परस्पर
साथ का आखिर यह भी कैसा मकाम
कि आलिंगन और चुम्बन तक से अटपटा लगने लगे
ऐसे और बाकी शब्द भी अतिशयोक्ति मालूम हों
इसलिए उन्हें एकांत किसी जगह पर भी
महज एक दूसरे के हाथ छूते हुए से बैठना होगा
सामने से गुजरने वाले इक्का दुक्का लोगों को
यह देख कर भी कुछ अजब सा लगेगा
जहां जरा भी कुछ अलग करना नुमाइश हो जाना है
और थोड़ी दूर से उनकी खिलखिलाहट उन तक पहुंचेगी
और शायद एक लम्हे के लिए वे एक दूसरे को फकत देखेंगे
उनके हिस्से की धरती
सांझ की छाया की ओर घूम रही होगी
सूरज के डूबने का भ्रम रचती हुई
और जब चेहरे और मंजर धुंधले पड़ने लगेंगे
रात का कोई पहला पक्षी कुछ बोलना शुरू करेगा
तब वे उसी तरह चुप उठेंगे
उनके बीच वह होगा
जो न फासला है न नजदीकी सिर्फ संग है
शायद वह उसकी उंगलियां छोड़ चुका होगा
और नीचे देखता चल रहा होगा
जबकि वह सामने देखती होगी और घटते उजाले में
उसकी वह सोच भरी किंचित मुस्कान दिखाई नहीं देगी
इसी तरह वे वापस आयेंगे अपने चौथे मंजले पर
मन ही मन गिनते पांच दर्जन सीढ़ियां लगभग बिना दिक्कत चढ़ते हुए
और या तो वह कहेगी कितने दिन हुए तुम्हारे हाथ की चाय पिये
और वह अपने खुफिया नुस्खे से उसे तैयार करेगा
या वह खुद ही बिना कहे बना कर ले आयेगी
उसकी आसूदा उसांस उफान की झुलसती आवाज में डूबती हुई
उनकी आंखें स्वाद रंगत और गर्माहट पर सहमत होंगी
परस्पर आखिरी घूंट तक
लौटना
उसे जहां छोड़ा था
कभी कभी वहां जाकर खड़ा हो जाता हूं
कूडे+ के जिस अम्बार को देख
वह लपक कर दौड़ गया था
अब वहां नहीं है
दरअसल अब कुछ भी वहां उस दिन जैसा नहीं है
मैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी था
कि अगर लौट आये तो उसे वापस ले जाऊं
लेकिन वह सिर्फ एक बार मेरी तरफ देख कर
मुझे ऐसा लगा कि जैसे हंसता हुआ
कूड़ा खोदने में जुटा रहा
उसके बाद मैं चला आया लेकिन कई बार लौटा हूं
वह जगह अब एकदम बदल चुकी है
नयी इमारतों दूकानों की वजह से पहचानी नहीं जाती
वह कूड़ा भी नहीं रहा वहां
वह सड़क अंदर जहां जाती थी
उस पर भी कुछ दूर तक गया हूं
वह या उससे मिलता जुलता कुछ भी दिखाई नहीं देता
कभी कभी एकाध आदमी पूछ लेता है
किसे देखते हैं भाई साहब
नहीं यूं ही या कोई और झूठ बोल कर चला आता हूं
कई कारणों से वहां जाना कम होता गया है
और अब तो बहुत ज्यादा बरस भी हो गये
फिर भी कभी लौटता हूं सारी उम्मीदों के खिलाफ
और जहां वह कूड़े का ढेर था उससे कुछ दूर
वह उतनी ही देर
याद करता खड़ा रहता हूं कि कोई मददगार फिर पूछे नहीं
एक दिन ऐसे जाऊंगा कि कोई मुझे देख नहीं पायेगा
और बिना पुकारे पता नहीं कहां से
वह झपटता हुआ तीर की तरह आयेगा
पहचानता हुआ मुझे अपने साथ ले जाने के लिए
शुरुआत
अशोकनगर स्टेशन पर रात दो बजे
उन सैकड़ों की भीड़ देख कर दिल डूब गया था
अपनी स्लीपर की रिजर्व सीट भले ही न छिने
तो भी डिब्बे में घुस कर वे चैन से सोने नहीं देंगे
लेकिन वे बिना किसी शोरशराबे गाड़ी में दाखिल हुए
जिसको जहां बैठने या खड़े रहने की वाजिब जगह मिली
वह उस पर चुप रहा
ध्यान से देखा मैंने उन्हें
इस तरह के इतने मौन यात्राी मैंने कभी देखे न थे
अधिकांश खद्दर के सादा कपड़े पहने हुए
पैरों में सस्ते जूते भी कम किफायती चप्पलें ज्यादा
हरेक के कुर्ते कमीज की जेब पर उसकी पहचान पर्ची लगी हुई
वे बाहर के अंधेरे वीरान में उस तरह चुप तक रहे थे
जैसे सदियों से वंचित शोषित अवमानित लोग
अपने जीवन अपनी आत्मा अपने अतीत में देखते हैं
और प्रतीक्षा करते हैं
लेकिन उनके शरीर की भाषा में एक संयम था
उनके चेहरों पर एक अपूर्व संकल्प कभी कभी कौंध जाता था
बहुजन समाज के वे कार्यकर्ता
जिनमें कम्यूनिस्टों को छोड़ दीगर हर पार्टी के गिरोहों की
उठाईगीरी और उचक्केपन का अविश्वसनीय अभाव था
अपनी भोपाल की रैली के लिए कब बेआवाज उतर गये
मुझे अपनी नींद में मालूम न पड़ा
लेकिन मुझे खूब याद है
मैंने उन्हें उत्तर प्रदेश के शहरों और कस्बों में
उनके दफ्तरों में देखा है
जहां उनका सिर्फ एक नुमाइंदा पत्राकारों से बात करता था
आत्मसम्मान और गरिमा भरी मितभाषी तार्किकता और दृढ़ साफगोई से
और उसके आसपास बाकी सारे ऐसे ही कार्यकर्त्ता
उसे तल्लीन मौन वर्ग-गर्व से देखते थे ᄉ
उन दृश्यों से मुझे हमेशा लेनिन को घेरे हुए
दमकते चेहरों वाले बोल्शेविक काडरों की तस्वीरें याद आती थीं ᄉ
मैंने उन्हें आम्बेडकर साहित्य और महात्मा फुले की जीवनी खरीदते देखा है
उन्होंने कभी कभी मुझसे बातें भी की हैं
गुंडागीरी अश्लीलता और शोहदेपन का उनमें नाम नहीं
तुम जो उनके कथित नेताओं के कदाचार से इतने खुश हो
खुश हो कि तुम्हारे जितना पतित होने में उन्हें कितना कम वक्त लगा
और सोचते हो कि तुम्हारी आंखों में ये नीच लोग
इसी तकदीर के काबिल हैं
अव्वल तो तुम यह भूलना चाहते हो
कि द्विजों के पांच हजार वर्षों के पाशविक तंत्रा में
यही सम्भव है और कुछ दिन और रहेगा
कि रिश्वतखोर और धूर्त सवर्ण साथ दें
एक पथभ्रष्ट उनके लिए अस्पृश्य नेतृत्व का
और दूसरे तुमने वे चेहरे देखे नहीं है
जो इस किमाश के वंचित नेताओं बुद्धिजीवियों के नहीं हैं
बल्कि अभी तक सताये जा रहे निम्नतम वर्गों के हैं
लेकिन जिनकी आस्था और एकजुटता मैंने देखी है
जो न बिके हैं और न गिरे हैं न गिरेंगे
वे ही एक दिन पहचानेंगे
मायावी राजनीति की काशी करवटों के असली चेहरे
शनाख्त करेंगे हर जगह छिपे हुए
मनु कुबेर और लक्ष्मी के दास दासियों की अपने बीच भी
तुम्हारी द्विज राजनीति पिछले सौ वर्षों में सड़ चुकी है
और तुम उस मवाद को इनमें भी फैलती समझ कर सुख पाते हो,
लेकिन इनकी आंखों में और इनके चेहरों पर जो मैंने देखा है
उससे मैं जानता हूं
कि तुम्हारे पांच हजार वर्षों की करोड़ों हत्याओं के बावजूद
ये मिटे नहीं हैं और अब भी तुम्हारे लिए पर्याप्त हैं
तुम्हारे साथ अपने कठिन युद्ध का यह मात्रा प्रारम्भ है उनका
फिर तुम देखोगे कि अपने दूसरे समानधर्मा भी पहचान लेंगे ये
जो पहले से ही सक्रिय हैं
और इसी दुहरी समझ से अंततः जन्म लेंगे
और किसी द्विज कुल में कभी नहीं
कल्कि जैसे कई जो बुद्ध के बाद विष्णु के नये अवतार नहीं होंगे
मात्रा मुक्तिदाताओं में होंगे हमारे
अपने समूचे समाज के और तुम्हारे सारे कलुष के
अक्स
आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये ᄉ
फिर भी इतना मुश्किल नहीं
वह शीशे में
यूं और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ जो दिख रहा है वह पुर्जा पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ
पाठांतर
उम्र ज्यादा होती जाती है
तो तुम्हारे आसपास के नौजवान सोचते हैं
कि तुम्हें वह सब मालूम होगा
जो वे समझते हैं कि उनके अपने बुजुर्गों को मालूम था
लेकिन जो उसे उन्हें बताते न थे
सो वे तुमसे उन चीजों के बारे में पूछते हैं
जिन्हें तुम खुद कभी हिम्मत करके
लड़कपन में अपने बड़ों से पूछते थे
और तुम्हें कोई पूरा तसल्लीबख्श जवाब मिलता न था
फिर भी उतनी व दूसरी सुनी सुनाई बहुत सी बातें
प्रचलित रहती ही थीं
और अलग अलग रूपांतरों में दुहरायी जाकर
वे एक प्रामाणिकता हासिल कर लेती थीं
सो तुम भी उन कमउम्रों को कमोबेश वही बताते हो
अपनी तरफ से उसे कम से कम अविश्वसनीय बनाते हुए
उस यकीन के साथ जो
एक खालिस लेकिन लम्बी बतकही पर आश्रित रहता है
और वे हैरत में एक दूसरे को देखते हैं
और तुम्हें काका या दादा सम्बोधित करते हुए
आदर से बोलते हैं कि आपको कितना मालूम है
अब तो इससे चौथाई जानने वाले लोग भी नहीं रहे
आपसे कितना कुछ सीखने जानने को है ᄉ
और अचानक तुम्हें अहसास होता है
कि जो तुमने उन्हें बताया उसे अपनी सचाई बनाते हुए
जब ये लोग अपने वक्त अपने नौजवानों से मुखातिब होंगे
तो तुम जैसों के हवाला बना कर या न बना कर
वही दुहरा रहे होंगे
जो तुम्हें अनिच्छा से बताया था तुम्हारे बुजुर्गों ने
अपने बड़ों से उतनी ही मुश्किलों से पूछ कर
लेकिन उस पर एक अस्पष्ट यकीन करके
और उसमें अपनी तरफ से कुछ भरोसेमंद जोड़ते हुए ᄉ
इस तरह धीरे धीरे हर वह चीज प्रामाणिक होती जाती है
और हर एक के पास अपना उसका एक संस्करण होता है
उतना ही मौलिक और असली
और इस तरह बनता जाता होगा वह
जिसे किसी उपयुक्त शब्द के अभाव में
परम्परा स्मृति इतिहास आदि के
विचित्रा किन्तु अपर्याप्त बल्कि कभी कभी शायद नितांत भ्रामक
नामों से पुकारा जाता है।