विश्वनाथ त्रिपाठी
• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल • सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार
• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण
• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण
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कहानी होनी अनहोनी , यथार्थ अयथार्थ, प्रत्याशित अप्रत्याशित के बीच एक नयी निर्मिति है। इसी रूप में वह आज की या समकालीन कहानी है। देखते देखते कहानी एक केन्द्रीय विधा बन गयी है और उसमें दूसरे रूपों की आवाजाही वर्जित नहीं है। कवि कथाकार विमल कुमार का लघु कथा संग्रह ÷ चोर पुराण' क्षमा शर्मा का कहानी संग्रह ÷ नेमप्लेट', युवतर कथाकार कुणाल सिंह का कहानी संग्रह ÷ सनातन बाबू का दाम्पत्य' और संजय खाती का कहानी संग्रह ÷ बाहर कुछ नहीं था' कहानी को कहानी के साथ सामाजिक विमर्श भी बनाते हैं। जीवन में नैतिक मूल्यों के साथ मूलभूत ऊलजलूलपन बना रहता है। विनोद और त्राासदी का अंतर्गुम्फन कहानी की एक नयी पहचान है। एजाज अहमद आज के मनुष्य के विस्थापन को सहज मानते हैं जब कि उससे भिन्न निर्वासन को विडम्बनापूर्ण। कहानी जहां एक निर्मिति है, वहीं यथार्थ और अतिकल्पना के गड्डमड्ड में चीजों का विखंडन भी है। विमल कुमार के ÷ चोर पुराण' में टेकनालॉजी, साइबर कैफे, ई मेल, चैनल, लोकतंत्रा, वैश्वीकरण का जिक्र यों ही नहीं है। चोर की रचना प्रक्रिया में संगीत का रहस्यवाद, संस्कृति की बहुलता घुली मिली है। ÷ चोर और वसंतसेना' एक मुकम्मल लघुकथा है : ÷÷ चोर कपिलवस्तु से आये थे चोर उज्जयिनी से आये थे वे वसंतसेना से प्यार करते थे इसलिए वसंतसेना भी उनकी संतरी से रक्षा करती थी इसलिए संतरी राजा से खुश था इसलिए राजा वसंतसेना से प्यार करता था और उसे अपनी अर्द्धांगिनी बनाना चाहता था। '' कोई पाठक यहां कथा गद्य की लय देख सकता है। ÷ चोर पुराण' में संस्कृत ग्रंथों, मृच्छकटिक जैसे नाटकों, लोकतंत्रा की बहसों, न्यायालय के निर्णयों का घालमेल है। विमल कुमार ÷ चोर पुराण' में विनोदपूर्ण कथा युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। ÷ चोर और सत्ता विमर्श', ÷ चोर उवाचः', ÷ चोर की शायरी', ÷ चोर और मौन की भाषा' का कॉमिक तत्व कई बार बहुलार्थी है। ÷ माडर्न चोर' में विमल कुमार लिखते हैं: ÷÷ पहले चोर बहुत परम्परावादी थे। वे माथे पर तिलक लगाते थे। चुटिया भी रखते थे। मंदिर भी जाते थे। ... अब तो चोर भी उत्तर आधुनिक हो गये। वे अनास्थावादी हो गये । इसलिए वे देवता के घर में भी सेंध लगाने लगे हैं। काफी कमाने लगे हैं। यह घोर कलयुग की निशानी है। माडर्न चोरों की कहानी है।'' चोरों की अपनी वेबसाइट है , उनका इंटरनेट है। उनका लोकतंत्रा है। विमल कुमार की लघुकथा ÷ धर्मनिरपेक्षता की चुप्पी' का व्यंग्य मारक है। कहानी की पाद टिप्पणी हैः ÷ धर्मनिरपेक्ष होने के लिए मौके पर चुप रहना ही बेहतर होता है। इससे धर्मनिरपेक्षता मजबूत होती है।' ÷ चोर और एम. एफ. हुसैन' का व्यंग्य इन दिनों देवियों के न्यूड्स के विवाद के दौर में चकित करने वाला है। यहां चोट वामपंथियों पर भी है। यहां कथा रस का व्यंग्यार्थ प्रकट है। ÷÷ उसने देखा कि चारों तरफ चोर का गुणगान हो रहा था। उसे ऐसा कोई आदमी नहीं मिला जो चोर के खिलाफ हो। रानी साहिबा तो उस पर आसक्त थीं ही। परिचारिकाएं और बांदियां भी। साथ में नर्तकियां भी। राजा उलट कदम वापस लौट आया।'' मितकथन की ताकत , व्यतिरेक विनोद। विमल कुमार ने अपनी कवि दृष्टि से अलग व्यंग्य दृष्टि का प्रमाण दिया है। कवि दृष्टि के बावजूद।
क्षमा शर्मा का कहानी संग्रह ÷ नेमप्लेट' जहां स्त्राीमुक्ति के निहितार्थ खोलता है, वहीं मर्दवादी रवैये पर चोट भी करता है। ÷ नेमप्लेट' में खिलंदड़ापन भी स्त्राीमुक्ति का संकेत है, पर स्त्राीवाद के प्रचलित मुहावरे का इनकार भी है। स्त्राी उत्पीड़न का प्रतिवाद यहां जितना मुखर है, उतना ही अनकहा भी। ÷ दादी मां का बटुआ', ÷ एक अधूरी प्रेम कहानी', ÷ खलनायक', वैलेण्टाइन डे', ÷ न्यूड का बच्चा', ÷ नेमप्लेट', ÷ बिन्दास' जैसी कहानियां हमारे समय के भयावह यथार्थ को भी कौतुकपूर्ण ढंग से बयान करती हैं। पहली ही कहानी ÷ दादी मां का बटुआ' भू्रणहत्या की त्राासदी पर विनोदपूर्ण क्रिटीक है। बीजे की एंकरिंग में दर्शकों के साथ बतकही दिलचस्प है। खरशूशटी देवी पहले ही प्रलोभन देती हैं कि इनामी सवाल का अच्छा उत्तर देने वाले को लंदन आने जाने का टिकट और ढेर सारे गिफ्ट दिये जाएंगे। ÷ लिबरेटेड वूमन' को भ्रूण परीक्षण से क्यों एतराज हो। टी.आर.पी. रेटिंग बढ़ रही है तो भू्रण परीक्षण के सारे तर्क और कन्याभ्रूण हत्या तक जायज है। लेखिका का प्रतिवाद छिपा है पर अंडर टोन में भारी पड़ता है। जो कहानी कहती है वह लेखिका का पक्ष नहीं है। इसका उलट पक्ष है। ÷ एक अधूरी प्रेम कहानी' संकेत है कि प्रेम कथाएं कैरियर के बड़े पेट में समा गयी हैं। ÷ वैलेण्टाइन डे' प्रेम की खिल्ली उड़ाने वाली कहानी है। फेमिनिज्म इसकी छूट नहीं है कि झूठे प्रेम का बखान काफी हो। ÷ न्यूड का बच्चा' कहानी में बीनू रातोंरात स्टार बनने के लिए न्यूड फोटोग्राफी के लिए तो राजी हो जाती है पर देखती है कि उसके निरावृत्त शरीर पर विज्ञापन ही विज्ञापन दर्ज हैं। ÷ उसके दांतों पर टूथपेस्ट की ट्यूबें जगमगा रही थीं। बिन्दी, काजल, पाउडर, कुंडल, चूड़ी, सब जगह कम्पनियां खड़ी इठला रही थीं। उसके नाखूनों पर नेल पालिश बनाने वाली कम्पनियों की सुंदरियां नृत्य कर रही थीं। और उसकी कमनीय त्वचा वहां तो क्रीम बनाने वाली कम्पनियों का युद्ध छिड़ा था।' यह है बाजारवाद और यही देह मुक्ति। मुक्ति की यातना। ÷ नेमप्लेट' में राहुल जिस लड़की को शादी के लिए नापसंद करता है उसी से अन्यथा फ्लर्ट करने में झिझकता नहीं है, पर लड़की ÷ टेप' की गयी बातों का हवाला देकर उसे पस्त कर देती है कि कल तक शादी की डेट वही बताये। राहुल वर्मा ने इतनी बड़ी पराजय अपनी जिन्दगी में पहले कभी नहीं देखी। ÷ बिन्दास' का व्यंग्य जिस सूत्रा में है वह है - ÷ स्पीड थ्रिल्स, बट किल्स' । स्त्राी कितनी भी मुक्त हो, भीतर भीतर घुटती है। इस घुटन के रूप अलग अलग हो सकते हैं। ÷ खलनायक' कहानी में खलनायक सरीखे सत्यजीत के लिए एक आत्मीय लगाव स्त्राी मुक्ति की नयी पहचान है - ÷ नहीं, वह जो मेरे आत्मसम्मान को बार बार ठेस पहुंचा कर भी मन के एक कोने में एक स्थान सुरक्षित छोड़ गया था, क्या खलनायक हो सकता था?' क्षमा शर्मा ÷ गन्दगी' में एक काम करने वाली बाई के पक्ष में हैं जो दबंग है - वह कूड़ा साफ कर सकती है तो फैला भी सकती है। ÷ अन्नविदा' का आरम्भिक अंश इस प्रकार है : ÷ जिन्दगी में कितनी कहानियां एक साथ चलती रहती हैं। बिल्कुल बेतरतीब, एक दूसरे से अलग थलग। फिर भी बेमिसाल, एक दूसरे में गुंथी हुई।' कई कहानियां मामूलीपन में इकहरी सपाट जान पड़ती हैं। वे कहीं भी शूरू हो सकती हैं, कहीं भी खत्म। ÷ चार अक्षर' कहानी का अंत - ÷ और इस तरह एक कथा जो जहां से शुरू होती है, जिसे हम जैसे खत्म करना चाहती हैं वह बिल्कुल उस तरह से खत्म नहीं होती। जैसे कि हमारे चाहने से कोई कथा शुरू नहीं हो सकती। प्रेम करने के कारण लड़कियां पागल हो सकती हैं। मर सकती हैं .... या सरोज जीजी की तरह एक अधूरी जिन्दगी के पार जा सकती हैं।' यहां डिप्रेशन की ओर इशारा अधूरी जिन्दगी के पार जाना है। क्षमा शर्मा की कहानियां कहीं सहज हैं - व्यंग्य में ताकतवर, कहीं नाटकीय विडम्बना में सार्थक। ÷ आधी दुनिया' के अंतर्गत कॉलमनुमा लेखों से क्षमा शर्मा की पहचान बनी। कहना न होगा कि कहानियों में भी विमर्शकार की ताकत अधिक प्रकट है जबकि कहानीकार की अपनी सीमा भी छिपी नहीं है। छोटी कहानियां भी रिपोर्ताज जान पड़ती हैं। एक मीडियाकर्मी के सरोकार क्षमा शर्मा के सरोकर भी हैं। कहानीपन यहां कहानी की शर्त नहीं है। संकेत की जगह आक्रामक खिलंदड़ापन क्षमा शर्मा की कहानियों की पहचान हैं। स्मार्टनेस। दुस्साहस। कहीं गालियों का प्रयोग धड़ल्ले से है। सीधी सादी कहानी ÷ फादर' में जॉब करती स्त्राी का त्यागपत्रा, भूटान में मिली नौकरी, शहर में फैलता दंगा - जो त्राासदी से कम नहीं। दंगों में भी स्त्राी ही आसान शिकार होती है। एक सीधी सादी कहानी भी विमर्श से कम नहीं।
युवा कहानीकार कुणाल सिंह का कहानी संग्रह ÷ सनातन बाबू का दाम्पत्य' कहानी की दुनिया में एक नया रचनात्मक विकास है। विस्तार और जटिलता में जाकर इधर कुणाल , नीलाक्षी, चंदन पांडे ने कहानी के वस्तुजगत् को और शिल्प को नयी से नयी भंगिमाएं दी हैं और जीवन, प्रेम, बेकारी, क्षेत्रावाद, हिंसा, बाजार, यौनिकता जैसे विषयों पर अप्रत्याशित रूप से ऐसी कहानियां लिखी हैं जो विस्मयप्रद हैं। वे एक तरह से हमारे तथाकथित शालीन संस्कारों को ध्वस्त करती हैं। वे अप्रत्याशित हैं, आघातप्रद हैं। नींद उड़ा देने वाली हैं। जैसे संग्रह की लम्बी कहानी ÷ रोमियो, जूलियट और अंधेरा' । इसकी औपन्यासिकता चकित करती है। अनुभव के भीतर नयी तकनीक का उपयोग कई बार करिश्माई है। कुणाल सिंह का पूर्वकथन कहानी के विस्फोटक नयेपन की समझने की कुंजी है : ÷÷ कहानी में आये विवरण एवं तथ्य पूर्णतया काल्पनिक हैं। किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। दरअसल दुनिया में गुवाहाटी नामक कोई शहर ही नहीं। गुवाहाटी में कभी कोई दंगा हुआ ही नहीं। दंगे में कभी कोई मरा ही नहीं। दुनिया में हर कहीं अमन चैन है। लोग खुशहाल हैं तमाम व्यवस्थाएं हैं। फुर्सतें भी हैं। फुर्सतों में पढ़ने के लिए और कभी नहीं पढ़ने के लिए कहानियां हैं। कहानियों में गुवाहाटी है, गुवाहाटी में दंगे हैं। दंगों में लोग मारे जा रहे हैं। लेकिन गुवाहाटी, अहमदाबाद, अयोध्या, काबुल, बगदाद आदि हमारे समय के कद्दावर गद्य हैं बस! चिन्ता की कोई बात नहीं। कहानी का आरम्भ और अंत जैसे त्राासद समय के दो छोर हैं - पर कहीं मिलते भी हैं।'' हाशिए का चरित्रा रामदहिन कामती अनुभा मनोज को एक दूसरे से मिलाता है पर पहले ही मार दिया जाता है। अनुभा मनोज के लिए प्रेम रोमांस से अधिक है। अनुभा खुद ही मनोज को मां से मिलाती है और विवाह के लिए तैयार है। दोनों के बीच का मोबाइल संवाद तिलिस्म से कम नहीं है। संवाद की भाषा यह है : मैं - तुम्हें नहीं लगता कि मैं भीग रहा हूं? वह - तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें छतरी में आ जाना चाहिए। मैं - मे आई कम इन योर छतरी? वह - योर वेलकम। इन माय छतरी। या - क्या पता मैं इस तरह गुम हो जाऊं कि फिर कभी न मिलूं? - क्या पता तुम्हें खोजते खोजते मैं भी गुम हो जाऊं? या - अब ये भी मैं ही बताऊं कि तुम मुझसे क्या बोलो? पगले हो क्या? - एक्चुअली मैं जरा नर्वस महसूस कर रहा हूं। यहां इस आधे अंधेरे कमरे में तुम्हारे साथ अकेला। मतलब...। कुणाल कहानी के उत्तरार्द्ध में अनहोनी का पूर्वाभास देते हैं कि ÷ कहानी में हम आगे और आगे बढ़ते जाते हैं और पीछे छूटती जाती है खतरे की तख्ती। चेतावनी की वे इबारतें हमें बहुत दिनों बाद याद आनी थीं - ÷ सावधान ... कहानी में आगे खतरनाक मोड़ हैं' ।' कहानी त्राासदी से कम नहीं। हिंस्र आक्रमण में अनुभा भी मार दी जाती है। अधमरा मनोज कुत्ते से भिड़ जाता है। ÷ अंधेरा' सिर्फ एक शब्द संकेत है कि कुछ भयावह त्राासद घट चुका है। अब पूर्वकथन याद करें - ÷ दरअसल दुनिया में गुवाहाटी नामक कोई शहर ही नहीं' । ÷ सनातन बाबू का दाम्पत्य' संग्रह की चर्चित कहानियों में प्रायः सभी सात कहानियां हैं - ÷ शोकगीत', इति गोंगेश पाल वृत्तांत', ÷ सनातन बाबू का दामपत्य', ÷ आदिग्राम उपाख्यान', ÷ आखेटक', ÷ साइकिल' और ÷ रोमियो जूलियट और अंधेरा' । ÷ साइकिल' की चाची, ÷ आखेटक' की जुल्फिया, ÷ सनातन बाबू का दामपत्य' के सनातन बाबू - यादगार चरित्रा हैं। सनातन बाबू अविवाहित हैं पर काल्पनिक पत्नी पूरी कहानी में छायी हुई हैं। अनहोनी आम बात है। पत्नी कहती हैं - ÷ हवा के खुले में हम औरतें अपनी देह की चमड़ी पहनती हैं। चमड़ी उतार दो तो नंगी हो सकती हैं, या क्या पता तब भी नहीं' । इसी कहानी का एक अंश है : ÷ अकेले के घर में रात खटकों से भरी होती है। लेकिन इस घर में जरूर कोई और भी है। सनातन बाबू के जाने बगैर छिप छिप कर रहता आया है। ... उदाहरण के लिए सनातन बाबू ने दो बेला के लिए भात बनाया। रात के लिए भात रख कर गये और लौट कर देखा तो भात गायब।' उन्हें यह भी लगता है - दूसरा अदृश्य व्यक्ति स्त्राी ही है। यह कल्पना जितनी हास्यास्पद है, त्राासद भी। ÷ इतिगोंगेश पाल वृत्तांत' में कहानी में अक्सर छोटा सा ब्रेक है। जादुई यथार्थवाद और क्या हो सकता है। कहानी तो कहानी है। समाज की गिरफ्त से बाहर आता गोंगेश पाल। यहां भी त्राासद अंत है। कहानी जैसे आगे लिखी जानी हो। ÷ शोकगीत' में बेकारी के दिनों की यातना है। दुनिया एक रेडीमेड उत्पाद है। यहां कुछ भी हासिल नहीं। ÷ आखेटक' में जुल्फिया ही शिकारी है - शिकार हैं पर्यटक नेपाल बाबू। जुल्फिया को लगता है - ÷ उसकी शालीन हरकतों में अब भी वे उत्तेजक और हिंस्र झाड़ियां बच रही हैं जो मर्दों को लहूलुहान कर सकती हैं।' बाघ का होना झूठ है पर जुल्फिया की देह का खुलना सच है। कुणाल सिंह की कहानियां कहानी के प्रचलित तंत्रा के विरुद्ध नया वृत्तांत बनाती हैं। ÷ आदिग्राम उपाख्यान' विभूतिभूषण बनर्जी के आरण्यक की तरह की फंतासी हैं। रानी रासमणि के दुःख से भीगी कमीज की अपनी अंतर्कथा है। कुणाल सिंह के सामने चुनौती है कि वे एक भयावह समय में कहानी को अपने समय का दस्तावेज बना सकें। मुक्तिबोध ने फंतासी प्रधान कहानियों से एक अद्वितीय पहचान बनायी थी। इधर युवतर कहानीकारों ने कहानी को प्रति कहानी का रूप दिया है। कहानी के विरुद्ध कहानी- जो किस्सागोई को एक नयी ऊंचाई देती है।
इधर के कहानीकारों में अग्रणी संजय खाती का पहला संग्रह ÷ पिण्टी का साबुन' १९९६ में छप कर चर्चित हुआ था। दूसरा नया संग्रह बाहर कुछ नहीं था इतिहास, संस्कृति, सूचना क्रांति, तकनीकी के साथ मिथक और फंतासी के इस्तेमाल के कारण भी उल्लेख्य हो चला है। कम कहानीकारों के यहां पौराणिकता और समकालीनता के द्वंद्व में लोकतंत्रा, आजादी, बाजारवाद, वैश्वीकरण के तमाम मुद्दे कहानी को बहुलार्थी बनाते हैं। संग्रह की अंतिम कहानी ÷ बाहर कुछ नही था' उपभोक्ता संस्कृति की मीमांसा जान पड़ती है। यह उस पार की दुनिया है जिसमें हमारी नजर चीजों में गुम रहती है, जबकि वह सिर्फ एक इंच दूर है या शायद इससे भी कम। खाड़ू का शाप और खड़क सिंह का चमत्कार एक दूसरे को अतिव्याप्त करते हैं। कम्पनी के नये टूथब्रश ब्रांड हैं जो क्या कुछ नहीं दे सकते। प्रेसीडेन्शियल डिनर में बॉस का इम्प्लाई के साथ जाना इस जादुई दुनिया में असंगत नहीं है। अमरता भी ब्रांड का नाम है। जो है, विज्ञापन में है मुनाफे में है। बाहर कुछ नहीं है। संक्षिप्तता में यह कहानी एक तरह से संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है। संजय खाती के नये संग्रह की अन्य महत्वपूर्ण कहानियां हैं - ÷ बापू की घड़ी', ÷ मादरेवतन', ÷ पुल', ÷ विलन', ÷ जाल से जाल तक', ÷ अयोध्या' और ÷ सुलतान का दांव' । आज जब ÷ लगे रहो मुन्ना भाई' जैसी फिल्म के बहाने गांधीगीरी मुहावरा बन चुका है - ÷ बापू की घड़ी' करिश्माई होकर भी ठप है क्योंकि म्यूजियम में बंद है। इंटरनेट और वैश्वीकरण के दौर में वह कुछ न के बराबर है। जैहिन्दी की मौत के बाद घड़ी चलने लगती है। संजय खाती एक तरह से सम्यता समीक्षा के दायरे की कहानियां लिखते हैं। स्मार्टनेस के प्रलोभन से मुक्त वे पर्यावरण, आतंकवाद, भ्रूणहत्या, विकास आदि की तहों में जाते हैं। ÷ जाल से जाल तक' कहानी में मछली की मानवीय भाषा के चमत्कार के साथ ÷ गोल्डन फिश' कम्पनी का मायाजाल भी है। यहां बाजार और पूंजी का विमर्श भी है। संकेत यह भी है कि पूंजी ही विनाश का कारण हो सकती है। आदमी हो या जलचर एक ही दुष्चक्र में फंसे हैं। ÷ अयोध्या' कहानी बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद के मनोविज्ञान को प्रकट करती है। ए.सी. कोच में सुरक्षित लोग दरवाजे की ठक ठक सुन कर भी दरवाजा नहीं खोलते। किसी की आवाज आती है - ब्रिलियंट! अपने डरों के साथ हम कितने एकजुट हैं - हम सब अयोध्या। ट्रेन का सफर नहीं हुआ, अंतरिक्ष यात्राा हो गयी। ÷ सुलतान का दांव' कहानी फिल्म की ग्लैमरस दुनिया का मखौल उड़ाती है - हालांकि यहां त्राासदी कम महत्वपूर्ण नहीं। सुल्तान विश्वविजय के वर्ष में ही सुपर हीरो हैं - वही खलनायक भी हैं। बेरोजगारी, भुखमरी, औंधे बर्तन, बुझे चल्हे हों तो हों - उसके लिए लोग सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार थे। अंधेरे के तिलिस्म में फिल्म सुपरहिट होती है। ÷ स्वर्गारोहिणी' कहानी खंड खंड वृत्तांत की तरह है। पर्यटन उद्योग है, कहीं इन्द्रधनुष, कहीं स्वर्ग का पुल, कहीं कम्प्यूटर, कहीं खच्चर। डर है तो यह कि पर्यटन तक तो ठीक है, सुरंग वालों का मूड बिगड़ गया तो क्या होगा। अकेले युधिष्ठिर जिधर जा रहे हों वहां मामूली आदमी कम्प्यूटर क्रांति के सपने देख रहा है। स्वर्ग की राह सबके लिए आसान तो नहीं। कहानी का एक वाक्य है - जो सच बात बोलता है, अकेला ही रह जाता है! एक तरह से सभी कहानियां विमर्श प्रधान हैं पर कुतूहल उत्सुकता जगा कर। दुर्लभ पठनीयता के साथ कल्पनाशीलता संजय खाती की कहानियों का अनिवार्य तत्व है। ÷ पहली संतान' में खस्टी देवी ८१ साल की उम्र में अबूझ जान पड़ती हैं। कभी इस अंचल में औरत को जन्मते ही मार दिया जाता था। पर एक दिन अंधेरे सौरगृह में एक नियम टूटा। परम्परा को काठ मार गया और एक बच्ची जी गयी। अल्ट्रासाउंड के जमाने में स्पर्श से भ्रूण का पता चल जाता था खस्टी को - जो बकरियां चराती थी। आखिर बकरियां भी तो बच्चियां ठहरीं। फिर एक लड़के का करिश्माई जन्म। अनु की डायरी में कल्पना है कि खस्टी देवी उसकी पहली बेटी की तरह जन्म लें। सृष्टि की सार्थकता इसी जन्म जन्मांतर के रहस्य में ही है। इसी जिजीविषा में। कभी नीत्शे ने मौखिक पर्यावरण की अतार्किकता को एक तरह की रोमांचक कल्पना माना था। संजय खाती इस अतर्क्य कल्पना से अक्सर नया विमर्श बनाते हैं। यहां विस्थापन की अपनी विडम्बनाएं हैं। ÷ मादरेवतन' में इस्लाम शेख का छापाखाना मुक्तिबोध की कविता के छापाखाने की याद दिलाता है जिसमें उत्तेजक पर्चे छपते रहते हैं। संजय खाती का सूक्ष्म पर्यवेक्षण एक नया विन्यास सम्भव करता है। सघनता के इस शिल्प में पाठ और संदर्भ दोनों महत्वपूर्ण हैं। कई बार इतिहास चक्र जैसा विमर्श संजय खाती के यहां प्रधान हो जाता है। ÷ बाहर कुछ नहीं था' का अंत इस तरह है : ÷÷ उसके बाद में कानों को कुछ सुनाई देना बंद हो गया। सिर्फ नदी के सुसाट सा दिमाग में गूंजने लगा। ... वह दीवार पर चलती एक एड फिल्म थी। उसमें एक घर था, जो मेरे जैसा लगता था, उसमें कौशल्या थी, डब्बू था और पिंकी भी। वे टूथपेस्ट की एक ट्यूब के इर्द गिर्द खिलखिलाते हुए नाच रहे थे। मैं वहां नहीं था।'' उपरोक्त अतर्क्य कल्पना संजय खाती को बाहर भीतर के द्वंद्व से परिचित कराती है। यहीं होनी अनहोनी के तनाव में आधी अधूरी लगने वाली कहानी एक मुकम्मल पाठ बनती है। पूंजीवाद का बढ़ता हुआ दबाब इतिहास , राष्ट्रवाद, संस्कृति, जातीय अस्मिता पर देखा जा सकता है। संजय खाती की कहानियां कई बार सांस्कृतिक विस्थापन के विमर्श में ले जाती हैं पर विस्मय का जादुई प्रभाव वे सजीव रखते हैं।
यहां विमल कुमार का ÷ चोर पुराण', क्षमा शर्मा का ÷ नेमप्लेट', कुणाल सिंह का ÷ सनातन बाबू का दाम्पत्य' और संजय खाती का ÷ बाहर कुछ नहीं था' - ऐसे संग्रह हैं जो कहानी के बहुरंगी यथार्थ को - कभी छायाभासी यथार्थ, कभी भयावह यथार्थ को - प्रकट करते हैं। इनमें कई बार एक ही संग्रह की दो कहानियां एक जैसी नहीं हैं। बेशक विमल कुमार के यहां एक ही थीम हैं, पर खिलंदड़ापन वहां भी वैविध्य की झलक देता है। युवतर कहानी लेखक कुणाल सिंह संजय खाती से सीख सकते हैं कि कहानी में वक्रताएं अनिवार्य नहीं हैं। इकहरापन तो संजय खाती के यहां भी नहीं है, पर विन्यास में सचेष्ट जटिलता भी नहीं है। क्षमा शर्मा सीधे सीधे अपने समय को सम्बोधित करती हैं। एक बेलाग स्मार्टनेस उनका ढंग है। विमल कुमार की व्यंग्य दृष्टि के पीछे कवि दृष्टि मौजूद है। विमल कुमार के व्यंग्य की भ्रामक सरलता के पीछे राजनीतिक समझ भी सक्रिय है। कहना न होगा कि यहां चुने गये कहानी संग्रह हमारे समय की विडम्बनाओं को सामने लाते हैं। कहानी अब कहानी के फार्म तक सीमित नहीं है। वह खबर भी है, विचार भी, हस्तक्षेप भी। यथार्थ के अपने रहस्य हैं। कहानी यथार्थ का रूपांतरण भी है। सूचनाओं के दौर में संजय खाती और कुणाल सिंह यथार्थ और अयथार्थ के बीच एक कथात्मक विन्यास रचते हैं। जरूरी नहीं कि इसे कलावाद कहा जाए। इन सभी कथाकारों के लिए महत्वपूर्ण है जीवन। वही गल्प भी है और यथार्थ भी।
चोर पुराणः विमल कुमार , प्रकाशनः पेंग्विन बुक्स, नयी दिल्ली, मूल्यः १५०.०० रु. नेमप्लेटः क्षमा शर्मा , प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्यः १७५.०० रु. सनातन बाबू का दाम्पत्यः कुणाल सिंह , प्रकाशकः भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्यः १२०.०० रु. बाहर कुछ नहीं थाः संजय खाती , प्रकाशकः भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्यः १००.०० रु.
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