मानव इतिहास में कभी कभी ऐसे क्षण भी आये हैं जब एक स्थान विशेष का इतिहास एक स्थान का ही सीमाबद्ध इतिहास न रह कर एक पूरे देश या देश समूह का ही नहीं समस्त मानवता की नियति और भविष्य का निर्णायक बन जाता है। मानव इतिहास के इस महत्वूपर्ण तथ्य से मेरा और मेरे नेतृत्व में अक्टूबर सन् 1984 में रूस यात्रा पर गये हुए, समाज वैज्ञानिक और साहित्यकार बंधुओं के प्रतिनिधि मंडल का साक्षात्कार तब हुआ जब हमने लेनिनग्राड की यात्रा की और हमें विशेष रूप से 7 अक्टूबर 1984 को 4 बजे के आसपास बेहद शानदार और विशाल ÷वार मेमोरियल' यानी द्वितीय महायुद्ध के विस्मयकारी स्मारक को देखने का मौका मिला। एक माने में असाधारण विनाशकारी द्वितीय महायुद्ध में हार जीत का फैसला यदि किसी देश की भूमि पर निर्णायक रूप से तय हुआ तो वह रूस की भूमि थी और रूस की भूमि पर जिस स्थान को इस युद्ध में हार जीत की निर्णायक भूमिका का गौरव और गरिमा प्राप्त हुई, वह लेनिनग्राड की भूमि थी।
सामरिक दृष्टि से अत्यंत संगठित और विज्ञान तथा टेक्नालाजी की अत्यंत विध्वंसकारी शक्तियों से लैस फासीवादी हिटलर की फौजों द्वारा लेनिनग्राड की करीब 900 दिन की घेराबंदी के दौरान लेनिनग्राड ने जिस असाधारण वीरता, साहस, त्याग और बलिदान का परिचय दिया विश्व के समस्त इतिहास में उसकी मिसाल शायद नहीं मिलेगी।
जर्मनी और रूस के बीच का यह महायुद्ध केवल जर्मनी और रूस के बीच का महायुद्ध नहीं रह गया था जिसमें हार या जीत का नतीजा जर्मनी और रूस की नियति का ही निर्णायक बनता। यहां तक कि जर्मनी और रूस की टकराहट केवल फासीवादी और दूसरी समाजवादी एवं उसकी सहयोगी लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं का ही ऐतिहासिक टकराव नहीं था। अनेक इतिहासकारों ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि यह टकराव बुनियादी रूप से बर्बरता और सभ्यता की प्रतिनिधि शक्तियों के बीच का टकराव था जिसमें सभ्य कहे जाने वाले देशों का भविष्य दांव पर लगा था। इसमें यदि भयावह और नृशंस बर्बरता का नेतृत्व कर रहा फासीवादी जर्मनी विजयी हो जाता तो रूस ही नहीं सम्य कहलाने वाली समस्त मानवता का भविष्य लम्बे अरसे के लिए अंधकारमय हो जाता। इस महायुद्ध में ब्रिटेन के नेता के रूप में बड़ी भूमिका निभाने वाले सर विन्सटन चर्चिल को किसी माने में समाजवादी रूस का प्रशंसक नहीं कहा जा सकता, उन्हीं के नेतृत्व में रूसी समाजवादी राज्य को विश्व के नक्शे से ही मिटा देने के कितने षड्यंत्र रचे गये थे और कितने सामरिक अभियान संगठिन हुए थे। लेकिन द्वितीय महायुद्ध के दौरान उन्हें सब कुछ भूल कर विश्वव्यापी फासीवाद विरोधी मोर्चे में रूस को शामिल करने और उसके साथ सहयोग के लिए पहल करनी पड़ी, जबकि पश्चिमी फासीवादी शक्तियों के अत्यंत आक्रामक हमलों से स्वयं को भयावह रूप से वे संकटग्रस्त महसूस करने लगे। रूस पर हिटलर के आकस्मिक और भयानक रूप से आक्रामक हमले के बाद यह स्पष्ट हो गया की रूस की भूमि पर विशेषकर लेनिनग्राड की जमीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई सिर्फ लेनिनग्राड या रूसवासियों या सोवियतसंघ के देशों की ही नहीं समस्त सभ्य, शांतिप्रिय और युद्धविरोधी, बर्बरता विरोधी मानवता कीहै।
पश्चिमी देशों के प्रबुद्ध समुदाय ने इस तथ्य को सबसे पहले महसूस किया और अपने अपने देशों में रूस से सहयोग करने का माहौल पैदा किया। इसी माहौल का ही दबाव था कि समस्त पुराने पूर्वाग्रहों और प्रतिकूल भावनाओं को भूल कर नये दौर के आग्रहों को स्वीकार करने और उन्हें निःसंकोच अभिव्यक्त करने वालों में ब्रिटिश नेता और प्रधानमंत्री स्वयं सर विन्सटन चर्चिल अग्रणी थे। महायुद्ध के मध्य रूस की यात्रा के दौरान मास्को में चर्चिल का निम्नांकित कथन इतिहास के दस्तावेजों में ऐतिहासिक महत्व का बन गया। चर्चिल ने तब कुछ इस प्रकार के भाव प्रकट किये थे − ÷÷आज इस संकट की घड़ी में आधुनिक सभ्यता के भविष्य की रक्षा में सबसे निर्णायक भूमिका रूस की, रूस की बहादुर लाल सेना की और रूस के सर्वोच्च नेता मार्शल स्तालिन की है।''
प्रश्न उठता है कि क्या चर्चिल का यह कथन अत्यंत कठिन परिस्थितियों और गम्भीर खतरे के दबाव में व्यक्त हुआ एक क्षणिक भावावेश था? सोवियत संघ से सम्बंध महायुद्ध की विभीषिकाजन्य विवशता में किया गया एक अस्थायी समझौता था? दरअसल इन सबके प्रेरक कारकों में उन बुनियादी मूल्यों, नैतिक मान्यताओं और सैद्धांतिक सरोकारों से पैदा हुई वे प्रेरणाएं, वे आग्रह और वे मानसिक प्रक्रियाएं थीं जिन्हें उस आधुनिक नवजागरण ने जन्म दिया था जो क्लासिकल उदारवाद (पूंजीवादी लोकतांत्रिाक व्यवस्था का सैद्धांतिक आधार) और क्लासिकल मार्क्सवाद (साम्यवाद का सैद्धांतिक आधार) दोनों से मूल रूप से घनिष्ठ और अटूट सम्बंध स्थापित करता था। संकट काल में दोनों खेमों में उन मूल प्रेरणाओं और समान नैतिक सरोकारों की चेतना जगी थी जिन्हें दोनों खेमों के विचारकों और सिद्धांतों को व्यावहारिक बनाने वाले राजनेताओं ने भुला दिया था। प्रश्न था कि क्या दोनों खेमों की महायुद्ध के समय की यह एकता महायुद्ध के बाद भी जारी रहेगी और क्या यह नये विश्व, नयी व्यवस्था, नये दौर के निर्माण में भी एक महत् नये प्रयोग में सहायक बनेगी? या महायुद्ध के बाद फिर दोनों खेमे पुरानी प्रतिद्वंद्विता, आपसी विद्वेष और शत्रुता तथा विरोध और प्रतिरोध की पुरानी पटरी पर वापस आ जायेंगे। महायुद्ध के दौरान दोनों खेमों के बीच दरार को पाटने और फासीवाद द्वारा छेडे+ गये महायुद्ध की चुनौती का सामना करने के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाने के कृत्य ने इस एकता को महायुद्ध के बाद के शांति के दौर में जारी रखने और समान आदर्शों के अनुकूल एक नयी व्यवस्था के निर्माण में सहयोग के रास्ते खोजने की एक जोरदार सम्भावना, आशा अवश्य पैदा की थी। महायुद्ध के बाद के फ्रांस और इटली में यह सम्भावना एक ठोस विकल्प की तलाश में बदल गयी। मसलन फ्रांस का पाप्यूलर फ्रंट जिससे कम्यूनिस्ट और भिन्न लोकतांत्रिाक रुझानों के बीच सहयोग का कार्यक्रम चालू हुआ। इटली में हिस्टोरिकल कम्प्रोमाइज अवधारणा इसी प्रकार के वैकल्पिक कार्यक्रम की तलाश की प्रेरक बनी। यह सम्भावना पूरी तरह कार्यान्वित नहीं हो पायी और क्यों कुछ ही वर्षों बाद सहयोग नहीं प्रतिरोध का स्वर महायुद्ध के बाद फिर से मुखर और प्रखर हो गया और विनाशक शीतयुद्ध का रूप ले लिया जिसने पश्चिमी देशों और सोवियत देशों के बीच घृणा और वैमनस्य की भयावह खाईं पैदा कर दी। फासीवादी बर्बरता गयी पर उसकी जगह एक नयी बर्बरता हावी हो गयी। यह मानसिक हिंसा (प्रतिहिंसा) का भाव महायुद्ध काल की खुली मारकाट की हिंसा से अधिक आत्म विध्वंसक और सृजनशील शक्तियों की संहारक साबित हुई।
प्रश्न उठता है कि इंग्लिश्तान की युद्ध की विभीषिका और असुरक्षा से तंग आ गयी जनता ने महायुद्ध के बाद के चुनाव में असाधारण साहस और सहज बुद्धि का परिचय दिया और महायुद्ध के अति लोकप्रिय महानायक चर्चिल को अमन की तलाश में इंग्लिश्तान के प्रधानमंत्री पद के लिए एकदम आयोग्य माना। हालांकि महायुद्ध में उनकी शानदार भूमिका के लिए सभी सम्मानों से विभूषित किया लेकिन नये दौर की सम्भावनाओं और सहयोग एवं शांति की खोज में आगे बढ़ने के लिए उन्हें एक बाधा ही माना। महायुद्ध के महानायक को शांति के नये युग की नयी भूमिका के लिए अक्षम समझ उसे फिर से इंग्लिश्तान का कर्णधार न चुनने का जो ऐतिहासिक कदम इंग्लिश्तान की व्यवस्था के अंदर सम्भव था वह रूस की तानाशाही व्यवस्था के अंदर सम्भव न था। इसीलिए रूस के ग्रेट पेट्रियाटिक वार का महानायक स्तालिन महायुद्ध के बाद भी सत्तासीन रहा। हालांकि बाद की घटनाएं बताती हैं कि उसकी अलोकप्रियता की जड़ें बड़ी गहरी थीं लेकिन उसकी मृत्यु के बाद ही नेतृत्व में एक महापरिवर्तन सम्भव हुआ। स्तालिन की ज्यादतियों का उद्घाटन करने का साहस जुटाने वाला ख्रुश्चोव नया नेता बना। लेकिन यह अजूबा है कि इंग्लिश्तान के नये नेतृत्व ने चर्चिल के युग से सम्बंध विच्छेद तो किया लेकिन रूस के प्रति उसकी नीति चर्चिल के ढर्रे पर ही जारी रही। यही नहीं अमरीका में फोल्टन में दिये गये अपने भाषण के द्वारा शीतयुद्ध की घोषणा कर चर्चिल ही रूस के प्रति नयी नीति का प्रवर्तक बना रहा।
आयरन कर्टेन को तोड़ कर एक नये युग की आशा जगाने वाला खु्रश्चोव भारत में अपने दौरे के द्वारा शांति की खोज में नेहरू का नया सहयात्री लगने लगा लेकिन शांतिकामी मानवीय समाजवाद के पक्षधर नेहरू की रूस में एक नये ÷था' (ज्ीूं) की उम्मीद और रूसी-पश्चिमी खेमे के बीच एक नये सेतुबंध की सम्भावना शीघ्र ही दोनों ओर से पुनः एक हार्डिनिंग के कारण निष्फल हो गयी। स्थिति यथावत हो चली। ख्रुश्चोव युग की जगह प्रच्छन्न स्तालिनवादी बे्रझनेव ने ले ली। यह विश्व इतिहास का एक बड़ा दुखद त्रासद अध्याय है जिसका गहरा विवेचन आज तक नहीं हो सका है क्या 21वीं सदी भी 20वीं सदी की इस त्रासदी का भार ढोती रहेगी या एक नयी पीढ़ी एक नयी लहर का सूत्रपात करेगी।
आज से करीब 25 वर्ष पूर्व अक्टूबर 7, 1984 की शाम जब हम एक रूसी तरुणी से लेनिनग्राड की 900 दिनों की घेराबंदी के दौरान रूसी जनसाधारण, सैन्य और सामरिक दलों और अन्य प्रबुद्धजनों तथा राजनेताओं द्वारा दी गयी अमर कुरबानी का फिल्म तथा तरुणी की मार्मिक टिप्पणी द्वारा उपलब्ध आंखों देखा बयान सुन कर अभिभूत हो रहे थे तब एक बात बार बार मेरे और मेरे साथियों के मन में गूंज रही थी। वह थी कि महायुद्ध के अंत के कुछ अरसे बाद ही रूस से सहयोग के अंत का और रूस के प्रतिरोध में एक नये अत्यंत तीव्र विद्वेष भरे ÷शीतयुद्ध' का एलान लेनिनग्राड की अविस्मरणीय शहादत की अवमानना और उसका तिरस्कार मात्र ही नहीं था, वह विश्व स्तर पर एक नयी मानसिक बर्बरता के ऐसे विस्फोट का आरम्भ भी था जिसका अंत आज भी नहीं हुआ है। मुझे याद आया जर्मन मार्क्सवादी विचारक रोजा लग्जमबर्ग का कथन − ÷समाजवाद या बर्बरवाद'। इसको याद करते हुए अपनी आत्मकथा ÷इंटरेस्टिंग टाइम्स' में प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने सही कहा था कि समाजवाद के गढ़ रूस के विरुद्ध शीतयुद्ध का एलान कर पश्चिमी देशों ने नग्न बर्बरवाद (बर्बरता) को ही जैसे खुली छूट दे दी − वैधता (लेजिटिमेसी) प्रदान कर दी। अंध कम्यूनिस्ट विरोध ने भयानक मानसिक अंधता को जन्म दिया और इसका फायदा उठा कर बर्बरवाद पश्चिमी लिबरल डेमोक्रेसी के एक एक स्तम्भ को ध्वस्त करता चला गया। फासीवाद विरोधी अभियान ने बर्बरता के प्रतिरोध में विश्वव्यापी सभ्यता के बुनियादी मूल्यों की रक्षा के लिए जिस प्रकार सभी सकारात्मक शक्तियों को एकजुट किया था, कम्यूनिस्ट विरोधी अभियान बर्बरता के युग का पुनरावर्तन बन गया, यही नहीं महत् अभिनंदन बन गया। ÷कम्यूनिस्टों के दुश्मन हमारे दोस्त' का सिद्धांत कम्यूनिस्ट प्रतिरोध के झंडे तले दुनिया भर के सभी धार्मिक कट्टरवादियों और प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथियों को लामबंद कराने में समर्थ हो गया। आज के धार्मिक आतंकवादी जैसे बिन लादिन और तानाशाह जैसे इराक के पूर्व सदर सद्दाम हुसैन, ये सब पश्चिम के द्वारा मंच पर लाये गये नायक (खलनायक) ही तो थे। कम्यूनिस्ट व्यवस्था के ध्वस्त होने के बाद ये पश्चिम पर ही भारी साबित होने लगे और हो रहे हैं।
लेनिनग्राड के इतिहास में अमर शहादत का पश्चिम ने यह कैसा भयावह उपहास किया और इस शहादत में निहित मूल्यों पर आधारित एक नये विश्वव्यापी विकल्प की खोज को त्याग देने की कितनी बड़ी कीमत समस्त मानवता को आज तक चुकानी पड़ रही है यह आगे आने वाले युग में और अधिक स्पष्ट हो जाएगा। जब तक सभ्यता के बुनियादी मूल्यों की आधारशिला पर इक्कीसवीं सदी में एक नयी मानवीय व्यवस्था के निर्माण को प्राथमिकता नहीं मिलती लेनिनग्राड की शहादत हमारी नैतिक अंधता और बर्बरता के खतरे से आंखें मूदने की प्रवृत्ति को झिझोड़ने और हमारी नैतिक चेतना को जागृत करने का माध्यम बनी रहेगी। मैंने अभी तक लेनिनग्राड की शहादत और द्वितीय महायुद्ध में रूस के सहयोगी पश्चिमी देशों द्वारा की गयी भयावह अवमानना को ही रेखांकित किया है। यह विवेचन अधूरा, एकांगी और पूर्वाग्रहग्रस्त माना जायेगा यदि स्वयं रूस के अंदर लेनिनग्राड की शहादत से उपजी बुनियादी मूल्यों की रक्षा में सकारात्मक सहयोग की खोज को प्राथमिकता देने के आग्रह के भयावह तिरस्कार को भी न रेखांकित किया गया। स्वयं रूस के अंदर स्तालिनवाद के मातहत समाजवाद की वैचारिक कट्टरता, असहिष्णुता और बौद्धिक असहमति का तिरस्कार और क्रूरतापूर्वक दमन स्वयं समाजवाद के बर्बरीकरण के ही प्रमाण थे। एक खेमे के बर्बरीकरण के महानायक दूसरे खेमे के अंदर बर्बरीकरण के सहायक ही बनते, संशोधन और सुधार के नहीें। एक खेमा दूसरे खेमे के अंदर बर्बरीकरण का सहायक बन कर विश्व भर में बर्बरीकरण का ही सहायक बनता रहा।
आज स्वीकार करना पडे+गा कि लेनिनग्राड के उस ÷वार मेमारियल' में तरुणी के मार्मिक बयान, लेनिनग्राड की 900 दिन घेराबंदी और उसको रूसियों द्वारा तोड़ने के भगीरथ प्रयास और उस प्रयास में अकथनीय रूसी बलिदान की गाथा ने यह अहसास तो जगाया कि अपने महायुद्ध के सहयोगियों के बलिदानों को भुला कर और फिर कम्यूनिस्ट विरोध द्वारा विश्व को बर्बरवाद की ओर ले जाने का जो अभियान पश्चिम ने शुरू किया उसके कितने घातक परिणाम हुए हैं। लेकिन स्वयं रूस के अंदर बर्बरवाद के अभ्युदय और उसके समाजवाद पर हावी हो जाने की प्रवृत्ति विश्व को बर्बरवाद की ओर पुनः धकेलने में कितनी सहायक बनी है इसका मुझे तथा मेरे दल के लोगों को पूरा पूरा अहसास उस समय नहीं था।
लेनिनग्राड की महान वीरगाथा और शहादत का बार बार जिक्र तो कर रहा हूं लेकिन तरुणी द्वारा दिखायी गयी फिल्म और सुनायी गयी गाथा सुन कर हम सबके दिल दहल उठे और पूरे घंटे भर आंखें नम होती रहीं। उस शाम की वार मेमोरियल यात्रा के बिना हम एक मार्मिक और महान अनुभव से वंचित रह जाते। कुर्बानी की बात सुनी थी लेकिन म्यूजियम के भीतर रखे डबल रोटी के स्लाइस से हमने जाना कि उन दिनों भिन्न भिन्न श्रेणी के लोगों के लिए उपलब्ध राशन किस स्थिति में पहुंच गया था। घेराबंदी के कारण माल का आना बंद होने के कारण भिन्न भिन्न श्रेणी के लोग किस तरह न्यूनतम राशन में जी रहे थे और लड़ाई लड़ रहे थे यह जानना रोंगटे खड़े करने वाला था लेकिन लेनिनग्राडियों की हिम्मत का जीवंत प्रमाण भी था।
लेनिनग्राड की घेराबंदी सितम्बर 1941 से जनवरी 1944 के आखिरी हफ्ते तक लगभग 900 दिन चली। हिटलर लगातार बमबारी और सभी दिशाओं से फौजी हमलों के द्वारा लेनिनग्राड को नक्शे से ही मिटा देने का ख्वाब देख रहा था। यह था म्यूजियम में देखा गया हिटलरी फरमान : ÷÷फ्यूहरर ने हुक्म जारी किया है कि सेण्ट पीटर्सबर्ग का (जो युद्ध समाप्ति के बाद लेनिनग्राड कहलाया) दुनिया से नामोनिशान ही मिट जायेगा। यह तय किया गया है कि शहर के नजदीक पहुंच कर तोपों द्वारा लगातार गोलाबारी और हवाई बमबारी द्वारा शहर बरबाद कर दिया जायगा।'' (जर्मन नौसेना के हेड क्वार्टर्स से जारी निर्देश सितम्बर 22, 1941)
सोवियत सेना और लेनिनग्राड की जनता के अदमनीय मनोबल और ऊर्जा तथा सामारिक दक्षता का फल था कि जनवरी 18, 1943 में इस घेराबंदी में दरार पैदा करने में लेनिनग्राडवासी सफल हुए। लेनिनग्राड को खत्म कर देने के हिटलरी मनसूबे ध्वस्त हो गये। यह विजय जितनी फौजों ने हासिल की उतनी ही लेनिनग्राड की आम जनता ने।
लेनिनग्राड म्यूजियम के प्रवेश द्वार पर एक स्कूल की बच्ची की डायरी के एक पन्ने का फोटो लगा है जो घेराबंदी की प्रत्यक्ष साक्षी थी। शब्द रुला देने वाले हैं। डायरी का पन्ना इस प्रकार है :
÷÷झेन्या की 12.30 बजे रात दिसम्बर 28, 1941 को मौत हो गयी।''
÷÷नानी की जनवरी 25, 1942 को रात तीन बजे मौत हो गयी।''
÷÷ल्योमा की मार्च 17, 1942 को 5 बजे सबेरे मौत हो गयी।''
÷÷चाचा वास्या की अप्रैल 13, 1942 को 2 बजे सबेरे मौत हो गयी।''
÷÷ल्योशा की मई 10, 1942 को चार बजे सबेरे मौत हो गयी।''
÷÷मां की मई 13, 1942 को 7.30 बजे सबेरे मौत हो गयी।''
आखिरी बात त्रासदी की चरम सीमा है :
÷÷सभी चेव परिवार के सभी की मौत हो गयी। केवल तान्या बची है।''
तान्या लेनिनग्राड से तो सुरक्षित ले जायी गयी लेकिन अत्यंत कमजोर होने के कारण 1943 में गुजर गयी।
यह एक ही परिवार की कहानी नहीं, इसके द्वारा अनगनित परिवारों की त्रासदी की झलक मिलती है। उनके बारे में डायरी लिखी गयी या नहीं पता नहीं। लेकिन एक की डायरी को अनगिनतों के दर्द की गाथा मानना चाहिए।
महान रूसी कवयित्री अन्ना अखमातोवा ने लेनिनग्राड की लम्बी घेराबंदी के दिनों के पूरे परिदृश्य को बड़ी मार्मिकता और गहन संवेदना के साथ अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया था। ये कविताएं रूसी साहित्य की ही नहीं विश्व साहित्य की अमूल्य निधि हैं। हर कविता एक ऐतिहासिक क्षण का आईना है। कुछ नमूने नीचे प्रस्तुत किये गये हैं। अन्ना की कविताओं के अंग्रेजी अनुवादों के संग्रह से ही कुछ छोटी कविताओं के हिन्दी में किये गये भावानुवाद नीचे प्रस्तुत हैं। किसी भी अनुवाद में मूल की स्पिरिट पकड़ पाना सम्भव नहीं। लेकिन अनुवाद की कमजोरियों के बावजूद उस समय के माहौल की झलक इन कविताओं से अवश्य मिलती है।
÷युद्ध की आंधी' खंड की पहली कविता है ÷शपथ' जो संघर्ष के आरम्भ का संकेत देती है :
वह जो अपने प्रियतम से विदा लेती है आज / बेहतर है कि उसका दर्द बन जाय उसकी ताकत आज / लें हम अपने बच्चों की शपथ उनके यादगारों की शपथ / कुछ भी हो हम न झुकेंगे कभी यही हमारी शपथ।
अगली कविता युद्ध की विभीषिका से आहत लेनिनग्राड से प्रथम परिचय कराती है :
है मौत के पंक्षियों की सब तरफ कांव कांव / मेरे लेनिननग्राड कौन करेगा तेरा बचाव / सांस चलती है इसकी अभी सुनो चुपचाप / जिन्दा है यह अभी सुनता हर बात / बाल्टिक सागर के तट से उठती अरे आह / सुन पड़ती नींद से इसके बेटों की कराह / इसकी गहराइयों से उठती रोटी रोटी की पुकार / चीरती जो इस सन्नाटे को बार बार / यह धरती है लेकिन बेरहम और कठोर / हर खिड़की से सुन पड़ता है बस मौत काशोर।
कवयित्री याद दिलाती है कि एक तरफ यदि मौत के पंछियों की कांव कांव और हर खिड़की से सुनाई देने वाले मौत के शोर वाला दर्दनाक नजारा है तो दूसरी ओर लेनिनग्राड के निवासी जिस प्रकार इस कयामत से जूझने की हिम्मत जुटा रहे हैं उसका शनदार नजारा है। कविता का शीर्षक है ÷हिम्मत'−
÷÷मालूम हमें कि क्या गुजरती हम पर इस पल / मालूम नहीं क्या होगा कल सब कुछ तो अनिश्चित इस पल / मगर निश्चित है यह कि न छोडे+गी हिम्मत हमारा साथ / घड़ी बताती है कि है यही हिम्मत की घड़ी आज / डर नहीं गर ऊपर से बरसता सीसे का लावा / कोई साया न सिर पर मगर न कोई गिला न पछतावा / हर हालत में रखेंगे महफूज तुझे, ओ हमारी रूसी जुबान / ओ हमारे रूसी लफ्ज हमारी ताकत हमारी शान / हमीं से पहुंचेगी हमारी जुबान हमारे बच्चों के बच्चों तक / आजाद और पाक, इंसानियत के लिए हिम्मत का सबक।''
घेराबंदी के दौरान हिटलर की फौजों की कभी न रुकने वाली बमबारी में तमाम लोगों की जिन्दगी घरों में नहीं खंदकों और खाइयों में बीतती है। कैसी है यह खंदकों खाइयों की जिन्दगी? कुछ पंक्तियों में ही अन्ना हमें इस घुटन और दहशत की जिन्दगी का अहसास करा देती हैं :
खोदी गयी हैं खाइयां वहां / जहां बाग थे कभी / रोशनी का कहीं नाम भी नहीं / पीटर के यतीम ओ मेरे बच्चो / जमींदोज जिन्दगी में / सांस लेना भी मुश्किल / दहशत इतनी कि रुकता नहीं / तुम्हारी कनपटी का फड़कना / बमबारी के बीच भी सुन पड़ती है / एक बच्चे की आवाज।
और फिर अंत में चार चार पंक्तियों की केवल दो कविताओं द्वारा अन्ना ने लेनिनग्राड की मौत के साये और सांय सांय से जिन्दगी की हलचल में वापसी का जो अहसास पैदा किया है वह शायद विश्व साहित्य में बेमिसाल है। पहली कविता है :
जनवरी 27, 1944
और यह बिना तारों की / जनवरी की रात / इसकी अनोखी किस्मत से आश्चर्यचकित / मौत की अगाध गहराइयों से वापस लौटा / लेनिनग्राड स्वयं को करता है सलाम।
दूसरी कविता का शीर्षक है ÷मुक्ति' और उसकी एक एक पंक्ति में गूंजते मुक्ति के स्वरों से हमारी पूरी आत्मा झनझना उठती है :
देवदारुओं को हिलाती डुलाती है / एक स्वच्छंद वातास / धरती को ढक रही है अब / एक शीतल हिमराशि / दुश्मनों के पैरों तले / रौंदे जाने का डर नहीं। / मेरी भूमि, सोती है / कितने चैन से आज।
अन्ना अखमातोवा की इन कुछ ही कविताओं ने ÷लेनिनग्राड वार मेमारियल' में 25 साल पूर्व बितायी गयी उस शाम की याद फिर से ताजा कर दी। उस शाम को रूसी तरुणी द्वारा दिखाई गयी फिल्म और उसकी दिल हिला देने वाली टिप्पणी ने एक गम्भीर भावावेग और वैचारिक मंथन को हमारे दल के सदस्यों के अंदर पैदा किया। उस रात हममें से कोई भी ठीक से सो न सका। सबके मन उद्वेलित थे, दिल भरे हुए। अगले दिन सबेरा होने के पहले ही मैंने अपने पास के कमरे में टिके दल के सदस्य प्रोफेसर शिशिर दास के कमरे को हल्की सी दस्तक दी। उन्होंने दरवाजा खोल कर मुझे अंदर बुला लिया और बताया कि वे भी उद्वेलित मन से सो न सके और काफी देर से जगे हैं। उनके हाथ में पेन था और उनके सामने कुछ लिखे पन्ने फैले थे। मैंने पूछा यह क्या लिख रहे हैं? उन्होंने कहा कि कल के अनुभव से प्रभावित और प्रेरित होकर उन्होंने एक कविता लिख डाली है बंगला में। मेरे अनुरोध पर उन्होंने वह कविता सुनायी। अभिभूत हो गया। मैंने कहा हमारी रूस यात्रा की यह अनमोल उपलब्धि है इसे भारतीयों से ही नहीं रूसियों से भी बांटना चाहिए।
आप इसका अंगरेजी अनुवाद कर एक कापी मुझे दे दीजिये। मैं रूसी दल के अध्यक्ष को देकर इसका रूसी अनुवाद करवा लूंगा। और आज के खुले अधिवेशन में मूल बंगला, अंगरेजी और रूसी अनुवाद तीनों का पाठ होगा। खुली सभा में जब शिशिर बाबू की कविता पढ़ी गयी तो सभी भाव विहृवल हो उठे, विशेष तौर पर रूसी इस बात से भी अत्यंत अभिभूति हुए कि एक भारतीय कवि ने उनके दर्द को गहराई से महसूस किया और अदभुत रूप से कविता के माध्यम से व्यक्त किया। मैं शिशिर बाबू की कविता का अंगे्रजी से हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत कर रहा हूं जो मैंने स्वयं किया है। शिशिर बाबू की यह कविता और उनकी समस्त रूस यात्राओं की डायरी के पन्ने मुझे उनकी पत्नी श्रीमती सुष्मित दास ने उपलब्ध कराये जिसके लिए मैं उनका ¬ऋणी हूं। मूल बंगाली कविता का शीर्षक है − ÷कोथाय छिलाम आमी, कोथाय'। उनके द्वारा किये गये अंगे्रजी अनुवाद का शीर्षक है − ÷ओ ह्वैर वाज आइ, ह्वैर?'
उस दिन कहां था मैं ओ लेनिनग्राड
पांव और आगे चलते नहीं
है यह कैसी थकान
गला क्यों इस कदर रुंधा जाता है।
यह कैसी मेरे अंदर की कम्पन
उतरता हूं सीढ़ियों से धीमे धीमे
आकाश की ओर उठा पाता नहीं नजर
सोचता हूं छिप जाऊं किसी कोने में
या सीढ़ियों से धीमे धीमे जाऊं उतर
इतिहास की अंधेरी सुरंग में करूं प्रवेश निडर
उतरता हूं जितना
तुम्हारी गहराइयों में
ओ लेनिनग्राड
खो जाता हूं उतना ही
होता मुझे तुम्हारी उष्णता का आभास
और हो जाता उतना ही तीव्र
मेरा दोषी होने का अहसास
पूछता हूं मैं स्वयं से
कहां था मैं उस दिन
कहां?
उस दिन जब आकाश में उगा नहीं सूरज
उस दिन आसमान में नहीं थे सितारे
उस दिन जब तुम्हारी रातें हो उठी थीं रोशन
लड़ाकू विमानों के प्रचंड प्रकाश से
उस दिन जब तुम्हारे मुंह में जाते थे
गरम गरम रोटियों के कौर नहीं
वरन दनदनाती गोलियां
उस दिन
तब मैं कहां था
कहां था मैं ?
उस दिन जब
तुम्हारे बच्चे नन्हें नादान
पतझड़ के पीले पत्तों की तरह
झड़ झड़ कर गिरते रहे
जमीन पर अनगिनत
सड़ते रहे घास पर लागातार
उस दिन जब तुम्हारी नारियां
बर्फानी तूफान को झेलती बिलखती रहीं
उस दिन जब बुजुर्ग देखते रहे
अपने बच्चों के झुलसते हुए बदन
क्षण प्रभ उल्काओं की तरह
उभरते टूटते गगन में दूर
और उस दिन तुम्हारे बहादुर बेटों ने जब
भेंट किये थे खून से रंगे फूल
यही थी तुम्हें
उनके जवान धड़कते दिलों की
सर्वोच्च आहुति
ओ लेनिनग्राड
कहां था मैं उस दिन
कहां ?
झुक जाता है मेरा सर
अपराध से
शर्म से
नौ सौ दिनों का
नौ सौ रातों का
उठाये भार
झुका झुका लंगड़ाता चलता हूं मैं
तड़पता और टूट टूट जाता हूं मैं
उठाये कितना भार
निकलता हूं मैं
इतिहास की उन सुरंगों के अंधेरे से बाहर
बारिश से धुले
आकाश के नीचे
जहां उगती है हरी हरी घास
और खलते खिलखिलाते हैं बच्चे
और जहां तुम्हारी
विशाल और भव्य देह
पाकर सूरज का ताप
हो रही पुलकित और मुदित
ओ लेनिनग्राड, लो मेरा सलाम
तुम्हारे वीरता के करतबों के नाम
चलता हूं धीरे धीरे
सर झुकाये हुए मैं
मैं क्या इस लायक कि कर सकूं
तुम्हे सलाम
तुम्हारे आकाश को सलाम
वही आकाश जिसने लिया था जीत
डर को
भूख को
नींद को
और मौत को
तुम्हें मेरा सलाम
ओ लेनिनग्राड
इस कविता का महत्व एक मार्क्सवादी, एक सोवियत यूनियन के पुराने प्रशंसक और समर्थक द्वारा लिखी कविता भर नहीं। यह एक ऐसे बंगाली साहित्यकार, कवि और भारतीय साहित्य के आलोचक द्वारा लिखी गयी कविता है जो बंगाल नवजागरण के मूल्यों में पला और बड़ा हुआ और जिसने प्रबुद्ध और खुली दृष्टि के लिए मान्यता पायी। शिशिर दास का रूस से परिचय रवीन्द्रनाथ की रूस से लिखी चिट्ठियों द्वारा हुआ था और उन्हें जिज्ञासा थी कि जिस रूस को रवीन्द्रनाथ ने देखा था वह अब कैसा होगा। हमारे दल के साथ की गयी लेनिनग्राड यात्रा उनकी पहली रूस यात्रा थी। उनकी डायरी के पन्ने जो अप्रकाशित हैं उनकी पैनी नजर और संवेदनापूर्ण निरीक्षण और विचारगर्भित अनुभवों से भरे हैं।
अतीत से यदि वर्तमान की तरफ लौटें तो एक माने में आज फिर बर्बरता और सम्यता की टकराहट पुनः मानवता के लिए चिन्ता का कारण वन रही है।
बर्वरता संगठित भी है और सक्रिय भी और लेकिन सभ्यता की शक्तियां भ्रांतिग्रस्त और असंगठित तथा एकजुट होने में अक्षम। सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है कि कल जो बर्बरता के विरुद्ध मानवता के समान आदर्शों और मूल्यों की चेतना लेकर एकजुट हुए थे वे आज इस चेतना का जरा भी संकेत नहीं देते। उनके व्यवहार से लगता है कि यांत्रिाक और अनुषंगिक सरोकार प्राथमिक बन गये हैं और प्रारम्भिक और बुनियादी सरोकार गौण हो गये हैं। क्लासिकल उदारवाद और क्लासिकल मार्क्सवाद जिनका प्रेरणास्रोत कभी एक ही था यानी पश्चिमी नवजागरण उनके बीच आज तक पहुंचते पहुंचते वैचारिक और व्यावहारिक दरार भयानक खाईं बन चुकी है। ऐसे में मानवता के हितों की रक्षा पुरानी क्षयग्रस्त अप्रासंगिक जड़ीभूत आत्म संतुष्ट वैचारिक संरचनाओं के आधार पर नहीं की जा सकती।
19वीं और बीसवीं सदी की मानसिकता से इक्कीसवी सदी की समस्याओं से जूझना सम्भव नहीं। जरूरत है क्लासिकल उदारवाद और क्लासिकल मार्क्सवाद इन दोनों से जुड़े प्रबुद्ध समुदाय के द्वारा एक नये वैचारिक मंथन आत्मपरीक्षण और व्यापक चिन्तन के शुरुआत की और आज के मसलों को लेकर दोनों रुझानों के प्रबुद्ध समुदायों के तलाश की। इसके पहले कि बर्बरता द्वारा मानव सभ्यता की जड़ों पर आघात कर मानवता को गम्भीर संकट में धकेलने की कोशिश कामयाब हो, क्लासिकल उदारवाद और क्लासिकल मार्क्सवाद से जुड़े प्रबुद्ध समुदायों को इतिहास से सबक लेकर समान आदर्शों और मूल्यों की चेतना जाग्रत करने की दिशा में नयी पहल करनी होगी।
बर्बरता और मानवता की विजय के प्रतीक लेनिनग्राड का यही संदेश और आज की पीढ़ी के लिए यही सबक है। यह भी याद दिलाना जरूरी है कि पश्चिमी प्रबुद्ध विचारकों और मार्क्सवाद और समाजवाद से जुड़े विचारकों और क्रांतिकारी नेताओं के बीच संवाद की परम्परा बड़ी पुरानी है। रूसी क्रांति के बाद के प्रारम्भिक वर्षों में पश्चिम के सर्वोच्च प्रबुद्ध विचारकों जैसे जौन चेनर्ड कीन्स और बर्टेण्ड रसेल ने रूस की बिना आलोचना किये क्रांति से उपजी व्यवस्था पर सकारात्मक किन्तु आलोचनात्मक रुख अपनाया था। कीन्स के ग्रंथों में शामिल उनका लम्बा संस्मरणात्मक लेख रूस की यात्रा और बर्टेण्ड रसेल की पुस्तक ÷द बौल्शैविक रिवौल्यूशन' क्रांति के बाद के रूस पर विचारगर्भित, सकारात्मक किन्तु दीर्घकालीन प्रासंगिकता की दृष्टि से कुछ बुनियादी प्रश्न उठाने वाली प्रतिक्रिया है। इस संवाद की परम्परा में शीतयुद्ध की मानसिकता ने जबर्दस्त आघात किया। इस संवाद की परम्परा को फिर से चालू करने और शीतयुद्ध की असहिष्णुताओं और मानसिक जड़ताओं से मुक्त करने में जवाहर लाल नेहरू की भूमिका अहम् थी जिन्होंने कहा था बाहर की आयरन कर्टेन से हानिकारक और खतरनाक अंदर की, मानसिकता की, आयरन कर्टेन है जिससे मुक्त होना पडे+गा।
सोवियत व्यवस्था के ध्वस्त होने के बाद कुछ लिबरल विचारकों ने इसे समाजवाद पर लिबरेलिज्म की विजय मान कर गलत नतीजे निकाले थे। असलियत यह है कि जितने निर्मम आत्मपरीक्षण की जरूरत मार्क्सवाद से प्रेरणा वाले समाजवाद को है उतने ही निर्मम आत्मपरीक्षण की जरूरत नये दौर के लिबरेलिज्म को है जिसने आर्थिक इकालौजिकल पर्यावरणीय और सुरक्षा सम्बंधी कई प्रकार के संकटों में मानवता को धकेला है और बर्बरवाद के लिए रास्ता साफ किया है।
इन सब अनुभवों का नतीजा है कि लिबरल खेमे में ऐसे प्रबुद्ध लोग उभर रहे हैं जो इक्कीसवीं सदी की स्थितियों और सम्भावनाओं के अनुकूल नयी वैचारिक दृष्टि और संरचनाओं की खोज के लिए तैयार हैं।
सच तो यह है कि रूसी समाजवाद के सत्तर वर्षों का जितना विश्वसनीय, निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ, विवेचन और पुनर्मूल्यांकन पश्चिमी विचारकों और अन्वेषकों ने तैयार किया है उतना समाजवादी बुद्धिजीवियों ने नहीं। यह मूल्यांकन कई मसलों पर नयी रोशनी डालता है। मसलन सबसे अहम मसला जिस पर नयी रोशनी डाली गयी है वह समाजवाद की ग्राम सम्बंधी नीतियों विशेषकर कृषि के समूहीकरण की प्रक्रियाओं और उसके परिणामों का है। बिना रूसी समाजवादी प्रयोग के ग्रामीण अध्याय से पूरी तरह परिचित हुए स्तालिनवाद की जड़ों और उनकी गहराई को नहीं समझा जा सकता है। इस क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय योगदान ब्रिटिश विचारक और अन्वेशक मोशे लेविन का है जिनकी ÷सोवियत व्यवस्था' नामक नव अन्वेशष पर आधारित पुस्तक एक ऐतिहासिक महत्व की रचना है। ग्रामीण क्षेत्र आधुनिक औद्योगिकरण के लिए अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त पूंजी का सबसे विश्वसनीय स्रोत न सिर्फ पश्चिमी पूंजीवाद के लिए रहा है बल्कि रूसी समाजवाद ने भी बड़ी निर्ममता से कृषि के समूहीकरण की प्रक्रिया द्वारा ग्रामीण क्षेत्र को उसी प्रकार अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त पूंजी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया था चाहे इसके परिणाम कृषक समुदाय के लिए कितने ही विनाशकारी और यातनादायी रहे हों।
मार्क्सवादी इतिहासकार सुमित सरकार उन विरले विद्वानों में थे जो मोशे लेविन की इस पुस्तक के नतीजे सर्वप्रथम भारतीय विद्वानों के सामने लाये। कहते हैं जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते वे वही गलतियां फिर दोहराते हैं। नंदीग्राम में मार्क्सवादी व्यवस्था द्वारा किसानों की भूमि का अपहरण और भूमि से उनका विस्थापन एक छोटे पैमाने पर भारतीय संदर्भ में उसी प्रक्रिया का पुनरावर्तन था जो विशाल पैमाने पर स्तालिन के नेतृत्व में रूस में हुआ था। सुमित सरकार अपनी ऐतिहासिक दृष्टि के कारण ही पश्चिमी बंगाल में सी.पी.एम. की नीति का सही जायजा लेने में कामयाब हुए और उन्होंने इसके किसान विरोधी, किसान उत्पीड़क चरित्र को उजागर किया। वास्तविकता तो यह है कि उदारवाद और मार्क्सवाद दोनों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के लिए किसान को ही बलि का बकरा बनाया गया है। उदारवाद का चाहे अठारहवीं इक्कीसवीं सदी के फ्रांस जर्मनी अमरीका आदि का उदाहरण हो या बीसवीं सदी में अन्य देशों के औद्योगीकरण की मिसालें हों किसान का विस्थापन और शोषण ही आधुनिक विकास का आधार रहा है।
इसी प्रकार समाजवाद पूंजीवाद का विकल्प बन कर इतिहास के मंच पर उतरा था लेकिन चाहे रूस का आर्थिक विकास का माडल हो या पूर्वी योरोपीय देशों का माडल ये सभी निर्मम रूप से किसान का शोषण विस्थापन बड़े पैमाने पर करने वाले साबित हुए। यहां तक कि चीन और वियतनाम का समाजवाद जो किसान क्रांति और किसानों को भूमि का मालिक बनाने की क्रांति से उपजा था वह भी कालांतर में प्रतिक्रांति द्वारा नये बाजार हितैषी समाजवाद के आर्थिक माडल के दबाव में किसानों के व्यापक विस्थापन और उत्पीड़न का कारण बना है।
भारत में गांधी के प्रभाव में आधुनिक विकास के हिमायती नेहरू जी ने विकास प्रक्रिया को किसान हितैषी बनाने की जोरदार कोशिश की थी ताकि ग्राम और शहर के बीच दरार और न बढ़े बल्कि घटे। इंदिरा गांधी ने भी इसी प्रक्रिया पर बल दिया था।
मगर यहां भी आर्थिक सुधार की शुरुआत के बाद जो दिशा अपनायी गयी उसके कारण किसानों में विस्थापन और ग्राम से पलायन की प्रक्रिया ने जोर पकड़ा है, स्वयं खेती के बाजारीकरण के परिणाम मिश्रित रहे हैं। एक ओर बाजारू खेती के विकास से कुछ तबकों की खुशहाली हुई लेकिन भारी संख्या में कई इलाकों में इसके मातहत किसानों की तबाही हुई। गांवों में बड़े पैमानों पर किसानों द्वारा आत्महत्या का नया नजारा इस नये आर्थिक माडल के किसान विरोधी चरित्र पर सबसे तीखी टिप्पणी है।
नतीजा साफ है कि चाहे वह पुराना या नया उदारवाद हो अथवा पुराना या नया समाजवाद दोनों उपनिवेशवाद और अर्द्ध सामंतवाद के युग से निकले विश्व के एक विशाल भूभाग की खेतिहर आबादी को विकास के युग में बिना विस्थापन, पलायन, शोषण उत्पीड़न के आगे ले जाने में और उनको एक बेहतर जीवन देने में नाकाम हुए हैं। इस पृष्ठभूमि में चाहे वो उदारवादी समाज के प्रबुद्ध लोग हों चाहे समाजवादी समाज के प्रबुद्ध लोग जो इतिहास को दोहराने में नहीं इतिहास से सबक लेने में विश्वास करते हैं, जो नये युग की नयी चुनौतियों और सम्भावनाओं के अनुकूल विकास के नये माडल की तलाश के लिए तैयार हैं उन्हें इस तलाश में संवाद और विचारविनिमय की परम्परा को फिर से नयी वैधता देनी होगी। बिना व्यापक संवाद और विचार विनिमय के किसी भी प्रकार की सर्जनात्मकता और नवीनता की उम्मीद नहीं की जा सकती। उदारवाद और समाजवाद/मार्क्सवाद दोनों आज वैचारिक जड़ता और अवरुद्धता से ग्रस्त हैं इसी कारण वे किसी भी जीवंत व्यावहारिक कार्यक्रम की पहल करने में भी अक्षम हैं। इसीलिए आज व्यवहार पर या तो सत्ताप्रेमी अधिकारी वर्ग हावी है या नयी पीढ़ी के टेकनीशियन/विशेषज्ञ दोनों मानवीय संवेदना और जनसाधारण से सहानुभूति से मुक्त हैं। यही वर्तमान स्थिति का परिदृश्य है जो गम्भीर संकट और नयी चुनौतियों का संकेत देता है। यह निराशा की स्थिति का साक्षात्कार भी है और एक वैचारिक नव जागरण का आहृवान भी। ऐसे में महज बुद्धि हमें संकट से नहीं उबार सकती, उसे एक प्रबल आंतरिक भावना (स्पिरिट) और संवेदना ही सक्षम बना सकती है।
इतिहास बताता है कि वैचारिक क्षेत्र में नयी लहर के उभार के बहुत पहले भावनात्मक मंथन से प्रेरित संस्कृति नयी लहर का सबसे सशक्त माध्यम बन जाती है और वैचारिक नवोदय के लिए जमीन तैयार करती है। जहां किताबी बुद्धिजीवी विफल रहा है वहां बहुत बार जिन्दगी की किताब से जुड़ा, संस्कृतिकर्मी नये स्वरों का वाहक साबित हुआ है। आज ऐसे ही स्वप्नदर्शियों के लिए जमीन तैयार हो चुकी है, ऐसा मुझे लगता है।