिए गांव आया। उसने मेरे गांवों के लोगों से कहा, ÷÷चलो अब सागू को मारेंगे।''
मेरे गांव के लोग थर थर कांपने लगे। एक सौ रुपये जीबोन को पहले से दे दिये गये थे, बाकी सौ काम पूरा हो जाने के बाद देने थे। लोग बोले, ÷÷हम लोग सागू मुंडा के घर नहीं जाएंगे।'' जीबोन ने कहा, ÷÷मैंने सागू का घर देखा नहीं है। वह कहां सोता है, मैं यह भी नहीं जानता। अब तो तुम लोगों का दिया सौ रुपया मैं ले जाऊंगा।''
बाद में चल कर जो व्यक्ति मुझे मरवाना चाहते थे, उन्होंने ही इस घटना का वृत्तांत मुझसे बतलाया।
इस घटना के कुछ दिनों के बाद रांची विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ए.बी. शरण अपने शोध सहयोगी के साथ जोजोहातु आये। वे मेरी मदद लेते थे। मैंने जीबोन वाली घटना को उनके सहयोगी से कहा और उसने प्रो. शरण से कह दिया तो प्रो. शरण सुखदेव बरदियार के साथ मएपन हातु जीबोन के घर गये। जीबोन ने भी प्रो. शरण को यह वृत्तांत बतला कर तथ्य की पुष्टि कर दी और उन्हें वह बंदूक भी दिखलायी। कुछ दिनों के बाद प्रो. शरण ने चिट्ठी लिख कर जीबोन को रांची बुलाया। जीबोन अपने दमाद लक्खन स्वांसी के साथ रांची गया। प्रो. ने दोनों का अच्छा अतिथि सत्कार किया। प्रो. ने जीबोन से कहा, ÷÷आप सागू मुंडा को मत मारिए। वह विद्वान आदमी है। हम लोग उनके पास सीखने के लिए जाते हैं। आप उन्हें मत मारिए।''
जीबोन ने प्रो. के सामने किरिया खायी, ÷÷मैं सागू को नहीं मारूंगा।''
एक दिन मरांगहादा बाजार में जीबोन ने मेरे पैर छुए। मुझे पिता जी कह कर सम्बोधित किया और बोला, ÷÷मैं प्रो. के सामने आपको नहीं मारने की किरिया खाया हूं। अब आप मुझसे मत डरिए।''
मैंने कहा, ÷÷तुम किसी भी जीव को मत मारो। सब ईश्वर के ही पुत्रा हैं। तुम्हारे हाथ पांव मजबूत हैं। शरीर का गठन अच्छा है। तुम मेहनत करके खाओं।''
जीबोन की कहानी समाप्त हुई।
आसपास के जितने गुंडे थे, सब मुझे मारना चाहते थे और मैंने उन सबों को परास्त किया था। उटड़ुंग गांव में पांडेया मुंडा नाम का एक भारी गुंडा था। उस गुंडे ने साइको बाजार से लौटती हुई एक स्त्राी को कत्ल भी कर दिया। काहेतोबिन हातु का बुड़न मुंडा भी, जो कद में काफी ऊंचा और गुंडा था, इस हत्या में पांडेया मुंडा के साथ था। उस लड़की की हत्या का समाचार पुलिस को मिला लेकिन पुलिस हत्यारों को पकड़ नहीं सकी क्योंकि हत्या रात के समय हुई थी और उपयुक्त गवाह नहीं मिले। मैंने अपने और उसके, दोनों गांवों को मिला कर पांडेया को पकड़ लिया। उसे सभा में बुलाया गया। मैंने उसे समझाया कि तुम यह सब काम छोड़ दो और 70 रु. दे दो। लेकिन वह गांव छोड़ कर भाग गया। दूसरी जगहों पर हत्या और चोरी करने लगा। मेरे डर से अपने गांव नहीं लौटता। रात को कभी आता तो रात ही को वापस चला जाता। एक बार पांडेया और उसके साथी खिड़की के रास्ते मेरे घर में घुसे। उन्होंने सारा घर छान मारा लेकिन वे मुझे नहीं पा सके। मैं घर में ही सोया हुआ था। भगवान ने मुझे छुपा दिया था। एक बार गर्मी के दिन में मैं साइकिल पर बाजार जा रहा था। पांडेया भी मरांगहादा जा रहा था। रास्ते में भेंट हुई। मैं साइकिल से उतरा । उसने मुझे देखा और थर थर कांपने लगा। मैंने उससे पूछा, ÷÷तुम कहां रहते हो?''
उसने कहा, ÷÷टाटा में।''
÷÷हे पांडेया! तुम झूठ बोलते हो। तुम लोगों को काटते ओर लूटते हो, फिर भी 70 रुपये क्यों नहीं देते? 70 रुपये देकर तुम गांव में रहो।''
लेकिन उसने पैसे नहीं दिये। एक बार वह मुरहू बाजार गया तो उसे उधर के लोगों ने कत्ल कर दिया। गीध उसकी लाश खा गये।
उसके साथी बुड़न को भी दुहमी गांव के लोगों ने काट दिया।
बीचागुटू में सनिका नाम का एक लोहरा था और बुरुहातु में सोनाराम नाम का दूसरा लोहरा था। ये दोनों गुंडे थे। एक दिन मरांगहादा बाजार से लौटते हुए उन दोनों ने मुझे रास्ते में आम के बड़े पेड़ के निकट टुंगरी के पास रोकना चाहा। मैंने साइकिल वाला रास्ता छोड़कर खेतों के बीच वाला रास्ता चलना शुरू किया। मैंने देखा कि वे दोनों गुंडे एक कटहल के गाछ के नीचे बैठे हैं। बुहातु के राधिका मुंडा ने कुछ गुंडों को लगभग 100 रुपये बुरुहातु के कुरचू मुंडा को मारने के लिए दिए। कुरचू एक नामी आदमी था। बी.डी.ओ. उसे पसंद करता था। एक दिन लांदुप बजार में कुरचू शराब बेच रहा था। उसे बजार में काफी देर हो गयी। घड़े में बची हुई शराब को ढोकर वह अपने गांव लौट रहा था। उसके पीछे गुंडे लग गये। गुंडों ने कुरचू मुंडा पर बंदूक चलायी। कुरचू ने उन्हें देखने के लिए अपना सिर पीछे घुमाया तो छर्रा उसके कंधे पर लग गया। कुरचू भाग गया। कुछ दिनों के बाद वे गुंडे राधिका मुंडा से अपनी बकाया रकम मांगने गये। तब राधिका मुंडा ने उनसे कहा, ÷÷मैं पूरे पैसे नहीं दूगा क्योंकि तुम लोगों ने मेरा सौंपा काम पूरा नहीं किया। कुरचू अभी भी जिन्दा है।''
यह सुन कर सभी गुंडे राधिका के घर रात को आ गये। उन्होंने राधिका को पुकारा। राधिका बाहर निकला तो उन्होंने उसे पकड़ लिया और गांव के बाहर ले गये। फरसा उस पर तान कर उन्होंने कहा, ÷÷तुम रुपये दोगे या नहीं?''
उनके साथ घर लौट कर राधिका ने अपनी औरत को बाहर से पुकारा और कहा कि अमुक स्थान से रुपये निकाल कर ले आओ। रुपये के साथ एक सफेद बकरा भी वे ले गये। दूसरे दिन लांदुप पंचायत में राधिका ने इस घटना को अपने घर डकैती कह कर उन पर केस कर दिया। ग्राम सेवक मनिराम ने राधिका की दरखास्त लिखी। मनिराम ने मरांगहादा में मुझसे कहा कि एक केस है। उसे कैसे निपटाना है, जरा सहायता कर दीजिए। मैं उसके घर गया। दरखास्त कई दिन पहले लिखी हुई थी। मैंने उससे कहा, ÷÷डकैती के केस की दरखास्त इतने दिन से लिख कर घर में रखना गलत है। ताजा दरखास्त लिखो (उन दिनों मैं जोहोहातु का सरपंच था। कांडे ग्रामसेवक था।) हम लोग गुंडों को पकड़ने के लिए बुरुहातु गये। वहां हमने सनिका और सोनाराम, इन दोनों गुंड़ों को पाया। मैंने सोना को पकड़ा लेकिन मैं बूढ़ा वह जवान। वह छिटक गया। मेरी किसी ने सहायता भी नहीं की। उसने चाकू निकाला। मेरे सब साथी डर गये। दूसरे दिन खूंटी थाने में हम लोगों ने राधिका की रिपोर्ट दर्ज करा दी। दरोगा बेनीप्रसाद आये। लेकिन उसने गुंडों को नहीं पकड़ा, उल्टे वह राधिका से सौ रुपये मांगने लगा, क्योंकि गुंडों ने एक दिन पहले ही खूंटी पहुंच कर दरोगा को 200 रुपये देने का वायदा किया था। गुंडों ने रुपये हासिल करने के लिए टुड़ाकेला गांव (खूंटी की तरफ) के खलिहान में सोये एक आदमी पर गोली चला दी। हम लोगों ने दरोगा पर घूस लेने का केस चलाया। तब दरोगा ने गुंडों को पकड़ने की कोशिश की। तब दरोगा ने सनिका और सोनाराम को पकड़ कर बीचागुटु में खूब पीटा। तब गुंडों के पास बंदूक और कारतूस बरामद हुए। उन्हें हाजत में भेज दिया गया। उन्हें दो दो बरस की सजा हुई। दरोगा को थाने से हटा कर टाउन में भेज दिया गया।
एक दिन मैं मरांगहदा बाजार से साइकिल पर लौट रहा था। दो गुंडे साइकिल पर मेरे आगे आगे चल रहे थे। मैं नहीं जानता था कि वे गुंडे हैं। उनमें से एक को मैंने पहले भी देखा था। जब मैं उनके निकट पहुंचा तो दोनों सड़क के दो किनारों पर हो गये। मैंने देखा, उनका बलुआ और शरीर थरथर कांप रहा था। उनमें मारने का साहस नहीं हुआ।

मेरी शादी 1925 में हुई थी। तब हम लोग चार भाई थे। मेरी शादी के बाद मंझला भाई अलग हो गया। हम तीन भाई एक ही घर में रहते थे। जिसमें अभी मनोहर रहता है जो मेरे छोटे भाई चट्टान सिंह का लड़का है।
1927 में मेरी लड़की सालमी का जन्म हुआ और छोटी लड़की जयमुनी का जन्म 1950 में हुआ। 1930 में मेरे छोटे भाई का विवाह हुआ। शादी के बाद वह अपनी ससुराल में 12 वर्ष तक रहा। 1942 में वहीं पर बीमार पड़ा। हम लोग उसे ढोकर लाये। बाद में वह मर गया। इसके बाद दो वर्ष तक मेरा परिवार और छोटे भाई चट्टान सिंह का परिवार एक ही साथ रहा। फिर दोनों परिवार अलग हो गये। अलग होने के बाद मैं अपने बड़े भाई के साथ रहने लगा। उसी दौरान मैंने अपना मौजूदा घर बनाया। मैं पहले कभी भी बाजार से कोई तरकारी या चावल नहीं खरीदता था। 1950 में मेरा बड़ा भाई मर गया। अपनी स्त्राी और बच्चों के साथ हम सिर्फ तीन व्यक्ति अब रह गये। 1972 में मेरी बुढ़िया भी मर गयी। मैंने 18 वर्षों तक सरपंच का काम किया और 17 वर्षों तक रांची रेडियो में अपनी कविता और गीत गाकर सुनाता रहा। तीन बरस तक मैंने गोस्नर मिशन में प्रचारक का काम भी किया। उस समय मैं 18 वर्ष की उम्र का था। पहले हमारा परिवार ईसाई था लेकिन सन्‌ 1932 से मैंने गिरजा जाना छोड़ दिया। गिरजा नहीं जाने का यही कारण था कि सामूहिक रूप से ईश्वर की स्तुति करना बेकार है। गिरजा में सैकड़ों आदमी एक साथ हल्ला करते हैंᄉ उसमें से कोई पापी है, कोई धार्मिक है। ईश्वर किसकी सुनता होगा? इसलिए मैं अकेले ही अपना धर्म निभाता हूं। मैं किसी दूसरे के घर में नहीं खाता और नशीली वस्तुओं का सेवन भी नहीं करता हूं। दूसरों की कमाई को खाना मैं पाप समझता हूं। मैं अपने जीवन में सभी जातियों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता आया हूं और कभी किसी को ऊंच नीच नहीं समझा। मैंने अंगे्रजी काल में जन्म लेकर भी बहुत सुख भोग किया क्योंकि दो आने सेर चावल था और धोती बारह आने में मिलती थी। साड़ी एक रुपये में मिलती थी। लेकिन वर्तमान समय में मुझे काफी कठिनाई उठानी पड़ती है क्योंकि सभी वस्तुओं का दाम बढ़ गया है और रुपया प्राप्त करने में मैं असमर्थ हूं। अंगे्रजी काल में चोरी नहीं होती थी, लोग कम पढ़े लिखे थे, सरकारी आदमियों से डरते थे। मैं अपने साथियों के साथ आनंदपूर्वक जीवन बिताता था। लेकिन आज गांव में मेरा कोई साथी नहीं, क्योंकि सभी आदमी शराब पीकर मस्त रहते हैं। नशेबाजों से मिलना मैं महापाप समझता हूं।
मेरी शादी दाऊद मुंडा की बेटी इलिसाबा सांगा से हुई थी। वह फुदी गांव की थी। शादी धूमधाम से हुई थी। मेरी शादी सरना टोली में एक पादरी मनसुख के द्वारा हुई थी। दाउद मुंडा की दो लड़कियां एक साथ विवाहित होकर विदा हुई थीं। मेरी शादी उसकी बड़ी लड़की से हुई थी। लड़की बिल्कुल अनपढ़ थी लेकिन आज्ञाकारी थी। वह किसी से झगड़ा तकरार करना पसंद नहीं करती थी। उसका रंग काला था। मेरे ही जितनी उंची थी और शादी के समय उसकी उम्र 17 वर्ष की थी। (लोअर स्कूल में मास्टरों ने मेरी जन्मतिथि 1905 लिख दी थी)।
मेरी पहली लड़की के बाद मेरी पत्नी को कोई बच्चा नहीं हो रहा था। लड़का एक भी नहीं हो रहा था। इसलिए मैं दूसरी शादी करना चाहता था। लेकिन मेरी पत्नी इसके लिए इजाजत नहीं दे रही थी। उसकी इजाजत के बिना दूसरी पत्नी लाने से झगड़ा झंझट होता। इसलिए मैंने दूसरी शादी नहीं की।

बिरसा भगवान के बाद छोटानागपुर में एक मुंडा सभा की स्थापना हुई। यह संस्था 1906 में बनी थी। इसे बनाने वाले दाउद बीरसिंह (बाजीगांव) याकूबा भेंगरा, इलियास तोपनो, सैमुअल पूर्ति (कोटना हातु) और याकूब (सीदू गांव) आदि लोग थे। इस सभा का उद्देश्य मुडांओं के भूमि सम्बंधी अधिकारों की रक्षा करना था। ये लोग गवर्नर के पास मेमोरेण्डम भेजे। गर्वनर ने सभा के सभापति दाउद बीर सिंह को बुलाया। बीर सिंह सैमुअल पूर्ति के साथ रांची पटना गया। सैमुअल बी.ए. पास था और बिहार उड़ीसा रजिस्ट्रार इंस्पेक्टर था। तब 1908 में छोटानागपुर टीनेन्सी एक्ट पास हुआ। 1931 में मैं भी मुंडा सभा का सेक्रेटरी बना। उस समय सभापति युसुफ सीतल (टकरा हतुदायी हातु) था। एक बार जोजोहातु में पंचायत हुई थी और युसुफ सीतल भी वहां आये हुए थे। वहीं पर उन्होंने मुझे इसका सेक्रेटरी बनाया। मुंडा सभा में ज्यादातर मुंडाओं का इतिहास सुनाया जाता था। 1932 में मुंडा सभा और छोटा नागपुर उन्नति समाज, दोनों की एक साथ बैठक हुई। उन्नति समाज वालों ने मुंडा सभा वालों को बुलाया। मुंडा सभा को उन्नति समाज में विलीन कर दिया गया। छोटानागरपुर उन्नति समाज जुवले लकड़ा, बंदी उरांब (रांची), जूलियस तिग्गा, जुना सुरेन आदि लोगों ने बनाया था। समाज में कभी कभी शरतचंद्र राय भी आते थे। इस समाज की बैठकों में भी मुंडाओं की संस्कृति और इतिहास सुनाया जाता था। इसी उन्नति समाज में राजनीति सम्बंधी व्याख्यान भी होते थे। इससे मुझसे राजनीति के प्रति भी जागृति हुई। उन्नति समाज में बड़े बड़े लोग सभापति सेक्रेटरी थे। मैं तो सिर्फ उसका एक जवान सदस्य था। उन्नति समाज ने कोई काम नहीं किया, सिर्फ उसके पैसों से हरमू नदी के पास एक सभा भवन का निर्माण हुआ। चार हजार रुपये में जमीन खरीदी गयी। सेटलमेण्ट के बाद सरकार ने दफा 85 लगायी (मालगुजारी बढ़ाने का एक्ट) जिसे खत्म करवाने के लिए उन्नति समाज ने काफी संघर्ष किया। यह संघर्ष कानूनी ढंग से चला। लेकिन सरकार नहीं झुकी। कांगे्रस की प्रांतीय सरकार के गठन के बाद दफा 85 को हटा दिया गया। इस उन्नति समाज से मैंने कुछ इतिहास सीखा और कुछ राजनीति भी। इस समाज में सुकटा पाहन (मरांगडीह हातु) इतिहास बतलाते थे। वह कहता था कि पहले हम लोग काबुल में आये। वहां से हम आजमगढ़ में आये। आजमगढ़ से हम रोहतासगढ़ में आये। वहां से मुंडारपहाड़ (पिठौरिया के पास) आये। सुकुटा ने इतिहास दाउद बीर सिंह से सीखा था। सुकुटा मुझसे बड़ी उम्र का था। उन्नति समाज की महासभा रांची में होती थी। रांची हम लोग पैदल जाते थे। बस नहीं थी। केवल लालगाड़ी (डाकगाड़ी) होती थी। लकड़ी और चावल ढोकर हम लोग 10-12 आदमी रांची जाते थे। महासभा हर साल मई महीने में होती थी। क्योंकि जुएल लकड़ा हाई स्कूल में प्रिंसिपल थे। मई में लड़कों की छुट्टी रहती थी, इसलिए उन्हें भी फुर्सत रहती थी और गोस्सनर मिशन स्कूल का छात्राावास महासभा में भाग लेने वालों के लिए खाली रहता था। दाउद बीरसिंह पहले सरदार पार्टी में थे। सरदार लोग मुंडाओं का इतिहास अच्छी तरह जानते थे। सुकुटा पाहन लिखना पढ़ना नहीं जानता था।
आगे चल कर छोटानागपुर उन्नति समाज को आदिवासी महासभा में बदल दिया गया, 1937 ई. में। जुएल लकड़ा इस परिवर्तन का नेता था। इसी आदिवासी महासभा ने 1937 में महान नेता जयपाल सिंह को ब्रिटेन से भारत में बुलाया। 1938 में जब प्रांतों में चुनाव हुआ तो उसमें आदिवासी महासभा के विधानसभाई उम्मीदवार हार गए। तब इसके नेताओं ने सोचा कि आदिवासी महासभा के नाम से हम चुनाव नहीं जीत सकते। आदिवासी कहने से तो सिर्फ आदिवासी ही वोट देंगे, दूसरी जातियों के लोग नहीं। इसलिए जयपाल सिंह ने एक राजनीतिक पार्टी ÷झारखंड पार्टी' 1938 में बनायी। 1939 में दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। युद्ध छिड़ जाने पर अंग्रेजों ने राष्ट्रपति और गवर्नर का पद कांग्रेस को देने से इनकार कर दिया। युद्ध के दौरान सभी राजनीतिक गतिविधियां ठप्प पड़ गयी। जयपाल सिंह अंग्रेजों की मदद में कर्नल का पद संभालने लगे। युद्ध समाप्त होने पर 1946 में फिर चुनावों की घोषणा हुई।
1938 में झारखंड पार्टी बनने से पहले छोटानागपुर उन्नति समाज में अलग छोटानागपुर प्रांत की मांग उठाते थे। मैंने संथालपरगना का नाम भी नहीं सुना था और हमारे उन्नति समाज में संथाल नहीं थे। बाद में जयपाल सिंह की पार्टी ने छोटानागपुर के साथ संथाल परगना को जोड़ कर झारखंड अलग प्रांत की मांग को उठाया।

गाउआ मुंडा (सेरेंगडीह) का जन्म लगभग 1820 के आसपास हुआ था। इतिहास जानने के लिए गाउआ से मिला था। 1832 में मुंडा विद्रोह के समय गाउआ 10-12 साल का था और बकरियां चराता था। 1832 की लड़ाई जिकिलता के मैदान में और बुंडूतमाड़ में हुई थी। मैं जब नौजवान था उस समय गाउवा बहुत ही बूढ़ा था और वह लाठी के सहारे चलता था। बिरसा आंदोलन में गाउआ ने अंग्रेजों की मदद की थी। इसलिए पुरस्कार स्वरूप उसे मुफ्त एक छोटी बंदूक दे दी गयी थी। 1832 के विद्रोह में कैप्टन कैमेक की पलटन को मुंडाओं ने मारा था। कैमेक के साथ नागवंशी राजा प्रताप उदयनाथ भी था। कैप्टन ने राजा से कहा, ÷÷मुंडा बहुत सुदृढ़ हैं। इनके धर्म को भ्रष्ट करने के लिए मैं एक नया धर्म लाऊंगा। आपका क्या विचार है?'' राजा ने कहा, ÷÷जरूर लाइए।'' मुंडा और उराव ही हमारे असल शत्राु हैं।'' तब कैप्टन ने इंग्लैड से मिशनरियों को बुलाने के लिए चिट्ठी लिखी। सबसे पहले 1845 में जर्मन मिशन आया। गाउवा मुंडा ने प्राईवेट तौर पर शिक्षा प्राप्त की थी। लिपि कैथी थी।
मैं जामिड़ी हातु के प्रभुदयाल से मिला। वह गाउवा से कम उम्र का था। उसके यहां हम चार आदमी चावल बांध कर सीखने के लिए गये थे। वह काफी जानकार आदमी था। वह मूल रूप से चोंडोर का निवासी था। प्रभुदयाल ने हमें चोंडोर के पूर्वजों का और हांसदाः का इतिहास बतलाया। अधिकतर इतिहास मैंने प्रभुदयाल से ही सीखा था। प्रभुदयाल से मैं 17-18 वर्ष की उम्र में मिला था। गाउवा से मैं शादी होने के बाद मिला था। गाउवा के गांवों के नौजवानों को मैं कुश्ती सिखलाता था। गाउवा के खलिहान में ही मैं सोता था। आग तापते समय गाउवा हमें इतिहास बतलाता था। मैं सुन कर लिखता नहीं था। मन में याद रखता था।
सरदारी लड़ाई का एक नेता बिन्दा सरदार था। वह साड़ी गांव का था। उसका बड़ा भाई सिंगराम मानकी था। उस समय आदिवासियों को बहुत सताया जा रहा था। पंजाब के बहुत से मुसलमान व्यापारी रोम से सुंदर कपड़े लाते थे। ये व्यापारी सोनपुर के राजा हरिनाथ साहदेव के पास भी आये। व्यापारी ने राज परिवार के पास कपड़े बेचे। रुपये के बदले राजा ने साड़ी गांव और आसपास के कुछ गांव उसे जागीर के रूप में दिया। व्यापारी का नाम जपराली खां था। वह बदमाश था। वह बिन्दा की बहन को अपने पास रखना चाहता था। मुंडा लोग इस नये जागीरदार से बिगड़ गये। उन्होंने उसे मार भगाने का निश्चय किया। एक दिन उसे पकड़ कर जला दिया गया। बिन्दा के दोस्त काटे, सूय्या, तोपाई आदि भी सरदारी लड़ाई के नेता थे। विद्रोह हुआ और सरकार ने बिन्दा और उसके दोस्तों को फांसी दे दी।
मुंडा जाति में सबसे पहले रेडियो में मैं ही गया था, 1959 में एक बी.डी.ओ. था चंद्रदेव राम। वही मुझे रेडियो में ले गया था। वह ब्लाक का पहला बी.डी.ओ. था। उसने हमारे गांव में लड़कियों के लिए रात्रिापाठशाला खोली। वे पाठशाला देखने बराबर आते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि इन लड़कियों को गाना भी सिखलाइए। एक दिन उसने हम लोगों का सामूहिक गीत सुना और खुश हो गया। एक बार बगाई से कुछ अफसर आये थे। हम लोगों ने उन्हें नाच दिखलाया और गीत सुनाये। वे गीत रेकार्ड करके ले गये। इसी के बाद बी.डी.ओ. ने आकाशवाणी रांची में हम लोगों के गीत गाने का प्रबंध कर दिया। वहां बारह आदमियों का टेस्ट हुआ और हम सब पास हो गये। उस समय रेडियो में रेकार्डिंग नहीं होती थी। सीधे गाया जाता था। जबसे मैंने रेडियो में गाना शुरू किया, तब से मैंने अपने बनाये गीत लिखना भी शुरू किया। रेडियो वालों ने मुझसे बहुत अच्छा व्यवहार किया। मैंने कभी उनसे झगड़ा नहीं किया और न उन्होंने कभी मेरी शिकायत की। कांडे मुंडा ने मुझसे बहुत बाद में अपनी पार्टी बनायी, गीत गाने के लिए। एक बार विदेश में गीत भेजने के लिए कांडे को रेकार्डिंग के लिए बुलाया गया। रेकार्डिंग के बहुत दिनों बाद जब 300 रुपये आया तो अकेले कांडे ने 300 रुपये खा लियाᄉ अपनी पार्टी के सदस्यों को नहीं दिया। पार्टी के सदस्यों ने उससे झगड़ा किया। यह बात डायरेक्टर सुमन जी तक पहुंची। सुमन ने अगली रेकार्डिंग के समय कांडे को सिर्फ आने जाने के लिए दो रुपया भाड़ा दिया और बाकी रुपये उसकी पार्टी के लोगों के बीच बांट दिया। कांडे न पुराना इतिहास जानता है, न पुराना गीत। उसने मेरे जितना लिखा भी नहीं है। मुझसे कुछ सीख लिया है और अब घमंड करता है।
प्रोफेसर दूबे (अब मर चुके हैं) भी मेरे साथ आते थे। इन सबने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया। कुमार सुरेश सिंह के घर में मैं जाया करता था, रात को वहां ठहरा करता था। वह मुझे खाना खिलाता था, इज्जत से रखता था। उसकी पत्नी रांतू के महाराजा के भाई की लड़की थीᄉ बहुत सुंदर थीᄉ अधिक गोरी नहीं थी लेकिन उनमें से किसी ने भी कभी मुझे मेरी लिखी किताब छपाने के लिए नहीं कहा। सच्चिदानंद को मैंने जितनी बातें लिखवायीं, अगर उन्हीं सब को छपवाया जाए तो छः इंच मोटी किताब बनेगी। लेकिन मैंने इन शोधकर्ताओं से कभी रुपये पैसे की सहायता नहीं मांगी। इन लोगों ने भी कभी मेरी कोई सहायता नहीं की। सिर्फ एक बार सुरेश सिंह ने पटने से मुझे 10 या 15 रुपये भेजे थे। वह एक किताब लिखना चाहता था। सुरेश सिंह ने मुझे आदिवासियों के विभिन्न गोत्राों के पीछे की कहानी जानने का काम सौंपा था। यह जानकारी उसे डाक से भेजनी थी। इस काम में मुझे मुरहू इत्यादि दूर दूर के स्थानों पर घूमना था। इस घूमने के काम में खर्च करने के लिए उसने मुझे दस रुपये भेजे थे।
खूंटी में एक बार उसने मुझे पांच रुपये दिए और एक बार अपनी एक पुरानी पैण्ट भी उसने मुझे दी थी। यह पांच रुपये उसने खूंटी से अपने बिदाई के समय मुझे दिये थे।
सच्चिदानंद ने मुझसे जानकारी लेकर एक किताब लिखी थी। इस जानकारी के लिए मैं उसके साथ जगह जगह घूमता रहा। जब किताब छप गयी, तब वह कुछ व्यक्तियों के साथ किताब लेकर आया था। उसने मुझसे कहा कि तुम्हें इसके लिए पैसे मिलेंगे। उसने मुझसें एक कागज पर सही करवाया। पैसे देने की बात उसने मुझे जोजोहातु के वर्तमान वैद्य झाजी के सामने कही थी। दो तीन आदमियों के साथ मेरी फोटो भी खीची। इसके बाद वह चला गया। बहुत दिन बाद फोटो उसने मुझे भेज दी लेकिन पैसे आज तक नहीं भिजवाये। मेरे दस्तखत किये हुए कागज को भुना कर वह मेरे रुपये खा गया।

पहले मैं अपने गांव में सबसे श्रेष्ठ आदमी था। आज मैं सबसे नीचा आदमी हो गया हूं। परमेश्वर ने ही अब मुझे असहाय और नीचा बना दिया है। पहले मैं बलशाली था। गांव के सब लोग मुझसे डरते थे। मैं जब सरपंच थाᄉ खुद मैंने गांव के चार आदमियों को जेल भिजवाया था। अब मैं बूढ़ा हो गया हूं और लंगड़ा भी हो गया हूं। इसलिए मैं कमजोर और छोटा हो गया हूं। आज मेरी बात कोई नहीं सुनता है।

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