आओ बंधु
फिर से जियें
क्रांति के वे दस दिन
युग बुने जो पल
रूस में श्रमिकों की विजय
बनी विश्व के श्रमिकों का
महोत्सव
आओ बंधु
फिर से जियें
त्रासदी के वे दिन
जब ढह गया
कल का श्रमिकों की शक्ति का स्तम्भ
सोवियत संघ
आओ बंधु
फिर से जियें
विखराव के वे दिन
बंधु सोचो जरा
सचमुच क्या ढह गया
बाहर समाजवाद का लेबल
अंदर कुछ और
जो था कभी महान
आंतरिक विकृतियों से हुआ
कुछ का कुछ
इसीलिए हो गया
धराशायी
आओ बंधु
फिर से जियें
कठिन आत्म परीक्षण
के क्षण
क्योंकि बंधु
आज कोई मसीहा नहीं
हम हैं स्वयं
अपने रहबर
सोवियत संघ के विघटन के दौर में लिखे गये लेखक के कविता संग्रह आज कोई मसीहा नहीं से ली गयी एक कविता।
सन् 1978 के अक्टूबर मास में तिबलिसी (जियोर्जिया) में दस दिन के अपने निवास के दौरान (जिसमें से पांच दिन अस्पताल में बिताने पड़े) मुझे समाजवादी व्यवस्था और जीवन के अनेक ऐसे पहलुओं, ऐसे तथ्यों को व्यक्तिगत अनुभव द्वारा समीप से जानने और परखने का अवसर मिला जो चौंकाने वाले थे और पूर्व कल्पित, पूर्व निर्धारित धारणाओं और विश्वासों के एकदम प्रतिकूल थे। रूसी समाजवाद के मिथक और उसकी वास्तविकता के बीच की दरार बिना तिबलिसी गये समझ में नहीं आ सकती थी। मैं सोचता था सोवियत यूनियन में जो भी गणराज्य हैं वे संकीर्ण राष्ट्रवादी प्रवृत्ति और भावना से मुक्त हैं और समाजवादी व्यवस्था अनेकता में एकता और एकता में अनेकता का लक्ष्य हासिल करने में कामयाब हुई है। हमें युवाकाल से ही बताया गया था कि रूसी क्रांति के बाद समाजवाद कई राष्ट्रीय गणराज्यों का ऐसा संघ बनाने में सफल हुआ है जिसके भीतर कई राष्ट्र एक संघ में शामिल होकर पारस्परिक सहयोग और सहभागिता द्वारा एक दूसरे की उन्नति में भागीदार हुए हैं तथा राष्ट्रहित और संघ के सभी राज्यों का सामूहिक हित एक दूसरे के पूरक बन गये हैं। शायद सोवियत गणराज्य के प्रारम्भिक वर्षों में जब लेनिन के नेतृत्व ने रूस के अन्य राज्यों से रिश्ते को जारशाही के प्रभुत्व से मुक्त किया तो मैत्रीपूर्ण रिश्ते बनाने की दिशा में प्रगति हुई भी थी। लेकिन बाद में यह एक आदर्श या स्वप्न मात्र हो कर रह गया और राष्ट्रीय अस्मिता की भावना महा शक्तिशाली रूसी गणराज्य के - रूसी भाषा के, रूसी आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक वर्चस्व के - विरुद्ध अंदर ही अंदर सुलगती गयी और गम्भीर आंतरिक संकट की स्थिति और विस्फोट का कारण बनी जिसके फलस्वरूप अंत में सोवियत संघ का ही विघटन हो गया। सोवियत संघ के विखंडन के एक या डेढ़ दशक पहले जब हम तिबलिसी में थे तभी इसके संकेत स्पष्ट थे। सन् 1978 में भारतीय समाज वैज्ञानिकों का दल जिसमें अधिकतर भूगोल के विशेषज्ञ थे और शायद मैं अकेला अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री था, प्रादेशिक विकास की समस्याओं के तुलनात्मक अध्ययन के लिए तिबिलिसी पहुंचा था। क्या उस समय दल के सदस्यों ने महसूस किया था कि शताब्दि के अंत के पहले ही जियौर्जिया रूसी प्रभुत्व वाले सोवियत संघ से उसी प्रकार अलग हो जायगा जैसे वह कभी जारशाही के प्रभुत्व से मुक्त हो गया था? क्या हमें इस बात का पूर्वाभास था कि सम्बंध विच्छेद ही नहीं इक्कीसवीं सदी का आरम्भ होते होते रूस और जियौर्जिया के बीच टकराव इतना भयावह रूप ले लेगा जैसे दोनों राज्य एक दूसरे के शत्रु राज्य हों? इतना ही नहीं, जियौर्जिया अमरीका से अपने रिश्ते जोड़ने की दिशा में तेजी से सक्रिय होगा?
जिसे पश्चदृष्टि कहते हैं उसके आधार पर रूस और जियौर्जिया का टकराव और फिर उनके बीच अलगाव और शत्राुता जो आज की स्थिति में है उसके बीज अतीत में खोजना पत्रकारों और राजनीतिज्ञों का अत्यंत प्रिय बौद्धिक क्रियाकलाप है। लेकिन जिस नये रुख से जियौर्जिया तथा अन्य राज्यों से जारशाही के प्रतिकूल रूसी क्रांति के बाद नये मैत्रीपूर्ण रिश्ते की नींव रखी गयी थी स्तालिनवादी व्यवस्था ने उस नये आधार को मजबूत करने की बजाय विपरीत दिशा में नीतियां अपनायीं। इसका अकाट्य प्रमाण तो नहीं इसके स्पष्ट संकेत अनेक रूपों में बुद्धिजीवियों तथा आमलोगों से सार्वजनिक वैचारिक आदान प्रदान के दौरान बहुत कम तो निजी बातचीत के दौरान बहुत अधिक मिले। लेकिन जैसा हम कह चुके हैं कि समाजवाद का मिथक - समाजवादी व्यवस्था के सकारात्मक पक्ष और अतीत के पिछले गणराज्यों की उन्नति में उसके महत योगदान का कई दशकों से चला आता हुआ विश्वास (या मिथक) - अंदर और बाहर के बुद्धिजीवियों में इतना प्रबल था कि इन संकेतों के आधार पर गहरी जांच पड़ताल करने और वास्तविकता की खोज का जोखिम उठाने का साहस न अंदर के बुद्धिजीवियों ने दिखाया न बाहर के बुद्धिजीवियों ने, जिनमें हम भारतीय भी शामिल थे।
मास्को में भारत के राजदूत के.पी.एस. मेनन ने भी Russian Panorama नाम से सन् 1962 में प्रकाशित अपने यात्रा वृत्तांतों में तिबलिसी शहर और जियौर्जिया राज्य के सम्बंध में अपनी जून सन् 1953 की यात्रा पर आधारित जो कुछ तथ्य और टिप्पणियां प्रस्तुत की थीं उनमें और हमारे प्रायः 25 वर्ष बाद के अनुभवों में एक आश्चर्यजनक साम्य था। मेनन महोदय के निम्नांकित कथन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं -
÷÷जियौर्जिया में हम इस बात से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते कि वहां लोग अपनी विशिष्ट पहचान लिए हुए एक अलग राष्ट्र बनाते हैं और अपनी विशिष्टता के प्रति अत्यंत संवेदी और सचेत हैं। उनकी अपनी भाषा है जिसकी रूसी भाषा से कोई समानता नहीं। असल में उनकी वर्णमाला तेलगू और मलयालम जैसी दक्षिण भारत की भाषाओं के समान लगती है। मुझे बताया गया कि जियौर्जिया साहित्य की दृष्टि से भी धनी देश है। उनका सर्वोच्च कवि, रुस्तावेली, बारहवीं सदी में जिया था। तिबलिसी की मुख्य सड़क उसके नाम है और उसकी प्रतिष्ठा में अनेक प्रतिमाएं बनी हैं। जनसाधारण की दृष्टि में उसकी छवि उतनी ही विशाल है जितनी लेनिन और स्तालिन की। आज भी उसकी एक प्रतिमा शहर की सबसे बड़ी पहाड़ी पर खड़ी हुई जैसे वह सारे शहर पर नजर रखे है।''
प्रश्न उठता है अपनी विशिष्टता के प्रति इतने अति सचेत और अति संवेदी राष्ट ने रूस के प्रभुत्व वाले संयुक्त सोवियत समाजवादी राष्ट्र संघ में शामिल होना कैसे स्वीकार किया। इसकी कुंजी भी मेनन महोदय के यात्रा वृत्तांत में है। स्तालिन जो स्वयं जियौर्जिया की संतान था उसके प्रारम्भिक जीवन पर प्रकाश डालते हुए मेनन कहते हैं -
÷÷तिबलिसी में हम उस कैथोलिक सेमिनारी में गये जहां स्तालिन अपनी मां की इस इच्छा की पूर्ति के लिए दाखिल हुए थे कि उन्हें एक याजक (Prist) बनने की शिक्षा लेनी चाहिए। वहां स्तालिन को प्रतिबंधित पुस्तकों के अध्ययन का मौका मिला जिसमें मार्क्सवादी साहित्य भी शामिल था। स्तालिन का टकराव अधिकारियों से अपनी जियौर्जियन राष्ट्रवादी भावना को लेकर हुआ। उसे शामिल नामक कौकेशिया के महान वीर की जीवनी ने प्रेरणा दी जिसने जारशाही के विरुद्ध बगावत की थी। स्तालिन एक ऐसे दल में शामिल हो गये जिसने सेमिनारी का शिक्षण जियौर्जिया के उत्पीड़कों की भाषा रूसी में करने का विरोध किया और अपनी देशी भाषा जियौर्जियन में शिक्षण की मांग की। 1899 में इस अपराध के लिए उन्हें सेमिनारी से निकाल बाहर कर दिया गया।''
इसी घटना पर मेनन की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है -
÷÷जियौर्जिया के पूरे इतिहास में राष्ट्रवाद एक ऐसी सशक्त भावना थी जो बार बार टिमटिमाती रही और मौका आने पर एक ज्वाला के रूप में भड़क उठी। फारसी साम्राज्य (जिससे जियौर्जिया का कभी सम्बंध था), मंगोलों के आक्रमण और ओटोमन साम्राज्य ये सभी आये और गये लेकिन जियौर्जिया का राष्ट्रवाद जीवंत रहा। 1879 में जिस वर्ष स्तालिन का जन्म हुआ जियौर्जिया जारशाही के प्रभुत्व में आ गया।''
जियौर्जिया पर जारशाही के प्रभुत्व और आतंक का अंत तथा रूस से एक नये मैत्रीपूर्ण रिश्ते की शुरुआत रूसी क्रांति और नयी समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के बाद हुई। शुरुआत कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारशाही के मातहत जियौर्जिया समेत सभी पड़ोसी राज्यों के प्रति नये रुख, नयी नीति के परिणामस्वरूप हुई जिसमें राष्ट्रीयता के प्रश्न पर नयी दृष्टि के रचयिता स्तालिन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मेनन महोदय के ही शब्दों में -
÷÷क्रांति के बाद पड़ोसी राज्यों के प्रति रूस की नीति जारशाही की नीति से एकदम भिन्न थी। इन राज्यों के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और परम्पराओं के प्रति गर्व करने की शिक्षा दी गयी। यह अवश्य था कि समग्र व्यवस्था के संचालन की बागडोर कम्यूनिस्ट पार्टी के हाथ में थी। इस नयी नीति के निर्माता स्तालिन थे जो स्वयं जियौर्जियन थे और विद्यार्थी जीवन में जियौर्जिया में रूसी भाषा में शिक्षण विरोधी आंदोलन के नेता थे, इसलिए जारशाही के कोपभाजन भी बने थे लेकिन जनसाधारण के स्नेहभाजन बने। उन्होंने राष्ट्रीय भावना और परम्परा की शक्ति को समझा था और उसे सम्मानपूर्वक स्वीकार कर नयी नीति की निर्धारित की थी। लेकिन जब इसी राष्ट्रवादी भावना के सशक्त होने की प्रक्रिया सोवियत संयुक्त गणराज्य की अखंडता और एकता के लिए खतरा बनने लगी तो स्तालिन ने इसको ÷पूंजीवादी राष्ट्रवाद' कह कर भर्त्सना की और राष्ट्रवादी नेताओं की तरफ वैसा ही कड़ा रुख अपनाया जैसा जारशाही अपनाया करती थी।''
इसी विचित्र स्थिति पर आगे टिप्पणी करते हुए मेनन लिखते हैं -
÷÷यह एक विडम्बना ही है कि जो व्यक्ति स्वयं राष्ट्रवादी रुझान के लिए दंडित किया गया था उसी ने स्वयं अपने शासन काल में हजारों लोगों को उसी राष्ट्रवादी रुझान के लिए मौत के धाट उतार दिया।''
इसके भी सबूत मौजूद हैं कि स्वयं लेनिन के जीवन काल में स्तालिन का जियौर्जिया विरोध जियौर्जिया में अनुचित राजनीति और सैनिक हस्तक्षेप के रूप में प्रकट हुआ था जिसकी लेनिन ने भर्त्सना की थी। लेनिन के अंतिम वर्षों में उनकी चेतावनी के बाद भी संघ के अन्य सदस्य राष्ट्रों को रूसी वर्चस्व से मुक्त करने का सिद्धांत अमल में न आ सका। वर्चस्व की स्तालिनवादी व्यवस्था स्तालिन की मौत के बाद भी बरकरार रही और रूस संयुक्त सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ के सबसे सशक्त राज्य के रूप में संघ पर हावी रहा। प्रश्न उठता है 70 वर्ष तक जो संघ बना रहा, उसका आधार क्या महाशक्तिशाली रूस का भय और आतंक ही था या रूस से अभिन्न सम्बंध और समाजवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग होने के परिणामस्वरूप संघ के राज्यों जैसे जियौर्जिया को मिला लाभ भी था जो संघ की सदस्यता की निरंतरता का ठोस आधार था? जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के ÷सेण्टर फार रीजनल डेवलेपमेण्ट' की पहल पर सन् 1978 में ÷Comparative Perspective in Problems of Reginal Development : A Study of U.S.S.R and India' विषय पर एक सेमिनार श्रृंखला का कार्यक्रम सोवियत यूनियन की एकडेमी आफ साइंसेस ने जिसमें सोशल साइंस भी शामिल है स्वीकार किया तो भारतीय समाज वैज्ञानिकों को लगा कि सोवियत संघ की इस विषय पर वास्तविक स्थिति को खोजने, परखने और जांच पड़ताल करने का सुनहरा अवसर मिलेगा। लेकिन जैसा मैं पहले कह चुका हूं कि जियौर्जिया के सेमिनार से जो शुरुआत हुई वह उत्साहवर्द्धक और आशाप्रद नहीं थी। तिबलिसी सेमिनार में सोवियत यूनियन के प्रतिनिधियों में रूसी भी थे और जियौर्जियन भी, जिनकी तायदाद अधिक थी लेकिन राज्य स्तर के विकास की वास्तविक स्थिति पर रोशनी डालने में न रूसियों को दिलचस्पी थी न प्रगट रूप से जियौर्जिया के बुद्धिजीवियों की। उनकी तरफ के वक्तव्य और कथन औपचारिक या सरकारी वक्तव्यों से अधिक और कुछ नहीं थे। भारतीयों की ओर से किये गये प्रश्नों के उत्तर भी औपचारिक या सरकारी से ही लगे जो वस्तुस्थिति को उजागर करने के बदले स्थिति को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर के छिपाते अधिक थे। लगता था जैसे सेमिनार के सोवियत प्रतिनिधियों का ÷रिमोट कंट्रोल' कहीं और है। जो अधिकारिक या स्वीकृत मत या नीति थी उससे अलग बोलने का जोखिम कोई भी नहीें उठाना चाहता था। ऐसा लगा जैसे खुली बहस की परम्परा से ही रूसी और जियौर्जियन बुद्धिजीवी अपरिचित थे। भारतीयों का खुला रुख उनके लिए जैसे एकदम नया अनुभव हो जिसमें असहमति की खुली अभिव्यक्ति द्वारा ही सहमति का रास्ता खुलता है। लेकिन वहीं सोवियत बुद्धिजीवी जो सार्वजनिक मंच से अधिकृत, सरकारी मत व्यक्त करने के आदी थे मंच से अलग निजी बातचीत में अपनी सचमुच की राय का संकेत भी देते थे जो अधिकतर अधिकृत राय से भिन्न और विपरीत होती थी।
कई कारणों से बाहरी लोगों को अंदर के लोगों की सही राय जानने के अवसर बहुत कम मिलते थे। सबसे बड़ा कारण था कि हफ्ते दस दिन की यात्रा के दौरान समस्त दिनचर्या पूर्व निर्धारित प्रोग्राम के अनुसार चलती थी। अकादमी के होटल में निवास, गाइड महिला के साथ होटल से सेमीनार के स्थान पर जाना और वापस आना या फिर दर्शनीय स्थानों पर उसी के संरक्षण में जाना और वापस लौटना यांत्रिक नियमितता के अनुकूल होता था। कभी पार्टियों, स्वागत समारोहों, दर्शनीय स्थानों, बाजारों दूकानों में अन्य लोगों से मिलने का मौका मिले भी तो उनकी भाषा न जानने के कारण किसी प्रकार की बातचीत करने या प्रश्न पूछने का सवाल नहीं उठता था और महिला गाइड के सहारे बातचीत करना एक सीमा के अंदर ही सम्भव था। किसी प्रकार की अनौपचारिक जांच पड़ताल के सवाल पूछना नामुमकिन था क्योंकि गाइड विदेशियों से व्यवहार में पूरी तरह प्रशिक्षित और अनुशासित होते थे और वहां व्यवस्था या जीवन के बारे में आवांछनीय उत्सुकता को नापसंद करने का पूरा संकेत देते थे। यहां मैं भारत के प्रसिद्ध सोशलिस्ट बुद्धिजीवी प्रदीप बोस की पुस्तक 'Communism & Communist Social Systems : Some Reflections' के एक पूरे अध्याय 'A Socialist in Moscow (1957) Festival of Youth' का जिक्र करना चाहूंगा। उनका यह लेख मास्को में विश्व युवा उत्सव के दौरान युवाओं तथा लेखकों से बातचीत तथा मास्को की ऊंची ऊंची इमारतों के वृहत रास्तों के पास की गलियों में स्थित गंदी बस्तियों (Slums) की झांकियों पर आधारित है।
प्रदीप बोस को मास्को में घूमने और वास्तविक स्थिति से कुछ हद तक परिचित होने का एक अनूठा अवसर मिला, जो विदेशी यात्राी को सामान्य परिस्थिति में नहीं मिलता। प्रदीप बोस भी यह स्पष्ट करते हैं कि जो स्वतंत्रता घूमने की - बातचीत की - विदेशियों को उत्सव के दिनों में प्राप्त थी वह आमतौर पर कदापि उपलब्ध नहीं होती। यह सामान्य स्थिति नहीं असामान्य स्थिति थी कि कोई विदेशी किसी भी व्यक्ति से नाजुक सवाल भी चाहे वह पुलिस के आतंक, अमूर्त कला अथवा हंगरी की सोवियत रूस विरोधी विस्फोट की घटनाओं आदि के बारे में हो, पूछ सकता था और इस तरह के सवाल पूछने पर कोई रोक नहीं दिखाई दी। शायद उत्सव में उपस्थित लोगों की तायदाद इतनी ज्यादा होती थी कि उसमें शामिल हर व्यक्ति की गतिविधि पर नजर रखना सम्भव नहीं था। प्रदीप बोस यह भी रिकार्ड करते हैं कि सरकारी बयान और आम राय में फर्क था। सरकारी प्रवक्ताओं से यदि बात की जाय तो साफ नजर आने वाले तथ्यों को वह देख लें या स्वीकार भी कर लें लेकिन उनके आधार पर निकलने वाले युक्तिसंगत नतीजों से वे आंखें मूंदते या उनसे इनकार करते नजर आते थे। उन्होंने वह भी पाया कि अधिकतर खुफिया पुलिस विदेशियों पर कड़ी नजर रखती है कि वे किनसे मिलते हैं और क्या बात करते हैं। बोस साहब से उनके होटल की लाबी में मिलने आयी एक युवती तमारा पर जो भारत में योग के सम्बंध में जानकारी प्राप्त करना चाहती थी खुफिया पुलिस की कड़ी नजर थी और जैसे ही वह होटल से बाहर निकली खुफिया पुलिस ने उसकी जांच शुरू कर दी। प्रदीप बोस के शब्दों में -
÷÷आतंकित तमारा के भयभीत चेहरे ने मुझे उस सब की याद दिला दी जो मैंने रूसी खुफिया पुलिस के बारे में पढ़ रखा था। और यह घटना रूस में ुिस्चेव रिपोर्ट के बाद के बहुचर्चित Thaw के चार वर्ष बाद घटी थी। ऐसे वातावरण में यह आशा करना कि समाजवादी व्यवस्था में वास्तविक स्थिति पर खुली बहस या संवाद सम्भव होगा एक निराधार आशा ही कही जाएगी।''
प्रदीप बोस समाजवाद की एक तीव्र अंतर्विरोधपूर्ण स्थिति को रेखांकित करते हैं। एक तरफ समाजवाद ने शिक्षा के अभूतपूर्व प्रसार और विस्तार द्वारा एक ऐसी नयी पीढ़ी, एक ऐसे युवा समुदाय को तैयार किया जो पुरानी पीढ़ी के विश्वासों, पूर्वाग्रहों और आंतरिक मानसिक प्रतिबंधों से मुक्त है और खुले वातावरण में जीने का इच्छुक है और खुले संवाद के लिए व्यग्र है। दूसरी ओर स्तालिनवादी अति केन्द्रित सत्ता स्तालिन के बाद भी बुनियादी रूप से चली आ रही थी जिसमें खुला बौद्धिक माहौल, खुली बहस, खुला संवाद बाधित था। यह स्थिति सदा चलने वाली नहीं, कभी न कभी बदलाव आयेगा, चाहे शांतिपूर्ण ढंग से आये या विस्फोटक रूप में।
प्रदीप बोस के विवेचन से कई प्रश्न उठते हैं : सोवियत संघ की समाजवादी व्यवस्था के अंदर सुलग रहे आक्रोश और अंतर्विरोध किस दिशा में ले जा रहे थे? और मानसिक तथा वैचारिक खुलेपन की विरोधी पुरानी व्यवस्था के अंदर शिक्षित युवा वर्ग की घुटन और नये दौर की नयी आंकाक्षाओं और ऊर्जाओं की अभिव्यक्ति पर बाधाओं के कारण असंतोष किस प्रकार के परिवर्तन की मुख्य प्रेरक शक्ति बन कर उभर रहे थे?
रूसी समाजवाद के कई भटकावों के बावजूद भी प्रदीप बोस को ऐसा लगता है कि सोवियत समाजवाद के तीन ऐसे तत्व हैं जो उसे वर्तमान अंतर्विरोधों और संकट से मुक्त कर समाजवादी जनतंत्र या जनतांत्रिक समाजवाद की ओर ले जाने में सक्षम होंगे। वे तीन तत्व हैं - ÷सम्पत्ति पर निजी नहीं सामूहिक स्वामित्व, समाजवादी शिक्षा अभियान और नयी पीढ़ियों के अंदर खुली और लोकतांत्रिक जीवन शैली के लिए व्यापक उत्साह और आकांक्षा।' अंत में प्रदीप बोस निम्न नतीजे पर पहुंचे -
÷÷विकासशील देशों में समाजवाद की ओर बढ़ने में हम सोवियत अनुभव से बहुत कुछ सीख सकते हैं तो बहुत मानों में उनकी गलतियां दुहराने से बच सकते हैं। सोवियत संघ की आतंकवादी व्यवस्था, उनके भय और बल पर चलने वाले श्रमिक शिविर, अवश्य समाजवाद की छवि में काले दाग हैं लेकिन इन सबके बावजूद सोवियत प्रयोग हमारे समय का सबसे व्यापक और सबसे साहसी नये समाज के निर्माण का प्रयोग निर्विवाद माना जाएगा।''
प्रदीप बोस की मास्को यात्रा सन् 1957 में हुई थी जब उन्हें रूस की राजधानी मास्को में अपनी आंखों से समाजवाद के प्रथम देश के युवाओं, लेखकों और जनसाधारण से भी परिचित होने का अवसर मिला। फील्ड वर्क जमीनी स्थिति को जानने पहचाने में सहायक तो होता ही है, अपने पूर्वाग्रहों, पूर्व निर्धारित धारणाओं, संकीर्ण दृष्टि और निर्वैयक्तिक और भावनाशून्य विवेचन के दायरे से ऊपर उठ कर सामाजिक समस्याओं को मानवीय संवेदनाओं से परखने का मौका भी देता है। इस दृष्टि से प्रदीप बोस के सन् 1957 के जन सम्पर्क और अनुभव पर आधारित लेख तथा पुस्तक के शेष लेखों के महज किताबी शुष्क तार्किक विवेचन में जमीन आसमान का अंतर है। यदि 1957 का लेख संवेदना और सहानूभूति से ओत प्रोत है जहां प्रदीप बोस अपने लोहिया सोशलिस्ट तथा कम्यूनिस्ट विरोधी और रूस विरोधी पूर्वाग्रहों से अपेक्षाकृत मुक्त दिखाई देते हैं तो कम्यूनिस्ट विचार और व्यवहार के शेष विवेचनों में उनके कम्यूनिस्ट विरोधी पूर्वाग्रह स्पष्टतया उन पर हावी दिखाई देते हैं। कम्यूनिस्टों की निर्मम आलोचना उनका अधिकार है किन्तु यदि वे उसी निर्ममता से अंतर्राष्ट्रीय और भारत के राष्ट्रीय सोशलिस्ट विचार और व्यवहार को भी परखते तो उनकी वस्तुनिष्ठता निर्विवाद और प्रामाणिक होती। उनके 1957 के लेख के निष्कर्ष और शेष समग्र पुस्तक के आमुख में दिये गये निष्कर्ष में बड़ा अंतर्विरोध है। 1957 के लेख के अंत में बोस कहते हैं -
÷÷मानव के नये प्रकार की दुनिया और समाज के संघर्ष के इतिहास में रूसी क्रांति सदा इतिहास को नया मोड़ देने वाली निर्णायक घटना के रूप में याद की जायेगी। मानव की अभूतपूर्व जागृति और सृजनशीलता जैसे इस क्रांति के रूप में यकायक केन्द्रीभूत होकर जाजल्वमान हो गयी। यह सदा मानव जाति की अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की यात्रा के मार्ग पर चलने वालों का मार्गदर्शन करेगी और इस पथ के पथिकों को ऊर्जा देती रहेगी। साथ ही यह भी सही है एक महान प्रक्रिया की शुरुआत करने और उसे पूर्णरूपेण सफल बना सकने में बड़ा अंतर है।''
उनका मतलब साफ है। जिस देश ने मानव इतिहास के सबसे महत प्रयोग की शुरुआत की जरूरी नहीं वही देश उसे पूर्ण सफलता की ओर ले जाने में सफल होगा। सदियों से चली आयी वर्ग शोषण की व्यवस्था को एक ही प्रयोग द्वारा बदलना सम्भव होगा ऐसी आशा आदर्शवादी और अव्यावहारिक है। लेकिन पहला प्रयोग बाद के प्रयोगों का प्रेरणास्रोत बन सकता है बशर्ते पहले के प्रयोगों से विचार मंथन द्वारा सही नतीजे निकाले जाएं। प्रश्न उठता है क्या समाजवादी बुद्विजीवी इस दिशा में सक्रिय हैं। इस प्रश्न पर बाद में विचार करेंगे। फिलहाल प्रदीप बोस के निष्कर्ष पर विचार करें तो लगेगा कि इस निष्कर्ष में ऐतिहासिक दृष्टि (सेन्स आफ हिस्टरी) का मानवीय संवेदना और सहानुभूति के साथ अद्भुत मेल है जो आमुख और उपसंहार में प्रस्तुत किये गये निष्कर्षों से बेमेल लगता है। आमुख और उपसंहार का यह भविष्य संकेत सही निकला कि बीसवीं सदी के अंत तक सोवियत साम्यवाद इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जायेगा। लेकिन इस सत्य के प्रति लेखक एकदम संवेदी नहीं लगता कि सोवियत साम्यवाद के अंत ने विश्व स्तर पर और विश्व भर के सभी देशों में विशाल श्रमिक मानवता के प्रति भयावह अमानवीयता और बर्बरता की वापसी को भी आसान कर दिया है। उसी अमानवीयता और बर्बरता पर सभी खामियों के बावजूद रूसी समाजवाद ने एक ÷ब्रेक' लगाया था और एक श्रमिक संवेदी और श्रमिक हितैषी भविष्य की आशा जगायी थी। रोसा लक्जमबर्ग का यह कथन कि समाजवाद रूसी समाजवादी प्रयोग की विफलता के बाद आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना रूसी क्रांति के समय था। पूंजीवादी विकास बर्बरता मुक्त न होकर श्रमिकों के प्रति बर्बरता का ही पोषक है। पूंजीवाद के विकल्प की तलाश आज भी उतनी प्रासंगिक है जितनी रूसी क्रांति के समय थी। लेकिन प्रदीप बोस सत्य के इस पहलू की तरफ एकदम असंवेदी नजर आते हैं।
प्रश्न उठता है कि वह कौन सा प्रभाव, वह कौन सी प्रवृत्ति है जो एक विचारशील बुद्धिजीवी को भी वस्तुनिष्ठ के बजाय पूर्वाग्राही बना देती है और वास्तविकता की उसकी समझ को एकदम त्रुटिपूर्ण नहीं तो एकतरफा और आंशिक अवश्य बना देती है। लेकिन बौद्धिक दृष्टि से सबसे बड़ा गुनाह है वास्तविकता के सभी पहलुओं को देखने पहचानने से इंकार करना या उसके किसी न किसी पक्ष पर परदा डालना। बहुत बार ideology का चश्मा पहनने से अंधेरा भी उजाला नजर आता है और उजाला अंधेरा। यदि प्रदीप बोस की समग्र पुस्तक कम्यूनिज्म के अंधकारपूर्ण पक्ष को अतिरंजित रूप में प्रस्तुत करती है तो कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवी कम्यूनिस्ट व्यवस्था के अंधकारपूर्ण पक्ष से पूरी तरह आंख मूंदे रहे जैसे उसका कोई आस्तित्व ही न हो। प्रदीप बोस के विपरीत प्रवृत्ति की मिसाल के रूप में हिन्दी के प्रतिष्ठित प्रगतिशील साहित्यकार और कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवी भीष्म साहनी का जिक्र किया जा सकता है जिन्होंने मास्को में सन् 1956 से 1963 तक करीब सात साल बिताये और इस दौरान सोवियत यूनियन के कुछ भागों की यात्राा भी की। सात साल के मास्को निवास और कुछ भागों की यात्राओं के बाद भीष्म साहनी जैसे नामी कम्यूनिस्ट से यह आशा की जाती थी कि वे डायरी के माध्यम से या अपने रूस निवास के निरीक्षणों, अनुभवों तथा मास्को में रहने वाले भारतीयों से बातचीत के आधार पर विस्तारपूर्वक सोवियत व्यवस्था और जीवन की झांकियां और विवेचन पुस्तक रूप में अवश्य प्रस्तुत करेंगे। लेकिन इस दिशा में उन्होंने कोई पहल नहीं की। उनकी उदासीनता या निष्क्रियता से निराशा ही हुई।
एक साहित्यकार से जो एक प्रबुद्ध बुद्धिजीवी के रूप में भी जाना जाता है , यह उम्मीद की जाती है कि वह समकालीन साहित्यकारों और उनके साहित्य का गहरा विवेचन और मूल्यांकन नहीं, तो परिचयात्मक विवरण अवश्य तैयार करेंगे। ख्रुश्चेव के द्वारा स्तालिन की तानाशाही पर परदा हटाने के बाद शासक वर्ग और साहित्यकारों के रिश्ते में क्या परिवर्तन हुआ, उसके बाद अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं, कविताएं, उपन्यास लिखे गये जो बहुचर्चित हुए और जिन्होंने रूसी समाज और शासन की असलियत पर नयी रोशनी डाली - इन सब पर भीष्म जी प्रगतिशील लेखक के नाते कुछ रोशनी अवश्य डाल सकते थे। लेकिन भीष्म जी की इन सब पर चुप्पी आश्चर्य में डालने वाली थी। इस विषय पर उनसे उनके जीवन काल में सवाल भी पूछे गये जिसका जवाब देने से वे हमेशा दूर रहे और अगर बोले भी तो यथास्थिति के ही समर्थन में बोले। अपने अंतिम वर्षों में उन्होंने अवश्य अपनी आत्मकथा ÷ आज के अतीत' (2003) में अपने मास्को निवास पर कुछ विचार व्यक्त किये हैं। इन विचारों में जो रुख व्यक्त होता है वह मानसिक खुलेपन का नहीं है बौद्धिक गम्भीरता, साहस और वस्तुनिष्ठता का तो कदापि नहीं।
सोवियत संघ के विघटन के एक दशक से अधिक गुजर जाने के बाद भी जब वह इस अभी तक निषिद्ध ( फोरबिडन) विषय पर कुछ कहने का साहस जुटाते हैं तब भी विषय के साथ न्याय नहीं कर पाते। ऐसा नहीं कि भीष्म जी अपनी असमर्थता के कारणों से वाकिफ न हों। वे स्वयं अपनी बुनियादी रूप से रूस के प्रति ÷ रूमानी आदर्शोन्मुख दृष्टि के' प्रति सचेत हैं जो ÷ आशावादी और प्रेरणाप्रद होती है पर उसके प्रभावाधीन नकारारात्मक पहलुओं को देखने की इच्छा ही मन में नही उठती!' भीष्म जी मानते हैं कि इस प्रवृत्ति के प्रभावाधीन उनके लिए ( सोवियत संघ) के अंतर्विरोधों के पीछे काम कर रहे कारक तत्वों को समझ पाना कठिन भी था। अपनी मानसिकता की जड़ों की ऐसी साफ समझ होते हुए क्यों भीष्म जी उस मानसिकता से जूझने और वास्तविकता का सही निरीक्षण और विवेचन करने से चूक जाते हैं, इसे समझना भी एक बौद्धिक चुनौती है। शायद भीष्म जी उस पीढ़ी के बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए रूसी क्रांति एक महान प्रेरणादायक युगांतरकारी घटना थी और उसके प्रति पश्चिम साम्राज्यवादी पूंजीवादी राष्ट्रों ने जिस प्रकार विद्वेष और शत्रुता का रुख अपनाया था और उसे उसके शैशव में ही खत्म कर देने के लिए जो साजिश रची थी, जो खुले सामरिक हस्तक्षेप किये थे उसकी प्रतिक्रिया में क्रांति के समर्थकों में प्रथम समाजवादी राज्य और समाज का सम्पूर्ण मन से, बिना कोई सवाल पूछे, बिना किसी शर्त के पूर्ण समर्थन की परम्परा बन गयी जो आखिर तक चलते चलते एक आदत बन गयी। भीष्म जी की पीढ़ी के लिए रूस के खिलाफ कुछ भी बोलना और लिखना तो दूर - कुछ सुनना भी जैसे एक अपराध हो, ÷ पाप' हो। ÷ जो हमारे साथ नहीं हमारे खिलाफ है' - यह सिद्धांत इसी दौर की उपज है जब हर dissident एकदम renegrade करार दिया जाता था। जब एक विचारधारा (ideology) जो आरम्भ में विवेक आधारित हो कालांतर में विवेक से कट कर विश्वास (faith) या मतांधता (dogma) में बदल जाती है तो उसका सम्बंध वास्तविकता से कट जाता है। भीष्म जी जैसा ईमानदार और विवेकी व्यक्ति यह सब जानते हुए भी इससे मुक्त नहीं हो पाया। यह अकेले उनकी अक्षमता नहीं एक पूरी पीढ़ी, एक पूरी परम्परा, एक पूरे बौद्धिक समुदाय की अक्षमता है।
भीष्म जी के कथनों को पढ़ कर मुझे एरिक हाब्स बाम की आत्मकथा Interesting Times: A Twenteenth Centrury Life की निम्न पंक्तियां स्मरण हो आयीं जो उल्लेखनीय हैं और जो भीष्म जी की ही नहीं अधिकतर भारतीय कम्यूनिस्टों की मानसिक स्थिति की प्रामाणिक तस्वीर प्रस्तुत करती हैं -
÷÷ सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में स्तालिन के जघन्य अपराधों का खुलासा करने वाली ुिश्चेव रिपोर्ट के बाद किसी भी विचारशील कम्यूनिस्ट के लिए कम्यूनिज्म के बारे में कुछ बुनियादी सवाल स्वयं से पूछने से कतराना मुश्किल हो गया। यह कम्यूनिस्ट विश्वास का ऐसा संकट है कि एक ओर इसे खोने की पीड़ा है तो दूसरी ओर उससे चिपके रहने की पीड़ा। सच तो यह है कि अक्टूबर क्रांति ने जिस कम्यूनिस्ट विश्वास को जन्म दिया था ख्रुश्चैव रिपोर्ट ने उसकी बुनियाद ही हिला दी।''
विश्व भर में पुरानी पीढ़ी के कम्यूनिस्टों के विश्वास पर खु्रश्चैव की रिपोर्ट ने कितना जबर्दस्त आघात किया था और उनके लिए कितना गहरा मानसिक संकट पैदा किया इसकी पुष्टि करते हुए एरिक हाब्स बाम ब्रिटेन के कम्यूनिस्टों का हवाला देते हैं। एरिक हाब्स बाम के अनुसार 1956 ब्रिटेन की राजनीति में एक नाटकीय मोड़ का वर्ष था लेकिन ब्रिटेन के कम्यूनिस्टों के लिए खु्रश्चैव रिपोर्ट के मुकाबले स्वेज कैनाल का संकट आदि सब कुछ गौण हो गया। ÷ इसमें कोई भी अतिशयोक्ति नहीं कि साल भर से ऊपर ब्रिटेन के कम्यूनिस्ट ऐसी मानसिक स्थिति में रहे जिसे राजनैतिक स्तर पर सामूहिक रूप से nerous break down की स्थिति कहा जा सकता है। कई दशकों के विश्वास पर आघात से पैदा हुआ यह संकट इतना गहरा था कि उसने अनगिनत बुद्धिजीवियों को टूटे विश्वास और बढ़ते संशय के द्वंद्व में फंसा दिया जिससे कम्यूनिस्ट आंदोलन आज तक मुक्त नहीं हो सका है। '
भीष्म जी की आत्मकथा में भी खु्रश्चैव रिपोर्ट के बाद एक कम्यूनिस्ट के द्वंद्व और दुविधाग्रस्त विभाजित मन की स्पष्ट झलक मिलती है। एक ओर ऐसा मानसिक दबाब है कि रूस की कम्यूनिस्ट व्यवस्था की आलोचना समाजवाद पर अटूट विश्वास में दरार न पैदा करे। दूसरी ओर उनकी बुनियादी ईमानदारी कम्यूनिस्ट व्यवस्था की कमजोरियों की भी अनदेखी नहीं कर सकती। विश्वास अगर एक दिशा में खींचता है तो समाजवादी व्यवस्था के बारे में पैदा हुआ संशय विपरीत दिशा में। अंत में दुविधाग्रस्त मन बार बार विश्वास की ओर ही लौटना चाहता है , संशय को एक विचारात्मक प्रक्रिया में बदलने का साहस और मनोबल नहीं जुटा पाता। यह ऐसी ही स्थिति है - ÷ जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे' चाहे टूटा हुआ जहाज सहारा देने की स्थिति में हो या न हो।
मास्को में सात साल रहने के बाद क्यों भीष्म जी इस स्थिति में नहीं हैं कि वे सोवियत व्यवस्था की असलियत के बारे में कुछ निश्चित राय बना सकें या व्यक्त कर सकें , यह सवाल कोई भी पूछ सकता है। मुझे याद पड़ता है कि इंस्टीट्यूट आफ एडवांस्ड स्टडीज शिमला में जब वे विजिटिंग फेलो थे एक गोष्ठी में उनसे यह सवाल पूछा भी गया था। लेकिन उन्होंने उस गोष्ठी में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से परहेज ही किया था और कहा था कि यह बड़ा पेचीदा प्रश्न है जिस पर इतिहास ही अपना निर्णय देगा। जीवन के अंतिम वर्षों में लिखी अपनी आत्मकथा में जैसे वे स्वयं अपने से सवाल जवाब कर रहे हों और स्वयं को जवाब देने की कोशिश कर रहे हों। आरम्भ में जैसे स्वयं को बता रहे हों कि क्यों वे चुप्पी की स्थिति में थे। उनका प्रारम्भिक कथन एक तरह अपने से ही जूझने की कोशिश है -
÷÷ हम लोग सात साल तक मास्को में रहे। मास्को निवास के सात वर्षों में क्या खोया क्या पाया, इसके बारे में सोचो तो व्यक्तिगत स्तर पर तो पछतावे ही ज्यादा मन में उठते हैं। न तो अच्छी तरह से रूसी भाषा सीखी न उसका साहित्य ही जम कर पढ़ा, न तो जन जीवन की ज्यादा जानकारी ही हासिल कर पाया, न ही उनकी आर्थिक सामाजिक व्यवस्था को किसी गहराई से जान समझ पाया। अनुवाद कार्य के बोझ के नीचे ही दबा रहा।''
यह एक प्रकार अपनी स्थिति का rationlisation है। असली कारण कुछ और है जिसका अनुमान उनके आगे के कथनों से लगाया जा सकता है। इस सिलसिले में एक और नामी बुद्धिजीवी आएजा बर्लिन का खयाल आता है जिन्हें ब्रिटिश एम्बेसी के एक अस्थायी अधिकारी के रूप में पहले 1945 और फिर 1956 में कुछ मास बिताने का अवसर मिला था जिसका उन्होंने अनेक बाधाओं से जूझते हुए और अनेक जोखिम उठा कर उपयोग किया और दो प्रतिष्ठित और राज्य के कोपभाजन रूसी लेखकों से साक्षात्कार के रूप में अपना प्रसिद्ध लेख ÷ रूसी लेखकों से भेट' 1945 और 1956 लिखा जो इन लेखकों से उनकी बातचीत की बहुमूल्य जानकारी देने वाला है। तथा लेखकों की रूस में भूमिका का विचारोत्तेजक विवरण प्रस्तुत करता है। कोई मानसिक अवरोध न हो और इच्छा हो तो कुछ जानने और कहने के लिए कुछ महीने भी काफी होते हैं। अगर मानसिक अवरोध और दुविधा हो तो सात साल भी काफी नहीं होते हैं। वह मानसिक अवरोध क्या था? एक समाजवाद में अटूट विश्वास रखने वाले कम्यूनिस्ट के धर्मसंकट की भीष्म जी एक उत्कृष्ट मिसाल प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले भीष्म जी का धर्मसंकट नहीं था, यह हम सब कम्यूनिस्ट विचारधारा के लोगों का धर्मसंकट था जिन्होंने समाजवाद के प्रति निष्ठा को विश्व की प्रथम समाजवादी व्यवस्था के प्रति निष्ठा का पर्याय बना दिया था। उसके बारे में कोई संशय वास्तव में समाजवाद के विरोध का पर्याय समझ लिया जाता था। इस प्रवृत्ति से पैदा होने वाली बुद्धिजीवियों की चुप्पी की समाजवादी आंदोलन को भारी कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि इसके कारण समाजवाद की नयी दिशा की खोज पर ही जैसे एक ÷ आंतरिक' सेंसरशिप लागू हो गयी और समाजवादी बुद्धिजीवी सृजनशील होने की बजाय रूसी समाजवाद की विकृतियों की सफाई देने में ही उलझ गया। इस आंतरिक अवरोध का परिणाम यह हुआ कि समाजवादी चिन्तन और व्यवहार में एक भयावह जड़ता और गतिरोध पैदा हो गया।
इसके पूर्व कि मैं अपनी तिबलिसी की सात आठ दिन की यात्रा से प्राप्त कुछ तथ्य , अनुभव, अपनी राय पेश करूं भीष्म जी के सात साल के रूस निवास पर आधारित कुछ तथ्य, अनुमान, नतीजे प्रस्तुत करना कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवियों की दुविधाग्रस्त मनःस्थिति की जटिलता को समझने के लिए जरूरी है।
मास्को में अपने अनुभवों को याद करते हुए भीष्म जी का निम्नांकित कथन उस दुविधाग्रस्त मनःस्थिति की एक अच्छी मिसाल है जिसका मैंने जिक्र किया। भीष्म जी के ही शब्दों में -
÷÷ पर कभी चौंकाने वाले अनुभव भी होते, एक दिन शाम के वक्त जब अंधेरा उतर रहा था और मैं एक तंग गली से गुजर रहा था तो मेरी नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी जो गली के एक नाके पर रखे हुए बड़े से कूड़ेदान में हाथ डाले कुछ ढूंढ रहा था। मुझे अचम्भा हुआ। यह ऐसा क्यों कर रहा है? क्या इसका कुछ खो गया है या अपना पेट भरने के लिए कुछ ढूंढ रहा है। मन को निश्चय ही धक्का सा लगा। फिर मैं स्वयं ही इसकी सफाई भी देने लगा। कोई सनकी होगा, कोई पागल ही कूड़े के ढेर में हाथ डालेगा। वरना सोवियत देशों में कोई ऐसा क्यों कर करेगा।''
जो बात सहज बुद्धि से साफ समझ में आती है कि एक गरीब बूढ़ा अपना पेट भरने के लिए कूड़ेदान में कुछ ढूंढ रहा है वही बात उस व्यक्ति के लिए स्वीकार करना मुश्किल है जो सदा यह विश्वास करता आया है कि सोवियत व्यवस्था में गरीबों की सम्पूर्ण सुरक्षा है। स्वयं मार्क्स ने स्पष्ट कहा था कि सामाजिक सुरक्षा वास्तव में आर्थिक स्थितियों पर निर्भर करेगी क्रांतिकारियों या समाज सुधारकों के नेक इरादों पर नहीं। आर्थिक अभावग्रस्त सोवियत व्यवस्था इस नियम का अपवाद नहीं हो सकती। इसी सिलसिले में भीष्म जी का निम्नलिखित कथन भी गौरतलब है -
÷÷ जब भी मुझे आस पास के जीवन में त्रुटियां नजर आतीं तो मैं स्वयं ही उनकी सफाई भी ढूंढ लिया करता। यदि लोग शराब बहुत पीते है और सड़कों पर गिरे मिलते हैं तो मैं उसके लिए भी सफाई ढूंढ लेता। ÷ जिन लोगों ने दूसरी जंग में इतना कुछ झेला हो, हिटलर की सेनाओं से जूझे हों, उस कड़े संघर्ष में ही उन्हें पीने की आदत पड़ गयी होगी।' और यदि देहात में खाने पीने की चीजें उपलब्ध न हों तो भी मैं कहता - ÷ अभी जंग को खत्म हुए कितने साल बीत पाये हैं। जंग के जख्म भरते ही भरेंगे। आदि आदि।' इन युक्तियों में सच्चाई तो थी पर वास्तविकता से आंख चुराने की प्रवृत्ति भी थी। और मेरे लिए अंतर्विरोधों के पीछे काम करने वाले कारक तत्वों को समझ पाना कठिन था।''
इस अक्षमता के दोषी केवल भीष्म जी ही नहीं हैं। यह प्रवृत्ति एक माने में अधिसंख्य कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवियों और सोवियत समर्थकों में पायी जाती थी। मुझे सन् 1985 की अपनी रूस यात्रा के दौरान हुई घटना याद आती है जब भारतीय समाज वैज्ञानिकों और साहित्यकारों का एक दल ÷ साहित्य और समाज : भारत और सोवियत संघ का एक तुलनात्मक' अध्ययन विषय पर केन्द्रित सेमिनार के लिए लेनिनग्राड गया था। मैं दल का नेतृत्व कर रहा था। लेनिनग्राड के एक मशहूर भवन में हमारे रहने का प्रबंध था। द्वितीय महायुद्ध के समय रूस पर विजय प्राप्त कर हिटलर इसी भवन में रहने का आकांक्षी था जिसे बहादुर सोवियत फौजों ने विफल कर दिया। भारतीय दल में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक नेमिचंद जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय से टैगोर प्रोफेसर ऑफ कम्पेरेटिव लिटरेचर डा. शिशिर दास, मशहूर तामिल कवि जयकांतन, कलकत्ता के प्रगतिशील लेखक और आलोचक देवेश राय और नामी बुजुर्ग तथा अंग्रेजी में लिखने वाले प्रसिद्ध उपन्यासकार और कला आलोचक मुल्क राज आनंद आदि थे। सेमिनार के दूसरे दिन रात को नेमि जी को एक महिला ने उनके कमरे में फोन किया। कमरे का नम्बर बोल कर वह जानना चाहती थी उस कमरे में क्या उसकी लड़की है, यदि है तो उसे फोन दे दीजिए। नेमि जी के मना करने पर उसने उनका परिचय जानना चाहा। बताने पर कि वह एक भारतीय लेखक हैं महिला ने मनोरंजन के लिए उन्हें अपने घर पर आमंत्रित किया और उन्हें बताया कि यदि वह भवन के बाहर आ जाएं तो वह अपनी गाड़ी में ले जायेगी और वापस छोड़ भी देगी। नेमि जी के यह कहने पर कि वह स्वयं भवन में क्यों नहीं आ जाती, उत्तर मिला कि अंदर आने की मनाही है। नेमि जी के यह कहने पर कि वह एक अजनबी महिला के घर नहीं जाना चाहेंगे, उसने अगले दिन फिर फोन करने का वादा किया।
दूसरे दिन सबेरे नाश्ते पर जब नेमि जी ने इस घटना का दल के अन्य सदस्यों से जिक्र किया , तो सबको यह घटना अजीब सी लगी। सोवियत रूस में ऐसी घटना घटेगी किसी ने यह सोचा भी न था। प्रश्न उठा क्या पर्यटकों के मनोरंजन के लिए ÷ कौल गर्ल' सोवियत रूस में भी मौजूद हैं? ÷ कौल गर्ल' का जिक्र होते ही दल के कम्यूनिस्ट सदस्य भड़क उठे। बोले - ÷÷ यह लेनिन का देश है जिसने वेश्यावृत्ति चाहे खुली हो या प्रच्छन्न उसे जड़ से मिटा दिया था। यहां ऐसी बात हो ही नहीं सकती।'' एक सदस्य जो रूस कई बार आ चुके थे बोले - ÷÷ रूसी सरहद के पार फिनलैण्ड से युवतियां अवश्य लुका छिपी आकर ऐसा धंधा करती हैं। यह पहले भी सुना गया है।'' नेमि जी के यह कहने पर कि उस महिला ने अपने को रूसी बताया वह बोले कि ऐसी युवतियां अपने को रूसी बता कर यह धंधा चलाती हैं। ÷ मनोरंजन उद्योग' के नाम पर वेश्यावृत्ति की खुली छूट - यह सब पूंजीवादी समाज और उसकी विलासिता पोषक मनोवृत्ति की उपज है। समाजवाद द्वारा स्थापित आदर्श समाज और जागरूक सोवियत इंसान के बीच इन सबका होना सम्भव ही नहीं। ऐसी ( अंध) विश्वासी मानसिकता के सामने सभी तर्क और प्रमाण बेकार। कई निष्पक्ष किन्तु सोवियत समाज के हितैषियों ने इस बात की पुष्टि की कि सोवियत रूस के बड़े शहरों में ऐसे धंधे तेजी से बढ़े हैं।
अपने अंतिम वर्षों में नेमि जी की ÷ डायरी के कुछ पन्ने' एक हिन्दी पत्रिका समास - 4 ( पृष्ठ 191-200) में प्रकाशित हुए थे। इस प्रकाशित सामग्री में कुछ पन्ने लेनिनग्राड में घटे प्रसंग की पूरी जानकारी देते हैं। नेमि जी ने लेनिनग्राड 6 और 7 अक्टूबर 1984 ( रात बारह बजे के बाद) शीर्षक से रूसी स्त्री से फोन पर जो भी बात हुई थी उसका खुलासा किया है। 6 अक्टूबर की डायरी से एक अंश है -
÷÷ बड़ा अटपटा अनुभव है। वह स्त्री अंग्रेजी किसी विदेशी, शायद रूसी, की तरह ही बोल रही थी। पर आवाज सचमुच बड़ी मीठी, ÷ सिडक्टिव' थी। शुरू में अपनी बेटी की बात शायद बहाना ही थी। सुना था कि रूस में मास्को में, लड़कियां, औरतें विदेशियों को होटलों में, रेस्तरां में ÷ एकास्ट' करती हैं। पहले बात चलाती हैं और साथ चलने या अपने घर ले जाने को तैयार हो जाती हैं - डालर या अच्छे होटल में खानपान के बदले में। वह भी शायद ऐसा ही प्रयास हो। विदेशियों से इस होटल के ऐसे ही किसी कमरे में फोन करना और फिर मिलने का स्थान तै करना। असम्भव नहीं कि वह लड़की इस होटल में ही हो और रात में संग साथ के इच्छुक लोगों का इसी तरह पता लगाती हो।''
इसके बाद प्रस्तुत है 7 अक्टूबर की लम्बी बातचीत को ब्योरा और अंत में नेमि जी की निम्नोद्धृत टिप्पणी जो हमारे दल के सदस्यों की इस घटना पर प्रतिक्रिया को व्यक्त करती है -
÷÷ आज सबेरे सात बजे चाय पर पी.सी. जोशी और शिशिर दास को मैंने कल की कहानी सुनायी तो दोनों बड़े ÷ शाक्ड' हुए थे। है भी बड़ी ÷ डिस्टरबिंग' बात। यह कोई कालगर्ल रैकेट है या कोई लड़की अपने आप ही कुछ धन कमाने के लिए यह सब करती है। दस बजे तक खबर प्रतिनिधि मंडल के सब लोगों में फैल गयी। नाश्ते के समय कुछ लोग रस लेकर और कुछ मजाक उड़ाते हुए जिक्र छेड़ते रहे। पता चला देवेश राय का पक्का विश्वास है बल्कि उन्होंने पता लगा लिया है कि यह होटल में किसी ने मजाक किया है। ऐसे मजाक किये जाते रहते हैं। यह आदमी ( यानी श्री देवेश राय) तमाम कट्टर कम्यूनिस्टों की तरह शुतुरमुर्गीय मानसिकता से ग्रस्त है।
÷÷ आज शाम के दोबारा मजाक होने की सम्भावना और भी बहुत कम हो गयी। उस स्त्री का स्वर और सारी बातचीत का लहजा और अंदाज इस शक की गुंजायश नहीं छोड़ता। यह एक ऐसी सामाजिक स्थिति का सूचक है जो सोवियत रूस में धीरे धीरे पनप रही है और खतरे की घंटी है।''
नेमि जी की डायरी के पन्ने जो सन् 1985 के अपने लेनिनग्राद के अनुभव को ईमानदारी से व्यक्त करते हैं उस ÷ सामाजिक स्थिति' का भी संकेत देते हैं जो एक गुप्त व्याधि की तरह सोवियत समाज के भीतर ही भीतर पनप रही थी और लगता था कालांतर में अत्यंत उग्र और विकट रूप धारण कर लेगी।
नेमि जी की डायरी का इस लेख में जिक्र करते समय डाक में एक नूतन हिन्दी पत्रिका ÷ समकाल' का 15 जून 2007 का अंक मेरे हाथ में आया जिसमें एक लेख - ÷ रूसियों को चाहिए इंग्लिश बालाएं' शीर्षक से छपा है। सन् 1985 में जिस ÷ सामाजिक स्थिति' को नेमि जी ने रूसी समाजवाद के अंतिम दौर में पनपते देखा था और जिसे ÷ खतरे की घंटी' के रूप में रेखांकित किया था वह दैत्याकार बन कर किस प्रकार इक्कीसवी सदी के आरम्भ में नवउदारवादी रूस के नवधनाढ्य वर्ग की जीवन शैली का अभिन्न अंग बन चुकी है, यह ÷ समकाल' के प्रकाशित लेख में अत्यंत अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिस सामाजिक व्याधि के अस्तित्व को भी स्वीकार करने में रूसी समाजवादी सभ्यता के समर्थक उस समय मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थे, आज का नव उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग उसे आर्थिक उन्नति की एक अनिवार्य शर्त या कीमत मानने में जरा भी संकोच या क्लेश महसूस नहीं करता। रूस को जिस नेमि जी ने प्यूरिटन कम्यूनिस्टों की ÷ शुतुरमुर्गी मानसिकता' कह कर परिभाषित किया था उसकी कालांतर में परिणति उत्तर आधुनिक युग के नग्न और उग्र उपभोक्तावादी और मुक्त विलासितावादी जीवन शैली से सिद्धांतहीन समझौते में ही होनी थी। इस स्थिति में भीष्म जी की पीढ़ी ने आनेवाली युवा पीढ़ी को अपनी वास्तविकता से कतराने वाली मनोवृत्ति द्वारा एकदम सुरक्षाहीन और बे-तैयार छोड़ दिया था।
ऐसा नहीं कि भीष्म जी अपने इस रुख के परिणामों से एकदम अनभिज्ञ या उसके प्रति असंवेदी हों। आदर्शोन्मुख , विश्वासी रुख के यथार्थ से मुंह मोड़ने से उत्पन्न वाले परिणामों को भीष्म जी स्वयं स्वीकार करते हैं -
÷÷ मतवाला बना घूमने में अपना रस है, इंसान धरती पर चलने के बजाय उड़ता अधिक है, पर वास्तविकता पर उसकी पकड़ कमजोर ही बनी रहती है। अपने आसपास के यथार्थ को समझने के लिए वस्तुपरक, संतुलित दृष्टि ही सहायक होती है। बेशक रूमानी आदर्शोन्मुख दृष्टि आशावादी, प्रेरणाप्रद होती है पर उसके प्रभावाधीन नकारात्मक पहलुओं को देखने की तीव्र इच्छा ही मन में नहीं उठती। वस्तुपरक दृष्टि हो तो संतुलन बना रहता है।''
सिद्धांत स्तर पर सही दृष्टि होने के बावजूद इस दृष्टि को अमल में लाना और जांच पड़ताल की हिम्मत जुटा पाना कितना कठिन है यह भीष्म जी के ही कथन से स्पष्ट है -
÷÷ इस तरह मुख्यतः सुनी सुनाई बातों के आधार पर मैं अपने निष्कर्ष निकालता रहा। पर सोवियत संघ की एकबद्धता पर, मजबूती पर और अपनी त्राुटियों को दूर कर पाने की उसकी क्षमता पर मुझे तनिक भी संदेह नहीं था। मैं यह नहीं भूल पाता था कि क्रांति के कुछ ही समय बाद साम्राज्यवादी गुट के चौदह देशों ने इस नवजात समाजवादी देश को कुचलने की भरसक कोशिक की थी, दल बल के साथ इस पर टूट पड़े थे। फिर दूसरे विश्वयुद्ध के दिनों में भी प्रकटतः इसका साथ देते हुए भी उनकी यही कोशिश रही कि हिटलर सोवियत संघ को रौंद डाले। और उसके बाद भी ये देश अपने प्रचार माध्यमों तथा अपने कुचक्रों द्वारा सारा वक्त इसे नुकसान पहुंचाने, इसे कमजोर करने की कारवाइयां करते रहे थे। और निश्चय ही इन शक्तियों ने सोवियत यूनियन की कमजोरियों का पूरा पूरा लाभ उठाते हुए, अपनी पूरी शक्ति और षडयंत्रों द्वारा सोवियत सत्ता को धराशायी किया है।
÷÷ मेरी इस धारणा के सामने सोवियत व्यवस्था के सभी गुनाह माफ थे।''
स्पष्ट है कि भीष्म जी की समझ में सोवियत संघ के विघटन और विलोप के पीछे पश्चिमी राष्ट्रों का षडयंत्र और उनका शत्राुपूर्ण व्यवहार ही मुख्य कारक तत्व हैं। रूस की गम्भीर आंतरिक कमजोरियों और व्यवस्था के समाधानातीत अंतर्विरोधों की समाजवादी व्यवस्था के विघटन और विनाश में जैसे कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी। सिद्धांत रूप में वस्तुपरक दृष्टि के महत्व को स्वीकार करते हुए भी अमल में भीष्म जी इतने अवास्तविक और आत्मपरक क्यों हो गये , इस पर हम बाद में विचार करेंगे।
भीष्म जी द्वारा व्यवस्था का महिमा मंडन किस प्रकार एक विचारशील व्यक्ति का नहीं एकदम मुग्ध और भावुक व्यक्ति का कथन बन जाता है, यह कथन इसका अच्छा उदाहरण है -
÷÷ जहां त्राुटियों की ओर सरसरीतौर पर ध्यान जाता था, वहां सोवियत संघ की उपलब्धियों पर मन पुलक पुलक आता था। सोवियत संघ में जब पहला स्पूतनिक छोड़ा गया और इस तरह मानव जाति ने अंतरिक्ष की दूरियों में प्रवेश किया तो संसार भर में उल्लास की लहर दौड़ गयी थी। खु्रश्चैव इस स्पूतनिक का एक नमूना गेंद के आकार का बड़े गर्व से राजनायकों को उपहार स्वरूप देते फिरते थे।
÷÷ इसके कुछ समय बाद संसार के पहले अंतरिक्ष नाविक, यूरी गैगरिन ने अंतरिक्ष में अपनी उड़ाने भरीं। दुनिया एक नये युग में प्रवेश कर रही थी और इसका श्रेय सोवियत विशेषज्ञों को था।
÷÷ सोवियत संघ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक गर्व और उत्साह की लहर क्यों कर नहीं दौड़ जाती।
÷÷ ऐसी उपलब्धियों के सामने सोवियत व्यवस्था की त्राुटियां गौण पड़ जाती थीं।''
प्रश्न उठता है क्या सोवियत नागरिकों की नजर में व्यवस्था की त्रुटियां सचमुच गौण पड़ गयीं। या यह भीष्म जी की समझ और दृष्टि का चमत्कार है ?
अंतरिक्ष में स्पूतनिक छोड़ने की चमत्कारिक उपलब्धि पर के.पी.एस. मेनन की टिप्पणी अधिक ÷ वस्तुपरक' है। मेनन साहब इस बात के प्रति सचेत हैं कि सोवियत व्यवस्था में किस प्रकार सामान्य सुविधाओं का भी अभाव है। जैसे रूस में घरों में ही नहीं, अस्पतालों में भी शौचालयों के ÷ फ्लश' काम नहीं करते थे, उनसे पानी बाहर निकलता रहता था। इस पर देखिये मेनन साहब की टिप्पणी -
÷÷ यह एक अजूबा है कि जो राज्य स्पूतनिक के आविष्कार में अग्रणी रहा वही शौचालय में सही काम करने वाले फ्लश नहीं बना सका है। सचमुच रूस में भारी उद्योगों और जरूरत की चीजों के उत्पादन के उद्योगों में बड़ा असंतुलन है जिसके कारण आम लोगों को सदा जरूरत की चीजों का अभाव महसूस होता है।''
आम जनता की इसी अभावग्रस्त जिन्दगी पर अधिक रोशनी डालते हुए मेनन लिखते हैं -
÷÷ जो सुख सुविधाएं हमें सोची के आरोग्य निकेतन ( सेनेटोरियम) में उपलब्ध थीं उसकी तुलना में साधारण नागरिकों की जिन्दगी जरूरी चीजों के अभाव और तंगी से ही ग्रस्त थी। डबल रोटी अवश्य सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी लेकिन अन्य जरूरी चीजें नहीं। दूध और फल की दूकानों के आगे लम्बी कतारें रहती थीं और फल तो दूकान में आते ही कुछ ही मिनटों में गायब हो जाता था।
÷÷ दवाएं अच्छी और सस्ती थीं लेकिन कागज के पैकेज में ऐसे लपेटी रहती थीं कि भारत के गांव वाले को भी उसे लेने में लज्जा महसूस होगी। थर्मामीटर का यह हाल था कि उसे कांख में दस मिनट तक रख कर ही बुखार मापा जा सकता था। अस्पताल के कर्मचारी यह जान कर अचम्भे में थे कि मेरा थर्मामीटर तीस सेकेण्ड में बुखार माप लेता है। सोची में और अन्य जगह जरूरत की चीजें एकदम दुर्लभ थीं। हमारा थर्मोसफ्लास्क टूटने पर हम नया खरीदना चाहते हैं लेकिन सारे शहर में खोजने पर भी नहीं मिला। अगर सोची जैसी पर्यटकों के लिए दर्शनीय जगह में आम जरूरत की चीजों की यह स्थिति थी तो आम शहरों और खास कर गांव की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।''
स्पूतनिक जैसे चमत्कार से आम रूसी गर्वित हो सकता है लेकिन रोजमर्रा का जीवन अभावग्रस्त ही था। बढ़ता हुआ असंतोष जिसकी कोई सुनवाई न हो व्यवस्था के लिए विस्फोटक भी बन सकता है। भीष्म जी ने भी दैनिक अभावजन्य जन साधारण के असंतोष का जिक्र किया था लेकिन न वे उसके असली कारणों को छू सके न उसके परिणामों का उन्हें अहसास था। ऐसा क्यों ? प्रश्न यह भी है कि व्यवस्था इस अभाव को दूर करने की ओर क्यों सक्रिय, सफल न हो सकी? इस प्रश्न पर हम इस लेख श्रृंखला की अगली कड़ी में विचार करेंगे।
वस्तुस्थिति के प्रति भीष्म जी जितने असंवेदी दिखते हैं मेनन साहब उतने ही वस्तुस्थिति के प्रति संवेदी। जहां वे अभाव की स्थिति पर टिप्पणी करते हैं वहां उनका निम्नांकित कथन अभाव से प्रचुरता की ओर बढ़ने के रास्ते में जो कठिनाइयां हैं उनका भी संकेत देता है -
÷÷ आम जरूरत की चीजों के अभाव को दूर करने और उनको सभी के लिए प्रचुर मात्रा में सुलभ बनाने के लिए अब राज्य की ओर से बड़े प्रयास हो रहे हैं और सरकार ने इस उद्देश्य के लिए आदेश दिये हैं। लेकिन सोवियत संघ की समस्त जनता को पर्याप्त मात्रा में सुलभ कराने के लिए भागीरथ प्रयास जरूरी है। और इस बात पर जरा भी ताज्जुब नहीं होना चाहिए यदि कुछ वर्षों तक आज की कारवाई का नतीजा यह हो सकता है कि जो लोग भोग विलास की चीजें खरीद सकते हैं और उनके और उस अधिकतर जनता के बीच जो यह चीजें नहीं खरीद सकते हैं विषमता में वृद्धि हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो सोवियत संघ में एक ऐसा सुख सुविधा सम्पन्न बुर्जुआ वर्ग जन्म लेगा - एक ऐसी प्रक्रिया जिसके घटित होने पर कम्यूनिस्ट विरोधी दुनिया एक विद्वेषपूर्ण खुशी महसूस करेगी।''
यह बात मेनन साहब ने सन् 1953 में कही थी जो एक माने में भविष्य सूचक (prophetic) साबित हुई। क्या बिना वर्ग विषमता तीव्र किये विकास प्रक्रिया में तेजी लाना सम्भव है , यह शासक वर्ग और आर्थिक नीति निर्धारिकों के लिए तब भी एक समस्या थी और आज भी वह बरकरार है, चाहे वह रूस का विकास हो, या चीन और भारत का। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि यदि चिन्तन और जांच पड़तालें पूर्वाग्रहों से मुक्त हों तो वास्तविकता अधिक पकड़ में आती है। भीष्म जी और मेनन साहब की सोच और दृष्टि में यही अंतर है जो महत्वपूर्ण है। इस प्रश्न पर गहरे विचार के लिए आर्थिक विकास के पूंजीवादी बनाम समाजवादी माडलों का सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर तुलनात्मक विवेचन अपेक्षित है। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के विश्व के इतिहास को याद करें तो जो तथ्य सबसे महत्वपूर्ण बन कर हमारे समक्ष उभरता है वह है इतिहास की सबसे बड़ी और गम्भीर चिन