जीवन
तो फिर विपथन ही सही...(II) भानु भारती 

शताब्दी
न याद किया जाना अतिया हुसैन का वीरेन्द्र यादव 


लेख
अभिशप्त आत्माओं का आलाप: मलयालम स्त्राी आत्मकथा गरिमा श्रीवास्तव
समकालीन जीवन और हिन्दी उपन्यास अजय वर्मा 


लम्बी कहानियां
एगही सजनवा बिनऽऽऽ ए राम! उपासना 
चांदी चोंच मढ़ाएब ए कागा उर्फ चॉकलेट फ्रेण्ड्स शिवेन्द्र 

कविताएं 
ग्यारह कविताएं कुंवर नारायण / पांच कविताएं ऋतुराज / तीन कविताएं आर चेतनक्रांति / ऐसा ही है जीवन सुंदर चंद ठाकुर / कविताएं विवेक निराला / कविताएं आलोक पराड़कर 

वृत्तांत 
अर्थात् औरों की कथा-प्प्प् अरुण कमल 


आत्मकथा
मणिकर्णिका-III डॉ. तुलसीराम 


समीक्षाएं 
भारतीय समाज और अल्पसंख्यक समुदाय मधुरेश
भेदक सचाइयों का कथात्मक रूपांतरण अवधेश मिश्र
कथालोचना के तीन युवा स्वर अमिताभ राय
वैश्वीकृत समय और हिन्दी आलोचना रणेन्द्र
‘आत्म’ का लोप और किताबों के बहाने कल्लोल चक्रवर्ती

 

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जीवन
तो फिर विपथन ही सही... भानु भारती

शताब्दी
उत्पीड़ित और अपमानित लोगों का संसार मोहम्मद मसूद

कहानियां
मिनाल पार्क और तीन बूढ़े वंदना शुक्ला 
ए घुटरू ! ए घुटरू ! कहनी कहो न... शिवेन्द्र

आत्मकथा
मणिकर्णिका डॉ. तुलसीराम

उपन्यास
बखेड़ापुर हरे प्रकाश उपाध्याय

समीक्षाएं 
निज लय का अनुपम गद्य पंकज पराशर
व्यंजना शक्ति का नया रूप अजय वर्मा 
भूमंडलीकरण के दौर में आधुनिकता अरुण होता

लेख
प्राचीन भारत में शिल्पियों की स्थिति रमानाथ मिश्र 
सामाजिक पदानुक्रम का प्रत्यंतरण अवधेश मिश्र

विशेष 
अपनी अपनी आधुनिकता हरबंस मुखिया

कविताएं 
आठ कविताएं विष्णु नागर / कविताएं बद्री नारायण / कविताएं प्रकाश / हलफनामा: कविता के दक्खिन टोले से अशोक कुमार पाण्डेय / कविताएं अपर्णा मनोज / तीन कविताएं अविनाश मिश्र

वृत्तांत 
अर्थात् औरों की कथा अरुण कमल

 समीक्षाएं 
समय की सचाइयां तलाशता साहित्य बिपिन तिवारी
कविता की नाउम्मीदी के खिलाफ मदन कश्यप
तो जीवन कितना वृहत्तर हो जायेगा अनिल त्रिपाठी
काव्य चित्त का परिष्कार और विस्तार जितेन्द्र श्रीवास्तव

समाज 
मार्फत दिल्ली कृष्णा सोबती

शताब्दी
‘मैं’ और ‘वे’ के बीच रामविलास शर्मा का ज्ञानकांड अभय कुमार दुबे 
रामविलास जी की एक डायरी विजय माहन शर्मा 

कहानियां
फेसबुक और बनना पड़ोसी के मकान काकृनवीन जोशी 
परिवार, (राज्य) और निजी सम्पत्ति राकेश मिश्र 
द रॉयल घोस्ट तरुण भटनागर 

लम्बी कहानी 
कट टु दिल्लीः कहानी में प्रधानमंत्राी का प्रवेश उमा शंकर चौधरी 

कविताएं 
कविताएं कात्यायनी / कविताएं एकांत श्रीवास्तव / सात कविताएं गीत चतुर्वेदी / दो कविताएं श्रीप्रकाश शुक्ल / कविताएं यू.के.एस. चौहान / तीन कविताएं प्रीति चौधरी

आत्मकथा
मणिकर्णिका डॉ. तुलसी राम

लेख
दृश्य: बिम्ब और गाथा नित्यानंद तिवारी
महाराष्ट्रीय नवजागरण में निरंतरता वीर भारत तलवार 

बहस
यथार्थवाद और मार्क्सवाद को विकसित करें रमेश उपाध्याय जवाबे शिकवा राजकुमार

वृत्तांत 
अर्थात औरों की कथा अरुण कमल

विशेष
बच्चों को क्या पाठ पढ़ाएं? दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा 

समीक्षाएं/  रोती हुई संवेदनाओं की आत्मकथा चौथीराम यादव
समीक्षाएं/ निरुपनिवेशीकरण के हक में अजय तिवारी  
समीक्षाएं/ कविता सम्प्रति: पीढ़ियों की जुगलबंदी ओम निश्चल 
समीक्षाएं/ वैचारिक आधार की दृढ़ता वीरेन डंगवाल 
समीक्षाएं/ संघर्ष काल में कथाएं वैभव सिंह
समीक्षाएं/ समय और सभ्यता का भाष्य अशोक सिंह यादव 

जीवन
• जीवन क्या जिया! नामवर सिंह
 मुड़ मुड़ के देखता हूं... राजेन्द्र यादव
 यह जान तो आनी जानी है... गुरदयाल सिंह

समाज
 विस्थापन की पीड़ा पी.सी. जोशी

शताब्दी
 नयी चेतना का संघर्ष अजय तिवारी 
 जैनेन्द्र की रचनात्मक दुनिया में स्त्री प्रीति चौधरी

लेख
 'शृंखला की कड़ियां' और मुक्ति की राहें मैनेजर पाण्डेय
• गांधी: अपना सामना सुधीर चंद
 विभाजन, इस्लामी राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमान (संदर्भ: आधा गांव, उदास नस्लें, आग का दरिया व छाको की वापसी) वीरेन्द्र यादव 
 भक्ति के बृहद आख्यान में 'सत्पुरुषों' की पीड़ा बजरंग बिहारी तिवारी
 स्त्री प्रतिरोध के पुरा लेख अवधेश मिश्र

मुलाकात
 भारत में आर्यों की अखंड इकाई नहीं थी डाक्टर रामविलास शर्मा से नामवर सिंह की वार्ता

बहस
 आम्बेडकर चिन्तन में मार्क्स कंवल भारती

संस्मरण
 लखनऊ मेरा लखनऊ मनोहर श्याम जोशी
 मैनपुरी का शहजादा कृष्णा सोबती 
 तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द ज्ञानरंजन 
 फिराक वार्ता विश्वनाथ त्रिपाठी
 पंडित श्रीलाल शुक्ल रवीन्द्र कालिया

 

डायरी 
 गुजरात: यहां भी है, वहां भी है नमिता सिंह

यात्रा
जंगलों की ओर मधु कांकरिया

वृत्तांत 
कितने शहरों में कितनी बार: दिल्ली ममता कालिया

आख्यानक 
घर का जोगी जोगड़ा काशीनाथ सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया: डॉ. तुलसी राम

विशेष 
 रतनबाई जिन्ना: जिन्ना की कामना का नीलकुसुम वीरेन्द्र कुमार बरनवाल
 19वीं सदी में स्त्री चेतना और ताराबाई शिन्दे वीरभारत तलवार
 रणभूमि में भाषा विभूति नारायण राय 
 आत्म और आत्मचरित राजकुमार

कहानियां

 नपनी दूधनाथ सिंह 
 ख्वाजा, ओ मेरे पीर! शिवमूर्ति 
 इति गीतांजलि श्री 
 रंगमंच पर थोड़ा रुक कर देवेन्द्र
 भूलभुलैयां सारा राय 
 खाना योगेन्द्र आहूजा 
 परिन्दे का इंतजार सा कुछ... नीलाक्षी सिंह 
 नोटिस राजू शर्मा 
 क्विजमास्टर पंकज मित्र
 मौसम मो. आरिफ
 इति गोंगेश पाल वृत्तांत कुणाल सिंह 
 सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय 
 भूलना चंदन पाण्डेय 
 एक जिन्दगी... एक स्क्रिप्ट भर! उपासना

कविताएं 
 कोलम्बस का जहाज कुंवर नारायण 
 इब्राहिम मियां का हालचाल केदारनाथ सिंह
 विनोद कुमार शुक्ल की कविता 
 अपने बहीखाते में अशोक बाजपेयी
 होनहार विष्णु खरे 
 हमसे भी तो कुछ सीखना चाहिए मनुष्यों को चंद्रकांत देवताले 
 बैलगाड़ी भगवत रावत
 समुद्र पर हो रही बारिश नरेश सक्सेना 
 मेरे हिस्से की शांति ऋतुराज 
 जगह बदलनी होगी वेणु गोपाल
 खिलौना राजेश जोशी
 दोस्त अरुण कमल 
 कुछ कद्दू चमकाये मैंने वीरेन डंगवाल 
 खेल के नियम विजय कुमार
 पुकार पंकज सिंह 
 मेरी हैसियत विष्णु नागर
 प्रेत विनोद दास
 पिताओं के बारे में कुछ छूटी हुई पंक्तियां कुमार अम्बुज
 निजामुद्दीन देवी प्रसाद मिश्र 
 आधी रात मे रुलाई का पाठ बद्रीनारायण
 हंसने से अधिक रोने की क्रियाएं नवल शुक्ल 
 दृश्यों से लबालब इस दुनिया में हरीश चन्द्र पाण्डेय 
 हवाई थैला मदन कश्यप 
 नदी और पुल विमल कुमार 
 रीमिक्स आशुतोष दुबे 
 बात पवन करण 
 हड़परौली श्रीप्रकाश शुक्ल 
 नमकहराम जितेन्द्र श्रीवास्तव 
 जिसके पीछे पड़े कुत्ते गीत चतुर्वेदी 
 इस बरस फिर हरे प्रकाश उपाध्याय 
 विलाप नहीं कुमार वीरेन्द्र 
 वैश्विक बाजार में लुप्त होने से पहले पटरी बाजार का एक शब्दचित्रा मदन केशरी
 मुक्तिबोध का लिफाफा यू.के.एस. चौहान
 दिल्ली में टाइम क्या चल रहा है सर्वेन्द्र विक्रम
 तुम्हारी जेब में एक सूरज होता अजेय
 नानी का चश्मा फरीद ख

 जीवन 
 यह जान तो आनी जानी है... गुरदयाल सिंह

शताब्दी 
 अज्ञेय : दिक और काल के बरक्स राहुल सिंह
 प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल सा सुबोध शुक्ल
 आत्मकथन शमशेर बहादुर सिंह

लेख 
 वैकल्पिक आधुनिकता, आधुनिकता के विकल्प, अनेक आधुनिकताएं या कुछ और   हरबंस मुखिया
• एक वाकिया' संविधान सभा काः चंद उलझे हुए सवालों पर एक नजर और आदित्य निगम

कहानियां 
 दो कहानियां काशीनाथ सिंह
 सेंदरा पंकज मित्र
 खाली दिनों में लोकबाबू की जंगलगाथा रविंद्र आरोही
 रामबहोरन की अनात्मकथा आशुतोष

 विशेष 
 हाशिमपुरा 22 मई विभूति नारायण राय

कविताएं 
 कविताएं बद्री नारायण
 इस्तिमा से खरीदा चमड़े का कोट नरेंद्र गौड़
 अच्छा आदमी प्रेम रंजन अनिमेष
 कविताएं जितेंद्र श्रीवास्तव
 तीन कविताएं अजेय
 कविताएं फरीद खान

पत्र
 भगवत शरण उपाध्याय के नाम पत्र प्रस्तुतिः डॉ. अरुण वर्मा

वृत्तांत 
 असमाप्त किस्सों की समापन किस्त राजेश जोशी

उपन्यास
 पतिया : देशज नारी विमर्श की प्रथम कृति वीरेंद्र यादव
 पतिया केदारनाथ अग्रवाल

 • आधुनिकता तथा आम आदमी इंद्रनाथ चौधुरी

 हिन्द स्वराज की अंतस्संरचनाः विकास के वैकल्पिक मॉडल

  की तलाश विनोद शाही

 आधुनिक सभ्यता एवं हिन्द स्वराज राजकुमार

 आधुनिक सभ्यता के नाम अभियोगपत्रा राकेश

 आधुनिक सभ्यता का विकल्प आशुतोष कुमार मिश्र

 हिन्द स्वराज : दो सवाल सुधीर चंद्र

 हिन्द स्वराज का वर्णाश्रमी पाठ विभूति नारायण राय

 सुस्तकदमी का सौन्दर्यशास्त्रा आदित्य निगम

 हिन्द स्वराज का क्या करें? प्रणय कृष्ण

  हिन्द स्वराज: ऐतिहासिक अनिवार्यता नंद किशोर आचार्य

 हिन्द स्वराज : कुछ नोट्स त्रिदिप सुद

 मानसिक स्वराज : हिन्द स्वराज के सौ साल बाद 
  
शैल मायाराम

 हिन्द स्वराज का पुनर्पाठ एवं छनीसगढ़ मुक्ति मोर्चा 
   हिलाल अहमद

 गांधीवाद, हिन्द स्वराज और हमारा समय दिनेश कुमार

 सभ्यता का समग्र बोध शम्भू जोशी

 हिन्द स्वराज : एक पाठ अभय कुमार दुबे

 गांधी का हिन्द स्वराज अरुणेश नीरन शुक्ल

संपादकीय अंक 28

लोग जानते हैं कि ताल्सताय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘अन्ना कैरेनिना’ में कहा था: दुनिया के सभी सुखी परिवार सुखी एक तरह से होते हैं किन्तु दुखी अपने अपने ढंग से। केवल सुख और दुख के प्रकरण में ही नहीं बल्कि देखा यह जाता है कि जीवन और समाज में प्रायः हर अच्छे की तुलना में उसके विलोम यानी बुरे रूप में अधिक वैविध्य, नाटकीयता और रोचकता होती है। आप इस बात की थाह लेना चाहें तो कोई भी उदाहरण चुन सकते हैं जैसे: अच्छा बुरा, दया क्रूरता , संवेदनशील संवेदनहीन, दिन रात, अहिंसा हिंसा, प्रेम घृणा आदि। कुछ इसी तरह के कारण होते हैं कि अनेक अच्छे अभिनेता बुरे चरित्रों के निर्वहन में अपनी अभिनय प्रतिभा के व्यापक उपयोग की सम्भावना देखते हैं। साहित्य में भी हम सूरदास जैसे कुछ महान रचनाकारों को छोड़ दें जिनके यहां बुरे पात्रा और भाव अनुपस्थित हैं तो आधुनिककाल के पूर्व अधिसंख्य अमर कृतियां बगैर खलनायकों के नहीं रची गयी हैं। यह खलनायक इन्सान, परिस्थिति, प्रकृति, दुर्योग; किसी भी भेष में हो सकता है। शायद ये खलनायक न होते तो साहित्य में ‘ट्रेजडी’ का आगमन न हुआ होता। खैर अभिनेता हों या साहित्यकार; उन्हें उनकी कला को उच्चतर बनाने के लिए भले ही बुरी आत्माओं ने आकृष्ट किया हो किन्तु समाज और जीवन में ऐसे लोगों को आला स्थान दिये जाने का रिवाज नहीं रहा है। और लोग भी प्रायः बुरा आदमी बनना कोई शान की बात नहीं समझते रहे हैं।
उ$पर हमने साहित्य की चर्चा करते हुए ‘आधुनिककाल के पूर्व’ पद का प्रयोग इसलिए किया था कि आधुनिकता ने मनुष्य के सोचने विचारने के ढंग में बड़ा भारी परिवर्तन कर दिया था। आधुनिकता ने सिखाया कि इन्सान को अच्छे और बुरे के द्विविभाजन में मत देखो। उसे केवल स्याह या केवल श्वेत में देखोगे तो कभी उसको उसके सच्चे रूप में नहीं परख पाओगे। क्योंकि जो इन्सान है वह दोनों के सहमेल से बना है और समाज की तरह मनुष्यों में भी अंतरविरोध होते हैं और अंतरविरोध कोई अपराध नहीं होता है वरन एक तरह से उनमें ही परिवर्तन तथा विकास के गुणसूत्रा निवास करते हैं। इसी दृष्टि के चलते आधुनिकता ने साहित्य में यथार्थवाद को जन्म दिया था। किन्तु यह भी सच है कि परस्पर विरुद्ध गुणों को वहन करने के बावजूद समझना होता है कि किसी कालखंड के मनुष्यों में अच्छे और बुरे गुणों में किसका पलड़ा अधिक भारी है? इस मूल्यांकन से ही उस समय में उस समाज का वास्तविक मूल्यांकन किया जाना सम्भव होता है। उक्त कसौटी पर कसे जाने पर सम्भव है कि अनेक निर्मित धारणाएं उलटपुलट हो जायें। बीसवीं सदी में जो आधुनिकता की सदी कही जाती है; ऐसा विश्वास था कि आधुनिकता मनुष्य की अंदरूनी नकारात्मकताओं पर विजय पायेगी। जैसे जैसे सभ्यता विकसित होगीµ आधुनिकता उन्नत होगीµ एक संुदर, सच्चे और मानवीय गुणों से भरपूर इन्सान का निर्माण होगा। इसी प्रकार का एक अन्य विश्लेषण भी था कि जब समाज में आर्थिक उन्नति शिखरों को चूमेगी और मशीनें मानवीय श्रम के बोझ को कम कर देंगी तो लोगों के हाथ खाली होंगे; लोगों के पास वक्त रहेगा; ऐसी स्थिति में शारीरिक श्रम से फुर्सत पाया हुआ इन्सान अपने मस्तिष्क को ज्यादा सक्रिय कर सकेगा जिसका नतीजा होगा; संसार में एक से बढ़ कर एक खूबसूरत, उदात्त, मानवोपयोगी विचारों, कलाओं, साहित्य, दर्शन, आविष्कारों का जन्म! हम यह कदापि नहीं कहेंगे कि उपरोक्त धारणाएं तथा विश्वास भ्रामक सिद्ध हुए या भविष्य ने उन्हें विफल प्रमाणित किया लेकिन कम से कम यह कहना ही पड़ेगा कि मनुष्य के सद्गुणों और सभ्यता विकास के मध्य कोई यांत्रिक सम्बंध नहीं होता है। प्रायः देखा गया है कि अत्यंत अभाव और गहरी प्रतिकूलताएं चाहे व्यक्ति हो या समाज में अपराध और अन्य ढंग की संवेदनहीनता की सृष्टि करती हैं तो घोर समृद्धि भी व्यक्ति और समाज में अनेक प्रकार के गुनाहों को पैदा करती है। समकालीन दुनिया में अमीर जितनी लूट, बर्बरता, क्रूरता और अनीति को अंजाम दे रहे हैं उसके सम्मुख मुफलिस की बुराइयां दूर दूर तक कहीं नहीं ठहरतीं। दुनिया में रईसी और आधुनिकता का सबसे बड़ा ‘मसीहा’ देश अमेरिका हिंसा, लूट, अमानवीयता और मौत का सबसे बड़ा सौदागर है; यह किसी के भी लिए रहस्य नहीं रह गया है।
सर्वविदित है कि गांधी जी साध्य को हासिल करने के लिए साधन की पवित्राता पर बड़ा जोर देते थे; इसीलिए उनका यह भी मानना था कि हिंसा के बल पर हासिल की गयी कोई विजय प्रतिक्रिया में हिंसा को ही रचती है। इतिहास साबित करता है कि समाजवादी या पूंजीवादी; दमन की शक्ति पर निर्मित कोई भी सामाजिक व्यवस्था अंततः समस्याग्रस्त होती है साथ ही यह भी कि हिंसा उसका स्थायी उत्पाद होती है। इसी तरह हम कह सकते हैं कि अनैतिक, अपवित्रा और आपराधिक तरीके से अर्जित की गयी सम्पन्नता भी आत्मा को दागी बनाने का काम करती है। आज जैसे जैसे अमेरिका और अमीरी का जयघोष चतुर्दिक व्यापक और प्रगाढ़ होता जा रहा है वैसे वैसे हिंसा की शक्तियां बेखौफ हो रही हैं।
विरोधी तर्क के रूप में कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता का इतिहास ही रक्तरंजित है। पुराने दौर में जितने युद्ध, जितने नरसंहार हुए उसको देखते हुए आज जो तबाही का मंजर है कुछ खास अस्वाभाविक नहीं है। इसे अपने विश्लेषण में सम्मिलित करते हुए हम कहना चाहेंगे कि इन दिनों हम सर्वाधिक हिंसक दौर में रह रहे हैं। ‘हम सर्वाधिक हिंसक दौर में रह रहे हैं’ यह कथन तभी स्पष्टता प्राप्त करेगा जब यह जोड़ा जाये कि हिंसा आज के समय में व्यापक के साथ साथ काफी गहरी हो चुकी है। और यह भी कि इक्कीसवीं सदी में पहुंच कर वह बहुरंगी और धूर्त हो गयी है। हम जब हिंसा का लेखा जोखा करते हैं तो हमारे सामने प्रायः उसका स्थूल रूप रहता है। अपने स्थूल रूपाकार अर्थात युद्ध, नरसंहार, आतंकवाद, हत्याओं के रूप में भी वह मौजूदा विश्व में अपरम्पार है किन्तु यहां हम प्रच्छन्न और अमूर्त हिंसा का भी जिक्र करना चाहेंगे; उस भावनात्मक हिंसा का जिक्र करना चाहेंगे; जो हमें एकदम से दिखायी नहीं देती किन्तु दैनंदिन के सामाजिक व्यवहार में पल प्रतिपल घटित होती रहती है। ऐश्वर्य की अंधी दौड़ मेंµ मनचाहा; किसी भी तरह पा लेने की आंधी मेंµ लोग इतने बदहवास, अधैर्यवान और संवेदनहीन होते जा रहे हैं कि जो राह में आ रहा है कुचल दिया जा रहा है। अभी हम अमूर्त और भावनात्मक हिंसा की चर्चा कर रहे थेµ आज का मनुष्य दूसरे मनुष्यों के प्रति, बुजुर्गों, बच्चों, स्त्रिायों, पड़ोसियों के प्रतिµ प्रकृति और मानवेतर जीव जंतुओं के प्रति जितना गैर जिम्मेदार तथा हृदयहीन हुआ है वह अकथनीय है। यह बताने की जरूरत नहीं है; फिर भी; जब हम चिकित्सा, धन, शिक्षा से सम्बंधित किसी भी प्रकार के मनुष्यविरोधी अभाव से दुखी प्रताड़ित व्यक्ति अथवा समुदाय को असहाय अकेला छोड़ कर अपने सुख चैन की डफली वंशी बजा रहे होते हैं तो यह भी एक प्रकार की हिंसा है। दुनिया को पतन के गर्त में धकेलना निश्चय ही हिंसा का वीभत्सतम रूप है लेकिन इस कार्रवाई पर चुपचाप बैठे रहना और प्रतिरोध की आवाजों का न उठना भी एक प्रकार की हिंसा है। कहना होगा कि जब से दुनिया ने विचारों को विदाई देने की रस्म चलायी है; दोनों प्रकार की हिंसाओं में भारी उछाल आया है। यह किस तरह की आधुनिकता है कि देश के तमाम इलाकों में स्त्राी जाति को न जन्म लेने की स्वतंत्राता है न प्रेम करने की, न मर्जी से विवाह करने की। यदि स्त्राी ऐसा कर डालने का जोखिम उठाती हैं तो उनका वध करके जीवन जीने के अधिकार से भी वंचित कर दिया जा रहा है। समूचे देश भर में रोज रोज घटित होने वाले बलात्कार के हादसे समाज की जिस रूप में शिनाख्त कहते हैं उसकी क्षतिपूर्ति क्या विकास दर, सेंसेक्स की तरक्की से की जा सकती है! भावावेश माना जा सकता है; इसका खतरा उठाते हुए भी कहना पड़ेगा कि उपरोक्त परिदृश्य में साहित्य जो रचा जा रहा है उसमें यदि अपने वक्त की छवियां और विरोध के स्वर नहीं हैं और वह जननिरपेक्ष होकर शब्दक्रीड़ा कर रहा है तो इसे भी सामाजिक और आपराधिक हिंसा की कोटि में रखा जाना चाहिए।
उपरोक्त पृष्ठभूमि में कहा जा सकता है: मौजूदा समय में हिंसा अपने भांति भांति के रूप में तबाही मचा रही है। वह गुजरात में हुए अल्पसंख्यकों के नरसंहार में थी और वह तब भी प्रकट हुई जब गुजरात के मुख्यमंत्राी नरेन्द्र मोदी उन मृतात्माओं के संदर्भ में कहते हैं कि कुत्ते का पिल्ला जब सड़क पर कुचला जाता है तब उनको तकलीफ होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि आज राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तमाम तरह के बहुरूप में हिंसा वारदातें कर रही है। जिन्दगी, भावनाओं, स्वाभिमान, विश्वास सभी के वध का सिलसिला पूरे रफ्तार पर है।
आज की हिंसा के चरित्रा के एक तत्व पर गौर करने की आवश्यकता है कि उसमें घृणा की मात्रा सघन होती जा रही है। दूसरे धर्म, जाति, सम्प्रदाय, प्रांत, देश, संस्कृति के लिए नफरत में इजाफा हमारे रोजमर्रा के जीवन में साफ साफ देखा जा रहा है। यह अत्यंत खतरनाक है। राज्य विस्तार के लिए हुए युद्धों में सेनाएं लड़ती थीं और विजय के बाद लूटपाट करने या वहां अपना शासन स्थापित करने के बाद वैमनस्य भूल जाती थीं। स्वयं भारत में मुगलों का आगमन इसका उदाहरण है। किन्तु घृणा की बिसात पर होने वाली हिंसा ज्यादा भयानक और गहन होती है। अब तो युद्ध भी घटित होने के पहले घृणा के दर्शन से अपनी वैधानिकता प्राप्त करने का जतन करते हैं। स्वयं अमेरिका अपने दुश्मन के खिलाफ पहले घृणा का वातावरण बनाता है फिर हमला करता है। इस मायने में आधुनिकता का अलम्बरदार अमेरिका हो या प्राचीनता के पैरोकार हमारे देश के वे धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन जो साम्प्रदायिक दंगों को अंजाम देते हैं लेकिन उसके पहले और बाद घृणा का प्रचार करते हैं। यूं हर किसी को मालुम है कि दुनिया में कहीं भी किसी भी रूप में यदि घृणा है तो उसका अवश्यम्भावी उत्पाद हिंसा होती है। साहित्य हो या अन्य कलाएं उनका सबसे बड़ा मूल्य यही है कि वे घृणा और हिंसा के विपर्यय हैं। उनके आवास में प्रेम और शांति निवास करते हैं। हमारे समाज चिन्तक और दुनिया के व्याख्याकार ऐसा मान रहे हैं कि भविष्य शायद ज्यादा हिंसा और घृणा की गिरफ्त में हो; तो ऐसा न हो; हमारी दुनिया इतनी विकृत और बरबाद न हो; इसके लिए साहित्य और अन्य कलारूपों को नये तरीके से तैयारी करनी होगी।

विगत दिनों हिन्दी आलोचना के बहुत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व शिव कुमार मिश्र तथा डॉ. रघुवंश, असगर अली इंजीनियर, मस्तराम कपूर, के. विक्रम सिंह, सुरेन्द्र तिवारी का निधन हो गया। हम सभी इनके न होने से शोकाकुल हैं। तद्भव परिवार इन सभी विभूतियों को नमन करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

अखिलेश

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