जीवन
तो फिर विपथन ही सही... भानु भारती 

लेख
सन् 1857 का विद्रोह: सुराज के लिए संघर्ष मैनेजर पांडे  
विज्ञापनों में स्त्रिायां (नवजागरणकालीन हिन्दी पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों के संदर्भ में) आशुतोष पार्थेश्वर   

कहानियां
चूक मो. आरिफ
खजाना मनोज कुमार पांडेय 

पत्र
नामवर सिंह के पत्र

कविताएं
पांच कविताएं मलय
कविताएं नवल शुक्ल
कविताएं कुमार अम्बुज 
छः कविताएं श्रीप्रकाश शुक्ल  
कविताएं प्रियदर्शन  
कविताएं नीलोत्पल 

वृत्तांत
अर्थात् औरों की कथा: अरुण कमल 

यात्रा
बुद्धबारूद और पहाड़ मधु कांकरिया 

लम्बी कहानी
छबीला रंगबाज का शहर प्रवीण कुमार 

समीक्षाएं
प्रभुता का पराभव अर्थात ईश्वरता का ‘उपसंहार’ नारायण सिंह  
जहां से अनहद शुरू होता है अनिल त्रिपाठी 
लिखना अपनी आंख पाना है! विशाल श्रीवास्तव 
मानुष गंध से उर्वर होती है कविता की जमीन रविशंकर उपाध्याय 
कहानी का कमल व्यूह विन्ध्याचल यादव 
यथार्थबोधआधुनिक चेतना एवं भविष्यदृष्टि राजीव कुमार 
असुरक्षित भविष्य का खौफ और तनाव बसंत त्रिपाठी 

 

 Click Here to read अंक- 29

जीवन
तो फिर विपथन ही सही...(II) भानु भारती 

शताब्दी
न याद किया जाना अतिया हुसैन का वीरेन्द्र यादव 


लेख
अभिशप्त आत्माओं का आलाप: मलयालम स्त्राी आत्मकथा गरिमा श्रीवास्तव
समकालीन जीवन और हिन्दी उपन्यास अजय वर्मा 


लम्बी कहानियां
एगही सजनवा बिनऽऽऽ ए राम! उपासना 
चांदी चोंच मढ़ाएब ए कागा उर्फ चॉकलेट फ्रेण्ड्स शिवेन्द्र 

कविताएं 
ग्यारह कविताएं कुंवर नारायण / पांच कविताएं ऋतुराज / तीन कविताएं आर चेतनक्रांति / ऐसा ही है जीवन सुंदर चंद ठाकुर / कविताएं विवेक निराला / कविताएं आलोक पराड़कर 

वृत्तांत 
अर्थात् औरों की कथा-प्प्प् अरुण कमल 


आत्मकथा
मणिकर्णिका-III डॉ. तुलसीराम 


समीक्षाएं 
भारतीय समाज और अल्पसंख्यक समुदाय मधुरेश
भेदक सचाइयों का कथात्मक रूपांतरण अवधेश मिश्र
कथालोचना के तीन युवा स्वर अमिताभ राय
वैश्वीकृत समय और हिन्दी आलोचना रणेन्द्र
‘आत्म’ का लोप और किताबों के बहाने कल्लोल चक्रवर्ती

 

 Click Here to read अंक- 28 

जीवन
तो फिर विपथन ही सही... भानु भारती

शताब्दी
उत्पीड़ित और अपमानित लोगों का संसार मोहम्मद मसूद

कहानियां
मिनाल पार्क और तीन बूढ़े वंदना शुक्ला 
ए घुटरू ! ए घुटरू ! कहनी कहो न... शिवेन्द्र

आत्मकथा
मणिकर्णिका डॉ. तुलसीराम

उपन्यास
बखेड़ापुर हरे प्रकाश उपाध्याय

समीक्षाएं 
निज लय का अनुपम गद्य पंकज पराशर
व्यंजना शक्ति का नया रूप अजय वर्मा 
भूमंडलीकरण के दौर में आधुनिकता अरुण होता

लेख
प्राचीन भारत में शिल्पियों की स्थिति रमानाथ मिश्र 
सामाजिक पदानुक्रम का प्रत्यंतरण अवधेश मिश्र

विशेष 
अपनी अपनी आधुनिकता हरबंस मुखिया

कविताएं 
आठ कविताएं विष्णु नागर / कविताएं बद्री नारायण / कविताएं प्रकाश / हलफनामा: कविता के दक्खिन टोले से अशोक कुमार पाण्डेय / कविताएं अपर्णा मनोज / तीन कविताएं अविनाश मिश्र

वृत्तांत 
अर्थात् औरों की कथा अरुण कमल

 समीक्षाएं 
समय की सचाइयां तलाशता साहित्य बिपिन तिवारी
कविता की नाउम्मीदी के खिलाफ मदन कश्यप
तो जीवन कितना वृहत्तर हो जायेगा अनिल त्रिपाठी
काव्य चित्त का परिष्कार और विस्तार जितेन्द्र श्रीवास्तव

समाज 
मार्फत दिल्ली कृष्णा सोबती

शताब्दी
‘मैं’ और ‘वे’ के बीच रामविलास शर्मा का ज्ञानकांड अभय कुमार दुबे 
रामविलास जी की एक डायरी विजय माहन शर्मा 

कहानियां
फेसबुक और बनना पड़ोसी के मकान काकृनवीन जोशी 
परिवार, (राज्य) और निजी सम्पत्ति राकेश मिश्र 
द रॉयल घोस्ट तरुण भटनागर 

लम्बी कहानी 
कट टु दिल्लीः कहानी में प्रधानमंत्राी का प्रवेश उमा शंकर चौधरी 

कविताएं 
कविताएं कात्यायनी / कविताएं एकांत श्रीवास्तव / सात कविताएं गीत चतुर्वेदी / दो कविताएं श्रीप्रकाश शुक्ल / कविताएं यू.के.एस. चौहान / तीन कविताएं प्रीति चौधरी

आत्मकथा
मणिकर्णिका डॉ. तुलसी राम

लेख
दृश्य: बिम्ब और गाथा नित्यानंद तिवारी
महाराष्ट्रीय नवजागरण में निरंतरता वीर भारत तलवार 

बहस
यथार्थवाद और मार्क्सवाद को विकसित करें रमेश उपाध्याय जवाबे शिकवा राजकुमार

वृत्तांत 
अर्थात औरों की कथा अरुण कमल

विशेष
बच्चों को क्या पाठ पढ़ाएं? दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा 

समीक्षाएं/  रोती हुई संवेदनाओं की आत्मकथा चौथीराम यादव
समीक्षाएं/ निरुपनिवेशीकरण के हक में अजय तिवारी  
समीक्षाएं/ कविता सम्प्रति: पीढ़ियों की जुगलबंदी ओम निश्चल 
समीक्षाएं/ वैचारिक आधार की दृढ़ता वीरेन डंगवाल 
समीक्षाएं/ संघर्ष काल में कथाएं वैभव सिंह
समीक्षाएं/ समय और सभ्यता का भाष्य अशोक सिंह यादव 

जीवन
• जीवन क्या जिया! नामवर सिंह
 मुड़ मुड़ के देखता हूं... राजेन्द्र यादव
 यह जान तो आनी जानी है... गुरदयाल सिंह

समाज
 विस्थापन की पीड़ा पी.सी. जोशी

शताब्दी
 नयी चेतना का संघर्ष अजय तिवारी 
 जैनेन्द्र की रचनात्मक दुनिया में स्त्री प्रीति चौधरी

लेख
 'शृंखला की कड़ियां' और मुक्ति की राहें मैनेजर पाण्डेय
• गांधी: अपना सामना सुधीर चंद
 विभाजन, इस्लामी राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमान (संदर्भ: आधा गांव, उदास नस्लें, आग का दरिया व छाको की वापसी) वीरेन्द्र यादव 
 भक्ति के बृहद आख्यान में 'सत्पुरुषों' की पीड़ा बजरंग बिहारी तिवारी
 स्त्री प्रतिरोध के पुरा लेख अवधेश मिश्र

मुलाकात
 भारत में आर्यों की अखंड इकाई नहीं थी डाक्टर रामविलास शर्मा से नामवर सिंह की वार्ता

बहस
 आम्बेडकर चिन्तन में मार्क्स कंवल भारती

संस्मरण
 लखनऊ मेरा लखनऊ मनोहर श्याम जोशी
 मैनपुरी का शहजादा कृष्णा सोबती 
 तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द ज्ञानरंजन 
 फिराक वार्ता विश्वनाथ त्रिपाठी
 पंडित श्रीलाल शुक्ल रवीन्द्र कालिया

 

डायरी 
 गुजरात: यहां भी है, वहां भी है नमिता सिंह

यात्रा
जंगलों की ओर मधु कांकरिया

वृत्तांत 
कितने शहरों में कितनी बार: दिल्ली ममता कालिया

आख्यानक 
घर का जोगी जोगड़ा काशीनाथ सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया: डॉ. तुलसी राम

विशेष 
 रतनबाई जिन्ना: जिन्ना की कामना का नीलकुसुम वीरेन्द्र कुमार बरनवाल
 19वीं सदी में स्त्री चेतना और ताराबाई शिन्दे वीरभारत तलवार
 रणभूमि में भाषा विभूति नारायण राय 
 आत्म और आत्मचरित राजकुमार

कहानियां

 नपनी दूधनाथ सिंह 
 ख्वाजा, ओ मेरे पीर! शिवमूर्ति 
 इति गीतांजलि श्री 
 रंगमंच पर थोड़ा रुक कर देवेन्द्र
 भूलभुलैयां सारा राय 
 खाना योगेन्द्र आहूजा 
 परिन्दे का इंतजार सा कुछ... नीलाक्षी सिंह 
 नोटिस राजू शर्मा 
 क्विजमास्टर पंकज मित्र
 मौसम मो. आरिफ
 इति गोंगेश पाल वृत्तांत कुणाल सिंह 
 सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय 
 भूलना चंदन पाण्डेय 
 एक जिन्दगी... एक स्क्रिप्ट भर! उपासना

कविताएं 
 कोलम्बस का जहाज कुंवर नारायण 
 इब्राहिम मियां का हालचाल केदारनाथ सिंह
 विनोद कुमार शुक्ल की कविता 
 अपने बहीखाते में अशोक बाजपेयी
 होनहार विष्णु खरे 
 हमसे भी तो कुछ सीखना चाहिए मनुष्यों को चंद्रकांत देवताले 
 बैलगाड़ी भगवत रावत
 समुद्र पर हो रही बारिश नरेश सक्सेना 
 मेरे हिस्से की शांति ऋतुराज 
 जगह बदलनी होगी वेणु गोपाल
 खिलौना राजेश जोशी
 दोस्त अरुण कमल 
 कुछ कद्दू चमकाये मैंने वीरेन डंगवाल 
 खेल के नियम विजय कुमार
 पुकार पंकज सिंह 
 मेरी हैसियत विष्णु नागर
 प्रेत विनोद दास
 पिताओं के बारे में कुछ छूटी हुई पंक्तियां कुमार अम्बुज
 निजामुद्दीन देवी प्रसाद मिश्र 
 आधी रात मे रुलाई का पाठ बद्रीनारायण
 हंसने से अधिक रोने की क्रियाएं नवल शुक्ल 
 दृश्यों से लबालब इस दुनिया में हरीश चन्द्र पाण्डेय 
 हवाई थैला मदन कश्यप 
 नदी और पुल विमल कुमार 
 रीमिक्स आशुतोष दुबे 
 बात पवन करण 
 हड़परौली श्रीप्रकाश शुक्ल 
 नमकहराम जितेन्द्र श्रीवास्तव 
 जिसके पीछे पड़े कुत्ते गीत चतुर्वेदी 
 इस बरस फिर हरे प्रकाश उपाध्याय 
 विलाप नहीं कुमार वीरेन्द्र 
 वैश्विक बाजार में लुप्त होने से पहले पटरी बाजार का एक शब्दचित्रा मदन केशरी
 मुक्तिबोध का लिफाफा यू.के.एस. चौहान
 दिल्ली में टाइम क्या चल रहा है सर्वेन्द्र विक्रम
 तुम्हारी जेब में एक सूरज होता अजेय
 नानी का चश्मा फरीद ख

 जीवन 
 यह जान तो आनी जानी है... गुरदयाल सिंह

शताब्दी 
 अज्ञेय : दिक और काल के बरक्स राहुल सिंह
 प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल सा सुबोध शुक्ल
 आत्मकथन शमशेर बहादुर सिंह

लेख 
 वैकल्पिक आधुनिकता, आधुनिकता के विकल्प, अनेक आधुनिकताएं या कुछ और   हरबंस मुखिया
• एक वाकिया' संविधान सभा काः चंद उलझे हुए सवालों पर एक नजर और आदित्य निगम

कहानियां 
 दो कहानियां काशीनाथ सिंह
 सेंदरा पंकज मित्र
 खाली दिनों में लोकबाबू की जंगलगाथा रविंद्र आरोही
 रामबहोरन की अनात्मकथा आशुतोष

 विशेष 
 हाशिमपुरा 22 मई विभूति नारायण राय

कविताएं 
 कविताएं बद्री नारायण
 इस्तिमा से खरीदा चमड़े का कोट नरेंद्र गौड़
 अच्छा आदमी प्रेम रंजन अनिमेष
 कविताएं जितेंद्र श्रीवास्तव
 तीन कविताएं अजेय
 कविताएं फरीद खान

पत्र
 भगवत शरण उपाध्याय के नाम पत्र प्रस्तुतिः डॉ. अरुण वर्मा

वृत्तांत 
 असमाप्त किस्सों की समापन किस्त राजेश जोशी

उपन्यास
 पतिया : देशज नारी विमर्श की प्रथम कृति वीरेंद्र यादव
 पतिया केदारनाथ अग्रवाल

 • आधुनिकता तथा आम आदमी इंद्रनाथ चौधुरी

 हिन्द स्वराज की अंतस्संरचनाः विकास के वैकल्पिक मॉडल

  की तलाश विनोद शाही

 आधुनिक सभ्यता एवं हिन्द स्वराज राजकुमार

 आधुनिक सभ्यता के नाम अभियोगपत्रा राकेश

 आधुनिक सभ्यता का विकल्प आशुतोष कुमार मिश्र

 हिन्द स्वराज : दो सवाल सुधीर चंद्र

 हिन्द स्वराज का वर्णाश्रमी पाठ विभूति नारायण राय

 सुस्तकदमी का सौन्दर्यशास्त्रा आदित्य निगम

 हिन्द स्वराज का क्या करें? प्रणय कृष्ण

  हिन्द स्वराज: ऐतिहासिक अनिवार्यता नंद किशोर आचार्य

 हिन्द स्वराज : कुछ नोट्स त्रिदिप सुद

 मानसिक स्वराज : हिन्द स्वराज के सौ साल बाद 
  
शैल मायाराम

 हिन्द स्वराज का पुनर्पाठ एवं छनीसगढ़ मुक्ति मोर्चा 
   हिलाल अहमद

 गांधीवाद, हिन्द स्वराज और हमारा समय दिनेश कुमार

 सभ्यता का समग्र बोध शम्भू जोशी

 हिन्द स्वराज : एक पाठ अभय कुमार दुबे

 गांधी का हिन्द स्वराज अरुणेश नीरन शुक्ल

संपादकीय अंक 29

साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली चीज नहीं, उसके आगे चलने वाला एडवांस गार्ड है। वह उस विद्रोह का नाम है जो मनुष्य के हृदय में अन्याय, अनीति और कुरुचि से होता है।

उपरोक्त उद्गार हमारे देश के महान कथाकार प्रेमचंद ने अप्रैल सन् 1936 में लाहौर में आयोजित आर्य समाज के भाषा सम्मेलन के अपने उद्बोधन में व्यक्त किया था। लाहौर वह लखनऊ से होते हुए गये थे जहां प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन में शिरकत करने के लिए आये थे। 9 अप्रैल 1936 को इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने यह भी कहा थाµ ‘‘साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है। उसका दर्जा इतना न गिराइये। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।’’ उक्त दोनों ही कथनों में जो समान पद प्रगट हुए हैं वे हैंµ साहित्य और राजनीति। और जो मीमांसा प्रस्तुत की गयी है वह है साहित्य और राजनीति के सम्बंध की। राजनीति के संदर्भ में साहित्य का पदानुक्रम क्या हो सकता है या क्या होना चाहिए, प्रेमचंद इसे स्पष्ट करते हैं। देख सकते हैं कि सन् 1936 अप्रैल महीने में साहित्य और राजनीति का अंतर्सम्बंध प्रेमचंद के लिए काफी महत्वपूर्ण था; इतना ज्यादा कि वह लखनऊ से लाहौर तक व्याप्त था।
तब से आज तक अठहत्तर वर्ष व्यतीत हो चुके हैं लेकिन साहित्य और राजनीति के बीच परस्पर सलूक का सवाल अभी भी अनसुलझा है, बल्कि शायद वह समय के साथ साथ अधिक जटिल और ज्वलंत हो चुका है। प्रेमचंद ने अपने वक्त में राजनीति को ‘मशाल’ दिखाने की अपेक्षा साहित्य से की थी और उसे जिस राजनीति के आगे चलने वाला ‘एडवांड गार्ड’ कहा था उसकी जरा आज की राजनीति से तुलना करिये तो कहने की जरूरत नहीं, बड़े ही शर्मनाक परिणाम सामने आयेंगे। प्रेमचंद के दौर में गांधी, नेहरू, भगत सिंह जैसे लोग हुए और उनकी अपनी अपनी राजनीतिक गतिविधियां थीं जिनमें बेशक साहित्य के महत्व का स्वीकार और उसके उजाले में समय को देखने, समझने तथा उसे व्याख्यायित करने की सूझ थी। गांधी और रवीन्द्र नाथ टैगोर के सम्बंध को हम इस प्रसंग में एक दृष्टांत के रूप में सम्मिलित कर सकते हैं। लेकिन चिराग लेकर ढूंढ़िये तो भी समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर इस प्रकार का कोई उदाहरण नहीं तलाशा जा सकता है। ऐसे यथार्थ में क्या बड़ा अजीब और हास्यास्पद दृश्य नहीं उपस्थित हो जायेगा कि साहित्यकार ऐसी निस्संग राजनीति के आगे बढ़ कर मशाल दिखा रहे हैं अथवा एडवांस गार्ड के रूप में चल रहे हैं जो उनकी ओर बिल्कुल ध्यान ही नहीं दे रही है और भरपूर बेगानेपन के साथ उनसे निरपेक्ष है। ऐसे में तो साहित्य की उपरिलिखित गतिविधियां फर्ज नहीं, दयनीय तमाशा मानी जायेंगी। यहां सवाल यह है कि फिर ऐसे हालात में साहित्य द्वारा राजनीति का किस प्रकार पाठ किया जाये? वह उससे अपने रिश्ते को लेकर क्या निर्णय करे? इन प्रश्नों पर चर्चा करने के पूर्व कुछ अन्य चीजों पर विचार जरूरी है।
साहित्य के महत्व और उसकी भूमिका को रेखांकित तथा निर्दिष्ट करने वाले प्रेमचंद के उपर्युक्त उद्धरणों के प्रायः दो तरह के पाठ सामने आते रहे हैं। एक तरह के लोगों का समूह यह पाठ करता है कि साहित्य समाज की सबसे अधिक नैतिक, ज्ञानी और महान और उद्धारक संरचना है और उसका कर्तव्य है कि वह अन्य सामाजिक उपकरणों के साथ राजनीति को भी राह दिखाये। निश्चय ही इस मान्यता की पृष्ठभूमि में भावुकता और सरलता के तत्व अधिक प्रभावी हैं। इसके पक्षधरों का आत्मविश्वास, उत्साह प्रबल से प्रबलतर हो जाने पर वे साहित्य को पांचवां वेद, ब्रह्म, देवी सरस्वती की वीणा की झंकार वगैरह, जाने क्या क्या बताने लगते हैं। दूसरी तरफ प्रेमचंद के उपरोक्त विचार को लेकर जो मार्क्सवादी समझ बनती है वह यूं है कि बुनियादी रूप से व्यवस्था परिवर्तन का मुख्य कारक राजनीति ही होती है। क्रांतिकारी राजनीतिक विचारधारा और उससे प्रतिबद्ध क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी की अगुवाई में ही व्यवस्था पविर्तन किया जा सकता है। साहित्य और अन्य कलारूपों की भूमिका आमूलचूल बदलाव की इस लड़ाई में सहयोग करने, उसे तीव्रतर बनाने की होती है। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि इस अभियान में साहित्य संलग्नक और उत्प्रेरक है न कि खुदमुख्तार और निर्णायक। यहां ठहर कर उपरोक्त अवधारणाओं को दृष्टिगत रखते हुए यह प्रश्न उठाने में कोई हर्ज नहीं है कि क्या साहित्य की नियति अनिवार्य रूप से राजनीति का पथप्रदर्शक अथवा अनुयायी बनना है? निःसंदेह कोई साहित्यकार चाहे जितनी दृढ़ता के साथ राजनीतिक दृष्टिकोण से परहेज करे किन्तु अपने नतीजे में उसकी अभिव्यक्ति उसके बगैर चाहेµ उसे बिना बतायेµ किसी न किसी प्रकार की राजनीति करती ही है। हालांकि इसका आशय यह नहीं होना चाहिए कि हर कला महज राजनीति का अनुवाद कर्म है। स्वयं प्रेमचंद वैचारिक धरातल पर गांधी से प्रभावित थे लेकिन अनेक बार वह गांधी के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। वह अपनी भरपूर क्षमता के साथ गांधीवाद से टकरा जाते हैं। ध्यान दें कि प्रेमचंद ने अपनी जिन रचनाआंे में गांधी जी के हृदय परिवर्तन, ट्रस्टीशिप वगैरह के सिद्धांतों को प्रचारित करने का यत्न किया वे उनकी कामयाब कथाएं नहीं हैं। इसके उलट वह जहां गांधीवाद और बोल्शेविक उसूलों के विरुद्धों के मध्य जिन्दगी की गहमागहमी को उतारते हैं वे उनकी कालजयी कृतियां हैं।
आधुनिक भारतीय वांगमय को तीन राजनीतिक शख्सियतों ने सर्वाधिक प्रभावित कियाµ गांधी, मार्क्स और नेहरू और तीनों के ही मध्य दृष्टियों की कितनी भी भिन्नता रही हो किन्तु एक समानता थी कि वे तीनों विशुद्ध राजनीतिज्ञ नहीं थे। अपने अपने तरीके से उनमें मनुष्यता के उच्चतम स्वरूप के स्वप्न शामिल थे। उन्होंने सभ्यता को केवल राजनीति के चश्मे से नहीं देखा। गांधी के बारे में तो यह भी कहा जा सकता है कि राजनीतिक शक्ति से भी ज्यादा इंसान की आंतरिक शक्तिµ भीतरी खूबसूरती और आत्मबल का जागरण उनका मकसद था। लेकिन आज हम अपने देश के नेताओं और उनके राजनैतिक विश्वास तथा उसे साकार करने के लिए उनके द्वारा की जा रही कारगुजारियों का अवलोकन करें तो पायेंगे कि ऐसी दृष्टिहीन राजनीति को मशाल दिखा कर क्या कर लेंगे और उसका अनुगमन करके क्या कर लेंगे! यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारा जो समकालीन समय है उसमें राजनीति का जो चरित्रा है वह ताकत, खुदगर्जी, दांवपेंच, मदांधता और क्रूरताओं से भरा हुआ है। हमें जानना होगा कि उसकी ऐसी परिणति क्या साहित्य, कला जैसी सांस्कृतिक इकाइयों के प्रति घनघोर उपेक्षा के कारण हुई है? हम कहना चाहेंगे कि साहित्य, कला की अग्रगामी चेतना से विहीन सत्तातंत्रा अनिवार्यतः उसी गति को प्राप्त होता है जहां वह आज करीब करीब पहुंच गया हैµ अहंकारी, आत्ममुग्ध और बेरहम। प्रश्न है, ऐसे दौर में साहित्य राजनीति से अपने सम्बंध को किस प्रकार का स्वरूप दे। वह उसे रोशनी दिखाये, उसका जमीर जगायेµ यह आदर्श स्थिति है मगर यह सम्भवतः पत्थर पर दूब उगाना होगा क्योंकि आज की राजनीति जिनकी मुट्ठियों में कैद है उनका शब्द कर्म से कतई सरोकार नहीं है। और जहां तक राजनीति को बुनियादी कारक मानते हुए उसका उत्प्रेरक बनने की अवधारणा पर अमल करने का सवाल है तो आज परिदृश्य पर राजनीति की वैसी विश्वसनीय आवाजें और शक्लें नदारद हो चुकी हैं। फिर क्या करे साहित्य? क्या वह गैरराजनैतिक हो जाये? निश्चय ही यह परिणाम कुछ लोगों को पसंद आयेगा जो बड़ी आत्मश्लाधा के साथ साहित्य की स्वायत्तता का गुणगान करते हुए राजनीति निरपेक्ष रचनाशीलता की पैरवी करते हैं और समाज निरपेक्ष रचनाएं लिखते हैं। दरअसल साहित्य में राजनीति निरपेक्षता की वकालत भी अपने वास्तविक अर्थ में एक प्रकार की खतरनाक राजनीति है जो अंततः वंचित, प्रताड़ित वर्ग की मुखालिफत और वर्चस्वशाली समुदाय की हिफाजत करती है। पतनशील राजनीति से घबरा कर राजनीति की चेतना का परित्याग करना उसी प्रकार होगा कि जैसे संसार के दुखों और संकटों से घबरा कर आत्महत्या को एक बेहतरीन विकल्प के रूप में मान्यता दी जाये।
तब फिर रास्ता क्या है? देखना है कि प्रारम्भ में हमने प्रेमचंद के जिन दो कथनों को उद्धृत किया है उनसे एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि प्रेमचंद इस बात के बिल्कुल कायल न थे कि साहित्य राजनीति का अनुगामी बने। यहां वस्तुतः वह साहित्य की आजादी और स्वविवेक की पैरवी कर रहे हैं। मुश्किल साहित्य के ‘राजनीति के पीछे चलने वाली चीज’ नहीं होने में नहीं है, बल्कि आगे चलने वाला ‘एडवांस गार्ड’ और ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ बनने में है। हमें लगता है कि कठिनाई होने की वजह यह है कि साहित्य के आगे चलने का अर्थ प्रायः राजनीति के साथ चलते हुएµउससे कदमताल मिलाते हुए आगे आगे चलने से लिया जाता है। हम जरा पारम्परिक ढर्रे से उबर कर अन्य पाठ करें तो कहा जा सकता है कि यहां साहित्य के राजनीति से संलग्न अथवा विक्षिन्न होने की बात नहीं कही गयी है बल्कि आशय यह है कि राजनीति से वाबस्ता होते हुए भी साहित्य राजनीति के अधीन नहीं है। ‘मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ से अभिप्राय यह है कि राजनीति से असहमति, उसकी आलोचना और जरूरत पड़ने पर उसका प्रतिरोध करने का हक साहित्य के पास रहता है। मशाल दिखाने का मतलब यह नहीं है कि राजनीति का रास्ता प्रशस्त करने के लिए साहित्य उजाला फैलाता है, वरन् यह है कि उस उजाले का काम मनुष्य के जीवन के संदर्भ में राजनीति की अपर्याप्तता, सीमाओं को उजागर करते हुए अपनी अभिव्यक्ति करना है। इस बिन्दु पर साहित्य राजनीति से स्वायत्त भले न हो किन्तु वह स्वतंत्रा निश्चय ही हो जाता है। और दुनिया ऐसे उदाहरणों से भरपूर सम्पन्न है कि साहित्य ने राजनीति की आलोचना करने, उसकी असंगतियों और अंतर्विरोधों को उजागर करने के कर्तव्य को भरपूर निबाहा है। अंत में यह भी कहना है कि साहित्य जब अपनी इस जिम्मेदारी को निबाहता है तो उसके लिए राजनीति का अर्थ मात्रा कोई दल या उसका एजेण्डा या घोषणापत्रा नहीं रह जाता है। राजनीति को अपने वक्त की शक्ति संरचना के रूप में ग्रहण करना चाहिए और उसके सत्य को उद्घाटित करने के लिए एडवांस गार्ड बनना पड़े या मशाल दिखानी हो, जो भी बन पड़े, करे। खुद प्रेमचंद का साहित्य लोक इस बात का साक्ष्य है कि उन्होंने अपने वक्त की समस्त शक्ति संरचनाओं को चुनौती दी थी।

राजेन्द्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, ओम प्रकाश वाल्मीकि, विजयदान देथा, के.पी. सक्सेना जैसे विशिष्ट व्यक्तित्वों को पिछले दिनों हमने खो दिया। उनके निधन पर तद्भव शोकाकुल है। हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।

अखिलेश

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